31 December 2008

सुना मैंने नया साल आया


खिड़कियों के पुराने परदे बदल दो।
पुराना मेजपोश अब दिल को नहीं भाता।
गर्द जमी रहती है कुर्सियों पर
मुझसे मिलने अब कोई नहीं आता।
अंगीठी की आंच धीमी पड़ गई है
रोटियों का स्वाद कसैला सा है।
दीवारों पर स्याही के छीटें हैं
मेरा प्यारा पीकदान मैला सा है।
बचपन के प्यारे एलबम में सारी फोटूएं
न जाने क्यों आपस में चिपककर धुंधली हो गई हैं।
वो चिडिया का घोसला अब खाली है
बचा है, तो बस घास-फूंस का ढेर।
पुराने अखबारों के पुलिंदों के बीच में
दबा सा मैं सोचता हूं- ये सब क्या है?
मेरे मोजे, रूमाल, तौलिया सब रूठे हुए
बोलते हैं तू घिस गया है हमें इस्तेमाल करते-करते।
बल्ब जो सालों से टिमटिमा रहा है बंद-बदबूदार कमरे में
अब आजाद होना चाहता है।
किवाड़ सारे चरमराते रहते हैं
वक्त की सुइयां टूटी हुई हैं।
क्या यही वाजिब समय है
जब मैं बदल दूं अपना कलैंडर।
ले आऊं चंद खुशियां।
क्या वो 2009 में लटक रहा नो
मेरी जिंदगी में उम्मीदों को यस कह पाएगा।
हां थोड़ी आशा तो है कि मैं सपनों को सपनों से ज्यादा कुछ तो मानूंगा।
मैं भरोसा करूंगा कि मैं मौजूद तो हूं इस दुनिया में चाहे
उसी नाम से जिससे बचपन से मेरे मां-बाप मुझे बुलाते हैं
और अब दोस्त पुकार लेते हैं गाहे-बगाहे।
हां, मैं झिलमिलाती रोशनी हूं 2009 की।
मैं बदल तो सकता हूं खुद को
पर शर्त है कि तुम मेरे रूप से नाराज नहीं होओगे, चिढ़ाओगे नहीं मुझे।
नहीं तो मैं अपने खोल में वापस घुस जाऊंगा
और अगले साल तक वापस नहीं निकल पाऊंगा।
मुझे भरोसा है कि इस बार आप मेरी मदद करोगे
मेरी सारे कूड़े-करकट को बाहर का रास्ता दिखलाने में।
- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

29 December 2008

ख्वाब हो या हो कोई हकीकत


पार्वती ओमानकुट्टन मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में बनीं फर्स्ट रनरअप।

सुंदरता को कोई रंगों के माध्यम से चित्र में संजोने की कोशिश करता है, तो कोई छंदों के जरिए गीत में कहने की कोशिश करता है पर केरल की 21 वर्षीय सुंदरी पार्वती ओमानकुट्टन के रूप को रंगों या छंदों के माध्यम से बांधने की हर कोशिश जाया जाती है। आखिर वे हैं ही इतनी सुंदर। पूरे 8 साल बाद कोई भारतीय सुंदरी मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता के फाइनल राउंड में पहुंची। पार्वती हाल ही हुई मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में मिस वर्ल्ड बनते-बनते रह गईं और फर्स्ट रनरअप बनीं। मिस वर्ल्ड में भारतीय सुंदरियों की फेहरिस्त पर नजर डालें, तो कोई लंबी सूची नहीं बनती। सबसे पहले 1966 में रीता फारिया ने मिस वर्ल्ड के सिलसिले को शुरू किया, वह ऐश्वर्या राय (1994), डायना हेडेन (1997), युक्ता मुखी (1999) से होता हुआ प्रियंका चोपड़ा (2000) पर आकर रुक गया। इस साल पूरे देश को पार्वती से उम्मीदें थीं, उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत भी की और इसी की बदौलत वे प्रतियोगिता में फर्स्ट रनर अप बनीं और सफलता से सिर्फ एक पायदान दूर रह गईं।

हौले-हौले सफर

पार्वती केरल के कोट्टयम में चंगानाचेरी में 13 जुलाई 1987 को पैदा हुई। जब वे छह महीने की थीं, तभी पूरा परिवार मुंबई में आकर बस गया। उन्होंने अपनी पढ़ाई मुंबई में ही की। मुंबई के मीठीबाई कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई करने वाली पार्वती की मम्मी हाउस वाइफ हैं और पिता एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। उनका छोटा भाई अभी क्लास 11 में पढ़ता है। बकौल पार्वती, 'मैं हमेशा से ही मिस इंडिया बनने का सपना देखा करती थी। फिर मैं फैशन शोज में भाग लेने लगी। फिर मिस मलयालम बनकर ही दम लिया। जब मैंने ऐश्वर्या राय को टीवी पर मिस वर्ल्ड बनते देखा, तो पापा से कहा कि मैं भी मिस वर्ल्ड बनकर दिखाऊंगी। वे बडे़ खुश हुए और मेरी मदद के लिए तैयार हो गए। '

तैयार पूरी है

पांच फुट नौ इंच लंबी पार्वती ने मिस इंडिया कंपीटीशन में जहां 28 भारतीय लड़कियों को हराकर ताज हासिल किया वहीं दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग शहर में आयोजित 58वीं मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में उनका मुकाबला 108 लड़कियों के साथ था। मुकाबले के लिए पार्वती ने अपने ट्रेनर्स के साथ काफी पसीना बहाया। पर्सनेलिटी डवलपमेंट गुरुओं से लेकर ड्रैस डिजाइनर्स तक की हर बात पर अमल किया। अप्रेल में मिस इंडिया प्रतियोगिता जीतने के बाद से ही वे इसके लिए जुट गईं। मम्मी-पापा से सीखापार्वती के मुताबिक, 'प्रतियोगिता में रंग-रूप से साथ-साथ दिमाग पर भी काफी ध्यान देना पड़ता है। हाजिरजवाबी तो मुझमें पहले से ही थी, इसी की बदौलत मैं फाइनल तक पहुंच सकी। मम्मी से जहां मैंने सादगी सीखी, तो पापा से बड़प्पन।' पार्वती को संगीत सुनने, नाचने, पेंटिंग और किताबें पढ़ने का बहुत शौक है। भारतीय क्लासिकल डांस में उन्हें महारत हासिल है। साथ ही उन्हें तैराकी, बास्केटबॉल और बैडमिंटन खेलना बहुत भाता है। दूसरी सुंदरियों की तरह वे भी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाना चाहती हैं। बकौल पार्वती, 'मैं सलमान खान और रितिक रोशन की बहुत बड़ी फैन हूं। उनके साथ फिल्में करने की मेरी दिली इच्छा है। पर इससे पहले मैं अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं।' मिस इंडिया बनने के बाद के दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, 'जब मैं मिस इंडिया बन गई, तो मेरे प्रति लोगों का नजरिया ही बदल गया। लोग मेरे ऑटोग्राफ के लिए पीछे पड़ने लगे।'

सपने सोने नहीं देते

पार्वती को सबसे ज्यादा सब्यसाची के ड्रैस किए हुए डिजाइन पसंद आते हैं। अपने माता-पिता को अपनी ताकत मानने वाली पार्वती आत्मविश्वास और भगवान में आस्था को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानती हैं। जब उनसे उनकी कमजोरी के बारे में पूछा जाता है, तो वे बेबाकी से कहती हैं,'मुझे गलत चीज पर गुस्सा बहुत जल्दी आता है।' अपने सपनों के राजकुमार के बारे में उनका मानना है कि वह शख्स मेरी भावनाओं को समझने वाला होना चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का एक वाक्य, 'सपने वो नहीं होते, जो सोते समय आते हैं, सपने तो वो होते हैं, जो आपको सोने ही नहीं देते।' उन्हें बहुत अच्छा लगता है। मां के हाथ के बने खाने को वे अपने व्यस्त शिड्यूल में बहुत मिस करती हैं। खूबसूरती के बारे में उनका कहना है, 'मैं बाहर की बजाय मन की सुंदरता को ज्यादा तरजीह देती हूं। सुंदरता के लिए मैं मेकअप की बजाय हैल्थ पर ध्यान देती हूं।'

- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

26 December 2008

नई उमंगों का सवेरा



नए साल पर जीवन में कुछ खास बातों को साकार करना अच्छा रहेगा, तो क्यों न मशहूर साहित्यकारों के लेखन पर एक नजर डाली जाए-




उल्लास


स्वागत! जीवन के नवल वर्ष


आओ, नूतन-निर्माण लिए


इस महा जागरण के युग में


जाग्रत जीवन अभिमान लिए


दीनों दुखियों का त्राण लिए


मानवता का कल्याण लिए।


सोहनलाल द्विवेदी (नववर्ष)


स्वप्न


जा तेरे स्वप्न बड़े हों।


भावना की गोद से उतर कर


जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।


चांद तारों सी अप्राप्य ऊंचाइयों के लिए


रूठना मचलना सीखें।


दुष्यंत कुमार (एक आशीर्वाद)


विश्वास


मैं बढ़ा ही जा रहा हूं,


पर तुम्हें भूला नहीं हूं ।


चल रहा हूं, क्योंकि चलने से थकावट दूर होती,


जल रहा हूं, क्योंकि जलने से तमिस्त्रा चूर होती,


गल रहा हूं, क्योंकि हल्का बोझ हो जाता हृदय का,


ढल रहा हूं, क्योंकि ढलकर साथ पा जाता समय का ।


शिवमंगल सिंह सुमन (मैं बढ़ा ही जा रहा हूं)


संघर्ष


तप रे मधुर-मधुर मन !


विश्व वेदना में तप प्रतिपल,


जग-जीवन की ज्वाला में गल,


बन अकलुष, उज्ज्वल औ' कोमल


तप रे विधुर-विधुर मन !


सुमित्रानंदन पंत (गुंजन(कविता संग्रह))


निश्चय


प्रातः होगा, होगा निश्चय,


अंधेरे को छंटना ही है,


तुम्हारी स्वर्णिम वाणी को,


दूर नभ से फटना ही है!


रवींद्रनाथ टैगोर (गीतांजलि)


शुभकामना


नए साल की शुभकामनाएं !


खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पांव को


कुहरे में लिपटे उस छोटे से गांव को


नए साल की शुभकामनाएं...


इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को


चौके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को


नए साल की शुभकामनाएं !


सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (नए साल की शुभकामनाएं ! )


हौसला


वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है


थक कर बैठ गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं है


चिंगारी बन गई लहू की बूंद गिरी जो पग से


चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से


बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है


थक कर बैठ गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं है


रामधारी सिंह दिनकर (आशा का दीपक)

आशा


शैशव के सुंदर प्रभात का


मैंने नव विकास देखा...


जग-झंझा-झकोर में


आशा-लतिका का विलास देखा।


आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का


क्रम-क्रम से प्रकाश देखा॥


सुभद्राकुमारी चौहान (उल्लास)


प्रस्तुति- आशीष जैन







...आगे पढ़ें!

15 December 2008

मैं रफ्तार हूं



मिलते हैं देश की अकेली महिला सुपर बाइक रेसर अलीशा अब्दुल्लाह से।



दौ सौ किलो वजनी 600 सीसी की होंडा सीबीआर बाइक। उसे बच्चों के किसी खिलौने की तरह दौड़ाने के लिए तैयार है वह। पलक झपकते ही 210 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार छूना उसका शगल है। उसका कहना है,'मैं रफ्तार हूं। सबसे तेज। बिजली-सी कौंधने वाली रफ्तार। मेरी जिंदगी बाइक के लिए है और मैं मरूंगी भी बाइकिंग के लिए। बाइकिंग मेरव् खून में है।' यह है चेन्नई की 19 वर्षीय अलीशा अब्दुल्लाह। बाइकिंग के लिए दीवानगी की झलक उसके ईमेल आईडी 'लिवफॉरस्पीड' से मिलती है।


मजा है लड़कों को हराने में


देश की सबसे कम उम्र की महिला सुपर बाइक रव्सर अलीशा अब्दुल्लाह ने आठ साल की उम्र से ही बाइक चलाना शुरू कर दिया था। वह बताती है, 'पुरुषों के साथ मुकाबला वाकई रोमांचक रहता है क्योंकि 110 सीसी और 600 सीसी बाइकिंग में कोई भी महिला प्रतिभागी नहीं होती। मुझे लड़कों को हराने में बहुत मजा आता है। मुझे तब ज्यादा खुशी मिलती है, जब लड़के गर्दन झुकाए खड़े रहते हैं। उनमें से कुछ तो रोने तक लगते हैं, पर जीत मुझे मिलती है। जब लोग मुझसे पूछते हैं कि तुम्हारा सबसे बड़ा सपना क्या है, तो मेरा जवाब रहता है, 'मुझे दुनिया का सबसे तेज बाइकर बनना है।'


शौक मरने नहीं दूंगा


उसके पिता आर. ए. अब्दुल्ला भी जाने-माने बाइकर रह चुके हैं और सात बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीत चुके हैं। वे ही अलीशा को बाइकिंग की टे्रनिंग देते हैं। बकौल अलीशा, 'जब कभी रव्सिंग करते हुए मैं घायल हो जाती हूं तो पापा कहते हैं कि तुम एक रव्सर हो, तुम हार नहीं सकती। इससे मुझे गजब का हौसला मिलता है।' उसके पिता बताते हैं, 'मुझे बचपन में ही उसकी क्षमताओं का पता लग गया था। मैं उसे खूब सिखलाता और प्रोत्साहित करता, पर उसके लायक कार और बाइक्स का इतंजाम नहीं कर पाता था। फिर भी मैंने बेटी के शौक को मरने नहीं दिया और कार रव्सिंग की बजाय बाइकिंग में किस्मत आजमाने की सलाह दी और तब अलीशा हर रविवार रव्सटै्रक पर नजर आने लगी। आज उसकी बाइकिंग वाकई शानदार हो गई है। रेसिंग के दौरान हमेशा उसका नजरिया करो या मरो का रहता है। हार उसे कतई मंजूर नहीं है। पर जब कभी उसकी रेस में थोड़ी चूक रह जाती है, तो मैं उसे धीरज का सबक देता हूं। मैं हमेशा उससे कहता हूं कि अगर तुम गति पर नियंत्रण रखना सीख लोगी, तो रेस में आधी जंग खुद-ब-खुद जीत जाओगी।'


बस जोश चाहिए


बाइक को अपनी जिंदगी बताते हुए अलीशा कहती है, 'बाइक, हैलमेट और जंपसूट मिलने पर लगता है कि मैं पूरी हो गई हूं। इनके बिना लगता है कि मैं अधूरी-सी हूं।' जब उससे पूछा जाता है कि सुपर बाइकिंग जैसा खतरनाक काम तो खास तौर पर लड़के ही कर सकते हैं, तो वे तपाक से कहती हैं, 'क्या सारे जोखिम वाले काम करने का ठेका लड़कों ने ही ले रखा है? जिसमें जोश है, वह सब कुछ कर सकता है। मैं कभी लड़कियों के साथ रेस नहीं लगाती बल्कि सबसे तेज बाइक चलाने वाले लड़कों को हराने के बारे में सोचती हूं। मैं ऑटोक्रॉस रेसेज, गो कार्टिंग और फामूर्ला रेसेज तक में प्रतिस्पर्धा कर चुकी हूं।' पढ़ाई में भी अलीशा कभी कमजोर नहीं रही। अभी वह समाजशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई कर रही है। आगे उसकी एमबीए करने की इच्छा है।


दुआओं का असर


अलीशा को टेनिस खेलने का भी बहुत शौक है। उसके पिता मुस्लिम हैं और मां ईसाई। वह कहती है कि पिताजी से अच्छी बाइक चलाते आज तक मैंने किसी को नहीं देखा। मुझे अभी काफी कुछ सीखना है तभी मैं रव्सिंग की बेताज बादशाह बन पाऊंगी। उसने 2003 में एमआरएफ नेशनल गोकार्टिंग चैंपियनशिप जीती। उसके बाद वह फार्मूला वन कार रव्सिंग की तरफ मुड़ गई और 2004 में जेके टायर नेशनल चैंपियनशिप में पांचवा स्थान हासिल किया। उसका कहना है , 'अब मेरा मकसद जेके टायर नेशनल रोड रेसिंग चैंपियनशिप जीतना है। फिर मैं अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में हिस्सा लूंगी।' अभी हाल ही उसे यंग अचीवर्स अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है। बाइकिंग के उसके जुनून के चलते एक नामी कंपनी ने उसे अपने उत्पाद का ब्रांड एंबेसेडर भी बनाया है।


- प्रस्तुतिः आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

11 December 2008

कहां गया मेरी बगिया का फूल?


मुंबई में हुए आतंकी हमलों ने पूरे देश की रूह को छलनी किया है। आज देश जवाब मांगता है दुश्मनों से। आखिर क्या हासिल हुआ, हमारी बगिया के फूलों को उजाड़कर।


क्या लहू का कोई मजहब हो सकता है? क्या अश्कों में तड़पती आह से राम या रहीम को अलग-अलग दर्द होता है? अगर नहीं, तो फिर क्यों गुलशन को उजाड़ने पर आमादा है आतंक। सपनों की पोटली लिए मुंबई में घूमते सैकड़ों बेगुनाह ही नहीं, पूरी दुनिया की रूह को कंपाने की कोशिश है हाल में मुंबई में हुआ आतंकी हमला। रोज की भागदौड़, हजारों परेशानियां और अब उसमें शामिल है एक डर। आतंक का डर। कब किस ठौर विस्फोट हो और जिंदगी की रोशनी बेनूर होकर हजारों परिवारों के घरों को हमेशा के लिए अंतहीन अंधेरा दे जाए। पर कभी न थमने की हम देशवासियों की शपथ हमेशा रंग लाती है और हम फिर खुशी की बहार को अपने आंगन में बिखरने के लिए बुला लेते हैं।

बाबुल का ये घर बहना...

