09 September 2008

कम्प्यूटर शायरी

ऐसा भी नहीं है कि आई डॉन्ट लाइक योअर फेस

लेकिन दिल के कम्प्यूटर में, नहीं है इनफ डिस्क स्पेस


तुमसे मिला मैं कल, तो मेरी दिल में हुआ इक साउण्ड

लेकिन आज तुम मिली तो कहती हो, फाइल नॉट फाउण्ड


लोग कहते हैं प्यार में नींद नहीं आती

अरे कोई हमसे भी प्यार कर लो, हमें नींद बहुत आती है


खुदा से स्कूटर मांगा, कार दी अपार्टमेंट मांगा, बंगला दिया

खुदा से दोस्त मांगा, तुम्हें दिया ऐसा जुल्म मुझ पर क्यों किया


मेरे मरने के बाद मेरे दोस्त यूं आंसू ना बहाना

अगर मेरी याद आए तो,सीधे ऊपर चले आना

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08 September 2008

कलम के बूते


कलम के बूते

आइए जानते हैं आजादी के बारे में कुछ खास लोगों की राय।


गुलाम का न दीन है, न धर्म है, गुलाम के रहीम हैं न राम हैं।

- देवराज दिनेश (भारत मां की लोरी)


क्या मैं अपने ही देश में गुलामी करने के लिए जिंदा रहूं? नहीं, ऐसी जिंदगी से मर जाना अच्छा। इससे अच्छी मौत मुमकिन नहीं।

- प्रेमचंद (गुप्तधन)


पिंजरा तो सोने का होने पर भी पिंजरा ही रहेगा।

- रांगेय राघव (कल्पना)


जंगल में रहने वाले पक्षी की अपेक्षा पिंजड़े का पक्षी ही अधिक फड़फड़ाता है।

- शरतचंद्र (बड़ी बहन)


जितने भी बंधन है, वे सब अबलों के ही अर्थ,बंधन बंधन ही है, तोड़ो यदि तुम सबल समर्थ।

- मैथिलीशरण गुप्त (द्वापर)


विचार और कार्य की स्वतंत्रता ही जीवन, उन्नति और कुशल-क्षेम का एकमेव साधन है।

- विवेकानंद


जो स्वतंत्र है, सारी प्रकृति उसकी अभ्यर्थना करती है, संपूर्ण विश्व उसके आगे सिर झुकाता है।

-स्वामी रामतीर्थ


स्वाधीनता सद् गुणों को जगाती है, पराधीनता दुगुर्णों को।

-प्रेमचंद(कायाकल्प)


स्वतंत्रता का मर्म समता है। विषमता में स्वतंत्रता भंग हो जाती है।

डॉ. रामानंद तिवारी


स्वतंत्रता अनुभव करना ही जीवन है। पराभूत सजीव होकर भी मृत है।

- यशपाल (दिव्या)


बेड़ियों में बंद राजा होने से तो आसमान का स्वतंत्र कबूतर होना ज्यादा अच्छा है।

- चंद्रप्रभ (प्याले में तूफान)


आजादी, सुख-समृद्धि, प्रेम, आशा और विश्वास ही भोर है।

- रामदरश मिश्र (जल टूटता हुआ)

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06 September 2008

उम्र 70 की हौसले 17 के


शख्सियत- वैलेंटिना तेरेश्कोवा

उम्र- 70 साल

संघर्ष- बचपन में ही सिर से पिता का साया उठ गया। पढ़ाई के साथ-साथ एक टैक्सटाइल फैक्ट्री में भी काम किया।

उपलब्धि- पहली महिला अंतरिक्ष यात्री होने का गौरव प्राप्त।
'अब मैं मंगल ग्रह पर जाना चाहती हूं। फिर चाहे मेरे लिए यह यात्रा एक ही ओर की क्यों ना हो।' यह सुनीता विलियम्स या किसी नवयुवक की चाह भर नहीं है। यह उम्मीद है 70 साल की वैलेंटिना तेरेश्कोवा की। उम्र चाहे 70 की हो, पर उनके हौसले तो 17 साल के युवा को भी मात करते हैं। कौन हैं वैलेंटिना?
ये कोई आम महिला नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला हैं। जहां एक ओर सन्‌ 1963 में रूस की महिला वैलेंटिना तेरेश्कोवा अंतरिक्ष में कदम रख चुकी थीं, वहीं अमरीका सन्‌ 1983 तक किसी महिला को अंतरिक्ष में नहीं भेज पाया। तेरेश्कोवा का यह अभियान बेहद गुप्त रखा गया था। रूस चाहता था कि अमरीका से पहले अंतरिक्ष में महिला भी वही भेजे। रूस के ही यूरी गागरिन ने अंतरिक्ष में सबसे पहले कदम रखा था।
जब तेरेश्कोवा प्रशिक्षण लेने जा रही थी तो उन्होंने अपनी मां से भी यह बात छुपा रखी थी। जब रव्डियो पर यान की उड़ान की घोषणा हुई, तो उनकी मां को पता लगा कि उनकी बेटी तो अंतरिक्ष की सैर पर जा रही है।
6 मार्च, 1937 को यारोस्लाव के निकट एक छोटे से गांव बोल्शोय मास्लेनिकोवो में वैलेंटिना का जन्म हुआ। बचपन में ही इनके सिर से पिता का साया उठ गया। इनके पिताजी रूसी सेना में टैंक लीडर थे, वे द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ाई करते हुए मारव् गए। 18 साल की उम्र में पढ़ाई के साथ-साथ वह एक टैक्सटाइल फैक्ट्री में भी काम किया करती थी। 22 साल की उम्र में पैराशूट से पहली छलांग लगाने वाली तेरेश्कोवा ने स्कूल खत्म करने के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। 24 साल की उम्र में उन्होंने अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए एप्लाई किया।
तेरेश्कोवा अपने पिता से बेहद प्यार करती थी। जब वे अंतरिक्ष यात्रा से लौटीं तो लोगों ने पूछा, 'ये धरती आपका आभार कैसे प्रकट करे ?' तो जवाब में तेरेश्कोवा बोली, 'बस वो जगह बता दो, जहां मेरे पिताजी लड़ाई में शहीद हुए थे।' उनकी इच्छा पूरी हुई और उस जगह को खोजकर उनके पिता का स्मारक बनाया गया। बकौल तेरेश्कोवा 'सन्‌ 1961 में मेरा चयन हुआ था। उस समय महिला पायलट बहुत कम हुआ करती थी। इसलिए यान उड़ाने का मौका पेराशूट उड़ाने वाली महिलाओं को मिला।' चयन के बाद 15 महीने प्रशिक्षण में गुजरव्। बहुत मुश्किलों और अंतरिक्ष में रहने के कठोर अभ्यास से तेरव्श्कोवा को गुजरना पड़ा। इस अभ्यास में स्पेस क्रॉफ्ट चलाना, झटकों को बर्दाश्त करना, अकेले रहना और भारहीनता के अनुभवों से गुजरना वाकई बुरी तरह थका देने वाली प्रक्रिया थी।
पर तेरेश्कोवा ने कभी हार नहीं मानी और हर चुनौती का डटकर सामना किया। इस सबके बाद आखिरकार वह दिन आया 16 जून 1963, जब वोस्तोक-6 को उड़ान भरनी थी। तेरेश्कोवा की बरसों की साधना पूरी होने वाली थी। वह बहुत उत्तेजक माहौल था। यह दो यानों का संयुक्त मिशन था। 14 जून 1963 को वोस्तोक-5 भी छोड़ा गया था। इस मिशन में दोनों यानों को एक ही समय में कक्षा में रहना था। दोनों यानों से अंतरिक्ष यात्रियों ने आपस में संपर्क भी किया। यान से तेरेश्कोवा ने धरती के 48 चक्कर लगाए और 70 घंटे 50 मिनट तक अंतरिक्ष में रहीं। उन्होंने वहां धरती के कई चित्र लिए जो बाद में वैज्ञानिकों के काफी काम में आए। तेरेश्कोवा कहती हैं,'यह 70 घंटे और 50 मिनट का समय मेरव् जीवन का सबसे रोचक समय था।'
वोस्तोक-6 के वापस लौटने पर यान से बाहर निकलने के बाद तेरेश्कोवा ने 20 हजार फीट की ऊंचाई से पैराशूट के माध्यम से जमीन पर पहुंची। लोगों ने पूछा कि अंतरिक्ष में जाकर कैसा लगा? तो उनका जवाब था 'मैं अपना काम पूरी शिद्दत से कर रही थी और मैं यान की सुरक्षा को लेकर भी चिंतित थी। इसके सबके बावजूद मैं भारहीनता का आनंद ले रही थी।' वापस लौटने पर उसके साथी उसे चिढ़ाया करते थे कि उसे तो आंद्रे निकोलायेव से शादी कर ही लेनी चाहिए। निकोलायेव भी अंतरिक्ष यात्रियों की जमात में एक अकेले ऐसे शख्स थे, जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई थी। 3 नवंबर 1963 को तेरेश्कोवा और आंद्रे शादी के बंधन में बंध गए। इनकी बेटी का नाम था ऐलेना। ऐलेना दुनिया की पहली ऐसी महिला हैं जिनके मम्मी-पापा दोनों अंतरिक्ष की सैर करके आ चुके हैं।
तेरेश्कोवा ने ना केवल अंतरिक्ष विज्ञान में नाम कमाया, बल्कि उनमें सामजिक उत्थान की भी भावना थी। वे कई सालों तक सुप्रीम सोवियत की सदस्य रहीं। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेलसन मंडेला ने उन्हें शताब्दी के नेता के पुरस्कार से सम्मानित किया। तेरेश्कोवा को अपने देश से बेहद लगाव है और वे रूस में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रोत्साहन के लिए भी काम कर रही हैं।
-आशीष जैन

