13 June 2009

पिटाई और धुनाई में अंतर

मुझे बड़ा गर्व है कि मैं हिंदुस्तानी हूं और अपने ही देश में रहता हूं। ये देश वाकई कमाल का है। यहां के लोग बड़े सहिष्णु होते हैं। यहां पत्थरों को भगवान समझकर पूजा जाता है। आप क्या सोच रहे हैं। हम भाट नहीं हैं। देश की स्तुति भी नहीं कर रहे हैं। वाकई ये सच्चाई है कि अपना देश महान है। इस देश ने गांधी को जन्म दिया है, तो भगतसिंह को भी। यहां शांति और पौरुषता का अनोखा मेल देखने को मिलता है, जो पूरी दुनिया में कहीं नजर नहीं आता। पूरी दुनिया हमें घूरने मतलब घूमने आती है। उनकी यहां की दिलकश जगहों को देखने की बजाय यहां रहने वालों में ज्यादा दिलचस्पी है। उन्हें आश्चर्य इस बात पर है कि किस तरह हर तरह के संकट से जूझते हुए हम खुशी-खुशी अपनी-अपनी जिंदगी में मगन रहते हैं।

हम जब-जब इन विदेशी पर्यटकों को देखते हैं, तो सोचते हैं कि ये आखिर खाते क्या हैं। खा-पीकर बिल्कुल सांड रहते हैं। क्या आपने कभी कोई ऐसा विदेशी देखा है, जो मरियल हो, बीमार दिखाता हो। तो हम तो उन्हें देखकर डर जाते हैं कि कहीं अगर किसी दिन किसी विदेशी ने गलती से हमारे कंधे पर हाथ रख दिया, तो उस दिन तो सीधा खड़ा रहना ही मुश्किल हो जाएगा। जिस जगह पर हमें ये नजर आ जाते हैं, हम तो दस फुट दूर खिसक लेते हैं। इसका यह मतलब कतई नहीं कि हम कमजोर हैं। ये तो हमारा सीधापन है जी। वरना... हम तो...। अब रहने भी दीजिए।
वैसे हम अगर किसी से डरते हैं, तो एकमात्र अपनी बीवी से। रोज हमारी बीवी खुद को आस्ट्रेलिया समझकर हम पर हमला बोल देती है, पर हम आह तक नहीं भरते। उसके शस्त्र बदलते रहते हैं, पर हमारी खाल तो वही रहती है ना। पिटते-पिटते तो एक बार गधा भी अपने मालिक को दुलत्ती मारकर भाग छूटता है और एक हम हैं कि बस पिटे जाते हैं। यूं तो पिटने और पीटने में बस एक मात्रा को उल्टा-सीधा करने की देर रहती है। पर यह कदम पता नहीं, हम आज तक क्यों नहीं उठा पाए? जब भी मात्रा को बड़ा करने की कोशिश करते हैं, छोटी मात्रा की मात्रा हम पर इस कदर हावी होती है कि पूरा शरीर दर्द से कराहने लगता है। हम भी आस्ट्रेलिया रहने वाले भारतीय स्टूडेंट्स की तरह थोड़ा-सा हल्ला-गुल्ला मचाकर शांत पड़ जाते हैं और हमारी बीवी के हौसले बढ़ते ही जाते हैं। आप समझ रहे हैं ना कि हम क्या कह रहे हैं।
मेरा एक दोस्त आस्ट्रेलिया में रहता है। कुछ दिनों पहले उसका फोन आया। कहने लगा कि यार हम हिंदुस्तानी क्या इतने कमजोर हैं कि हर कोई हमें तंग करके चला जाता है और हम देखते रह जाते हैं। ये आस्ट्रेलिया के गोरे पता नहीं अपने आप को समझते क्या हैं? आज दुनिया कहां की, कहां पहुंच गई और ये अभी भी काले-गोरे के चक्कर में फंसे हुए हैं। मैंने उसे समझाया और कहा कि पिटते तो हम भी हैं। वो बोला कि तुम पिटते हो और हमारी तो धुनाई ही हो जाती है। हम उससे पिटाई और धुनाई का अंतर पूछने लगे, तो वो बात घुमा गया और दुखी होने लगा। हमने उसे शांत करने के लिए लगे हाथ एक कहानी सुना डाली।
कहानी दरअसल यूं है कि एक बार भगवान ने सोचा कि क्यों ना मैं भी रोटी सेक कर देखूं। उन्होंने रोटी बेलना शुरू किया। जो पहली रोटी उन्होंने तवे पर सेकी, वो एकदम जली हुई थी। तब भगवान ने दूसरी रोटी सेकनी शुरू की। दूसरी रोटी अच्छी सेकने के चक्कर में वो कच्ची ही रह गई। तब आखिर में जाकर भगवान ने एकदम परफेक्ट रोटी सेकी। ना जली हुई और ना ही कच्ची। फिर भगवान ने रोटियां जमीन पर फेंक दीं। जली हुई रोटी जहां गिरी, वहां अफ्रीका बन गया। जहां कच्ची रोटी फेंकी, वहां इंग्लैंड जैसे देश बस गए और जहां एकदम गेहुंआ रोटी गिरी, वहां हिंदुस्तान बस गया। मतलब साफ है कि जहां साफ-सुथरे, गेहुंआ लोग रहते सकते हैं, वो जगह हिंदुस्तान ही है। तो ये कहानी सुनकर हमारा दोस्त भी मान गया वाकई हिंदुस्तानियों का कोई मुकाबला ही नहीं हो सकता। अब अगर आस्ट्रेलिया में हम पर हमला होता है, तो हमें खाली हाथ पर हाथ धरे तो बैठा नहीं रहना चाहिए। कब तक हम हमले सहते रहेंगे, संसद पर हमला हुआ, तो क्या हुआ था। मेरे देश के कर्णधारों, कम से कम इस बार तो उन्हें बता दो, वो पढऩे के लिए आए हैं, उनकी रक्षा करो। वैसे हमें लगता है कि जब आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम ही हमारे भज्जियों को भाजी बनाकर खा जाती है, तो ये तो देश का मामला है, इसमें वो कोई कोर-कसर थोड़े ही रखेंगे। हमें तो पूरा शक है कि जहां-जहां हिंदुस्तानी स्टूडेंट्स पर हमले हुए, उन कॉलोनियों में जरूर ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट टीम के सदस्य भी रहते होंगे। क्या पता खेल-खेल में 'खेलÓ कर गए हों।
घर जाकर जब हमने बीवी को ये सारी बातें सुनाईं, तो भड़क गईं। वो बोली कि तुम भी किस मिट्टी के बने हो। पिटाई और धुनाई का अंतर नहीं समझ पाए। वो कहने लगी कि गलती मेरी ही है। मैंने ही कभी तुम्हें धुनाई से रूबरू नहीं करवाया। चलो आज तुम्हें धुनाई से मिलवा ही देती हूं। फिर जो उसने मेरा हाल किया, वो मैं अभी आपको बता नहीं पाऊंगा। दरअसल मैं बड़ा कमजोर दिल इंसान हूं। हो सकता है कि बताते-बताते रोने लगूं। पर उस धुनाई से मुझे पता लग गया कि पिटाई और धुनाई में बेसिक अंतर क्या होता है। आप भी जानना चाहते हैं, तो लीजिए सुनिए। पिटाई तो वो है, जो किसी बात पर की जाए। सामने वाले को बताकर की जाए। जबकि धुनाई तभी की जाती है, जब कोई वजह तो होती नहीं है, बिना कारण से बस खुन्नस निकाली जाती है और सामने वाले की एक भी सुनी नहीं जाती। यही सब तो आस्ट्रेलिया रहने वाले मेरे भारतीय दोस्तों के साथ हुआ है। चलिए, अब ये बात अपने तक ही रखना, किसी को बताना मत। वरना मैं पिटाई या धुनाई कुछ भी कर सकता हूं।
-आशीष जैन

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12 June 2009

यार टाइम नहीं है

भई हम तो परेशान हो गए हैं, ये रोज-रोज एक ही बात सुनते-कहते। कभी-कभी तो लगता है कि यह सत्य वाक्य तो वेद वाक्य से भी ज्यादा शाश्वत है। कभी आपने गौर किया कि आप रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी बार कहते हैं- अरे, यार टाइम ही नहीं है। मैं पक्के से दावा कर सकता है कि इस अखिल ब्रह्मांड में ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जिसने इस मंत्र का उच्चारण नहीं किया हो। आज सुबह तो हद ही हो गई है। हम अपनी घड़ी साथ लाना भूल गए और जब बस से उतरते सज्जन से पूछा कि टाइम कितना हुआ, तो वे महाशय बोले- अभी टाइम नहीं है, मैं नहीं बता सकता। तो जनाब देखा आपने टाइम बताने के लिए भी टाइम नहीं है। आपको लग रहा होगा कि मैं तो मजाक कह रहा हूं।

ऐसा भी भला कहीं होता है। साथ में आप मुझे यह तर्क भी देगो कि लाले दी जान, ये इंडिया है। यहां सब के पास टाइम ही टाइम है। इतनी बेरोजगारी है, काम है नहीं। तो फिर लोगों के पास टाइम ही टाइम पड़ा है। जितना चाहो, थोक के भाव ले लो। गली-नुक्कड़ पर कई प्यारेलाल मिल जाएंगे, जिनके पास इस संपदा का भंडार है। पर मैं आपसे शर्त लगा सकता हूं कि मैं सही हूं। चाहे बूढ़ा हो या जवान, गोरा हो काला, उत्तर भारतीय हो या दक्षिण भारतीय, सब के पास इस अनमोल धन की कमी है। दूर से देखने से ही लगता है कि लोगों के पास टाइम है। पर अगर पास जाकर उनसे तनिक-सा टाइम मांग लिया, तो फिर देखिए, कैसे बरसते हैं आप पर। आपको उनकी तोहमत सुन-सुनकर यकीन हो जाएगा कि आपने दुनिया का सबसे बड़ा पाप कर दिया है।
हमें तो पहले के दिन याद करके खुद पर ही दया-सी आने लगती है। जाने कहां गए वो दिन। जब मैं गांव में रहा करते थे और सुबह-सुबह नीम की अच्छी दातुन की खोज में सैर करते-करते कहां से कहां चले जाया करते थे। दूर खेत में जाकर ही निपट भी लिया करते थे। सब काम तसल्ली से। और एक हमारा बेटा है। जो एक तो सुबह तो नौ बजे उठेगा। और उठते ही अखबार उठाकर भागेगा, लैट-बाथ की तरफ। हमने एक दिन पूछा कि ये अखबार साथ में क्यों ले जाते हो लल्लू। तो बोला- पापा, एक साथ दो काम करता हूं। निपटने के साथ-साथ अखबार भी चाट डालता है। उसकी बात सुनकर हमें तो बड़ी घिन्न-सी आई। उससे पूछो- लेट क्यों उठा, तो कहेगा, रात को इतना काम जो किया था। अरे क्या पहले के लोग काम नहीं करते थे क्या। काम भी ज्यादा करते थे और खुद के हाथों से करते थे। अब तो ससुरे कई तरीके ईजाद हो गए हैं। कपड़े धोने की वाशिंग मशीन आ गई है, रोटी बेलने की मशीन आ गई है। फिर भी टाइम नहीं है। ये अचरज नहीं है, तो और क्या है। अब ये कमबख्त मोबाइल फोन भी खूब करामात दिखा रहे हैं। खाते-पीते, नहाते-धोते, चलते-फिरते, उठते-बैठते और भी ना जाने कितने 'ते-तेÓ में ये मोबाइल घुस गया है। सारे काम मोबाइल पर पूरे हो रहे हैं। फिर भी पता नहीं कहां पहुंचने की जल्दी है। हमें तो लगता है कि टाइम नहीं करते-करते ही एक दिन पूरी दुनिया अपना टाइम पूरा कर लेगी। फिर लोग कहेंगे- अरे, यार टाइम तो था, पर अब हाथ से निकल गया। अब क्या करें। घर में कोई हमारी सुनता ही नहीं है। सब बस भागे जा रहे हैं। घर आते हैं, तो फिर वही रट- अभी टाइम नहीं है। और कभी पूछे कि किस काम में बिजी हो, तो कहेंगे कि काम ही तो कर रहा हूं।
'टाइम इज मनीÓ का फार्मूला इजाद करने वाला मुझे मिल जाए, तो उसके दो चपत लगाए बिना नहीं रहूंगा। उससे पूछेंगे कि क्यों लोगों को भरमाते हो। हम हिंदुस्तानियों के लिए तो टाइम और मनी दोनों से ज्यादा अहमियत तो रिश्ते रखते हैं। अगर बूढ़े बाप के पास बैठने के लिए दो पल नहीं बचे, तो ऐसे टाइम और मनी क्या करोगे? बच्चों की किलकारी सुने बिना मां अगर 'टाइम नहीं हैÓ चिल्लाती हुआ ऑफिस निकल जाएगी, तो क्या जिंदगी में कोई रस रह पाएगा। बचपन में दद्दा कहते थे कि दुनिया में आपसी प्यार से बड़ी अहमियत किसी चीज की नहीं हो सकती। किसी का टाइम कभी खराब होता है, तो कभी सही। पर अगर सबसे बनाकर चलोगे, तो बुरे टाइम को अच्छा बना लोगे। पर अब हमें लगता है कि इस दुनिया में टाइम से महंगी कोई चीज हो ही नहीं सकती। और मजेदार बात देखिए, ये महंगी चीज जिस के पास भरपूर मात्रा में होगी, वही सबसे निट्ठला कहलाएगा। सब कहेंगे- हमारे पास तो टाइम नहीं है। उसके पास खूब है, उसी के करा लो काम। सारा दिन टाइम पास ही तो करता है। तो जनाब, टाइम की सच्चाई हमें आज तक समझ में नहीं आई। एक तरफ टाइम ना होने का रोना रोते हो और दूसरी तरफ टाइम होने पर टाइमपास का ठप्पा लगाते हो। हम जैसे बेचारे क्या करें। लगता है कि हमारा ही टाइम खराब है, जो टाइम की थ्योरी हमारे समझ में नहीं आती। हम तो पूरी दुनिया से कहते हैं कि टाइम हम इंसानों ने ही बनाया है, तो फिर इसे अपने सिर पर सवार मत होने दो। अपने टाइम के मालिक खुद बनो। ऐसे काम मत करो कि खुद ही टाइम के गुलाम बनकर रह जाओ और बाद में पछताओ।
-आशीष जैन

