आज समय किसी के पास नहीं है। तो हाइटेक जमाने में दीपावली पूजन के लिए पंडितजी को खोजने की भी जरूरत नहीं।
महानगर में एक पंडितजी है दीनानाथ जी। अब भई दीपावली का समय है तो श्रेष्ठ चौघड़ियों के हिसाब से हर कोई फटाफट और सटीक समय पर दीनानाथजी को अपने साथ ले जाना चाहता है। दीनानाथजी भी चाहते हैं कि हर यजमान की इच्छा पूरी हो। समझ में नहीं आ रहा, कैसे इस समस्या से निजात पाएं। इसके लिए काम आया केबल नेटवर्क। केबल नेटवर्क की मदद से दीनानाथजी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग की और सारव् यजमान उनके बताए अनुसार उपयुक्त मुहूर्त में पूजा का मार्गदर्शन लेते रहे। पंडितजी के बताए अनुसार मंत्र पढ़ते लोग खुशी-खुशी महालक्ष्मी की आराधना करते रहे।
आगे पढ़ें के आगे यहाँ
बदलते समय और लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर अब बाजार में दीपावली पूजन का ऑडियो कैसेट भी मिल रहा है। इन कैसेटों में पूजा के मंत्र और विधान दोनों हैं। कई कैसेटों के साथ तो पूजन सामग्री भी मिल रही है। बाजार में इस तरह की थाली उपलब्ध है, जिन्हें तुरंत खरीदें और पूजा करना शुरू कर दें। इस थाली को गेरू,चंदन, गोटा-सितारव् और कोैड़ियों से सजाया गया है और इसमें लक्ष्मी-गणेश, दीपक, लौंग, कपूर, खील-बताशे, रोली, मौली सब कुछ मौजूद हैं।
अब तो बाजार में बहीखाते के विकल्प के रूप में बोनचाइना की खिलौनानुमा किताब भी मिलने लगी है। इसमें एक पेज पर गणपति बने हैं, तो दूसरे पर लक्ष्मीजी के मंत्र। इस तरह देखा जाए, तो पूरा बाजार ही आपकी सुविधा के लिए तैयार खड़ा है।
-आशीष जैन
24 October 2008
आई है दिवाली
22 October 2008
सबको राम-राम राम।

आई है दिवाली आई है दिवाली
आंख में पानी, दिल है खाली।
दुनिया में हडकंप मचा है
लक्ष्मी रूठी कैसी सजा है।
बैंक हुई कंगाल हैं
बड़े-बड़े बदहाल हैं।
भारत में है राज का राज
भाषा में हो मराठी का साज।
दीए नहीं अब दिल जलते हैं
देशभक्त अब हाथ मलते हैं।
आई है दिवाली आई है दिवाली
देश-उपवन का खो गया माली।
चंद्रयान आगे बढ़ रहा
खाने को निवाला नहीं रहा।
मन को रोशन कैसे करें अब
उम्मीदों का तेल घट रहा अब।
चारों ओर चुनाव हैं
बातों का सैलाब है।
आई है दिवाली आई है दिवाली
असली माल लगता है जाली।
हर घर हर मन हर लौ रहे चमकती
ना हों कहीं आहें सिसकती।
रहे उजाला चारो ओर
चाहे अमावस हो या भोर।
दिल में सच्ची खुशी बसी हो
मुट्ठी में उम्मीद कसी हो।
आई है दिवाली आई है दिवाली
तन-मन-धन की भागे कंगाली।
-आशीष जैन
07 October 2008
हौसलों के पंख सपनों की उड़ान
ग्रामीण महिलाएं ले रही हैं छोटे-छोटे ऋण और संवार रही हैं अपना हुनर।
चारों ओर धूल-मिट्टी के गुबार हैं, पर चेहरे पर हौसलों की मुस्कान साफ नजर आती है। मुश्किलें लाखों हैं, पर मंजिल पाने का यकीन है। हर तरफ आत्मविश्वास और खुशियों की यह बयार आई है महिलाओं को मिलने वाले ऋण से। अब महिलाएं अपने हुनर को आसानी से पेशा बना सकती हैं। चाहे कशीदाकारी हो, मिट्टी के बर्तन बनाना या दूध बेचने के लिए चाहिए भैंस, हर उस चीज के लिए ऋण मिलेगा, जिससे आप हुनर को बढ़ाना चाहती हों। पहले जिस महिला को पति ने छोड़ दिया, उसी महिला ने जब खुद का काम शुरू किया तो पति उससे मिन्नतें कर रहा है कि वह उसके साथ रहना चाहता है। यह है करामात महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता की। इस अभियान में महिलाओं के लिए वरदान साबित हुआ है एसकेएस माइक्रो फाइनेंस। आज ये महिलाएं अपने कौशल को बाजार में बेचने में माहिर हैं और अपने काम को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।
खुशहाली है चहुंओर
बात करते हैं ज्ञानादेवी से। कशीदे का काम सीखा, तो लगा कि खुद ही क्यों न कपड़ों पर कशीदाकारी कर बाजार में सप्लाई करव्। एसकेएस से 8 हजार का ऋण लिया और कशीदे की मशीन खरीद ली। अगले 4 हजार रुपयों से कपड़ा खरीदा और फिर बाजार में कशीदा कढ़ा हुआ कपड़ा सप्लाई करने लगी। पति का भी पूरा साथ मिला। आज ज्ञानादेवी के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने जाते हैं। पूरा परिवार इस बात से बेहद खुश है कि पति-पत्नी मिलकर कमा रहे हैं और अपने परिवार को खुशहाली की राह पर ले जा रहे हैं। शुरू में उन्हें लगा था कि कैसे मैं खुद का काम करूंगी, पैसा कैसे चुकाऊंगी। पर धीरव्-धीरव् आत्मविश्वास बढ़ा और आज वह अपने काम को और बढ़ाने की सोच रही हैं।
बड़ा अच्छा लगता है
आज से तीन साल पहले विमला देवी ने 8 हजार रुपए का ऋण लिया और उन पैसों से कपड़े खरीदकर गांव-ढाणियों में बेचने लगीं। पहले पति की पान की दुकान थी, पर अब वह बंद हो गई। अब विमला ही पूरे घर की जिम्मेदारियां निभाती है। खुद के बूते काम कर रही हैं, तो सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। अब वे अपने जैसी महिलाओं को जागरूक करके आत्मनिर्भर बनने का सबक देती हैं। घर पर पोते-पोतियों के बीच घिरी रहने वाली विमला बाजार में एक समझदार दुकानदार की भूमिका बखूबी निभा रही हैं।
औरों को भी काम
जरदोजी का काम मंजु को उसके पति ने सिखाया। पहले पति यह काम किया करते थे। एक हादसे में उनकी उंगली कट गई। फिर परिवार की जिम्मेदारी मंजु ने संभाल ली और एसकेएस से ऋण लेकर बाजार में सप्लाई शुरू कर दी। अब तो उसने अपने बढ़ते काम को देखकर लोगों से भी काम करवाना शुरू कर दिया है। पहले खुद सक्षम हुईं, अब आस-पास के लोगों को रोजगार मुहैया करा रही हैं।
खुद का पैसा ही भला
मोहिनी देवी ने अपनी सास से गर्मी में हाथ से झलने वाला पंखा बनाना सीखा था। खजूर के पेड़ की पत्तियों से बनने वाले पंखों के लिए पहले साहूकार से पैसा लेना पड़ता था। पैसों को लेकर उस पर दबाव बना रहता था। ऐसे में लगा कि अगर खुद ही कहीं से पैसों का इंतजाम कर लें, तो कितना अच्छा हो। एसकेएस की योजना ठीक लगी। अब खुद पंखा बनाकर सप्लाई करती हूं, तो बचत भी ज्यादा होती है।
बड़ा आकाश- सबका साथ
विक्रम अकूला ने एसकेएस माइक्रो फाइनेंस की स्थापना इसी मकसद से की थी कि दूर-दराज गांवों की वे महिलाएं जो न तो द्गयादा पढ़ी-लिखी हैं और न ही बाहरी दुनिया से परिचित, उन्हें रोजगार के लिए पैसे की कमी आड़े नहीं आए। इसलिए वे सिर्फ महिलाओं को ऋण देते हैं और वह भी बिना किसी कागजी कार्रवाई और गारंटर के। अगर महिला गरीब है, तो अपने आस-पड़ोस की पांच महिलाओं के साथ मिलकर ऋण ले सकती है। एक साल में दो हजार से शुरू कर 16 हजार रुपए तक लिए जा सकते हैं। जिस भी महिला में कमाने की चाह है, अब उसे सिर्फ ऋण लेना है और शुरू कर देना है अपना काम। ऋण लौटाना भी है बहुत आसान। हर हफ्ते होने वाली महिलाओं की मीटिंग में आसान सी रकम देते जाइए और 50 हफ्तों में पूरी रकम अदायगी। आज एसकेएस 17 से ज्यादा राज्यों में काम कर रहा है। राजस्थान में इसकी शुरुआत जुलाई 2006 में हुई और आज 18 जिलों के 1460 गांवों में हजारों महिलाओं का भविष्य संवारने में मदद कर रहा है। महिलाओं को ऋण देने के लिए जो लोग यहां काम कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर लोग गांव और इन्हीं महिलाओं के परिवारों से हैं।
-आशीष जैन
06 October 2008
उजाला जिंदगी में
अंधेरी रात में जिस तरह एक नन्हा सा सितारा आसमान को रोशनी से लबरेज कर देता है। उसी तर्ज पर राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की मैला ढोने वाली महिलाओं ने भी अब इस कुप्रथा को छोड़कर अपनी जिंदगी को खुशियों से लबरेज कर लिया है।
कुछ लोग जिंदगी में सब कुछ सह लेते हैं जबकि कुछ बदलाव का बीड़ा उठाते हैं। उन्हीं में शुमार हैं राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की मैला ढोने वाली दलित महिलाएं। आज वे सदियों पुरानी बेड़ियों को उतारकर फैंक चुकी हैं और अपनी आगे की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए जुटी हैं। उनके सूने जीवन में रोशनी की किरण लेकर आई सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन की 'नई दिशा'। 'नई दिशा' ने सही मायनों में इन दलित महिलाओं के जीवन को नई दिशा दी है।
'नई दिशा' से जुड़कर ये महिलाएं आत्मनिर्भर बनने के लिए सिलाई, कढ़ाई, फूड प्रोसेसिंग, ब्यूटी केयर, सॉफ्ट टॉयज और बत्तियां बनाने का प्रशिक्षण ले रही हैं। नई दिशा ट्रेनिंग कम प्रोडक्शन सेंटर से इन महिलाओं की ओर से तैयार सामान गुड़गांव, अलवर और तिजारा के बाजारों में जाता है। इसके अलावा दिल्ली से आयात किए कपड़े आते हैं, जिन पर ये महिलाएं कढ़ाई का काम करती हैं। यह सामान विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। संस्था इन महिलाओं को 2 हजार रुपए मासिक भत्ता भी देती है।
हाल ही न्यूयार्क स्थित जनरल एसेंबली में दो जुलाई को आयोजित कैटवॉक में अलवर की इन दलित महिलाओं को शामिल होने का अवसर मिला। वहां 36 महिलाओं के समूह में से 11 महिलाओं ने भारत के मशहूर मॉडलों के साथ रैंप पर कदम से कदम मिलाते हुए कैटवॉक किया। इस आयोजन की तैयारी इन महिलाओं ने काफी पहले से शुरू कर दी थी। कैटवॉक के दौरान पहनी कारीगरी की गई बॉर्डर की नीली साड़ियां माइकल जैक्सन के कपड़े डिजाइन करने वाले फैशन डिजाइनर अब्दुल हल्दार की देखरेख में तैयार किए गए।
होंगे कामयाब एक दिन
न्यूयार्क में अपनी सफलता का परचम लहराकर दुनिया में भारत का नाम रोशन करने वाली ये महिलाएं वहां से लौटने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज हैं और भविष्य संवारने के मकसद से उन्होंने अपने-अपने हुनर के दम पर काम को आगे बढ़ाने की ठान ली है।
हमने कर दिखाया
अब हम सभी अपना अलग व्यवसाय खोलना चाहती हैं। ब्यूटी केयर का प्रशिक्षण लेने के बाद मैं भी अपनी अन्य बहनों के साथ मिलकर अपना ब्यूटी पार्लर खोलना चाहती हूं। प्रेसीडेंट के पद पर होने के नाते मैला ढोकर जीवन बिताने वाली देशभर की अन्य महिलाओं को इस घृणित कार्य से मुक्ति दिलाने का प्रयास करूंगी।
- उषा चौमर, प्रेसीडेंट, सुलभ इंटरनेशनल मिशन फाउंडेशन, अलवर
सिलाई और कढ़ाई से लेकर साड़ियों और सूट पर सितारे सजाने का काम मुझे अच्छा लगता है। अब मैं अपना बुटिक खोलना चाहती हूं। किसी नए काम को शुरू करने में परेशानी तो आएगी, पर हम भी पूरी तरह से तैयार हैं।
- लक्ष्मी नंदा, अलवर
सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक से बातचीत के कुछ अंश-
- आपको इन दलित महिलाओं को मैला ढोने जैसी कुप्रथा से छुटकारा दिलाने की प्रेरणा कहां से मिली?