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गांधी की अब चल रही है आंधी



गांधी आज भी हैं!
कुछ समय पहले कहा जाता था कि गांधी के विचार सिर्फ किताबों तक सिमटकर रह गए हैं। नई पीढ़ी गांधी का सिर्फ नाम याद रखेगी। पर अब यह बात गलत साबित होती दिखाई दे रही है। आज जहां विश्व में हिंसा और आतंकवाद बढ़ रहा है वहां गांधीवाद उसे खत्म करने के लिए एक प्रभावकारी विकल्प के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। तकनीक से लेकर मैनेजमेंट तक गांधीजी के विचार उपयोगी साबित हो रहे हैं।


1.रामाल्लाह में फिलीस्तीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अब्बास ने रिचर्ड एटेनबरो की फिल्म गांधी में गांधी का किरदार निभाने वाले बेन किंग्स्ले के साथ 'गांधी' फिल्म देखी और फिलिस्तीन व इजरायल के बीच की समस्या को शांति से सुलझाने की बात की।

2. लखनऊ में लोगों ने शराब की दुकानें बंद करवाने के लिए सबको गुलाब भेंट किए और शराबबंदी का आह्वान किया।

3. 7 जनवरी, 2008 को नासिक की केंद्रीय जेल से एक कैदी लक्षण तुकाराम गोले ने महात्मा गांधी की आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' पढ़कर अपने अपराधों को कबूल कर लिया।

4. मिस्त्र के कई राजनीतिक दल मिलकर पूरी तरह अहिंसक 'काफिया' आंदोलन चला रहे हैं।


5. मलेशिया में हिंदू अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठन हिंदू राइट्स एक्शन फोर्स 'हिंदराफ' के तत्त्वावधान में आगामी 16 फरवरी, 2008 को कम से कम दस हजार मलेशियाई भारतीय वहां की संसद के बाहर लोगों को लाल व पीले गुलाब भेंट कर अपने शांतिपूर्ण संघर्ष को प्रदर्शित।


गांधी को अब दुनिया आशा की नजर से देख रही है। उनके विचारों से पूरी दुनिया अपनी- अपनी समस्याओं का समाधान खोज रही है। उनके सत्य और अहिंसा के प्रयोग अपनाने में लोगों को रुझान तेजी से बढ़ रहा है। फिर चाहे वह तकनीक हो, लड़ाई हो या तीव्र प्रतिक्रिया। हर जगह गांधी का असर देखा जा रहा है। गांधी आज हमारव् बीच नहीं हैं, पर उनकी बातें और सिद्धात जीवंत हैं। ईमानदारी से अगर यह कहा जाए, तो गांधीजी अभी जिंदा हैं, दुनिया के विचारों, कर्मों और बातों में।


युवाओं ने थामे अहिंसा के झंडे
आज हिंसा से त्रस्त पूरी दुनिया को अहिंसा ही एकमात्र रास्ता नजर आ रहा है। अनेक हिंसाग्रस्त इलाकों में युवा छात्र-छात्राएं अहिंसा का प्रचार-प्रसार करने में जुटे हुए हैं। इसी का उदाहरण हैं 24 साल की अमरीकी छात्रा रशेल कोरी। उन्होंने इजरायल की नीतियों के विरोध में गाजा पहुंचकर 16 मार्च 2003 को इजरायली सेना के समक्ष मानव शृंखला बनाई। वे खुद सेना के बुलडोजर के आगे खड़ी हो गईं। जार्जिया की तलीबसी स्टेट यूनिवर्सिटी के छात्रों ने अहिंसक 'कामरा' आंदोलन चलाकर राष्ट्रपति एडवर्ड शेवरनात्जे को हटा दिया। यह आंदोलन गुलाबी क्रांति के नाम से मशहूर हुआ। सर्बिया के राष्ट्रपति मिलोसेविक को हटाने के लिए यूक्रेन के युवाओं ने अहिंसक 'पोरा' आंदोलन चलाया और अपने मकसद में सफल रहा। मिस्त्र के कई राजनीतिक दल 'काफिया' आंदोलन चला रहे हैं। यह पूरी तरह एक अहिंसक आंदोलन है। यह आंदोलन 25 साल से ज्यादा राष्ट्रपति पद पर आसीन मुहम्मद होस्नी मुबारक को हटाने के लिए चल रहा है।


गांधी को समझो, बनो मैनेजमेंट के गुरु

आज मैनेजमेंट के क्षेत्र के महारथी मान रहे हैं कि प्रबंधन के क्षेत्र में आने वाले युवाओं के लिए गांधी, उनके सिद्धातों और कार्यशैली को जानना जरूरी है। गांधीजी ने अंग्रेजों की गुलामी के दिनों में अपनी और देश की समस्याओं के लिए जिस तरह से प्रबंधन की तकनीक का सहारा लिया, वह कमाल की है। मैनेजमेंट गुरु सी के प्रहलाद कहते हैं कि गांधी ने देश को आजाद कराने के लिए चलाए गए आंदोलन के समय उपजी समस्याओं से लड़ने के लिए नए-नए तरीकों का इस्तेमाल किया। चाहे वह विदेशी कपड़ों की होली जलाना हो, सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या फिर सन्‌ 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन। उनका हर काम नए तरीकों से लैस होता था। इनकी मदद से उन्होंने भारत को आजादी दिलाने में कामयाबी हासिल की। आज भारत को दुनिया में सुपरपावर बनाने के लिए भी उन्हीं की तरह नए प्रयोग करने पड़ेंगे, क्योंकि वे तरीके आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने परंपराओं को तोड़ा। उन्हें पता था कि अंग्रेजों के खिलाफ बल प्रयोग की लड़ाई की बजाय आम लोगों के प्रतिकार की शक्ति को इस्तेमाल करना होगा। उन्होंने कभी संसाधनों के अभाव की शिकायत नहीं की। आज के युवाओं को भी अपने सीमित संसाधनों में ही सफलता को हासिल करना होगा। मैनेजमेंट विशेषज्ञ व्यापार में गांधी के नैतिकता, ईमानदारी और सत्यता के गुणों को अपनाने की सलाह देते हैं। अर्थशास्त्री अरिंदम चौधरी अपनी पुस्तक 'काउंट योअर चिकन्स बिफोर हैच' में विस्तार से बताते हैं कि गांधीजी के नेतृत्व में कुछ खास बात थी। वे इन तरीकों को कॉर्पोरव्ट क्षेत्र में लागू करने के तरीके की भी बात करते हैं। चौधरी कहते हैं कि गांधीजी ने भारत की संस्कृति के अनुरूप ही आंदोलन चलाया। हमें भी प्रॉडक्ट को समय, काल और संस्कृति के अनुरूप ढालकर ही पेश करना होगा। गांधीजी अपने अनुयायियों की बात बहुत ध्यान से सुनते थे। इसलिए हमें भी अपने उपभोक्ता की समस्याओं को करीब से जानना चाहिए। 'स्मार्ट मैनेजर ' की मैनेजिंग एडिटर डॉ. गीता पीरामल कहती हैं, 'गांधीजी की पीआरशिप गजब की थी। कल्पना कीजिए अगर गांधीजी दांडी यात्रा पर अकेले जाते, तो उसका कोई खास असर नहीं होता। उन्होंने दांडी यात्रा के लिए लोगों को अपने साथ जोड़ा।' आज के युवाओं को गांधीजी की जनसंपर्क की इस विधा को अपने जीवन में उतारना चाहिए। सत्याग्रह भारत का सबसे पहला लोकप्रिय ब्रांड था। गांधीजी ने 'यंग इंडिया' और 'हरिजन' में विज्ञापन दिया तथा लोगों से प्रस्तावित आंदोलन का नाम पूछा। उसमें लिखा था- नाम स्वीकार हुआ, तो 'यंग इंडिया' का एक साल का सब्स्क्रिप्शन मुफ्त मिलेगा। एक गुजराती सज्जन ने आंदोलन का 'साद आग्रह' मतलब 'सच्चाई का आग्रह'। छात्रों ने इससे सीखा कि किस तरह नए उत्पाद की ब्रांडिंग की जाए और ब्रांडिंग के लिए जनता का फीडबैक कितना जरूरी है। बोस्टन कनसल्टिंग ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरू ण मारिया कहते हैं कि व्यापार में हर किसी का सशक्तिकरण महत्त्वपूर्ण है। उत्पाद से लेकर उपभोक्ता तक। गांधीजी ने देश के लिए सेवा के लिए भारत के लोगों को एक नया मंच दिया। हर व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता संग्राम में एक भूमिका तय की।