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परिसाईजी का पुनर्जन्म

मेरा मुल्क बड़ा महान है और उसमें भी मेरा शहर जयपुर शहरों में जानदार शहर है। आप हमें अपने मुंह मियां मिट्ठू मत समझना, पर अब बात चली है, तो बता ही दें कि हमारा मोहल्ला और उसमें भी हमारी गली का तो कहना ही क्या। एक से एक फनकार बसे हैं, हमारी पतली-सी गली में। यूं ही मत समझना इस गली को। इस गली में तो एक बार चचा गालिब भी आए थे। आप कहेंगे, गालिब और जयपुर! मैं मजाक नहीं कर रहा जनाब। हुआ यूं कि एक बार चचा के पायजामे का नाड़ा एक चोर चुराकर भाग लिया और भागते-भागते हमारी गली में छुप गया। चचा भी उसे खोजते-खोजते यहीं तक आ पहुंचे थे। कुछ-कुछ ऐसे ही वाकये हरिशंकर परसाई, हरिवंशराय बच्चन और रामधारी सिंह दिनकर के साथ हुए थे। अरे! ये हम नहीं कहते, हमारी गली के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं।

तो जब शुरू से इतने बड़े-बड़े लेखक हमारी गली में आ चुके थे, तो उनके गुण भी हमारी गली में आने ही थे। कसम से एक से बढ़कर एक लेखक पैदा होते गए। वो तो जमाने की नजर ही नहीं पड़ी, वरना एक से एक नायाब हीरे थे हमारे यहां, हीरे भी क्या थे, कोहिनूर थे, कोहिनूर। अब हम उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। लेखक बन गए हैं। लेखक भी ऐसे-वैसे नहीं, व्यंग्य लिखते हैं। क्या करें, जब भी किसी से दिल की बात बयान करने जाते हैं, पिट कर आते हैं। ये दुनिया के लोग कभी अपनी बुराई सुन ही नहीं सकते, तो हमने तो ठान ही लिया कि व्यंग्य लिखेंगे। इस बहाने दिल की भड़ास निकालते रहेंगे। आज इतनी प्रॉब्लम हैं। आपको तो पता ही है, नल में पानी गायब है, घर में बिजली नदारद है और महंगाई सिर पर बैले डांस करती है, तो ये सारी बातें भी तो किसी से कहनी ही पड़ेंगी ना। अब अपनी बीवी से कहें, तो कहती है कि जब भी बोलते हो, बुरा ही बोलते हो। दोस्त लोगों को अपनी जिंदगानी से ही टाइम नहीं बचता, तो लगा कि क्यों ना कलम-कागज लेकर बैठ जाएं और दिल का दर्द कागज पर उतारते रहें। बेरोजगारी में इससे बढिय़ा टाइम पास और क्या हो सकता है। अब कैरेक्टर खोजने के लिए कहीं जाना भी तो नहीं पड़ता। घर में बीवी, बाहर पड़ोसी, देश में मंत्री, विदेश में अमरीका। कुछ भी उठा लो और लग जाओ कलम घिसने में। कसम से बड़ा मजा आता है, अंदर की बात बाहर लाने में। ये सब यूं ही चलता रहता, पर एक दिन तो गजब होना ही था। हम व्यंग्य लिखते हैं, ये बात हमारी बीवी से पड़ोस की सहेली से कह दी। उसने अपने पति से बोला और पति ने गली में सबसे। सब अगले ही दिन घर के बाहर हुजूम लगाकर इकट्ठा हो गए। एक बाबा टाइप का आदमी लकड़ी टेकता हुआ आया और बोला, 'बेटा, हमने सुना है कि तुम व्यंग्य लिखते हो। कहां हैं तुम्हारे व्यंग्य। मैं पढऩा चाहता हूं।Ó मैंने उनसे पूछा कि मैं तो सीधा सा आदमी हूं, ये सब अफवाह है। वो बोला कि मुझे तुम्हारी शक्ल और अक्ल परसाईजी जैसी लगती है। परसाईजी सालों पहले जब अपनी गली में आए थे, तो इस गली को देखकर उन्होंने कहा था कि काश! मेरा अगला जन्म इसी गली में हो। और देखो उनकी बात सच हो गई। हो ना हो, तुम परसाईजी के पुनर्जन्म रूप हो। अब तो मैं घबरा चुका था। मैंने उनके पैर पकड़ लिए और गिड़गिड़कर बोला कि आप मुझे चैन से जी लेने दें। क्यों पूरे शहर में मुझे बातचीत मुद्दा बनाना चाहते हो। वो बोला कि बेटा बताओ, तो सही कि तुम लिखते कैसा हो। मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा। मैं मन ही मन सोच रहा था कि मैं लिखता तो इन गली वालों के ऊपर ही हूं। मेरे व्यंग्य में सारे पड़ोसियों को कोसने के सिवा और होता ही क्या है। मैंने तय कर लिया कि किसी भी कीमत पर अपनी पोल नहीं खुलने दूंगा। पर वो तो अपनी बात पर अड़ा ही रहा। उसके साथ-साथ पूरी भीड़ भी मेरे जयकारे लगाने लगी और कहने लगी कि हमें भी लगता है कि परसाईजी ने आपके रूप में दुबारा जन्म लिया है। हम सब आपके व्यंग्य पढऩा चाहते हैं। मैंने डरते-डरते अपने लिखे सारे व्यंग्य उनके सामने कर दिए और खुद घर में जाकर दुबक गया। पर वो टस से मस नहीं हुए और अंदर घुसकर मुझे घेर लिया। एक व्यंग्य में पड़ोसी पपीताराम और उसकी पत्नी इमलीबाई के खट्टे रिश्तों पर मजाक था, तो एक व्यंग्य इमरती लाल के बेटे लड्डू सिंह और कचौरीकुमार की बेटी जलेबी कुमारी के प्यार के किस्से। मुझे लग रहा था कि पपीताराम, इमरती लाल और कचौरीकुमार ये सब पढ़कर मेरा कचूमर निकाल देंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने तो मुझे लगे लगा लिया और कहा कि तुम्हारे हमारे घर-परिवार, बाल-बच्चों की सच्चाई को जिस निर्भकता और कटाक्ष के साथ कागज पर लिखा है, उससे हम बहुत खुश हैं। सबने शहर में फोन घुमाना शुरू कर दिया। पूरे शहर ने मुझे परसाईजी का पुनर्जन्म समझकर मुझ पर फूल मालाएं लादना शुरू कर दिया। सारे अखबारों के एडिटर मेरे चरण कमलों में विराजने लगे। मेरी हर बात में वे व्यंग्य खोजने लगे और वो दिन था और आज का दिन। ससुरों ने व्यंग्य लिखवा-लिखवाकर मेरी उंगलियों का कचूमर निकाल दिया है। अब मैं दिन-रात उनके लिए व्यंग्य लिखने की कोशिश करता रहता हूं और वे मुझे परसाईजी समझकर छापते रहते हैं। धन्य हो परसाईजी और उनके व्यंग्य।
-आशीष जैन

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रिपोर्टर की रपटन

हे दुनिया के तुच्छ जीवों! मैं सर्वशक्तिमान हूं। मैं अनादि-अनंत हूं। मैं सर्वज्ञ हूं। और भी पता नहीं मैं क्या-क्या हूं। दरअसल मेरी उपमाएं अभी तैयार हो रही हैं। कुछ मुझे ज्ञात थी, सो मैंने कह दी। पर ये पक्का मानना कि मैं इस दुनिया में सबसे अद्भुत है। मेरा स्वरूप हर इंसान में है, पर जो मेरे भावों को अंगीकार कर लेता है, वही इंसान मुझ जैसा बन पाता है। मैं सुबह सवेरे से लेकर रात-बिरात तुम्हारे दिमाग पर कब्जा किए हुए रहता हूं। पापी मुझसे डरते हैं। वैसे तुम मुझे दुनिया का सबसे बड़ा पापी भी मान सकते हो, पर क्या करूं, मेरा काम भी तो अनोखा है। मेरे पास दुनिया के हर पल, हर कोने की सारी छोटी-बड़ी जानकारियां आंख झपकते ही पहुंच जाती हैं।

अगर इतना पढऩे के बाद भी तुम नहीं पहचान पाए कि मैं कौन हूं, तो तुम वाकई क्षुद्र बुद्धि के इंसान हो। जरा गौर करना, अलसुबह से जो अखबार तुम्हारे हाथों में रहता है, वही मेरा कर्मक्षेत्र है, वही मेरा दाता, मेरा ईश्वर है। मैं ही तो अखबार के लिए खबरें जुटाता हूं। मैं रिपोर्टर हूं। कुछ मुझे खबरनवीस, तो कुछ पत्रकार भी कहते हैं। पर मुझे खुद को जर्नलिस्ट कहलवाना ज्यादा पसंद है। इस शब्द से मुझे ज्यादा प्यार है। पत्रकार और रिपोर्टर शब्द सुनकर मैं भड़क जाता हूं, ये शब्द मुझे गाली की तरह लगते हैं। कोरेसपोंडेंट शब्द थोड़ा सोफिस्टिकेटेड है, इसी नाम से मुझे पुकारना। मात्र तुम्हारे पुकारने की देर है, मैं पल में तुम्हारे सामने हाजिर हो जाऊंगा। फिर तुम्हारे साथ घंटों बिताऊंगा और बतियाऊंगा। तुम्हें लगेगा कि मेरे पास टाइम ही टाइम है। मैं फालतू ही तुम्हारे पास बैठा हूं। पर ऐसा नहीं है। मैं घंटों बैठकर कोई काम की खबर तुमसे निकलवा ही लूंगा। अगर कोई तुम्हें परेशान कर रहा है, तो मुझे बताओ। उस बदमाश को अभी चित्त कर दूंगा और ज्यादा चूंचपड़ की तो, उसका बड़ा सा फोटो पहले पन्ने पर छापकर उसे बदनाम कर दूंगा। मेरा तो काम ही है, लोगों की मदद करना। पर इस महंगाई के जमाने में ये मत समझना कि सारे काम मुफ्त में हो जाएंगे। कुछ ना कुछ दक्षिणा तो देनी ही पड़ेगी। वैसे मेरी न्यूनतम फीस दो हजार रुपए है, पर तुम्हारी सूरत देखकर मुझे तुम पर तरस आ रहा है, इसलिए मैं सौ-दौ सौ में काम निपटा दूंगा। चाहे तुमने कोई तीर ना मार हो, पर अगर तुम्हारी दिलीइच्छा है कि तुम्हारा गुणगान भी लोग गाएं, तो मेरे पास आना। मैं शब्दों का मायाजाल रचूंगा और लोगों को भरमा दूंगा कि तुम जैसा इंसान तो दुनिया में पैदा ही एकाध बार होता है। शब्द माया ही तो मेरी असल ताकत है। लोगों को लगेगा कि तुम ही हो इस युग के युगपुरुष।
मुझे तुमसे बस एक चीज और चाहिए। तुम हर हफ्ते मुझे अपने सरकारी ऑफिस में बैठे बॉस की एक-दो ताजातरीन कारस्तानियां लाते रहना। चाहे उसमें आधी सच्चाई हो, पर उसे सत्यापित करके छापने की जिम्मेदारी मेरी है। जब चुनाव होते हैं, तो बिना सभा के ही मैं अखबार में नेताजी के लिए भीड़ की फोटू का जुगाड़ लगा देता हूं, तो ये तो मेरा चुटकियों का काम है। किसी को भी सेलिब्रिटी बनाकर पेश करने में मुझे मजा आता है। बाजार में चाहे कोई ट्रेंड सालों पहले खत्म हो चुका हो, मैं उसे इस तरह अखबार में छापता हूं कि लोगों को लगता है कि नया फैशन आया है। चाहे युवा सो रहे हों, पर मैं लिखता हूं कि युवा क्रांति की ओर अग्रसर हैं। मैं देश की अर्थव्यवस्था के बारे में उन लोगों की राय प्रकाशित करता हूं, जिन्हें देश के वित्तमंत्री तक का नाम मालूम नहीं होता।
मुझे तिल को ताड़ बनाने में महारत हासिल है। किसी की पर्सनल लाइफ में को भी मैं उछाल सकता हूं। मुझसे सब छिपते रहते हैं। चाहे दुनिया में सब ट्रेफिक रूल तोडऩा बंद कर दें, पर मैं कभी हेलमेट लगाकर नहीं चलता। जर्नलिस्ट हूं, तो अपनी गाड़ी पर प्रेस भी लिखवा रखा है। इससे मैं सड़क पर बेखौफ हो जाता हूं। हर उल्टा-सीधा काम कर सकता हूं। सब डरते हैं। पूरे देश में सूचना का अधिकार कानून लागू हो चुका है। हर बाबू से आप उसके काम का हिसाब मांग सकते हो, पर मुझे कंट्रोल करने की कभी कोई सोच भी नहीं सकता।
मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं हूं। बचपन से ही आवारा था, पिताजी हमेशा कहते थे कि कुछ किया कर, नहीं तो मेरा नाम डूब जाएगा, पर अब भरा-पूरा घर देखकर वे भी मेरी तारीफ करते हैं। दारू और सिगरेट से ही मेरी जिंदगी चलती है। शुरू में मुझे देश में बदलाव और समाज-सुधार का शौक चर्राया था। पर अब मैं मशीन बन गया हूं। किसी के घर मौत होने पर मैं रोता नहीं हूं, बल्कि अपनी खबर खोजता हूं। मैं चलता-फिरता सहायता केंद्र बन गया हूं। किसी के बच्चे को पास करना है, किसी को प्लॉट दिलाना है, किसी को मंत्री से नौकरी की सिफारिश लगवानी है, इन सब कामों की मेरी प्राइज लिस्ट तैयार है। तुम्हें जब भी कोई जरूरत हो, मुझे याद करना।
-आशीष जैन

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11 June 2009

ओबामा और ओसामा की प्रेमकथा

क्या हुआ शीर्षक पढ़कर क्या सोचने लगे। अरे! ओबामा और ओसामा तो हमारे पड़ोस में रहने वाले दंपती हैं जी। अब क्या बताएं, उनकी जिंदगी के बारे में। एक से एक रोचक काम करते रहते हैं दोनों। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकते। ओसामा से बात करो, तो ओबामा का नाम बातचीत में जरूर आएगा और ओबामा की हर गुफ्तगू की शुरुआत ही ओसामा की कारास्तानियों से होगी। पर ओबामा महाशय तो हरदम अपनी हेकड़ी दिखाते रहते हैं और ओसामा रानी हमेशा मौका तलाशती है कि कब पतिदेव ओबामा को बता सके कि वो भी किसी से कम नहीं है। अलसुबह से ही दोनों झगडऩा शुरू कर देते हैं।