यह तो गांधीजी का सपना था। हमने तो बस प्रयास किए हैं। कुछ समय पहले अलवर जाना हुआ, वहां कुछ महिलाओं को सिर पर मैला ले जाते हुए देख बहुत दुख हुआ। उनसे बात करने की कोशिश की, तो शुरुआत में कोई भी तैयार नहीं हुई। सबने चेहरे पर लंबा घूंघट डाला हुआ था। काफी समझाने पर इनमें से एक बात करने के लिए तैयार हुई।
-पर क्या अपने काम को छोड़ देने के लिए वे सहजता से तैयार हो गई?
जब इस काम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्वीकारा कि यह काम गंदा और अपमानजनक है। लेकिन काम नहीं किया, तो खाएंगे क्या? इस पर हमने कहा कि खाना हम देंगे, तुम काम छोड़ दो। काफी समझाने पर सब तैयार हो गईं।
- इसके बाद आपका अगला कदम क्या रहा?
इन महिलाओं के लिए अलवर शहर में ही सुलभ इंटरनेशनल की ओर से संचालित 'नई दिशा' नामक सेंटर खोला गया। शुरुआत में तीन महीनों तक नकद राशि दी गई और साथ में इनको शिक्षित करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इन्हें संस्था में ही सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी केयर, अचार, पापड़ आदि का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।
भविष्य के लिए क्या योजनाएं हैं?
इनके समूह में तीन तरह की महिलाएं हैं। पहली वे, जिनमें नेतृत्व की क्षमता है। ऐसी महिलाएं भविष्य में अपना कामकाज ठीक से संभाल लेंगी। दूसरी ऐसी महिलाएं हैं, जो नौकरी कर सकने योग्य हैं। इन महिलाओं को उनकी रुचि के अनुसार अन्य जगहों पर बतौर प्रशिक्षण नौकरी के लिए भेजा जाएगा, जिसका खर्चा सुलभ वहन करेगा। तीसरी वे महिलाएं हैं, जो केवल सामान तैयार कर सकती हैं, लेकिन बेच नहीं सकतीं। इनके लिए सामान बेचने के लिए मार्केटिंग आदि की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ ही दलित परिवारों के बच्चों के लिए 1 अप्रेल 2009 तक स्कूल की योजना है और पतियों को रुचि के आधार पर ड्राइविंग, बिजली आदि प्रशिक्षण दिए जाने हैं।
...और एक नया कदम
केंद्र सरकार के एक आकलन के मुताबिक भारत में 3.42 लाख लोग सिर पर मैला ढोने के काम से जुड़े हुए हैं। इनके लिए सन् 2007 में सरकार ने प्रधानमंत्री स्वच्छकार पुनर्वास एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम को राजस्थान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति वित्त एवं विकास निगम संचालित करता है। अलवर में 'सुलभ इंटरनेशनल' के 'नई दिशा' कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए निगम ने टोंक में भी 190 महिलाओं को स्वरोजगार प्रशिक्षण देने का जिम्मा सुलभ इंटरनेशनल को सौंपा। निगम की महाप्रबंधक शुचि शर्मा के मुताबिक राजस्थान में पुनर्वासित करने योग्य हथ सफाईकर्मी लगभग 1326 हैं। मार्च, 2009 तक इन सभी को पुनर्वासित करने की योजना है। निगम हथसफाई कर्मियों को मैला ढोने का काम छोड़कर दूसरा काम शुरू करने के लिए ऋण भी देता है।
अलवर की तर्ज पर सुलभ इंटरनेशनल ने टोंक में वहां के मशहूर नमदों के निर्माण, आरी-तारी साड़ियां और सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण देना शुरू किया। सुलभ इंटरनेशनल की सलाहकार सुमन चाहर के मुताबिक कई टीमों ने उन लोगों की काउंसलिंग की। उन्हें मैला ढोने के काम को छोड़ने के लिए तैयार किया। आज वे खुद अपने पैरों पर खड़ी हैं और कमा रही हैं। टोंक के 'नई दिशा' सेंटर पर साक्षरता कार्यक्रम, साफ-सफाई, टीकाकरण और बैंकिंग के बारे में जानकारी दी जाती है। सुबह 9 बजे से 4 बजे तक प्रशिक्षण दिया जाता है। यह एक साल का प्रशिक्षण कार्यक्रम है। इस दौरान उन्हें एक हजार रुपए प्रतिमाह भत्ता भी दिया जाता है। कमाई की बचत के गुर भी सिखाए जाते हैं। समय-समय पर महिला उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। इन लोगों की मॉनिटरिंग भी की जाती है कि परिस्थितिवश ये दुबारा मैला ढोने के काम से तो नहीं जुड़ गई हैं।
मेरा नाम- मेरा काम
मैंने 'नई दिशा' में आरी-तारी और कशीदे का काम सीखा है। पहले मुझे घबराहट होती थी कि कैसे इस नए काम को सीख पाऊंगी। पर अब सारा काम मैं बहुत सफाई से करती हूं। अभी मुझे 6 माह का ही समय हुआ है, पर अब लगता है कि खुद के बूते कुछ कर रही हूं। अब तो घर वाले भी साथ देते हैं। सेंटर पर काम का ऑर्डर आता है, इससे आय में भी इजाफा हो रहा है।
- सुनीता, उम्र 27 वर्ष, टोंक
मैंने नई दिशा से सिलाई का काम सीखा है। इसकी बदौलत अपने तीन बच्चों को पाल रही हूं। अब मैं वापस उस घृणित काम को करना नहीं चाहती। समाज में महिलाओं की स्थिति बदल रही है। ऐसे में हमें मौका मिला है, तो हम भी बता देना चाहते हैं कि हम किसी से कम नहीं। अब हमारे काम को लेकर कोई हमसे घृणा नहीं कर सकता।
- उगंता, उम्र 32 वर्ष, टोंक
03 October 2008
गांधी बाबा क्या कहते हो
01 October 2008
स्वाद से हुआ नाम रोशन
मिलिए 65 हजार रेसिपी बनाकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने वाली भोपाल की कृष्णावेणी से।
कुछ महिलाओं के हाथ में ऐसा जादू होता है कि उनकी बनाई रेसिपीज का हर कोई दीवाना बनकर रह जाता है। ऐसे में अगर कोई हमें कहे कि हिंदुस्तान में एक ऐसी भी महिला है जो हजार नहीं, दस हजार नहीं पूरे 65000 रेसिपीज बनाने में माहिर हैं तो एक बारगी तो विश्वास ही नहीं होता। जी हां, भोपाल शहर में रहने वाली 66 साल की कृष्णावेणी मुदलियर एक ऐसी ही शख्सियत हैं। खाना बनाने में बेहद पारंगत कृष्णावेणी एक आम गृहिणी ही हैं पर अपने शौक के चलते आज इनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है। बकौल कृष्णावेणी 'मैंने बहुत कम उम्र से ही भोजन बनाना शुरू कर दिया था। मेरी रूचि बचपन से ही खाना पकाने में रही। इसी का नतीजा है कि मेरा नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ है।' कृष्णावेणी बताती हैं कि जब भी मेरी इच्छा कोई रेसिपी बनाने की होती थी तो मैं उसे बनाकर ही दम लेती थी। आज कृष्णावेणी भारत के विभिन्न राज्यों की रेसिपी बना लेती हैं साथ ही इटेलियन, चाइनीज और बर्मा के व्यंजन भी बना सकती हैं। बर्मा के बारे में कृष्णावेणी बताती हैं कि मैं कुछ दिन बर्मा रही थी तो मैंने झट से बर्मा की डिशेज बनाना सीख लिया। उनका दावा है कि उनकी बनाई रेसिपीज आस्ट्रेलिया, यूरोप और अफ्रीका में भी मशहूर हो रही हैं। कृष्णावेणी कहती है कि मैं अपनी रेसिपीज में खासतौर पर स्वाद को लेकर बेहद सतर्क रहती हूं। मसालों में थोड़ी सी ऊंच-नीच रेसिपी का स्वाद बिगाड़ सकती है। मैं अपनी रेसिपी में कैलोरी की मात्रा का भी खास खयाल रखती हूं। कृष्णावेणी के बेटे ओमप्रकाश मुदलियर बताते हैं रोज हमें स्वादिष्ट भोजन खाने को मिलता है। इससे अच्छी बात हमारे लिए और क्या होगी? जब मां को खाने के लिए कोई पुरस्कार मिलता है तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। हालांकि सन् 2006 से कृष्णा का नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है। पर अब गिनीज बुक में मेरी मां का नाम आने से उन्हें पूरी दुनिया जानेगी। अभी वे बाकी विश्व रिकॉर्ड में प्रयासरत हैं। अभी तक सबसे ज्यादा रेसिपीज बनाने का रिकॉर्ड एक ब्रिटिश महिला के नाम था जिसे 3000 रेसिपीज बनाना आता था, इसकी तुलना में कृष्णावेणी की रेसिपीज की संख्या वाकई कई गुना ज्यादा थी। कृष्णावेणी की बहू कारतीखासी मुदलियर कहती हैं कि मेरी सासू मां की बनाई रेसिपीज पूरी दुनिया में चमकनी चाहिए। उनके हुनर का इस्तेमाल रोजगार सृजन में भी किया जा सकता है। इन सब बातों से एक बात तो स्पष्ट है कि कृष्णावेणी का नाम गिनीज बुक में दर्ज होना हर भारतीय गृहिणी के भोजन से लगाव का पुरस्कार माना जा सकता है।
- आशीष जैन
19 September 2008
कितने रीयल रियलिटी शो
टेलीविजन का एक रियलिटी शो..... डिजाइनर परिधान में लकदक, स्टाइलिश ढंग से नाचते-गाते, अपने हुनर को पेश करते बच्चे। लगता है वाकई क्या खूब हैं ये नौनिहाल। पर चकाचौंध में डूबे इस बचपन की असलियत कुछ और ही है। बच्चों की मासूमियत और भोलेपन के पीछे कौन-सा दर्द छुपा है, आइए, जानने की कोशिश करते हैं।
पहला वाकया- एक बांग्ला टीवी चैनल के रियलिटी शो के दौरान जजों ने 16 साल की शिंजिनी सेनगुप्ता की इतनी आलोचना की कि वह सदमे से लकवे का शिकार हो गई।
दूसरा वाकया- झारखंड के 12 साल के दीपक तिर्की ने दर्द की गोलियां खा-खाकर अपनी प्रस्तुति दी।
तीसरा वाकया- सारेगामापा लिटिल चैंप्स की विजेता 12 वर्षीय अनामिका चौधरी की तबियत कार्यक्रम के दौरान बिगड़ गई। क्योंकि उसके साथ कार्यक्रम में भाग ले रही दूसरी लड़की स्मिता नंदी के पिता को बेटी के शो से बाहर होने पर दिल का दौरा पड़ गया था।
इन दिनों छोटे परदे पर बच्चे छाए हुए हैं। कोई नाचता है, तो कोई आवाज से सबको झुमाता है। उनकी हर अदा से दर्शक खुश हैं। प्रोडक्शन हाउस और टीवी चैनल वालों के लिए बच्चे एक नए प्रॉडक्ट की तरह साबित हुए हैं। वे बड़ों की तरह हर लटके-झटके से लैस हैं। वे डिजाइनर मुस्कान देते हैं, शेर सुनाते हैं। इन बच्चों को देखकर एक बार भी नहीं लगता कि ये वाकई 'बच्चे' हैं। माता-पिता की आकांक्षाओं को पूरा करने के चलते बच्चे अब बचपन, अपनी मासूमियत को भुलाकर गलाकाट प्रतिस्पर्धा का अंग बन गए हैं। मेकअप, चमकदार कपड़े और बड़ों जैसे लटके-झटके के बीच बच्चे बार-बार यही कह रहे हैं कि हमें लगातार काम करना है और थकना नहीं है। मानो थक गए, तो हार गए। इस तरह की सोच से वे खुद को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। देर रात तक चलने वाले शूटिंग शिड्यूल्स के बीच इन बच्चों के अति उत्साह को संभालने वाला कोई व्यक्ति नहीं होता। इससे स्वास्थ्य और मनोदशा पर विपरीत असर होता है। माता-पिता और दर्शक समझते हैं कि बड़ा समझदार बच्चा है। कोई मासूम ब्रिटनी स्पीयर्स बनना चाहती है, तो कोई सोनू निगम। ऐसा नहीं कि इसके लिए वे मेहनत नहीं कर रहे हैं या उनमें प्रतिभा की कमी है। पर कहीं न कहीं लगता है कि इन सबके बीच बचपन कहीं खोता जा रहा है।
नहीं चलेगी मनमानी
ऐसे ही एक रियलिटी शो 'छोटे उस्ताद' के दौरान एक दर्शक द्वारा खास मेहमान इमरान हाशमी को चूमने से खफा होकर एक संगीत निर्देशक कार्यक्रम से वॉकआउट कर गए। उनके मुताबिक बच्चों के कार्यक्रम में इस तरह की हरकत गलत है। टीवी चैनलों और रियलिटी शोज को मशहूर बनाने के लिए बच्चों पर जिस तरह मनमानी की जाती है, उसकी तरफ सरकार का कोई ध्यान नहीं है। शिंजनी की घटना के बाद थोड़ी सी हलचल जरूर हुई है। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी कहती हैं, 'देश में जानवरों तक के लिए कानून है। सरकार इस तरह के बालश्रम को नजरअंदाज नहीं करेगी और टीवी पर नाच-गानों के ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों के काम के तौर-तरीके तय करेगी। सरकार ने इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सौंपी है और शोज में बच्चों के काम के तौर-तरीकों की जांच के लिए 10 सदस्यीय कमेटी बना दी है।' आयोग की सदस्या संध्या बजाज का कहना है, 'हम इन शोज में जजों के लिए सीमाएं निर्धारित करेंगे और यह पता करेंगे कि इनसे बच्चों की पढ़ाई पर कितना असर हो रहा है। अगर बच्चों पर दबाव में माता-पिता की भूमिका भी पाई गई, तो उनसे भी सवाल किए जाएंगे।' इस पूरी कवायद पर बचपन बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक कैलाश सत्यार्थी का कहना है, ' सरकार चाहे, तो बालश्रम कानून के तहत रियलिटी शोज के लिए अध्यादेश भी लाया जा सकता है। बालश्रम अधिनियम 1986 में 10 अक्टूबर 2006 को संशोधन किया गया। इसके अनुसार घरेलू बाल मजदूरी, ढाबों के साथ-साथ मनोरंजन क्षेत्र में भी बच्चों से काम नहीं लिया जा सकता और ये शोज भी बच्चों को मनोरंजन का एक जरिया ही बनाते हैं, तो फिर इन पर तुरंत रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है?'