छाया गांधीगिरी का जादू

आज गांधीगिरी मात्र एक शब्द नहीं आंदोलन बन गया है। मुन्नाभाई ने जब 'लगे रहो मुन्नाभाई' में पहली बार इसका इस्तेमाल किया, तो किसी ने सोचा नहीं होगा कि इस शब्द को इतनी शोहरत मिलेगी। आज http://www.gindhigiri.org/ नाम की एक वेबसाइट चल रही है। जहां आप अपनी समस्या, विचार या नया प्रयोग लोगों के साथ बांट सकते हैं। ऑरकुट पर भी गांधीगिरी नाम से एक कम्यूनिटी बनी हुई है। यहां तक कि इंटरनेट पर सबसे मशहूर वेबसाइट वीकीपीडिया पर भी गांधीगिरी के विषय पर पृष्ठ प्रकाशित है।लखनऊ में लोगों ने शराब की दुकानें बंद करवाने के लिए सबको गुलाब भेंट किए। इंदौर में मकर संक्रांति के दिन ट्रेफिक पुलिसकर्मियों ने लोगों को यातायात के नियम सिखाने के लिए उन्हें तिल के लड्डू भेंट किए और 15 यातायात नियमों को न तोड़ने की गुजारिश की। मलेशिया में हिंदू अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठन 'हिंदराफ' के तत्त्वावधान में 16 फरवरी, 2008 को कम से कम दस हजार मलेशियाई भारतीय वहां की संसद के बाहर लोगों को लाल व पीले गुलाब भेंट कर अपने शांतिपूर्ण संघर्ष को प्रदर्शित किया। जब आपातकाल के दौर में पाकिस्तान में न्यूज चैनलों पर रोक लगी, तो जियो टीवी के हामिद मीन ने कार्यालय के बाहर ही कार्यक्रम पेश करने लगे। आपातकाल को वापस लेने के लिए भी गांधीगिरी का सहारा लिया गया और सड़कों पर फूल लेकर इसका विरोध करने लगे।अमरीका में भी ग्रीन कार्ड आवेदकों ने अमरीकी इमीग्रेशन एजेंसी को हजारों फूल भेजे ताकि एजेंसी उन नीति पर दुबारा गौर करे, जिससे उनके स्थायी निवास में परेशानी आ सकती है। गांधीजी को विदेशी खेल पसंद नहीं थे। वे कबड्डी जैसे खेलों को बढ़ावा देने के पक्ष में थे। पर आज भारतीय टैस्ट क्रिकेट टीम के कप्तान अनिल कुंबले खुद गांधीगिरी दिखा रहे हैं और ब्रैड हॉग की खुद के लिए और महेन्द्र सिंह धोनी के लिए कहे अपशब्द की आईसीसी को की गई शिकायत वापस ले ली। चाहे पाकिस्तान हो या हिंदुस्तान हर जगह लोग अपनी समस्याओं से निपटने के लिए गांधीगिरी का सहारा ले रहे हैं। टैफिक पुलिस वाले लोगों को गुलाब का फूल देकर नियम पालन का सबक दे रहे हैं। जब पाकिस्तान में जियो टीवी के कार्यालय को सील कर दिया गया, तो टीवी सैट्स को लेकर बाहर बैठ गए।

तकनीक को भाते साबरमती के संत

गांधीजी कुटीर उद्योग को बढ़ावा देना चाहते थे। वे तकनीक पर आश्रित नहीं होने की सलाह दिया करते थे। पर आज तकनीक के पर्याय इंटरनेट पर गांधी की सर्च सबसे द्गयादा होती है। गूगल पर अगर गांधी के लिए सर्च करते हैं ,तो 1.94 करोड़ रिजल्ट मिलते हैं। लोग उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जान रहे हैं। गांधी के नाम, विचार और जीवन पर कई वेबसाइट्स हैं। कुछ लोकप्रिय वेबसाइट हैं- http://www.mkgandhi.org/,
फिल्मों में भी बहार

फिल्मों में गांधी के स्वरूप को देखकर सारी दुनिया जान पाई कि एक व्यक्ति ने किस तरह ब्रिटिश शासन के कभी न डूबने वाले सूरज को अस्त कर दिया। रामाल्लाह में फिलीस्तीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अब्बास ने रिचर्ड एटेनबरो की फिल्म गांधी में गांधी का किरदार निभाने वाले बेन किंग्स्ले के साथ 'गांधी' फिल्म देखी। उन्होंने कहा कि इजरायल और फिलिस्तान के बीच शांति से हल खोजा जाए। सन्‌ 1962 में बनी फिल्म नाइन आवर्स टू रामा (जॉन राबसन), गांधी(रिचर्ड एटेनबरो, 1982), मेकिंग ऑफ द महात्मा(श्याम बेनेगल, अंग्रेजी, 1996), हे राम(कमल हासन, 2000), मैंने गांधी को नहीं मारा(जानू बरुआ, 2005), लगे रहो मुन्नाभाई(राजकुमार हिरानी, 2006) गांधी माइ फादर(फिरोज खान, 2007) जैसी हिंदी फिल्में दुनिया के सामने गांधी के सच्चे स्वरूप को सामने लाने का दावा करती हैं। साथ ही 'लुकिंग एट गांधी' के शीर्षक से सात लघु फिल्में भी बनी हैं। ये फिल्में गांधी के जीवन में आम आदमी को झांकने का मौका देती हैं। बॉम्बे सर्वोदय मंडल ने साल 2007 में छह बड़ी जेलों में गांधी पर आधारित फिल्म 'लगे रहो मुन्नाभाई' का भी प्रदर्शन किया गया। इससे कैदियों के जीवन में सुधार की उम्मीद की जा रही है।

विचारों में समाए
जहां रोम्या रोलां जैसे लेखक और आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिक गांधी पर लिख चुके हैं। अमरीका के इलिनाय के गवर्नर जार्ज रेयान गांधीजी को याद करते हैं। उनके संदेश को दुनिया में फैलाना चाहते हैं। उन्होंने राज्य की जेलों में बंद 167 लोगों की फांसी की सजा माफ कर दी। वहीं विश्व के प्रमुख नोबेल शांति पुरस्कार विजेता भी उन्हें अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते रहे हैं। अमरीका के मार्टिन लूथर किंग गांधी के दर्शन से बहुत प्रभावित थे। तिब्बत के दलाई लामा गांधीजी को अपना सच्चा शिक्षक मानते हैं। म्यांमार की आंग सान सू की ने म्यांमार में सैनिक शासन का अहिंसक विरोध करके खुद को अप्रत्यक्ष रूप से गांधीजी की बेटी साबित कर दिया है। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेल्सन मंडेला भी गांधीजी के आचार-विचार से प्रभावित हैं। मार्टिन लूथर किंग जूनियर से लेकर नेल्सन मंडेला को नोबेल शांति पुरस्कार मिल चुका है। अब ये दुनियाभर में गांधीजी के विचारों को मूर्तरूप देने का काम कर रहे हैं।


साहित्य भी है साधन

गांधी की लिखित पुस्तकों की संख्या कुल मिलाकर चालीस के आसपास है। उनकी प्रमुख किताबों में 'सत्य के प्रयोग', 'अनासक्ति योग', 'मेरे सपनों का भारत', 'पंच रत्न', 'नई तालीम की ओर' और 'आरोग्य की कुंजी' हैं। ये सारी किताबें गुजराती भाषा से हिंदी में अनुवादित हो चुकी हैं। आज भारत का युवा गांधी के विचारों को जानना चाह रहा है। दुनियाभर में उनकी पुस्तकें और विचार धूम मचा रहे हैं। शिकागो विश्वविद्यालय में स्थित पुस्तकालय में छात्र अखबार 'यंग इंडिया' की माइक्रो फिल्म पढ़ रहे हैं। 7 जनवरी 2008 को नासिक की केंद्रीय जेल से एक कैदी लक्ष्मण तुकाराम गोले ने महात्मा गांधी की आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' पढ़कर अपने अपराधों को कबूल कर लिया। बॉम्बे सर्वोदय मंडल ने उसे 'सत्य के प्रयोग' पढ़ने के लिए दी थी। बॉम्बे सर्वोदय मंडल की न्यासी टी आर के सौम्या कहती हैं, 'देशभर की जेलों में अब कैदी गांधीजी की जीवनी की मांग कर रहे हैं।' बॉम्बे सर्वोदय मंडल महाराष्ट्र राज्य में पिछले पांच सालों से जेल में रहने वाले कैदियों के लिए 'गांधी शांति परीक्षा' का आयोजन कर रही है, ताकि कैदियों में भी गांधी और उनके काम के बारे में जागरुकता आ सके।