22 साल की जसमीन की आंखों में भी गजब की चमक थी, तो बातों में कुछ कर गुजरने की तमन्ना। घरवालों के सपनों को परवाज देने के लिए मोहाली से मुंबई के सफर के लिए रवाना हुई पर वापस फिर कभी अपने घर ना लौट सकी। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह मुंबई में उस काली रात ओबरॉय के रिसेप्शन पर बैठी हुई थी। होटल मैनेजमेंट में ग्रेजुएट जसमीन दो महीने पहले ही मास्टर डिग्री के कोर्स के लिए सपनों की नगरी मुंबई आई थी। पापा डीआईजी भुर्जी अपनी लाडली को तन्नू कहकर पुकारते थे। जब उन्होंने टीवी पर मुंबई पर आतंकी हमले की खबर देखी, तो बेटी को फोन मिलाया। पर फोन उठाने वाले हाथ हमेशा के लिए निस्तेज हो चुके थे। तन्नू की मां दीप कौर और भाई परमीत की जुबान खामोश और आंखों में छलकते दर्द के सिवा कुछ नहीं बचा। परमीत को वो ख्वाब तो अधूरा ही रह गया, जिसमें दिन-रात वो अपनी फूल सी नाजुक बहन की डोली को सजाने की सोचा करता था। मम्मी-पापा ने जिस लाडो का हर नाज इस उम्मीद से उठाया कि एक दिन उसे घर से विदा करना है, वो तो दुनिया से ही रूखसत ले चुकी थी।

सोचा था मुस्कान देंगे

उनकी बातों में गजब का जोश था। अपने काम में माहिर। दिल में बस एक ख्वाहिश कैसे इस देश में अमन कायम रहे। वे शायद अकेले ऐसे पुलिस अफसर जिनके चाहने वालों ने उनके नाम से सोलापुर में करकरव् फैन क्लब तक बना रखा है। महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, जिन्हें अपने काम और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। अब वे इस दुनिया के लिए मिसाल बन चुके हैं। कामा अस्पताल में जाते वक्त उन पर पीछे से गोलीबारी हुई और वे मोबाइल पर अपनी बात पूरी न सके। पीछे छोड़ गए पत्नी कविता, दो बेटियां और एक बेटा। अभी कुछ दिनों पहले ही तो उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के हाथ पील किए थे। लंदन में पढ़ने वाली दूसरी बेटी और मुंबई में पढ़ रहे बेटे को देश के हवाले कर अपने अनजाने सफर पर निकल गए। पूरा देश हेमंत के बलिदान को नहीं भूल पाएगा पर उन बच्चों को क्या दोष है, जो अपने पापा को जहान भर की खुशियां देना चाहते थे। सोचा था कि आने वाले समय में जब उनके पिता बुढ़ापे की दहलीज पर होंगे, तो उन्हें मुस्कान देते रहेंगे। ताउम्र देश की सेवा करने वाले करकरे की आंखों में भी सपना था कि काश वो दिन जल्द से जल्द आए जब इस देश में कोई आंख नम ना हो। हर तरफ बस खुशियों का डेरा हो। करकरे की शहादत को सच्चा सलाम तभी होगा, जब उनका सपना पूरा करने के लिए हम सब एक हो जाएं और दुश्मनों को दिखा दें कि जब देश का एक बेटा शहीद होता है, तो अपनी फर्ज निभाने हजारों सपूत और पैदा हो जाते हैं।

कहीं छुप गया है वो

मेरा इकलौता बेटा था जहीन। उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था हैवानों। मेरी उम्मीदों को कफन उठाकर तुम्हें आखिर क्या हासिल हुआ। ये तो बता देते। मां सलमा के दामन में अब आंसुओं के सैलाब के सिवा बचा भी क्या है? भीलवाड़ा से चलकर घर का चिराग मुंबई पहुंचा और हमेशा के लिए बुझ गया। ताज होटल में एक्जीक्यूटिव कुक जहीन अब इस दुनिया में नहीं है। पर दादा मोईनुद्दीन को अब भी लगता है कि घर के किसी कोने में छुपा हुआ नटखट जहीन उन्हें आवाज देगा, 'बाबा, आप मुझे नहीं पकड़ पाओगे। मैं छुप गया हूं। आपको नजर नहीं आऊंगा।' दादी कर रही है, 'मेरा पोता कहीं नहीं गया। वो तो सबसे नाराज है। इसलिए कहीं छुप गया है।' वाकई जहीन कहीं छुप गया। दादा-दादी की आंखें अब उसे कैसे ढूंढ़ेंगी। क्या गुजर रही होगी सलमा पर जब शादी के सेहरे की जगह आज अपने जिगर के टुकड़े के जनाजे को टकटकी लगाए देख रही होगी? किसी की दुनिया को उजाड़ कर आखिर मौत के सौदागरों को क्या मिला? क्या कोई बता पाएगा तन्नू, हेमंत या जहीन के घरवालों को।

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

रिंग की रानी को सलाम


विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में लगातार चौथी बार स्वर्ण पदक जीतकर मैरी कोम ने किया देश का सिर गर्व से ऊंचा।


रिंग में एक के बाद एक बरसते फौलादी पंच। बॉक्सिंग ग्लव्स और दो खिलाडिय़ों के हौसलों की भिडंत। बचाव के लिए हैं सिर्फ दो हाथ। अगर जरा सी चूक हुई, तो नाक या मुंह पर जबरदस्त चोट। यह रोमांच है बॉक्सिंग खेल का। इसी के सहारव् खुद का नाम मणिपुर की वादियों से पूरी दुनिया में फैलाने वाली महिला बॉक्सर हैं- एम.सी. मैरी कोम। उनके नाम में एम.सी. का मतलब है- मांगते चुन्गनेईजंग। हाल ही चीन में संपन्न हुई विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में 46 कि.ग्रा. वर्ग में लगातार चौथी बार गोल्ड मैडल जीतकर उन्होंने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

पेट भरने के लिए खेल

मणिपुर के ग्रामीण इलाके के मोइरंग लमखाई के कांगाथेई गांव में 1 मार्च 1983 को मांगते टोन्गपा कोम और मांगते सानेईखोम कोम के घर मैरी कोम का जन्म हुआ। 5 फुट 2 इंच लंबी मैरी अपनी गजब की फुर्ती से सामने वाले बॉक्सर को इस कदर परेशान कर देती है कि उसे आखिरकार घुटने टेकने ही पड़ते हैं। मैरी कहती हैं, '2000 में ही देश में आधिकारिक रूप से महिला मुक्केबाजी की शुरुआत हुई। तब लोग महिलाओं को इसके काबिल नहीं समझते थे। मैं एक किसान की बेटी हूं। अपने परिवार का पेट भरने के लिए इस खेल में आई। मैं चाहती थी कि अपने परिवारवालों को एक घर दिला सकूं और मैं तो बारहवीं तक ही पढ़ सकी पर अपने तीन बहनों और एक भाई की पढ़ाई अच्छी से अच्छी हो सके।' स्कूल के दिनों में मैरी को सारे खेल ही लुभाते थे। फुटबॉल और एथलेटिक्स उसे बहुत पसंद थे। उन दिनों उसने मोहम्मद अली के बारे में सुन रखा था और उनकी बॉक्सर बेटी लैला अली को एक बार उन्होंने टीवी पर देखा, तो बॉक्सिंग के बारे में सोचने लगी। उन्हीं दिनों 1998 में मणिपुर के डिंकू सिंह बैंकाक एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे, तो मैरी ने ठान लिया कि अब तो वे भी मुक्केबाजी में मैडल हासिल करके रहेंगी। एक दिन वह बिना किसी से कहे स्थानीय इंडिया सेंटर खेल अथोरिटी में बॉक्सिंग कोच से मिलने पहुंच गईं और मुक्केबाजी की अपनी इच्छा के बारे में उन्हें बताया। इस तरह सन 2000 में उन्होंने मुक्केबाजी शुरू की। इससे पहले वे जैवेलियन थ्रो जैसे खेलों में भी हिस्सा ले चुकी थीं। खेल में जल्द ही महारत हासिल करके वे जिला और राज्य स्तरीय बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगी। शुरू में माता-पिता को मैरी की बॉक्सिंग के बारे में पता नहीं था। एक बार राज्य चैंपियनशिप जीतने के बाद उनका फोटो अखबारों में छपा, तो घरवालों को जानकारी हुई। पिताजी नाराज भी हुए पर मैरी ने कह दिया कि बॉक्सिंग के बिना उनकी जिंदगी अधूरी है। जब मैरी को पूरे देश में प्रतियोगिताओं के सिलसिले में जाना पड़ता, तो उन्हें भाषा और भोजन की भी दिक्कतें आतीं। पर उन्होंने एक ही चीज ठान रखी थी कि हर कीमत में बॉक्सिंग में महारत हासिल करनी ही है। बैंकाक में पहली एशियाई महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप के सलैक्शन कैंप में भाग लेने जाते वक्त उनका सारा सामान और पासपोर्ट तक चोरी हो गया था। माता-पिता ने कहा, 'घर वापस लौट आओ।' पर मैरी ने हार नहीं मानी। वहां से खाली हाथ लौटने पर वे फिर अपने खेल में निखार लाने में जुट गईं। मैरी को सबसे ज्यादा दुख इस बात का होता है कि महिला बॉक्सिंग ओलंपिक खेलों में शामिल नहीं है। जीत का सिलसिला 2001 में अमरीका में पहली विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा। अगले साल तुर्की में हुई महिला बॉक्सिंग में तो उन्होंने गोल्ड मैडल लेकर ही दम लिया। फिर तो लगातार स्वर्ण पदक जीतने का सिलसिला चल ही पड़ा और अब नवंबर में चीन में लगातार चौथा स्वर्ण पदक हासिल कर पूरे देश को खुशी का मौका दिया। नई दिल्ली में हुई विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप जीतने के बाद उन्होंने अपने जुड़वां बच्चों की देखरेख के लिए दो साल के लिए खेल से अपना ध्यान हटा लिया। पर सिर्फ चार महीने के प्रशिक्षण के बाद वापसी इतना शानदार होगी यह किसी को भरोसा नहीं था।

मैरी बताती हैं, 'इस वापसी में मेरे पति के. ओनखोलेर कोम का बहुत बड़ा हाथ रहा। मेरे खेल को चमकाने में मेरे कोच इबोमचा, नरजीत, किशेन और खोइबी सलाम का भी सहयोग रहा।' मैरी कोम को उनके बेहतरीन खेल के लिए साल 2003 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार पाने वाली वह पहली महिला मुक्केबाज बनीं। इसके बाद 2006 में उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार दिया गया। पिछले साल उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के नामांकित भी किया गया था। मणिपुर सरकार ने मैरी कोम के बेहतरीन खेल प्रदर्शन को देखते हुए खेल गांव की एक सड़क का नाम मैरी कोम रोड रखा। यह वाकई उनके लिए बड़ी उपलब्धि है।

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

छोटी जेब, बड़ा खर्च



'द ग्रेट मिडिल क्लास' अब और बड़ी 'ग्रेटनैस' की तरफ अग्रसर है। एसोचैम के सर्वे के मुताबिक देश के शहरी मध्यम वर्ग के बच्चों के जेबखर्च में भारी बढ़ोतरी हुई है। चारों तरफ छाई आर्थिक मंदी के इस दौर में बच्चों की बढ़ती जेबखर्ची कितनी बढ़ी है, सुनकर चौंक जाएंगे आप। 486 करोड़ रुपए। कार्टून नेटवर्क की ओर से देश के 14 शहरों में सात से चौदह साल की उम्र के 6000 बच्चों पर करवाए गए एक सर्वे के मुताबिक देश में हर साल करीब 486 करोड़ रुपए पॉकेटमनी के नाम पर खर्च कर दिए जाते हैं। एसोचैम के सर्वे के मुताबिक पिछले दस सालों में बच्चों की पॉकेटमनी में छह गुना इजाफा हुआ है।


एक माह का औसतन खर्चा

मोबाइल- 350 रुपए

मिठाई, चॉकलेट, क्रिस्प और कोल्ड ड्रिंक- 200 रूपए

मूवीज- 150 रुपए

घूमने पर - 250 रुपए

गिफ्ट्स- 250 रूपए

मैग्जीन- 50 रुपए

डीवीडी या वीडियो- 100 रुपए

कंप्यूटर गेम्स- 100 रुपए


याद कीजिए प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' के नन्हे पात्र हामिद मियां को। कैसे वह दोस्तों के साथ ईद के मेले में जाकर अपनी बचत के तीन पैसों से मिठाई और खिलौने नहीं खरीदता बल्कि बूढ़ी दादी अमीना के लिए चिमटा लेकर जाता है। उसे अपनी दादी की जरूरतों का खयाल रहता है। वहीं आज के बच्चे बचत की बजाय खुद की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं।
पैसा आया फिर खर्च किया

उदारीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से लोगों की आय में गजब का इजाफा हुआ है। पैसा बढ़ेगा, तो तय है कि उसे बेतरतीब ढंग से खर्च भी किया जाएगा। शुरू में लगा कि मध्यमवर्गीय परिवार ही पैसे से मालामाल हुए हैं। पर अब एसोचैम का सर्वे बताता है कि इसका असर बच्चों पर भी पड़ा है। महानगरीय बच्चों को अब पहले की तुलना में छह गुना ज्यादा पॉकेट मनी मिल रही है। एक दशक पहले जहां शहरी बच्चों को औसतन 300 रूपए प्रति माह पॉकेट मनी मिलती थी, वहीं अब मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को औसतन 1800 रूपए प्रति माह पॉकेट मनी के रूप में मिलने लगे हैं। महानगरों के 2500 बच्चों पर किए एसोचैम के सर्वे में यह बात सामने आई है कि सबसे ज्यादा पैसा दिल्ली के बच्चों को मिलता है। इसके बाद बंगलौर, चेन्नई, मुंबई और कोलकाता के बच्चों को। सर्वे के अनुसार देश में लगभग 65 फीसदी बच्चों को पॉकेट मनी दी जाती है। साथ ही यह भी कि लड़कों से ज्यादा पैसे लड़कियों को मिल रहे हैं। लड़के जहां वीडियो गेम्स और गिफ्ट पर ज्यादा पैसे खर्च करते हैं, वहीं लड़कियां अपनी पॉकेट मनी का 58 फीसदी हिस्सा कपड़ों पर खर्च कर रही हैं। कार्टून नेटवर्क की ओर से करवाए गए एक सर्वे से भी इस बात की पुष्टि होती है कि देश के 98 फीसदी बच्चे टीवी के आदी हो चुके हैं और टीवी पर देखे गए उत्पादों को मनमाने ढंग से खरीदने लगे हैं। ऐसे में बच्चों के कदम बहकना स्वाभाविक है।

बचत एक सपना

नई पीढ़ी के पास पैसों को खर्च करने के लिए विज्ञापनों का सहारा है। आज के दौर के विज्ञापनों का खास फोकस भी बच्चे ही होते हैं। विज्ञापन की लुभावनी भाषा के पीछे छुपी सच्चाई को बच्चे समझ नहीं पाते हैं और उस उत्पाद पर पैसे खर्च करने से खुद को रोक नहीं पाते। सर्वे में बच्चों ने यह बात भी स्वीकारी है कि हमें पैसे खर्च करने के लिए मिलते हैं, बचाने के लिए नहीं। अब बच्चों के लिए बचत कोई मायने नहीं रखती है। कक्षा 10 में पढऩे वाले शुभम का मानना है कि पढ़ाई के सारे खर्च तो मम्मी-पापा उठा ही लेते हैं। फिर जब पैरंट्स पैसे दे रहे हैं, तो इसे कहीं न कहीं खर्च भी तो करेंगे ही ना। इसमें गलत क्या है? पैसे को तुरंत खर्च करने के पीछे साथियों की देखादेखी और दिखावा अहम वजह है। अपने ग्रुप के बच्चों में वे खुद को बेहतर साबित करने के लिए तरह-तरह की चीजें खरीद लाते हैं। मम्मी-पापा के सामने उनका एक ही जवाब रहता है कि इसे मैंने अपनी पॉकेट मनी से खरीदा है। तब पैरेंट्स भी बच्चों की इन बातों को नजरअंदाज कर देते हैं। सिर्फ पैसे देकर माता-पिता अपनी जिम्मेदारियों को इतिश्री समझ रहे हैं। उनके पास पैसा तो है, पर बच्चों के लिए समय नहीं है। महंगे शौक हैंएक मल्टीनेशनल कंपनी में एग्जीक्यूटिव ऑफिसर महेंद्र सिंह के मुताबिक हम बच्चों को समझा सकते हैं कि पैसे किस चीज पर खर्च करने चाहिए। पर हर समय उनके साथ तो हम भी नहीं रह सकते हैं ना। इस माहौल में मोबाइल फोन के जादू से बच्चे भी नहीं बच पाए हैं। वे महंगे मोबाइल फोन पर अपनी पॉकेट मनी खर्च कर रहे हैं। अधिकतर स्कूलों में मोबाइल फोन लाने पर प्रतिबंध है फिर भी बच्चे चोरी छुपे अपने साथ मोबाइल फोन लाते हैं और अपने अपने दोस्तों के बीच रौब गांठते हैं। वहीं आज ज्यादातर बच्चे इंटरनेट और चैटिंग पर भी काफी खर्च कर रहे हैं। कक्षा 9 में पढ़ने वाले अंकुर जायसवाल घंटों साइबर कैफे में बैठे रहते हैं और दोस्तों से चैटिंग करते हैं। मम्मी-पापा के नौकरी पर जाने के बाद अंकुर घर पर अकेला रह जाता है और अपना समय गुजारने के लिए अक्सर चैटिंग करता है।
हमारा मानना है

