युगों-युगों से मैं काम करता आया हूं। मेरे पास हर मर्ज की दवा है। मुफ्त की सलाह दे रहा हूं- आज के दौर में अगर मौके-बेमौके सफलता चाहिए, तो अपनी जेब में मेरे नाम की पुडिया रखनी ही पड़ेगी। जो मेरे नाम का प्रसाद नहीं चढ़ाता, उसका कभी भला नहीं होता। तो बोलो, जय जुगाड़ बाबा की।
राम-राम सा। कैसे हो? सब कुशल से है कि नहीं। क्या कहा, परेशान हो, कुछ सूझ नहीं रहा। तो भैया मुश्किल में हमें क्यों बिसरा रहे हो। अब तक याद काहे नहीं किया। हम हैं ना हर मर्ज की दवा। हमें भूल गए क्या? तुमारी कितनी बार मदद की है। कितनी बार संकट से उबारा है। कितनी बार तुमने हमारी वजह से घर बैठे-बिठाए वाहवाही लूटी है। हमें पता था कि समय फिरते ही तुम हमें भूल जाओगे। अब देख लो, अपना हाल। हमारे नाम का प्रसाद नहीं चढ़ाओगे, तो ऐसा ही होगा। मैं तो हमेशा से ही कहता हूं कि हर काम करने से पहले सोच लिया करो कि हमें याद किया कि नहीं। क्या कहा- समझ नहीं आ रहा, हम कौन हैं। अरे हमें पता है तुम्हारी याददाश्त कमजोर पड़ गई है। चलो, हम ही बताय देते हैं। हम हैं जुगाड़।
तुम इंसानों ने ही तो पैदा किया था हमें। तुम्हारा तो शुरू से ही मंत्र रहा है कि सीधी उंगली से घी ना निकले, तो जुगाड़ लगाकर घी निकालो। अब तुम्हें बस घी खाने से मतलब है जी। भूल गए, तुमने अपनी जिंदगी में मेहनत से कुछ हासिल नहीं किया। बस मेरी मदद से ही तो तुम बादशाह बन पाए हो। जुगाड़ बिठाकर ही तो तुम गली के गुंडे से शहर से नामचीन नेता बन बैठे थे। याद नहीं वो दिन, जब पूरे शहर में किसी को भी उल्लू बनाकर रुपए एंठने में तुम उस्ताद थे। एक दिन एक नेताजी को पलीता क्या लगाया, नाराज होने की बजाय खुश होकर उन्होंने कहा था- तुम में तो नेता बनने के सारे गुण मौजूद हैं। आ जाओ, हमारी पार्टी में और बन जाओ मोहल्ले के नेता। फिर तो तुम्हारी चल निकली। पूरे शहर में तुम्हारी नेतागिरी के चर्चे होने लगे। कोई काम ऐसा नहीं, जो तुम ना कर पाओ। पर भूलो मत, हर उल्टा-सीधा काम करने से पहले तुम मुझे ही तो याद किया करते थे। पार्टी की सरकार बनी, तो दाब-धौंस से जुगाड़ लगाया और अपने राजदुलारे घीस्या को पेट्रोल पंप दिलवा दिया। सिफारिश करके तुमने हाईकमान से टिकट पटा लिया और दारू बंटवाकर तुम संसद के गलियारों में चहल-कदमी करने लग गए। फिर मौका लगा, तो किसी दूसरी पार्टी का जुगाड़ लगाकर उसमें घुस गए। अब देखो ना, इस बार चुनाव हुए, तो दुबारा पुरानी पार्टी में आकर फिर जीत गए। मानना पड़ेगा, इंसानी जमात में मेरा जितना इस्तेमाल तुम नेता लोगों ने किया है, उतना शायद ही किसी ने किया हो। जुगाड़ लगाकर कर किसी तरह से अपना काम बनता और भाड़ में जाए जनता। यह तो तुम्हारे जीवन का सिद्धांत है भई। पर अब लगता है कि तुम्हें हमारी कद्र नहीं रही। पावर जो आ गई है, तुम्हारे पास। लेकिन तुमने हमारी खूब सेवा की है। इसलिए तुम्हारी परेशानी के बारे में सुना, तो हम ही चले आए। अब बता भी दो, क्या प्रॉब्लम है। मेरे पास है ना हर ताले की चाबी। क्या कहा- सरकार बनानी है। पर गणित पूरी नहीं बैठ रही। मन में डर है कि कहीं विपक्ष में ना बैठना पड़े। अरे, इतनी-सी बात और इतनी ज्यादा टेंशन। तुम भी क्या इंसान हो। इतना टाइम मेरे साथ रहे और कुछ नहीं सीखा। करना क्या है, बस बयान देते रहो। जो छोटे दल हैं, उन्हें पुचकारते रहो, सपने दिखाते रहो और जो तुम्हारे साथी-संगी हैं, उनसे कह दो-यह सब तो पॉलिटिक्स का हिस्सा है, सरकार अपनी ही बनेगी। निर्दलीयों को खरीद लो, मीडिया में सरकार बनाने की हवा फैला दो। किसी को अपनी पोल खुलने मत दो कि डर तो तुम्हें भी लग रहा है। अगर लोगों को तुम्हारा हौव्वा बना रहेगा, तो तुम जरूर सफल हो जाओगे। लो हो गया ना जुगाड़। पर अब से एक बात याद रखना- मुझे कभी मत भूलना, वरना दुबारा तुम्हारी कभी मदद करने नहीं आऊंगा। अभी तो चलता हूं और दीन-दुखियों की भी तो सेवा करनी है। जय राम जी की।
-आशीष जैन
22 May 2009
जय जुगाड़ बाबा की
परिणाम को प्रणाम
सावधान रहिएगा। सुनते हैं, अब परिणामों का दौर है। किस्म-किस्म के परिणाम अब बाजार में नजर आएंगे। देखना ये है कि भरी गरमी में कौनसा परिणाम कुल्फी-सी ठंडक देगा और कौनसा अंजाम तूफान बरपाएगा।
लो भैया हो गया काम तमाम। सारी भागदौड़ पूरी। अब तो दिल धड़काने की बारी है जी। मन में तड़पन, तन में हलचल। आप ही बताएं, जब किसी काम को मन रमाकर करा है, तो उसका अंजाम जानने की तो सबको जल्दी रहती ही है ना। अंजाम मतलब रिजल्ट मतलब परिणाम।