काम गांधी ने किया जो, काम आंधी न कर सकती - सियाराम शरण गुप्त


'सवेरे के प्रहर में सूर्य नारायण अपना उद्धार करता है, योगारू ढ़ होकर आता है और संध्या के समय शांत होता है। सूर्य सचमुच शांत होता है?मैं मरूंगा, तब भी शांत थोड़े ही होने वाला हूं।' - 'गांधीः जैसा देखा-समझा' से


-आशीष जैन

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04 September 2008

हर रिश्ते को संजोया है मैंने



अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हमने एक मध्यवर्गीय महिला की डायरी के कुछ पन्ने पलटे। डायरी के इन पन्नों से उसकी पूरी जिंदगी हमसे बात कर रही थी। एक पन्ने पर निगाह पड़ी, तो पता लगा कैसे गुजरते हैं एकढ महिला के रोज के 24 घंटे। आइए जानते हैं-
दिनांक 22-08-2008 समय 11.30 P.M.
रात की खामोशी पसरी हुई है। मैं अपने कमरे में अकेली बैठी हूं। दिन भर की भागदौड़ के बाद खुद को अकेली महसूस कर रही हूं। ना जाने क्यों मुझे लगता है कि जिंदगी हर रोज एक बंधे-बंधाए रास्ते पर दौड़ती जा रही है। पर मैं यह क्यों भूल रही हूं कि इसी के सहारे मेरा परिवार, मेरे रिश्ते हर रोज एक नई जिंदगी पाते हैं। मेरी खुशियां, मेरे सपने, मेरी आस्था, विश्वास, उमंग सब इसी घर, इन्हीं रिश्तों के चौतरफा तो सिमटे हुए हैं। मेरा विश्वास, मेरी ताकत और मेरे अरमानों से ही तो मेरा घर महका करता है।
हर रोज की तरह आज भी सुबह 5.30 पर बिस्तर छोड़ दिया था मैंने। मुन्ना और 'वो` तो सात बजे तक उठेंगे, तब तक क्यों ना, कपड़े ही धोलूं`, यही सोचकर फटाफट कपड़े भिगो दिए। पानी में जब अपनी सूरत देखी, तो खुद से सवाल किया, 'अरे रूपा! तू कितनी बदल गई है?` अपने परिवार के सुख-दुख में खुद को ही भुला दिया।` मैं सोच ही रही थी कि इतने में पड़ोस की रीना ने आवाज दी, 'रूपा! नल आ गए हैं, पानी भर ले। जल्दी कर, वरना नल चले जाएंगे।` पानी के बर्तन लेकर बाहर तक पहुंची, तो याद आया कि मुन्ना स्कूल जाएगा, उसके लिए हलवाई से दूध भी लाना है। पानी घर तक पहुंचाकर फटाफट हलवाई की दुकान तक गई। आधा किलो दूध लिया और घर पहुंचकर भगोनी में गर्म होने के लिए चढ़ा दिया।
इस बीच मुन्ना को जगाया। वो उठने में आनाकानी कर रहा था, मैंने उसे प्यार से समझाया, तो वो मान गया। मैं भी तो अम्मा और बाऊजी को कितना परेशान करती थी। मैंने मुन्ना को नहलाया-धुलाया और दूध पिलाकर चौराहे तक स्कूल-बस तक छोड़ने गई। पति महोदय अभी तक नहीं उठे। साढ़े सात बज गए थे। उन्हें जगाकर मैं खुद नहाने के लिए चल दी। नहाते ही मुझे पूरे घर के लिए नाश्ता तैयार करना था। पिछली शाम को देवरजी कह रहे थे किढ छोले-भटूरे खाऊंगा। इसीलिए रात को ही छोले भिगो दिए थे। अच्छा हुआ, वरना नाराज होते। जेठजी को भी तो छोले की सब्जी अच्छी लगती है। जब तक भाभीजी जीवित थी, वही ख्याल रखती थी। अब तो मुझे ही उनका देखभाल करनी होगी।
मम्मीजी गठिया की मरीज हैं। डॉक्टर ने उनके खान-पान का खास ख्याल करने को कहा था, इसलिए उन्हें खिचड़ी भी बनानी थी। नाश्ता तैयार कर ही रही थी कि पापाजी के कुछ मित्र आ गए। मैंने सोचा आए हैं, तो चाय तो पीकर ही जाएंगे। इसलिए दूसरी गैस पर चाय के लिए पानी चढ़ा दिया। इस सबके बीच मैं भूल गई थी कि पड़ोस में राधा भाभी की लड़की की सगाई है। उसमें भी शामिल होना है। मैंने घड़ी की तरफ देखा। आठ बजने वाले थे। ऐसा लगा कि घड़ी की सुइयों और मेरा कोई मुकाबला चल रहा है। नाश्ते की टेबल पर सभी इकट्ठे हो चुके थे। सबको अपने-अपने काम करने थे नाश्ते के बाद। पर मेरे लिए तो उनके कामों में ही खुशी छुपी हुई थी।
नाश्ते का दौर चला, तो एक घंटे तक रसोई संभालनी ही पड़ी। आज शायद सब्जी में मिर्ची ज्यादा थी, इसीलिए ननद उमा खाना बीच में छोड़ कॉलेज के लिए चल दी। मुझे बुरा तो बहुत लगा, पर हो सकता है, मुझसे ही कोई गलती हो गई शायद। जल्दबाजी में मिर्च जरूरत से ज्यादा डल ही गई। सवा नौ बजे तक किचन का काम निपटाया और कमरे में जाकर पति के ऑफिस की ड्रेस पर प्रेस करने लगी। सवा नौ बजे तक उनका टिफिन भी लगाया। मुझे अक्सर दुख होता है कि पति घर का खाना ले जाने की बजाय ऑफिस में ही खाना खाते हैं। इसीलिए उनका पेट खराब रहता है। मेरी तो सुनते ही नहीं। क्या करूं, आखिर पति परमेश्वर जो ठहरे। अच्छे-बुरे की समझ तो है ही। पर मैं क्या करूं ? मुझे तो टेंशन हो जाती है। पति को स्कूटर की चाबी, रूमाल और उनका पर्स लाकर दिया। वे ऑफिस के लिए निकलने वाले हैं। घड़ी पौने दस बजा रही थी।
पति को दरवाजे तक छोड़ने के बाद सोचती हूं, अब झाडू-पौंछे का काम निपटा लूं। इस काम में रोज एक घंटा लग जाता है। घर को साफ रखने की जिम्मेदारी भी तो आखिर गृहिणी की ही होती है। पवित्र घर में ही लक्ष्मी और सरस्वती का वास होता है। मैं घर के दरवाजे पर जाती हूं, तो देखती हूं कि कुछ महिलाएं राधा भाभी के घर जा रही थीं। मैं भी फटाफट तैयार हुई। सवा ग्यारह बजे तक राधा भाभी के घर पहुंची। सगाई का कार्यक्रम खत्म हो रहा था। चलो, मैं कार्यक्रम में शामिल तो हो गई। एक घंटे देर पहुंचूंगी, तो ऐसा ही होगा। मैं सोच रही थी कि सामाजिक सरोकार भी तो महिलाओं को ही निभाने पड़ते हैं।
वहां मुझे अपने दूर के रिश्ते की एक बुआजी मिली। उन्होंने पूछा, 'अरे! रूपा दो साल पहले तेरी शादी हुई थी। दो साल में ही इतना बदल गई है। पहले तू कितना बोलती थी, हंसती थी। आज तो बिल्कुल धीर-गंभीर हो गई है और तुझे ये जल्दबाजी किस बात की है?` बुआजी की बात का मैं कुछ जवाब नहीं दे पाई।
मैं घर आकर सोचने लगी कि क्या वाकई मैं बदल गई हूं? क्या मैं जिंदगी का मतलब भूल गई हूं? दूसरे ही पल सोचा, 'अरे नहीं। मैं तो और अधिक निखर गई हूं, संवर गई हूं। मेरे पति, सास, देवर, जेठ, ननद सभी तो मेरी तारीफ करते हैं। ये सब रिश्ते ही तो मेरी असल ताकत हैं। मुझे औरों से क्या, मेरे अपनों के लिए तो मैं खुशी की वजह हूं। सोचते-सोचते निगाह घड़ी की तरफ गई। मैंने देखा, 'अरे सवा बारह बज रहे हैं। दो बजे तक मुन्ना स्कूल से आएगा। उसके लिए कुछ फल वगैरह बाजार से ले आती हूं। सब्जी भी तो खत्म होने गई है। इसी बहाने राशन भी ले आऊंगी।` मैंने अपना पर्स खोला। उसमें 200 रुपए ही थे। मैंने सोचा, 'मैंने सुबह ही पति से पैसे क्यों नहीं मांगे?` काम के चक्कर में सब भूल जाती हूं। चलो इतने पैसों से ही काम चलाऊंगी। घर से निकलकर रिक्शा पकड़ा और बाजार पहुंची। दाल, चीनी, बेसन तो खरीद लिया। अब क्या रहा? हां! हल्दी भी ले चलती हूं। पिताजी को रोज दूध में दो चम्मच मिलाकर देती हूं। जल्दी ही खत्म हो जाएगी, अच्छा है याद आ गया।
मैं सोच रही थी, 'महिला को कब आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी। इतने खर्चों के बीच इतने से पैसे, कैसे गुजर होगा?` काश मैं भी छोटा-मोटा काम करती और पैसे कमा पाती? सोचते-सोचते मैं सब्जी मण्डी पहुंची। वहां से कुछ फल खरीदकर घर कढी तरफ चल दी। रास्ते में एक मेडिकल की दुकान दिखाई दी। उसे देखकर मुझे मम्मीजी की गठिया की दवा की याद आ गई। बचे पैसों से दवा खरीद ली। सब्जी के थैले से कमर में दर्द हो रहा था। मैंने सोचा घर जाकर कमर दर्द का बाम लगा लूंगी।
इतने में मुझे चेत हुआ, 'दो बज गए हैं, मुन्ना घर आ गया होगा। मुझे याद कर रहा होगा।` मैं तेज कदमों से घर पहुंची। मुन्ना भूख से रो रहा था। मैंने उसके कपड़े बदले। उसके लिए गर्म खाना बनाया और खाना खिलाकर सुला दिया। मैंने सोचा, 'साढ़े तीन बजे तक साड़ी में फॉल लगा लेती हूं, फिर सबके लिए दोपहर की चाय बना दूंगी।` नई फॉल निकालकर मैं साड़ी में फॉल लगाने लगी।
इतने में याद आया कि पति से कह दूं कि ऑफिस से लौटते वक्त वो प्लंबर को अपने साथ ले आएं। नल बहुत दिनों से टपक रहा था। मैंने पति को फोन करके प्लंबर साथ लाने की बात बता दी। मैं सोच रही थी कि हर काम मुझे ही याद रखना होता है। चाय बनाते-बनाते गैस की लौ कम होने लगी थी। मुझे लगा सिलेण्डर अभी बुक करा देना चाहिए। गैस की भी तो कितनी किल्लत चल रही है। मैंने तुरंत गैस एजेंसी को फोन किया और गैस बुक करवाई। इसके बाद मम्मीजी और पापाजी को चाय पिलाई और मुन्ना को जगाकर कुढछ फल खाने को दे दिया। 5 बजे मैंने मुन्ना से कहा, 'अपना होमवर्क निकोलो, मैं करवा देती हूं। मुन्ना ने कहा, 'मैं खेलने जाऊंगा। मैंने कहा, 'नहीं, पहले अपना होमवर्क करो, फिर खेलने जाना।` मैं मुन्ना को होमवर्क कराने लगी। उसका होमवर्क कराते-कराते मैं अपने बचपन में खो गई। बचपन में रंगों भरी दुनिया कितनी प्यारी होती है। कोई चिंता नहीं। सब तरफ मस्ती... बस। मैंने खिड़की से बाहर झांका... सूरज अस्ताचल को जा रहा था। मैंने पूजा की थाली तैयार की और पास के मंदिर में पूजा के लिए पहुंच गई। पड़ोस की उमा, माधुरी, वर्षा और रमा आंटी भी थी। उनसे घर-गृहस्थी को बात कर ही रही थी कि याद आया पतिदेव घर आ चुके होंगे। वे प्लंबर को भी साथ लाने वाले थे।
मैं तुरंत घर पहुंची। पति आ चुके थे। वे प्लंबर को अपने साथ ले आए थे। उन्होंने कहा, 'कहां चली गई थी तुम? मुझे नहीं पता कि कौनसा नल टपक रहा है?` मैं ऊपर की मंजिल पर प्लंबर को ले गई और प्लंबर से नल सुधरवाया। प्लंबर को विदा करने के बाद पति के लिए चाय बनाई। पति का मूड आज शायद कुछ उखड़ा हुआ था। मैंने उनसे पूछा तो वे टाल गए। शायद ऑफिस में बॉस से किसी बात पर खटपट हो गई हो। इस सबके बीच मेरी कमर का दर्द बढ़ता जा रहा था। बाम लगाने की फुर्सत ही नहीं मिल पाई।
साढ़े आठ बजते ही सब लोग टीवी देखने बैठ गए। मैं किचन में ही थी। रात के खाने का इंतजाम करने लगी। मैं सोच रही थी कि मेरा संसार कितना... छोटा होते हुए भी वाकई बहुत विशाल है। इतने में मेरी ननद आई और कहने लगी, भाभी! जल्दी से फर्स्ट एड बॉक्स लाओ। स्कूटी चलाते हुए मैं गिर पड़ी और मेरी अंगुली कट गई है। खून निकल रहा है।` मैं दौड़कर कमरे में पहुंची और फर्स्ट एड बॉक्स से पट्टी निकालकर लाई। मैंने ननद की अंगुली पर पट्टी बांधी। मैंने कहा, संभलकर गाड़ी चलाया करो, अगर ज्यादा चोट लग जाती तो। वो रोने लगी। मैंने उसे चुप कराया। मै सोचने लगी, 'मैंने उसे यूं ही डांटा। मैं सोच रही थी नारी आज समाज में अपनी जगह बना रही है, नित नई ऊंचाईयों को छू रही है। अगर छोटी-छोटी मुश्किलें आती हैं तो उन्हें संभालने में वह खुद सक्षम है।
सवा नौ बजे मैं दुबारा किचन में गई और खाना बनाने लगी। खाने की मेज से आवाज आने लगी 'अरे रूपा! भूख लग रही है, जल्दी खाना लाओ।` मैं तुरंत खाना तैयार करने में जुट गई। सबने खाना खाया और खाने की खूब तारीफ की। मैं बहुत खुश हुई। इसके बाद मैं कमरे में गई और सोने के लिए बिस्तर लगा आई। पतिदेव और मुन्ना आराम करने लगे। मुझे लगा, 'चलो आज का सब काम निपट गया।` इतने में मुझे ध्यान आया, 'बर्तन साफ करना तो मैं भूल ही गई।` मैं वापिस किचन में गई और बर्तन साफ करने लगी।
सब काम निपटाकर मैं कमरे में आई। पतिदेव और मुन्ना सो चुके थे। लाइट अभी जल रही थी। मुझे खुशी थी कि परिवार के लिए एक दिन और गुजारा। खट्टे-मीठे पलों को जिया। पूरे परिवार को खुशियां बांटी। जिंदगी के सब ख्वाब पूरे लग रहे थे। मैंने डायरी निकाली और लिखना शुरू कर दिया। सब काम पूरे हो चुके थे... बस एक चीज अधूरी थी.... मेरा कमर दर्द।

