13 August 2008
दिल खुश है
08 August 2008
राखी है प्यारा सा बंधन
मैं नहीं बताती उसे मन की कोई बात।
सोचती हूं सख्त है वो
पर शायद अखरोट सा अंदर से कोमल है वो।
मन का विश्वास है कि डांटेगा ही
पर नहीं होगा नाराज।
कर लेती हूं सपनों के राजकुमार से प्यार
अक्स नजर आता है भाई का सा उसमें मुझे।
डरती हूं टोकता है भाई मेरा बार-बार
लड़ती हूं क्यों दखल है हर काम में हर बार।
दम दिखलाती हूं हर किसी को
पर उसमें छुपा है भाई का प्यार।
डरती हूं मैं भाई से कुछ भी कहने से
पर डरती हूं बिना उसके रहने से।
हर पल रहे वो मेरे साथ
ना बोले, पर लगता है कर रहा है मुझसे बात।
डरती हूं मेरी डोली उठने के बाद
रह जाएगा हो जाएगा वो बिल्कुल उदास।
पर अब मन से डर जा रहा है
राखी का त्योहार आ रहा है।
इक रेशमी धागे बांध लूंगी दिलों के तार
बजता रहेगा उससे सदा मधुर संगीत।
हर डर हो जाएगा तब काफूर
वो नहीं रहेगा वो मेरे मन से दूर।
30 July 2008
तेरी यारी जान से प्यारी
समय बदला है। पर एक चीज आज भी जिंदा है, वो है मेरे यारों की यादें। क्या और कितना कहूं उनके बारे में। दोस्त शब्द याद आते जेहन में सैंकड़ों बातें एक साथ घूमने लगती हैं। अंधेरे में जो किरदार जुगनू का होता है, कुछ-कुछ वैसा ही काम हमारी जिंदगी में दोस्ती का होता है। यह तो वह मुस्कान है, जो सदा चेहरे पर जमी रहना चाहती है। दिल की जुबां को अगर दोस्ती का नाम दें, तो शायद एक हद तक ठीक ही होगा। दोस्ती वो स्परश है, जो एक बार तो रोते हुए इंसान को हंसा दे। कैसा रिश्ता है यह? कितना कुछ अपने आप में समेटे हुए? हजारों बार इसे शब्दों में बांधने की कोशिश की, पर हर बार अंदर से आवाज आई कि नहीं बांध पाऊंगा, चंद अल्फाजों में इस एहसास को। पर फिऱ भी दिल को तसल्ली देने के लिए कोशिश करता हूं और खुद को समझा लेता हूं कि ये कोशिशें तो बहाना है, असल में तो मन की रची-बसी यादों को आपके सामने रखना है।
अक्सर हम सभी दोस्त चाय की थड़ियों पर बैठकर एक बात दोहराया करते थे, यारो, ऊपरवाले ने हमारे लिए हर रिश्ता तय करके भेजा है, माता-पिता, भाई-बहन। पर अकेला यह नाता ऐसा है, जो हमने खुद ने बनाया है। जान-बूझकर बनाया है। इस संबंध की आंच को कभी ठंडी मत होने देना। सही भी तो है, माता-पिता को हमने चुना थोड़े ही है। हां, दोस्त जरूर अपनी मरजी से बनाए हैं। दोस्ती तो उस फूल की तरह जो पतझड़ के मौसम में भी अपनी पूरी महक के साथ फिजा में खुशबू बिखेरता रहता है।
एक-दूसरे के सुख-दुख, प्यार-जज्बात, कोशिशों में हमारी दुआएं शामिल रहती। दोस्त दरिया की तरह सदा मेरे साथ बहते, उन्होंने यह कभी नहीं पूछा कि हमारी राह कहां है? मुझे तो बस यही सुकून था कि मेरे हर कदम पर दोस्तों का साथ है। जिंदगी की कड़ी धूप में जब कभी खुद को बुझा-बुझा सा महसूस करता, ये दोस्त ही मेरी लौ को जलाए रखते। आज मैंने जिंदगी की हर खुशी, हर मंजिल हासिल कर ली है। दुनिया के सामने में चाहे लाख कहूं कि मैंने अपने बूते ये सब चीजें पाईं हैं, पर असलियत यह है कि कहीं न कहीं दोस्ती की मजूबत रोशनी मेरे पास नहीं होती, तो मैं मंजिल तो क्या, असल राह भी कभी नहीं पकड़ पाता। मेरे लिए क्या गलत है और क्या सही, इस सबका फैसला मेरे दोस्तों से बेहतर कौन कर सकता था। उन्हें मेरे मन