हर चीज है बिकाऊ
कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि आज बाजार में हर चीज बिकाऊ है। प्रोडक्शन हाउस और चैनल वाले बचपन का बाजारीकरण करने पर तुले हैं। उन्हें घंटों कोल्हू के बैल की तरह जोता जा रहा है। रियलिटी शो वाले बच्चों और माता-पिता को रातों-रात सुपर स्टार बनने के सपने दिखा रहे हैं। इससे बच्चे भी अपनी सुध-बुध खोकर घंटों खुद को परव्शान करके भी शूटिंग और रियाज कर रहे हैं। उन्हें शूटिंग के दौरान घंटों काम करना पड़ता है, जिससे वे न समय पर खा पाते हैं और न सो पाते हैं। हकीकत यह है कि 100 में से एक बच्चा जीतता है, बाकी 99 बच्चे हार जाते हैं। कुछ बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं, जिसका गहरा असर भी हो सकता है। दो बच्चों में तुलना भी नुकसान पहुंचाती है। मसलन 'देखो, ये कितना होशियार बच्चा है। तुम भी ऐसा ही किया करो।' आम बच्चों पर कुछ खास करने का दबाव बढ़ता जाता है।
हमारे साथ ऐसा नहीं
चैनल नाइन एक्स पर चल रहे शो 'चक दे बच्चे' में भाग ले रही उदयपुर की निष्ठा के पिता ए. के. नाग चौधरी कहते हैं,' हमने अपनी बच्ची को खेल भावना से कार्यक्रम में भाग लेने की सलाह दी है। हमने उसमें कभी भी कंपीटिशन की भावना पनपने नहीं दी। उसकी मम्मी मुंबई में चौबीसों घंटे उसके साथ रहती है और उसे संबल देती है। उसके लिए तो यह एक सीखने का मंच साबित हो रहा है। हां, अगर कुछ शोज में गलत हो रहा है, तो यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।' उनकी कही इन सारी बातों में कितनी सच्चाई है, यह तो वही जानते हैं। अब तो निष्ठा चक दे बच्चे की विजेता भी बन चुकी हैं।
बुरा असर सेहत पर
वरिष्ठ मनोचिकित्सक आर. के. सोलंकी बताते हैं कि अठारह घंटे काम करने वाले बच्चों पर दिन-रात अच्छे प्रदर्शन का बोझ रहता है। यह बात वे किसी से नहीं कह पाते और मन ही मन परेशान रहते हैं। शोज में होने वाली प्रतियोगिताओं को जीवन-मरण का प्रश्न बनाने की बजाय प्रतिभा निखार के मौके के रूप में देखना चाहिए। अगर बच्चे लगातार ऐसे तनाव भरे माहौल में रहते हैं, तो उन्हें हिस्टीरिया के दौरे तक पड़ सकते हैं। बच्चों को चाहिए कि वे बिना किसी दबाव के रिलेक्स होकर अपनी स्वाभाविक कला का प्रदर्शन करें और झूठे दिखावे से बचें।
आजाद छोड़ दो
समाजशास्त्री ज्योति सिडाना कहती हैं कि माता-पिता बच्चों को बिना किसी मेहनत के रातों-रात लखपति-करोड़पति बनाने के सपने दिखा रहे हैं। यह पूरी तरह गलत है। माता-पिता को इन कार्यक्रमों में बच्चों को भेजने से पहले उनकी प्रतिभा का सही आकलन करना चाहिए। इसी के साथ दूसरा पहलू यह भी है कि आजकल बच्चे जल्दी ही किसी भी बात को दिल से लगा लेते हैं । ऐसे में अगर उन्हें धैर्य का गुण सिखाया जाए, तो जिंदगी में कभी कोई मुश्किल नहीं आएगी। बच्चे पर किसी खास काम के लिए दबाव डालने की बजाय उनकी प्रतिभा को नैसर्गिक रूप से बढ़ने का मौका देना चाहिए। बच्चों में नैतिक मूल्य सिखाने पर ही वे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के काबिल बन पाएंगे और किसी भी तरह के तनाव से दूर रहेंगे।
'सरकार इस तरीके के बालश्रम को नजरअंदाज नहीं करेगी और टीवी पर नाच-गानों के ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों के काम के तौर-तरीके तय करेगी। हमने इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सौंपी है। आयोग ने रियलिटी शोज में बच्चों के काम के तौर-तरीकों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है।' - रेणुका चौधरी, केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री
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मन करता है एक ऐसी जगह उड़ चलें, जहां कुदरत ने अपना हर रंग बिखेरा हो, जहां प्राकृतिक सुषमा के साथ विरासत का आकर्षण हो। जहां खुली हवा, नीले आसमान और हरी-भरी वसुंधरा की त्रिवेणी मिलकर मन को लुभा जाए। कला और संगीत फिजाओं में महकते हों। तो फिर आओ चलें शहर की रोशनी से दूर गांवों की ओर। यहीं मिलेगा आपको यह सब।
मैं तो जाता अपने गांव, सबको राम-राम राम। जी हां, गांवों की ओर लौट चलने का मन कर रहा है, तो देर मत लगाइए। गांव का सुकून तो बस वहां जाकर ही महसूस किया जा सकता है। गांव की मस्ती चूल्हे पर बनी मोटी रोटी और लहसुन की चटनी में ही मिल सकती है। दरअसल आज शहरों में आदमी का दम घुट रहा है। अब हमें उन बड़े-बड़े कारखानों, धुआं उगलती चिमनियों से दूर एक ऐसा गांव याद आता है, जहां हम सदा के लिए बस जाएं। पहले हम परेशान होते थे, तो याद आती थी पहाड़ों की। हम शिमला, मसूरी, दार्जिलिंग, श्रीनगर या फिर मनाली की तरफ भागते थे। पर अब तो वहां भी अजीब नजारा देखने को मिलता है। सड़कों पर चलने को जगह नहीं है। होटलों में कमरे नहीं हैं। पानी भी बूंद-बूंद करके आता है। सब तरफ परेशानियां हैं। ऐसे में हमें गांव-देहात में कुछ पल गुजारने की इच्छा होती है। मन में शायर की ये पंक्तियां गूंजने लगती हैं-
शहर की रोशनी से अब मेरा दिल भर गया यारो
चलो फिर से वहीं पुराने गांव चलते हैं।
मन चाहता है, कुछ ऐसे पल, जो सदा के लिए उसके हृदय में बस जाएं। वो पल कानों में बांसुरी की मधुर धुन की तरह गूंजते रहें। आज फिर गांव लौटने का मन कर रहा है। आप और हम ही नहीं, पूरी दुनिया के लोगों को गांव की मिट्टी की सौंधी सुगंध भा रही है। सांसों में बहती हुई शांति, दिलों में बसता हुआ लोगों का विश्वास और प्यार, पूरी दुनिया में किसी मोल में नहीं मिल सकते। गांव में आप बरगद के पेड़ नीचे बैठे-बैठे कब सुबह से शाम के सफर पर पहुंच जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
हां, भारत के लिए ग्रामीण पर्यटन की बात कुछ नई हो सकती है। पर यह अब धीरे-धीरे विकसित हो रहा है। लोग वाकई गांव का माहौल पसंद कर रहे हैं। पर्यटन से जुड़े लोग भी इस ओर ध्यान देने लगे हैं। देसी से लेकर विदेशी पर्यटक कड़ाही में पकती हरी सब्जियों का आनंद लेना चाहते हैं। वे तंदूर की रोटी को खेजड़ी के पेड़ के तले पूरे इत्मीनान से खाना चाहते हैं। चाहे गांवों में बिजली ना हो, सड़कें ना हों, पर कं क्रीट के जाल से निकलकर वहां की झोपड़ियों में जाते ही दिल को आराम मिलता है। गांव वाले भी इस बात से खुश हो रहे हैं कि लोग आ रहे हैं। इस बहाने उनका भी रोजगार बढ़ रहा है। उन्हें भी आमदनी हो रही है। वे मन ही मन पावणों का स्वागत करके भाव-विभोर हो रहे हैं। इसी तरह विदेशी पर्यटक भी कहते हैं कि यहां के कण-कण में आत्मीयता छुपी है। यहां आज भी ग्रामीण लोगों में 'अतिथि देवो भव' की भावना बसी हुई है। वे पर्यटकों को अपने परिवार का सदस्य मानकर सेवा करते हैं। यह विचार सिर्फ रॉबर्ट का ही नहीं है बल्कि राजस्थान में आने वाला हर पर्यटक यहां के सत्कार व आवभगत से अभिभूत है। इस तरह लोगों के ग्रामीण पर्यटन की ओर बढ़ते रुझान को देखकर सरकार भी वहां के लोगों को तो रोजगार के अवसर मुहैया करा ही रही है, साथ ही इस बहाने पर्यटकों को भी हर तरह की सुविधा मिल रही है। 'राजग्राम्य योजना' और 'ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट योजना' इसी तरह की योजनाएं हैं, जो ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से लागू की गई हैं।
क्या है राजग्राम्य योजना
राजस्थान सहकारिता विभाग ने 30 दिसम्बर 2007 से जिले के हर्ष गांव व फतेहपुर के ढांढ़ण गांव को ग्रामीण सहकार पर्यटक योजना में शामिल करते हुए राजग्राम्य योजना की शुरूआत की गई है। योजना में राज्य के 26 पर्यटक स्थलों को चिह्नित किया गया है।
राजग्राम्य योजना में देशी विदेशी पर्यटक अनुभवी ट्यूर ऑपरेटर्स के प्रयासों से 30 सदस्यों के पर्यटक दल को भ्रमण के लिए लाया जाएगा। गांव के रहन-सहन जानने के लिए भ्रमण के दौरान पर्यटकों को गांव का पैदल या बैलगाड़ी से दौरा करवाकर वहां की कला-संस्कृति एवं रहन-सहन व परम्पराओं से अवगत कराया जाएगा। इस दौरान ठहरने की व्यवस्था ग्राम सेवा सहकारी एजेन्सी करव्गी।
साफा पहनाकर किया जाएगा स्वागत
योजना के तहत गांव में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों का तिलक लगाकर, लोकगीत गाकर, माला व राजस्थानी पगड़ी अर्थात् साफा पहनाकर उनका स्वागत किया जाएगा।
झोंपड़ी में होगी चारपाई
ग्राम सेवा सहकारी समिति भ्रमण दल के सदस्यों के लिए झोंपडिय़ों में व्यवस्था की जाएगी। बैठने के लिए मिट्टी से बनी सीटों अथवा मुड्डों की व्यवस्था होगी।
संस्कृति व लोक कलाकारों की प्रस्तुति
भ्रमण दल को गांव की कला एवं संस्कृति से रूबरू करने के लिए स्थानीय लोक कलाकारों द्वारा भोपा-भोपी नृत्य, कालबेलिया नृत्य, सपेरा नृत्य, शेखावाटी का प्रसिद्ध कच्ची घोड़ी नृत्य, बग्गी की सवारी, ऊँट व घोड़ी नृत्य दिखाया जाएगा।
गांव सहकार पर्यटक योजना के तहत गांवों में मिट्टी के बने बर्तन, लकड़ी, कपड़े, हस्तनिर्मित सामान, नमदे, खेस, बादले, राजस्थानी जूतियां, मोजड़ी उपलब्ध कराए जाएंगे।
गांव के परिवारों से जुडऩे का सीधा मौका
गांव में आने सभी पर्यटकों को ग्रामीण जीवन के रहन-सहन व उनके बारे में जानने का सीधा मौका मिल सकेगा। इसके अलावा यहां आने वाले पर्यटकों को ग्रामीण जीवन की झलक भी देखने को मिलेगी।
ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट योजना
भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 'ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट योजना' नाम की एक नई योजना शुरू की है। इस के तहत कोई भी मकान मालिक इसमें भाग लेकर अपने मकान का कमरा/कमरे पर्यटकों को रहने के लिए दे सकेगा, जिसमें मकान मालिक को भी आय होगी और पर्यटकों को भी अच्छी जगह सस्ते दामों पर मिल सकेगी। वैसे तो यह योजना पूरे भारत वर्ष में लागू है परन्तु ऐसे इलाकों में इसका खास महत्त्व होगा, जहां होटल के कमरों की कमी है। इस योजना में भाग लेने के लिए मकान मालिकों को पहले पर्यटन मंत्रालय/पर्यटन विभाग के पास स्वयं को पंजीकृत कराना होगा कि वे अपने कमरे पर्यटकों को रहने के लिए देना चाहते हैं तथा उनके पास पर्यटकों के रहने लायक गुणवत्ता वाले आवास हैं।
योजना में भाग लेने की शर्तें
योजना में भाग लेने के लिए सबसे पहली शर्त तो यह है कि घर का मालिक घर में रहता हो, उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला न हो, कम से कम एक तथा अधिक से अधिक पांच कमरे किराए पर दे सकता है।
योजना के लाभ
यदि आपका घर पहले से ही सभी सुविधाओं से सुसज्जित है, तो कम खर्चे में आप यह व्यापार शुरू कर सकते हैं। इसके अलावा पर्यटक बहुत ही कम समय के लिए ठहरते हैं। मंत्रालय ने कोई दरें निर्धारित नहीं की हैं। 'गोल्डन वर्ग' में आने वाले कई घरों के मालिक, पर्यटकों से 1500 से 2500 रूपए प्रतिदिन लेते हैं। मेजबानों के लिए मेहमान कोई बोझ नहीं है। मेजबान को उन्हें सिर्फ सुबह का नाश्ता देना होता है। अधिकांश मेहमान पूरा दिन बाहर रहते हैं और रात को लौटते हैं। महिलाओं के लिए तो यह कारोबार बहुत ही लाभकारी है क्योंकि वे घर से बाहर निकले बिना ही कमा सकती हैं और इसके लिए खास प्रशिक्षण की भी आवश्यकता नहीं होती।