परिणाम भी दसियों तरह के। कभी स्कूल की एग्जाम के परिणाम, कभी मैच का परिणाम, तो कभी चुनावों का परिणाम। ससुरे जितनी टेंशन ये एग्जाम नहीं देते, उससे चौगुनी तकलीफ तो मुए रिजल्ट देते हैं। काम करते वक्त हमारा दिल इतना नहीं धड़कता, जितना परिणाम सोच-सोचकर धड़कने लगता है। इन परिणामों से हम बचपन से पीडि़त हैं। कक्षा की परीक्षा के परिणाम आने वाले दिनों में तो हम घर से निकलना ही छोड़ देते थे। अब देश के इन चुनावों की बात भी क्या खूब है। महीना-डेढ़ महीना नेताजी के नाम से खूब नारे लगाए, खूब भाग-दौड़ की। अब सब गुल। अब वही कंगाली के फटेहाल दिन। नेताजी जीत गए, तो बल्ले-बल्ले और अगर किसी की गलत नजर चलते हार गए, तो कुछ नहीं बचेगा। क्या-क्या आस लगा रखी है। नेताजी जीत गए, तो बेटे को नौकरी मिल जाएगी। थोड़ी पहुंच बढ़ जाएगी। हर तरफ रुतबा बढ़ जाएगा। अब देखते हैं कि इन परिणामों की पोटली में क्या छुपा है। हमें छोडि़ए, आप तो नेताजी के घर का नजारा देखिए। सब लोग लगे हैं नेताजी को तसल्ली देने में। सब अच्छा होगा, आप देखना। अब तो चुनाव जीत ही गए, समझ लो। पर अपने नेताजी तो शुतुरमुर्ग की तरह बेफ्रिक। वे तो जीत का भरोसा तभी करेंगे, जब परिणाम हाथ में होगा। वे तो सोच-सोचकर परेशान हैं कि नहीं जीते, तो क्या होगा? वही तेल बेचने का काम दुबारा करना होगा। बेइज्जती होगी सो अलग। हालत तो यूं होगी- माया मिली, न राम। हमने तो नेताजी की खैर-खबर रखने वाले एक-दो मुलाजिमों को कहलवा दिया है कि चुनाव परिणाम के एक दिन पहले से ही डॉक्टर-वॉक्टर को घर बुलवा लेना। इसी में भलाई है। क्या पता नेताजी सदमा झेल भी पाएं या नहीं।
कल-परसों से तो गजोधर के परिणाम ने भी हमारा जीना हराम कर रखा है। गजोधर हमारा बेटा। इस साल मैट्रिक की परीक्षा दी थी। सोचा था कि टॉप करके हमारा नाम रोशन करेगा। पर हमें क्या पता कमबख्त क्रिकेट के पीछे पड़कर अपना मटियामेट कर लेगा। कहता था- बापू, अब मैं ही अगला सचिन बनकर दिखाऊंगा। खुशी-खुशी हमने उसे गेंद-बल्ला दिला दिए। अब नीपूता फेल हो गया। अब क्या करें? किससे अपना दर्द बयां करें? ये क्रिकेट तो हमारे नूरे चमन का कॅरियर ही चौपट करके रहेगा। भई, क्रिकेट की दीवानगी तो हमें भी है। पर इसका मतलब यह थोड़े ही ना है कि सपूत की तरह चौबीसों घंटे हाथों में गेंद-बल्ला लेकर घूमते रहें। पूरे मोहल्ले को सचिन बनने का सपना दिखाते रहें।
हां, तो हम बात कर रहे थे परिणामों की। बीस-बीस क्रिकेट हो रहा है ना दक्षिण अफ्रीका में। उसके भी रंग निराले हैं। इस बार तो अपने डेक्कन चार्जर्स पूरे चार्ज में दिख रहे हैं। धो डाला सबको। और तो और लगता है शाहरुख भाईजान तो सड़कों पर ही आ जाएंगे। खानभाई ने बड़े सपने देखे थे नाइटराइडर्स से। खूब पाला-पोसा। बुकानन की हर बात पर कान लगाया। दादा की कप्तानी छीन ली। पर ढाक के वही तीन पात। बाहर हो लिए खेल से। अब कौन इस बार आईपीएल का सूरमा साबित होगा, ये बात अच्छे-अच्छों को परेशानी में डाले हुए है। प्रीतो के गालों के डिंपल पर, शिल्पा के चेहरे की खुशी अब परिणामों को जानने को मचल रही होगी। सबने मिलकर पहले तो क्रिकेट को जलेबी की तरह-तरह गोल-मोल कर दिया। पता ही नहीं लगा कि कहां खेल है, कहां कमाई? अब सब हिसाब लगा रहे हैं, कैसे भागते चोर की लंगोट पकड़ें। ये सब देखकर हमें तो रास-रसैया, माखनचोर श्रीकृष्ण की याद आ रही है। क्या खूब कह छोड़ा गीता में, कर्म करो और फल की चिंता मत करो। अबसे हम तो भैया एक बात पक्के से गांठ बांध चुके, नेकी कर और दरिया में डाल कर। काम किया और चिंता मिटी। बाकी रामजी करेंगे बेड़ा पार। परिणाम के फेर में फंसे रहे, तो क्या पता करम भी सही कर पाएंगे या नहीं। लो, कह दी हमने भी लाख पते की बात।
- आशीष जैन
20 May 2009
आम है खास
फलों के राजा आम में क्या है खास, जानते हैं।
रसीले आम... वाह! मजा आ गया खाकर। इसकी खुशबू इतनी लाजवाब है कि आम के बगीचे में आप कभी जाएंगे, तो बिना आम तोड़े नहीं रह सकेंगे। जिस तरह पश्चिमी देशों में सेब और अरब जगत में अंगूरों के लिए दीवानगी है, उसी तरह हमारे देश में लोग आम के स्वाद के दीवाने हैं। वेदों में आम को विलास का प्रतीक माना गया है। महाकवि कालिदास ने इसका गुणगान किया, तो सिकंदर को भी आम बेहद खास लगे। सम्राट अकबर ने तो दरभंगा में आम के एक लाख पौधे लगवा दिए थे और वह बाग आज भी 'लाखी' बाग के नाम से मशहूर है।
आम के कई रूप हैं। आम का बौर, कैरी या कच्ची अंबिया और पका आम। आम की लोकप्रियता हमारे देश में इतनी है कि इस पर लोकगीत तक लिखे जा चुके हैं। आम से बना पना, अचार, मुरब्बा या जैम तो आपने जरूर खाया होगा। कैसा लगा? यकीनन स्वादिष्ट। और हां, अमचूर यानी आम की खटाई के बिना तो मानो हर स्वाद अधूरा है। तमिलनाडु के कृष्णगिरी के आम तो दुनियाभर में मशहूर हैं।