की हर दशा औऱ दिशा पता थी, तभी तो वे मन की हर बात को बेहद आसानी से भांप लेते थे। जब भी मैं अपने दिल के सवालों को समझने की कोशिश में अंदर तक जाता, इसका सबब मेरा कोई न कोई दोस्त ही बनता था। सितारों की आसमान से दोस्ती होती है, तभी तो वे हर रोज तयशुदा समय पर अपने मित्र से मिलने पहुंच जाते हैं। कुछ ऐसा ही याराना हमारा भी था, पता नहीं कैसे पता लगा लेते थे कि कौन दोस्त किस वक्त कहां होगा। दिल से एक बार पुकारा नहीं कि दौड़े चले आते थे। उस वक्त मोबाइल फोन तो थे नहीं , बस धड़कनों की घंटियां थी, जो हर हाल में अपनी बात उन तक पहुंचा देती थी। दोस्ती की मुस्कान सदा खिली रहना चाहती है।
चाहे माता-पिता से लाख बातें छुपा लें, पर दोस्तों से नजरें मिलाते ही वे पकड़ लेते थे कि कहां झूठ बोल रहा है? फिर उनके सामने परत-दर-परत मन की बात रखते। नदी जिस तरह समंदर से मिलने की आस में पगली रहती है, उसी मानिन्द मैं भी दोस्त के घरों पर गाहे-बगाहे पहुंच जाता था और नीचे खड़ा होकर सीटी बजाने लगता। वे एक पल में ही मेरी सीटी की आवाज सुनकर समझ जाते कि उनका बुलावा आ गया है। फिर जो हम मिलते, तो लगता कि बरसों बाद मिलें, आज ही दुनियाभर की सारी बातें पूरी करके दम लेंगे।
इस एहसास को मैं कभी उम्र से नहीं बांध पाया। हर किसी को दोस्त बना लेने की फितरत सी थी मुझमें। जैसे एक बुजुरग बच्चों के बीच जाकर बच्चा बन जाता है, उसी तरह मैं भी हर उम्र के दोस्तों के बीच घुल-मिल जाया करता था। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती के किस्से तो बचपन से सुन रखे थे, पर जब दोस्तों के साथ मिलकर शोले देखी, उसी दिन से जय-वीरू मेरे लिए आदरश बन गए।
दोस्तों के साथ दिल की गुफ्तगू के सिवा मस्ती करने की भी कोई छोर नहीं थी। कभी किसी दोस्त से मसखरी करने का दिल होता, तो उसे किसी लड़की के नाम से झूठ-मूठ का लवर लैटर थमा देते। उस लैटर में लिखा होता कि मैं तुमसे फलां दिन फलां बगीचे में तुम्हारा इंतजार कर रही हूं। लाल शरट और सफेद पैंट पहनकर आ जाना। दोस्त भी मन ही मन खुश होकर बिना हमें बताए, उससे मिलने चला जाता। और हम सब दोस्त वहां पहुंचकर उससे पूछते, भई किस का इंतजार कर रहे हो? अनिता का? वो तो एकदम चौंक जाता और पूछता तुम्हें कैसे पता? फिर जब हम उसे सच्चाई बताते तो उसकी सूरत देखने लायक हो जाती।
दोस्तों के साथ बिता हर पल मेरे लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता। हर रोज खुशी के दिए जलते औऱ हर समय उमंगों के रंगों से सराबोर रहा। दोस्ती एक बार बनकर खत्म नहीं हो जाती। दिन ब दिन बढ़ती है, फलती-फूलती है और रोज अपनी मिठास से दिलो-दिमाग पर छा सी जाती है। आज भी मैं दोस्त बनाता हूं। अब भी पुराने दोस्तों के साथ महफिल जमती है। बचपन से शुरू होकर दोस्ती के नित नए आयाम बनते चले गए। बचपन में माता-पिता को दोस्त के रूप में देखा, बड़ा हुआ तो सहपाठियों में सखा की झलक पाई और फिर पवित्र अगि्न की दोस्ती ने दो दिलों को मिला दिया और फिर बच्चों से होते हुए आज मैं अपने नाती-पोतियों से मित्रता का धरम निभा रहा हूं। मैं तो ऊपर वाले से यही प्रारथना करता हूं कि यारों की यारी सदा फलती-फूलती और सलामत रहे।
21 July 2008
14 July 2008
बारिश बुला रही है...