योजना में कैसे भाग लें
योजना में भाग लेने के लिए एक आवेदन-पत्र है जिसे पर्यटन मंत्रालय की वेबसाइट www.incredible india.org से प्राप्त किया जा सकता है। फार्म प्राप्त करने के बाद पुलिस सत्यापन के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन में आवेदन करना होगा। पुलिस की क्लियरेंस मिलने में लगभग दो दिन लगते हैं।
इसके बाद आवेदनकर्ता को अपना आवेदन (जिसके साथ उन सुविधाओं की सूची लगी हो, जो आपके घर में उपलब्ध हैं) फार्म प्रस्तुत करना होगा जिसके साथ पुलिस का क्लीयरेंस लगा हो तथा घर के स्वामित्व का प्रमाण पत्र भी संलग्न हो, आवेदनकर्ता को मंत्रालय को पंजीकरण शुल्क भी जमा कराना होगा, जो 'गोल्ड कैटेगरी' के लिए 5,000 रूपए तथा सिल्वर वर्ग के लिए 3,000 रूपए हैं।
इसके बाद मंत्रालय की एक समिति उस घर का दौरा यह सुनिश्चित करने के लिए करेगी कि बताई गई सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं। समिति तब यह निर्णय करेगी कि घर 'स्वर्ण (गोल्ड)' वर्ग में आएगा या 'रजत (सिल्वर)' वर्ग में।
(उर्मिला राजौरिया, अतिरिक्त निदेशक, पर्यटन विभाग से बातचीत के आधार पर)
- आशीष जैन (रतन सिंह के सहयोग से)
16 September 2008
ये बंधन है दोस्ती का
दुनिया में जब हम आते हैं, तो अनायास ही एक-एक रिश्ते में बंधते चले जाते हैं। सिर्फ दोस्ती ही ऐसा रिश्ता है, जो हम खुद बनाते हैं। लेकिन जब रिश्तेदारी में दोस्ती भी शुमार हो, तो क्या कहना।
दोस्ती की आंच पर पके रिश्तों की मजबूती गजब की होती है। एकदम खिले हुए, सहज और भरोसे के लायक। ऐसा होगा, तो आपको कभी रिश्तों में जटिलता या जकड़न महसूस नहीं होगी, बल्कि विचारों के खुलेपन की नई तस्वीर नजर आएगी। दिल की बात जुबां पर आसानी से आएगी और इसका फायदा आपके संबंधों को ही मिलेगा, फिर चाहे कोई भी रिश्ता हो। कुछ इसी फलसफे के साथ अपने रिश्तों में दोस्ती को जीते हुए लोगों की दास्तां-
जाने कब दोस्त बन गए
सचिवालय में कार्यरत माला जैन का कहना है कि मैं जितनी धूम-धाम और खुशी से बहू लाई थी, वह खुशी आज भी कम नहीं हुई। मैंने तो ज्यादातर सास-बहू को आपस में बुराइयां करते ही सुना है। मैं मानती थी कि यह रिश्ता कभी दोस्ताना नहीं बन सकता। लेकिन मेरी सोच गलत थी। हम कब सास-बहू से दोस्त बन गए, पता ही नहीं चला। यदि उसे कोई काम नहीं आता, तो मैं बिना डांटे या ताना दिए उसे प्यार से समझा देती हूं। कभी मैं कुछ गलत करती हूं, तो वह भी दोस्त की तरह मुझे समझाती है। हम कभी एक-दूसरे की बात का बुरा नहीं मानते। संस्कार के साथ-साथ मेरी बहू में रिश्तों को निभाने की समझ भी है। दूसरी तरफ बहू कविता का कहना है कि जब मैं शादी होकर इस घर में आई थी, तो बहुत झिझक रही थी। जैसा कि हर बहू के साथ होता है। लेकिन सास का ऐसा साथ मिला कि न जाने कब यह घर अपना लगने लगा। मुझे घर का काम करने की आदत नहीं थी। लेकिन कभी मेरी सास ने इस बात को मुद्दा नहीं बनाया। घर के बाकी लोगों को तो यह भी नहीं पता कि मुझे क्या बनाना आता है और क्या नहीं। कभी मेरी सास ने किसी तरह की शिकायत नहीं की। इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे कॅरियर बनाने की भी सलाह दी। फिलहाल मैं बैंक परीक्षा की तैयारी कर रही हूं और इसमें मेरी सास का पूरा सहयोग मिल रहा है। वे मेरे खान-पान से लेकर हर चीज का ध्यान रखती हैं। आज मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि वे मेरी सास कम और दोस्त ज्यादा हैं।
माला जैन, कविता जैन(सास-बहू)
बुरा होता नहीं देख सकता
लोग हमें पिता-पुत्र कम और दोस्त ज्यादा मानते हैं। इसमें उनकी गलती नहीं, हमारा रहन-सहन ही कुछ ऐसा है। हम जहां भी जाते हैं फुल मस्ती करते हैं। ये कहना है ट्यूरिस्ट कोच से जुड़े सुरेंद्र शर्मा का। वे अपने बेटे अमन को दोस्त समझकर हर बात में उससे सलाह लेते हैं। वे कहते हैं कि चाहे अमन का कॉलेज में एडमिशन हो या मोबाइल खरीदना हो, मैंने कभी अपनी मर्जी नहीं थोपी। हमने आज तक हर छोटी-छोटी बात एक-दूसरे से शेयर की है। खाली समय में हम किसी भी विषय पर चर्चा करने लगते हैं। मेरव् साथ रहकर उसे दोस्तों की कमी नहीं खलती। एक बार ग्यारहवीं क्लास में उसका अपने दोस्तों के साथ मनमुटाव हो गया था। इस वजह से वह काफी डिप्रेशन में था। मैंने उस वक्त एक दोस्त की तरह मानसिक रूप से सपोर्ट किया। कभी मोबाइल पर कोई अच्छा मैसेज आता है, तो मैं उसे अमन को फॉरवर्ड कर देता हूं। बड़ी से बड़ी गलती करने पर भी उसे डांट दूं, तो बाद में दिल मेरा ही दुखता है। वहीं बेटे अमन का कहना है कि पापा शुरू से ही क्रिकेट खेलते थे। उन्होंने मुझे एक दोस्त की तरह क्रिकेट की बारीकियां सिखाईं। उन्होंने मुझे क्लब क्रिकेट खेलने की सलाह भी दी। मैंने जयपुर क्लब में क्रिकेट जॉइन किया। लेकिन पढ़ाई के चलते उसे निरंतर नहीं रख पाया। इस बारे में पापा को पता चला, तो उन्होंने मुझे वापस क्लब जॉइन करने को कहा। मैं भी उनका कहा टाल न सका। एक अच्छे दोस्त की यही निशानी होती है कि वह अपने दोस्त का बुरा होता नहीं देख सकता और यही मेरे पापा ने किया।
सुरेंद्र शर्मा, अमन शर्मा (पिता-पुत्र)
दो जिस्म एक जान हैं हम
कौन कहता है कि हम दो बहनें हैं। हम तो दुनिया की सबसे अच्छी दोस्त हैं। दोस्ती के इस रिश्ते से ही हमारे चेहरों पर मुस्कान बनी रहती है। यह कहना है जीएनएम नर्सिंग कर रही शमा का। वह बताती है कि मेरी छोटी बहन पिंकू बहुत सीधी है। किसी से कुछ नहीं कहती। मन की हर बात छुपा कर रखती है। लेकिन मैं उसका चेहरा पढ़ लेती हूं। वह भी मम्मी-पापा और दोस्तों की बजाय मुझसे हर बात शेयर करती है। हम दोनों बहनें जरूर हैं लेकिन दोस्तों की तरह कॉम्पिटीशन भी रखते हैं। एक-दूसरे से शिकायत करते हैं तो कभी नोंक-झोंक भी हो जाती है। लेकिन एक सच्चे दोस्त की तरह मैं अपना हर फर्ज निभाने की पूरी कोशिश करती हूं। जब कभी पिंकू की तबियत खराब होती है या वो किसी परेशानी में होती है, तो मैं अपना काम छोड़कर उसके पास पहुंच जाती हूं। दूसरी ओर छोटी बहन पिंकू का कहना है कि मैं पहले बहुत सीधी-सादी लड़की थी। लेकिन दीदी ने मुझे समझाया कि आज की दुनिया में इतना सीधापन अच्छा नहीं होता। उन्होंने मेरी हर आदत को सुधारकर मेरे व्यक्तित्व को निखारा है। उन्होंने मुझे इतना प्यार और भरोसा दिया कि मैं हर बात उनसे खुलकर कर सकती हूं। यह काम कोई दोस्त ही कर सकता है। मैंने भी कभी उनकी बात का बुरा नहीं माना और जैसा उन्होंने कहा, वैसा ही किया।
शमा पंवार, पिंकू पंवार (बहनें)
पूरा ध्यान रखता हूं
ज्वैलरी का काम करने वाले विनोद शर्मा बड़े भाई की भूमिका में तो सभी को नजर आते हैं लेकिन अपने छोटे भाई कमलेश के लिए वे दोस्त भी हैं। वे बताते हैं कि वह मनचला है। या यूं कहें कि उसमें बचपना ज्यादा है। होने को तो उसकी शादी हो गई है लेकिन उसमें उतनी परिपक्वता नहीं है, जितनी होनी चाहिए। यही वजह है कि मैं बिजनेस और उसके व्यक्तिगत जीवन का पूरा ध्यान रखता हूं। वह भी हर काम मुझसे पूछकर करता है। काम को लेकर कभी तकलीफ नहीं हुई। छोटे भाई कमलेश का कहना है कि जितने सीधे और सरल भाईसाहब हैं, उतनी ही चंचलता मुझमें है। यूं तो हमारा बिजनेस एक है लेकिन सारा ध्यान वे ही रखते हैं। मुझे पार्टियां करने का शौक है। यदि मैंने घर में अपनी ओर से कोई कार्यक्रम रखा है, तो उसे पूरी तरह संभालते वे ही हैं। कभी कोई काम करने से मना नहीं करते। जब भी मैं किसी परेशानी में होता हूं, तो वे मुझे दोस्त की तरह संभाल लेते हैं। मेरे पूरे परिवार को लगता है कि वे मेरे साथ हैं, तो मुझे कुछ नहीं हो सकता। मेरा विश्वास भी यही है। सच कहूं तो मैंने भाई के रूप में सच्चा दोस्त पाया है।
विनोद शर्मा, कमलेश शर्मा (भाई)
प्रीति स्वर्णकार, आशीष जैन
12 September 2008
पापा मेरे पापा
विशाल वृक्ष के साए में जिस तरह हर मौसम की मार से महफूज नन्हे पौधे बेफिक्री से झूमते हैं और हवा-पानी पाकर बढ़ते जाते हैं। उसी तरह जिंदगी के संघर्षों की तीखी धूप से हमें राहत देता है पिता का प्यार। ज्यों ज्यों हम बड़े होते जाते हैं, उनके वात्सल्य की गहराई समझ आती जाती है। उम्र के हर दौर में हमें याद आता है पिता के साथ हुआ अनमोल लेन-देन। कुछ इसी तरह की यादों के जरिए अपने दिल की बात कह रहा है एक युवक।
आज मैं अपनी उम्र के 30 बसंत देख चुका हूं। इतने सालों में कई चीजें बदल गईं, कई अच्छे-बुरे दौर गुजर गए पर एक चीज कभी नहीं बदली। वह है मेरे पिता का स्नेह, दुलार, विश्वास और उनकी बांहों में मिली सुरक्षा, जो आज भी हर मुश्किल समय में मुझे हमेशा महसूस होती है। मुझे धुंधली सी याद है, जब मैं बहुत छोटा था। उस वक्त पिताजी मुझे अपनी उंगली पकड़कर धीरे-धीरे चलना सिखाते थे। मैं कई बार गिरता, पर हर बार वे मुझे संभाल लेते और बदले में मैं उन्हें एक प्यारी सी मुस्कान दे दिया करता था। वे मुझे कभी गिरने नहीं देते थे। शायद इसीलिए मेरे नन्हे कदम जल्दी ही सध गए और मैं कब दौड़ने लगा, पता ही नहीं चला। जब मैं चार साल का हुआ, तो अपने पापा का हाथ पकड़कर पहली बार सहमता हुआ स्कूल गया। पापा मुझे वहां छोड़कर जा रहे थे, तो मैं दौड़कर वापस उनके पास आया और उन्हें कसकर पकड़ लिया। पापा ने मुझे प्यार से समझाया और मैं मान गया।
जब पापा साइकिल लाए
जब कुछ बड़ा हुआ और मैंने 12 साल की उम्र में साइकिल की जिद की, तो पापा मेरे लिए तुरंत बाजार से सुंदर सी साइकिल लाए थे। मैं दिन भर उस पर बैठकर पार्क के चक्कर लगाता रहता और पापा को बताया कि मैं इससे पूरी दुनिया का चक्कर काटूंगा। पापा भी मेरी पीठ थपथपाकर कहते, 'क्यों नहीं बेटा, जरूर चक्कर लगाना पूरी दुनिया का।'
मैंने गिफ्ट दिया
उसी दौरान एक बार पापा मेरे लिए पेंसिल कलर लेकर आए थे। मैंने उनसे घर की पूरी दीवारें रंग दी थीं। बाद में मुझे लगा कि पापा डांटेंगे। पर पापा जब ऑफिस से आए, तो पीठ पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए बोले, 'ड्रॉइंग बहुत अच्छी करते हो, पेंटर बनने का इरादा है क्या?' मैंने कुछ नहीं कहा और अपने कमरे से एक पेपर लाकर पापा से बोला,'यह रहा आपका गिफ्ट।' पापा ने पेपर देखा। मैंने उसमें पापा की ही पेंटिंग बना रखी थी। उन्होंने मुझे गले लगा लिया। उस वक्त मुझे लगा, मानो पूरी दुनिया भर की खुशियां एक ही पल में मुझे मिल गई हों।
उन्हें लिखा पहला खत
जब मैं 15 साल का हुआ, तो एक समर कैम्प के लिए दस दिन के लिए अपने शहर जयपुर से दूर जाना पड़ा। उस वक्त पापा ने अपने हाथों से मेरे लिए बैग जमाया और मिठाई का डिब्बा भी रखा और कहा, 'घबराना मत, मन लगाकर चीजें सीखना।' मैं घर से दूर तो जा रहा था, पर मन ही मन उनसे बिछुड़ने का गम था। वहां जाकर मैंने पिताजी को एक चिट्ठी लिखी। वह चिट्ठी आज भी पिताजी मुझे दिखाते हैं कि किस तरह मैंने अपने बचकाने शब्दों में ढेर सारा प्यार उंडेला था।
कहां खोए हो बेटा !