कई बच्चे तो स्कूल में टिफिन ले जाने की बजाय कैंटीन से खरीदकर खाना पसंद करते हैं। उन्हें घर के पौष्टिक खाने की बजाय पिज्जा, बर्गर और पेटीज पसंद आते हैं। बच्चों की इस सोच पर स्कूल्स के नियंत्रण की बात भी सामने आती है। जयपुर के केंद्रीय विद्यालय नं. 1 की प्रिंसिपल राज अग्रवाल के मुताबिक हम इस बात पर पूरी निगाह रखते हैं कि हर बच्चा अपना टिफिन लाए और समय पर खाना खा ले। कैंटीन में भी द्गयादा महंगा सामान नहीं रखा जाता है। पर साथ ही माता-पिता को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि अगर वे बच्चों को जरूरत से ज्यादा पैसे दे रहे हैं तो इसमें हम क्या कर सकते हैं? बच्चा उसे गलत चीजों पर खर्च करेगा ही।समाजशास्त्री ज्योति सिडाना कहती हैं कि आज बाजार संस्कृति के बढ़ावे की वजह से बच्चों की इच्छाएं काफी बढ़ गई हैं। उन्हें हर चीज ब्रांडेड चाहिए। माता-पिता भी बच्चों को यही सिखा रहे हैं, 'जो है, आज है। कल का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए पैसे को कल के लिए बचाने की बजाय खर्च करना ही ज्यादा अच्छा है।' यह सोच बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाली है। इससे बच्चे मेहनत का महत्त्व भूलने लगे हैं। उन्हें बस शौक पूरा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे चाहिए।

समाजशास्त्री रश्मि जैन के मुताबिक बच्चों में निर्णय लेने की क्षमता उम्र के साथ-साथ ही बढ़ती है। उनका बालमन पैसों की अहमियत समझे बिना उन्हें खर्च करने लगता है। माता-पिता को उन्हें समझाना चाहिए कि जेबखर्च आपकी मासिक कमाई है और उसका कुछ हिस्सा हमेशा बचाकर रखना चाहिए। बच्चे किस चीज पर पैसा खर्च कर रहे हैं, यह ब्यौरा भी समय-समय पर उनसे लेते रहना चाहिए। उन्हें पैसे का सदुपयोग सिखाने से कोई समस्या नहीं आएगी।

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

27 November 2008

चांद पर तिरंगे की खुशबू




उत्तरप्रदेश के अमरोहा शहर की खुशबू मिर्जा ने इसरो में चंद्रयान प्रथम की सफलता में निभाई अहम भूमिका।

चांद पर अब तिरंगा भी लहरा रहा है। देश ने चंद्रयान के बहाने अपनी क्षमताओं का एक फिर परिचय दिया है। इस पूरे मिशन में एक ऐसी लड़की की मेहनत छुपी है जिसे बचपन से ही अंतरिक्ष की असीम गहराइयां लुभाती रही। उत्तरप्रदेश के छोटे से कस्बे अमरोहा से निकलकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) तक पहुंचने वाली 23 साल की इस लड़की का नाम है- खुशबू। अपने नाम की तरह वह अपने काम से भी सबका दिल महका देती है। खुशबू चंद्रयान प्रथम के सैटेलाइट सिस्टम को तैयार करने वाली बारह सदस्यीय इंजीनियर टीम में शामिल है। इनके चेक आउट डिवीजन दल ने यान के हर पुर्जे की थर्मल और वैक्यूम जांच की।


बस कड़ी मेहनत करनी है


25 जुलाई, 1985 को अमरोहा के मोहल्ला चाहगौरी निवासी सिकंदर मिर्जा और फरहत मिर्जा के घर एक नन्ही कली खुशबू ने जन्म लिया। सात साल की उम्र में ही उसके सिर से पिता का साया उठ गया। पिता इंजीनियर थे, इसलिए मां ने ठान लिया कि अपने सभी बच्चों को भी इंजीनियर ही बनाना है। बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिए परिवार के पेट्रोल पंप की जिम्मेदारी संभाली। आज खुशबू का बड़ा भाई खुशतर भी इंजीनियर कर चुका है और छोटी बहन महक भी यही पढ़ाई कर रही है। अपने पुराने दिनों की परेशानियों के बारे में खुशबू की मां फरहत बताती हैं, 'जब खुशबू पैदा हुई थी, तो यहां पीने के लिए पानी बहुत मुश्किल से मिलता था। मुझे कुएं से पानी लाना पड़ता था। हमारे इलाके में महिलाएं बुरका पहनती थी, पर खुशबू को जींस पहनना पसंद था। लोग तरह-तरह की बातें करके हमें परव्शान करते थे। पर मैं उससे हमेशा कड़ी मेहनत करने को कहती थी।'


खुशबू की शुरुआती पढ़ाई स्थानीय कृष्णा बाल मंदिर में हुई। सन्‌ 2000 में वह दसवीं कक्षा में 73 फीसदी अंक पाकर टॉपर बनी। आगे की पढ़ाई उसने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पूरी की। 2002 में इंटर की परीक्षा में 83 फीसदी अंक पाकर फिर से टॉपर बनी। स्कूल के दिनों में वह वॉलीबॉल की अच्छी खिलाड़ी रही। उसने वॉलीबॉल के लिए उत्तरप्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व भी किया। इसी की बदौलत खेल कोटा से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीटेक(इलेक्ट्रोनिक्स) करने का मौका मिला। 2006 में बीटेक में 96 फीसदी अंक प्राप्त करके वह विश्वविद्यालय की गोल्ड मैडलिस्ट भी बनी।
पैसा नहीं दिल की खुशी चाहिए


बीटेक के बाद उसने बहुराष्ट्रीय कंपनी एडोबे में अच्छी नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दिया और नवंबर 2006 में आधी तनख्वाह में इसरो से जुड़ गई। काम के प्रति लगन को देखते हुए जनवरी 2007 में उसे चंद्रयान मिशन के लिए चुना गया। तब से लेकर अब तक वह लगातार चंद्रयान के सफलतापूर्वक चांद की जमीन पर उतरने के लिए दुआ करती रही और आखिरकार यह मिशन सफल भी रहा। अब हिंदुस्तान अमरीका, रूस और जापान के बाद चांद पर झंडा गाड़ने वाला चौथा देश बन गया है। खुशबू मानती हैं,' हां मैं आधुनिक वेशभूषा पहनती हूं। पर मैं साथ में अपनी परंपराओं का निर्वहन भी करती हूं। मैं दिन में पांच बार नमाज अदा करती हूं और रमजान के महीने में रोजे भी रखती हूं। हर भारतीय की तरह मैं भी शुरू से ही अंतरिक्ष कार्यक्रमों को लेकर उत्सुक रही। चंद्रयान का प्रक्षेपण मेरे लिए बड़ा रोमांचकारी अनुभव रहा और मुझे इस दौरान काफी कुछ सीखने को मिला।'


- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

20 November 2008

प्रज्ञा पर प्रश्न चिह्न





मालेगांव बम धमाके के सिलसिले में गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जिंदगी पर एक नजर-


अधूरी हसरतों का दूसरा नाम है प्रज्ञा। उसकी जिंदगी के हर पन्ने में एक कहानी छुपी हुई है। मध्यप्रदेश के भिंड जिले के लहार कस्बे के गल्ला मंडी रोड पर आयुर्वेदिक क्लिनिक चलाने वाले वैद्य पिता चंद्रपाल सिंह और मां सरला देवी की बेटी है प्रज्ञा। उनका जन्म तो मध्यप्रदेश के दतिया जिले में हुआ पर लालन-पालन लहार में। चार बेटियों और एक बेटे में दूसरे नंबर की प्रज्ञा में बचपन से ही लड़कों जैसी चपलता थी। जूड़ो-कराटे में महारत हासिल करके वह बिगडै़ल लड़कों की पिटाई तक कर दिया करती थी। लड़कियों की बजाय उसे लड़कों जैसे कपड़े- जींस और कमीज पहनना पसंद था। कॉलेज के दिनों से ही वह मोटर साइकिल पर घूमने की शौकीन थी। पल्सर और बुलैट जैसी भारी गाडियां भी प्रज्ञा आसानी से चला लेती थी। पढ़ाई में औसत विद्यार्थी थी। लहार से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की और भिंड कॉलेज से इतिहास में स्नातक भी किया।सिलसिला चलता रहाकॉलेज के दिनों में वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गई। नब्बे के दशक के आखिर तक वह विद्यार्थी परिषद में रही। वाक्‌पटुता और हाजिरजवाबी के चलते काफी मशहूर हुई और भोपाल, देवास, जबलपुर, इंदौर में अपने भाषणों से छा गई। ऐसा माना जाता है कि 1998 के विधानसभा चुनाव से पहले भिंड जिले की मेहगांव सीट से चुनाव लड़ने की भी उसने कोशिशें कीं। गुजरात चुनाव के दौरान भी उसे चुनावी सभाओं में देखा गया। सन्‌ 2002 में उसने 'जय वंदेमातरम' और 'राष्ट्रीय जागरण मंच' बनाया।प्रज्ञा के साध्वी बनने के पीछे में प्रेम में असफलता को खासी वजह माना जाता रहा। अपने एक साथी नेता की किसी और से शादी होने पर फिर कभी शादी के बारे में नहीं सोचा। सन्‌ 2004 में उसके पिता लहार छोड़कर सूरत में बस गए।


बन गई संन्यासिन

जनवरी 2007 में जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद के समक्ष संन्यास लेकर साध्वी पूर्ण चेतनानंद गिरि बन गई और प्रवचन करने लगी। सूरत को अपनी कार्यस्थली के रूप में स्थापित करने के बाद वहां अपना आश्रम बना लिया। उनके परिजन अभी सूरत में ही रह रहे हैं। उसके पिता चंद्रपाल सिंह का कहना है, 'मुझे 99 फीसदी विश्वास है कि प्रज्ञा का मालेगांव बम मुझे विस्फोट में कोई हाथ नहीं है। पर एक फीसदी अविश्वास इसलिए है क्योंकि साध्वी बनने के बाद वह पिछले दो साल से घर नहीं लौटी। अब वह मुझे पिताजी नहीं डॉक्टर साहब कहकर पुकारती है। सबकी तरह मैं भी चाहता हूं कि सच्चाई जल्द से जल्द सबके सामने आए।'

- प्रस्तुति- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

18 November 2008

बड़ी खूबसूरत है ये दुनिया





मशहूर अभिनेता फारूक शेख खुलासा कर रहे हैं अपनी जिंदगी के चंद अनछुए पहलुओं का।
सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन के कामयाब कलाकार फारूक शेख उन चंद लोगों में से हैं जो समाज से जुड़े हर विषय पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। उनकी आवाज में गर्मजोशी है, तो बातों में नर्म दिल होने की झलक। पिछले दिनों जयपुर आगमन पर हमने उनसे अपनी जिंदगी के बारे में कुछ खास बातें की। पेश है उनसे हुई अंतरंग बातचीत के खास अंश-




आपके लिए खुशी के मायने...।


खुशी का राज सबको साथ लेकर चलने में है। परिवार से ऊपर उठकर समाज के बारे सोचने में है। आदमी अपनी जिंदगी दुनिया या बाजार में नहीं गुजारता बल्कि दिमाग के अंदर गुजारता है। अगर दिल और दिमाग संतुष्ट है, तो हजारों अभाव होने पर भी हम खुद को खुश पाएंगे। अगर मैं यह सोचने लगूं कि पूरी दुनिया मेरी जरूरतों को पूरा करने के लिए बनी है, तो यह गलत होगा। हम दुनिया नहीं, दुनिया का एक हिस्सा हो सकते हैं। यही तसल्ली तो असली खुशी देती है।


शायर ने कहा भी है-


चमन में इख्तिलाफे रंगो-बू से बात बनती है


हम ही हम हैं, तो क्या हम हैं


तुम ही तुम हो, तो क्या तुम हो।



परिवार को कितना समय दे पाते हैं?


मेरी बीवी ही घर की गृहमंत्री हैं। हम अपनी दोनों बेटियों साहिस्ता और सना को बेहद प्यार करते हैं। बेटी साहिस्ता एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करती है और सना एनजीओ से जुड़ी हुई है। जब मैं घर पर होता हूं, तो एक आम आदमी की तरह अपनी जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश करता हूं। पर जब शहर से बाहर होता हूं, तो मेरी बीवी सब संभाल लेती है।



परदे पर और असल जिंदगी के फारूक में क्या फर्क है?


जाहिरा तौर पर एक बड़ा फर्क है। हम चाहें खुद कितने ही परेशान क्यों न हों, परदे पर अगर लोगों को हंसाना है, तो हंसाना पड़ेगा। असल जिंदगी मुश्किलों से भरी है। यहां हम अपने भावों को कितनी देर तक छुपा पाएंगे। इसलिए अपनी सोच को विशाल दायरा देकर सारी जिम्मेदारियों को समझना पड़ता है। असल जिंदगी में एक आम आदमी हूं, जो इस खूबसूरत दुनिया और इसके बाशिंदों को बेहद प्यार करता है।
छोटे परदे पर आपका शो 'जीना इसी का नाम है' बड़ा मशहूर हुआ था। आपका क्या कहना है?


यह शो मेरे दिल के करीब है। दर्शकों ने शो के लिए मुझे बहुत सराहा। शो के दौरान कई शख्सियतों के बारे में करीब से जानने का मौका मिला। अगर प्रोड्यूसर दुबारा यह शो लेकर मेरे पास आते हैं, तो मैं जरूर करूंगा।


फिल्मों से इतर आपके आदर्श कौन हैं?


गांधीजी ने मुझ पर खासा असर डाला है। उन्होंने कहा था- मेरी जिंदगी ही मेरा संदेश है। हमें भी अपनी जिंदगी को इस तरह जीना चाहिए कि दिखावे के लिए कोई जगह ना हो।


क्या आप राजनीति में आना चाहेंगे?


नहीं भई, नौजवान, शिक्षित, मेहनती और समझदार नेता ही देश की किस्मत बदल सकते हैं। मैं आम आदमी की तरह देश की राजनीति में रुचि रखता हूं, पर इसमें आना नहीं चाहता।


इन दिनों छोटे परदे पर आ रहे कार्यक्रमों के बारे में आपकी क्या राय है?


हर इक शै से जुड़ी है हर इक शै यहां


इक फूल को तोड़ो तारे का दिल हिलेगा।


छोटे परदे पर पेश होने वाले कार्यक्रमों का समाज पर गहरा असर पड़ता है। चाहे सीरियल्स हों या कोई रियलिटी शो, एक सीमा रव्खा तय की जानी जानी चाहिए। इन्हें देखकर लगता है, मानो यही हमारी संस्कृति है। बिना किसी को नीचा दिखाए भी तो लोगों को हंसाया जा सकता है। अब समय आ गया है कि दर्शकों को जागरूक हो जाना चाहिए। उन्हें प्रोड्यूसर्स को ऐसे कार्यक्रम बंद करने के लिए खत लिखने होंगे और फोन करने होंगे। गलत कार्यक्रमों के आते ही चैनल बदलना होगा। निजी चैनल लोगों की प्रतिक्रिया पर ध्यान देंगे और अपने कार्यक्रमों के स्तर को सुधारने पर मजबूर हो जाएंगे।


आज की फिल्मों के बारे में क्या कहेंगे?


भई, आजकल फिल्में भी फास्टफूड की तरह बन रही हैं। मल्टीप्लैक्स की बाढ़ के चलते फिल्में पूरी तरह प्रॉडक्ट बनकर रह गई हैं। सैकड़ों फिल्मों में से एकाध ही ऐसी होती हैं, जिन्हें हम लंबे समय तक याद रख पाते हैं। हास्य फिल्मों में फूहड़ता आ गई है, मैसेज गायब है। आज की कॉमेडी देखकर मुझे बड़ा दुख होता है। मैंने हाल में अनुपम खेर अभिनीत 'खोसला का घोसला' देखी, इस का प्रजेंटेशन मुझे बेहद पसंद आया।


लंबे अरसे के बाद आपकी फिल्म 'सास, बहू और सेंसेक्स' रिलीज हुई है...।


मेरा मानना है कि कलाकार को अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए और फिर सारा फैसला जनता के हाथ में छोड़ देना चाहिए। अगर फिल्म फ्लॉप हो जाती है, तो कमियों पर ध्यान देकर अगली बार सुधार करना चाहिए। अब तो मैंने फैसला कर लिया है कि अगर अच्छी स्क्रिप्ट और बेहतरीन डायरव्क्टर का साथ मिलता है, तो साल में एक फिल्म जरूर करूंगा।



आपकी सहकलाकार रह चुकीं दीप्ति नवल डायरव्क्शन के फील्ड में आ गई हैं, आप भी निर्देशन करने की सोच रहे हैं...?