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03 September 2008

हमें नहीं जाना स्कूल...पर नोबल पाना है


माना कि स्कूल जाना जरूरी है। लेकिन घर पर मिली शिक्षा स्कूली शिक्षा से कहीं ज्यादा अहम है। यहां पेश हैं कुछ ऐसी नोबल पुरस्कार प्राप्त हस्तियां, जिन्हें स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था।
जैसा कि कहा गया है- प्रथम शिक्षक मां होती है। वैसे ही घर बच्चे के लिए पहला स्कूल है। यहां जितना सीखोगे, उतने ही नोबल बन जाओगे।


नाम - रवींद्र नाथ टैगोर
उपलब्धि- 1913 में साहित्य का नोबल पुरस्कार

स्कूल के बारे में राय- मेरा विचार में यह रहस्यमयी संसार जिसका सृजन खुद ईश्वर ने किया है, उससे दूर ले जाने की जगह है स्कूल। यह एक ऐसी अनुशासन विधि है, जिसमें एक विद्यार्थी की नैसर्गिक प्रतिभा या मौलिक योग्यता का कोई स्थान नहीं है। स्कूल की जिंदगी तब अच्छी होती है, जब खुद को निष्क्रिय या अजीवित मान लें। शायद यह मेरा लिए अच्छा ही था, कि मुझे किसी सभ्य परिवार में रहने वाले लड़के की तरह स्कूल या कॉलेज की शिक्षा नहीं मिली। शायद मेरे विरोध ने ही मुझे साहित्य में कुछ नया रचने के लिए प्रेरित किया।
(1921 में अमरीका में और 1924 में चीन में दिए गए भाषणों के आधार पर)

नाम- अल्बर्ट आइंस्टीन

उपलब्धि- भौतिकशास्त्र में 1921 में नोबल पुरस्कार
स्कूल के बारे में राय- मुझे हमेशा स्कूली अनुशासन से चिढ़ थी। ज्यादातर समय मैं भौतिकशास्त्र की प्रयोगशाला में काम करता रहता, इससे मुझे किताबी बोरियत से छुट्टी मिलती और सीधे प्रयोग करके कुछ पाने का सुखद एहसास होता। इसके बाद बचे बक्त में मैं पढ़ाई और दूसरे कामकाज करता था। परीक्षाओं का हौव्वा भी मेरे दिमाग पर गहरा असर डालता था। इनसे मुक्त होते ही मैं बेहद हल्का महसूस करता।
(आत्मकथा 'आटोबायोग्राफिकल नोट्स' से)