फलों के इस राजा को भारत का राष्ट्रीय फल यूं ही नहीं कहा जाता। इसके गूदे में जो रेशा होता है, वह न केवल हाजमा सही करता है बल्कि कॉलेस्ट्रोल भी घटाता है। इसमें विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है। सबसे अच्छा आम वही होता है, जिसमें रेशा कम, गूदा ज्यादा और मीठा हो। आम के पेड़ को हमारे यहां खुशियों से जोड़कर देखते हैं। आज आम के लिए कलम बांधने की कला में मलीहाबाद के हाजी कलीम उल्ला खान वाकई कमाल कर रहे हैं। सत्तर वर्ष के हाजी साहब को इस हुनर के लिए इस साल पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। वे कलम लगाकर आम के एक ही पेड़ में 300 किस्मों के आम पैदा कर चुके हैं। पचास-पचपन साल पहले चंडीगढ़ के बुड़ैल गांव में आम का एक विशाल पेड़ था। उसकी उम्र 100 वर्ष से भी अधिक थी। उसका तना 9.75 मीटर मोटा था और पेड़ 2,258 मीटर क्षेत्र में फैला हुआ था। एक साल में उससे करीब सोलह-सत्रह टन फल मिलते थे।
आम की किस्में
दुनिया के तीन चौथाई से ज्यादा आम एशिया में पैदा होते हैं। उसमें भी सबसे ज्यादा आम हमारे देश में ही पैदा होते हैं। हमारे देश की कुछ खास किस्में हैं- दशहरी, लंगड़ा, चौसा, बैंगनपल्ली, हिमसागर, फजली, खासा, प्रिंस, आबेहयात, अलफांजो, केसर, किशनभोग, मलगोवा, नीलम, वनराज, जरदालू, मल्लिका, रत्ना, अर्का अरुण, अर्मा पुनीत, अर्का अनमोल, बंबई ग्रीन, शम्सुल अस्मर, हलवा, लखनऊ सफेदा। इन नामों के किस्से भी बहुत दिलचस्प हैं। 'लंगड़ा' आम सुनकर सोच रहे होंगे, भला ये भी कोई नाम हुआ। पर इस किस्म के आम का पहला पेड़ बनारस में एक लंगड़े फकीर बाबा के घर के पिछवाड़े उगा था। और स्वादिष्ट दशहरी के बारे में कहा जाता है कि यह लखनऊ के पास मलीहाबाद के दशहरी गांव में पैदा हुआ। मलीहाबाद तहसील के ही चैसा गांव में लोगों ने जब पहली बार एक अलग स्वाद और सुगंध वाला आम चखा तो उसका नाम 'समरबहिश्त चैसा' रख दिया! इसी तरह बिहार के भागलपुर गांव में एक औरत थी-फजली। पहली बार उसी के आंगन में फला-फूला था यह आम।
गुणों की बहार
यदि गर्भस्थ महिला आम चूसती है, तो इससे शिशु का रंग साफ होता है।
जो महिलाएं चेहरे का सौंदर्य बढ़ाना चाहती हैं, वे आम के रस में शहद मिलाकर चेहरे पर लगाएं।
आंखों के चारों ओर काले घेरे हों, तो आम के रस में रुई डुबोकर चेहरे पर लगाएं।
बाल झड़ते हैं, तो आम के पत्तों और डंठल को पानी में उबालकर हफ्ते में दो बार सिर धोएं।
कान का दर्द होने पर आम का पत्ता पीसकर (बिना पानी) हल्का गर्म करके कान में डालें।
-आशीष जैन
13 May 2009
यूं मिली कामयाबी की डगर
मुजफ्फरनगर की श्वेता सिंघल ने सिविल सर्विसेज एग्जाम में हासिल की 17वीं रैंक और हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों में दूसरा स्थान।
विषय को समझा गहराई से
मुजफ्फरनगर के श्यामली कस्बे में पैदा हुई श्वेता के पिता अरुण सिंघल मेडिकल स्टोर संभालते हैं। मां उषा गृहिणी हैं और भाई नितिन आईएएस की तैयारी कर रहा है। बड़ी बहन रश्मि की शादी हो चुकी है। श्वेता ने शुरुआती पढ़ाई श्यामली में ही की। इसके बाद वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के लिए दिल्ली आ गईं। लेडी श्रीराम कॉलेज से हिंदी ऑनर्स से बीए करने के बाद उन्होंने हिंदू कॉलेज से एमए किया। हिंदी विषय में ही उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही एमफिल भी किया। सिर्विल सर्विसेज के बारे में श्वेता पहले गंभीर नहीं थी। पर एमफिल करने के बाद उन्होंने एग्जाम के लिए कमर कस ली। शुरू के दो प्रयासों में उन्हें इस परीक्षा को करीब से समझने का मौका मिला। उन्हें यह बात समझ में आई कि जब तक विषय की गहराई में नहीं जाएंगे, सफलता मिलना मुश्किल है। पढ़ाई के दौरान श्वेता कॉलेज हॉस्टल में ही रहती थीं। उसके बाद वे सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए अपने भाई के साथ किराए के फ्लैट में रहने लगी।
आत्मविश्वास और मेहनत
सिलसिलेवार तरीके से पढ़ाई करते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य पर निगाह जमाए रखी। प्री एग्जाम में भूगोल विषय लेकर मुख्य परीक्षा भूगोल और हिंदी साहित्य से पास की। साक्षात्कार में सफलता के लिए उन्होंने खान स्टडी गु्रप में ट्रेनिंग ली। इस बारे में वे कहती हैं, ' मेरे सर ए. आर. खान ने व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी मदद की। उन्होंने मुझे पर्सनलिटी डवलपमेंट के गुर सिखाए। इसी की बदौलत मैं यह सफलता पा सकी। अपने ग्रामीण परिवेश के बारे में वे कहती हैं, 'ग्रामीण विद्यार्थियों को शुरू में सब कुछ अटपटा लगता है। न तो सही गाइडेंस होती है और न ही उचित संसाधन। ऐसे में आत्मविश्वास और मेहनत ही काम आते हैं। अपने साक्षात्कार के बारे में वे बताती हैं, 'इंटरव्यू के दौरान मुझसे पूछा गया कि इंटरव्यू देने आते वक्त आप क्या सोचकर आईं? साथ ही धर्म, इतिहास, बाल विकास, महिला सशक्तीकरण, अर्थव्यवस्था पर सवाल पूछे गए। हिंदी माध्यम को श्वेता अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती हैं। वे कहती हैं, 'हिंदी भाषा मेरा आत्मविश्वास है। हिंदी मेरे लिए कभी बाधा नहीं बनी, बल्कि हिंदी की वजह से ही मेरा चयन हो पाया। अपने भविष्य के बारे में उनकी सोच साफ है। बकौल श्वेता, 'मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाकर सबसे पहले फील्ड की बारीकियां सीखूंगी। लोगों की समस्याओं से रूबरू होऊंगी। इसके बाद मैं सरकारी अफसर और जनता के बीच बनी हुई संवादहीनता खत्म करूंगी। मेरा मानना है कि जब तक लोगों के मन से सरकारी सिस्टम का डर नहीं निकलेगा, तब तक देश का विकास अधूरा रहेगा।
