29 April 2009

रोमांच की सैरगाह


सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां
जिंदगी गर मिल भी जाए तो नौजवानी फिर कहां।
सैर करने में क्या रस छुपा है, यह इस्माइल मेरठी ने अपने शब्दों में बखूबी बयां किया है। यायावर राहुल सांकृत्यायन ने तो घर-बार छोड़कर दुनिया की सैर की ठान ली थी। घूमने पर लिखना शुरू किया, तो घुमक्कड़ शास्त्र से हमें रूबरू करवाया। हमने भी सोचा क्यों ना गर्मियों की छुट्टियों में घूमने-फिरने का मजा लिया जाए। हमने जब ट्यूरिज्म में एडवेंचर का तड़का लगाया, तो आंखों के सामने पैराग्लाइडिंग के लिए खुले बीलिंग के मैदान थे, दूसरी ओर फूलों की घाटी से आती सुगंध। मन किया अपने आराध्य को याद करने का, तो बद्रीनाथ और अमरनाथ तक पहुंच गए। सूरज सिर पर चढ़कर तांडव करने लगा, तो स्कूबा डाइविंग के बहाने पानी की गहराइयों में तांकझांक कर ली। थोड़ी मस्ती और रंगीनी की चाह वाले क्रूज तलाशने लगे। स्वर्ग की सुंदरता के मुरीद श्रीनगर को खोजने लगे, वहीं रफ्तार पसंद साथी रिवर रॉफ्टिंग के लिए गंगा किनारे शिवपुरी को रवाना हो लिए। इस सबके लिए ट्यूर पैकेजेज और कुछ खास जानकारी वाली वेबसाइट्स ने हमारी सारी उलझन एक बार में हल कर दी। कुछ का हौसला चट्टान की तरह मजबूत था, तो वे रॉक क्लाइंबिंग में मशगूल रहे। कुछ जोग फॉल इस तमन्ना के साथ पहुंचे कि गिरते पानी में कुदरत के खूबसूरत रंगों को तलाश सकें। आखिर में लगा कि ये पूरी दुनिया ही एक सैरगाह है और हम मुसाफिर। हम रूक कैसे सकते हैं। तो फिर आप भी तैयार हो जाइए हमारे साथ कुदरत के नायाब रोमांच से हाथ मिलाने के लिए। अब सोचिए मत, आलस छोड़कर हमारे साथ निकल पड़िए रोमांच की सैरगाह पर।

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