ओबामा की तो आदत पड़ गई है बेचारी ओसामा को बात-बात में झिड़कने की। ओसामा तो कभी घर से बाहर नहीं निकलती। हमेशा अपने ही खोल में छुपी रहती है। आप इसका मतलब आप ये मत लगा लीजिएगा कि ओसामा कमजोर है। अरे, जब-जब मौका मिलता है, ओबामा को वो भी बहुत चिढ़ाती है। कभी हवाईजहाज को बेलन का रूप देकर ओबामा के सिर पर मारती है, तो कभी-कभी अपनी सहेलियों से ओबामा की बुराई कर आती है। दरअसल देखा जाए, तो वे रहते तो एक घर में हैं, पर दोनों ने अपने-अपने पक्ष में कई लोग खड़े कर रखे हैं। ये लोग सिपहसालार की तरह उन्हें सलाह देते हैं कि कैसे एक-दूसरे को नीचा दिखाया जाए, अपनी धौंस जताई जाए।
अब इनके इकलौते बच्चे पाकिस्तान को ही ले लीजिए। यूं तो पाकिस्तान के लिए ओसामा और ओबामा दोनों ही माता-पिता हैं, पर पाकिस्तान अपनी मां ओसामा का ज्यादा साथ देता है। ओबामा अक्सर सोचता है कि इसे मौज-मस्ती, सैर-सपाटे के लिए जेबखर्च तो मैं देता हूं, फिर ये अपनी मां के इतनी नजदीक कैसे है। पर वो ये भूल जाते हैं कि ओसामा ने बचपन से ही पाकिस्तान को इतना प्यार किया है, तो वो कैसे उन्हें भूल जाए। पाकिस्तान एक दिन हमारे घर आया था। हमसे कह रहा था, 'ओबामा पापा तो कभी-कभी डांट भी देते हैं और जेबखर्ची के लिए दिए पैसों का हिसाब भी मांग लेते हैं, फिर कैसे मैं उनका कहा मानूं। दूसरी तरह मम्मी ओसामा मेरी हर गलती छुपाती है। जब भी पापा मुझे मारने दौड़ते हैं, तो मैं मम्मी की गोद में छुप जाता हूं और बच जाता हूं।Ó ओसामा और ओबामा भी एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं कि पाकिस्तान को तुमने ही बिगाड़ा है। ओसामा कहती है कि तुम बच्चे को फालतू खर्चे के लिए इतने पैसे देते हो, इसीलिए वो बिगड़ गया है, वहीं ओबामा बोलता है कि ये तो तुम्हारे लाड़-प्यार की वजह से बिगड़ा है। ओबामा तो आम पतियों की तरह ही ज्यादातर चुप ही रहता है। उसे पता है कि अगर वो ज्यादा बोलेगा, तो ओसामा नाराज होकर अपने पीहर चली जाएगी। ओसामा के पिताजी तालिबान बड़े खूंखार हैं। अपने बेटी को ब्याह तो दिया मॉर्डन परिवार में, पर वे अभी भी पुराने ख्यालों के ही हैं। बात-बात में अपनी बंदूक तान देते हैं, अपने दामाद के ऊपर। अब ओसामा घर-गृहस्थी के फेर में यूं फंसा कि यार दोस्तों को ही भूल गया। बचपन का एक दोस्त है- हिंदुस्तान। पड़ोस में ही रहता है। उसके साथ खेलता-कूदता था ओबामा, पर अब तो हारी-बीमारी में भी हाल-चाल पूछने नहीं जाता। और एक तरह हिंदुस्तान है, जो आज भी अपनी हर खुशी में ओबामा को शरीक करता है। यूं ओबामा के लिए बहुत पैसा है, पर उसका सही इस्तेमाल नहीं कर पाता। उसकी बीवी ओसामा हमेशा ऐसी व्यवस्था करके रखती है कि सारे पैसे उसी पर खर्च हो जाते हैं। एक बार की बात है। ओसामा ने ओबामा से बड़े प्यार से कहा कि आओ जी, कहीं घूमकर आएं। पर ओबामा को ये सब पसंद नहीं था, तो उसने ओसामा से ही पूछा- तुम ही बताओ इस भरी गर्मी में कहां चलें। फिर तय हुआ कि चांद पर होकर आते हैं। चांद पर जो दोनों गए थे, तो अपना सामान ही वहीं भूल आए और लौटकर वापस लड़ाई करने लगे। यूं दोनों की गृहस्थी काफी अच्छी चल रही है, पर ओबामा थोड़ा शक्की मिजाज का इंसान है, सो अपनी पत्नी के दोस्त माओवादी से बहुत चिढ़ता है। माओवादी से चिढऩे की एक खासी वजह है। एक दिन ओबामा रात को पान खाने गया था, तो रास्ते में माओवादी गली के गुंडे लिट्टे के साथ बैठकर सिगरेट पी रहा था। तभी से वो ओसामा को समझाता रहता है कि तुम माओवादी से दूर रहा करो। पर ओसामा कहती है कि वो मेरे बचपन का दोस्त है। मुझे पता है कि वो सिगरेट पीता है, पर इससे क्या फर्क पड़ता है।
एक बात और बताते चलें कि ऊपर की गई व्याख्या से लग रहा होगा कि ओबामा और ओसामा तो बहुत बुरे पति-पत्नी हैं। पर असलियत में इन दोनों ने प्रेम विवाह किया है। दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। पर कहानी में एक पेंच था। कॉलेज में पढऩे वाले रशिया को ओसामा बहुत चाहती थी। ओसामा बहुत अमीर थी। ऐसे में ओबामा खुद ओसामा को पटाकर करोड़पति बनना चाहता था। तब ओबामा ने चाल चली और रशिया और ओसामा के बीच में दरार डालना शुरू कर दी और आखिर में ओसामा को शादी के लिए मना लिया। वो तो शादी के बाद ओसामा को पता चल गया कि ओबामा ने मेरे साथ धोखा किया है और तभी से दोनों पति-पत्नी रहकर भी एक-दूसरे से दुश्मनों की तरह लड़ते हैं। हमें तो सोचते हैं कि इस प्रेमकथा और शादी के दुखद प्रसंग तो हम ही भले, जो आज तक कुंवारे हैं।
-आशीष जैन

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10 June 2009

हाय! हम उसके बिना कैसे रहें?

वो हमारी जान है। हाय! हम उसके बिना कैसे रहें? हमने उसके साथ कितना समय बिताया। और अब वो हमसे दूर है। गली-गली, कूचे-कस्बे सब जगह ढूंढ़ लिया, पर वो कहीं नहीं है। हमने लाख उपाए किए कि वो वापस आ जाए, पर पता नहीं किसकी नजर लग गई। मंदिर, मस्जिद हर जगह माथा टेका, पर शायद ऊपरवाले को भी मंजूर नहीं कि वो हमें नसीब हो। उसके बिना ना रातों की नींद है और ना ही दिन का करार। उसके लिए हम ही नहीं, हमारे दोस्त, हमारे शुभचिंतक यहां तक कि हमारे दुश्मन भी दुआ कर रहे हैं कि उसे पाना है। वही तो हमारी इज्जत है, वही हमारी शान है। सच-सच बताना, कल तक जो आपका हो, अगर वो किसी और के पास जाकर रहने लगे, तो क्या आपको बुरा नहीं लगेगा क्या?

हाय! हम उसके बिना कैसे रहें? कमबख्तों ने देश को खोखला कर दिया। यहां का सारा पैसा विदेशी बैंकों में ले जाकर ठूस दिया। इन नेताओं का बस नहीं चलता, वरना ये तो स्विट्जरलैंड में जाकर ही बस जाएं। इन्हें पांच बरस देते हैं, हम लोग, अपने विकास के लिए। पर देश का विकास तो जाए भाड़ में, इनकी आस तो अपने संतानों के सुख से जुड़ी है। हमारे लालजी इस चुनाव में बढिय़ा मुद्दा खोजकर लाए कि स्विस बैकों में जमा पैसा वापस भारत लाएंगे। एकबारगी तो इन नेताओं की जान पर बन आई होगी। हम तो ये चाहते हैं कि काश! वो पैसा जल्दी से जल्दी भारत वापस आ जाए। फिर देखते हैं कि किस नेता ने कितनी गद्दारी की है? छोड़ेंगे नहीं करमजलों को। मलाई खा-खाकर तुंदिया गए हैं। बुजुर्ग हो जाएंगे, पर नेतागिरी का भूत सिर से नहीं उतरेगा। युवाओं को टिकट देने के नाम से ही जान जाती है। अब जिस देश में करोड़ों लोग एक वक्त का खाना खाकर जिंदगी काट रहे हों, उस महान, भारत विशाल में अगर ऐसी धूर्तता चलती रहेगी, तो जल्द ही हम सबका बेड़ा गर्क हो जाएगा। हम तो मनमोहन भाई से इतना ही कहना चाहते हैं कि सरदारजी, आप इन पांच सालों में कुछ करें या ना करें, पर प्लीज विदेशी बैंकों में जमा नेताओं के पैसे को जरूर वापस ले आइए। ये देश आपका सदा ऋणी रहेगा।
हाय! हम उसके बिना कैसे रहें? गर्मी की छुट्टियां आते ही हमारी लख्तेजिगर, शरीकेहयात हमें छोड़ अपने मायके जा बसी है। मायका भी कहां अमरीका, इत्ती दूर। अब इस भरी दुपहरी में किससे दिल लगाएं, किससे अपने मन की बात कहें। वो होती थी कि गर्मी में भी ठंडक का एहसास होता था। चाहे वो हमें घर का काम ना करने के लाख ताने मारती थी, पर उसके बिना बहुत सूना लगता। राम कसम कपड़े धोने से लेकर खाना बनाने तक की मशक्कत में तेल ही निकल जाता है। दिनभर काम करने के बाद जब घर लौटकर उसकी गालियों की बौछार सुनता था, उसकी फरमाइशों की लिस्ट देखता था, तो लगता था कि ये भी कोई जिंदगी है। पर आज लग रहा है कि यह सुख भी बड़ी किस्मत वालों को ही नसीब होता है। कोई हमें बताए कि हम क्या जतन करें कि वो लौट आए। उससे फोन पर बात करने की कोशिश की, तो ससुरे ने फोन उठा लिया। हमने तो तपाक से अपनी आवाज बदल ली। और क्या करते? ससुरजी मिलिट्री में हैं। क्या पता भड़क उठें और बंदूक सिर पर तानकर बोलें कि मेरी बेटी पर अत्याचार करता है, दबाव डालता है। सो हम तो शांत हैं जी। हम तो अपने मन को यूं तसल्ली देते हैं कि जब उसे हम जैसे निरीह प्राणी पर तरस आएगा, तब खुद-ब-खुद लौट आएगी।
हाय! हम उसके बिना कैसे रहें? हमारा कोहिनूर हीरा तो इंग्लैंड की रानी के ताज में ही अटक कर रह गया है। कब से हमारी सरकारें चाह रही हैं कि वो वापस आ जाएं। मजे की बात बताएं कि सब सरकारें बस चाह रही हैं, कोई उसे वापस ला नहीं रहा। इतना शानदार हीरा अगर हमारे पुराने आकाओं की जमीन पर पड़ा रहेगा, तो कैसे लगेगा कि हम आजाद हैं। जो हमारा है, उस पर हम अपना हक दिखा सकते हैं। ये तो कोई बात नहीं हुई जी। अब गांधी बाबा की विरासत को ही देख लो। कहीं चश्मा, कहीं घड़ी। कुछ-कुछ दिन छोड़कर अखबारों में खबर पढऩे को मिलती हैं कि नीलामी के लिए गांधीजी की फलां चीज सामने आई है। यूं तो हमारे राष्ट्रपिता हैं बापू। पर ये जोर कोई नहीं लगाता कि एक बार में छानबीन करके गांधीबाबा की सारी चीजें भारत ले आएं। सच कहें, बापू की चीजों की नीलामी होते देख, हमारा दिल तो बहुत दुखता है जी। जिन गांधीजी को शराब से नफरत थी, उसकी चीजों को देश में शराब बेचने वाला व्यापारी वापस लेकर आए, ये हमें कतई नहीं सुहाता। गांधी की विरासत अपनी जमीन पर वापस आएगी, तो हमें लगेगा कि हमारे लोगों की नजर में भी संस्कृति और धरोहर कोई मायने रखता है। नहीं तो ये दिल यूं ही मचलता-तड़पता रहेगा।
हाय! हम उसके बिना कैसे रहें? लगता है कल-परसों की ही तो बात है। हमारा भतीजा मोनू आईआईटी करने मुंबई गया था। पूरे घर ने सोचा था कि अपन का सपूत तो पूरे खानदान को निहाल कर देगा। पर वही हुआ, जिसका हमें डर था। ना जाने क्या सोचकर मोनू विदेश चला गया, नौकरी करने। यूं तो नौकरी उसे अपन के देश में भी कई मिल रही थी, पर वो होता है ना विदेश सैर का चस्का। अब आसानी से यह लत नहीं छूटेगी। अब तो बिल्कुल बदल गया है। फोन पर जब करते हैं, तो वही अंग्रेजी लटके-झटके। हाय मॉम-डैड। मुझे अंकल कहने लगा। खान-पान, संस्कृति सब कुछ भूल गया। साल में एक बार अपनी शक्ल दिखा जाता है। अरे, ये भी कोई जिंदगी है। मां-बाप ने पाला-पोसा, बढ़ा किया और तुम हो कि पैसे के पीछे भागते-भागते अपनी जमीन को छोड़कर। अरे लल्ला, एक बार अपने देश की सौंधी मिट्टी की महक लेकर तो देखो, फिर वापस नहीं जा पाओगे। और हमें क्या चाहिए? रुपए-पैसे तो हमारे पास भी बहुत हैं। देश ने तुम्हारे लिए कितना कुछ किया है, तो क्या तुम उसे वापस कुछ नहीं लौटाना चाहते। चलो और किसी के लिए नहीं, तो अपनी मां के लिए ही आ जाओ, जो तुम्हें कई दिनों से गले लगाने के लिए तड़प रही है।
-आशीष जैन