दीप्ति बड़ी अच्छी कलाकार हैं। अपनी फिल्म 'दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश' में वे अपना बेहतर काम पेश करेंगी, मुझे पूरा यकीन है। और जहां तक मेरे डायरव्क्शन का सवाल है, मैं खुद को इस काबिल नहीं समझता कि मुझमें लोगों से काम निकलवाने की समझ है। मैं तो एक्टर ही ठीक हूं।


युवाओं के लिए कोई संदेश।


कभी सैलेरी के लिए अपनी सोच और ईमानदारी को मत बेचो। पैसा ही जिंदगी नहीं है। काम के लिए जिओगे, तो पैसा पीछे भागेगा। जिंदगी का मकसद सारे समाज की खुशहाली होना चाहिए। आज अगर आपको आगे बढ़ने के अच्छे अवसर मिल रहे हैं, तो कुछ काम करने चाहिए कि आने वाली पीढिय़ों को भी कुछ अच्छा हासिल हो सके।


- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

दिल में धड़के हिंदुस्तान



सोनल शाह अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा की खास सलाहकार बनने जा रही भारतीय मूल की अमरीकी नागरिक सोनल शाह को जानते हैं खुद उन्हीं की जुबानी-


मेरा काम मेरी पहचान है


यह नवंबर माह मेरे लिए सबसे खुशी का महीना साबित हुआ है। अब मुझे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका के राष्ट्रपति के साथ काम करने का मौका मिलेगा। अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने मुझे अपने 15 सदस्यीय सलाहकार मंडल में बतौर सदस्य शामिल किया है। यह समिति निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुभव रखने वाले लोगों से मिलकर बनाई गई है। मैं ओबामा को प्रशासन चलाने के लिए काबिल लोगों के नामों की सिफारिश करूंगी। यह मेरे लिए वाकई गर्व की बात है। मैं एक अमरीकी अर्थशास्त्री हूं। अभी मैं गूगल डॉट ओरआरजी के साथ वैश्विक विकास दल में काम कर रही हूं। इससे पहले मैं गोल्डमैन एंड कंपनी की वाइस प्रेसीडेंट थी। वहां मैंने गोल्डमेन सोक्स की पर्यावरण संबंधी प्रोजेक्ट को पूरा करने में अहम भूमिका निभाई। मैं सेंटर ऑफ अमरीकन प्रोग्रेस में राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक नीति विभाग की सहायक निदेशक भी रह चुकी हूं। इसके साथ ही मैंने बोसनिया और कोसावो के युद्ध पीड़ित लोगों के लिए भी काम किया है और वहां से मुझे धैर्य, समर्पण जैसे कई गुण सीखने को मिले। कोई भी शख्स लगातार काम करके ही सीखता है, मैंने भी कई जगह और कई लोगों के साथ काम किया है। इसी की बदौलत आज इस मुकाम हैं।


देश के लिए जज्बात


मूलतः मैं गुजरात के साबरकांठा की हूं। मेरा जन्म 1968 में मुंबई में हुआ। सन्‌ 1970 में मेरव् पिताजी रमेश शाह गुजरात से जाकर न्यूयार्क में स्थायी तौर पर बस गए। 1972 में मैं भी अपनी मां कोकिला शाह के साथ न्यूयार्क जाकर बस गई। वहीं मेरी पढ़ाई-लिखाई हुई। मेरे भाई आनंद और बहन रूपल के साथ मिलकर मैंने 2001 में इंडीकॉप्स नाम के एक गैर सरकारी संस्था की स्थापना की। यह संस्था प्रवासी भारतीय को आपस में जोड़कर भारत में विकास के कामों में भागीदार बनाती है और भारत में डवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए भारतीय मूल के लोगों को एक साल की फैलोशिप देती है। मेरा मानना है कि देश से बाहर रहने वाले भारतीयों के मन में भी देश के लिए जज्बात होते हैं और वे हिंदुस्तान में सामाजिक कामों में भागीदारी करना चाहते हैं, पर उन्हें कोई मौका नहीं मिल पाता। इंडीकॉप्स के तहत युवा प्रवासी स्वेच्छा से भारतीय ग्रामीण लोगों की शिक्षा, जागृति, स्वास्थ्य जैसे विषयों पर एक साल तक भारत में काम करने के लिए आते हैं। इससे उन्हें ग्रामीण भारत की नई तस्वीर देखने का मौका मिलता है। सन्‌ 2003 में इंडिया एब्रोड प्रकाशन ने मुझे मेरे काम और नेतृत्व क्षमता के लिए 'पर्सन ऑफ द ईयर' घोषित किया।


आसमान छू सकते हैं


मुझे ओबामा की सोच और काम करने का तरीका बेहद पसंद है। वे बहुत स्पष्टवादी हैं। उनकी तरह मैं भी कहे हुए काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध रहती हूं। मुझे किताबें पढ़ने का बहुत शौक है और अच्छी एथलीट भी हूं। खासकर टेनिस और बॉलीबॉल तो मुझे बहुत भाते हैं। मैं स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानती हूं। वे कहा करते थे कि भयमुक्त होने पर ही इंसान कोई बड़ा काम कर सकता है। साथ ही मैं अपनी सफलता का श्रेय समाजसेवी पांडुरंग आठवाले को भी देती हूं। उन्हीं से मुझे समाज से करीब से जुड़ने की प्रेरणा मिली। मैं खुद को धन्य मानती हूं कि मुझे इतने अच्छे माता-पिता मिले, जिन्होंने सदा मेरा साथ दिया और हम काम में मेरी हौसला अफजाई की। मैं भारतीय युवाओं को हमेशा यही बात समझाती हूं कि उनमें क्षमता है बदलाव लाने की। वे समाज को एक नई दिशा दे सकते हैं। अगर आप आसमान के बारे में सोच सकते हैं, तो आसमान पा भी सकते हैं।


- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

10 November 2008

ये बच्चे बड़े सयाने हैं

ये बच्चे बड़े सयाने हैं
ये दुनिया से अनजाने हैं।
ईश्वर अल्लाह गॉड खुदा रब
मन से सदा पावन रहते ये सब।
इनकी बात निराली है
इनके चेहरों पर लाली है।
बातों में है एक भोलापन
जुड़ जाते इनके झट से मन।
ये अदा बड़ी दिखलाते हैं।
नटखट हरकत कर इतराते हैं।
ये बच्चे बड़े सयाने हैं
ये दुनिया से अनजाने हैं।
हर भाषा इनकी प्यारी है
हर रंग रूप में न्यारी है।
ये प्यार प्रेम हैं सिखलाते
दुनिया को सच्चाई दिखलाते।
ये सबके लिए इक सौगात हैं
इनसे जग के दिन-रात हैं।
बच्चों को दे प्यार ही प्यार
सब कुछ दें उन पर वार।
यही देश का नाम करेंगे
जग में अपना काम करेंगे।
-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

03 November 2008

चाहिए एक संगिनी ऐसी

ख्वाबों की शहजादी कहें या सपनों की परी, हर पुरुष चाहता है कि उसकी जीवनसंगिनी ऐसी हो जो सारे जमाने से अलहदा और हरदिल अजीज हो।

शादी जिंदगी में एक नया मोड़ लेकर आती है। कुछ को यह रिश्ता ताउम्र लुभाता है, तो कुछ को लगता है कि हमेशा साथ निभाने वाले हमसफर में कोई न कोई खास बात होनी चाहिए, जो जमाने भर में ढूंढ़ने पर भी कहीं नजर न आए। हमने बात की कुछ पुरुषों से और जाना कि कैसी होनी चाहिए आपकी ड्रीम वाइफ।
आंखों में झांककर दिल पढ़ ले
वो लड़की बिल्कुल मेरी दोस्त जैसी हो। आखिर उसे मेरे साथ ताउम्र रहना है। ऐसे में दोस्त की तरह मेरी मुश्किलों को समझे, मेरा हौसला बढ़ाए और प्यार करे। वह दिखने में चाहे कैसी भी हो, इससे कोई फर्क मुझे नहीं पड़ेगा। हां, अगर मैं गलत राह पर जाऊं, तो मुझे सही राह भी दिखला सके। मेरे बोलने से पहले मेरी आंखों में झांककर ही मेरे मन की बात समझ सके। कभी अगर मैं जिंदगी के सफर में हताश हो जाऊं, तो मुझे प्रेरित करे, ऐसी वाइफ मिल जाए, तो मेरी लाइफ बन जाए।
-रवि कुमार शर्मा, उम्र- 36 वर्ष
सबका दिल जीत ले
उस लड़की की शक्लोसूरत खूबसूरत हो। हम दोनों की सोच भी मिले। पत्नी के साथ-साथ परिवार में दूसरी भूमिकाओं जैसे भाभी, बहू और मां को निभाने में भी कुशल हो। घर में सबकी इच्छाओं के लिए अगर थोड़ा बहुत अपनी सुविधाओं के साथ एडजस्ट करना पड़े, तो खुशी-खुशी तैयार हो जाए। जहां भी वह जाए, अपनी बातों से सबका दिल जीत ले और हाथ के हुनर में पारंगत हो। फिर चाहे वह अच्छी कुक हो या अच्छी पेंटर। कुछ ना कुछ ऐसी खासियत जरूर होनी चाहिए कि हर कोई कहे, वाह! क्या बीवी है।
-बुद्धप्रकाश सैनी, उम्र-34 वर्ष
मस्त, बिंदास और जिम्मेदार
मेरा हमसफर थोड़ा चुलबुला, चंचल और शरारती हो। मस्त, बिंदास हो, साथ ही जिम्मेदार भी। वह खुले विचारों की हो और समय के हिसाब से खुद को ढाल सके। मैं जिस भी प्रोफेशन में रहूं, वह उसे समझे और मेरी मदद भी करे। खुद को अपडेट रखे। आपने आस-पास की चीजों की जानकारी रखने वाली हो। वह इमोशनल भी होनी चाहिए ताकि रिश्तों की डोर को मजबूती से संभाले रख सके। तन की सुंदरता से ज्यादा मन की खूबसूरती को तवज्जो देने वाली हो। तभी मैं कहूंगा कि जोडिय़ां तो फरिश्ते तय करके भेजते हैं।
- विनोद भंडारी, 23 वर्ष
खुद को ना बदले
मेरी तलाश ऐसी अर्द्धांगिनी की है, जो वाकई मेरी पूरक हो। मेरी पहचान हो। सूरत और सीरत में कोई फर्क ना हो। बिना बताए अपने फर्ज को समझने वाली हो। आधुनिक हो पर ज्यादा फैशनबल ना हो। चाहे साड़ी पहने या सलवार पर हो हिंदुस्तानी तहजीब को समझने वाली। परंपराओं को दिल से निभाए और मुश्किलों में मेरा साथ दे। मन की सारी भली-बुरी बातें मुझसे शेयर करे। मेरी ख्वाहिशों के चलते वह खुद को ना बदले। जैसी है, सदा वैसी ही रहे। वह खुद कहे कि मैं हूं बीवी नंबर वन।
- आदित्य बोहरा, 26 वर्ष

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

दोस्ती कमाल की

सिसली के राजा ने डेयन को किसी अपराध के कारण मृत्यु दण्ड दिया। मृत्यु दण्ड से पहले राजा ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी तो उसने कहा- मुझे ग्रीस जाकर परिवार का प्रबंध करने के लिए एक साल का समय चाहिए। राजा बोला- मैं तुम्हारी अंतिम इच्छा पूरी करना चाहता हूं, पर तुम्हारी जगह कारागृह में कौन रहेगा? और तुम्हारे नहीं लौटने पर मृत्यु दण्ड लेने को कौन तैयार होगा? उसका मित्र पीथियस पास में ही खड़ा था। उसने कहा- मैं डेयन की जगह कारावास जाने को तैयार हूं, अगर वह लौटकर नहीं आया तो मैं मृत्यु दण्ड पाने को भी तैयार हूं। राजा ने डेयन को जाने की अनुमति दे दी। लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी बनीं कि डेयन समय पर लौट कर नहीं आ सका। पीथियस को फांसी की पूरी तैयारी कर ली गई। जैसे ही फंदा उसके गले में डाला जा रहा था, तभी हांफता हुआ डेयन लौट कर आ गया और उसने कहा- मैं आ गया हूं, मेरे मित्र को छोड़ दो और मृत्युदण्ड मुझे ही दो। पीथियस ने कहा- काश तुम देर से आते तो आज मित्रता का मिसाल कायम हो जाती। समझदार राजा ने दोनों क मित्रता को समझा और प्रशंसा करते हुए उन्हें छोड़ दिया। राजा ने उम्हें कई उपहार भी दिए और कहा- मुझे भी तुम्हारे जैसे मित्रों की आवश्यकता है। यदि तुम दोनों मेरे मित्र बन जाओगो तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।

...आगे पढ़ें!

बहकते नन्हे कदम

घटना1- 11 दिसंबर 2007 को गुडगांव के एक स्कूल में दो स्कूली छात्रों ने आठवीं कक्षा के अपने दोस्त पर 5 गोलियां दागकर उसे मार डाला।
घटना2- 3 जनवरी 2008 को मध्यप्रदेश के सतना जिले के चोरवाड़ी गांव में दसवीं कक्षा के एक छात्र ने अपने से जूनियर कक्षा 8 के एक छात्र को गोली चलाकर मार डाला।

हाल ही हुई बच्चों में बढ़ती हिंसा की घटनाओं ने सबके सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों बालमन भटक रहा है? मासूमियत कहां गुम होती जा रही है? यह प्रवृत्ति परिवार, देश-समाज के लिए नासूर बने, उससे पहले सोचना होगा कि कैसे नन्हे कदमों को भटकने से रोका जा सकता है? इसी का खुलासा कर रहा है यह लेख-

आंकड़ों की जुबानी
1. पिछले दस सालों में बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में 400 फीसदी बढ़ोतरी हुई है।(इंडियन एसोसिएशन फॉर चाइल्ड एंड एडोलेसेंट मेंटल हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक)

2. हर 10 में से चार बच्चे अवसादग्रस्त हैं। (विमहंस के अध्ययन के मुताबिक)

3. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सन्‌ 2020 तक बचपन में न्यूरोसाइकरेटिक समस्या में 50 फीसदी तक का इजाफा हो जाएगा और रोग व मृत्युदर में इजाफे के लिए जिम्मेदार पांच कारणों में एक प्रमुख कारण होगा।
4. विद्यासागर मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरो विज्ञान संस्थान (विमहंस) ने 1200 बच्चों पर किए एक अध्ययन के आधार पर बताया है कि दिल्ली में पिछले एक दशक में 15 से 18 साल के बच्चों में तम्बाकू और अल्कोहल का इस्तेमाल चार गुना बढ़ गया है।
ये घटनाएं आजकल सबके बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। सभी को बच्चों में बढ़ती हिंसा ने हैरत में डाल दिया है। बच्चों में इस कदर बढ़ती हिंसा वाकई चिंता का विषय है। मनोवैज्ञानिक बच्चों के इस बदलते व्यवहार को व्यापक दायरे में देखते हैं और इसके लिए कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। अगर इसे समय पर नहीं सुलझाया गया, तो समाज में बच्चों की स्थिति बिगड़ सकती है और हम सबको इसके नकारात्मक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।
कोमल मन, मिट्टी समान
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। बच्चे अपने परिवार, परिवेश, समाज और स्कूल से बहुत कुछ सीखते हैं। उनमें यह समझ नहीं होती कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। ऐसे में वे कई बार गलत कदम उठा लेते हैं। मुंबई में बच्चों की काउंसलर दिव्या प्रसाद इसी बात का समर्थन करते हुए कहती हैं, 'बच्चों का मन कच्ची मिट्टी की तरह होता है। ऐसे में बच्चे हर चीज से बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं। बच्चों में सही-गलत का निर्णय लेने का गुण विकसित करना बेहद जरूरी है।'
बढ़ती सुख-सुविधा और पैसा
उदारीकरण के दौर में भारतीय परिवारों की आय में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके चलते सुख-सुविधाओं की वस्तुएं बढ़ी है। बच्चों को भी ज्यादा जेबखर्च दिया जाने लगा है। बच्चे इस पैसे का गलत इस्तेमाल करते हैं। पैसे के बल पर माता-पिता के खरीदे लाइसेंस्ड हथियार बच्चों तक आसानी से पहुंच जाते हैं। घर में रखे हथियारों के प्रति बच्चों में उत्सुकता बनी रहती है। बच्चे मौका देखते ही हथियार को लेकर उसका असल जिंदगी में प्रदर्शन करते हैं और दोस्तों के बीच आपनी धौंस जमाने लगते हैं। कभी-कभी इन हथियारों के जरिए अपना गुस्सा जाहिर करने से भी नहीं चूकते।
पढ़ाई का तनाव
आज प्रतिस्पर्धा का दौर है। मां-बाप व अध्यापक से लेकर रिश्तेदार और साथी-संगी सभी चाहते हैं कि बच्चा स्कूल में हमेशा टॉप पर रहे। बच्चे के मन को समझने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। ऐसे में बच्चा अपनी पढ़ाई को लेकर हमेशा तनाव में रहता है। बच्चा अपने मन की बात किसी से नहीं कह पाता और ऐसे में मन ही मन परेशान रहने लगता है। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को समय से पूर्व ही करियर का भूत भी सताते लगता है। माता-पिता की बढ़ती अपेक्षाओं के चलते बच्चा अवसाद में आ जाता है।
टीवी और इंटरनेट, कम्प्यूटर गेम्स
तकनीक ने हमारी जीवनशैली का स्तर सुधारा है। पर तकनीक के बढ़ते प्रभाव के चलते बच्चे असल जिंदगी और टीवी के किरदारों में फर्क महसूस नहीं कर पाते। टेलीविजन पर दिखलाई जाने वाली हिंसा बाल-मन पर कुप्रभाव छोड़ती है। वहीं इंटरनेट पर जानकारियों का अनवरत प्रवाह के बीच बच्चे भ्रमित होकर हिंसा को वास्तविक जीवन की सच्चाई मानने लगते हैं। वहीं आजकल कम्प्यूटर गेम्स के बढ़ते चलन से बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता सिकुड़ गई है। कम्प्यूटर गेम्स जैसे हिटमैन, ब्लड मनी, रोड रश बच्चों को सीधे तौर पर हिंसा के जरिए अपना काम निकालने का संदेश देते हैं। बच्चे कम्प्यूटर गेम्स के इस मायावी संसार को असल जिंदगी में भी लागू करते हैं। उसके परिणाम बहुत घातक होते हैं।
तेज जीवनशैली और खान पान
आज के युग में किसी के पास समय नहीं है। हर किसी को जल्द से जल्द परिणाम चाहिए। बच्चे भी तेजी से खुद को बड़ा साबित करना चाहते हैं। इस होड़ में बच्चे अपनी कोमलता छोड़कर प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गए हैं। वे अपनी हार बर्दाश्त नहीं कर सकते। बच्चे सफलता में बाधा बनने वाली हर चीज का हल हथियार में ढूंढने लग जाते हैं। वहीं कई शोध साबित करते हैं कि जंक फूड खाने से भी बच्चों की मानसिकता प्रभावित होती है। फास्ट फूड के बढ़ते चलन से बच्चों का बौद्धिक स्तर कम हुआ है। अकेलापन
आधुनिक समय में माता-पिता दोनों रोजगार के लिए दिन के समय घर से बाहर रहते हैं। जिस समय बच्चा स्कूल से घर आता है उसे चाहिए मां का दुलार, उसके ममता भरे बोल। लेकिन उसे इसकी बजाय खालीपन मिलता है।वह घर पर सारे दिन अकेला रहता है। बच्चा इस अकेलेपन को सहन नहीं कर पाता है। अकेलापन हावी होने से उसकी मानसिकता में विकृति आने लगती है। अकेलेपन का कोई रचनात्मक उपयोग न होने की वजह से बच्चे में तनाव, अवसाद और निराशा घर करने लगती है।
कुछ खास बातें
बच्चों के कुछ खास लक्षणों को देखकर आप पता लगा सकते हैं कि आपका लाडला भी किसी मानसिक परव्शानी या अवसाद से तो नहीं गुजर रहा-
1. हमेशा उदास रहना और अनावश्यक तनाव लेकर आंसू बहाते रहना।
2. हमेशा माता-पिता का साथ पसंद करना और एक पल को भी उनसे दूर नहीं होना।
3. स्कूल में अपने सहपाठियों से घुल-मिल नहीं पाना और हमेशा उनसे लड़ने को उतारू रहना।
4. प्रायः उल्टी, सिरदर्द की शिकायत करना।
5. खेल, पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों से अचानक मन उचटना।
6. खान-पान की आदतों में बदलाव और कम नींद लेना।
7. अल्कोहल या ड्रग लेना या एकाएक बहुत ज्यादा वजन बढ़ना।
8. बात-बात पर गुस्सा करना और तोड़फोड़ करना।
9. दोस्तों के नए समूह में शामिल होना
मनोचिकित्सक प्रवीण दादाचांजी और अनिल ताम्बी के मुताबिक अपने बच्चे में कोई मानसिक समस्या देखें, तो इससे निजात के लिए आपको निम्न उपाय करने चाहिए-
1. बच्चों के साथ समय गुजारें- जब तक आप अपने बच्चों के साथ स्तरीय समय व्यतीत नहीं करेंगे, बच्चे को सही राह नजर नहीं आ सकती है। माता-पिता को बच्चों की समस्याएं सुननी चाहिए व उनके साथ बैठकर हल खोजना चाहिए।
2. बच्चों को प्रेरणादायी और सकारात्मक किस्से सुनाएं- आज के युग में बच्चे दिशाहीन होते जा रहे हैं। ऐसे समय में अगर उन्हें प्रेरणादायी किस्से और सकारात्मक बातें बताई जाएं, तो उनका तनाव कम होगा और वे गलत राह पर जाने से बचे रहेंगे।
3. टीवी और कम्प्यूटर गेम्स की बजाय उन्हें पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें- अगर बच्चे कम्प्यूटर की बजाय पुस्तकें पढ़ने की आदत विकसित करेंगे, तो वे अपना समय कहीं बेहतर ढंग से व्यतीत कर सकेंगे। पुस्तकें बच्चों की सबसे अच्छी मित्र साबित हो सकती हैं।
4. सामाजिक मान्यताओं के सम्मान की सीख दें- अपने बच्चों को सिखाएं कि व्यक्ति का विकास समाज में रहकर ही हो सकता है। सामाजिक मान्यताओं का आदर करना बहुत जरूरी है।
5. खुद मर्यादित व्यवहार करें- अक्सर बच्चे अपने माता-पिता को देखकर काफी कुछ सीखते हैं। अगर माता-पिता खुद अपना व्यवहार मर्यादित रखेंगे, तो बच्चों के सामने एक मिसाल कायम होगी और उनके कदम बहकने से बचेंगे।
6. रचनात्मकता को बढ़ावा दें- हर बच्चे में कुछ खास करने की इच्छा होती है। इसलिए आपको बच्चों की रचनात्मकता को विकसित करने का मौका देना चाहिए। पेंटिंग्स, लेखन और डांस से बच्चों को कुछ नया करने का मौका मिलता है और वे ज्यादा सकारात्मक बन पाते हैं।
7. एंगर मैनेजमनेंट की सीख दें- अगर बच्चे को बात-बात पर गुस्सा आता है, तो उसे गुस्सा कम करने की तकनीक बताएं। गुस्से के वक्त उसे अपनी सांस पर ध्यान देने की सलाह दें। ध्यान और योग से भी बच्चों के गुस्से को कम किया जा सकता है।
क्या कहना है स्कूल प्रिंसिपल्स और निदेशकों का
जयपुर के स्कूल के प्रिंसिपल्स और निदेशकों से जब स्कूल परिसर में बच्चों में बढ़ती हिंसा के बारव् में बातचीत की गई, तो पता लगा कि सभी को इस घटना के बारव् में पता था और इस घटना के पीछे छुपे संकेतों को भी सभी समझते थे। अधिकतर स्कूलों ने इस घटना के तुरंत बाद अध्यापकों के साथ मीटिंग की और बच्चों की भावनाओं को समझने की वकालत की। पर प्रायः स्कूलों ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी किसी ठोस कार्रवाई की बात नहीं कही।
नैतिक शिक्षा जरूरी
जैसे ही मुझे गुडगांव की हृदयविदारक घटना के बारे में पता लगा, मैंने स्कूल के अध्यापकों और बच्चों के साथ मीटिंग की और बच्चों को समझाया। मैं अध्यापकों को बच्चों को नैतिक शिक्षा देने की बात कही है।
- आर एल शर्मा, निदेशक, ब्राइट फ्यूचर सीनियर सैकण्डरी स्कूल
शिक्षक से मन की बात कहें
गुडगांव और चोरवाड़ी घटना के बाद हम बच्चों से पूछताछ कर रहे हैं कि उन्हें किसी साथी से डर तो नहीं है। हम निगाह रखते हैं कि किसी बच्चे का व्यवहार असामान्य तो नहीं है। अगर किसी बच्चे को किसी भी तरह की परव्शानी है, तो वह सीधे अपने शिक्षक से बात कर सकता है।
- बेला जोशी, प्रिंसिपल, सुबोध पब्लिक स्कूल
हर हरकत पर निगाह
आज बच्चों के दिल में जो गुबार है,उसे बाहर निकालना बहुत जरूरी है। मैं तो बच्चों के पास जाकर बच्चों जैसी हो जाती हूं। उनकी हर बात ध्यान से सुनती हूं। स्कूल में शिक्षकों को बच्चों की असंदिग्ध हरकतों पर निगाह रखने के निर्देश दिए हुए हैं। पर हर बच्चे की चैंकिंग करना नामुमकिन है।
- राज अग्रवाल, प्रिंसिपल, केन्द्रीय विद्यालय नं.1
हिदायत दी हुई है
स्कूल की हर कक्षा में कैमरे लगे हुए हैं, जिससे हम बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। अध्यापकों को बच्चों के लड़ाई-झगड़े निपटाने के भी निर्देश दे दिए हैं। बच्चों को हिदायत दी है कि अगर आप कुछ गलत चीज स्कूल में लेकर आए, तो आपको स्कूल से निकाला जा सकता है।
-मोहिनी बक्शी, प्रिंसिपल, सीडलिंग स्कूल
काउंसलिंग करवाते हैं
वैसे कोई बड़ा कदम तो नहीं उठाया है। हां, नियमित रूप से अकस्मात चैकिंग का काम चलता रहता है। इससे बच्चे किसी तरह का गलत काम करने से डरते हैं। बच्चों की काउंसलिंग का कार्यक्रम भी बढ़ा दिया है।- माला अग्निहोत्री, वाइस प्रिंसिपल, इंडिया इंटरनेशनल स्कूल
समझाइश से काम होगा
हम माता-पिता को समझा रहे हैं कि हथियारों को बच्चों की पहुंच से दूर रखें। बच्चों को भी पढ़ाई का तनाव नहीं लेने की सलाह दी है। बच्चों को हथियारों के नुकसान से भी चेताया है।
- कर्नल कौशल मिश्रा, प्रिंसिपल, महावीर दिगंबर सीनियर सैकंडरी स्कूल
आलेख- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

नखरा बड़ा खाने-पीने में



बच्चों की खाने की आदतें बिगड़ रही हैं। अनाश-शनाप खाने वाले बच्चों पर एक पड़ताल।

13 साल की निखिला आनंद नोएडा के अपमार्केट पब्लिक स्कूल में पढ़ती है। निखिला जब स्कूल में प्रोअर के लिए जाती है तो अक्सर उसे चक्कर आने लगते हैं और वह बेहोश हो जाती है। डॉक्टर ने उसकी जांच की तो पाया कि उसका हीमोग्लोबिन का स्तर काफी कम है। तीर की तरह दुबली-पतली निखिला खाने के मामले में काफी ना-नुकुर करती है और खाने की मेज पर उसकी मां और उसमें हमेशा तकरार चलती रहती है। उसकी खाने की इस आदत से उसमें लौह तत्व की कमी की वजह से एनीमिया हो गया है। दूसरी तरफ 12 साल का रितिक घोष उच्च कॉलेस्ट्रोल से परेशान है और उसे अब रोजउठाकर फुटबाल खेलने की हिदायत है। रोहित का मोटापा पूरी तरह से उसके अनियमित और गलत खान-पान से जुड़ा हुआ है। रोहित सारे जंक फूड्स खाने का शौकीन है, पर उसे फल-सब्जी खाने के नाम पर काफी परेशानी होती है। खाने में उसके काफी नखरे होते हैं।सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली को शिशु और पेट रोग विशेषज्ञ नीलम मोहन के मुताबिक, 'सबसे ज्यादा परिजन इसी शिकायत के साथ हमारे पास आते हैं, कि उनका बच्चा ढंग से खाता-पीता नहीं है।

'मैक्स हेल्थकेयर, नई दिल्ली के शिशु रोग विशेषज्ञ राहुल नागपाल साफ कहते हैं, 'जितने दौलतमंद परिजन हैं, उतनी ही गंभीर समस्या बनने लगती है।' मैंने देखा है कि संपन्न घर के माता-पिता खूब खिलाने की कोशिश करते हैं, पर बच्चे उतना ही खाने-पीने से घृणा करते हैं।' इसे हमें 'गरीबी से त्रस्त अमीर बच्चे' कह सकते हैं। इस आदत के प्रभाव भारतीय बच्चों में दिखाई देने लगे हैं।

बुरे प्रभाव

नई दिल्ली स्थित पोषण विशेषज्ञ ईषी खोसला कहती हैं कि खाने में मां-बाप को परेशान करने वाले बच्चों का स्टेमिना काफी कम होता है। उनकी एकाग्रता क्षमता भी घट जाती है और बाल व त्वचा पर कुप्रभाव नजर आने लगता है। वे कहती हैं कि 11 साल की उम्र तक खाने की जो आदतें बन जाती हैं, वह ताउम्र बनी रहती है। डॉ. नागपाल कहते हैं 'अध्ययन बताते हैं कि जिन बच्चों को दिन की शुरुआत में ग्लूकोज की कमी होती है उनमें 'लर्निंग डिसऑर्डर' की संभावना बढ़ जाती है। चुन- चुनकर खाने वाले बच्चों में विटामिन और खनिजों की कमी होती है। उनका विकास भी इससे प्रभावित हो जाता है। अधिकतर मामलों में इससे 'नियोफोबिया- नए खाने से डर' की आशंका बन जाती है। अगर बचपन में बच्चों में स्वास्थ्यपरक भोजन के प्रति रुचि जागृत की जाए तो आगे भयंकर बीमारियों जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन की संभावना कम हो जाती है।इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली के शिशु- पेट रोग विशेषज्ञ अनुपम सिबल के अनुसार 'इस पूरी समस्या का जन्म बचपन से ही शुरू हो जाता है। जब बच्चे का दूध छुड़ाया जाता है, तो यह समस्या सामने आती है।'

वजह खास है

अगर बचपन में बच्चे का दूध छुड़ाने में मां कोताही बरतती है, तो आगे चलकर बच्चे के लिए खाने पीने की आदतें बिगड़ने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ माताएं अपने छोटे बच्चे को भूख से ज्यादा बहुतसी चीजें खिलाती ही जाती हैं, इस वजह से बच्चे में भोजन के प्रति घृणा पैदा होने लगती है। कुछ मांएं दूध छुड़ाने के बाद भी लगातार तरल चीजें ही बच्चों को खिलाती हैं। इस वजह से भी आगे चलकर बच्चों में तरल, आसानी से खाया जाने वाली चीजों की आदत पड़ जाती है।कुछ परिजन तो खाने के समय को मनोरंजन का समय मानते हैं और टीवी, खिलौने दे देते हैं और सोचते हैं कि इन चीजों से बहलकर बच्चा खूब खाएगा। पर होता इससे उलट है। बच्चे खाना तो खाते नहीं है बल्कि लगातार टीवी और खिलौने मांगते रहते हैं। बच्चों के दांत निकलना, गले में दर्द, बंद नाक और पेट में खराबी होने की वजह से बच्चे हमेशा खाने से नाक-मुंह सिकुड़ने लगते हैं। पर यह कुछ ही समय की समस्या रहती है। इस दौरान अगर बच्चों को जबर्दस्ती खिलाया जाता है, तो आगे चलकर समस्या बढ़ जाती है और बच्चा भोजन से दूर भागने लगता है। जो मां-बाप हर वक्त अपने बच्चों के पीछे खाने-पीने को लेकर पड़े रहते हैं, उनमें यह समस्या अधिक होती है। डॉ. नागपाल कहते हैं '90 फीसदी मामलों में जबर्दस्ती भोजन खिलाने की वजह से ही बच्चे खाने में लापरवाह हो जाते हैं।'

सहज समाधान

डॉ. सिबल के मुताबिक यह समस्या काफी आम है। परिजनों को पूरी स्थिति समझनी चाहिए और काफी धैर्य से काम लेना चाहिए। जल्दबाजी से इस परेशानी का हल नहीं ढूंढा जा सकता। काउंसलिंग इसमें मददगार साबित हो सकती है। अगर आपका बच्चा ढंग से खाता नहीं है, तो उसे भूख बढ़ाने की दवा देना सही उपाय नहीं है। खोसला समस्या को जल्द से जल्द पहचानने पर जोर देते हैं। अध्ययन बताते हैं कि खान-पान की आदतों के निर्माण का सबसे सही समय 3 साल की उम्र होता है। सबसे पहले परिजनों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यह समस्या पैदा किस वजह से हो रही है। इसके बाद परिजनों को आराम से, बिना दुखी हुए बच्चे को समझना चाहिए।खाने की मेज से जुड़े एक आधारभूत तथ्य पर अधिकतर डॉक्टर सहमत हैं कि खाना परोसने के 45 मिनिट के अंदर खाने की मेज साफ हो जानी चाहिए और फिर भोजन 3 घंटे बाद ही देना चाहिए। डॉ. नागपाल कहते हैं कि पूरे परिवार को मिलकर एक साथ भोजन करना चाहिए। अध्ययन बताते हैं कि जो बच्चे खासकर किशोरावस्था में प्रवेश करने वाले, नियमित रूप से परिवार के साथ खाना खाते हैं, उनमें फाइबर कैल्शियम, आयरन और दूसरे जरू री विटामिनों की कमी नहीं होती। अगर बच्चा कम मात्रा में भोजन करता है, तो परिजनों को उसी मात्रा में भोजन के जरूरी तत्वों के समावेश की कोशिश करनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर बच्चा सिर्फ एक रोटी खाता है तो गेहूं के आटे की जगह उसे सोया या बेसन के आटे की रोटी खाने को दें और इसमें सब्जियां भर दें।