-आशीष जैन
सफलता का सफर
जानते हैं सिविल सर्विसेज एग्जाम में टॉप करने वाली शुभ्रा सक्सेना के बारे में।
आईआईटी रुड़की से अमरीका, यूनाइटेड किंगडम और सिंगापुर... फिर सिविल सर्विसेज एग्जाम के शिखर पर काबिज होने का शानदार मोड़। वाकई शुभ्रा सक्सेना के लिए जिंदगी का सफर काफी रोमांचक रहा।
सिविल सर्विसेज एग्जाम 2008 में टॉप करने वाली शुभ्रा ने आईआईटी रुड़की से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की, पर आईटी सेक्टर की शानदार नौकरी छोड़कर देश सेवा में लगने का फैसला किया। पढ़ाई के चार साल बाद तक वे तीन आई टी कंपनियों में काम करती रहीं। उन्होंने 2006 में अपनी नौकरी छोड़ी और नई दिल्ली के राजेंद्र नगर में किराए का अपार्टमेंट लेकर आईएएस बनने की तैयारी करने लगी। वे सुबह आईएएस की तैयारी करवाने वाले संस्थान में पढ़ाती थीं और बचे हुए समय में खुद तैयारी करती थीं। इंजीनियर शुभ्रा ने साइकोलॉजी और पब्लिक एडमिनिस्टे्रशन विषय से एग्जाम दी। आईएएस बनने की इच्छा के बारे में शुभ्रा कहती हैं, 'बोकारो में कोयले की खदानों के आस-पास मजदूरों के खेलते हुए बच्चों को देखकर मुझे लगा कि क्यों न ऐसा काम किया जाए, जिससे इन बच्चों का भला हो सके। फिर तो मैंने ठान लिया कि मैं आईएएस बनकर दिखाऊंगी। उत्तरप्रदेश के बरेली में पैदा हुई 30 वर्षीय शुभ्रा के पिता अशोक चंद्र सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड में अधिशासी अभियंता हैं। झारखंड के हजारीबाग से स्कूलिंग करने के बाद शुभ्रा आईआईटी से बीटेक करने के लिए रुड़की आ गई। फिर आईटी सेक्टर में नौकरी के चलते अमरीका, यूनाइटेड किंगडम और सिंगापुर भी गई। पर वे अपने काम से खुश नहीं थीं। इसलिए अपनी मां के पास यहां आकर आईएएस की तैयारी करने लगी। शुभ्रा की शादी छह साल पहले नोएडा के शशांक गुप्ता से हुई। शशांक अभी नोएडा में सीएससी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। आईएएस एग्जाम के इतिहास में भी ऐसा पहली बार हुआ है, जब पहले तीन स्थानों पर महिलाओं ने बाजी मारी है। शुरुआती 25 स्थानों में 10 लड़कियां शामिल हैं। उन्होंने साबित कर दिखाया है कि अब देश चलाने के लिए महिलाएं कमर कस चुकी हैं।
-आशीष जैन
प्यारा इक बंगला हो
प्रियंका हिमाचल प्रदेश में शिमला के पास छराबड़ा में एक घर बनवा रही हैं। हरे रंग के खास पत्थरों से बनने वाले इस दोमंजिला घर की पहली मंजिल तो बनकर तैयार भी हो गई है। इसमें कुल सात कमरे हैं। दिलचस्प बात है कि यहां मदर्स रूम नाम से एक खास कमरा भी बनाया गया है। कयास लगाया जा रहा है कि प्रियंका ने यह कमरा खास तौर पर अपनी मां सोनिया गांधी के लिए तैयार करवाया है। घर बनाने के लिए सोलन के बड़ोग से खास पत्थर मंगवाए गए हैं। प्रियंका इस घर की जमीन अपनी नानी पाओला मैनो को भी दिखा चुकी हैं। घर बनवाने के लिए उन्होंने पांच बीघा जमीन ली थी। उसमें से छह बस्वे के क्षेत्र में यह घर बन रहा है। घर की छत स्लेट की होगी। घर की शैली हिमाचली पहाड़ी शैली के अनुरूप ही होगी। हरियाली का खास ध्यान रखते हुए घर के बाहर चार लॉन बनाए जा रहे हैं। तीन लॉन सजावट और एक लॉन खास तौर पर बच्चों के खेलने के लिए तैयार किया जा रहा है। उम्मीद है कि घर जल्द ही बनकर तैयार हो जाएगा।
- आशीष जैन
06 May 2009
मां को बचाना है
बॉलीवुड एक्टैरस रवीना टंडन यूनिसेफ की ब्रांड एंबेसेडर बनकर मांओं को बचाने की खास मुहिम में जुटी हैं।
उनका कहना है कि आज भी देश के अधिकांश घरों में महिलाओं से पहले पुरुष भोजन करते हैं। अगर घर में कोई गर्भवती महिला है, तो घर के सभी सदस्यों को महिला की सेहत का ध्यान रखना चाहिए। इससे होने वाला बच्चा भी तंदुरुस्त पैदा होगा। गर्भवती महिलाओं को दवाइयों और विटामिन्स का खास ख्याल रखना होगा। तीन से पांच रुपए में आने वाली फालिक एसिड की गोली से भी गर्भ की समस्याओं को रोका जा सकता है। उनका सुझाव है कि महिलाओं को गर्भकाल के दौरान खुद के स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए। साथ ही घरवालों को भी महिला को पोषक तत्व देने के लिए एक अतिरिक्त खुराक देनी चाहिए। अगर महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ होगी, तो उसे बच्चे के जन्म के समय कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी। साथ ही उनका मानना है कि महिलाओं को दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम तीन या चार साल का अंतर रखना चाहिए, ताकि बच्चों की परवरिश ढंग से की जा सके। रवीना का कहना है कि अगर बच्चियों की जल्द शादी की बजाय माता-पिता उन्हें शिक्षित करेंगे, तो आगे चलकर यही लड़कियां बेहतर मां भूमिका निभा पाएंगी।