नाम- जार्ज बनार्ड शा
उपलब्धि- 1925 में साहित्य का नोबल पुरस्कार

स्कूल के बारे में राय- दुनिया में मासूम बच्चों के लिए सबसे डरावनी जगह अगर कोई है, तो वह स्कूल है। इसकी शुरुआत बंद कमरे से होती है। यहां उन लोगों की पुस्तकों को भी पढ़ना पड़ता है, जो लिखना नहीं जानते। ऐसी पुस्तकें जिनसे कुछ सीखना एक मुशिकल बात होती है।
(किताब 'ए ट्रीटीज ऑन पैरेट्स एंड चिल्ड्रन' से)


नाम- बरट्रेंड रसेल
उपलब्धि- 1950 में साहित्य का नोबल पुरस्कार

स्कूल के बारे में राय- स्कूल से ज्यादा घर में दी जाने वाली शिक्षा कारगर है। शिक्षण अधिकारी दिखावा जरूर करते हैं, मगर अपवादस्वरूप ही उनमें विद्यार्थियों के लिए उत्तरदायित्व की चिंता होती है। घर में संस्कारों के साथ संबंधों की शिक्षा मिलता है। यह समाज स्कूल के कृत्रिम वातावरण से ज्यादा जरूरी है।
(किताब 'एजुकेशन एंड सोशल ऑर्डर' से)


नाम- विंस्टन चर्चिल
उपलब्धि- 1953 में साहित्य का नोबल पुरस्कार

स्कूल के बारे में राय- जब मैं सात साल का हो गया, तो मुझे आफत की पुडिया समझकर घर से दूर शिक्षा के लिए भेज दिया गया। स्कूल के दिन मेरव् लिए खासे बोझिल और चिंता के विषय रहे। मैं यहां खेल में तो पीछे था ही, जो पाठ मुझे पढ़ाया जाता, उसमें भी बुरा हाल था। ये बड़े उदासी वाले दिन थे। स्कूल के हटकर कोई भी काम करना गुनाह था। मगर मैं भी पक्का था, जहां मेरी दिलचस्पी नहीं थी, वहां पढ़ना-सीखना मेरे बस का नहीं था।
(किताब 'माई अर्ली लाइफ' से)


नाम- सुब्रमण्यन चंद्रशेखर
उपलब्धि- 1983 में भौतिकशास्त्र का नोबल पुरस्कार
स्कूल के बारे में राय-
मुझे प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही मिली। मां ने तमिल और पिता ने अंग्रेजी और अंकगणित की शिक्षा दी थी। अधिकतर बच्चों को उस समय घर पर ही शिक्षा दी जाती, ताकि बच्चा अच्छी तरह ज्ञान पा सके। मेरे पिता दफ्तर जाने से पहले मुझे घर पर ही पढ़ाकर जाते थे।
(सी वी रमन की आत्मकथा से)


नाम- आंद्रई सखारोव
उपलब्धि- 1975 में शांति का नोबल पुरस्कार
स्कूल के बारे में राय-
मेरे अनुसार स्कूल जाना 'वेस्ट ऑफ टाइम' यानी समय की बर्बादी है। स्टालिन के दौर में मेरी पढ़ाई-लिखाई घर पर ही हुई।
(एक प्रश्न के जवाब में)


-आशीष जैन

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26 August 2008

भई, क्या हुआ।


क्या कहा। हम बीजिंग में तीन पदक जीत गए। तो फिर चुप क्यों हो भई? खुशियां मनाओ ना। अभी तो पंद्रह अगस्त गया है। देश का गुणगान कर ही रहे थे। अब तो लग भी रहा है कि वाकई हम तो गुणों की खान हैं। अब ये मत पूछो कि हमने खिलाड़ियों के लिए क्या किया? भई याद करते-करते जुबान थक गई थी, पर हमें तो अंत राज्यवरधन सिंह राठौड़ ही याद थे। पर क्या करें, वो भी उस परदे की शूटिंग के चलते असल शूटिंग याद ही नहीं रख पाए। और सबसे बड़ी खुशी की बात तो यह है कि अब अंजलि, राज्यवरधन की बजाय एक नवा-नवा नाम अभिनव लोगों की जुबान पर चढ़ रहा है। जय हो अभिनव देव। तुम तो निशानेबाजी के धुरंधर निकले। गजब का जादू चलाया तुमने दादा। सब पस्त। चेहरे पर क्या तेज है, तुम्हारे। आगे भी इसी तरह हिंदुस्तान का नाम रोशन करो और बताओ देश को कि जीता अभिनव है और हारा हिंदुस्तान है। तुमने खुद के दम पर ये गोल्ड मैडल पाया। जरमनी जाकर मेहनत की। आज भी देश में लाखों अभिनव हैं, पर हर कोई तुम्हारी तरह बाहर थोड़े ही जा पाएगा। खैर छोडो़ सारी बातें। अब तो तुम स्टार बनकर करोड़ों लोगों के इस महादेश में धूम मचाते जाओ और देश का नाम ऊंचा करते जाओ।

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13 August 2008

दिल खुश है


हम आजाद हैं, दिल खुश है

मन में एक आस है, दिल खुश है।


अब तो हर सपने सच कर सकते हैं

हर घर आबाद है, दिल खुश है।


जो सोचा उससे ज्यादा मिला है

सोच आकाश है, दिल खुश है।


तरक्की, खुशहाली और किस्मत पर

हक सभी का है, दिल खुश है।


ना कोई छोटा, बड़ा ना भेदभाव है

सभी अपने हैं, दिल खुश है।


खेल, लेखन, साइंस, खेती सबमें अपना नाम है

सबको अवसर हैं, दिल खुश है।


सोच का दायरा बढ़ा

संकुचित ना भाव हैं, दिल खुश है।


सबको सुलभ न्याय है

ना कोई दबाव है, दिल खुश है।


तमन्ना है देश के लिए धड़कता रहे दिल

देश आगे बढ़े, दिल खुश है।


-आशीष जैन

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08 August 2008

राखी है प्यारा सा बंधन


मैं डरती हूं भाई से कुछ भी कहने से
मैं नहीं बताती उसे मन की कोई बात।

सोचती हूं सख्त है वो
पर शायद अखरोट सा अंदर से कोमल है वो।

मन का विश्वास है कि डांटेगा ही
पर नहीं होगा नाराज।

कर लेती हूं सपनों के राजकुमार से प्यार
अक्स नजर आता है भाई का सा उसमें मुझे।

डरती हूं टोकता है भाई मेरा बार-बार
लड़ती हूं क्यों दखल है हर काम में हर बार।

दम दिखलाती हूं हर किसी को
पर उसमें छुपा है भाई का प्यार।

डरती हूं मैं भाई से कुछ भी कहने से
पर डरती हूं बिना उसके रहने से।

हर पल रहे वो मेरे साथ
ना बोले, पर लगता है कर रहा है मुझसे बात।

डरती हूं मेरी डोली उठने के बाद
रह जाएगा हो जाएगा वो बिल्कुल उदास।


पर अब मन से डर जा रहा है
राखी का त्योहार आ रहा है।

इक रेशमी धागे बांध लूंगी दिलों के तार
बजता रहेगा उससे सदा मधुर संगीत।

हर डर हो जाएगा तब काफूर
वो नहीं रहेगा वो मेरे मन से दूर।

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30 July 2008

तेरी यारी जान से प्यारी


एक बुजुरग इंसान याद कर रहा है अपनी जवानी के दिनों में अपने दोस्तों से जुड़ी यादें।