क्या करें-

माता- पिता को बच्चों के सामने खान-पान के मामले में बुराई करने की बजाय खुद का आदर्श स्थापित करना चाहिए। नियमित परिवार के भोजन की योजना तैयार करनी चाहिए।

- अगर आप खुद खूब फल-सब्जी और चपातियां खाते हैं, तो बच्चा भी आपसे सीखकर खाना खाएगा। खाना खाते वक्त टीवी ना देखें।

भोजन को आकर्षक बनाकर पेश करें। जिस खाने को बच्चा बहुत पसंद करता है, उसमें पौष्टिक और कम पसंद करने वाली चीजों का मेल करके भोजन में पेश करें।

- भोजन बनाने, खरीदने में बच्चे को भी शामिल करें। उससे खाने की लिस्ट बनाएं और अलग-अलग ढंग से सब्जियां जैसे- लाल (टमाटर), हरा (मटर), नारंगी (गाजर), पीला (मक्का) चुनने को कहें।- कभी भी भोजन को पुरस्कार या दण्ड के तौर पर न दें।

ऐसा न कहें 'अपनी गाजर खाओ, तभी आइसक्रीम मिलेगी।'

- सब्जियों को सूप, रोटी, मसाला डोसा, चावल, नूडल्स, पास्ता, मैदा, सलाद, चटनीऔर सॉस के साथ मिलाकर पेश करें।

- उसे हाथों से खाने के लिए प्रेरित करें।

- बच्चों को बच्चों या उसके दोस्तों के साथ खाना खिलाएं।

- दूध और ज्यूस ज्यादा ना दें।

- भोजन का समय नियमित रखें। बच्चे के भोजन में उसकी पसंदीदा चीजें भी परोसते रहें।

- अगर कुछ खास चीजें उसे पसंद नहीं है, तो उसके एवज में उतनी ही मात्रा के दूसरे पोषक तत्व दें। सारे डॉक्टर्स और न्यूट्रीशियन्स खान-पान की समस्याओं से ग्रस्त बच्चों के लिए अभिभावकों को रचनात्मक तरीके से भोजन को पेश करने की वकालत करते हैं।

खान-पान की समस्या से ग्रस्त बच्चों की समस्या सुलझाने के लिए इंटरनेट पर कुछ किताबें भी मौजूद हैं-1. आई विल नेवर नॉट एवर ईट ए टमाटो लेखक- लॉरेन चाइल्ड

2. फूसी ईटर्स रेसिपी बुक लेखक- अन्नाबेल करमेल

3. वन बाइट वॉन्ट फिल यू लेखक- एन्न हॉड्जमैन एंड रोज चास्ट

4. प्रीटेंड सूप एंड अदर रियल रेसिपील लेखक- मोली काटजेन एंड एल एल हेंडरसन।

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

01 November 2008

क्या खूब याददाश्त है...



बच्चो जिस तरह शरीर के लिए एक्सरसाइज करना जरूरी है उसी तरह आपको अपने दिमाग को तंदुरुस्त बनाने के लिए भी व्यायाम की जरूरत है। अगर आपका दिमाग तेज होगा, तो आपके मार्क्स अच्छे आएंगे। आपकी हर जगह तारीफ होगी। आपको चीजें ढूंढ़ने में परेशानी नहीं होगी और ना जाने कितने फायदे छिपे हैं, इस याददाश्त में। पेश हैं याददाश्त की कुछ मजेदार एक्सरसाइज-

1. हर रोज किसी एक चीज को या व्यक्ति को देखें। उसे दिमाग में अच्छी तरह बिठा लें। सप्ताह के अंत में याद की गई सातों चीजों को एक कागज पर लिखें। इससे आपका दिमाग विकसित होगा।

2. खाने की टेबल पर जो चीजें रखी हैं, उन्हें बिना देखे सिर्फ सूंघकर या चखकर पहचानें। फिर अपनी मम्मी से पूछें कि क्या आप सही बता रहे हो।

3. जब भी आप फोन अटेंड करें, तो सामने वाले को बिना नाम के पहचानने की कोशिश करें।

4. जब भी किसी रेस्टोरेंट में जाएं, तो मीनू में शामिल चीजों और उनकी कीमतों को याद करने की कोशिश करें।

5. जब आप अपनी अलमारी खोलें, तो याद रखें कि कौनसा सामान कहां रखा है। अगली बार अलमारी में बिना देखे चीजों का अनुमान लगाएं।

6. जब भी मम्मी आपको कुछ खरीदने बाहर जाएं, तो बिना लिस्ट बनाए, खरीदारी का सामान याद करें। बच्चो, बिना कम्प्यूटर और कैलकुलेटर के रुपयों का हिसाब रखें।

7. अपने सभी दोस्तों के फोन नंबर कागज पर लिखने की कोशिश करें।

8. अपने घर के सदस्यों, रिश्तेदारों व दोस्तों के जन्मदिन की लिस्ट बनाएं।

9. किसी कमरे में घुसते ही गिनें कि दाईं और बाईं तरफ कितने आदमी हैं।

10. क्रॉसवर्ड पहेली रोज हल करें।


बच्चो, आप सबको स्कूल में, घर में, होमवर्क में न जाने क्या-क्या याद रखना पड़ता है। कभी-कभी लाख कोशिशों के बाद भी कुछ याद नहीं रह पाता। हम इस बार कुछ ऐसे टिप्स लेकर आए हैं, जो आपकी याददाश्त को दुरुस्त करेंगे और इससे आप हमेशा पढ़ाई में अव्वल रहेंगे। बच्चो संस्कृत में एक सुभाषित है-

काग चेष्टा, बको ध्यानम्‌,

श्वान निद्रा तथैव च

अल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंचलक्षणम्‌।

इसका मतलब है विद्यार्थियों में पांच गुण होने चाहिए। सबसे पहले हमें इन गुणों को समझना है। काग या कौए की तरह प्रयास करें। बको यानी बगुले की तरह एकाग्रता रखें, कुत्ते की तरह चौकन्नी नींद हो, खाना सीमित हो और सुख-सुविधाओं का भोगी न हो।

- पढ़ाई के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें।

- संतुलित भोजन करें। भोजन सुपाच्य हो।

- खाली पेट कभी न रहें। अधिक भूख से सिरदर्द रहता है व कुछ याद नहीं होता।

- तली हुई, चटपटी चीजें कम से कम खाएं।

- देर रात तक न पढ़ें।

- हमेशा 8 घंटे की नींद अवश्य लें।

- खाना खाने के तुरंत बाद पढ़ाई के लिए न बैठें।

- सुबह-शाम सैर पर जरूर जाएं।

- गुस्सा कम करें, खुश रहें।

- किसी भी विषय को थोड़े-थोड़े अंतराल में पढ़ें।

- लिखकर, बोलकर, पढ़कर सभी तरीकों से याद करने की कोशिश करें।

- जिस भी विषय को याद करें, पूरी रुचि के साथ करें।

- याद करते समय, पहले याद की गई चीजों से उन चीजों को जोड़ते जाएं। मस्तिष्क में एक विचार से दूसरा विचार जुड़ता है तभी याददाश्त बनती है।

- पढ़ाई का एक समय तय कर लें, ताकि उस समय आपका मस्तिष्क पहले से कहीं तेजी से काम करें।

मस्तिष्क के दो भाग होते हैं-दायां और बायांदायां मस्तिष्क शरीर के बाएं अंगों के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।बायां मस्तिष्क शरीर के दाएं अंगों के संचालन में अहम है।

- बायां मस्तिष्क कल्पनाशील होता है। यह विचारों को मनमाने ढंग से चित्र व रंगों की मदद से याद रखता है। बायां मस्तिष्क तर्क को स्थान देता है। अच्छी याददाश्त के लिए दाएं व बाएं मस्तिष्क का सही समन्वय होना जरूरी है।

- इजिप्ट के बादशाह नासर के पास 20 हजार गुलाम थे। यह माना जाता है कि नासर को इन सभी गुलामों के नाम, जन्म स्थान, जाति, आयु और उन्हें पकड़े जाने की तारीख याद थी। नासर को उन गुलामों के बारे में यहां तक याद था कि किस गुलाम को कहां से खरीदा गया है।

- शतरंज जादूगर अमरीकन खिलाड़ी हैरी नेल्सन एक साथ बीस खिलाड़ियों की चालें याद रख सकते थे।

- डेनमार्क के एक बैंक में आग लग जाने पर ग्राहकों के बही-खाते और उनकी जानकारियां जब जल गईं, तो बैंक के ही एक क्लर्क ने 3000 ग्राहकों के नाम, पते और जमा धनराशि सही-सही बता दी।

- बि्रटिश संग्रहालय के अध्यक्ष रिचर्ड मारग्रेट कुर्सी पर बैठे-बैठे संग्रहालय की लाखों पुस्तकों के नाम, प्रकाशकों के पते और उनकी विषय वस्तु तक याद रखते थे।


-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

असली परीक्षा तो माता-पिता की है




क्या इन दिनों आपके घर का माहौल बदला हुआ है? बच्चों की परीक्षा ने आपको टेंशन में डाल दिया है। बच्चे क्या पढ़ें, कैसे पढ़ें, क्या खाएं, क्या पिएं, कब सोएं, कब जागें- ढेरों सवाल आपके दिमाग में भी घूमते रहते हैं। घूमने भी चाहिए। अरे भई! आप बच्चों के माता-पिता जो हैं। इन दिनों आपके बच्चे ही इम्तहान नहीं दे रहे, बल्कि आप भी परीक्षा दे रहे हैं जनाब!

मधु, निशा, अनन्या और माधुरी शाम के समय बतिया रही थी। चारों के बच्चों के एग्जाम चल रहे हैं। चारों इन दिनों अपने बच्चों को लेकर काफी पशोपेश में हैं। सब अपना-अपना दुखड़ा एक-दूसरे को सुनाने लगती हैं। मधु कहती है, 'मेरी बेटी ने तो इन दिनों खाना-पीना बिल्कुल छोड़ दिया है।' इस पर माधुरी बोलती है, 'मेरा बेटा रोहित तो हमेशा टेंशन में रहता है कि अच्छे नंबर आएंगे भी या नहीं।' अनन्या की अलग ही परेशानी है। उसका बेटा इन दिनों ठीक से सो ही नहीं पा रहा है। निशा कहती है, 'मेरी बिटिया तो चौबीसों घंटे किताबों के चिपकी रहती है, ना हंसती है, ना बात करती है।' चारों सोचती हैं कि हमें बच्चों को किसी डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। चारों सहेलियां अपने बच्चों की समस्याएं आपस में बांट ही रही थी कि उनकी डॉक्टर सहेली हेमलता आती है और उनकी बातों में शामिल हो जाती है। उनकी बातें सुनकर हेमलता कहती है, 'तुम यूं ही घबराती हो। बच्चों में एग्जाम के दिनों में ये समस्याएं आ सकती हैं। डॉ. के पास जाने के बजाय तुम्हें ही कुछ करना चाहिए। तुम्हें समझना चाहिए कि अब बच्चों की परीक्षा के साथ-साथ तुम्हारी भी परीक्षा है।
जी हां, हेमलता सही कह रही हैं। एग्जाम के दिनों में सभी मांओं की हालत इन चार सहेलियों जैसी हो जाती है। पर परीक्षा की इस घड़ी को सिर्फ अपने बच्चों की परीक्षा ना समझें, यह समय आपके लिए भी किसी परीक्षा से कम नहीं है। बच्चों की एग्जाम की टेंशन को थोड़ी सी समझदारी से सुलझाया जा सकता है।

माता-पिता ही सर्वश्रेष्ठ काउंसलर
एनसीईआरटी से ट्रेनिंग प्राप्त काउंसलर गीतांजलि कुमार का कहना है, 'परीक्षा के दिनों में एक बच्चे के लिए माता-पिता ही सबसे अच्छे काउंसलर साबित हो सकते हैं। मां-पिता बच्चे को नजदीक से जानते हैं और उसकी भावनाओं को अच्छे से समझ सकते हैं। अगर बच्चे को कोई भी परेशानी महसूस हो, तो माता-पिता को खुद आगे होकर बच्चों से बात करनी चाहिए।' माता-पिता को बच्चों के सामने एक दोस्त की भूमिका निभानी होगी, तभी बच्चे एग्जाम के डर के बारे में उनसे बातचीत कर पाएंगे। माता-पिता को बच्चे को यकीन दिलाना चाहिए कि परीक्षाएं जीवन-मरण का प्रश्न नहीं हैं। बच्चों में भरोसा पैदा करने के लिए उन्हें याद दिलाना चाहिए कि उन्होंने पूरी साल पढ़ाई की है और अब एग्जाम भी अच्छे ही होंगे। साइकेट्रिस्ट डॉ. रेशमा अग्रवाल का मानना है, 'परीक्षा के दिनों में अगर पूरा परिवार बच्चे के साथ रहेगा, तो उसे रिलेक्स महसूस होगा और उसमें एंग्जाइटी भी पैदा नहीं होगी।'

नाक का सवाल नहीं
चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. अंजलि मुखर्जी का कहना है, 'माता-पिता को अपने बच्चे की एग्जाम को नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए।' बच्चे पर कभी प्रेशर ना बनाएं कि फलां से ज्यादा नंबर आने चाहिए या फलां का पेपर तो बहुत अच्छा हुआ है। पेपर देने के बाद अपने बच्चे से यह कभी नहीं पूछें कि कितने नम्बर आएंगे? बच्चा अगर अपने दोस्त के साथ पढ़ाई करने जाता है, तो उस पर शक न करें। करियर, सोसाइटी, नौकरी की बातों को अच्छे नंबर्स के साथ जोडक़र पेश न करें। बच्चों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उन्हें बताएं, 'अभी तो बहुत समय है। तुम, कर सकते हो।' बच्चों को अपनी पढ़ाई और एग्जाम के अच्छे अनुभवों के किस्से सुनाएं। इससे बच्चों को लगेगा कि मम्मी-पापा ने भी तो एग्जाम दी है। वे सही ही सलाह दे रहे हैं। एग्जाम के दिनों में बच्चों को कभी पढ़ाई के विषय में अपमानित न करें। बच्चों में असुरक्षा की भावना को पनपने की बजाय उनकी हर बात को ध्यान और धैर्य से सुनें। माता-पिता को बच्चों को एग्जाम के दिनों में गहरी सांस लेने व छोडऩे की सलाह देनी चाहिए। सबसे सही और उपयुक्त बात तो यही है कि बच्चों को आप पर पूरा यकीन हो जाए और वे कहने लगें, 'मुझे कोई टेंशन कैसे हो सकती है, मेरे मम्मी-पापा मेरे साथ जो हैं।' तभी आप भी इस एग्जाम में पास माने जाएंगे।

तैयार रहें आप भी
परीक्षा के दिनों में माता-पिता को बच्चे की दिनचर्या सामान्य बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। काउंसलर बिंदु प्रसाद कहते हैं, 'एग्जाम के दिनों में अपने बच्चों को समझाएं, कि वे अपनी नियमित दिनचर्या में कतई फेर-बदल न करें। सामान्य दिनों की तरह ही हल्का-फुल्का समय मनोरंजन के लिए भी निकालें।' माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों का स्टडी रूम व्यवस्थित रूप से जमा दें। एग्जाम हॉल में ले जाने वाली जरूरी चीजों को नियत स्थान पर रखें। माता-पिता को चाहिए, एग्जाम के दिनों में बच्चा साफ कपड़े पहने, ताकि उसका तन-मन अच्छा रहे और पढ़ाई ध्यान से कर पाएं। पढ़ाई की जगह हवादार हो और कमरे में में पर्याप्त रोशनी हो। परीक्षाओं के दिनों में मम्मी-पापा को भी टीवी कम ही देखना चाहिए, ताकि उनके बच्चों का ध्यान ना भटके।
डाइट कंसलटेंट आरती शाह का मानना है कि परीक्षा के दिनों में बच्चों को आयरन और प्रोटीन से भरपूर भोजन खिलाना चाहिए। बच्चों को वसा युक्त, तला-भुना और गरिष्ठ भोजन नहीं दें। साथ ही माता-पिता को यह भी ख्याल रखना चाहिए कि बच्चे को लगातार और थोड़ा-बहुत खाने को देते रहें। ज्यूस और ठंडा पानी भी पिलाते रहना चाहिए। द्गयूस में अगर थोड़ा नमक मिलाकर देंगे, तो बच्चों के शरीर में नमक की कमी भी नहीं होगी। सबसे जरूरी बात है कि एग्जाम के दिनों में बच्चों को याददाश्त बढ़ाने वाली दवाइयां कतई न दें। बच्चों को खुद पर विश्वास बनाए रखने की सलाह दें। बच्चों को देर रात तक पढ़ाई की राय देने से भी बचें। हां! सुबह जल्दी जगाकर उन्हें कुछ देर टहलने को कहें और फिर पढ़ाई की बातें करें। उनके कोर्स को और पेपर पैटर्न को आप भी समझने की कोशिश करें। अगर बच्चे के मन में परीक्षाओं से संबंधित कोई सवाल है, तो उसे टालें नहीं, उसका सही जवाब दें।
-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