सलाखों में कैद मां
जेल का नाम आते ही दिमाग में ऐसे अपराधियों की छवि उभरती हैं, जो बहुत खतरनाक हैं। पर इन सखीचों के पीछे बैठी मां की ममता और दुलार का जवाब नहीं। ये महिलाएं जमाने भर के लिए मुजरिम हैं, पर अपने बच्चों के लिए सिर्फ एक मां है। इनकी भगवान से केवल एक ही दुआ है कि इनका राजदुलारा हमेशा खुश रहे।
छिपा लेती हूं आंचल में
मेरे दिन की शुरुआत मेरे बेटे अंकुश को देखकर होती है। मुझे दुख इस बात का है कि मेरी गलती की सजा इस मासूम को भी भुगतनी पड़ रही है। मां हूं ना इसके बिना रह भी तो नहीं सकती। इसलिए इसे यहां ले आई। अभी दो साल का ही तो है। जेल में मजदूरी करके दिनभर में नौ रुपए कमा पाती हूं। इन्हें इसके लिए जमा करती हूं। छह साल का हुआ नहीं कि इसे मुझसे अलग कर दिया जाएगा। यह सोचकर ही मैं सिहर उठती हूं। यहां यह सबका दुलारा है। कोई ना कोई इसे दिनभर खेल खिलाता रहता है। पर मैं इसे एक पल भी मेरे से दूर नहीं रखना चाहती। इसलिए हमेशा इसे गोद में रखती हूं। कई बार मेरे साथ वाली औरतें कहती हैं, 'इसे अपनी आदत मत डाल कि यह तुझसे दूर ना रह सके।' यह सुनते ही मन इसके दूर जाने के डर से कांप उठता है। अभी यह थोड़ा-थोड़ा बोलने लगा है। अपनी तुतलाती आवाज में मां सुनना बहुत अच्छा लगता है।
... अगली बार कब
मेरा बेटा आकाश दस साल का हो गया है। आश्रम में रहता है। वहां रहने वाले दूसरे बच्चों के साथ पढ़ने जाता है। सारी सुख-सुविधाएं हैं वहां पर। पर मेरा दिल नहीं मानता। इसलिए हर वक्त उसके लिए तड़पती रहती हूं। पता नहीं ठीक से खाना खाता होगा या नहीं। आज भी याद है वो दिन जब उसे यहां से ले जाने के लिए बोला गया था। मेरा तो उस दिन से ही खाना-पीना छूट गया था। पर उसे नहीं बताया, छिप-छिप के रोती थी। उसने पूछा, 'मम्मी कौन कहां जाने के लिए बोल रहा है?' मैंने कहा, 'तू यहां सबसे प्यारा है ना, इसलिए ये लोग तुझे घूमाने के लिए लेकर जाएंगे।' मैंने अपने दिल पर पत्थर रखकर उसे आश्रम भेज दिया। उसके जाने के बाद बिलकुल अकेलापन लगता है। अब सारे दिन अपने आपको यह समझाती रहती हूं कि जेल से बाहर जाकर उसे पढ़ना-लिखना है, बड़ा आदमी बनना है। इसलिए अपनी मजदूरी से पैसे जमा कर उसे देती हूं। सोचती हूं कि मेरे यहां से छूटने में कुछ साल बाकी हैं। रिहा होने के बाद आकाश के साथ रहूंगी। मेहनत-मजदूरी करके उसे खूब पढ़ाऊंगी। पर यह सपने एक ही पल में टूट जाते हैं जब हकीकत का खयाल आता है कि एक खूनी मां बेटा होने के कारण समाज वाले उसे परेशान करेंगे। इस डर के कारण मन करता है कि मैं आकाश से हमेशा दूर रहूं। ताकि वो समाज में सुख से तो रह सके।
इसको हर खुशी मिले
सधन्यवाद- विजया का लेख जो मदर्स डे 2009 के मौके पर परिवार में छपा।
29 April 2009
नेतागिरी का इलेक्शन लोचा
नेता बन गए पर कुछ खास नाम नहीं किया, तो चलो मंच पर और बक दो कुछ भी उल्टा-पुल्टा। फिर देखो कमाल। चुनावी दंगल में मंगल करवाना चाहते हो, तो कोई न कोई जुगत बैठानी ही पड़ेगी। अब लोग-लुगाई कौनसा 'उनचास ओ' को जानते ही हैं, तो मचाओ धमाल।
हम लाएं हैं तूफान से कश्ती निकालके... इस देश को रखना बच्चो संभालके। रेडियो पर गाना बज रहा था। बहुत ही पुराना गीत है। बचपन से सुनते आ रहे हैं। अब क्या करें? हमने तो बहुत ही कोशिश की थी, देश बचाने की। पर हमारे भीडू लोग चाहते ही नहीं। उनका तो एक ही नारा है... अपना काम बनता और भाड़ में जाए जनता। भीड़ू कौन? अरे वो ही भीडू लोग... जो आ रहे हैं दरवज्जों पे, आपके और हमारे माथा ढोकने। हम कोई कम थोड़े ही ना हैं। डंडे को तेल पिलाकर बैठे हैं चौक में। आने दो करमजले नेताओं को। पिछली बार धोखा दिया था ना ससुर के नातियों ने। अब की बार तो पूरी लिस्ट ही बना ली है हमने भी। कब-कब और कैसे-कैसे खून चूंसा था हमारा। सारा हिसाब करेंगे। कहा था कि शहर को स्वर्ग बना देंगे और अब देखते हैं, तो पता लगता है कि मोहल्ला तक गंदगी के मारे नरक बन चुका है। नल में पांच साल पहले भी पानी नहीं आता था और आज भी बेचारा प्यासा ही है। सड़क पे उस वक्त दो गड्ढे थे और आज तो गड्ढों में ढूंढऩा पड़ता है कि आखिर सड़क है कहां। अब आप ही बताओ कि वोट दें, तो किसे दें। सब एक से बढ़कर एक धूर्त। कोई चार सौ बीसी के चलते जेल में बंद हुआ है, तो किसी के लिए खून-खराबा रोज की बात। कोई मुद्दे की बात को करते नहीं। चूं-चपड़ कितनी ही करा लो। अपने राहुल बाबा थोड़ा सा चमकने लगे, तो ससुरी बीजीपे ने अपने 'गांधी' को मोर्चा संभला दिया। बको मंच पर कुछ भी। लूट-खसूट लो सारे वोटों को। हम गरीबन के पास है ही क्या संपदा। इकलौता वोट ही तो है। ऊ भी पांच बरस में एक ही बार तो मौका मिले है। वो भी हथिया लो भई। 