बादलों की बारात निकल रही है। बारिश की नन्ही बूंदें मदमस्त होकर जश्न मना रही हैं। हर कोई इस मौसम में खुद को भुलाकर खुशी में डूब गया है और आसमान से टपकते मोतियों को देखकर आल्हादित है।
टिपटिप कर बूंदे बरस रही हैं। बरसात की पहली बूंद तन को छूकर कर निकल गई है। लगता है मानो बरसों से बंजर पड़ी जमीन पर पहली बार कोई नन्हा अंकुर जन्मा हो। तन-मन प्रफुलि्लत होकर कह रहा है कि पहली बारिश में भीगने का आनंद जिसने नहीं लिया, उसके लिए तो संसार की हर खुशी बेमानी है। क्या महिला, पुरुष, बच्चे और क्या बुजुरग सभी तो इस बारिश में अपनी-अपनी उम्र को भुलाकर मस्ती में सराबोर हो जाते हैं। यहां तक कि पशु-पक्छी भी गाने-गुनगुनाते लगते हैं। बादलों के रथ पर बैठी ये बूंदे रथ की साऱथी भी हैं और सवारी भी। ये मोतियों की लडि़यां कभी हरे-हरे पत्तों पर आराम फरमाती हैं, तो कभी अनजान राहों पर लड़खड़ाती हुई बह जाती हैं। इस सब को देखकर मानो पूरी प्रकरति कह रही हो कि स्वागत हो...स्वागत हो पहली बरसात।
ऐसा नहीं कि बारिश की बूंदे टपकते ही लोग अपने-अपने घरों को बढ़ जाते हैं। वे तो निकल पड़ते हैं उस ठौर, जहां इस बारिश को पूरी तरह से जिया जा सके। चारों ओर हरियाली की चादर ओढ़े प्रकरति लोगों को आमंत्रित करती है और लोग भी उसके इस बुलावे को ठुकरा नहीं पाते और पहुंचते हैं पारकों में, पहाड़ों पर। फिऱ शुरू होता है पिकनिक और गोठ का सिलसिला। गोठ में भी ऐसा-वैसा कुछ नहीं- राजस्थान की खास दावत- दाल-बाटी-चूरमा। भई गरमा-गरम देसी घी में डूबी बाटी और मसालेदार दाल के साथ मीठा चूरमा, उस पर गजब की फुहारें। भई इस धरा पर ऐसा कौन होगा, जो इस रुत में मदहोश होकर रसखान की तरज पर बड़ी से बड़ी जागीर ना ठुकरा दे। एक के बाद एक गोठें, मौसम ही कुछ ऐसा है। ना पेट की फ्रिक, ना किसी तरह खाने में कोई लिहाज। बस खाना है और मौसम का लुत्फ उठाना है।
वहीं दूसरी ओर महिलाएं तो ना जाने कब से इस झमाझम का इंतजार कर रही होती हैं? भई वजह भी तो साफ है। लाल, गुलाबी,नीले, पीले और सतरंगी लहरिए पहनकर पिया को रिझाना जो है, नदी किनारे लगे पीपल के पेड़ पर लगे झूले पर सखी-सहेलियों के साथ हिचकोले जो खाने हैं। एक-दूसरे को उनके पति के नाम को लेकर जो छेड़छाड़ बरसात के मौसम में होगी, वैसा मौका और कभी थोड़े ही मिलने वाला है। घर के आंगन के बाहर पिया के संग बैठकर गरमागरम चाय और पकौड़ी के साथ दिल से जुड़ी मीठी-मीठी बातें करना भला किस वामा को नहीं सुहाएंगी।
बच्चों के लिए इस बरसाती मौसम में क्या कुछ खास है, यह हमसे मत पूछिए। भई रिमझिम का यह मौसम तो बनाइ ही बच्चों के लिए है। अपने-अपने स्कूल बैग पीठ पर लादे बच्चे झुंड बनाकर सड़क पर बह रहे पानी के साथ जिस तरह छपाक-छई करते हैं, उसे देखकर वापस बचपन में लौटने का मन करने लगता है। घर आकर भी बच्चे चुप थोड़े ही बैठ जाएंगे। भई फुल मस्ती करेंगे। मम्मी डांटेंगी, तो पापा कहेंगे, जाओ छत पर और खूब नहाओ। फिर तो मानो मिल गई आजादी और तब देखिए उनकी धमाचौकड़ी। हां कुछ बच्चे भी ऐसे हैं, जो बारिश से हिचकते हैं, पर वे भी घर के बाहर बह रहे पानी में कागज की कश्ती बनाकर उसे पानी में छोड़ना थोड़े ही भूलते हैं। हां अगर पापा की इजाजत मिल जाए, तो अपनी नाव का पीछे करते-करते घर से दूर तक भी पहुंच जाते हैं।
