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23 December 2009

बाइबिल यानी आधुनिक मैनेजमेंट बुक


प्रभु यीशु धरा पर आए और पूरी दुनिया में प्रेम, शांति और भाईचारे का संदेश दिया। बाइबिल में उन्होंने जो संदेश हमारे लिए छोड़े हैं, वे बड़ा गहरा अर्थ रखते हैं। जिंदगी को खुशनुमा और सफल बनाने की आधुनिक मैनेजमेंट बुक है बाइबिल। इसमें कही गई बातों को आज के संदर्भ में देखा जाए, तो पता लगेगा कि सकारात्मक चिंतन की बैस्ट बुक है बाइबिल।

खुद की पहचान करें
ईश्वर ने हम सबको कोई न कोई काम अच्छी तरह से करने की योग्यता दी है। (रोमन्स, 12:6, टी.एल.बी)
हर्मन मेलविल कहते हैं, 'नकल करके सफल होने से ज्यादा अच्छा यह है कि मौलिक बनकर असफल हो जाएं।' सही बात है कि जब हम किसी दूसरे जैसा बनने की कोशिश करते हैं, तो हमारे दूसरे स्थान पर ही रहते हैं। अगर हमें आदर्श स्थिति पर पहुंचना है, तो खुद अपना रास्ता बनाना होगा। आम लोग लीक से हटकर चलने की बजाय भीड़ के साथ ही चलना पसंद करते हैं। प्रभु यीशु ने लोगों को दया और प्रेम का संदेश देने का निश्चय किया और वे इसमें सफल ही रहे। सही बात है कि अगर मैं अपने स्वरूप को ही कायम नहीं रख पाऊंगा, तो मेरी पहचान क्या होगी? दोस्तो, ईश्वर ने आपको बनाया है और अगर वह आपसे संतुष्ट है, तो आपको भी संतुष्ट होना चाहिए।

कर्म में यकीन करें
काम करने से अमीरी आती है, बातें करने से गरीबी आती है। (प्रोवब्र्स 14:23, टी.एल.बी)
जॉर्ज वाशिंगटन कार्वर कहते हैं, 'निन्यानवें फीसदी मामलों में वही लोग असफल होते हैं, जिनमें बहाने बनाने की आदत होती है।' हम में से ज्यादातर लोग काम करने की बजाय बहाने बनाते हैं। इस वजह से वे असफल हो जाते हैं। फिल. 2:14-15, टी.एल.बी में लिखा है, 'चाहें आप कोई भी काम करें, शिकायत करने और बहस करने से बचें, ताकि कोई आपके खिलाफ एक शब्द भी न बोल पाए।' ईश्वर के सामने बहाने चलते भी नहीं है। ईश्वर सिर्फ आपके काम को देखता है। अगर आप कर्म करेंगे, तो फल जरूर मिलेगा। जो व्यक्ति काम की बजाय सिर्फ बोलने में यकीन करता है, वह कभी भी ईश्वर का प्रिय नहीं हो सकता। ईश्वर और भाग्य को खुश करने का सबसे अच्छा है- काम करना।

दूसरों की मदद करें
और जो भी आपको एक मील चलने के लिए मजबूर करे, उसके साथ दो मील आगे तक जाएं। (मैथ्यू 5:41)

हमें पाने से पहले देना होता है। जीवन में सफलता का सबसे आसान तरीका है कि आप दूसरों को दें। आपकी की गई मदद आपके पास लौटकर आती है। ईसामसीह का कहना है कि जो व्यक्ति दयालुता के बीज बोता है, उसे लगातार फसल मिलती रहती है। प्रोवब्र्स 11:17 में लिखा है, 'जब आप दयालु होते हैं, तो आपकी आत्मा को पोषण मिलता है। जब आप क्रूर होते हैं, तो यह नष्ट हो जाती है।' दूसरों के लिए आपके बोले प्रशंसा के दो शब्द बहुत मूल्यवान होते हैं। इसमें कुछ भी खर्च नहीं होता है। ईश्वर दयालु और दाता है, उसकी तरह बनें और सबका भला करें। इससे आपकी जिंदगी में पहले से बेहतर होने लगेगी।