'काट दूंगा' अरे मुन्नालाल, राजनीति में मार-काट करने आए थे क्या? मार-काट करनी है, तो बन जाओ मुंबई के डॉन। फिर कौन रोकेगा तुम्हें? अपने पीएम इन वेटिंग आडवाणीजी को तो वे पोस्टर बॉय ही नजर आने लगा है उसमें। न जाने कब से प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले बैठे थे। क्या मुद्दा बनाएं केंद्र की सरकार को हटाने के लिए। अब लगता है कि वापस पुराने रास्ते पर लौट ही आते हैं। अपना ही बच्चा है, वरुण। अब तक गांधियों से डरते थे, अब खुशी है कि एक 'गांधी' हमारे पास भी है। एक बात और। मुए दूर से ही अलग-अलग लगते हैं। पास जाके देखो, तो एक ही थाली के चट्टे-बट्टे। कौन सोच सकता था कि जो कल्याण सिंह कल तक बीजेपी का तारणहार दिखता था, वो आज सपा को पूजने लगगे। जो उमा भारती आडवाणी का दामन छोड़कर चली गई, वही आज बीजेएसपी से वापस बीजेपी-बीजेपी की रट लगाने लगेगी।अब तो संजूबाबा की भी फूंक निकल गई। अरे, वे खुद ही 'मामू' बन गए। अब क्या करें? ये इलेक्शन का लोचा अच्छे-अच्छे नहीं संभाल पाते, तो संजूबाबा कौनसा तीर मारते। महाराष्ट्र के सबसे बड़े गुंडे को तो आप जानते हैं ना। अरे बाल ठाकरे और कौन? आप कहेगा क्यों सबके सामने उसे गुंडा कह रहे हो? तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? अरे ये गुंडे नहीं, तो क्या हैं? बेचारी अंजलि बाघमारे। वही जो अजमल कसाब का केस लड़ने वाली थी। बोल दिया ठाकरे के गुंड़ों ने हमला। पर अंजलि कम थोड़े ही ना हैं। हिम्मत दिखाई है और हो गई हैं तैयार केस लड़ने को। ये सरेआम गुंडगर्दी नहीं तो और क्या है? टिकट देने में भी ये नेता कौनसी कसर रख रहे हैं? अभी अपन को रामप्यारे जन प्रतिनिधि अधिनियम पढ़ा रहे थे। बोले ये उनचास ओ भी कमाल है। हमने कहा ये क्या बला है? बोला गुस्सा निकालने का नया तरीका है भई। हमने पूछा- क्या होता है भई इसमें। तो बोले, भैया ये छोटी-सी धारा नेताओं की धार बदल सकती है। अगर वोटिंग मशीन में कोई उम्मीदवार पसंद ना आवै, तो नया कॉलम 'कोई पसंद नहीं' को दबा दो। यही है 'उनचास ओ'। ये तो कमाल है भई। चलो मन की भड़ास तो निकाल लेंगे। एक तो हमारे वो दोस्त हैं, जो वोट देने ही नहीं जाएंगे। अरे हम तो जाएंगे वोट देने, पर अगर कोई उम्मीदवार मन को नहीं भाया, तो 'उनचास ओ' का सहारा लेंगे जी। मेरा कहा मानो और आप भी आ जाओ आगे। इन नेताओं को छोड़ना मत। अगर अबके बख्श दिया, तो पूरे पांच साल में दर्शन होंगे। आगे आपकी मर्जी।
-आशीष जैन
तेरा जूता मेरे सिर
आप अपने फटे-पुराने जूतों को संभालकर रख लीजिए जनाब। हो सकता है कि आने वाले वक्त में मार्केट में इनकी डिमांड बढ़ जाए। आपको नहीं पता, ना जाने कैसे-कैसे जूते आजकल छोटे परदे पर शोभायमान हैं।
आज फिर हमारा सपूत स्कूल से बिना पढ़े लौटा है। हमने पूछा, 'क्या हुआ लल्लू' तो वो बोला, 'पापा, स्कूल वालों को आप इतनी फीस देते हो। फिर भी उन्हें तो बस मेरे जूतों से प्यार है।' फिर रोते-रोते बोला कि स्कूल वाले कहते हैं, 'पहले ढंग के जूते पहनकर आओ। तभी क्लास में घुसने देंगे।' कुछ दिन पहले ही उसे नए जूते दिलाए थे, पर कमबख्त ने बरसात में भीगोकर खराब कर दिए। ये स्कूल वाले किसी की सुनते ही थोड़े ना है। अब मेरे पास तो पैसे हैं नहीं, जो मैं उसे नए दिलाऊं। चलो, इसी बहाने क्यों ना आपको जूता कथा ही बांच दूं। अगर कथा पसंद आए, तो सप्रेम जूते देना और बुरा लगे, तो भी जूते ही देना। मुझे तो काम ही जूतों से हैं। तो भई 21 वीं सदी में जंबूद्वीप के भारतक्षेत्र में एकाएक बात चली, स्वतंत्रता की। लोगों के हुजूम चौक-चौराहों पर इकट्ठा होकर मांग करने लगे- हम आजाद तो कई साल पहले हो गए। पर मजा नहीं आता। लगता ही नहीं कि कुछ कर पाने की हालत में हैं या नहीं। हमें अपनी बात कहने की स्वतंत्रता हासिल ही करनी होगी। नेताओं को उनकी नानी याद दिलानी ही होगी। कोई मंच पर चढ़ बैठा, तो कोई रव्डियो पर लपक लिया। अब रह गए गज्जू भैया। अरे पत्रकार गज्जू भैया। वही जो सारे शहर को उनकी बात कहने के लिए मंच उपलब्ध कराते हैं। अखबार का मंच। दीन-दुखी उन्हें लाख आशीष देते हैं। अब लोगों को कौन बताए कि खाली आशीर्वाद से आज के टाइम में होता क्या है। वो बोलते रह जाते पर उन बेचारे महाशय का दर्द कोई सुनता ही नहीं था। उनका गुस्सा जायज था। क्या करें, कब तक कलम घिसते रहें। आज तक पड़ोसी अखबार का एडीटर तक तो शक्ल से पहचान नहीं पाया। चाहे हजारों प्रेस क्रांफेंसों में शामिल हो गए। पर कोई भाव ही नहीं देता। आज मौका मिला, तो पेश कर दिया जलवा। फैंक मारा जूता। चमक गई किस्मत। अब तो हमारा रोज का जागरण ही उनके नाम से होगा। प्रणाम करेंगे, रोज सुबह जागकर उन्हें। मार्क्सवादियों की समस्या ही हल कर दी भई। अब देखिए जूता भी किसे मारा, अपने चंदू भैया को। घर वाले मंत्री को घर में ही कोई जूता मार गया। हम तो हंस-हंसके