समय बदला है। पर एक चीज आज भी जिंदा है, वो है मेरे यारों की यादें। क्या और कितना कहूं उनके बारे में। दोस्त शब्द याद आते जेहन में सैंकड़ों बातें एक साथ घूमने लगती हैं। अंधेरे में जो किरदार जुगनू का होता है, कुछ-कुछ वैसा ही काम हमारी जिंदगी में दोस्ती का होता है। यह तो वह मुस्कान है, जो सदा चेहरे पर जमी रहना चाहती है। दिल की जुबां को अगर दोस्ती का नाम दें, तो शायद एक हद तक ठीक ही होगा। दोस्ती वो स्परश है, जो एक बार तो रोते हुए इंसान को हंसा दे। कैसा रिश्ता है यह? कितना कुछ अपने आप में समेटे हुए? हजारों बार इसे शब्दों में बांधने की कोशिश की, पर हर बार अंदर से आवाज आई कि नहीं बांध पाऊंगा, चंद अल्फाजों में इस एहसास को। पर फिऱ भी दिल को तसल्ली देने के लिए कोशिश करता हूं और खुद को समझा लेता हूं कि ये कोशिशें तो बहाना है, असल में तो मन की रची-बसी यादों को आपके सामने रखना है।
अक्सर हम सभी दोस्त चाय की थड़ियों पर बैठकर एक बात दोहराया करते थे, यारो, ऊपरवाले ने हमारे लिए हर रिश्ता तय करके भेजा है, माता-पिता, भाई-बहन। पर अकेला यह नाता ऐसा है, जो हमने खुद ने बनाया है। जान-बूझकर बनाया है। इस संबंध की आंच को कभी ठंडी मत होने देना। सही भी तो है, माता-पिता को हमने चुना थोड़े ही है। हां, दोस्त जरूर अपनी मरजी से बनाए हैं। दोस्ती तो उस फूल की तरह जो पतझड़ के मौसम में भी अपनी पूरी महक के साथ फिजा में खुशबू बिखेरता रहता है।
एक-दूसरे के सुख-दुख, प्यार-जज्बात, कोशिशों में हमारी दुआएं शामिल रहती। दोस्त दरिया की तरह सदा मेरे साथ बहते, उन्होंने यह कभी नहीं पूछा कि हमारी राह कहां है? मुझे तो बस यही सुकून था कि मेरे हर कदम पर दोस्तों का साथ है। जिंदगी की कड़ी धूप में जब कभी खुद को बुझा-बुझा सा महसूस करता, ये दोस्त ही मेरी लौ को जलाए रखते। आज मैंने जिंदगी की हर खुशी, हर मंजिल हासिल कर ली है। दुनिया के सामने में चाहे लाख कहूं कि मैंने अपने बूते ये सब चीजें पाईं हैं, पर असलियत यह है कि कहीं न कहीं दोस्ती की मजूबत रोशनी मेरे पास नहीं होती, तो मैं मंजिल तो क्या, असल राह भी कभी नहीं पकड़ पाता। मेरे लिए क्या गलत है और क्या सही, इस सबका फैसला मेरे दोस्तों से बेहतर कौन कर सकता था। उन्हें मेरे मन की हर दशा औऱ दिशा पता थी, तभी तो वे मन की हर बात को बेहद आसानी से भांप लेते थे। जब भी मैं अपने दिल के सवालों को समझने की कोशिश में अंदर तक जाता, इसका सबब मेरा कोई न कोई दोस्त ही बनता था। सितारों की आसमान से दोस्ती होती है, तभी तो वे हर रोज तयशुदा समय पर अपने मित्र से मिलने पहुंच जाते हैं। कुछ ऐसा ही याराना हमारा भी था, पता नहीं कैसे पता लगा लेते थे कि कौन दोस्त किस वक्त कहां होगा। दिल से एक बार पुकारा नहीं कि दौड़े चले आते थे। उस वक्त मोबाइल फोन तो थे नहीं , बस धड़कनों की घंटियां थी, जो हर हाल में अपनी बात उन तक पहुंचा देती थी। दोस्ती की मुस्कान सदा खिली रहना चाहती है।
चाहे माता-पिता से लाख बातें छुपा लें, पर दोस्तों से नजरें मिलाते ही वे पकड़ लेते थे कि कहां झूठ बोल रहा है? फिर उनके सामने परत-दर-परत मन की बात रखते। नदी जिस तरह समंदर से मिलने की आस में पगली रहती है, उसी मानिन्द मैं भी दोस्त के घरों पर गाहे-बगाहे पहुंच जाता था और नीचे खड़ा होकर सीटी बजाने लगता। वे एक पल में ही मेरी सीटी की आवाज सुनकर समझ जाते कि उनका बुलावा आ गया है। फिर जो हम मिलते, तो लगता कि बरसों बाद मिलें, आज ही दुनियाभर की सारी बातें पूरी करके दम लेंगे।
इस एहसास को मैं कभी उम्र से नहीं बांध पाया। हर किसी को दोस्त बना लेने की फितरत सी थी मुझमें। जैसे एक बुजुरग बच्चों के बीच जाकर बच्चा बन जाता है, उसी तरह मैं भी हर उम्र के दोस्तों के बीच घुल-मिल जाया करता था। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती के किस्से तो बचपन से सुन रखे थे, पर जब दोस्तों के साथ मिलकर शोले देखी, उसी दिन से जय-वीरू मेरे लिए आदरश बन गए।
दोस्तों के साथ दिल की गुफ्तगू के सिवा मस्ती करने की भी कोई छोर नहीं थी। कभी किसी दोस्त से मसखरी करने का दिल होता, तो उसे किसी लड़की के नाम से झूठ-मूठ का लवर लैटर थमा देते। उस लैटर में लिखा होता कि मैं तुमसे फलां दिन फलां बगीचे में तुम्हारा इंतजार कर रही हूं। लाल शरट और सफेद पैंट पहनकर आ जाना। दोस्त भी मन ही मन खुश होकर बिना हमें बताए, उससे मिलने चला जाता। और हम सब दोस्त वहां पहुंचकर उससे पूछते, भई किस का इंतजार कर रहे हो? अनिता का? वो तो एकदम चौंक जाता और पूछता तुम्हें कैसे पता? फिर जब हम उसे सच्चाई बताते तो उसकी सूरत देखने लायक हो जाती।
दोस्तों के साथ बिता हर पल मेरे लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता। हर रोज खुशी के दिए जलते औऱ हर समय उमंगों के रंगों से सराबोर रहा। दोस्ती एक बार बनकर खत्म नहीं हो जाती। दिन ब दिन बढ़ती है, फलती-फूलती है और रोज अपनी मिठास से दिलो-दिमाग पर छा सी जाती है। आज भी मैं दोस्त बनाता हूं। अब भी पुराने दोस्तों के साथ महफिल जमती है। बचपन से शुरू होकर दोस्ती के नित नए आयाम बनते चले गए। बचपन में माता-पिता को दोस्त के रूप में देखा, बड़ा हुआ तो सहपाठियों में सखा की झलक पाई और फिर पवित्र अगि्न की दोस्ती ने दो दिलों को मिला दिया और फिर बच्चों से होते हुए आज मैं अपने नाती-पोतियों से मित्रता का धरम निभा रहा हूं। मैं तो ऊपर वाले से यही प्रारथना करता हूं कि यारों की यारी सदा फलती-फूलती और सलामत रहे।

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21 July 2008

मेहनत कर तुझे फल मिलेगा

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कब से है तेरा इंतजार

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14 July 2008

बारिश बुला रही है...


छपाक छई...