जब बचपने से जवानी की दहलीज पर कदम रखा, तो पड़ोस में रहने वाली हमउम्र लड़की को पसंद करने लगा। रात-दिन उसी के ख्यालों में खोया रहने लगा। एक दिन जब पापा ने पूछा, 'बेटा, कहां खोए रहते हो? कोई बात है क्या?' तो मन की बात जुबान पर आ ही गई। मैंने डरते-डरते पापा को उसके बारे में बताया। पर उस वक्त भी पापा के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और कहा, 'बेटा, वह अच्छी लड़की है, पर इस उम्र में होने वाली आकर्षण स्थायी नहीं होता। अभी तुम्हारी उम्र करियर की तरफ ध्यान देने की है। उम्र के इस दौर में अगर तुम बहकोगे, तो खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारोगे।' पापा ने बताया कि क्यों मुझे इस उम्र में वह अच्छी लगती है। मुझे क्या करना चाहिए। इस समझाइश से पापा के लिए मेरे मन में बसी इज्जत और भी बढ़ गई। उस दिन से उनका व्यकि्तत्व मुझे बहुत विशाल लगने लगा।
रातभर जागते थे
जब मैंने 18 साल की उम्र में एम्स में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए प्रवेश परीक्षा के लिए तैयारी शुरू की, तो पापा भी मेरे साथ रात भर जागते रहते थे। मेरी छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखते थे। वे मेरा हौसला बढ़ाते रहते थे। मैंने भी मन ही मन ठान लिया था कि मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेकर दिखाना है। जिस पल मेडिकल कॉलेज में एडमिशन की बात पिताजी को पता लगी, उनकी आंखों से आंसू बह निकले थे। इतना संतोष, इतना गर्व उनके चेहरे पर देखकर लगा कि वाकई मेरे पिताजी दुनिया के सबसे अच्छे पिता हैं। कुछ दिनों बाद मैं एम्स में आ गया और पढ़ाई में रम गया। फिर तो छुट्टियों में ही मिलना होता। टेलीफोन और खत ही हमारे बीच संवाद के सेतु का काम करते थे। जब-जब मैं घर आता, तो रात को पापा के पास आकर लेट जाता। उनका सान्निध्य पाकर लगता कि दुनिया की कोई परेशानी मुझे कमजोर नहीं कर सकती। हम घंटों पक्के दोस्तों की तरह बातें किया करते। बात करते-करते हम कब नींद के आगोश में डूबते, पता ही नहीं चलता।
डांट में था सबक
जब कभी दिल्ली से आता, तो उनके लिए कुछ न कुछ जरूर लेकर आता। पर जो चीज आज भी पिताजी के पास रखी है, वह है- उस वक्त मेरा लाया हुआ चश्मा। न जाने क्यों मुझे हर वक्त उनकी चिंता लगी रहती थी। तभी तो एक बार उनकी बीमारी की खबर लगते ही मैं एग्जाम बीच में ही छोड़कर चला आया था। हालांकि बाद में पापा ने बहुत डांटा था, पर मैं कैसे खुद को रोक सकता था। उनकी डांट में एक सबक था।
मैं हूं ना...
जब 24 साल की उम्र में पढ़ाई पूरी की, तो गांव आकर ही क्लिनिक खोली। उस वक्त पिताजी पूरे गांव में शान से कहते थे, 'मेरा बेटा डॉक्टर है। इलाज बहुत अच्छा करता है।' और जब कभी कोई मरीज सही होकर उनसे मेरी थोड़ी सी भी तारीफ कर देता, तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। उन दिनों हम किराए के मकान में रहते थे। एक दिन जब मेरी शादी की बात चली, तो लड़की वालों ने कहा, 'आपका खुद का घर तो है नहीं, ऐसे में हम अपनी बेटी आपको कैसे दे दें?' पिताजी को यह बात चुभ गई। रात को बातों ही बातों में मुझसे कहने लगे,'मैं ताउम्र क्लर्क की नौकरी करता रहा। कभी सोचा ही नहीं कि खुद का मकान भी बनवाना है।' यह कहते-कहते वे थोड़ा भावुक हो गए। उस वक्त मैंने उन्हें गले लगाते हुए कहा, 'पापा, चिंता मत करो। मैं हूं ना। सब ठीक हो जाएगा। आपका मकान भी बनेगा और मेरी शादी भी धूमधाम से होगी।' उस वक्त उनके चेहरे पर वही भाव थे, जो कभी उनके मुझे सहारा देने पर होते थे।
पूरी की इच्छा
कुछ दिनों बाद ही उन्होंने मेरी शादी कर दी। बहू को आशीर्वाद देते वक्त उन्होंने कहा, 'मेरा बेटा मेरे लिए एक 'बेटी' लेकर आया है।' शादी के कुछ समय बाद मां का देहांत हो गया। पिताजी दुखी थे पर मुझसे कभी कुछ नहीं बोले। मैंने पिताजी को धीरज बंधाने की पूरी कोशिश की। हमने चारों धाम की यात्रा करने की सोची। मैं, मेरी पत्नी और पापा चारों धाम की यात्रा पर निकल गए। पिताजी की शुरू से ही चारों धामों के दर्शन की इच्छा थी, सो वह भी पूरी हो गई। जब हमारे घर 'नया मेहमान' आया और पिताजी दादाजी बने, तो उन्होंने पूरे गांव को न्योता दिया। ढेरों खुशियां मनाईं।
बस आपका प्यार चाहिए
मैं सोचता कि पिताजी ने मुझे इस काबिल बनाया और मैं किस तरह अपना 'पितृ ऋण' चुकाऊं? कुछ ही दिन पहले की बात है। मेरा जन्मदिन था। मैं 30 साल पूरे कर चुका था। शाम को पार्टी हुई। पार्टी के बाद पिताजी मेरे पास आए और उन्होंने कहा, 'बता, तुझे क्या गिफ्ट दूं?' मैंने कहा, 'मुझे तो बस आपका प्यार चाहिए और कुछ नहीं।' इसके बाद उन्होंने एक कागज का पुर्जा मुझे थमा दिया। उनके जाने के बाद मैंने उसे पढ़ा। उसमें लिखा था, 'बेटा, तू मेरी पहली और आखिरी पूंजी है। सदा ऐसा ही खुश रहना।' यह पढ़कर मेरी आंखें छलक पड़ीं।
संतुष्ट हूं मैं
अगले दिन मैं पिताजी के साथ सैर पर जा रहा था। वे लाठी टेकते हुए चल रहे थे। एकाएक एक पत्थर से उनकी लाठी टकराई और वे लड़खड़ा गए। तभी मैंने उन्हें संभाल लिया। उस समय मैं उनके चेहरे पर वही मासूम मुस्कान देख रहा था, जो आज से लगभग तीस साल पहले मैंने उन्हें दी होगी जब उन्होंने मुझे संभाला था। आज मैं संतुष्ट हूं कि मुझे मौका मिला अपने पिता की सेवा करने का और बचपन में मिले दुलार का अंश भर लौटाने का।
-आशीष जैन
11 September 2008
वो जब याद आए, बहुत याद आए
जैसे वृक्ष के साए में नन्हे पौधे बेफिक्री से झूमते हैं और स्नेह की हवा पाकर बढ़ते जाते हैं। इसी तरह जिंदगी की तपती-तीखी धूप में भी हमें याद आती है पिता के प्यार की ठंडी फुहार। बचपन में पिता के साथ गुजारे पलों को हर कोई बार-बार याद करना चाहता है। पेश है ऐसे ही कुछ सेलिब्रिटीज की बचपन में पिताजी के साथ जुड़ी रोचक यादें-
शबाना आजमी-कैफी आजमी
बचपन में मेरे एक दोस्त ने बताया कि उसने मेरे अब्बा का नाम अखबार में पढ़ा था। चालीस बच्चों वाली क्लास में सिर्फ मेरे अब्बा का नाम अखबार में आया था और इस घटना से मैंने मान लिया कि अब्बा कुछ अलग तरह के इंसान हैं। अब मुझे उनका कुर्ता-पाजामा पहनना बुरा नहीं लगता था। यहां तक कि मैंने वो काली गुड़िया भी बाहर निकाली, जो उन्होंने बचपन में मुझे दी थी। तब मैं चाहती थी कि वो मुझे नीली आंखों वाली सुनहरे बालों की गुड़िया खरीदकर देते, पर अब्बा ने मुझे प्यार से समझाया कि काला रंग भी खूबसूरत है और मुझे अपनी गुड़िया पर नाज करना चाहिए। तब मैं सात साल की थी और यह बात मेरी समझ में नहीं आई, पर मैंने चुपचाप वह गुड़िया ले ली और छुपा दी। तीन साल बाद मैंने उसे बाहर निकाल लिया, क्योंकि वो ही इस बात का पहला प्रमाण थी कि मैं अलग तरह के पिता की अलग तरह की बेटी हूं।जब मैं बड़ी हुई, तो अब्बा ने मेरी जिंदगी के हर फैसले में मेरा साथ दिया और जरूवरत लगी, तो मार्गदर्शन भी किया। जब मैं साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए दिल्ली से मेरठ तक एक पदयात्रा में शामिल होने जा रही थी, तो मैं थोड़ा नर्वस थी। मैं अब्बा के कमरे में गई, तो उन्होंने मुझे खींचकर अपने सामने बैठाया और कहा, 'मेरी बहादुर बेटी भला क्यों डर रही है। जाओ तुम्हें कुछ नहीं होगा। यह सुनकर मेरा सारा डर निकल गया था।
अमिताभ बच्चन-हरिवंशराय बच्चन
आज बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन जिस मुकाम पर हैं, वहां उन्हें थमकर जरा सा सुस्ताने की फुर्सत नहीं है। कभी न थकने का यह माद्दा अमिताभ को अपने पिता हरिवंशराय से मिला। बकौल अमिताभ 'बाबूजी को कैरम खेलना, क्रिकेट खेलना वगैरहा पसंद नहीं था। वे पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया करते थे। पर वे क्रिकेट प्रेम को बखूबी जानते थे। उन दिनों वे लंदन में थे और बंकिंघम पैलेस में एक कार्यक्रम में निमंत्रित किए थे। वहां भारत की क्रिकेट टीम भी गई हुई थी। उन्होंने तुरंत एक कागज वीनू मांकड़ को दिया और कहा कि कृपा करके पूरी टीम से ऑटोग्राफ ले दें। वीनू अचंभित कि इतना बड़ा कवि ऑटोग्राफ मांग रहा है, तो उन्होंने बताया कि मेरा बेटा बहुत खुश होगा और सचमुच वह ऑटोग्राफ वाला कागज जब बाबूजी ने मुझे पत्र में भेजा और मैंने दोस्तों को दिखाया, तो पूरे स्कूल में अचानक मैं बहुत मशहूर हो गया था।मेरे फिल्मों में आने के बाद बाबूजी ने मेरी सभी फिल्में देखी। अपने मित्रों में फिल्म का प्रचार भी करते थे। फलां फिल्म जरू र देखने जाना, अमित ने अच्छा काम किया है।'
लिएंडर पेस-वीस पेस
बचपन में मैं सॉकर खेला करता था। हमारी टीम का नाम था- कोला कोला। एक बार हमने गोल्ड स्पॉट टीम से फाइनल खेला था। मैच निर्णायक मोड़ पर था। ऐसे में मुझे पेनल्टी किक लगाने का मौका मिला, पर मैं चूक गया। हम मैच हार गए। मुझे लगा सब खत्म हो गया। सभी मुझे ही हार का जिम्मेदार मान रहे थे। ऐसे समय में मेरे पापा मेरे पास आए, मुझे उठाया और कंधे पर बिठाया। फिर पीठ पर झुलाते हुए सॉकर रू म तक ले गए। वे कहते रहे, 'सुनो, तुम सबसे अच्छे थे, तुम हो सकते हो और यही तुम्हें होना है। कभी-कभी चीजें आपके हाथ में नहीं होतीं और कभी उन्हें वैसा ही छोड़ देना चाहिए, जैसा कि वे असल में हैं।'
नितिन राय-रघु राय
जब मैं छोटा था, मुझे फोटोग्राफी की जगह संगीत ज्यादा आकर्षित करता था। मैं उन दिनों संगीतकार बनने का सपना देखता था। पर मेरे पिता के कलात्मक फोटोग्राफ मेरे अवचेतन मन को प्रभावित करते रहे। धीरे-धीरे उनका कैमरा बैग टांगकर मैं उनके फोटो शूट में उनका साथ देने लगा। डार्क रूम में भी उनके इर्द-गिर्द ही घूमता रहता और मेरे अंदर चित्रों के प्रति कलात्मक समझ पैदा होती गई। मम्मी पत्रकार थी, उनकी स्टोरीज के लिए मैं फोटोग्राफ उपलब्ध कराने लगा। हाई स्कूल में 'टारगेट' मैग्जीन के लिए फोटोग्राफ खींचने लगा। पिताजी अक्सर कहते, 'पहले काम की पूरी बारीकियां सीखो, फिर उसमें हाथ आजमाओ।' आज मुझे उनकी वे बातें याद आती हैं।
प्रिया दत्त-सुनील दत्त
मैं सिर्फ 13 साल की थी, तभी मेरी मां का निधन हो गया। उस वक्त पापा ही हमारे लिए मां बन गए थे। हमारे स्कूलों में जाना, नाटकों में जाना... वे सब कुछ करते थे। इतने बिजी शेड्यूल में भी वे हमारे लिए समय निकालते थे। सन 1987 में पिताजी दंगों से झुलसे भारत देश में शांति के उद्देश्य से मुंबई से अमृतसर पदयात्रा पर निकले। मैंने कहा, 'पापा, मैं भी आपके साथ आना चाहती हूं।' पापा ने मुझे इसी बात के साथ इजाजत दी कि मैं अगले साल कॉलेज रिपीट करूं। मैंने इस यात्रा में पापा से जो मानवीय मूल्य ग्रहण किए, वे आज भी काम आ रहे हैं।