लोट-पोट हुए जा रहे हैं। अरे, शान भी तो देखिए, जूता फैंका है और इतनी मस्ती में कुर्सी पर टिके हुए हैं, मानो कह रहे हों, 'आओ अब मेरी आरती भी तो उतारते जाओ।' एक तो अपने रामजी थे। जिनके खड़ाऊं से ही भरत भैया धाप गए थे। अब तो आडवाणी बाबू भी खड़ाऊं का असर देख चुके हैं। हमारे रामूकाका ने तो अपनी पूरी उमरिया ही लिगतरों में ही गुजार दी। फिर जूती, सैंडल ना जाने क्या-क्या चीजों का फैशन ही आ गया। जवानी के दिनों में हम एक गाना बड़े चाव से गाया करते थे- मेरा जूता है जापानी...। जूतों की शान थी उस वक्त। फिर तो जूतों के लेन-देन की भारतीय परंपरा पर भी गीत बन गया जी- 'जूते ले लो, पैसे दे दो...' ये लेन-देन फिल्मों तक तो ठीक था। अब तो असल जिंदगी में भी जूते का जादू चलने लगा है। जैदी ने क्या फार्मूला ईजाद किया पॉपुलर होने का। बुश पर जूता फेंका और छा गए पूरी दुनिया में। तो फिर उनके हिंदुस्तानी भाई कैसे पीछे रहते। वो ही कलमची... वो ही जूते... वो ही प्रेस कॉफे्रंस। बस थोड़े से फेरबदल से जूता कथा का पूरी तरह से भारतीयकरण हो गया। तैयार हो गई नई चाट। तो अब घबराना मत। रोज चटकारे लगाने को तैयार हो जाओ। अब तक तो आप जूतों को यूं ही पैरों में डालने की चीज ही समझते आए हैं। पर तैयार रहना, ये घर में बीवी का हथियार हो सकता है, तो घर के बाहर भी पॉपुलरटी तो दिला ही सकता है। चलते-चलते आपको बता देते हैं कि हरियाणा में भी नवीन जिंदल साहब पर भी जूता चल ही गया। हम कहते ना थे, ये जूता शास्त्र एक न एक दिन जरूर क्रांति लाकर रहेगा और देख लीजिए अब इसकी शुरुआत भी होने लगी है। अब तो हमें लगता है कि हर बड़ी सभा के बाहर एक बोर्ड जरूर टंगा मिलेगा- आपका जूता हमारा सिर सहर्ष स्वीकार कर लेगा, पर थोड़ा-सा पहले बताकर मारिएगा।
-आशीष जैन
चट्टान को चुनौती
तेज होती सांसें... चोटी पर पहुंचने का जुनून... नीचे गहरी खाई से उठता धुआं... ऊपर खुला विशाल आसमान। ये सब नजारव् हैं रॉक क्लाइंबिंग के। चट्टान की चुनौतियां स्वीकार ली हैं, तो अब घबराने से काम नहीं चलने वाला है। सपाट चट्टान की छाती पर हौसलों के निशान बनाते हुए आगे बढ़ने का मजा ही कुछ और है। हवाएं आपको बेचैन कर रही हैं कि कब टॉप पर पहुंचेंगे। वहीं चट्टान पर रेंगते छोटे कीड़े आपको आगे लगातार बढ़ने को कह रहे हैं। दरारों से झांकती हुई काई, तह दर तह तक जमी बर्फ। कभी फिसलन तो कभी रपटन। विश्राम का कोई नामलेवा नहीं। किसी का नाम आप पुकारने लगे, तो बार-बार वही नाम चारों ओर से गूंजने लगे। ऊपर से लुढ़कते पत्थरों से घबराना भी मना है। एक बात तो इस सबमें तय है कि पहाड़ पर चढ़ने के लिए ताकत की बजाय हिम्मत ज्यादा जरूरी है। कुल्लू जिले में 13050 फीट की ऊंचाई पर स्थित रोहतांग दर्रे को रॉक क्लाइबिंग के लिए बहुत मुफीद माना जाता है। लाहौल घाटी जाने के लिए आपको रोहतांग दर्रे से होकर गुजरना पड़ता है। रोहतांग दर्रा ही कुल्लू और लाहुल को आपस में जोड़ता है। इस दर्रे का पुराना नाम है- भृग-तुंग। यह दर्रा तेजी से मौसम बदलाव के लिए भी बहुत मशहूर है। बर्फबारी के चलते अक्सर नवंबर से अप्रेल तक इस दर्रे को बंद कर दिया जाता है। यहां की चट्टानों पर चढ़ाई करते वक्त आपको चारों और ग्लेशियरों, छोटी-बड़ी चोटियों, लाहौल घाटी से बहती चंद्रा नदी और प्रकृति के मनोरम दृश्यों का लुत्फ आसानी से मिलेगा। रॉक क्लाइंबिंग के लिए कई लोग बिना किसी बाहरी मदद से उंगलियों से ही ऊपर चढ़ने की जुगत करते हैं। आजकल कई उपकरणों की मदद से रॉक क्लाइबिंग आसान हो गई है। रस्सी और जीवन रक्षक उपकरण आपको थामे रहते हैं और आप ऊपर चढ़ते जाते हैं। कमर में बंधी रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ते हुए आपको खयाल रखना होगा कि आप बिल्कुल चोटी की बजाय मात्र दो फुट आगे ही निगाह रखें। इस तरह आप धीरे-धीरे बिना घबराए अपनी मंजिल पा लेंगे। इसके लिए शरीर में लचक होना भी बहुत जरूरी है। रॉक क्लाइबिंग में संतुलन, शक्ति और हलन-चलन पर नियंत्रण जैसी चीजों पर ध्यान रखना जरूरी है। चढ़ाई करते वक्त आपको कपड़ों और जूतों के चयन का खास खयाल रखना होगा। माउंट आबू, सरिस्का, पावागढ़, मनाली घाटी, मणिकर्ण, रोहतांग दर्रा, हंपी, दार्जिलिंग और स्पिति जैसी जगहों पर आप रॉक क्लाइबिंग की योजना बना सकते हैं।
आसमान में तैराकी