इस भीगी-भीगी रुत में कभी आपने अपने दादा-दादी या नाना-नानी के साथ समय गुजारा है। अगर नहीं, तो उनके साथ लंबी सैर पर निकल जाइए। हां, एक बात, जाना पैदल ही। फिर देखना कैसे वे आपको अपनी जवानी के रोचक किस्से सुनाने लगेंगे और पूरा समय कब गुजर जाएगा, आपको पता ही नहीं चलेगा। उस समय आप उन्हें कुछ खाने-पीने से मत टोकना कि आपको डायबिटिज है या गठिया है। अगर आइसक्रीम मांगे, तो वहीं लाकर देनी पड़ेगी। आखिर जब मन की पोटली खुलती है, तो उसे यूं ही समेटना नहीं चाहिए। इससे आपको मोती ही मिलेंगे, जो इस सुहावने मौसम में और चार चांद लगा देंगे।
अगर इन सारी बातों के बीच युवा दोस्तों का जिक्र ना किया जाए, तो लगेगा कि कुछ छूट गया है। बारिश की पहली बूंद के साथ ही कालेज-स्कूल के दोस्तों के मोबाइल फोन बजने लगते हैं। सब की एक ही बात होती है, अरे बाइक उठा और फलां जगह आजा। फिर दो दोस्त मिले नहीं कि हल्की-हल्की फुहारों के बीच सड़कों पर घंटों बाइक लेकर यूं घूमते रहेंगे मानो इस दुनिया के वे ही शहंशाह हैं।
अब जब सब लोग ही मस्ती करने पर उतारूं हैं, तो आप क्यों घर में दुबके बैठे हैं। बारिश आपको बुला रही है। भूल जाइए छाता, रेनकोट, सरदी-जुकाम और आ चढ़ जाने दीजिए मौसम की खुमारी। आज कोई ना-नुकर नहीं चलेगी, तो फिर शुरू कर दीजिए आप भी ताक- धिना- धिन।
-आशीष जैन
10 June 2008
पिता हैं वे मेरे
पिता हैं वे मेरे
पर दोस्त से लगते हैं।
हर पल मेरे साथ साए से बने रहते हैं।
दर्द में, खुशी में या किसी डर में
मैं सदा उनकी उंगली थामे रहता हूं।
पिता हैं वे मेरे
पर प्यार जैसे लगते हैं।
जब कभी लगाते हैं गले से
लगता है मैं मैं ना रहा।
गले मिलकर भूल जाता हूं सारा जहां।
पिता हैं वे मेरे
लगते हैं गुरू जैसे।
जब-तब डांट देते हैं मुझे
लगता है सीख रहा हूं दुनिया की गणित
बताते हैं क्या भला है क्या बुरा।
पिता हैं वे मेरे
लगते हैं पुत्र से मेरे।
जब कभी जरूरत होती है
मैं ही देता हूं उन्हें सहारा।
सुनता भी हूं उनकी बात पूरी।
पिता हैं वे मेरे
लगता है हर रिश्ते से परे
बस वे पिता हैं मेरे।
- आशीष जैन
31 May 2008
मन भर कर हंस लो
अरे, भई सिंपल है, जब किसी ऑटो में कोई टकली लड़की बैठे, तो इसे ऑटोमेटिकली कहवे हैं।
यार एक बात ये नोटबुक क्या बला होती है?
वेरी सिंपल है रे यार, जब कदै कोई आदमी नै नोटां की भूख बढ़ जावै तो इनै नोटबुक कहवै छै।
यार एक बात बता, ये आदमी अगर चांद से छलांग लगाएगा, तो कहां गिरेगा?
अबे सोच ना.... यार मुझे लगता है कि वो आदमी धरती पर गिरेगा।
तू बावड़ो ही छै कांई....
अबे चांद से छलांग लगाएगा, तो चांद पर ही गिरेगा।
यार मेरी पत्नी से आज मेरी कहासुनी हो गई।
अरे, वो कैसे?
यार, क्या करूं?