ये भी खूब है
2. राहुल बाबा देश के नए तारणहार हैं
3. हैदराबाद हरिकेन विवादों का दूसरा है नाम,
4. कॉलम लिखने पर बात बिगड़ गई
5. पहले हाथ का साथ छोड़ा
6. तुझ संग प्रीत लगाई सजना
7. हमरा बाजीगर, खेल रहा है कौनसी बाजी
8. महाराजा ने भी हल्ला बोल दिया
9. परदेसन माधुरी नेने की वापसी करारी हुई,
10. मोनिका भाभी लौट आई है गांव,
12. पिता कवि, बुद्धिजीवी हैं,
(भाई संजय सोनगरा का योगदान साल 2008 आने पर )
ए वतन ए वतन
1.मेरे वतन से अच्छा कोई वतन नहीं है।
सारे जहां में ऐसा कोई रतन नहीं है॥
2.शहीदों के मजारों पर, लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का, बाकी यही निशां होगा॥
3. कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा।
ये जिंदगी है कौम की, तू कौम पे लुटाए जा॥
4.तू शेरे हिंद आगे बढ़, मरने से तू कभी न डर।
उड़ा के दुश्मनों का सर, जोशे वतन बढ़ाए जा॥
5.दिल से निकलेगी न मरकर वतन की उल्फत
मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी॥
6. ऐ शहीदे- मुल्को- मिल्लत, तेरे जज्बो के निसार।
तेरी कुरबानी का चर्चा गैर की महफिल में है॥
बातें खरीदारी की
खरीदारी करते समय हमें कुछ खास बातों का खयाल रखना चाहिए, ताकि अपने पैसे का सदुपयोग हो सके।
1हर वस्तु का बिल जरूर प्राप्त करें और संभालकर रखें।
2वस्तु के साथ मिलने वाली गारंटी या वारंटी के अंतर को भली-भांति समझ लें।
3एम आर पी पर भी तौल-मोल करके उचित मूल्य ही चुकाएं।
4मेडिकल वस्तुओं जैसे- दवाइयों की खरीदारी करते समय एक्सपायरी डेट जरूर जांच लें।
5वस्तु की खरीद करते समय उसके निर्माता, विक्रेता, ब्रांड नाम, गुणवत्ता, टिकाऊपन, टेक्नोलॉजी और उपयोगिता पर भी ध्यान दें।
6 ब्रिकी के बाद की सेवाओं की जानकारी भी लें। इलेक्ट्रोनिक उत्पाद खरीदते समय ध्यान रखें कि इसके पार्ट्स कहां मिलेंगे, उनकी सेवा कहां कराई जा सकेगी इत्यादि।
7 अगर उपहार योजना के तहत खरीद करते हैं, तो उपहार के बारे में भी पूरी जानकारी लें।
8. नकद खरीद और फायनेंस से खरीद में मूल्य का अंतर पता करें।
9. छुपे हुए मूल्यों की पड़ताल खरीद से पहले ही कर लें।
10. विज्ञापनों से प्रभावित होकर बिना सही जांच-पड़ताल के उत्पाद न खरीदें।
- आशीष जैन
10 September 2008
ख्वाबों के पंखों तले हकीकत
क्या आपके मन की पतंग गाहे-बेगाहे कल्पना की उड़ान भरने लगती है? क्या आपको कल्पना के संसार में डूबे रहना अच्छा लगता है? खुश हो जाइए, क्योंकि कल्पना के परों से ही हकीकत का संसार मिल पाता है। वाकई कल्पना से सब कुछ हासिल करिए।
कहा जाता है कल्पना की उड़ान सबसे तेज वायुयान से भी अधिक है। हम सब भी कल्पना की उड़ानें भरते हैं। इंसान की कल्पना की पतंग आसमान छू लेना चाहती है। इंसान इन्हें साकार करने की इच्छा संजोता है हर पल। लेकिन कल्पना की पतंग उड़ाना कुछ के लिए कोरी और सतही बात हो सकती है। पर असलियत में कल्पना एक इंसान के लिए बहुत मायने रखती है। कल्पना इंसान के व्यक्तित्व का कायाकल्प कर देती है। कल्पना हमें सिखाती है कि हम खुद अपने भाग्य निर्माता हैं। अगर खुद को ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं, तो कल्पना की शक्ति को पहचानना होगा। मन और मस्तिष्क को अगर कल्पना के पंखों का सहारा मिल जाए, तो सफलता का हर दरवाजा खुलने लगता है। कल्पना करें, अपने सपनों को मन की गहराइयों से महसूस करें और फिर आप पाएंगे कि धीरे-धीरे हर ख्वाब हकीकत बनता जा रहा है। आज के समय में कल्पना के सहारे व्यक्तित्व विकास की अवधारणा तेजी से फैलती जा रही है। दरअसल व्यक्तित्व विकास में सबसे अहम भूमिका मन, मस्तिष्क और शरीर की होती है। अगर कल्पना के सहारे हम मन, मस्तिष्क और शरीर का विकास कर अपने लक्ष्य की ओर केन्द्रित कर सकें, तो निश्चित ही सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। कल्पना पुरुष, महिला, युवा या बुजुर्ग सबके लिए अहमियत रखती है। व्यक्तित्व विकास का मूल हम सभी के भीतर ही निहित है, पर हम सब इस गुण को बाहरी संसार में खोजते रहते हैं। सोचें, पूरी शिद्दत से सोचें और मन की गहराइयों में डूब जाएं। आप देखेंगे कि कल्पना ने न केवल आपका शरीर बल्कि मन की आपकी हर सोच को पूरा करने में आपकी मदद कर रहा है। आपका व्यक्तित्व निखर रहा है। तो फिर खो जाइए कल्पना के महासागर में।
कल्पना का मन
आप चाहे कुछ भी हासिल कर लें, मन में एक न एक इच्छा फिर भी शेष रहती ही है। ऐसे में कल्पना के घोड़े दौड़ाते रहें, मन में अपने सपनों को पलने दें। मन की उड़ान को रोकें नहीं। ओशो के अनुसार, 'हर बीज अपने अंदर एक विशाल वृक्ष की संभावना लिए पैदा होता है। जब एक बीज वृक्ष बन सकता है, तो सारे बीज वृक्ष बन सकते हैं। बस जरूरत बीज की चाहत को हमेशा संजोकर रखने की है।' बचपन में हम सब कल्पना का एक विशाल संसार लेकर पैदा होते हैं। दिनभर उसी संसार में खेलते-कूदते हैं। धीरे-धीरे हमारा यह गुण लुप्त होने लगता है और हम अपनी कल्पना को तिलांजलि देकर तर्क को महत्त्व देने लगते हैं। तर्क से हम अपनी सीमाओं में बंधकर रह जाते हैं। हर चीज में हमें लाभ-हानि नजर आने लगती है। हम खुलकर सपने नहीं देख पाते। जिंदगी भर हमारे मस्तिष्क में ख्वाबों की अधूरी तस्वीर रहती है। हमें सपने बेकार लगते हैं। उनमें जीना और उन्हें महसूस करना बचपना लगने लगता है। अगर हम तर्क में थोड़ा सा कल्पना का रंग घोल दें, तो हमारी सोच का दायरा विशाल हो जाता है। कल्पनाशील व्यक्ति पहले दिल की सुनता है, फिर अपने दिमाग की। वह समस्या आने पर अपनी कल्पनाओं के परों को खोलता है। हर दिशा और पहलू से चिंतन-मनन करने के बाद मन उस हल को मान लेता है और फिर हकीकत में भी समस्या सुलझ जाती है। हम अनंत शक्ति लेकर पैदा हुए हैं। आइंस्टीन के मुताबिक, 'कल्पना ज्ञान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।' ऐसे में अगर आप मन की कल्पनाओं की सम्मान करना सीख जाएं और उनके मुताबिक अपना जीवन ढाल लें, फिर आप भी यही कहेंगे, 'मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।'
कल्पना से सेहत
लेखक रव्मेज सासन के एक लेख के अनुसार नवीनतम शोधों के परिणाम बतलाते हैं कि कल्पनाशीलता हमारी सेहत को प्रभावित करती है। एक कल्पनाशील व्यक्ति खुशियों को कहीं बेहतर ढंग से महसूस करता है और जीवन की छोटी-छोटी बातों में खुशियां खोज लेता है। वह ऐसे लोगों की अपेक्षा स्वस्थ रहता है, जो जीवन में हर बात को तर्क के आधार पर लेते हैं। कल्पना की उड़ान क्रियाशीलता बढ़ाती है। सपनों और कल्पनाओं से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और भयंकर बीमारियों से बाहर निकलने की ताकत मिलती है। जो लोग कल्पना करते हैं, उनका तनाव भी जल्दी दूर होता है। शरीर में रक्त का प्रवाह भी कल्पना से प्रभावित होता है। शोध में देखा गया है कि कल्पना के सहारे कई लोग सालों तक युवा बने रहे और जीवन का आनंद बेहतर ढंग से उठा पाए। जापान के वृद्ध लोगों से जब उनकी दीर्घायु का राज पूछा गया तो उनका जवाब था, 'हमने तो अपनी कल्पनाओं में अपने स्वस्थ जीवन की छवि बना रखी है।हम कल्पना करते हैं और वो साकार होने लगती है।'
सामाजिक गुणों की खान
ऐसा नहीं है कि कल्पनाशील व्यक्ति सिर्फ अपने खयालों में खोया रहता है। कल्पनाशील इंसान सामाजिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभा पाते हैं। व्यक्ति की एकाग्रता, धैर्यशीलता, हास्यबोध और आत्मविश्वास जाग्रत करने के लिए मनोवैज्ञानिक कल्पना-शक्ति का सहारा लेने की सलाह देते हैं। लेखक स्टेप जोन्स कहते हैं, 'इंसान कल्पना की मदद से संवेदनाओं को बेहतर तरीके से महसूस कर पाता है। दूसरों के दर्द और तकलीफ में भी शामिल होने के लिए एक सच्चा दिल चाहिए, जो कल्पनाशीलता से ही हासिल होता है।'
समस्याओं का हल
मनोवैज्ञानिक विषयों के लेखक मार्टिन रोसमैन के अनुसार, 'कल्पनाशीलता एक तरह की पॉजिटिव सोच होती है। इसमें हम अपने आने वाली हर चीज के बारव् में विस्तार से सोचते हैं। फिर उसका हल निकालते हैं। व्यक्ति को यह पता होता है कि यह सब वास्तविक नहीं है। पर असलियत में उन परिस्थितियों का सामना करने पर समस्या हल करने के कई विकल्प सामने होते हैं। कल्पना के सागर में गोता लगाते हुए उन्हें कोई न कोई ऐसा मोती मिलता है, जो उनका काम आसान बना देता है।'
लक्ष्य बनाए आसान
मनुष्य अपने जीवन काल में मस्तिष्क का पांच फीसदी हिस्सा ही इस्तेमाल कर पाता है। ऐसे में दिमाग के तार खोलने में भी कल्पना की अहम भूमिका है। थॉमस एडिसन, न्यूटन हों या जॉर्ज बनार्ड शॉ, ये सभी लोग किसी आविष्कार या कृति को वास्तविकता के धरातल पर उतारने से पहले मस्तिष्क में गहन कल्पना करते थे। अमरीकी मनोवैज्ञानिक दौड़ से पहले धावकों को कल्पना करने की प्रेरणा देते कि वे दौड़ जीत चुके हैं। इस कल्पना से उनका मस्तिष्क आने वाली बाधाओं पर केन्द्रित हो जाता और हल खोज लेता। इससे धावक जीत के लक्ष्य को आसानी से पा लेते। हेलेन केलेर बचपन से ही न सुन सकती थी, न देख सकती थी। फिर भी उनका मस्तिष्क मात्र कल्पनाओं के सहारे कई भाषाओं को सीखने में सक्षम हुआ। इससे साबित होता है कि कल्पना में आया एक आइडिया वाकई दुनिया बदलने की ताकत रखता है। हर मर्ज की एक दवाएक गृहिणी दिनभर अपने काम में इस तरह मशगूल रहती है कि अगर कुछ पल के लिए कल्पना के संसार में जीए, तो सारी थकान पलभर में दूर हो जाती है। ऑफिस में काम करता एक पुरुष अगर अपने काम लेकर थोड़ा सा हवाई हो जाए और कल्पना के सहारे खुद को थोड़ा बेहतर महसूस करे, तो उसकी कार्यक्षमता में इजाफा होता है। युवावर्ग जहां अपने करियर को लेकर चिंतित रहता है, वहीं बुजुर्ग अपने भविष्य को लेकर परेशान। ऐसे में अगर हम अपने जीवन में कल्पना के लिए थोड़ा सा समय निकाल पाएं, तो जिंदगी आसान लगने लगती है। हम सबके लिए जरूरी है कि हम बच्चों का भोलापन उधार लें और कल्पनाओं के संसार में खो जाएं। इससे हम खुद को जान पाएंगे। क्या हैं हम, क्या हैं हमारी इच्छाएं और क्या हैं उनका समाधान!