आलोचना से न घबराएं
अगर आप उपहास उड़ाने वाले को बाहर निकाल देंगे, तो आप तनाव, लड़ाई और झगड़े से मुक्त हो जाएंगे। (प्रोवब्र्स 22:10, टी.एल.बी.)
डेल कारनेगी ने कहा है, 'कोई भी मूर्ख आलोचना कर सकता है, बुराई कर सकता है और शिकायत कर सकता है और ज्यादातर मूर्ख यही करते हैं।' काम की आलोचना करना उसे करने से हजार गुना ज्यादा आसान काम है। हमें इससे बचना चाहिए। सभी प्रगतिशील लोगों में एक खास बात होती है कि आलोचना उनकी तरफ खिंची चली आती है। ऐसे में घबराना बेकार है। अगर आप कुछ नया करते हैं, तो लोग बातें बनाने लगते हैं। उन्हें लगता है कि यह इंसान कैसे बंधे-बंधाए नियमों को तोड़ सकता है। खुद को बड़ा बनाएं और किसी के आलोचक न बनें और न ही खुद की आलोचना से दुखी हों।

ईष्र्या न करें
आरामदेह नजरिया व्यक्ति के जीवन को लंबा करता है, ईष्र्या इसे कम करती है। (प्रोवब्र्स 14:30, टी.एल.बी.) ईश्वर के हम सब की दौड़ निश्चित कर रखी है। अगर हम दूसरों की गति को परखने लगेंगे, तो हम खुद गिर जाएंगे। चाल्र्स कोल्टन ने कहा है, 'सभी भावनाओं में ईष्र्या सबसे कठोर सेवा करवाती है और सबसे बुरी तनख्वाह देती है।' आपकी जिंदगी बेशकीमती है, इसमें दूसरों के पास मौजूद चीजों की चाहत में बर्बाद नहीं करना चाहिए। ईष्र्या की बजाय जीवन में प्रेम पैदा करना चाहिए। जोश बिलिंग्स ने कहा है, 'प्रेम दूरबीन से देखता है और ईष्र्या माइक्रोस्कोप से देखती है।' ईष्र्या की बजाय जब इंसान दूसरों की खुशियों में अपनी खुशी खोजने लगता है, तो उसका जीवन सुखद बन जाता है।
धन्यवाद दें
उन सब चीजों के लिए खुश हों, जो ईश्वर आपको देने की योजना बना रहा है। मुश्किलों में धैर्य रखें और हमेशा प्रार्थना करें। (रोमन्स 12:12 टी.एल.बी)
आज के दिन धन्यवाद देने के लिए सौ चीजें खोजें। जीवन में कृतज्ञता का भाव रखने से जीवन सरल बन जाता है। हमें ईश्वर ने खुशियों से भरा जीवन जीने के लिए हर जरूरी चीज दी है। इनका आनंद उठाना सीखें। महत्वपूर्ण चीज यह है कि जो चीजें आपको हासिल हुई हैं, उन्हें आप अपने कर्मों का नतीजा मानते हैं या ईश्वर की नियामतें। ईश्वर की नियामतों के लिए उसे धन्यवाद दें और उससे प्रार्थना करें, 'हे ईश्वर, आपने मुझे इतना कुछ दिया है, मुझे एक चीज और दें- कृतज्ञ हृदय।'
-प्रस्तुति: आशीष जैन

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02 September 2009

आज की ताजा खबर- खबर लहरिया


महिलाओं के प्रयासों से निकलने वाले बुंदेली भाषा के अखबार 'खबर लहरिया' को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर मिलेगा यूनेस्को की ओर से साक्षरता पुरस्कार।
दलित, आदिवासी महिलाएं पढ़-लिख रही हैं और अब नई खबर है कि वे अखबार भी निकाल रही हैं। सही बात है, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में नवसाक्षरों और कम पढ़े-लिखे लोगों को उनकी बोली में ही सरल शब्दों वाला अखबार मुहैया हो, तो वे भी आसानी से अक्षरों से दोस्ती करने लगते हैं। अपने अंचल की बातें, अपनी ही जुबानी लिखी हों, तो जुड़ाव महसूस होता है। बुंदेली भाषा में छपने वाले अखबार 'खबर लहरिया' की प्रसिद्धि इसी बात का सबूत है।