वो कहती रही, मैं सुनता रहा। वो कहती रही, मैं सुनता रहा।
कविता
पाना है क्या खोना है क्या।
क्या मुझको पता।
मन में थी एक आस, वो पूरी हुई।
फिर उठी है एक प्यास, करनी है फिऱ पूरी आस।
मन का विश्वास सदा रहे साथ, खुदा रहे सदा मेरे पास।
दिल का बात सुन रह कोई, मन का दर्द ना जाने कोय।
मन की बात को सुन ले, ऐसा कोई मिल जाए।।
29 May 2008
चल चला चल
राह के साथी के, दर्द में फंसता चल।।
मंजिलें मिलेंगी तुझे, ना घबरा।
तूफानों में फंस, मझधारों से निकलता चल।।
खूब हंस, नाच ले, झूम ले।
दिल तोड़ दे कोई, तो सिसकता चल।।
दूर है किनारा, सेहरा में फंस गया।
लेकर दिल के अरमां, मचलता चल।।
मिले खुशियां, तरक्की, शोहरत।
राह भर फिर तू चहकता चल।।
इंसां है तू भी, दर्द होता है।
जाम बनके, तू भी होठों से छलकता चल।।
- आशीष जैन
28 May 2008
कविता
इक खता है।
हर समय, हर पल
गलती के निशां छोड़ जाता है।
बीता हुआ हर पल क्यों रूलाता है?
पल कभी पल-पल करके
तो कभी सदी बनके गुजरता है।
पल को पाने की जुर्रत क्यों करता हूं मैं
पल को पाने के लिए पल-पल गंवाता हूं मैं।
14 April 2008
मैं और मेरा खुदा
या विसाले खुदा मुझे इतना कमाल दे।
दुनिया मिसाल दे, तो हमारी मिसाल दे।।
या खुदा मैंने हर काम मन से करने की कसम ठानी है। मुझे पूरा यकीन है कि तुम मेरा पूरा साथ दोगे। मेरा यह यकीन ही मेरा सहारा, मेरा हुनर, मेरी ताकत बनेगा। मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मन की ताकत चाहिए। जिस दिन मुझे मेरे मन की ताकत मिल जाएगी। उस दिन मैं निखर जाऊंगा। संवर जाऊंगा। आमीन।
...आगे पढ़ें!04 November 2007
मेहनत रंग लाएगी
प्यार बांटो
31 October 2007
समय बदल रहा है भाई
30 October 2007
मंजिल ना दे चिराग दे
28 October 2007
मैं सफल हूँ क्यूंकि मैं असफल रहा हूँ
दोस्तों दुनिया में हर काम करो और खूब असफलता अर्जित करो। ताकि हर असफलता से कुछ सिख सको। जितनी आप असफलता अर्जित करोगे उतने आपको सबक मिलेंगे। हर रोज कुछ नया करो और गलती हो जाये तो उससे सीखो। यही जिन्दगी है।
...आगे पढ़ें!26 October 2007
हम भले तो जग भला
दोस्तों दुनिया में जो कुछ है अच्छा है। बस एक निगाह चाहिए। अगर हम ईमानदार हैं तो कोई हमे सफल होने से नहीं रोक सकता। काम करें और ऊपर वाले पर छोड़ दे तो फल अपने पास जरूर आएगा। यह मेरी परखी हुई बात है कि मेने बस काम किया और मेरी मदद ऊपर वाले ने की। कभी कभी लगा कि अब क्या होगा? पर ऊपर वाला मदद करने आ गया। मेरे हर काम में ऊपर वाले का ही हाथ है।
...आगे पढ़ें!काम काम और सिर्फ काम
दोस्तों अगर जिंदगी में काम नहीं है तो जीना बेकार सा लगता है। काम हम तभी सकते है जब हम दिल से उसे करना चाहते हैं। अगर बिना लोभ, लालच और स्वार्थ के हम काम, काम और सिर्फ काम करें तो ऊपर वाला (प्रकृति) भी हमारी मदद करता है। दोस्तों में सिर्फ काम किया है ओर कुछ नहीं। जो भी मुझे मिल बिना लाभ हानि सोचे किया है। दोस्तों अगर दिल से काम कर तो फल जरूर मिलेगा।
...आगे पढ़ें!08 September 2007
कुछ नया कर
मैं कुछ नया करना चाहता हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा कि जीवन में कुछ नया कर भी सकता हूँ । पर अब सबको देखकर लगता हैं कि मैं कुछ कर सकता हूँ . कुछ ऐसा कि मैं कुछ सीख सकूं।
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