कल्पना को दें नई उड़ान
डॉ. विन वेनगेर अपनी पुस्तक 'दी आइंस्टीन फैक्टर' में कल्पनाशीलता को विकसित करने की तकनीक बतलाते हैं।
1. एक शांत जगह आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं और आंखें बंद कर मन को शांत रखें। कल्पनाओं के सागर में गोता लगाने के लिए एक अलग कमरा तय करें।
2. अब आप अपनी कल्पनाओं के द्वार खोल दें और आप जो कुछ अनुभव कर रहे हैं, उसे जोर-जोर से बोलें। जहां तक हो, किसी व्यक्ति से अपनी बात कहें या अपने सामने एक टेपरिकॉर्डर भी रख सकते हैं।
3. अपनी कल्पनाओं के इस कमरे में जो कुछ भी आप अनुभव करते जा रहे हैं, उसे बोलते जाएं। स्वाद, सुगंध, माहौल से जो कुछ आप ग्रहण कर रहे हैं, उसे बोलें।
4. बिना किसी दबाव के जो कुछ आप अनुभव कर रहे हैं चाहे वो चित्र हो, रंग हो, जोर से बोलें।
5. लगातार रोज यह प्रक्रिया 20 मिनट तक दोहराएं।
6. यह प्रक्रिया कम से कम 3 सप्ताह तक करें।
7. इस अभ्यास से आपका मस्तिष्क आपकी कल्पनाओं के अनुकूल ढलेगा और आपकी बुद्धिमता में इजाफा होगा।
एक्टिव इमेजिनेशन का कमाल
मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ने 'एक्टिव इमेजिनेशन' पद्धति द्वारा व्यक्तित्व विकास की अवधारणा पेश की। इस पद्धति से व्यक्ति खुद के अवचेतन मन से संपर्क कर सकता है।
1. जुंग खुद से जुड़ने की सलाह देते हैं। अपने अंतर्मन का सम्मान करते हुए बुद्धिमता का महत्त्व आंकना चाहिए। हंसी से भी व्यक्ति का व्यवहार झलकता है। कभी भी खुद को जरू रत से ज्यादा गंभीरता से न लें। अपने अंतर्मन की यात्रा को सहजता से लें। आंखें बंद कर चित्रों की कल्पना करें। यह आपके सपनों का रास्ता हो सकता है। मन के चित्रों को स्पष्ट से अधिकतम स्पष्ट करें। अगर आपका अवचेतन इस चित्र में बदलाव चाहता है, तो उसे होने दें। स्वप्न, कल्पनाएं प्रतिपल बदलती हैं। इसलिए बिना घबराए चित्रों को चलने दें। इसके बाद अवचेतन आपसे बात करता जाएगा।
2. किसी व्यक्ति या वस्तु, जिससे आपको लगता है कि मदद मिल सकती है, उससे वार्तालाप करें। धीरे-धीरे करके जोर से बोलते जाएं। अपने संवाद लिखें। इन्हें अपने दिमाग में साकार करते जाएं। इसके बाद अपने मस्तिष्क को शांत करें और अवचेतन मन के बहाव को दुबारा स्थापित करें।3. कुछ समय बाद अवचेतन मन से भेजी गई सूचनाएं और अधिक साफ हो जाती हैं। इससे कल्पनाओं और वास्तविकता का भेद मिटने लगता है।
-आशीष जैन
...आगे पढ़ें!09 September 2008
धुआं धुआं होती नारी
आज जहां पूरी दुनिया तंबाकू से होने वाले नुकसान से चिंतित है। वहीं युवा पीढ़ी खासकर लड़कियां इससे होने वाले खतरों को धता बताकर इसे शौकिया अपना रही हैं। नई रिपोर्ट्स भारतीय शहरी महिलाओं और लड़कियों में धूम्रपान का बढ़ता चलन दर्शा रही हैं। यह संकेत घातक है। देश का स्वास्थ्य इससे बिगड़ सकता है। क्योंकि जब जननी ही धूम्रपान करने लगेगी, तो कैसे आने वाली पीढ़ी सुरक्षित रह पाएगी? विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर पेश है महिला धूम्रपान पर एक रिपोर्ट-
'अमिता, तुम भी किस जमाने की लड़की हो! कॉन्वेन्ट स्कूल में हमारे साथ पढ़ती हो, हॉस्टल में रहती हो और सिगरेट पीने से इस तरह घबराती हो।' नीता यह बात अपनी सहेली अमिता से कह रही थी। नीता और अमिता आज के समय की सच्चाई हैं। भारतीय शहरी महिलाएं और लड़कियां धूम्रपान के मामले में पुरुषों की बराबरी तक लगभग पहुंच गई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए अध्ययन 'फर्स्ट रिपोर्ट ऑन ग्लोबल टोबैको यूज' के मुताबिक आज शहरी भारत में 10 में से एक महिला धूम्रपान करती है या तंबाकू चबाती है। अंतरराष्ट्रीय शोध दर्शाते हैं कि धूम्रपान के कारण महिलाएं उत्पादन जीवन के लगभग आठ साल खो देती हैं। इस विषय पर केन्द्रीय स्वास्थ्य संगठन मंत्रालय के 'राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम' की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में तंबाकू का सेवन करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय शोध दर्शाते हैं कि धूम्रपान के कारण महिलाएं अपनी प्रॉडक्टिविटी के लगभग आठ साल खो देती हैं। आज देश के नामी स्कूल-कॉलेजों की लड़कियां आसानी से खुल्लमखुल्ला सिगरेट के कश खींचती नजर आ जाती हैं। धूम्रपान करने वाली 62 फीसदी भारतीय महिलाएं धूम्रपान न करने वाली 38 फीसदी की तुलना में अपने 'प्रॉडक्टिविटी इयर' में मर जाएंगी। यह अध्ययन इसी साल फरवरी में 'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन' में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन से जुड़े प्रभात झा कहते हैं, 'तंबाकू खासकर महिलाओं को ज्यादा क्षति पहुंचाता है। भारत में सन् 2010 के दशक में 30 से 59 साल के बीच की महिलाओं की कुल मौतों में से 5 फीसदी मौतें अकेले धूम्रपान के कारण होंगी।' धूम्रपान करने से गर्भावस्था के दौरान कई समस्याएं सामने आ सकती हैं। मृत शिशु, प्रीमैच्योर बेबी या फिर गर्भपात भी हो सकता है।
तनाव को बताती हैं वजह
जयपुर की एक मशहूर बीपीओ कंपनी में काम करने वाली 24 वर्षीय अनन्या सिगरेट के बारे में अपने विचार खुलकर पेश करती है। उसके मुताबिक, 'कॉलेज के दिनों में ही मैंने बीपीओ जॉइन कर लिया था। यहां काम का दबाव जबर्दस्त रहता था। रात की शिफ्ट्स में भी लगातार काम करना पड़ता था। जिसके चलते मैंने सिगरेट पीनी शुरू कर दी। अब तो सिगरेट खून में समा गई है और मैं इसे नहीं छोड़ सकती। अनन्या जैसी लड़कियां बदलती अर्थव्यवस्था से पैदा हुए माहौल की एक बानगी भर हैं। आज महानगरों में लड़कियां खूब पैसा कमा रही हैं, ऐसे में इस तरह के शौक उनके लिए आम हो चुके हैं। एनईजेएम 2008 के मुताबिक आश्चर्यजनक रूप से 25 प्रतिशत भारतीय स्त्रियां रोजाना दस से भी ज्यादा सिगरेट फूंक रही हैं। हावर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक शोध के अनुसार वैवाहिक जीवन में होने वाली खट-पट से परेशान होकर भी महिलाएं धूम्रपान की ओर मुड़ रही है।
ग्लैमर, दिखावा और इंप्रेशन
जयपुर में एमबीए की 22 वर्षीय छात्रा पायल के मुताबिक सिगरेट तो ग्लैमर का एक प्रतीक है। अगर आपको अपने बॉस या दोस्तों को इंप्रेस करना है, तो सिगरेट के कश तो लेने ही पड़ेंगे। जब हमने उससे सिगरेट शुरू करने की वजह पूछी, तो उसका कहना था, 'शुरुआत में तो मैं सिगरेट से नफरत करती थी। पर मैंने देखा कि जो लड़कियां बॉस और दोस्तों के साथ सिगरेट पी रही हैं, उनका इंप्रेशन अच्छा है, तो मैंने भी सिगरेट पीना शुरू कर दिया। पर अब मैं इस लत को छोड़ना चाहती हूं। मुझे दुख है कि लाख कोशिशों के बाद भी मैं वापस सिगरेट पीने लगती हूं।' आज के दौर में विज्ञापनों और फिल्मों में नायिकाओं को धूम्रपान करते दिखलाया जाता है। ऐसे में पायल जैसी लड़कियां दिग्भ्रमित हो जाती हैं और सिगरेट को स्टेटस सिंबल से जोड़ने लगती हैं। सिगरेट कंपनियां भी अपने लुभावने विज्ञापनों से इस तरह का माहौल पैदा कर देती हैं, मानो सिगरेट के कश में एक जादुई संसार छुपा है। 'बंटी और बबली' फिल्म की विम्मी की तर्ज पर अधिकतर विज्ञापन और फिल्में धूम्रपान को आजाद ख्यालों से जोड़ती हैं। आज भी 26 फीसदी फिल्मों में हीरोइन धूम्रपान करते आसानी से नजर आती है।
क्या राज है इसमें
जयपुर के मालवीय नगर में लगभग 22 वर्षीय सुषमा और 21 वर्षीय निधि बतौर पेइंग गेस्ट रहती हैं। एक बार मुंबई में रहने वाली उनकी मित्र अंजलि उनसे मिलने आई। बातों ही बातों में उनमें शर्त लगी कि सुषमा सिगरेट नहीं पी सकती। सुषमा यह बात सुनकर भड़क उठी। उसने कहा, 'मैं भी पी सकती हूं।' अंजलि ने तुरंत उसके सामने सिगरेट पेश कर दी। सुषमा भी जोश में सिगरेट पीने लगी। धीरे-धीरे यह लत में तब्दील हो गई। अंजलि कहती है, 'मैंने उस वक्त गलती से सिगरेट पी ली थी। पर अब मैं सिगरेट पीना लगभग छोड़ चुकी हूं। मेरी दोस्तों ने मुझे इस बारे में बहुत समझाया। तब जाकर मैंने संकल्प लिया कि अब कभी सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाऊंगी। सही बात भी है। अक्सर दोस्तों के उकसाने पर भी लड़कियां इस आदत का शिकार होती हैं। पश्चिमी संस्कृति के अनुरूप खुद को पेश करने की चाह भी इसके पीछे एक खास वजह है। डॉक्टरी शोध बताते हैं कि धूम्रपान करने वाली महिलाओं में कैंसर होने की आशंका 25 गुना ज्यादा होती है। साथ ही इससे महिलाओं की प्रजनन प्रणाली भी गड़बड़ाने की आशंका रहती है। जयपुर के कॉन्वेट स्कूल के पास होकर अभी कॉलेज के प्रथम वर्ष में दाखिला लेने वाली अंतिमा एक बार पिकनिक पर अपनी फ्रैंड्स के साथ गई थी। ग्रुप में एक लड़की को सिगरेट पीने की आदत थी। अंतिमा ने भी जिज्ञासावश सिगरेट पी ली। मस्ती और मजाक से शुरू हुआ यह दौर कब आदत बन गया, खुद उसे नहीं पता। आज भी अंतिमा इस बात से डरती है कि यह बात कहीं उसके माता-पिता को पता न लग जाए।
पता नहीं था
जयपुर में रहने वाली 20 वर्षीय प्रिया के पिताजी का जवाहरात का बिजनेस है। एक बार वह एक अच्छे होटल में डिनर के लिए गई। वहां एक जगह फ्लेवर्ड हुक्का था। दोस्तों और उसने मिलकर इसे एक बार आजमाने के लिए सोचा। उस वक्त को सबको थोड़ा अजीब लगा। पर धीरे-धीरे प्रिया का उस होटल में आना-जाना बढ़ा। हुक्के से आदत सिगरेट में तब्दील हो गई। अपनी इस आदत के बारे में प्रिया कहती है कि कभी-कभार सिगरेट पीने से क्या फर्क पड़ता है। पर शायद वह यह नहीं जानती कि यही निकोटिन एक दिन उसके लिए फेंफड़े के कैंसर का सबब हो सकता है।
आओ कुछ करें