सबसे सुखद बात है कि उनकी इस सार्थक पहल को यूनेस्को ने तवज्जो दी है और अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस, 8 सितबंर को साक्षरता पुरस्कार दिया जा रहा है। खबर लहरिया सहित चार पाक्षिक समाचार पत्रों को आठ सितंबर को पेरिस में साल 2009 के 'किंग सिजोंग साक्षरता पुरस्कार' से सम्मानित किया जाएगा, जिसमें प्रत्येक पुरस्कार विजेता को बीस हजार डॉलर की राशि दी जाती है।
प्रवाह समाचारों का
उत्तरप्रदेश के चित्रकूट और बांदा जिले से निकलने वाला साप्ताहिक अखबार 'खबर लहरिया'वाकई महिला सशक्तीकरण की मिसाल है। महिलाएं रिपोर्टिंग करती हैं, दूर-दराज के इलाकों से खबरों को इकट्ठा करती हैं, संपादन करती हैं और अखबार छपने पर बांटने का काम भी करती हैं। अखबार की एडिटर इन चीफ मीरा पांच बच्चों की मां हैं और अपना घरेलू काम पूरा करने के बाद कार्यालय पहुंचती हैं। साथ काम करने वाली अधिकांश महिलाएं विवाहित होने के बावजूद घर और बाहर के कामों को बखूबी निभाती हैं। अखबार से जुड़ी महिलाओं का आठवीं पास होना जरूरी है, पर नवसाक्षर पिछड़ी महिलाएं भी इससे जुड़ सकती हैं। क्षेत्र के बड़े अखबार भी खबर लहरिया में छपी खबरों के आधार पर खबरें निकालने लगे हैं। मीरा का कहना है, 'गांव-गांव जाकर लोगों की समस्या सुनने-समझने से काफी जानकारी मिलती है। शुरू में गरीब और नवसाक्षर महिलाओं को इस तरह का काम करता देखकर परिवार और समाज ने काफी विरोध किया था, पर धीरे-धीरे वे भी समझ गए। हमारा जोर इस बात पर रहता है कि खबरें नवसाक्षरों को ध्यान में रखकर लिखी जाएं।'
मासिक से बना साप्ताहिक
यह अखबार चित्रकूट जिले से आठ साल और बांदा जिले से तीन सालों से निकल रहा है। दोनों जिलों के लगभग 400 गांवों में इसे पढ़ा जाता है। इसे दिल्ली और उत्तरप्रदेश की महिला शिक्षा से जुड़ी स्वयंसेवी संस्था 'निरंतर' के सहयोग से 2002 से निकाला जा रहा है। एक मासिक पत्र के रूप में मात्र तीन महिलाओं के प्रयासों से शुरू हुआ यह अखबार पाक्षिक से होते हुए अब साप्ताहिक बन चुका है। खबर लहरिया यानी- समाचारों का अनवरत प्रवाह। अभी इसकी प्रसार संख्या 4500 है। लगभग बीस हजार पाठक संख्या वाले अखबार की कीमत दो रुपए है। अब इस अखबार को बिहार के तीन जिलों से भी शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। अभी 15 महिलाएं मिलकर इसे संभाल रही हैं। इसमें राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और मनोरंजन से जुड़ी खबरें प्रकाशित की जाती हैं। प्रतिष्ठित चमेली देवी पुरस्कार भी इस अखबार को मिल चुका है।
मामले की पूरी पड़ताल
संघर्ष के दिनों को याद करते हुए मीरा देवी कहती हैं, 'शुरू में साथी संवाददाताओं को कोई भी सूचना हासिल करने में बड़ी समस्या आती थी। लोग हमें गंभीरता से नहीं लेते थे। सरकारी विभागों के लोग हमें परेशान करते थे। पर हमने हार नहीं मानी और लोगों की समस्याओं को बेबाकी से छापा। मेरे साथ मिथिलेश, दुर्गा, सोनिया, शकीला, मीरा, कविता, शांति और मंजु भी हैं।' आठ पेजों के इस अखबार ने स्थानीय स्तर पर कई समस्याओं को भी सुलझाया है। उदाहरण के तौर पर हन्ना गांव में सड़क का प्रोजेक्ट सिर्फ सरकारी कागजों में पूरा हुआ था। जब संवाददाता मिथिलेश ने पूरे मामले की पड़ताल करके मामले को अखबार में छापा, तो जिला मजिस्ट्रेट ने जांच करवाई। अब हन्ना गांव में सड़क बन चुकी है। खबर लहरिया में छपी खबरों पर ग्रामीण लोगों को काफी भरोसा है। मीरा बताती हैं कि मुख्यमंत्री योजना में गरीब राशनकार्डधारियों को सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज की हमने अखबार में छापी थी। जब ग्रामीण लोगों से डॉक्टरों ने कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है। हम इलाज नहीं कर सकते, तो ग्रामीणों ने जवाब दिया, 'ऐसा नहीं हो सकता, हमने खबर पढ़ी है, खबर लहरिया में।'
बेबाक शैली में गंभीर बात
अखबार से जुड़ी महिलाएं सूचनाएं इकट्ठा करती हैं। फिर महीने में दो बार होने वाली मीटिंग के दौरान खबरों पर चर्चा की जाती है और खबरों के लिए पृष्ठ निर्धारित किए जाते हैं। हर पेज का एक तय नाम है, जैसे- देश-दुनिया, विकास, महिला मुद्दा, पंचायत, क्षेत्रीय खबरें, इधर-उधर। अखबार को चलाने वाली महिलाओं के पास पत्रकारिता की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हैं, पर निरंतर ने समय-समय पर इससे संबधित जानकारी के लिए कार्यशालाएं आयोजित की हैं। संपादकीय टिप्पणी में भी अखबार की ओर से बेबाक शैली का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे-'आ गा सूचना का अधिकार अब मड़ई सरकारी आफिस, सरकारी अस्पताल, ब्लॉक, पंचायत, पुलिस चौकी अउर दूसर सरकारी विभागन से सूचना लइ सकत हवैं। अब सरकारी अधिकारी सूचना दे मा आनाकानी न करिहैं। काहे से सूचना न दे मा उनका जुर्माना दे का पड़ी।'
-आशीष जैन