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जन-गण का रण

आपको तो पता है कि गर्मी कितनी पड़ रही है? पारा कितना ऊपर चढ़ चुका है। ऐसे में लोगों का मगज भी ठिकाने पर नहीं है। उनका पारा किसी भी बात से चढ़ सकता है। पूरा देश छोटी-छोटी सी बात पर बौखला सकता है। सब चाहते हैं कि रेल की पटरी की तरह जिंदगी सब सीधी-सपाट चलती रहे। अब अगर क्रिकेट में मास्टर ब्लास्टर नहीं चला, राजनीति में कमल का फूल मुरझा गया और नौकरी पर संकट छा रहा है, तो इसमें हम क्या करें। क्या बोलना-लिखना छोड़ दें। किसी से कहो कि तसल्ली रखो, तो भड़क उठता है। अरे, क्या जमाना है भई, हम कह रहे हैं कि नौकरी गई नहीं है, सब अफवाह है और तुम हो कि अफवाहों को सुन-सुनकर ही पतले हुए जा रहे हो। सोच रहे हो, अब मेरा ही नंबर है नौकरी से निकलने का।
किंगखान का तो क्रिकेट का नशा उतर गया लगता है। कितनी तालियां बजाई थीं, अपने खिलाडिय़ों के चौक्के-छक्कों पे। पर फिर कुछ काम नहीं आया।

महारानी ने चुनौती दी थी 'जादूगर' भाई को। कहा था कि विधानसभा जैसा प्रदर्शन लोकसभा में करके बताओ, तो दम मानें। अपने 'जादूगर' गहलोत ने भी बता दिया कि हम चाहे पिछली बार की भाजपा का 21 का आंकड़ा ना छू पाए, पर आपको तो चार पर ही सिमेट दिया न। अब महारानी की बोलती बंद है। बाबोसा ने भ्रष्टाचार का राग अलापा, तो सबकी बोलती बंद। अब पुराने चिट्ठे खुल रहे हैं, तो बदले की राजनीति का नाम लेकर मुंह क्यों फेर रहो हो। पता है बहुत गर्मी है। पर इसमें हमारा क्या दोष। कूलर-एसी में बैठो। धूप में निकलते ही क्यों हो, जो गर्मी सिर में चढ़ जाए।
अपने फिल्म वाले रामू भैया भी कमाल है। राष्ट्रगान के शब्दों में उलटफेर करने चले थे। अरे भई, एक अदद अच्छा गीतकार नहीं खोजा जा रहा था क्या, जो दिल की बात को शब्दों में ढाल सके। तर्क भी तो देखिए जनाब का- इससे फिल्म की मूलभावना झलकती है। मूलभावना के लिए कोई और तरीका नहीं बचा क्या। सब चीजों को पैसे के तराजू पे तोलकर अपने इस्तेमाल की फितरत बदल डालो रामू भैया। अब लग गई ना सुप्रीम कोर्ट की रोक इस गीत पर। रामू को गुस्सा तो बहुत आ रहा होगा, पर किस पर निकालें।
अब देश के जन-जन ने सोचा था कि हमने स्पष्ट जनादेश दिया है, तो फिर केंद्र में कोई बवाल नहीं होगा। पर ये नेता हैं ना, अपनी आदत से बाज थोड़े ही ना आएंगे। करूणा की भावना कठोर हो गई है और ममता का पता नहीं, कब पलीता लगा दे। उसे अपनी संतानों का मोह है, तो उसे बंगाल चाहिए। मंत्रालयों की बंदरबांट के लिए यूं लालायित हैं, मानो देश नहीं चलाना, उसे लूटना-खसोटना है।
लोगों ने वोट किस बात के लिए दिया है, पहले ये समझो। लोग चाहते हैं कि जो विकास के काम पिछली सरकार ने किए हैं, वे लगातार चलते रहें। और ये सारे काम तभी लगातार चलते रहेंगे, जब सरकार के साथी उनके काम में कोई टांग ना अडाएं। जो भी विभाग मिले, उस में भी ही बैस्ट काम करें।
जन-जन का मन जानने के लिए उनकी बातों को ध्यान से सुनना जरूरी है। आज लोग युवा नेता चाहते हैं। 61 महिलाएं पहली बार संसद के गलियारों में पहुंचेंगी, तो संभव है कि अब राजनीति के स्तर में मौजूद गिरावट में कमी आए। यूं तो ये सारी महिलाएं किसी ना किसी दिग्गज नेता की बेटी या पोती हैं, पर उनसे ही आस है कि ये महिलाओं के मन की बात समझेंगी और महिला आरक्षण विधेयक को अपनी मंजिल तक पहुंचाएंगी। आज राजनीति के सुधार पर गली-मोहल्ले में चर्चा हो रही है, तो कहीं ना कहीं जनता की सोच में बदलाव तो है ही। अब वे चाहते हैं कि अगर कोई नेता संसद में नालायकी दिखाए, तो उसे वापस जनता के पास भेज देना चाहिए। जनता खुद-ब-खुद निपट लेगी।
-आशीष जैन

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महिलाओं ने हिला दिया

आज हमारी घरवाली बड़ी खुश है। खूब प्यार से बात कर रही है, खाना भी बहुत स्वादिष्ट बनाया है। आज तो ऑफिस से लेट आने पर ताने भी नहीं मारे। क्या बात है, ये सूरज पश्चिम से कैसे उग रहा है। जरूर हो ना हो, दाल में कुछ काला है। रोज तो अपने दुख-दर्द का पिटारा लेकर बैठ जाती थी, कहती थी कि तुम मर्दों ने हमारी जिंदगी तबाह कर रखी है। तुमने हमें दबाकर रखा हुआ है। हमें आगे बढऩा चाहती हैं। और आज कह रही है कि तुम बहुत अच्छे हो, मेरा हर कहा मानते आए हो। मुझे तुम्हारा साथ बहुत भाता है। ये सुनकर मैं वैसे ही उलझन में था, इतने में ही उसने एक सवाल भी दाग दिया कि आगे भी मेरा साथ दोगे ना। मैं सोच में पड़ गया कि कैसे साथ देने की बात कर रही है ये। जरूर कोई बड़ा फंदा लाई है, ये मुझे फंसाने के लिए। मैं सर्तक हो गया। सोचने लगा कि इन दिनों में कुछ खास तो नहीं हुआ।

तभी हमें याद आया कि 100 दिन की मियाद में सरकार महिलाओं को देश की सबसे बड़ी पंचायत में आरक्षण देने जा रही है। जरूर इसे किसी ने बता दिया हो। अब तो ये जरूर चुनाव लडऩे की प्लानिंग बना रही होगी। दरअसल जब भी हमारी बीवी खुश होती है, मायावती और ममता बनर्जी के गुणगान करने लगती है। बोलती है, काश! मुझे भी मौका मिलता चुनाव लडऩे का। तुम जैसे पतियों की तो अकल ठिकाने पर लगा देती। हमें तो शुरू से ही पता है कि स्त्री शक्ति का कोई सानी नहीं है। अगर स्त्री जाग गई, तो सबको सुला देगी। आज जब बिना आरक्षण के ही महिलाओं ने अपना डंका चहुंओर मचा रखा है, तो फिर तो पुरुषों के बोलती ही बंद हो जाएगी।
मेरी पत्नी को तो मीरा कुमार की आवाज में भी कोयल की बोली नजर आती है, कहती है, कितना मीठा बोलती है। अब मीठा बोल-बोलकर संसद में सबको चुप कराएगी। हैडमास्टरनी बन गई है, सब नेताओं की। देखा ना बस एक पोस्ट बची थी, जिस पर महिला नहीं थी, अब तो वो भी पूरी हो गई। अपनी प्रतिभा ताई, सोनिया मैडम और इंदिरा गांधी की तरह ये भी अपना परचम लहराएगी। वैसे मेरा मानना है कि यूं अगर महिलाओं को आरक्षण नहीं भी मिलेगा, तो जल्द ही वो दिन भी आएगा, जब पूरी संसद में महिलाएं नजर आएंगी और जो बचे-कुचे पुरुष होंगे, वे सब मौन में चले जाएंगे। उन्हें ये डर हमेशा सताएगा कि कहीं ये औरतें अपने बैगों में बेलन छुपाकर ना लाई हों। अगर ज्यादा भड़भड़ाहट की, तो तपाक से बेलन निकालकर मारेंगी। अब देख लीजिए शुरुआत तो हो चुकी है, उनसठ महिलाओं ने बाजी मार ली ना इस बार के चुनावों में।
आरक्षण आएगा, तो ऐसी महिला क्रांति लाएगा, जिसकी उम्मीद तो शायद महिला सशक्तिकरण करवाने वाली संस्थाओं ने भी नहीं की होगी। पुरुषों की बजाय अब महिलाएं चाय की थडिय़ों का मंच हथिया लेंगी। सारी औरतें मिलकर वहीं कंट्री के फ्यूचर की प्लानिंग करेंगी। पनवाड़ी की दुकान पर महिला पान बेचती नजर आएंगी, रैलियों में महिलाओं की भीड़ उमड़ेगी, बसों में पुरुष आरक्षित सीटें नजर आएंगी, महिला आयोग के दफ्तर पर ताला लग जाएगा और सारे पुरुष मिलकर पुरुष आयोग की मांग करने लगेंगे। दहेज पीडि़त महिलाएं नदारद हो जाएंगी और महिलाओं द्वारा उत्पीडि़त पुरुषों की संख्या में भारी इजाफा देखने को मिलेगा। राष्ट्रपिता, राष्ट्रपति जैसे शब्दों की तरह ही संविधान में राष्ट्रमाता, राष्ट्रपत्नी जैसे शब्दों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की जाएगी। आतंकवादियों की नई फौज में महिला आतंकवादियों का वर्चस्व बढऩे लगेगा... इत्यादि इत्यादि। यूं तो मेरे पास भावी परिवर्तनों की बहुत लंबी लिस्ट है, पर उन सब बातों का यहां उल्लेख करना ठीक नहीं रहेगा। वरना लाखों पुरुष शरद यादव की तरह ही आत्महत्या करने की योजना बना लेंगे। मैं नहीं चाहता कि मेरी जात मतलब पुरुष बिरादरी घबराहट में कुछ गलत उठा ले। भाईयो, अभी डरने की नहीं धैर्य करने की जरूरत है। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आप पर ज्यादा आंच नहीं आएगी। हम अपनी माताओं-बहनों-बीवियों से फरियाद करेंगे कि वे अपने बाप-भाई-पति का पूरा ध्यान रखेंगी। हम उनके साथ समझौता करने को तैयार हैं। वो हमें समय पर चारा मतलब भोजन मुहैया करवाएंगी बदले में हम घर की सफाई कर दिया करेंगे। वो हमसे थोड़ा प्यार से बात कर लिया करेंगी और हम बदले में बच्चों की पोटी साफ कर दिया करेंगे।
हम इतना सोच कर पसीने-पसीने हो गए और मन किया कि अपनी पत्नी के पांव छू लें और उसे अभी से पटा लें। पर क्या देखते हैं कि पत्नी कलैंडर लेकर सामने खड़ी थी। बोले बस कुछ ही दिन तो बचे हैं। हमने सोचा कि इसने 100 दिनों में से उल्टी गिनती शुरू कर दिया दिखता है। पर वो बोली कि मुझे मायका जाना है, बच्चों की छुट्टियां खत्म होने में कुछ दिन ही बचे हैं। आप घर का ध्यान रखना, मैं जल्द ही आ जाऊंगी। इतना कहकर वो मायके जाने की तैयारी करने लगी और हम सकुचाए से अपने भविष्य के संकट के बारे में दुबारा विचारमग्न हो गए।
-आशीष जैन

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03 June 2009

बाखबर बरखा

बरखा दत्त टीवी पत्रकारिता का एक मशहूर चेहरा। करगिल वार जैसी मुश्किल कवरेज इनके खाते में दर्ज है। आइए जानते हैं, इनके कॅरियर और निजी जिंदगी के दिलचस्प वाकयों के बारे में, खुद उनकी जुबानी-
इस बात से मैं बेहद खुश हूं कि लोग मेरे काम को इतना पसंद करते हैं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं जर्नलिस्ट बनूंगी। मैं तो डॉक्यूमेंटी फिल्ममेकर या वकील बनना चाहती थी। अभी भी वकील बनने का मेरा ख्वाब जिंदा है। मेरी मां प्रभा दत्त भी पत्रकार थीं। उन्होंने जंग तक की कवरेज की थी। इसलिए न्यूज में मेरी शुरू से ही दिलचस्पी थी। मैंने शुरू में रिपोर्टिंग के साथ प्रोडक्शन का काम भी किया था। जामिया मिलिया के साथ-साथ कोलंबिया के पत्रकारिता संस्थान से भी मास्टर्स पूरा किया था। कोलंबिया जाने के समय मैंने पत्रकारिता के कॅरियर से डेढ़ साल की छुट्टी ले ली थी।