क्या आपका मन पंछियों की तरफ बेफ्रिक उड़ने का नहीं करता? क्या आप भी आसमां की बुलंदियों को छूना चाहते हैं, तो सोचिए मत, पैराग्लाइडिंग का निराला संसार आपकी बाट जोह रहा है। जिंदगी की फुल फॉर्म जाननी है, तो ग्लाइडर से हाथ मिला ही लीजिए। 50 से 60 फुट ऊंचे घने देवदार के दरख्तों से घिरा खुला लंबा मैदान हो, मैदान पर हरी मखमली घास की चादर बिछी हो, चारों ओर बादलों से ढके पर्वत हों, तो समझ लीजिए आपके पास मौका है एक नई उड़ान भरने का। आपकी आंखों के सामने एकाएक एक छतरी हवा में उड़ती है और मस्ती से नील गगन में हिचकोले खाने लगती है। छतरी के सहारे एक इंसान कभी पंछियों तो कभी बादलों से बातें करने लगता है। है ना वाकई रोमांच का दूसरा नाम- पैराग्लाइडिंग। हिमाचल की घाटियों में ये उड़नखटोले रोज नजर आते हैं। बर्फीले पहाड़ों की भव्यता में जमीन से ऊपर उठकर जमीन पर झांकने की इस कोशिश में कई लोग हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी के बिलिंग तक पहुंचते हैं। बिलिंग पहुंचने के लिए बीड़ से होकर जाना पड़ता है। बीड़ से गुजरने के दौरान चाय के बागानों की सौंधी-सौंधी महक और बौद्ध मंदिरों की घंटियों की आवाज साफ सुनाई देती है। इस घाटी में इस साथ दर्जनों पैराग्लाइडर खड़े किए जा सकते हैं। धौलाधार पहाडिय़ों के पीछे की तरफ बनी जगह पर बनी जगह पर हवा का रुख कुछ इस तरह से रहता है कि सब कुछ आसान लगता है। धौलाधार की पहाड़ियों में आप 150 किलोमीटर के क्षेत्र में 5500 मीटर की ऊंचाई तक आराम से उड़ान भर सकते हैं। इस तैरते रोमांच में जोश, जुनून और उमंग के साथ हर वो चीज शामिल है, जो जिंदगी जीने के लिए निहायती जरूरी है। 1978 में फ्रांस में पैराग्लाइडिंग की शुरुआत हुई। वहां पहली बार एल्प्स पर्वत की ऊंचाई पर जाकर उड़ान भरी गई। हमारव् देश में यह खेल 1991 में उस वक्त आया, जब कुछ विदेशी पैराग्लाइडिंग पायलट्स ने कुल्लू घाटी में पैराग्लाइडर के सहारव् उड़ान भरने की योजना बनाना शुरू की। पैराग्लाइडिंग सीखना बस कुछ घंटों का काम है। अगर पैराग्लाइडिंग में लॉन्चिंग, टर्निंग और लैंडिंग का तरीका आपने अच्छे से सीख लिया, तो बस यकीन मानिए आपको आसमान में उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। एक ग्लाइडर का वजन लगभग 7 किलोग्राम के करीब होता है। इसे 10 मिनट में आसानी से फोल्ड किया जा सकता है। ग्लाइडर में कपड़े से बनी दो सतह होती हैं। इन्हें सिलकर छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है। आप आराम से ग्लाइडर में टिककर दौड़ लगाते हैं, इसमें हवा भरने लगती है और आप हवा में तैरने लगते हैं। इससे आप आसानी से तीन घंटे तक 15 हजार फीट की ऊंचाई से आसमान की सैर कर सकते हैं। घाटियों के जादुई सौंदर्य में पैराग्लाइडिंग का अलग ही मजा है। हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा जिले की चामुंडा पीक और बिलिंग, बिलासपुर की बंदला घाटी, मंडी की जोगिंद्रनगर घाटी और कुल्लू की सोलंग घाटी पैराग्लाइडिंग के जानी जाती हैं। वहीं मध्यप्रदेश में महू, मैसूर में चामुंडा पहाडिय़ां और बैंगलूर में कोनिकट के साथ-साथ राजस्थान में अरावली पर्वत श्रेणियां भी पैराग्लाइडिंग करने वालों की पसंदीदा जगह हैं।
कैसे पहुंचें- निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट। निकटतम एयरपोर्ट गुग्गल। धर्मशाला (70 किमी.), मंडी (70 किमी.) से बसें।
लहरें ललकारती हैं
गुफ्तगू मछलियों से
रोमांच की सैरगाह
18 April 2009
सविता भाभी और इमोशनल अत्याचार
17 April 2009
झूमो जमके झूमो
15 April 2009
बैंकिंग से पॉलिटिक्स तक
'मुझे लगता है कि यह समय बैंकिंग के क्षेत्र में रहने का नहीं है। अब मुझे राजनीतिक जागरूकता लाने के लिए भी कुछ करना चाहिए।' ये हैं एबीएन एमरो बैंक की कंट्री हैड मीरा सान्याल। दक्षिण मुंबई में एबीएन एमरो का कार्यालय होटल ताजमहल पैलेस के पीछे है। पिछले 26 नवंबर को जब ताज होटल पर हमला हुआ, तो बैंक के कर्मचारी दंग रह गए थे। मीरा का कहना है कि 26/11 की घटना ने मेरे मन पर गहरा असर डाला और मुझे लगा कि समाज की सोच में बदलाव लाने के लिए मुझे राजनीति में जाना ही होगा। ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने जर्नलिज्म का कोर्स करने वाली मीरा का बैंकिंग इंडस्ट्री में 25 साल का अनुभव रहा है, अब इस क्षेत्र को छोड़कर देश की जनता को जागरूक करना चाहती हैं। वे कहती हैं, 'लोगों के पास वोट डालने के लिए सही शख्स का विकल्प ही मौजूद नहीं होता, ऐसे में वे वोट डालने ही नहीं जाते।' मीरा ने अपने बैंक से 15 मई तक की छुट्टी ले ली है और अब वे लोकसभा चुनावों के लिए दक्षिण मुंबई से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुई हैं। वे खुद को 'मध्यवर्गीय लोगों का उम्मीदवार' कहलाना पसंद करती हैं। वे पांच बिंदुओं (निवेश लाना, रोजगार निर्माण, आधारभूत ढांचा, सुरक्षा और शिक्षा) की कार्ययोजना लेकर जनता के सामने जाएंगी। उनका मुख्य संदेश है कि वे मुंबई को वापस अमन की नगरी की पहचान दिलाएंगी।
राजनीति की आंखों का ऑपरेशन
38 साल की नेत्र सर्जन मोना शाह शिक्षित लोगों को राजनीति से जोडऩे के लिए लड़ रही हैं चुनाव।
बदलाव का बिगुल
ना मेरे पास मनी है, न मशीनरी और न ही मसल पावर। पर वंचितों को उनका हक दिलाने की मुहिम के लिए ही मैं राजनीति में आई हूं। मुझे यकीन है कि बदलाव होकर रहेगा।