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26 August 2009

लोकतंत्र की दीवानी


पिछले बीस सालों से घर में नजरबंद रहने के बावजूद आंग सान सू की ने हार नहीं मानी है, वे म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना के लिए जी-जान से जुटी हुई हैं।
रंगून में 1945 के जून माह में एक सितारा जमीन पर उतरा। ऊपरवाले ने पहले ही उसकी किस्मत में लिख दिया था कि उसे जीवनभर अपने देश के नागरिकों के हक की लड़ाई लडऩी है और लोकतंत्र का अगुआ बनना है। पति कैंसर की बीमारी से जूझते हुए गुजर गए, पर वे अपने संघर्ष की धार को कम नहीं करना चाहती थीं, इसलिए अपने पति को संभालने भी नहीं गईं। पिछले साल म्यांमार में आए नरगिस तूफान से सू की का घर तबाह हो गया। अब उनके अस्थायी घर में रोशनी नहीं रहती और वे रात को अपना ज्यादातर समय मोमबत्तियों के बीच गुजारती हैं। उन्होंने छोटी-सी उम्र से ही तय कर लिया था कि वे म्यांमार में लोकतंत्र की एक ऐसी लड़ाई लडऩे जा रही हैं, जिसमें घर-परिवार सब कुछ छूट सकता है। उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया और जुटी हुई हैं अपने मिशन पर।