पत्थर के पीछे कई रातें
जर्नलिज्म में नौकरी को लेकर काफी असुरक्षा रहती है, पर फिर भी मैंने रिस्क लिया और वहां गई। और देखिए, मेरी वापसी के आठ महीने बाद ही करगिल की लड़ाई शुरू हो गई थी। करगिल वार की कवरेज के दौरान मेरे पास एक ही जींस रह गई थी, मैं 15 दिन तक उसी को पहने रही। करगिल में मेरे किरदार को फिल्म 'लक्ष्यÓ में प्रीति जिंटा ने बखूबी निभाया। लड़ाई का कवरेज करते वक्त डर तो लगता है, पर वहां घटनाक्रम इतनी तेजी से बदलता है कि डर पीछे छूट जाता है। उस वक्त आपको समझ नहीं आता कि आप किस तरह का जोखिम ले रहे हैं, पर बाद में उन दिनों को याद करके हैरान रह जाती हूं कि मैंने इतने ज्यादा रिस्क लिए थे।
मुझे आज भी याद है कि करगिल वार के दौरान हम जिस गाड़ी में थे, उस पर गोलीबारी हो गई और हमने कई रातें एक बड़े पत्थर के पीछे छुपकर गुजारीं। दिल-दिमाग पर बस लड़ाई का कवरेज छाया हुआ था, ना खाने की फिक्र, ना नहाने की। जो हेलीकॉप्टर्स शवों को ले जाते थे, हम उनसे कवरेज के टेप साथ में ले जाने की गुजारिश करते थे। वहां पर मोबाइल की बजाय सैटेलाइट फोन थे। बंकरों में छुपकर मैंने सैटेलाइट फोन से रिपोट्र्स भेजीं।
थोड़ा-सी सनक चाहिए
मेरा बचपन नई दिल्ली और न्यूयार्क में गुजरा। बचपन के कई साल मैंने न्यूयॉर्क में गुजारे थे। मेरे पिताजी एयर इंडिया में काम करते थे और उनके ट्रांसफर के चलते हमें न्यूयार्क जाना पड़ा था। मैंने दुनिया बहुत घूमी है। पर मैं बचपन में शरारती नहीं थी बिल्कुल खामोश रहती थी। उस वक्त भी मैं बहुत किताबें पढ़ती थीं। आज भी खाली समय में किताबें ही पढ़ती हूं। मैं अपनी मां और उनके काम से बहुत प्रभावित थी। पर जब मैं मात्र तेरह साल की थी, तो ब्रेन हैमरेज से उनका देहांत हो गया। मुझमें आज भी न्यूज को लेकर बहुत ज्यादा भूख है। या यूं कहूं कि न्यूज को लेकर थोड़ा-सा पागलपन भी है। एक बार मैंने किसी लेख में लिखा था कि टीवी जर्नलिज्म होने के लिए आपको थोड़ा सनकी भी होना चाहिए और यह बात मुझ पर सटीक बैठती है।
मैं असल जिंदगी में जो स्टाइल अपनाती हूं, वही तरीका मैं कैमरा फेस करते हुए भी इस्तेमाल करती हूं। शुरुआती दौर में एक बार मैंने राहुल द्रविड़ से कह दिया कि मुझे क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं है। इसके बाद मुझे कभी इंटरव्यू नहीं मिला। मैं जिंदगी में जैसे बात करती हूं, वैसे ही टीवी पर बात करती हूं। करगिल पर मेरे बेहतरीन काम को देखकर एक बार अमिताभ बच्चन ने मुझे फोन करके बधाई दी।
मेहनती होना चाहिए
मैं सद्दाम हुसैन के जमाने में इराक गई थीं। वहां अमरीकी सैनिकों ने हमें पकड़ लिया और टेप ले लिए। फिर जैसे-तैसे वहां से छूटी। मेरे साथ ऐसे कई वाकए कॅरियर के हर मोड़ पर हुए हैं। जब मैंने सलमान रुश्दी का इंटरव्यू किया, तो मैं बहुत घबराई हुई थी। मुझे इस बात का डर था कि चाहे मैं कुछ भी पूछ लूं, वे इतने चतुर हैं कि अपनी बात को सही साबित कर देंगे। रतन टाटा का इंटरव्यू लेना भी काफी मुश्किल है, वह अंतर्मुखी हैं और बहुत कम बोलते हैं। सोनिया गांधी बहुत ही शर्मीली महिला हैं। मैंने बेनजीर भुट्टो की हत्या के तीन दिन बाद आसिफ अली जरदारी से लरकाना में इंटरव्यू किया। उस वक्त मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इंटरव्यू में निजी बातें कितनी पूछूं और राजनीतिक कितनी।
पद्मश्री मिलने पर मैं बहुत अभिभूत महसूस कर रही थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि उम्र के तीसरे दशक में मुझे पद्मश्री जैसा पुरस्कार मिलेगा। मैं आलोचनाओं को भी काफी ईमानदारी से लेती हूं, पर उसमें झूठ शामिल नहीं होना चाहिए। खाली समय में बहुत-सी फिल्में देखती हूं। मुझे मर्डर मिस्ट्री और जासूसी सीरीज देखना बेहद पसंद है। फिल्मों में शशि कपूर मेरे फेवरिट हैं। लोगों को लगता है कि टीवी जर्नलिज्म बड़ा ग्लैमर वाला प्रोफेशन है, पर ऐसा नहीं है। इस पेशे में वही टिक सकता है, जो बहुत मेहनती है। मैं बहुत भावुक हूं। गुस्सा जल्दी आ जाता हूं, तो आंसू भी जल्दी आते हैं।
-आशीष जैन

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31 May 2009

आईपीएल की बल्ले-बल्ले

हो गई है बल्ले-बल्ले... हो जाएगी बल्ले। मजा आ गया जी। अरे कोई जीते, कोई हारे हमें इससे क्या जी। हमें तो मजा इस बात में आया कि जिसे सबने लल्लू समझा, उसने सबकी हेकड़ी निकला दी। बता दिया कि बादशाह बनने के लिए शोर मचाने की नहीं, हुनर की जरूरत होती है। अब लल्लाजी मुंह फुलाए क्यों बैठे हो। मुंह फुलाने से कौनसा हार जीत में बदल जाएगी। हमने तो कहा था ना कि बादशाह हमेशा बाद में ही नजर आता है। अरे वो क्या खाक शहंशाह जो अपने मुंह खुद मियां मिट्ठू बन जाए। शहशांह तो शह और मात के बीच में अपने असली मोहरों को आखिरी दांव के लिए बचाकर रखता है। अब देख लीजिए ना किसने सोचा था कि डेक्कन चार्जर्स सबको डिसचार्ज करके रख देगी। कमाल कर दिया ना। जीत लिया ना दूसरे आईपीएल का खिताब। आईपीएल चाहे दक्षिण अफ्रीका में हुआ, पर कसम से हमें तो शुरू से ही लग रहा था कि इस बार कुछ ऐसा होगा कि पूरी दुनिया देखा करेगी।

और हमारे लिए ये नई बात नहीं है। कल तक हमारी गली में एक गुंडा था, गणेशा। सब पर अपनी दाब-धौंस दिखाता था। कहता था कि कोई मुझसे भिड़कर तो देखे, हाथ-पांव तोड़कर रख दूंगा। सब सोचते थे कि ये आफत की जड़ तो अब हमेशा बनी रहेगी। हमारे पड़ोस में भोलारामजी रहते हैं। उनका किसी से कोई लेना-देना नहीं, बस अपने काम में लगे रहते हैं। सबसे अच्छा बोलते हैं, सुबह नौकरी करने जाते हैं और रात को घर आकर सो जाते हैं। कल पता नहीं गणेशा को क्या सूझा। उसने अपनी मोटरसाइकिल से भोलारामजी की साइकिल में जोरदार टक्कर मार दी और ऊपर से भोलाजी से गाली-गलौच करने लगा। भोलाजी जो कल तक गणेशा की दादागिरी को सहन करते आए थे, उन्होंने जो गणेशा को धोया, पूछिए मत। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया गणेशा की मार देखने के लिए। अब गणेशा मोहल्ले में चूहा बनकर रहता है और भोलारामजी मोहल्ले के हीरो बन गए हैं।
अरे, आज के टाइम ना तो कोई हीरो है और ना ही सुपरहीरो। थोड़ा-सा जोर लगाओगे, तो अच्छे-अच्छों को मिट्टी सुंघा दोगे। डेक्कन ने भी तो धोनी के धुरंधरों से लेकर सचिन के करामातियों तक, सबको ढेर कर दिया। पिछली बार की हार से सबक लिया, देखा कि कहां हुई चूक। फिर लगे रहे चुपचाप अपने खेल को धार देने में। और कमाल देखिए, खेल-खेल में सबको चलता कर दिया। सबकी बोलती बंद दी। कमेंटेटर से लेकर टीमों के मालिक, दर्शकों से लेकर भविष्यवक्ता सब भौचक। जैसा जलवा पिछली बार राजस्थान के रॉयल्स ने किया था, कुछ-कुछ वैसा जादू ही, इस बार डेक्कन चार्जर्स ने किया। राजस्थान की टीम को पिछली बार कोई तवज्जो नहीं दे रहा था। पर शेन दादा ने अपने खेल से, अपनी कोचिंग से बता दिया कि मिट्टी भी सोना उगल सकती है। सिर्फ नाम से कुछ नहीं होता। नाम के साथ जब तक काम का तड़का नहीं लगेगा, स्वाद नहीं आएगा। प्रीतो से लेकर किंग खान और माल्या साहब से लेकर शिल्पा, सब दुखी हैं। अपना दुख किससे बांटे। क्या-क्या मोड नहीं आए खेल में, हर मोड पे अपने खिलाडिय़ों का साथ दिया। मीडिया को लगातार खबरें देते रहे। ब्लॉग पे, अखबार में, गली में, मोहल्ले में, चाय की थड़ी से लेकर पनवाड़ी की दुकान तक, हर जगह क्रिकेट से ज्यादा इनके जलवाकारों की बातें। कभी शाहरुख बोले कि प्रीति जिंटा और शिल्पा शेट्टी ने अपनी-अपनी पहली फिल्में मेरे साथ ही कीं। मैं पहले से ही हर हुनर जानता हूं। टीम तो कोलकाता की ही जीतेगी। गांगुली भाई को कप्तानी से हटाकर कोच बुकानन तो चार-चार कप्तानों की थ्योरी ले आए। पर ये बस भूल गए कि मैच थ्योरी से नहीं प्रेक्टिकल से जीते जाते हैं। मैदान में जब इक्कली गेंद के पीछे भागना पड़ता है, तो अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं।
तू-तू मैं-मैं करने से सस्ती पब्लिसिटी तो मिल जाती है, पर जीत हासिल नहीं होती। हम बात क्रिकेट की क्यों करें, अरे फ्रेंच ओपन पर ही नजर डाल लीजिए, क्या 22 साल की उम्र। हर कोई कहेगा कि इस उम्र में तो नौजवान सिर्फ सपने देखते हैं। और एक अपना नडाल भाई है, जो इस बार लगातार पांचवी बार खिताब जीतने की सोच रहा है। मेहनत करता है बंदा। क्ले कोर्ट में उसने जितना पसीना बहाया है, शायद ही किसी के बूते हो। जीतेगा क्यों नहीं। हमें पता है कि जब पिछले साल उसने ब्योन भाई के चार बार लगातार फ्रेंच ओपन जीतने का खिताब तोड़ दिया, तो फिर इस बार भी कमाल करके दिखाएगा। अब हम तो अपने देश के खिलाडिय़ों को यही सलाह देंगे कि ज्यादा ख्याली पुलाव मत पाला करो। पसीना बहाया करो। यह नहीं कि एक बार शतक ठोक दिया और फिर गई साल-दो साल की। मियां, आज के दौर में टिकना है, तो लगातार खुद को चलता सिक्का साबित करना होगा। वरना ये जनता तुमको चलता कर देगी।
-आशीष जैन

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30 May 2009

चीते पस्त लंका मस्त

कल ही बात है। पप्पू हमारे बगल में अपनी किताब खोलकर बैठ गया और अपना पाठ दोहराने लगा- चीते में बड़ी फुर्ती होती है। वो बहुत तेज दौड़ता है। हमने पूछा- बेटा, क्या चीते को कोई नहीं पकड़ सकता? कहां लिखा है ये? वो बोला- और कहां लिखा होगा, मेरी किताब में लिखा है और किताब में लिखी हर बात सही होती है। उसकी बात सुनकर हमने चुप्पी साध ली। और आज जब अखबार खोलकर देखा, तो पता लगा- अरे! ये क्या चीते पस्त हो गए। लंका की सेना ने प्रभाकरन का सफाया कर दिया। धो डाला लिट्टे को। चुन-चुनकर मारा लिट्टे के लोगों को। फिर हमने अपने मुन्ना को भी यह खबर पढ़वाई कि देख बेटा, जो चीता हमेशा जीता, वो आज लंका के चपेटे में आ गया है।

चलो, इससे एक बात तो तय हो गई कि ये ससुरे आतंकी चाहे कितना ही कहर ढहा लें, पर अगर हम डटे रहें, तो जीत भी हमारी ही होगी। मानना पड़ेगा लंका के राष्ट्रपति का हौसला और फैसला। सारी दुनिया एक तरफ और खुद की मर्जी एक तरफ। हार नहीं मानी, कह दिया पूरी दुनिया से- ये हमारे घर का मामला है। हमें भी चिंता है हमारे लोगों की। अब आगे बढ़े हैं, तो घर की पूरी सफाई करके ही दम लेंगे। जंच गए महेंद्राजी, दम तो है बात में। अब तमिलों को भी तो यकीन दिलाओ कि उन पर किसी तरह का जुल्मोसितम नहीं होगा। उन्हें हर वो अधिकार मिलेगा, जिसके वे हकदार हैं। हमें यकीन है कि एक मोर्चे पर अगर लंका ने जीत हासिल की है, तो फिर तमिलों को संतुष्ट करने में भी सरकार जरूर सफल हो जाएगी।
अब बारी है उस कमबख्त पाकिस्तान की। कोई उसे भी तो समझाओ। उसने अपने ही घर को पापीस्तान बना रखा है। खुद जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है। दुनिया कहां की कहां पहुंच गई और वो ही अब भी जिए जा रहा है आदमयुग में। ना तो वो तलवार से डरता है और ना ही किसी तकरार से। अपनी मर्जी से चले जा रहा है। पर क्या करें, उसकी आदतों से हमें तो फर्क पड़ता है ना! नाक के नीचे तालिबानी काका उधम मचा रहे हैं और उन्हें दुत्कारने की बजाय पुचकार और रहे हैं। कल को वे तालिबानी स्वात के बाद दिल्ली फतह की सोचने लगे तो? अमरीका से ले लिया पैसा और कह दिया कि कर देंगे सफाई तालिबानियों का। अरे, अब हमें कोई ये बताए कि क्या ये पूरा मसला पैसे के चलते अटक रहा था क्या? खुद में हिम्मत हो, तो छोटी-सी फौज के आगे ना टिक पाएं, ये तालिबानी। यूं तो खबरें आ रही हैं कि तालिबानी संकट में हैं। पर आज तक पाक ने एक तस्वीर भी जारी की है, किसी तालिबानी की लाश की? इससे बढिय़ा तो पानी में तैरता लंका ही बढिय़ा। कम से कम प्रभाकरन की तस्वीर तो पेश कर दी और बता दिया कि जो टाइम उन्हें मिला था, उसमें आतंक का पूरा सफाया भी कर दिया है। भगवान झूठ ना बुलाए, पर हमें तो यह अमरीका के गाल पर करारा तमाचा लगता है भई। जो अमरीका अभी तक ग्यारह सितंबर के मुलजिम ओसामा बिन लादेन के बारे में यही पता नहीं लगा पा रहा कि वो जिंदा है या मर गया! वो क्या खाक आतंक का खात्मा करेगा?
और हम क्या खास कर रहे हैं आतंक के सफाए के लिए? क्या सिर्फ कसाब को पाकिस्तान नागरिक मनवा लेने से पाकिस्तान आतंक खत्म कर देगा। दीजिए उन्हें कसाब के डीएनए की रिपोर्ट? पर आखिर कोई तो हमें बताए कि क्या कछुआ चाल से चलते-चलते हम पाकिस्तान को कूटनीतिक पराजय दे पाएंगे? हम तो सिर्फ खड़े-खड़े देख सकते हैं। तस्लीमा नसरीन को देश से भागना पड़े, पर हम सिर्फ आश्वासन देते रहेंगे। यही हाल तो सलमान रुश्दी और एमएफ हुसैन का है। जी रहे हैं किसी और दुनिया में। लोगों को इस देश से बहुत आशा है। राहुल बाबा युवाओं को आगे आने की कह रहे हैं, पर राहुलजी एक बार इन युवाओं के भीतर उफनते सैलाब को तो देखें। कैसे उनके सामने उनके बड़े धर्म और जाति के नाम पर मरने-मारने को उकसा रहे हैं! ना रोजगार है और ना ही भविष्य को लेकर सपना। बस एक भीड़ बन चुके हैं युवा। अंदर की ताकत झूठे दिखावे में खर्च हो रही है। कोई भी टटपूंजिया उनका भाग्यविधाता बनने के सपने दिखाने लगता है। ऐसे में क्या हम सोच सकते हैं कि युवा शक्ति एकत्र होकर कोई बदलाव कर पाएगी। हां, ये जरूर संभव है कि अब इन्हीं युवाओं में से कोई युवा हिंदुस्तानी प्रभाकरन का चोला पहन ले और किसी भी मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों ले। हमें सोचना है। अब खाली बैठने का नहीं, कुछ करने का समय है। लंका को देखकर तो कुछ सीख लो, मेरे देश के भाग्यविधाताओं।
-आशीष जैन