बादलों की बारात निकल रही है। बारिश की नन्ही बूंदें मदमस्त होकर जश्न मना रही हैं। हर कोई इस मौसम में खुद को भुलाकर खुशी में डूब गया है और आसमान से टपकते मोतियों को देखकर आल्हादित है।
टिपटिप कर बूंदे बरस रही हैं। बरसात की पहली बूंद तन को छूकर कर निकल गई है। लगता है मानो बरसों से बंजर पड़ी जमीन पर पहली बार कोई नन्हा अंकुर जन्मा हो। तन-मन प्रफुलि्लत होकर कह रहा है कि पहली बारिश में भीगने का आनंद जिसने नहीं लिया, उसके लिए तो संसार की हर खुशी बेमानी है। क्या महिला, पुरुष, बच्चे और क्या बुजुरग सभी तो इस बारिश में अपनी-अपनी उम्र को भुलाकर मस्ती में सराबोर हो जाते हैं। यहां तक कि पशु-पक्छी भी गाने-गुनगुनाते लगते हैं। बादलों के रथ पर बैठी ये बूंदे रथ की साऱथी भी हैं और सवारी भी। ये मोतियों की लडि़यां कभी हरे-हरे पत्तों पर आराम फरमाती हैं, तो कभी अनजान राहों पर लड़खड़ाती हुई बह जाती हैं। इस सब को देखकर मानो पूरी प्रकरति कह रही हो कि स्वागत हो...स्वागत हो पहली बरसात।
ऐसा नहीं कि बारिश की बूंदे टपकते ही लोग अपने-अपने घरों को बढ़ जाते हैं। वे तो निकल पड़ते हैं उस ठौर, जहां इस बारिश को पूरी तरह से जिया जा सके। चारों ओर हरियाली की चादर ओढ़े प्रकरति लोगों को आमंत्रित करती है और लोग भी उसके इस बुलावे को ठुकरा नहीं पाते और पहुंचते हैं पारकों में, पहाड़ों पर। फिऱ शुरू होता है पिकनिक और गोठ का सिलसिला। गोठ में भी ऐसा-वैसा कुछ नहीं- राजस्थान की खास दावत- दाल-बाटी-चूरमा। भई गरमा-गरम देसी घी में डूबी बाटी और मसालेदार दाल के साथ मीठा चूरमा, उस पर गजब की फुहारें। भई इस धरा पर ऐसा कौन होगा, जो इस रुत में मदहोश होकर रसखान की तरज पर बड़ी से बड़ी जागीर ना ठुकरा दे। एक के बाद एक गोठें, मौसम ही कुछ ऐसा है। ना पेट की फ्रिक, ना किसी तरह खाने में कोई लिहाज। बस खाना है और मौसम का लुत्फ उठाना है।
वहीं दूसरी ओर महिलाएं तो ना जाने कब से इस झमाझम का इंतजार कर रही होती हैं? भई वजह भी तो साफ है। लाल, गुलाबी,नीले, पीले और सतरंगी लहरिए पहनकर पिया को रिझाना जो है, नदी किनारे लगे पीपल के पेड़ पर लगे झूले पर सखी-सहेलियों के साथ हिचकोले जो खाने हैं। एक-दूसरे को उनके पति के नाम को लेकर जो छेड़छाड़ बरसात के मौसम में होगी, वैसा मौका और कभी थोड़े ही मिलने वाला है। घर के आंगन के बाहर पिया के संग बैठकर गरमागरम चाय और पकौड़ी के साथ दिल से जुड़ी मीठी-मीठी बातें करना भला किस वामा को नहीं सुहाएंगी।
बच्चों के लिए इस बरसाती मौसम में क्या कुछ खास है, यह हमसे मत पूछिए। भई रिमझिम का यह मौसम तो बनाइ ही बच्चों के लिए है। अपने-अपने स्कूल बैग पीठ पर लादे बच्चे झुंड बनाकर सड़क पर बह रहे पानी के साथ जिस तरह छपाक-छई करते हैं, उसे देखकर वापस बचपन में लौटने का मन करने लगता है। घर आकर भी बच्चे चुप थोड़े ही बैठ जाएंगे। भई फुल मस्ती करेंगे। मम्मी डांटेंगी, तो पापा कहेंगे, जाओ छत पर और खूब नहाओ। फिर तो मानो मिल गई आजादी और तब देखिए उनकी धमाचौकड़ी। हां कुछ बच्चे भी ऐसे हैं, जो बारिश से हिचकते हैं, पर वे भी घर के बाहर बह रहे पानी में कागज की कश्ती बनाकर उसे पानी में छोड़ना थोड़े ही भूलते हैं। हां अगर पापा की इजाजत मिल जाए, तो अपनी नाव का पीछे करते-करते घर से दूर तक भी पहुंच जाते हैं।
इस भीगी-भीगी रुत में कभी आपने अपने दादा-दादी या नाना-नानी के साथ समय गुजारा है। अगर नहीं, तो उनके साथ लंबी सैर पर निकल जाइए। हां, एक बात, जाना पैदल ही। फिर देखना कैसे वे आपको अपनी जवानी के रोचक किस्से सुनाने लगेंगे और पूरा समय कब गुजर जाएगा, आपको पता ही नहीं चलेगा। उस समय आप उन्हें कुछ खाने-पीने से मत टोकना कि आपको डायबिटिज है या गठिया है। अगर आइसक्रीम मांगे, तो वहीं लाकर देनी पड़ेगी। आखिर जब मन की पोटली खुलती है, तो उसे यूं ही समेटना नहीं चाहिए। इससे आपको मोती ही मिलेंगे, जो इस सुहावने मौसम में और चार चांद लगा देंगे।
अगर इन सारी बातों के बीच युवा दोस्तों का जिक्र ना किया जाए, तो लगेगा कि कुछ छूट गया है। बारिश की पहली बूंद के साथ ही का‍लेज-स्कूल के दोस्तों के मोबाइल फोन बजने लगते हैं। सब की एक ही बात होती है, अरे बाइक उठा और फलां जगह आजा। फिर दो दोस्त मिले नहीं कि हल्की-हल्की फुहारों के बीच सड़कों पर घंटों बाइक लेकर यूं घूमते रहेंगे मानो इस दुनिया के वे ही शहंशाह हैं।
अब जब सब लोग ही मस्ती करने पर उतारूं हैं, तो आप क्यों घर में दुबके बैठे हैं। बारिश आपको बुला रही है। भूल जाइए छाता, रेनकोट, सरदी-जुकाम और आ चढ़ जाने दीजिए मौसम की खुमारी। आज कोई ना-नुकर नहीं चलेगी, तो फिर शुरू कर दीजिए आप भी ताक- धिना- धिन।
-आशीष जैन

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10 June 2008

पिता हैं वे मेरे

पिता हैं वे मेरे
पर दोस्त से लगते हैं।
हर पल मेरे साथ साए से बने रहते हैं।
दर्द में, खुशी में या किसी डर में
मैं सदा उनकी उंगली थामे रहता हूं।

पिता हैं वे मेरे
पर प्यार जैसे लगते हैं।
जब कभी लगाते हैं गले से
लगता है मैं मैं ना रहा।
गले मिलकर भूल जाता हूं सारा जहां।

पिता हैं वे मेरे
लगते हैं गुरू जैसे।
जब-तब डांट देते हैं मुझे
लगता है सीख रहा हूं दुनिया की गणित
बताते हैं क्या भला है क्या बुरा।

पिता हैं वे मेरे
लगते हैं पुत्र से मेरे।
जब कभी जरूरत होती है
मैं ही देता हूं उन्हें सहारा।
सुनता भी हूं उनकी बात पूरी।

पिता हैं वे मेरे
लगता है हर रिश्ते से परे
बस वे पिता हैं मेरे।
- आशीष जैन

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31 May 2008

मन भर कर हंस लो


भाई ये ऑटोमेटिकली क्या होता है रे?
अरे, भई सिंपल है, जब किसी ऑटो में कोई टकली लड़की बैठे, तो इसे ऑटोमेटिकली कहवे हैं।

यार एक बात ये नोटबुक क्या बला होती है?
वेरी सिंपल है रे यार, जब कदै कोई आदमी नै नोटां की भूख बढ़ जावै तो इनै नोटबुक कहवै छै।

यार एक बात बता, ये आदमी अगर चांद से छलांग लगाएगा, तो कहां गिरेगा?
अबे सोच ना.... यार मुझे लगता है कि वो आदमी धरती पर गिरेगा।
तू बावड़ो ही छै कांई....
अबे चांद से छलांग लगाएगा, तो चांद पर ही गिरेगा।

यार मेरी पत्नी से आज मेरी कहासुनी हो गई।
अरे, वो कैसे?
यार, क्या करूं?
वो कहती रही, मैं सुनता रहा। वो कहती रही, मैं सुनता रहा।

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कविता

पाना है क्या खोना है क्या।
क्या मुझको पता।

मन में थी एक आस, वो पूरी हुई।
फिर उठी है एक प्यास, करनी है फिऱ पूरी आस।

मन का विश्वास सदा रहे साथ, खुदा रहे सदा मेरे पास।
दिल का बात सुन रह कोई, मन का दर्द ना जाने कोय।
मन की बात को सुन ले, ऐसा कोई मिल जाए।।

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29 May 2008

चल चला चल


कोई नहीं है तेरा, तू हंसता चल।
राह के साथी के, दर्द में फंसता चल।।

मंजिलें मिलेंगी तुझे, ना घबरा।
तूफानों में फंस, मझधारों से निकलता चल।।

खूब हंस, नाच ले, झूम ले।
दिल तोड़ दे कोई, तो सिसकता चल।।

दूर है किनारा, सेहरा में फंस गया।
लेकर दिल के अरमां, मचलता चल।।

मिले खुशियां, तरक्की, शोहरत।
राह भर फिर तू चहकता चल।।

इंसां है तू भी, दर्द होता है।
जाम बनके, तू भी होठों से छलकता चल।।

- आशीष जैन

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28 May 2008

कविता


ये समय क्या है?
इक खता है।
हर समय, हर पल
गलती के निशां छोड़ जाता है।
बीता हुआ हर पल क्यों रूलाता है?
पल कभी पल-पल करके
तो कभी सदी बनके गुजरता है।
पल को पाने की जुर्रत क्यों करता हूं मैं
पल को पाने के लिए पल-पल गंवाता हूं मैं।

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14 April 2008

मैं और मेरा खुदा


या विसाले खुदा मुझे इतना कमाल दे।


दुनिया मिसाल दे, तो हमारी मिसाल दे।।


या खुदा मैंने हर काम मन से करने की कसम ठानी है। मुझे पूरा यकीन है कि तुम मेरा पूरा साथ दोगे। मेरा यह यकीन ही मेरा सहारा, मेरा हुनर, मेरी ताकत बनेगा। मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मन की ताकत चाहिए। जिस दिन मुझे मेरे मन की ताकत मिल जाएगी। उस दिन मैं निखर जाऊंगा। संवर जाऊंगा। आमीन।

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04 November 2007

मेहनत रंग लाएगी


दोस्तों दुनिया में आखिरकार एक ही चीज रंग लाती है और वो है मेहनत। ये बात मैं हर बार कहता हूँ। दोस्तों कभी भी बाधा को मत देखना। बाधा के उस पार की रंगत को नजर में रखना। मुझे तो पता ही नहीं था कि यूनीनागरी से इतनी आसानी से टाइप हो जाता है। तरू मैडम ने मेरी बहुत मदद की। इसके लिए मैं उन्हें तहेदिल से शुक्रिया करना चाहता हूं। अब मुझमें नया जोश आ गया है।

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प्यार बांटो


दोस्तों इस दुनिया में जो भी इंसान आया है। उसे खुदा ने कुछ खास काम के लिए ही भेजा है। वो खास काम है, लोगों में प्यार बांटना और इस जमीं पर जो भी बेहतर है, उसे और भी बेहतर बनाना।

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