छोटे कदम बड़ा संघर्ष
बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। पिता की हत्या कर दी गई। कई मुश्किलों के बीच उनकी मां खिन की ने रंगून में सू की और उसके दो भाइयों आंग सांग लिन और आंग सांग ओ का लालन-पालन किया। थोड़ी बड़ी हुई थीं कि आठ साल की छोटी उम्र में उन्हें अपने प्यारे भाई आंग सांग लिन की मौत का सदमा झेलना पड़ा। बड़ा भाई भी आंग सांग ओ भी उन्हें छोड़कर कैलिफोर्निया में जा बसा। लंदन से पढ़ाई करके लौटने के बाद 1988 में सू की वापस बर्मा लौटीं और लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने लगीं। नब्बे के दशक में हुए चुनावों में सू की की पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की, सारी दुनिया को लगा कि सू की का संघर्ष अपनी मंजिल पा गया है। पर उनके समर्थकों को शायद यह पता नहीं था कि असली लड़ाई शुरू ही तब हुई थी। इस जीत के बाद तय था कि अब म्यांमार की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आंग सांग सू की बैठेंगी। पर सैन्य शासकों ने सत्ता छोडऩे से इंकार कर दिया था और सू की को घर में ही नजरबंद कर दिया था। सू की घबराईं नहीं और पूरी दुनिया को संदेश देती रहीं कि वे अपनी आखिरी सांस तक हार नहीं मानेंगी।
पति से मिलीं सिर्फ पांच बार
1995 का क्रिसमस वे शायद ही भुला पाएं, इसी दिन उनकी और पति मिशेल की आखिरी मुलाकात हुई थी। इसके बाद वे कभी नहीं मिले। परेशानियों ने फिर भी सू की का पीछा नहीं छोड़ा। कुछ समय बाद मिशेल को प्रोस्टेट कैंसर हो गया, तब भी बर्मा के तानाशाहों ने उन्हें सू की से मिलने के लिए वीजा जारी नहीं किया। उस समय सू की अस्थायी तौर पर नजरबंदी से मुक्त थीं, वे अपने पति से मिलने लंदन जा सकती थीं, पर उन्होंने सोचा कि अगर वे एक बार देश से बाहर निकल गईं, तो सैन्य शासक उन्हें वापस देश में घुसने की इजाजत कभी नहीं देंगे। 1999 आते-आते उनके पति मिशेल की मौत हो गई। दुखद बात यह रही कि उनका निधन अपने 53वें जन्मदिन पर हुआ। खास बात यह भी है कि 1989 में पहली बार घर में नजरबंदी के बाद 1995 को क्रिसमस की आखिरी मुलाकात तक, वे अपने पति से सिर्फ पांच बार मिल पाईं। उनके दोनों बच्चे भी उनसे दूर ब्रिटेन में रहते हैं।
संघर्ष लहू बनकर दौड़ता है
नाम भी दिलचस्प है आंग सांग सू की का। उनके नाम में 'आंग सान' शब्द उनके पिता, 'सू' उनकी दादी और 'की' उनकी मां के नाम से लिया हुआ है। 64 साल की आंग सांग सू की के पिता ने 'मॉर्डन बर्मा आर्मी' की स्थापना की और 1947 में यूनाइटेड किंगडम से बर्मा को आजादी दिलाने में अपना योगदान दिया, तो मां भी बर्मा की राजनीति में जाना-माना चेहरा रहीं। जी हां, इसी वजह से आंग सांग सू की की रगों में ही संघर्ष लहू बनकर दौड़ता है। 1960 में उनकी मां भारत और नेपाल में बर्मा की राजदूत नियुक्त की गईं। उस दौरान आंग सांग सू की भी भारत में रहीं और उन्होंने नई दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से 1964 में राजनीति विज्ञान में एक डिग्री के साथ अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद भी पढ़ाई का सिलसिला चलता रहा और 1969 में सू की ने ऑक्सफोर्ड से दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र में बीए और 1985 में लंदन यूनिवर्सिटी से पीएचडी पूरी कर ली। लंदन में रहने के दौरान उनकी मुलाकात डॉ. मिशेल एरिस से हुई और फिर शादी। सू की के दो बेटे हैं- एलेक्जेंडर एरिस और किम। सू की को उनके प्रयासों के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं। 1991 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1992 में भारत सरकार ने उनके शांतिपूर्ण संघर्ष के लिए 'जवाहर लाल नेहरू शांति पुरस्कार' दिया।
तानाशाही को पसंद नहीं रिहाई
म्यांमार में पिछले 47 सालों से फौजी हुकूमत है। महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाली सू की भी उनकी तरह अहिंसा के रास्ते पर चलकर अपने देश को सैन्य शासन से मुक्ति दिलाना चाहती हैं। बगैर सरकार की इजाजत के किसी को उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी जाती। उनकी टेलीफोन लाइन को भी काट दिया गया है। इस साल मई में सू की की नजरबंदी का समय पूरा हो गया था। पर सैन्य सरकार ने सू की पर आरोप लगा दिए कि उन्होंने नजरबंदी के कानून का उल्लंघन किया है। कानून के मुताबिक उनके साथ रहने वाली दो महिलाओं के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति उन तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल हाल ही एक अमरीकी व्यक्ति ने किसी तरह सू की के घर पर पहुंचने की कोशिश की थी। अब तानाशाह ने इसी बात को मुद्दा बनाकर सू की की नजरबंदी 18 महीने और बढ़ा दी है, ताकि अगले साल होने वाले चुनावों में उनका और उनकी पार्टी 'नेशनल डेमोक्रेसी लीग' का कोई दखल न रह जाए।
-आशीष जैन