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जादूगर जनता

जब कभी इस भरी गर्मी में हम घर से बाहर निकलते हैं और बरसती लाय के बीच ठंडी हवा का झोंका चलता है, तो तन-मन में मस्ती का खुमार चढ़ जाता है। और मुंह से यही शब्द निकलते हैं, वाह! मजा आ गया। कुछ-कुछ ऐसा ही हमारे साथ ऑफिस में भी होता है। जब ऑफिस में काम के साथ रामप्यारेजी की प्यारी-प्यारी बातों का तड़का लग जाए, कहना ही क्या। दिन बड़ा सुकून से गुजरता है। सारी टेंशन भाग जाती है। पर कल तो गजब ही हो गया। रामप्यारेजी को ऑफिस आए, एक घंटे से ज्यादा हो गया और एक शब्द भी मुख से नहीं निकाला। आश्चर्य था भई। दरअसल सुबह से ही उनका मूड कुछ उखड़ा-उखड़ा सा था। हम तो मन ही मन सोचने लगे, रोज तो उनके पास कहने-सुनने को हजार बातें रहती थीं। आज क्या हुआ? जरूर पत्नी से मार खाकर आ रहे होंगे। या फिर बच्चों ने कोई ऐसी मांग सामने रखी होगी, जिससे इनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया और जुबान पर लगाम लग गई।

या हो सकता है कि बोलने की वजह से रास्ते में हाथापाई हो गई हो। हम उनके नजदीक गए। बात करने की कोशिश की, लाख समझाया। पर उनके बोल सुनने को हमारे कान तरस गए। तभी ख्याल आया कि अभी कुछ दिन पहले ही तो चुनाव परिणाम आए हैं। कहीं नेता-नांगलों की तरह इन्हें भी तो हार का गम नहीं बैठ गया। हमने ऑफिस में सबको इकट्ठा किया और गीत गाने लगे, 'चुप चुप बैठो हो.... जरूर कोई बात है।Ó हमने ये गीत गुनगुनाया ही था कि रामप्यारेजी भड़क उठे। बोले, 'बात है ना, जरूर है। हम कब मना कर रहे हैं। पर क्या चुप बैठना कोई गुनाह है? ज्यादा बोलने के परिणाम अच्छे नहीं होते। बोलना ही अच्छे-अच्छों की बोलती बंद कर देता है।Ó हम बोले, 'अब तनिक बता भी दो, रामू भैया। क्या है वो बात। क्यों आपके कमल से सुंदर मुख पर बारह बज रहे हैं।Ó फिर तो अपने रामप्यारे भैया को जाने क्या सूझी कि पुराने टेपरिकॉर्डर की तरह चालू हो गए। बोले, 'हमारा दर्द जुड़ा ही बोलने से है। काश! वे इतना नहीं गुर्राए होते, तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता। हमने पूछा, 'किसकी बात कर रहे हो रामू? बताओ तो सही।Ó बोले, 'और किसकी बात करेंगे, अपन के भाई लोग, इन नेता लोगों की और किसकी। लालजी को भूल गए क्या। पहले-पहल दहाड़ लगाई और अब बैठे होंगे कहीं दुबक कर। बातें करते थे- प्रधानमंत्री बनने की। तिल का ताड़ बनाकर रख दिया। ख्वाबों के आसमान की सैर करा लाए। घर का पैसा वापस लाने का मंत्र दे दिया। कह दिया कि मैं मजबूत और बाकी सब मजबूर। जनता की भीड़ इकट्ठा कर ली। पर आज पहली बार लगा कि जादू का खेल देखने के लिए यूं ही पैसे खर्च करते थे। अपन के देश की जनता है ना, सबसे बड़ी जादूगर। पल में सारे सपनों को धोकर सच्चाई पेश कर दी। अब सब हारे हुए दिग्गज एक स्वर में कह रहे हैं कि हम उन्हें समझ नहीं पाए। अरे समझते कैसे। जनता तो पहले से ही सोचती आ रही थी कि क्या तुम नेता लोग ही हमें पागल बनाना जानते हो। अरे, अगर हमने तुम्हें नेता बनाया था, तो तुम्हें सांप सूंघाना भी आता है। क्या सोचा था, तुम्हारी सभाओं की भीड़ में शामिल हो लिए, तो इसका मतलब है कि वोट भी तुम्हें भी देंगे। अरे, हम तो एक बारगी देखना चाहते थे कि तुम्हारी बकवास बातों के पिटारे में शब्दों का कैसा मायाजाल छुपा है? हम तो पल में ही तय कर लेते हैं कि किसको राज सौपेंगे। और ई ससुरे चंगू-मंगू। हम बनेंगे प्रधानमंत्री। अरे अपने राज्य में तो सीट बचाना मुश्किल हो गई और सपने देखने लगे थे- प्राइम मिनिस्टर बनने के। और ये उलटे चलने वालों ने तो क्या खूब की। जुट गए खुद को बुद्धिजीवी साबित करने में। पर उनके दिमाग के सारे पेंच ममता दीदी ने ढीले कर दिए। हद होती है जुबान की। बस बोलने की काम। उल्टा-सीधा जो मन में आए, बस बोले जाओ। अरे, पहले देखो। फिर जानो। फिर समझो और तब जाकर कुछ बोलो। जनता हर शब्द के पीछे छुपे अर्थ को तौलती है। क्या समझा था। बातों से चुनाव जीत जाएंगे। भई, विकास भी किसी चिडिय़ा का राज है। इनको समझाए कौन कि अब ये देश युवाओं का है। जो युवाओं के मन की बात करेगा, वही तो उनका दिल जीत पाएगा। अब अपने राहुल बाबा समझ गए, इस राज को। खेल ली बाजी यू.पी. में। भिड़ गए कथित सूरमाओं से और अब तो जोश आ गया है राहुल बाबा में। अब तो कह दिया कि जब तक पूरी यूपी फतह ना कर लें, दम नहीं लेंगे। एक बार कह दिया और बस लग गए। यह तो हुई कुछ बात।Ó रामप्यारेजी को यूं धाराप्रवाह बोलता देख कुछ चैन मिला। लगा कि अब पूरा दिन मजे से गुजरेगा। दिल से बस यही दुआ निकलती है कि रामप्यारे बस यूं ही खरी-खरी बोलते रहें और हम सदा यूं ही अपनी ज्ञान वृद्धि करते रहें।
-आशीष जैन

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22 May 2009

जय जुगाड़ बाबा की

युगों-युगों से मैं काम करता आया हूं। मेरे पास हर मर्ज की दवा है। मुफ्त की सलाह दे रहा हूं- आज के दौर में अगर मौके-बेमौके सफलता चाहिए, तो अपनी जेब में मेरे नाम की पुडिया रखनी ही पड़ेगी। जो मेरे नाम का प्रसाद नहीं चढ़ाता, उसका कभी भला नहीं होता। तो बोलो, जय जुगाड़ बाबा की।

राम-राम सा। कैसे हो? सब कुशल से है कि नहीं। क्या कहा, परेशान हो, कुछ सूझ नहीं रहा। तो भैया मुश्किल में हमें क्यों बिसरा रहे हो। अब तक याद काहे नहीं किया। हम हैं ना हर मर्ज की दवा। हमें भूल गए क्या? तुमारी कितनी बार मदद की है। कितनी बार संकट से उबारा है। कितनी बार तुमने हमारी वजह से घर बैठे-बिठाए वाहवाही लूटी है। हमें पता था कि समय फिरते ही तुम हमें भूल जाओगे। अब देख लो, अपना हाल। हमारे नाम का प्रसाद नहीं चढ़ाओगे, तो ऐसा ही होगा। मैं तो हमेशा से ही कहता हूं कि हर काम करने से पहले सोच लिया करो कि हमें याद किया कि नहीं। क्या कहा- समझ नहीं आ रहा, हम कौन हैं। अरे हमें पता है तुम्हारी याददाश्त कमजोर पड़ गई है। चलो, हम ही बताय देते हैं। हम हैं जुगाड़।

तुम इंसानों ने ही तो पैदा किया था हमें। तुम्हारा तो शुरू से ही मंत्र रहा है कि सीधी उंगली से घी ना निकले, तो जुगाड़ लगाकर घी निकालो। अब तुम्हें बस घी खाने से मतलब है जी। भूल गए, तुमने अपनी जिंदगी में मेहनत से कुछ हासिल नहीं किया। बस मेरी मदद से ही तो तुम बादशाह बन पाए हो। जुगाड़ बिठाकर ही तो तुम गली के गुंडे से शहर से नामचीन नेता बन बैठे थे। याद नहीं वो दिन, जब पूरे शहर में किसी को भी उल्लू बनाकर रुपए एंठने में तुम उस्ताद थे। एक दिन एक नेताजी को पलीता क्या लगाया, नाराज होने की बजाय खुश होकर उन्होंने कहा था- तुम में तो नेता बनने के सारे गुण मौजूद हैं। आ जाओ, हमारी पार्टी में और बन जाओ मोहल्ले के नेता। फिर तो तुम्हारी चल निकली। पूरे शहर में तुम्हारी नेतागिरी के चर्चे होने लगे। कोई काम ऐसा नहीं, जो तुम ना कर पाओ। पर भूलो मत, हर उल्टा-सीधा काम करने से पहले तुम मुझे ही तो याद किया करते थे। पार्टी की सरकार बनी, तो दाब-धौंस से जुगाड़ लगाया और अपने राजदुलारे घीस्या को पेट्रोल पंप दिलवा दिया। सिफारिश करके तुमने हाईकमान से टिकट पटा लिया और दारू बंटवाकर तुम संसद के गलियारों में चहल-कदमी करने लग गए। फिर मौका लगा, तो किसी दूसरी पार्टी का जुगाड़ लगाकर उसमें घुस गए। अब देखो ना, इस बार चुनाव हुए, तो दुबारा पुरानी पार्टी में आकर फिर जीत गए। मानना पड़ेगा, इंसानी जमात में मेरा जितना इस्तेमाल तुम नेता लोगों ने किया है, उतना शायद ही किसी ने किया हो। जुगाड़ लगाकर कर किसी तरह से अपना काम बनता और भाड़ में जाए जनता। यह तो तुम्हारे जीवन का सिद्धांत है भई। पर अब लगता है कि तुम्हें हमारी कद्र नहीं रही। पावर जो आ गई है, तुम्हारे पास। लेकिन तुमने हमारी खूब सेवा की है। इसलिए तुम्हारी परेशानी के बारे में सुना, तो हम ही चले आए। अब बता भी दो, क्या प्रॉब्लम है। मेरे पास है ना हर ताले की चाबी। क्या कहा- सरकार बनानी है। पर गणित पूरी नहीं बैठ रही। मन में डर है कि कहीं विपक्ष में ना बैठना पड़े। अरे, इतनी-सी बात और इतनी ज्यादा टेंशन। तुम भी क्या इंसान हो। इतना टाइम मेरे साथ रहे और कुछ नहीं सीखा। करना क्या है, बस बयान देते रहो। जो छोटे दल हैं, उन्हें पुचकारते रहो, सपने दिखाते रहो और जो तुम्हारे साथी-संगी हैं, उनसे कह दो-यह सब तो पॉलिटिक्स का हिस्सा है, सरकार अपनी ही बनेगी। निर्दलीयों को खरीद लो, मीडिया में सरकार बनाने की हवा फैला दो। किसी को अपनी पोल खुलने मत दो कि डर तो तुम्हें भी लग रहा है। अगर लोगों को तुम्हारा हौव्वा बना रहेगा, तो तुम जरूर सफल हो जाओगे। लो हो गया ना जुगाड़। पर अब से एक बात याद रखना- मुझे कभी मत भूलना, वरना दुबारा तुम्हारी कभी मदद करने नहीं आऊंगा। अभी तो चलता हूं और दीन-दुखियों की भी तो सेवा करनी है। जय राम जी की।
-आशीष जैन

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परिणाम को प्रणाम

सावधान रहिएगा। सुनते हैं, अब परिणामों का दौर है। किस्म-किस्म के परिणाम अब बाजार में नजर आएंगे। देखना ये है कि भरी गरमी में कौनसा परिणाम कुल्फी-सी ठंडक देगा और कौनसा अंजाम तूफान बरपाएगा।
लो भैया हो गया काम तमाम। सारी भागदौड़ पूरी। अब तो दिल धड़काने की बारी है जी। मन में तड़पन, तन में हलचल। आप ही बताएं, जब किसी काम को मन रमाकर करा है, तो उसका अंजाम जानने की तो सबको जल्दी रहती ही है ना। अंजाम मतलब रिजल्ट मतलब परिणाम।