महिलाओं में बढ़ता धूम्रपान रोकने के लिए कुछ खास तरह के उपायों की जरूरत है। वैसे तो सन् 1975 से ही सिगरेट के पैकट पर 'धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है' लिखा आ रहा है। पर यह 6 शब्द शायद उतने असरकारक साबित नहीं हुए हैं। सन् 1998 में कम उम्र के लोगों को तम्बाकू उत्पाद न बेचने की बात भी सही तरह लागू नहीं हुई। परदे पर धूम्रपान की मनाही के प्रस्ताव पर असमंजस की स्थिति है। ऐसे में एक महिला, जो मां-बहन या बेटी की निश्चल भूमिका में थी, उसका इस तरह अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ वाकई चिंताजनक है। ऐसे में जरू रत है नई दिशा में बेहतर तरीके से सोचने और समन्वित प्रयास करने की।
- आशीष जैन
कम्प्यूटर शायरी
तुमसे मिला मैं कल, तो मेरी दिल में हुआ इक साउण्ड
लोग कहते हैं प्यार में नींद नहीं आती
खुदा से स्कूटर मांगा, कार दी अपार्टमेंट मांगा, बंगला दिया
मेरे मरने के बाद मेरे दोस्त यूं आंसू ना बहाना
08 September 2008
कलम के बूते
गुलाम का न दीन है, न धर्म है, गुलाम के रहीम हैं न राम हैं।
क्या मैं अपने ही देश में गुलामी करने के लिए जिंदा रहूं? नहीं, ऐसी जिंदगी से मर जाना अच्छा। इससे अच्छी मौत मुमकिन नहीं।
पिंजरा तो सोने का होने पर भी पिंजरा ही रहेगा।
जंगल में रहने वाले पक्षी की अपेक्षा पिंजड़े का पक्षी ही अधिक फड़फड़ाता है।
जितने भी बंधन है, वे सब अबलों के ही अर्थ,बंधन बंधन ही है, तोड़ो यदि तुम सबल समर्थ।
विचार और कार्य की स्वतंत्रता ही जीवन, उन्नति और कुशल-क्षेम का एकमेव साधन है।
जो स्वतंत्र है, सारी प्रकृति उसकी अभ्यर्थना करती है, संपूर्ण विश्व उसके आगे सिर झुकाता है।
स्वाधीनता सद् गुणों को जगाती है, पराधीनता दुगुर्णों को।
स्वतंत्रता का मर्म समता है। विषमता में स्वतंत्रता भंग हो जाती है।
स्वतंत्रता अनुभव करना ही जीवन है। पराभूत सजीव होकर भी मृत है।
बेड़ियों में बंद राजा होने से तो आसमान का स्वतंत्र कबूतर होना ज्यादा अच्छा है।
आजादी, सुख-समृद्धि, प्रेम, आशा और विश्वास ही भोर है।
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06 September 2008
उम्र 70 की हौसले 17 के
उम्र- 70 साल
संघर्ष- बचपन में ही सिर से पिता का साया उठ गया। पढ़ाई के साथ-साथ एक टैक्सटाइल फैक्ट्री में भी काम किया।
उपलब्धि- पहली महिला अंतरिक्ष यात्री होने का गौरव प्राप्त।
'अब मैं मंगल ग्रह पर जाना चाहती हूं। फिर चाहे मेरे लिए यह यात्रा एक ही ओर की क्यों ना हो।' यह सुनीता विलियम्स या किसी नवयुवक की चाह भर नहीं है। यह उम्मीद है 70 साल की वैलेंटिना तेरेश्कोवा की। उम्र चाहे 70 की हो, पर उनके हौसले तो 17 साल के युवा को भी मात करते हैं। कौन हैं वैलेंटिना?
ये कोई आम महिला नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला हैं। जहां एक ओर सन् 1963 में रूस की महिला वैलेंटिना तेरेश्कोवा अंतरिक्ष में कदम रख चुकी थीं, वहीं अमरीका सन् 1983 तक किसी महिला को अंतरिक्ष में नहीं भेज पाया। तेरेश्कोवा का यह अभियान बेहद गुप्त रखा गया था। रूस चाहता था कि अमरीका से पहले अंतरिक्ष में महिला भी वही भेजे। रूस के ही यूरी गागरिन ने अंतरिक्ष में सबसे पहले कदम रखा था।
जब तेरेश्कोवा प्रशिक्षण लेने जा रही थी तो उन्होंने अपनी मां से भी यह बात छुपा रखी थी। जब रव्डियो पर यान की उड़ान की घोषणा हुई, तो उनकी मां को पता लगा कि उनकी बेटी तो अंतरिक्ष की सैर पर जा रही है।
6 मार्च, 1937 को यारोस्लाव के निकट एक छोटे से गांव बोल्शोय मास्लेनिकोवो में वैलेंटिना का जन्म हुआ। बचपन में ही इनके सिर से पिता का साया उठ गया। इनके पिताजी रूसी सेना में टैंक लीडर थे, वे द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ाई करते हुए मारव् गए। 18 साल की उम्र में पढ़ाई के साथ-साथ वह एक टैक्सटाइल फैक्ट्री में भी काम किया करती थी। 22 साल की उम्र में पैराशूट से पहली छलांग लगाने वाली तेरेश्कोवा ने स्कूल खत्म करने के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। 24 साल की उम्र में उन्होंने अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए एप्लाई किया।
तेरेश्कोवा अपने पिता से बेहद प्यार करती थी। जब वे अंतरिक्ष यात्रा से लौटीं तो लोगों ने पूछा, 'ये धरती आपका आभार कैसे प्रकट करे ?' तो जवाब में तेरेश्कोवा बोली, 'बस वो जगह बता दो, जहां मेरे पिताजी लड़ाई में शहीद हुए थे।' उनकी इच्छा पूरी हुई और उस जगह को खोजकर उनके पिता का स्मारक बनाया गया। बकौल तेरेश्कोवा 'सन् 1961 में मेरा चयन हुआ था। उस समय महिला पायलट बहुत कम हुआ करती थी। इसलिए यान उड़ाने का मौका पेराशूट उड़ाने वाली महिलाओं को मिला।' चयन के बाद 15 महीने प्रशिक्षण में गुजरव्। बहुत मुश्किलों और अंतरिक्ष में रहने के कठोर अभ्यास से तेरव्श्कोवा को गुजरना पड़ा। इस अभ्यास में स्पेस क्रॉफ्ट चलाना, झटकों को बर्दाश्त करना, अकेले रहना और भारहीनता के अनुभवों से गुजरना वाकई बुरी तरह थका देने वाली प्रक्रिया थी।
पर तेरेश्कोवा ने कभी हार नहीं मानी और हर चुनौती का डटकर सामना किया। इस सबके बाद आखिरकार वह दिन आया 16 जून 1963, जब वोस्तोक-6 को उड़ान भरनी थी। तेरेश्कोवा की बरसों की साधना पूरी होने वाली थी। वह बहुत उत्तेजक माहौल था। यह दो यानों का संयुक्त मिशन था। 14 जून 1963 को वोस्तोक-5 भी छोड़ा गया था। इस मिशन में दोनों यानों को एक ही समय में कक्षा में रहना था। दोनों यानों से अंतरिक्ष यात्रियों ने आपस में संपर्क भी किया। यान से तेरेश्कोवा ने धरती के 48 चक्कर लगाए और 70 घंटे 50 मिनट तक अंतरिक्ष में रहीं। उन्होंने वहां धरती के कई चित्र लिए जो बाद में वैज्ञानिकों के काफी काम में आए। तेरेश्कोवा कहती हैं,'यह 70 घंटे और 50 मिनट का समय मेरव् जीवन का सबसे रोचक समय था।'
वोस्तोक-6 के वापस लौटने पर यान से बाहर निकलने के बाद तेरेश्कोवा ने 20 हजार फीट की ऊंचाई से पैराशूट के माध्यम से जमीन पर पहुंची। लोगों ने पूछा कि अंतरिक्ष में जाकर कैसा लगा? तो उनका जवाब था 'मैं अपना काम पूरी शिद्दत से कर रही थी और मैं यान की सुरक्षा को लेकर भी चिंतित थी। इसके सबके बावजूद मैं भारहीनता का आनंद ले रही थी।' वापस लौटने पर उसके साथी उसे चिढ़ाया करते थे कि उसे तो आंद्रे निकोलायेव से शादी कर ही लेनी चाहिए। निकोलायेव भी अंतरिक्ष यात्रियों की जमात में एक अकेले ऐसे शख्स थे, जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई थी। 3 नवंबर 1963 को तेरेश्कोवा और आंद्रे शादी के बंधन में बंध गए। इनकी बेटी का नाम था ऐलेना। ऐलेना दुनिया की पहली ऐसी महिला हैं जिनके मम्मी-पापा दोनों अंतरिक्ष की सैर करके आ चुके हैं।
तेरेश्कोवा ने ना केवल अंतरिक्ष विज्ञान में नाम कमाया, बल्कि उनमें सामजिक उत्थान की भी भावना थी। वे कई सालों तक सुप्रीम सोवियत की सदस्य रहीं। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेलसन मंडेला ने उन्हें शताब्दी के नेता के पुरस्कार से सम्मानित किया। तेरेश्कोवा को अपने देश से बेहद लगाव है और वे रूस में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रोत्साहन के लिए भी काम कर रही हैं।
-आशीष जैन
गांधी की अब चल रही है आंधी
कुछ समय पहले कहा जाता था कि गांधी के विचार सिर्फ किताबों तक सिमटकर रह गए हैं। नई पीढ़ी गांधी का सिर्फ नाम याद रखेगी। पर अब यह बात गलत साबित होती दिखाई दे रही है। आज जहां विश्व में हिंसा और आतंकवाद बढ़ रहा है वहां गांधीवाद उसे खत्म करने के लिए एक प्रभावकारी विकल्प के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। तकनीक से लेकर मैनेजमेंट तक गांधीजी के विचार उपयोगी साबित हो रहे हैं।
1.रामाल्लाह में फिलीस्तीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अब्बास ने रिचर्ड एटेनबरो की फिल्म गांधी में गांधी का किरदार निभाने वाले बेन किंग्स्ले के साथ 'गांधी' फिल्म देखी और फिलिस्तीन व इजरायल के बीच की समस्या को शांति से सुलझाने की बात की।
2. लखनऊ में लोगों ने शराब की दुकानें बंद करवाने के लिए सबको गुलाब भेंट किए और शराबबंदी का आह्वान किया।3. 7 जनवरी, 2008 को नासिक की केंद्रीय जेल से एक कैदी लक्षण तुकाराम गोले ने महात्मा गांधी की आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' पढ़कर अपने अपराधों को कबूल कर लिया।
5. मलेशिया में हिंदू अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठन हिंदू राइट्स एक्शन फोर्स 'हिंदराफ' के तत्त्वावधान में आगामी 16 फरवरी, 2008 को कम से कम दस हजार मलेशियाई भारतीय वहां की संसद के बाहर लोगों को लाल व पीले गुलाब भेंट कर अपने शांतिपूर्ण संघर्ष को प्रदर्शित।
गांधी को अब दुनिया आशा की नजर से देख रही है। उनके विचारों से पूरी दुनिया अपनी- अपनी समस्याओं का समाधान खोज रही है। उनके सत्य और अहिंसा के प्रयोग अपनाने में लोगों को रुझान तेजी से बढ़ रहा है। फिर चाहे वह तकनीक हो, लड़ाई हो या तीव्र प्रतिक्रिया। हर जगह गांधी का असर देखा जा रहा है। गांधी आज हमारव् बीच नहीं हैं, पर उनकी बातें और सिद्धात जीवंत हैं। ईमानदारी से अगर यह कहा जाए, तो गांधीजी अभी जिंदा हैं, दुनिया के विचारों, कर्मों और बातों में।
'सवेरे के प्रहर में सूर्य नारायण अपना उद्धार करता है, योगारू ढ़ होकर आता है और संध्या के समय शांत होता है। सूर्य सचमुच शांत होता है?मैं मरूंगा, तब भी शांत थोड़े ही होने वाला हूं।' - 'गांधीः जैसा देखा-समझा' से