24 October 2008

आई है दिवाली

आज समय किसी के पास नहीं है। तो हाइटेक जमाने में दीपावली पूजन के लिए पंडितजी को खोजने की भी जरूरत नहीं।

महानगर में एक पंडितजी है दीनानाथ जी। अब भई दीपावली का समय है तो श्रेष्ठ चौघड़ियों के हिसाब से हर कोई फटाफट और सटीक समय पर दीनानाथजी को अपने साथ ले जाना चाहता है। दीनानाथजी भी चाहते हैं कि हर यजमान की इच्छा पूरी हो। समझ में नहीं आ रहा, कैसे इस समस्या से निजात पाएं। इसके लिए काम आया केबल नेटवर्क। केबल नेटवर्क की मदद से दीनानाथजी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग की और सारव् यजमान उनके बताए अनुसार उपयुक्त मुहूर्त में पूजा का मार्गदर्शन लेते रहे। पंडितजी के बताए अनुसार मंत्र पढ़ते लोग खुशी-खुशी महालक्ष्मी की आराधना करते रहे।

आगे पढ़ें के आगे यहाँ


बदलते समय और लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर अब बाजार में दीपावली पूजन का ऑडियो कैसेट भी मिल रहा है। इन कैसेटों में पूजा के मंत्र और विधान दोनों हैं। कई कैसेटों के साथ तो पूजन सामग्री भी मिल रही है। बाजार में इस तरह की थाली उपलब्ध है, जिन्हें तुरंत खरीदें और पूजा करना शुरू कर दें। इस थाली को गेरू,चंदन, गोटा-सितारव् और कोैड़ियों से सजाया गया है और इसमें लक्ष्मी-गणेश, दीपक, लौंग, कपूर, खील-बताशे, रोली, मौली सब कुछ मौजूद हैं।
अब तो बाजार में बहीखाते के विकल्प के रूप में बोनचाइना की खिलौनानुमा किताब भी मिलने लगी है। इसमें एक पेज पर गणपति बने हैं, तो दूसरे पर लक्ष्मीजी के मंत्र। इस तरह देखा जाए, तो पूरा बाजार ही आपकी सुविधा के लिए तैयार खड़ा है।
-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

22 October 2008

सबको राम-राम राम।



आई है दिवाली आई है दिवाली
आंख में पानी, दिल है खाली।

दुनिया में हडकंप मचा है
लक्ष्मी रूठी कैसी सजा है।

बैंक हुई कंगाल हैं
बड़े-बड़े बदहाल हैं।

भारत में है राज का राज
भाषा में हो मराठी का साज।

दीए नहीं अब दिल जलते हैं
देशभक्त अब हाथ मलते हैं।

आई है दिवाली आई है दिवाली
देश-उपवन का खो गया माली।

चंद्रयान आगे बढ़ रहा
खाने को निवाला नहीं रहा।

मन को रोशन कैसे करें अब
उम्मीदों का तेल घट रहा अब।

चारों ओर चुनाव हैं
बातों का सैलाब है।

आई है दिवाली आई है दिवाली
असली माल लगता है जाली।

हर घर हर मन हर लौ रहे चमकती
ना हों कहीं आहें सिसकती।

रहे उजाला चारो ओर
चाहे अमावस हो या भोर।

दिल में सच्ची खुशी बसी हो
मुट्ठी में उम्मीद कसी हो।

आई है दिवाली आई है दिवाली
तन-मन-धन की भागे कंगाली।
-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

07 October 2008

हौसलों के पंख सपनों की उड़ान

ग्रामीण महिलाएं ले रही हैं छोटे-छोटे ऋण और संवार रही हैं अपना हुनर।
चारों ओर धूल-मिट्टी के गुबार हैं, पर चेहरे पर हौसलों की मुस्कान साफ नजर आती है। मुश्किलें लाखों हैं, पर मंजिल पाने का यकीन है। हर तरफ आत्मविश्वास और खुशियों की यह बयार आई है महिलाओं को मिलने वाले ऋण से। अब महिलाएं अपने हुनर को आसानी से पेशा बना सकती हैं। चाहे कशीदाकारी हो, मिट्टी के बर्तन बनाना या दूध बेचने के लिए चाहिए भैंस, हर उस चीज के लिए ऋण मिलेगा, जिससे आप हुनर को बढ़ाना चाहती हों। पहले जिस महिला को पति ने छोड़ दिया, उसी महिला ने जब खुद का काम शुरू किया तो पति उससे मिन्नतें कर रहा है कि वह उसके साथ रहना चाहता है। यह है करामात महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता की। इस अभियान में महिलाओं के लिए वरदान साबित हुआ है एसकेएस माइक्रो फाइनेंस। आज ये महिलाएं अपने कौशल को बाजार में बेचने में माहिर हैं और अपने काम को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।

खुशहाली है चहुंओर
बात करते हैं ज्ञानादेवी से। कशीदे का काम सीखा, तो लगा कि खुद ही क्यों न कपड़ों पर कशीदाकारी कर बाजार में सप्लाई करव्। एसकेएस से 8 हजार का ऋण लिया और कशीदे की मशीन खरीद ली। अगले 4 हजार रुपयों से कपड़ा खरीदा और फिर बाजार में कशीदा कढ़ा हुआ कपड़ा सप्लाई करने लगी। पति का भी पूरा साथ मिला। आज ज्ञानादेवी के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने जाते हैं। पूरा परिवार इस बात से बेहद खुश है कि पति-पत्नी मिलकर कमा रहे हैं और अपने परिवार को खुशहाली की राह पर ले जा रहे हैं। शुरू में उन्हें लगा था कि कैसे मैं खुद का काम करूंगी, पैसा कैसे चुकाऊंगी। पर धीरव्-धीरव् आत्मविश्वास बढ़ा और आज वह अपने काम को और बढ़ाने की सोच रही हैं।

बड़ा अच्छा लगता है
आज से तीन साल पहले विमला देवी ने 8 हजार रुपए का ऋण लिया और उन पैसों से कपड़े खरीदकर गांव-ढाणियों में बेचने लगीं। पहले पति की पान की दुकान थी, पर अब वह बंद हो गई। अब विमला ही पूरे घर की जिम्मेदारियां निभाती है। खुद के बूते काम कर रही हैं, तो सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। अब वे अपने जैसी महिलाओं को जागरूक करके आत्मनिर्भर बनने का सबक देती हैं। घर पर पोते-पोतियों के बीच घिरी रहने वाली विमला बाजार में एक समझदार दुकानदार की भूमिका बखूबी निभा रही हैं।

औरों को भी काम
जरदोजी का काम मंजु को उसके पति ने सिखाया। पहले पति यह काम किया करते थे। एक हादसे में उनकी उंगली कट गई। फिर परिवार की जिम्मेदारी मंजु ने संभाल ली और एसकेएस से ऋण लेकर बाजार में सप्लाई शुरू कर दी। अब तो उसने अपने बढ़ते काम को देखकर लोगों से भी काम करवाना शुरू कर दिया है। पहले खुद सक्षम हुईं, अब आस-पास के लोगों को रोजगार मुहैया करा रही हैं।

खुद का पैसा ही भला
मोहिनी देवी ने अपनी सास से गर्मी में हाथ से झलने वाला पंखा बनाना सीखा था। खजूर के पेड़ की पत्तियों से बनने वाले पंखों के लिए पहले साहूकार से पैसा लेना पड़ता था। पैसों को लेकर उस पर दबाव बना रहता था। ऐसे में लगा कि अगर खुद ही कहीं से पैसों का इंतजाम कर लें, तो कितना अच्छा हो। एसकेएस की योजना ठीक लगी। अब खुद पंखा बनाकर सप्लाई करती हूं, तो बचत भी ज्यादा होती है।

बड़ा आकाश- सबका साथ
विक्रम अकूला ने एसकेएस माइक्रो फाइनेंस की स्थापना इसी मकसद से की थी कि दूर-दराज गांवों की वे महिलाएं जो न तो द्गयादा पढ़ी-लिखी हैं और न ही बाहरी दुनिया से परिचित, उन्हें रोजगार के लिए पैसे की कमी आड़े नहीं आए। इसलिए वे सिर्फ महिलाओं को ऋण देते हैं और वह भी बिना किसी कागजी कार्रवाई और गारंटर के। अगर महिला गरीब है, तो अपने आस-पड़ोस की पांच महिलाओं के साथ मिलकर ऋण ले सकती है। एक साल में दो हजार से शुरू कर 16 हजार रुपए तक लिए जा सकते हैं। जिस भी महिला में कमाने की चाह है, अब उसे सिर्फ ऋण लेना है और शुरू कर देना है अपना काम। ऋण लौटाना भी है बहुत आसान। हर हफ्ते होने वाली महिलाओं की मीटिंग में आसान सी रकम देते जाइए और 50 हफ्तों में पूरी रकम अदायगी। आज एसकेएस 17 से ज्यादा राज्यों में काम कर रहा है। राजस्थान में इसकी शुरुआत जुलाई 2006 में हुई और आज 18 जिलों के 1460 गांवों में हजारों महिलाओं का भविष्य संवारने में मदद कर रहा है। महिलाओं को ऋण देने के लिए जो लोग यहां काम कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर लोग गांव और इन्हीं महिलाओं के परिवारों से हैं।
-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

06 October 2008

उजाला जिंदगी में


अलवर की दलित महिलाएं अमरीका के मशहूर स्टैच्यू आफ लिबर्टी के नीचे खुशी की इजहार करते हुए।



अंधेरी रात में जिस तरह एक नन्हा सा सितारा आसमान को रोशनी से लबरेज कर देता है। उसी तर्ज पर राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की मैला ढोने वाली महिलाओं ने भी अब इस कुप्रथा को छोड़कर अपनी जिंदगी को खुशियों से लबरेज कर लिया है।
कुछ लोग जिंदगी में सब कुछ सह लेते हैं जबकि कुछ बदलाव का बीड़ा उठाते हैं। उन्हीं में शुमार हैं राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की मैला ढोने वाली दलित महिलाएं। आज वे सदियों पुरानी बेड़ियों को उतारकर फैंक चुकी हैं और अपनी आगे की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए जुटी हैं। उनके सूने जीवन में रोशनी की किरण लेकर आई सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन की 'नई दिशा'। 'नई दिशा' ने सही मायनों में इन दलित महिलाओं के जीवन को नई दिशा दी है।
'नई दिशा' से जुड़कर ये महिलाएं आत्मनिर्भर बनने के लिए सिलाई, कढ़ाई, फूड प्रोसेसिंग, ब्यूटी केयर, सॉफ्ट टॉयज और बत्तियां बनाने का प्रशिक्षण ले रही हैं। नई दिशा ट्रेनिंग कम प्रोडक्शन सेंटर से इन महिलाओं की ओर से तैयार सामान गुड़गांव, अलवर और तिजारा के बाजारों में जाता है। इसके अलावा दिल्ली से आयात किए कपड़े आते हैं, जिन पर ये महिलाएं कढ़ाई का काम करती हैं। यह सामान विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। संस्था इन महिलाओं को 2 हजार रुपए मासिक भत्ता भी देती है।


गुमनामी से रैंप तक का सफर
हाल ही न्यूयार्क स्थित जनरल एसेंबली में दो जुलाई को आयोजित कैटवॉक में अलवर की इन दलित महिलाओं को शामिल होने का अवसर मिला। वहां 36 महिलाओं के समूह में से 11 महिलाओं ने भारत के मशहूर मॉडलों के साथ रैंप पर कदम से कदम मिलाते हुए कैटवॉक किया। इस आयोजन की तैयारी इन महिलाओं ने काफी पहले से शुरू कर दी थी। कैटवॉक के दौरान पहनी कारीगरी की गई बॉर्डर की नीली साड़ियां माइकल जैक्सन के कपड़े डिजाइन करने वाले फैशन डिजाइनर अब्दुल हल्दार की देखरेख में तैयार किए गए।



होंगे कामयाब एक दिन
न्यूयार्क में अपनी सफलता का परचम लहराकर दुनिया में भारत का नाम रोशन करने वाली ये महिलाएं वहां से लौटने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज हैं और भविष्य संवारने के मकसद से उन्होंने अपने-अपने हुनर के दम पर काम को आगे बढ़ाने की ठान ली है।

हमने कर दिखाया
अब हम सभी अपना अलग व्यवसाय खोलना चाहती हैं। ब्यूटी केयर का प्रशिक्षण लेने के बाद मैं भी अपनी अन्य बहनों के साथ मिलकर अपना ब्यूटी पार्लर खोलना चाहती हूं। प्रेसीडेंट के पद पर होने के नाते मैला ढोकर जीवन बिताने वाली देशभर की अन्य महिलाओं को इस घृणित कार्य से मुक्ति दिलाने का प्रयास करूंगी।
- उषा चौमर, प्रेसीडेंट, सुलभ इंटरनेशनल मिशन फाउंडेशन, अलवर



सिलाई और कढ़ाई से लेकर साड़ियों और सूट पर सितारे सजाने का काम मुझे अच्छा लगता है। अब मैं अपना बुटिक खोलना चाहती हूं। किसी नए काम को शुरू करने में परेशानी तो आएगी, पर हम भी पूरी तरह से तैयार हैं।
- लक्ष्मी नंदा, अलवर

सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक से बातचीत के कुछ अंश-
- आपको इन दलित महिलाओं को मैला ढोने जैसी कुप्रथा से छुटकारा दिलाने की प्रेरणा कहां से मिली?
यह तो गांधीजी का सपना था। हमने तो बस प्रयास किए हैं। कुछ समय पहले अलवर जाना हुआ, वहां कुछ महिलाओं को सिर पर मैला ले जाते हुए देख बहुत दुख हुआ। उनसे बात करने की कोशिश की, तो शुरुआत में कोई भी तैयार नहीं हुई। सबने चेहरे पर लंबा घूंघट डाला हुआ था। काफी समझाने पर इनमें से एक बात करने के लिए तैयार हुई।



-पर क्या अपने काम को छोड़ देने के लिए वे सहजता से तैयार हो गई?
जब इस काम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्वीकारा कि यह काम गंदा और अपमानजनक है। लेकिन काम नहीं किया, तो खाएंगे क्या? इस पर हमने कहा कि खाना हम देंगे, तुम काम छोड़ दो। काफी समझाने पर सब तैयार हो गईं।



- इसके बाद आपका अगला कदम क्या रहा?
इन महिलाओं के लिए अलवर शहर में ही सुलभ इंटरनेशनल की ओर से संचालित 'नई दिशा' नामक सेंटर खोला गया। शुरुआत में तीन महीनों तक नकद राशि दी गई और साथ में इनको शिक्षित करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इन्हें संस्था में ही सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी केयर, अचार, पापड़ आदि का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।



भविष्य के लिए क्या योजनाएं हैं?
इनके समूह में तीन तरह की महिलाएं हैं। पहली वे, जिनमें नेतृत्व की क्षमता है। ऐसी महिलाएं भविष्य में अपना कामकाज ठीक से संभाल लेंगी। दूसरी ऐसी महिलाएं हैं, जो नौकरी कर सकने योग्य हैं। इन महिलाओं को उनकी रुचि के अनुसार अन्य जगहों पर बतौर प्रशिक्षण नौकरी के लिए भेजा जाएगा, जिसका खर्चा सुलभ वहन करेगा। तीसरी वे महिलाएं हैं, जो केवल सामान तैयार कर सकती हैं, लेकिन बेच नहीं सकतीं। इनके लिए सामान बेचने के लिए मार्केटिंग आदि की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ ही दलित परिवारों के बच्चों के लिए 1 अप्रेल 2009 तक स्कूल की योजना है और पतियों को रुचि के आधार पर ड्राइविंग, बिजली आदि प्रशिक्षण दिए जाने हैं।


...और एक नया कदम
केंद्र सरकार के एक आकलन के मुताबिक भारत में 3.42 लाख लोग सिर पर मैला ढोने के काम से जुड़े हुए हैं। इनके लिए सन्‌ 2007 में सरकार ने प्रधानमंत्री स्वच्छकार पुनर्वास एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम को राजस्थान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति वित्त एवं विकास निगम संचालित करता है। अलवर में 'सुलभ इंटरनेशनल' के 'नई दिशा' कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए निगम ने टोंक में भी 190 महिलाओं को स्वरोजगार प्रशिक्षण देने का जिम्मा सुलभ इंटरनेशनल को सौंपा। निगम की महाप्रबंधक शुचि शर्मा के मुताबिक राजस्थान में पुनर्वासित करने योग्य हथ सफाईकर्मी लगभग 1326 हैं। मार्च, 2009 तक इन सभी को पुनर्वासित करने की योजना है। निगम हथसफाई कर्मियों को मैला ढोने का काम छोड़कर दूसरा काम शुरू करने के लिए ऋण भी देता है।
अलवर की तर्ज पर सुलभ इंटरनेशनल ने टोंक में वहां के मशहूर नमदों के निर्माण, आरी-तारी साड़ियां और सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण देना शुरू किया। सुलभ इंटरनेशनल की सलाहकार सुमन चाहर के मुताबिक कई टीमों ने उन लोगों की काउंसलिंग की। उन्हें मैला ढोने के काम को छोड़ने के लिए तैयार किया। आज वे खुद अपने पैरों पर खड़ी हैं और कमा रही हैं। टोंक के 'नई दिशा' सेंटर पर साक्षरता कार्यक्रम, साफ-सफाई, टीकाकरण और बैंकिंग के बारे में जानकारी दी जाती है। सुबह 9 बजे से 4 बजे तक प्रशिक्षण दिया जाता है। यह एक साल का प्रशिक्षण कार्यक्रम है। इस दौरान उन्हें एक हजार रुपए प्रतिमाह भत्ता भी दिया जाता है। कमाई की बचत के गुर भी सिखाए जाते हैं। समय-समय पर महिला उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। इन लोगों की मॉनिटरिंग भी की जाती है कि परिस्थितिवश ये दुबारा मैला ढोने के काम से तो नहीं जुड़ गई हैं।

मेरा नाम- मेरा काम
मैंने 'नई दिशा' में आरी-तारी और कशीदे का काम सीखा है। पहले मुझे घबराहट होती थी कि कैसे इस नए काम को सीख पाऊंगी। पर अब सारा काम मैं बहुत सफाई से करती हूं। अभी मुझे 6 माह का ही समय हुआ है, पर अब लगता है कि खुद के बूते कुछ कर रही हूं। अब तो घर वाले भी साथ देते हैं। सेंटर पर काम का ऑर्डर आता है, इससे आय में भी इजाफा हो रहा है।
- सुनीता, उम्र 27 वर्ष, टोंक



मैंने नई दिशा से सिलाई का काम सीखा है। इसकी बदौलत अपने तीन बच्चों को पाल रही हूं। अब मैं वापस उस घृणित काम को करना नहीं चाहती। समाज में महिलाओं की स्थिति बदल रही है। ऐसे में हमें मौका मिला है, तो हम भी बता देना चाहते हैं कि हम किसी से कम नहीं। अब हमारे काम को लेकर कोई हमसे घृणा नहीं कर सकता।
- उगंता, उम्र 32 वर्ष, टोंक




-आशीष जैन के साथ अलवर से ऋचा माथुर

...आगे पढ़ें!