परिणाम भी दसियों तरह के। कभी स्कूल की एग्जाम के परिणाम, कभी मैच का परिणाम, तो कभी चुनावों का परिणाम। ससुरे जितनी टेंशन ये एग्जाम नहीं देते, उससे चौगुनी तकलीफ तो मुए रिजल्ट देते हैं। काम करते वक्त हमारा दिल इतना नहीं धड़कता, जितना परिणाम सोच-सोचकर धड़कने लगता है। इन परिणामों से हम बचपन से पीडि़त हैं। कक्षा की परीक्षा के परिणाम आने वाले दिनों में तो हम घर से निकलना ही छोड़ देते थे। अब देश के इन चुनावों की बात भी क्या खूब है। महीना-डेढ़ महीना नेताजी के नाम से खूब नारे लगाए, खूब भाग-दौड़ की। अब सब गुल। अब वही कंगाली के फटेहाल दिन। नेताजी जीत गए, तो बल्ले-बल्ले और अगर किसी की गलत नजर चलते हार गए, तो कुछ नहीं बचेगा। क्या-क्या आस लगा रखी है। नेताजी जीत गए, तो बेटे को नौकरी मिल जाएगी। थोड़ी पहुंच बढ़ जाएगी। हर तरफ रुतबा बढ़ जाएगा। अब देखते हैं कि इन परिणामों की पोटली में क्या छुपा है। हमें छोडि़ए, आप तो नेताजी के घर का नजारा देखिए। सब लोग लगे हैं नेताजी को तसल्ली देने में। सब अच्छा होगा, आप देखना। अब तो चुनाव जीत ही गए, समझ लो। पर अपने नेताजी तो शुतुरमुर्ग की तरह बेफ्रिक। वे तो जीत का भरोसा तभी करेंगे, जब परिणाम हाथ में होगा। वे तो सोच-सोचकर परेशान हैं कि नहीं जीते, तो क्या होगा? वही तेल बेचने का काम दुबारा करना होगा। बेइज्जती होगी सो अलग। हालत तो यूं होगी- माया मिली, न राम। हमने तो नेताजी की खैर-खबर रखने वाले एक-दो मुलाजिमों को कहलवा दिया है कि चुनाव परिणाम के एक दिन पहले से ही डॉक्टर-वॉक्टर को घर बुलवा लेना। इसी में भलाई है। क्या पता नेताजी सदमा झेल भी पाएं या नहीं।
कल-परसों से तो गजोधर के परिणाम ने भी हमारा जीना हराम कर रखा है। गजोधर हमारा बेटा। इस साल मैट्रिक की परीक्षा दी थी। सोचा था कि टॉप करके हमारा नाम रोशन करेगा। पर हमें क्या पता कमबख्त क्रिकेट के पीछे पड़कर अपना मटियामेट कर लेगा। कहता था- बापू, अब मैं ही अगला सचिन बनकर दिखाऊंगा। खुशी-खुशी हमने उसे गेंद-बल्ला दिला दिए। अब नीपूता फेल हो गया। अब क्या करें? किससे अपना दर्द बयां करें? ये क्रिकेट तो हमारे नूरे चमन का कॅरियर ही चौपट करके रहेगा। भई, क्रिकेट की दीवानगी तो हमें भी है। पर इसका मतलब यह थोड़े ही ना है कि सपूत की तरह चौबीसों घंटे हाथों में गेंद-बल्ला लेकर घूमते रहें। पूरे मोहल्ले को सचिन बनने का सपना दिखाते रहें।
हां, तो हम बात कर रहे थे परिणामों की। बीस-बीस क्रिकेट हो रहा है ना दक्षिण अफ्रीका में। उसके भी रंग निराले हैं। इस बार तो अपने डेक्कन चार्जर्स पूरे चार्ज में दिख रहे हैं। धो डाला सबको। और तो और लगता है शाहरुख भाईजान तो सड़कों पर ही आ जाएंगे। खानभाई ने बड़े सपने देखे थे नाइटराइडर्स से। खूब पाला-पोसा। बुकानन की हर बात पर कान लगाया। दादा की कप्तानी छीन ली। पर ढाक के वही तीन पात। बाहर हो लिए खेल से। अब कौन इस बार आईपीएल का सूरमा साबित होगा, ये बात अच्छे-अच्छों को परेशानी में डाले हुए है। प्रीतो के गालों के डिंपल पर, शिल्पा के चेहरे की खुशी अब परिणामों को जानने को मचल रही होगी। सबने मिलकर पहले तो क्रिकेट को जलेबी की तरह-तरह गोल-मोल कर दिया। पता ही नहीं लगा कि कहां खेल है, कहां कमाई? अब सब हिसाब लगा रहे हैं, कैसे भागते चोर की लंगोट पकड़ें। ये सब देखकर हमें तो रास-रसैया, माखनचोर श्रीकृष्ण की याद आ रही है। क्या खूब कह छोड़ा गीता में, कर्म करो और फल की चिंता मत करो। अबसे हम तो भैया एक बात पक्के से गांठ बांध चुके, नेकी कर और दरिया में डाल कर। काम किया और चिंता मिटी। बाकी रामजी करेंगे बेड़ा पार। परिणाम के फेर में फंसे रहे, तो क्या पता करम भी सही कर पाएंगे या नहीं। लो, कह दी हमने भी लाख पते की बात।
- आशीष जैन

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20 May 2009

आम है खास

फलों के राजा आम में क्या है खास, जानते हैं।
रसीले आम... वाह! मजा आ गया खाकर। इसकी खुशबू इतनी लाजवाब है कि आम के बगीचे में आप कभी जाएंगे, तो बिना आम तोड़े नहीं रह सकेंगे। जिस तरह पश्चिमी देशों में सेब और अरब जगत में अंगूरों के लिए दीवानगी है, उसी तरह हमारे देश में लोग आम के स्वाद के दीवाने हैं। वेदों में आम को विलास का प्रतीक माना गया है। महाकवि कालिदास ने इसका गुणगान किया, तो सिकंदर को भी आम बेहद खास लगे। सम्राट अकबर ने तो दरभंगा में आम के एक लाख पौधे लगवा दिए थे और वह बाग आज भी 'लाखी' बाग के नाम से मशहूर है।

आम के कई रूप हैं। आम का बौर, कैरी या कच्ची अंबिया और पका आम। आम की लोकप्रियता हमारे देश में इतनी है कि इस पर लोकगीत तक लिखे जा चुके हैं। आम से बना पना, अचार, मुरब्बा या जैम तो आपने जरूर खाया होगा। कैसा लगा? यकीनन स्वादिष्ट। और हां, अमचूर यानी आम की खटाई के बिना तो मानो हर स्वाद अधूरा है। तमिलनाडु के कृष्णगिरी के आम तो दुनियाभर में मशहूर हैं।
फलों के इस राजा को भारत का राष्ट्रीय फल यूं ही नहीं कहा जाता। इसके गूदे में जो रेशा होता है, वह न केवल हाजमा सही करता है बल्कि कॉलेस्ट्रोल भी घटाता है। इसमें विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है। सबसे अच्छा आम वही होता है, जिसमें रेशा कम, गूदा ज्यादा और मीठा हो। आम के पेड़ को हमारे यहां खुशियों से जोड़कर देखते हैं। आज आम के लिए कलम बांधने की कला में मलीहाबाद के हाजी कलीम उल्ला खान वाकई कमाल कर रहे हैं। सत्तर वर्ष के हाजी साहब को इस हुनर के लिए इस साल पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। वे कलम लगाकर आम के एक ही पेड़ में 300 किस्मों के आम पैदा कर चुके हैं। पचास-पचपन साल पहले चंडीगढ़ के बुड़ैल गांव में आम का एक विशाल पेड़ था। उसकी उम्र 100 वर्ष से भी अधिक थी। उसका तना 9.75 मीटर मोटा था और पेड़ 2,258 मीटर क्षेत्र में फैला हुआ था। एक साल में उससे करीब सोलह-सत्रह टन फल मिलते थे।
आम की किस्में
दुनिया के तीन चौथाई से ज्यादा आम एशिया में पैदा होते हैं। उसमें भी सबसे ज्यादा आम हमारे देश में ही पैदा होते हैं। हमारे देश की कुछ खास किस्में हैं- दशहरी, लंगड़ा, चौसा, बैंगनपल्ली, हिमसागर, फजली, खासा, प्रिंस, आबेहयात, अलफांजो, केसर, किशनभोग, मलगोवा, नीलम, वनराज, जरदालू, मल्लिका, रत्ना, अर्का अरुण, अर्मा पुनीत, अर्का अनमोल, बंबई ग्रीन, शम्सुल अस्मर, हलवा, लखनऊ सफेदा। इन नामों के किस्से भी बहुत दिलचस्प हैं। 'लंगड़ा' आम सुनकर सोच रहे होंगे, भला ये भी कोई नाम हुआ। पर इस किस्म के आम का पहला पेड़ बनारस में एक लंगड़े फकीर बाबा के घर के पिछवाड़े उगा था। और स्वादिष्ट दशहरी के बारे में कहा जाता है कि यह लखनऊ के पास मलीहाबाद के दशहरी गांव में पैदा हुआ। मलीहाबाद तहसील के ही चैसा गांव में लोगों ने जब पहली बार एक अलग स्वाद और सुगंध वाला आम चखा तो उसका नाम 'समरबहिश्त चैसा' रख दिया! इसी तरह बिहार के भागलपुर गांव में एक औरत थी-फजली। पहली बार उसी के आंगन में फला-फूला था यह आम।
गुणों की बहार
यदि गर्भस्थ महिला आम चूसती है, तो इससे शिशु का रंग साफ होता है।
जो महिलाएं चेहरे का सौंदर्य बढ़ाना चाहती हैं, वे आम के रस में शहद मिलाकर चेहरे पर लगाएं।
आंखों के चारों ओर काले घेरे हों, तो आम के रस में रुई डुबोकर चेहरे पर लगाएं।
बाल झड़ते हैं, तो आम के पत्तों और डंठल को पानी में उबालकर हफ्ते में दो बार सिर धोएं।
कान का दर्द होने पर आम का पत्ता पीसकर (बिना पानी) हल्का गर्म करके कान में डालें।
-आशीष जैन

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13 May 2009

यूं मिली कामयाबी की डगर

मुजफ्फरनगर की श्वेता सिंघल ने सिविल सर्विसेज एग्जाम में हासिल की 17वीं रैंक और हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों में दूसरा स्थान।

'जब मुझे पता लगा कि सिविल सर्विसेज एग्जाम में मुझे 17वीं रैंक हासिल हुई है, तो एकबारगी तो यकीन ही नहीं हुआ। लगा मेरी सालों की मेहनत और माता-पिता का आशीर्वाद काम आ ही गया। यह कहना है सिविल सर्विसेज एग्जाम में 17 वीं रैंक हासिल करने वाली उत्तप्रदेश के मुजफ्फरनगर की 27 वर्षीय श्वेता सिंघल का। हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों में उन्हें दूसरा स्थान मिला है। उनकी आंखों में देश के विकास के सपने हैं, तो बातों में कुछ कर गुजरने का आत्मविश्वास। अपनी कामयाबी में उन्होंने ग्रामीण परिवेश को कभी आड़े नहीं आने दिया। हालांकि श्वेता का यह तीसरा प्रयास था, पर उन्होंने पढ़ाई का तनाव कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे कहती हैं, 'लड़की होने के नाते मेरे ऊपर ज्यादा जिम्मेदारियां थीं। मुझे खुद को साबित करना था।

विषय को समझा गहराई से
मुजफ्फरनगर के श्यामली कस्बे में पैदा हुई श्वेता के पिता अरुण सिंघल मेडिकल स्टोर संभालते हैं। मां उषा गृहिणी हैं और भाई नितिन आईएएस की तैयारी कर रहा है। बड़ी बहन रश्मि की शादी हो चुकी है। श्वेता ने शुरुआती पढ़ाई श्यामली में ही की। इसके बाद वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के लिए दिल्ली आ गईं। लेडी श्रीराम कॉलेज से हिंदी ऑनर्स से बीए करने के बाद उन्होंने हिंदू कॉलेज से एमए किया। हिंदी विषय में ही उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही एमफिल भी किया। सिर्विल सर्विसेज के बारे में श्वेता पहले गंभीर नहीं थी। पर एमफिल करने के बाद उन्होंने एग्जाम के लिए कमर कस ली। शुरू के दो प्रयासों में उन्हें इस परीक्षा को करीब से समझने का मौका मिला। उन्हें यह बात समझ में आई कि जब तक विषय की गहराई में नहीं जाएंगे, सफलता मिलना मुश्किल है। पढ़ाई के दौरान श्वेता कॉलेज हॉस्टल में ही रहती थीं। उसके बाद वे सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए अपने भाई के साथ किराए के फ्लैट में रहने लगी।
आत्मविश्वास और मेहनत
सिलसिलेवार तरीके से पढ़ाई करते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य पर निगाह जमाए रखी। प्री एग्जाम में भूगोल विषय लेकर मुख्य परीक्षा भूगोल और हिंदी साहित्य से पास की। साक्षात्कार में सफलता के लिए उन्होंने खान स्टडी गु्रप में ट्रेनिंग ली। इस बारे में वे कहती हैं, ' मेरे सर ए. आर. खान ने व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी मदद की। उन्होंने मुझे पर्सनलिटी डवलपमेंट के गुर सिखाए। इसी की बदौलत मैं यह सफलता पा सकी। अपने ग्रामीण परिवेश के बारे में वे कहती हैं, 'ग्रामीण विद्यार्थियों को शुरू में सब कुछ अटपटा लगता है। न तो सही गाइडेंस होती है और न ही उचित संसाधन। ऐसे में आत्मविश्वास और मेहनत ही काम आते हैं। अपने साक्षात्कार के बारे में वे बताती हैं, 'इंटरव्यू के दौरान मुझसे पूछा गया कि इंटरव्यू देने आते वक्त आप क्या सोचकर आईं? साथ ही धर्म, इतिहास, बाल विकास, महिला सशक्तीकरण, अर्थव्यवस्था पर सवाल पूछे गए। हिंदी माध्यम को श्वेता अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती हैं। वे कहती हैं, 'हिंदी भाषा मेरा आत्मविश्वास है। हिंदी मेरे लिए कभी बाधा नहीं बनी, बल्कि हिंदी की वजह से ही मेरा चयन हो पाया। अपने भविष्य के बारे में उनकी सोच साफ है। बकौल श्वेता, 'मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाकर सबसे पहले फील्ड की बारीकियां सीखूंगी। लोगों की समस्याओं से रूबरू होऊंगी। इसके बाद मैं सरकारी अफसर और जनता के बीच बनी हुई संवादहीनता खत्म करूंगी। मेरा मानना है कि जब तक लोगों के मन से सरकारी सिस्टम का डर नहीं निकलेगा, तब तक देश का विकास अधूरा रहेगा।
-आशीष जैन

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सफलता का सफर

जानते हैं सिविल सर्विसेज एग्जाम में टॉप करने वाली शुभ्रा सक्सेना के बारे में।
आईआईटी रुड़की से अमरीका, यूनाइटेड किंगडम और सिंगापुर... फिर सिविल सर्विसेज एग्जाम के शिखर पर काबिज होने का शानदार मोड़। वाकई शुभ्रा सक्सेना के लिए जिंदगी का सफर काफी रोमांचक रहा।

सिविल सर्विसेज एग्जाम 2008 में टॉप करने वाली शुभ्रा ने आईआईटी रुड़की से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की, पर आईटी सेक्टर की शानदार नौकरी छोड़कर देश सेवा में लगने का फैसला किया। पढ़ाई के चार साल बाद तक वे तीन आई टी कंपनियों में काम करती रहीं। उन्होंने 2006 में अपनी नौकरी छोड़ी और नई दिल्ली के राजेंद्र नगर में किराए का अपार्टमेंट लेकर आईएएस बनने की तैयारी करने लगी। वे सुबह आईएएस की तैयारी करवाने वाले संस्थान में पढ़ाती थीं और बचे हुए समय में खुद तैयारी करती थीं। इंजीनियर शुभ्रा ने साइकोलॉजी और पब्लिक एडमिनिस्टे्रशन विषय से एग्जाम दी। आईएएस बनने की इच्छा के बारे में शुभ्रा कहती हैं, 'बोकारो में कोयले की खदानों के आस-पास मजदूरों के खेलते हुए बच्चों को देखकर मुझे लगा कि क्यों न ऐसा काम किया जाए, जिससे इन बच्चों का भला हो सके। फिर तो मैंने ठान लिया कि मैं आईएएस बनकर दिखाऊंगी। उत्तरप्रदेश के बरेली में पैदा हुई 30 वर्षीय शुभ्रा के पिता अशोक चंद्र सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड में अधिशासी अभियंता हैं। झारखंड के हजारीबाग से स्कूलिंग करने के बाद शुभ्रा आईआईटी से बीटेक करने के लिए रुड़की आ गई। फिर आईटी सेक्टर में नौकरी के चलते अमरीका, यूनाइटेड किंगडम और सिंगापुर भी गई। पर वे अपने काम से खुश नहीं थीं। इसलिए अपनी मां के पास यहां आकर आईएएस की तैयारी करने लगी। शुभ्रा की शादी छह साल पहले नोएडा के शशांक गुप्ता से हुई। शशांक अभी नोएडा में सीएससी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। आईएएस एग्जाम के इतिहास में भी ऐसा पहली बार हुआ है, जब पहले तीन स्थानों पर महिलाओं ने बाजी मारी है। शुरुआती 25 स्थानों में 10 लड़कियां शामिल हैं। उन्होंने साबित कर दिखाया है कि अब देश चलाने के लिए महिलाएं कमर कस चुकी हैं।
-आशीष जैन

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प्यारा इक बंगला हो


काश! हरी-भरी वादियों में हमारा भी एक आलीशन और खूबसूरत घर हो, यह चाहत किसकी नहीं होती। भला प्राकृतिक सौंदर्य के आकर्षण से कौन बच सकता है। पर इसे अमलीजामा पहनाने की तैयारी कर रही हैं प्रियंका गांधी।

प्रियंका हिमाचल प्रदेश में शिमला के पास छराबड़ा में एक घर बनवा रही हैं। हरे रंग के खास पत्थरों से बनने वाले इस दोमंजिला घर की पहली मंजिल तो बनकर तैयार भी हो गई है। इसमें कुल सात कमरे हैं। दिलचस्प बात है कि यहां मदर्स रूम नाम से एक खास कमरा भी बनाया गया है। कयास लगाया जा रहा है कि प्रियंका ने यह कमरा खास तौर पर अपनी मां सोनिया गांधी के लिए तैयार करवाया है। घर बनाने के लिए सोलन के बड़ोग से खास पत्थर मंगवाए गए हैं। प्रियंका इस घर की जमीन अपनी नानी पाओला मैनो को भी दिखा चुकी हैं। घर बनवाने के लिए उन्होंने पांच बीघा जमीन ली थी। उसमें से छह बस्वे के क्षेत्र में यह घर बन रहा है। घर की छत स्लेट की होगी। घर की शैली हिमाचली पहाड़ी शैली के अनुरूप ही होगी। हरियाली का खास ध्यान रखते हुए घर के बाहर चार लॉन बनाए जा रहे हैं। तीन लॉन सजावट और एक लॉन खास तौर पर बच्चों के खेलने के लिए तैयार किया जा रहा है। उम्मीद है कि घर जल्द ही बनकर तैयार हो जाएगा।
- आशीष जैन

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06 May 2009

मां को बचाना है

बॉलीवुड एक्टैरस रवीना टंडन यूनिसेफ की ब्रांड एंबेसेडर बनकर मांओं को बचाने की खास मुहिम में जुटी हैं।

'बच्चे के जन्म के समय या गर्भावस्था की समस्याओं के दौरान मां की मौत को अक्सर लोग गरीबी से जोड़ते हैं। पर मेरा मानना है कि यह गलत धारणा है।' रवीना टंडन की यह सोच निराधार नहीं है। वे महिलाओं को गर्भ से जुड़ी भ्रांतियों की सच्चाई से रूबरू कराने के मिशन पर हैं। आज गर्भ से जुड़ी समस्याओं के चलते देश में हर साल 78 हजार महिलाओं की मौत हो जाती है। यूनिसेफ के साथ मिलकर रवीना गांव-गांव में रोड शो करने की योजना बना रही हैं। ग्रामीण लोग जानकारी के अभाव में महिलाओं का ध्यान नहीं रख पाते और महिलाएं मौत का ग्रास बन जाती हैं।

उनका कहना है कि आज भी देश के अधिकांश घरों में महिलाओं से पहले पुरुष भोजन करते हैं। अगर घर में कोई गर्भवती महिला है, तो घर के सभी सदस्यों को महिला की सेहत का ध्यान रखना चाहिए। इससे होने वाला बच्चा भी तंदुरुस्त पैदा होगा। गर्भवती महिलाओं को दवाइयों और विटामिन्स का खास ख्याल रखना होगा। तीन से पांच रुपए में आने वाली फालिक एसिड की गोली से भी गर्भ की समस्याओं को रोका जा सकता है। उनका सुझाव है कि महिलाओं को गर्भकाल के दौरान खुद के स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए। साथ ही घरवालों को भी महिला को पोषक तत्व देने के लिए एक अतिरिक्त खुराक देनी चाहिए। अगर महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ होगी, तो उसे बच्चे के जन्म के समय कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी। साथ ही उनका मानना है कि महिलाओं को दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम तीन या चार साल का अंतर रखना चाहिए, ताकि बच्चों की परवरिश ढंग से की जा सके। रवीना का कहना है कि अगर बच्चियों की जल्द शादी की बजाय माता-पिता उन्हें शिक्षित करेंगे, तो आगे चलकर यही लड़कियां बेहतर मां भूमिका निभा पाएंगी।
-आशीष जैन

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सलाखों में कैद मां


जेल में सजा काट रही महिलाएं अपराधी तो हैं, पर अपने साथ पल रहे बच्चों के लिए इनके सीने में भी धड़कता है एक मां का दिल...। पेश है जयपुर की महिला जेल में रहने वाली महिला कैदियों के मातृत्व की एक झलक।
जेल का नाम आते ही दिमाग में ऐसे अपराधियों की छवि उभरती हैं, जो बहुत खतरनाक हैं। पर इन सखीचों के पीछे बैठी मां की ममता और दुलार का जवाब नहीं। ये महिलाएं जमाने भर के लिए मुजरिम हैं, पर अपने बच्चों के लिए सिर्फ एक मां है। इनकी भगवान से केवल एक ही दुआ है कि इनका राजदुलारा हमेशा खुश रहे।
छिपा लेती हूं आंचल में

नाम- ज्योत्सना, उम्र- 26 साल, अपराध- हत्या, सजा- आजीवन कारावास
मेरे दिन की शुरुआत मेरे बेटे अंकुश को देखकर होती है। मुझे दुख इस बात का है कि मेरी गलती की सजा इस मासूम को भी भुगतनी पड़ रही है। मां हूं ना इसके बिना रह भी तो नहीं सकती। इसलिए इसे यहां ले आई। अभी दो साल का ही तो है। जेल में मजदूरी करके दिनभर में नौ रुपए कमा पाती हूं। इन्हें इसके लिए जमा करती हूं। छह साल का हुआ नहीं कि इसे मुझसे अलग कर दिया जाएगा। यह सोचकर ही मैं सिहर उठती हूं। यहां यह सबका दुलारा है। कोई ना कोई इसे दिनभर खेल खिलाता रहता है। पर मैं इसे एक पल भी मेरे से दूर नहीं रखना चाहती। इसलिए हमेशा इसे गोद में रखती हूं। कई बार मेरे साथ वाली औरतें कहती हैं, 'इसे अपनी आदत मत डाल कि यह तुझसे दूर ना रह सके।' यह सुनते ही मन इसके दूर जाने के डर से कांप उठता है। अभी यह थोड़ा-थोड़ा बोलने लगा है। अपनी तुतलाती आवाज में मां सुनना बहुत अच्छा लगता है।
... अगली बार कब

नाम- अनीता, उम्र- 35 साल, अपराध- हत्या, सजा- आजीवन कारावास
मेरा बेटा आकाश दस साल का हो गया है। आश्रम में रहता है। वहां रहने वाले दूसरे बच्चों के साथ पढ़ने जाता है। सारी सुख-सुविधाएं हैं वहां पर। पर मेरा दिल नहीं मानता। इसलिए हर वक्त उसके लिए तड़पती रहती हूं। पता नहीं ठीक से खाना खाता होगा या नहीं। आज भी याद है वो दिन जब उसे यहां से ले जाने के लिए बोला गया था। मेरा तो उस दिन से ही खाना-पीना छूट गया था। पर उसे नहीं बताया, छिप-छिप के रोती थी। उसने पूछा, 'मम्मी कौन कहां जाने के लिए बोल रहा है?' मैंने कहा, 'तू यहां सबसे प्यारा है ना, इसलिए ये लोग तुझे घूमाने के लिए लेकर जाएंगे।' मैंने अपने दिल पर पत्थर रखकर उसे आश्रम भेज दिया। उसके जाने के बाद बिलकुल अकेलापन लगता है। अब सारे दिन अपने आपको यह समझाती रहती हूं कि जेल से बाहर जाकर उसे पढ़ना-लिखना है, बड़ा आदमी बनना है। इसलिए अपनी मजदूरी से पैसे जमा कर उसे देती हूं। सोचती हूं कि मेरे यहां से छूटने में कुछ साल बाकी हैं। रिहा होने के बाद आकाश के साथ रहूंगी। मेहनत-मजदूरी करके उसे खूब पढ़ाऊंगी। पर यह सपने एक ही पल में टूट जाते हैं जब हकीकत का खयाल आता है कि एक खूनी मां बेटा होने के कारण समाज वाले उसे परेशान करेंगे। इस डर के कारण मन करता है कि मैं आकाश से हमेशा दूर रहूं। ताकि वो समाज में सुख से तो रह सके।

इसका हक कैसे छीनती...

नाम- सुलेखा, उम्र- 30 वर्ष, अपराध- वेश्यावृत्ति, सजा- 7 साल मेरी बेटी बिट्टू का जन्म जेल में ही हुआ था। कोई मां कल्पना नहीं कर सकती कि उसकी संतान की आंखें जेल की चार दीवारी में ही खुलें। जब मुझे सजा हुई तभी पता लगा कि मैं मां बनने वाली हूं। सबने कहा कि मैं इसे जन्मा ना दूं। ताकि इसकी जिंदगी तो बर्बाद ना हो। पर मां का यह दिल कैसे मानता। मैं कैसे इसके जन्म लेने के हक को छीन सकती थी। आज बिट्टू तीन साल की हो गई है। इसके साथ कैसे समय गुजरता है, पता ही नहीं चलता। पर हर वक्त इसके आने वाले कल को लेकर चिंता रहती है। लड़की है, कैसे अकेले रहेगी। यह भी तो दुल्हन बन किसी के घर जाएगी। पर कौन इसे ब्याहना चाहेगा। जब पता चलेगा कि इसकी मां तो जेल में है। इसकी खुशियों के लिए मन करता है कि मेरा साया भी इस पर न आने दूं। बड़ी होने पर जब इसे मेरी सच्चाई के बारे में पता लगेगा, तो बहुत दुख होगा। इसलिए अभी से बिट्टू को मुझसे दूर भेज देती हूं। ताकि धीरे-धीरे यह मुझे भूल सके।
इसको हर खुशी मिले

नाम- रेखा, उम्र- 32 वर्ष, अपराध- हत्या, सजा- आजीवन कारावासमेरे जीने का मकसद मेरा बेटा राजू है। पांच साल का हो गया है यह। एक साल बाद यह अपनी नानी के पास रहने जाएगा। मुझे पता है, मां इसे अच्छी तरह रखेगी। पर मेरी कमी को तो कोई पूरा नहीं कर सकता। अभी यह मेरे बिना नहीं रहता, तो वहां कैसे रहेगा। कई बार तो खाना खिलाते हुए रोना आ जाता है कि अभी तो मैं खिला रही हूं। बाद में कौन खिलाएगा? मुझे रोता देख यह मेरे आंसू पोछने लगता है और कहता है, 'मम्मी तुम तो खाती ही नहीं और मुझे खिलाती रहती हो।' लेकिन इसे कैसे बताऊं कि इसे खिलाए बिना मेरे गले से एक निवाला तक नहीं उतरता। अभी तो मैंने इसे बताया तक नहीं कि इसे मुझे छोड़कर जाना पड़ेगा। सोचती हूं बताऊं, पर अगले ही पल यह सोचकर रुक जाती हूं कि न जाने इस पर क्या गुजरेगी। अभी थोड़े दिन पहले राजू बीमार हो गया था। मेरी तो भूख-प्यास सब बंद हो गई थी, बड़ी मन्नतें करने के बाद ठीक हुआ।

(महिला कैदियों के नाम बदल दिए गए हैं।)
सधन्यवाद- विजया का लेख जो मदर्स डे 2009 के मौके पर परिवार में छपा।

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