03 October 2008

गांधी बाबा क्या कहते हो



जबसे जाना तुझको बाबा

सपनों से तुम लगते हो।


गांधी बाबा आज का भारत देखके

क्या कहते हो... क्या कहते हो।


बम फट गया... कोई लूट गया...गांधी तेरे देश में।

चारों ओर लुटेरे बैठे हैंसाधुओं के भेष में।


भय, भुखमरी, भ्रष्टाचार

क्या हैं इन पर तेरे विचार।


ना कोई अब सोच है

सिर्फ बचा अब जोश है ।


कोई नहीं है तेरा साथी

सब पूछें अब मजहब और जाति।


आरक्षण की हवा आ रही

सबको लगता नई दवा आ रही।


सत्य, अहिंसा बकवास है

दौलत की बस आस है।


सिद्धांत सब झूठे हैं।

गांधी से सब रूठे हैं।


गांधी बाबा... गांधी बाबा

क्या कहते अब बोलो।


एक अकेले तुम थे गांधी

लाए थे भारत में आंधी।


आज चाहिए सौ-सौ गांधी

तभी हो सकेगा सपना पूरा।


गांधी बाबा वापस आओ

नई राह फिर-फिर बतलाओ।


देश प्रेम की बयार फैलती जाए

तभी गांधी का जन्मदिन याद आए।


-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

01 October 2008

स्वाद से हुआ नाम रोशन


मिलिए 65 हजार रेसिपी बनाकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने वाली भोपाल की कृष्णावेणी से।

कुछ महिलाओं के हाथ में ऐसा जादू होता है कि उनकी बनाई रेसिपीज का हर कोई दीवाना बनकर रह जाता है। ऐसे में अगर कोई हमें कहे कि हिंदुस्तान में एक ऐसी भी महिला है जो हजार नहीं, दस हजार नहीं पूरे 65000 रेसिपीज बनाने में माहिर हैं तो एक बारगी तो विश्वास ही नहीं होता। जी हां, भोपाल शहर में रहने वाली 66 साल की कृष्णावेणी मुदलियर एक ऐसी ही शख्सियत हैं। खाना बनाने में बेहद पारंगत कृष्णावेणी एक आम गृहिणी ही हैं पर अपने शौक के चलते आज इनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है। बकौल कृष्णावेणी 'मैंने बहुत कम उम्र से ही भोजन बनाना शुरू कर दिया था। मेरी रूचि बचपन से ही खाना पकाने में रही। इसी का नतीजा है कि मेरा नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ है।' कृष्णावेणी बताती हैं कि जब भी मेरी इच्छा कोई रेसिपी बनाने की होती थी तो मैं उसे बनाकर ही दम लेती थी। आज कृष्णावेणी भारत के विभिन्न राज्यों की रेसिपी बना लेती हैं साथ ही इटेलियन, चाइनीज और बर्मा के व्यंजन भी बना सकती हैं। बर्मा के बारे में कृष्णावेणी बताती हैं कि मैं कुछ दिन बर्मा रही थी तो मैंने झट से बर्मा की डिशेज बनाना सीख लिया। उनका दावा है कि उनकी बनाई रेसिपीज आस्ट्रेलिया, यूरोप और अफ्रीका में भी मशहूर हो रही हैं। कृष्णावेणी कहती है कि मैं अपनी रेसिपीज में खासतौर पर स्वाद को लेकर बेहद सतर्क रहती हूं। मसालों में थोड़ी सी ऊंच-नीच रेसिपी का स्वाद बिगाड़ सकती है। मैं अपनी रेसिपी में कैलोरी की मात्रा का भी खास खयाल रखती हूं। कृष्णावेणी के बेटे ओमप्रकाश मुदलियर बताते हैं रोज हमें स्वादिष्ट भोजन खाने को मिलता है। इससे अच्छी बात हमारे लिए और क्या होगी? जब मां को खाने के लिए कोई पुरस्कार मिलता है तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। हालांकि सन्‌ 2006 से कृष्णा का नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है। पर अब गिनीज बुक में मेरी मां का नाम आने से उन्हें पूरी दुनिया जानेगी। अभी वे बाकी विश्व रिकॉर्ड में प्रयासरत हैं। अभी तक सबसे ज्यादा रेसिपीज बनाने का रिकॉर्ड एक ब्रिटिश महिला के नाम था जिसे 3000 रेसिपीज बनाना आता था, इसकी तुलना में कृष्णावेणी की रेसिपीज की संख्या वाकई कई गुना ज्यादा थी। कृष्णावेणी की बहू कारतीखासी मुदलियर कहती हैं कि मेरी सासू मां की बनाई रेसिपीज पूरी दुनिया में चमकनी चाहिए। उनके हुनर का इस्तेमाल रोजगार सृजन में भी किया जा सकता है। इन सब बातों से एक बात तो स्पष्ट है कि कृष्णावेणी का नाम गिनीज बुक में दर्ज होना हर भारतीय गृहिणी के भोजन से लगाव का पुरस्कार माना जा सकता है।
- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

19 September 2008

कितने रीयल रियलिटी शो

टेलीविजन का एक रियलिटी शो..... डिजाइनर परिधान में लकदक, स्टाइलिश ढंग से नाचते-गाते, अपने हुनर को पेश करते बच्चे। लगता है वाकई क्या खूब हैं ये नौनिहाल। पर चकाचौंध में डूबे इस बचपन की असलियत कुछ और ही है। बच्चों की मासूमियत और भोलेपन के पीछे कौन-सा दर्द छुपा है, आइए, जानने की कोशिश करते हैं।

पहला वाकया- एक बांग्ला टीवी चैनल के रियलिटी शो के दौरान जजों ने 16 साल की शिंजिनी सेनगुप्ता की इतनी आलोचना की कि वह सदमे से लकवे का शिकार हो गई।

दूसरा वाकया- झारखंड के 12 साल के दीपक तिर्की ने दर्द की गोलियां खा-खाकर अपनी प्रस्तुति दी।

तीसरा वाकया- सारेगामापा लिटिल चैंप्स की विजेता 12 वर्षीय अनामिका चौधरी की तबियत कार्यक्रम के दौरान बिगड़ गई। क्योंकि उसके साथ कार्यक्रम में भाग ले रही दूसरी लड़की स्मिता नंदी के पिता को बेटी के शो से बाहर होने पर दिल का दौरा पड़ गया था।

इन दिनों छोटे परदे पर बच्चे छाए हुए हैं। कोई नाचता है, तो कोई आवाज से सबको झुमाता है। उनकी हर अदा से दर्शक खुश हैं। प्रोडक्शन हाउस और टीवी चैनल वालों के लिए बच्चे एक नए प्रॉडक्ट की तरह साबित हुए हैं। वे बड़ों की तरह हर लटके-झटके से लैस हैं। वे डिजाइनर मुस्कान देते हैं, शेर सुनाते हैं। इन बच्चों को देखकर एक बार भी नहीं लगता कि ये वाकई 'बच्चे' हैं। माता-पिता की आकांक्षाओं को पूरा करने के चलते बच्चे अब बचपन, अपनी मासूमियत को भुलाकर गलाकाट प्रतिस्पर्धा का अंग बन गए हैं। मेकअप, चमकदार कपड़े और बड़ों जैसे लटके-झटके के बीच बच्चे बार-बार यही कह रहे हैं कि हमें लगातार काम करना है और थकना नहीं है। मानो थक गए, तो हार गए। इस तरह की सोच से वे खुद को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। देर रात तक चलने वाले शूटिंग शिड्यूल्स के बीच इन बच्चों के अति उत्साह को संभालने वाला कोई व्यक्ति नहीं होता। इससे स्वास्थ्य और मनोदशा पर विपरीत असर होता है। माता-पिता और दर्शक समझते हैं कि बड़ा समझदार बच्चा है। कोई मासूम ब्रिटनी स्पीयर्स बनना चाहती है, तो कोई सोनू निगम। ऐसा नहीं कि इसके लिए वे मेहनत नहीं कर रहे हैं या उनमें प्रतिभा की कमी है। पर कहीं न कहीं लगता है कि इन सबके बीच बचपन कहीं खोता जा रहा है।

नहीं चलेगी मनमानी
ऐसे ही एक रियलिटी शो 'छोटे उस्ताद' के दौरान एक दर्शक द्वारा खास मेहमान इमरान हाशमी को चूमने से खफा होकर एक संगीत निर्देशक कार्यक्रम से वॉकआउट कर गए। उनके मुताबिक बच्चों के कार्यक्रम में इस तरह की हरकत गलत है। टीवी चैनलों और रियलिटी शोज को मशहूर बनाने के लिए बच्चों पर जिस तरह मनमानी की जाती है, उसकी तरफ सरकार का कोई ध्यान नहीं है। शिंजनी की घटना के बाद थोड़ी सी हलचल जरूर हुई है। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी कहती हैं, 'देश में जानवरों तक के लिए कानून है। सरकार इस तरह के बालश्रम को नजरअंदाज नहीं करेगी और टीवी पर नाच-गानों के ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों के काम के तौर-तरीके तय करेगी। सरकार ने इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सौंपी है और शोज में बच्चों के काम के तौर-तरीकों की जांच के लिए 10 सदस्यीय कमेटी बना दी है।' आयोग की सदस्या संध्या बजाज का कहना है, 'हम इन शोज में जजों के लिए सीमाएं निर्धारित करेंगे और यह पता करेंगे कि इनसे बच्चों की पढ़ाई पर कितना असर हो रहा है। अगर बच्चों पर दबाव में माता-पिता की भूमिका भी पाई गई, तो उनसे भी सवाल किए जाएंगे।' इस पूरी कवायद पर बचपन बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक कैलाश सत्यार्थी का कहना है, ' सरकार चाहे, तो बालश्रम कानून के तहत रियलिटी शोज के लिए अध्यादेश भी लाया जा सकता है। बालश्रम अधिनियम 1986 में 10 अक्टूबर 2006 को संशोधन किया गया। इसके अनुसार घरेलू बाल मजदूरी, ढाबों के साथ-साथ मनोरंजन क्षेत्र में भी बच्चों से काम नहीं लिया जा सकता और ये शोज भी बच्चों को मनोरंजन का एक जरिया ही बनाते हैं, तो फिर इन पर तुरंत रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है?'

हर चीज है बिकाऊ
कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि आज बाजार में हर चीज बिकाऊ है। प्रोडक्शन हाउस और चैनल वाले बचपन का बाजारीकरण करने पर तुले हैं। उन्हें घंटों कोल्हू के बैल की तरह जोता जा रहा है। रियलिटी शो वाले बच्चों और माता-पिता को रातों-रात सुपर स्टार बनने के सपने दिखा रहे हैं। इससे बच्चे भी अपनी सुध-बुध खोकर घंटों खुद को परव्शान करके भी शूटिंग और रियाज कर रहे हैं। उन्हें शूटिंग के दौरान घंटों काम करना पड़ता है, जिससे वे न समय पर खा पाते हैं और न सो पाते हैं। हकीकत यह है कि 100 में से एक बच्चा जीतता है, बाकी 99 बच्चे हार जाते हैं। कुछ बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं, जिसका गहरा असर भी हो सकता है। दो बच्चों में तुलना भी नुकसान पहुंचाती है। मसलन 'देखो, ये कितना होशियार बच्चा है। तुम भी ऐसा ही किया करो।' आम बच्चों पर कुछ खास करने का दबाव बढ़ता जाता है।

हमारे साथ ऐसा नहीं
चैनल नाइन एक्स पर चल रहे शो 'चक दे बच्चे' में भाग ले रही उदयपुर की निष्ठा के पिता ए. के. नाग चौधरी कहते हैं,' हमने अपनी बच्ची को खेल भावना से कार्यक्रम में भाग लेने की सलाह दी है। हमने उसमें कभी भी कंपीटिशन की भावना पनपने नहीं दी। उसकी मम्मी मुंबई में चौबीसों घंटे उसके साथ रहती है और उसे संबल देती है। उसके लिए तो यह एक सीखने का मंच साबित हो रहा है। हां, अगर कुछ शोज में गलत हो रहा है, तो यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।' उनकी कही इन सारी बातों में कितनी सच्चाई है, यह तो वही जानते हैं। अब तो निष्ठा चक दे बच्चे की विजेता भी बन चुकी हैं।

बुरा असर सेहत पर
वरिष्ठ मनोचिकित्सक आर. के. सोलंकी बताते हैं कि अठारह घंटे काम करने वाले बच्चों पर दिन-रात अच्छे प्रदर्शन का बोझ रहता है। यह बात वे किसी से नहीं कह पाते और मन ही मन परेशान रहते हैं। शोज में होने वाली प्रतियोगिताओं को जीवन-मरण का प्रश्न बनाने की बजाय प्रतिभा निखार के मौके के रूप में देखना चाहिए। अगर बच्चे लगातार ऐसे तनाव भरे माहौल में रहते हैं, तो उन्हें हिस्टीरिया के दौरे तक पड़ सकते हैं। बच्चों को चाहिए कि वे बिना किसी दबाव के रिलेक्स होकर अपनी स्वाभाविक कला का प्रदर्शन करें और झूठे दिखावे से बचें।

आजाद छोड़ दो
समाजशास्त्री ज्योति सिडाना कहती हैं कि माता-पिता बच्चों को बिना किसी मेहनत के रातों-रात लखपति-करोड़पति बनाने के सपने दिखा रहे हैं। यह पूरी तरह गलत है। माता-पिता को इन कार्यक्रमों में बच्चों को भेजने से पहले उनकी प्रतिभा का सही आकलन करना चाहिए। इसी के साथ दूसरा पहलू यह भी है कि आजकल बच्चे जल्दी ही किसी भी बात को दिल से लगा लेते हैं । ऐसे में अगर उन्हें धैर्य का गुण सिखाया जाए, तो जिंदगी में कभी कोई मुश्किल नहीं आएगी। बच्चे पर किसी खास काम के लिए दबाव डालने की बजाय उनकी प्रतिभा को नैसर्गिक रूप से बढ़ने का मौका देना चाहिए। बच्चों में नैतिक मूल्य सिखाने पर ही वे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के काबिल बन पाएंगे और किसी भी तरह के तनाव से दूर रहेंगे।

'सरकार इस तरीके के बालश्रम को नजरअंदाज नहीं करेगी और टीवी पर नाच-गानों के ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों के काम के तौर-तरीके तय करेगी। हमने इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सौंपी है। आयोग ने रियलिटी शोज में बच्चों के काम के तौर-तरीकों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है।' - रेणुका चौधरी, केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री

'सरकार चाहे, तो बालश्रम कानून के तहत रियलिटी शोज के लिए अध्यादेश भी लाया जा सकता है। बालश्रम अधिनियम 1986 में 10 अक्टूबर 2006 को संशोधन किया गया। इसके अनुसार घरेलू बाल मजदूरी, ढाबों के साथ-साथ मनोरंजन क्षेत्र में भी बच्चों से काम नहीं लिया जा सकता और ये शोज भी बच्चों को मनोरंजन का एक जरिया ही बनाते हैं, तो फिर इन पर तुरंत रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है?' - कैलाश सत्यार्थी, राष्ट्रीय संयोजक, बचपन बचाओ आंदोलन
-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!