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13 August 2009

भरतनाट्यम में डूबी भाव-भंगिमाएं

इस साल पद्म भूषण से सम्मानित दंपती वी. पी. धनंजयन और शांता पिछले 50 सालों से साथ नृत्य कर रहे हैं। इस दंपती को एक साथ नृत्य करते हुए देखकर लगता है, मानो एक भाव है और दूजा भंगिमा, दोनों मिलकर भरतनाट्यम की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं।




केरल का पेयन्नुर गांव। 1953 में इस गांव के एक गरीब परिवार के 13 साल के लड़के पर मशहूर कथकली कलाकार टी. के. चंदू पणिकर का ध्यान जाता है, वे उसकी नृत्य कला पर मुग्ध हो जाते हैं। वे उसे नृत्य के मशहूर संस्थान 'कलाशेत्रÓ की संस्थापक और मशहूर नृत्यांगना रूक्मणीदेवी के पास ले जाते हैं। वहां उस लड़के की मुलाकात नौ साल की लड़की शांता से होती है। शांता भी वहां पर नृत्य सीखने आई है। पहली नजर में ही दोनों को प्यार हो जाता है। वे सालों तक राम और सीता की नृत्य नाटिकाएं पेश करते हैं और बाद में शादी कर लेते हैं। यह कहानी है- भरतनाट्यम की मशहूर नृत्य जोड़ी वी. पी. धनंजयन और शांता की। ये दोनों धनंजयंस के नाम से मशहूर हैं। वे दोनों अपने आप में परिपूर्ण हैं, पर जब दोनों मिलकर नृत्य करते हैं, तो लोग बिना पलक झपकाए उन्हें निहारते रहते हैं और भावनाओं के समंदर में गोते लगाते हैं। उनके नृत्य, पहनावे, बातचीत और बरताव में महान भारतीय संस्कृति की झलक मिलती है। अगर कहा जाए कि वे भारतीय संस्कृति के सच्चे दूत हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
बहुत कुछ करना है
दोनों कला की आराधना करते-करते बहुत मंजिलें तय कर चुके हैं। 70 साल के वन्नाडिल पुडियापेट्टिल धनंजयन (वी.पी. धनंजयन) को नृत्य करते हुए 60 साल हो गए हैं। चेन्नई में उनका नृत्य संस्थान 'भारतकलांजलिÓ 40 साल पूरे कर चुका है। यह संस्थान दुनिया को नामी नृत्यकार और संगीतकार दे चुका है। सालों से दोनों पति-पत्नी कला के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं और चाहते हैं कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत नित नई ऊंचाइयों को छूता रहे। इस जोड़े को 2009 में भारत सरकार ने प्रतिष्ठित पद्मभूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान पाने वाली यह दूसरी नृत्य जोड़ी है। जब दंपती को पद्मभूषण अवार्ड मिला, तो उनका कहना था, 'ये सम्मान हम सारे शिष्यों और कला की बारीकियां सिखाने वाले संस्थान 'कलाक्षेत्रÓ को समर्पित करते हैं। 1956 में हमारी संरक्षक और 'कलाक्षेत्रÓ की संस्थापक रुक्मणी देवी को भी यह अवार्ड मिला था। हमें गर्व है कि हम उनके पदचिह्नों पर चलकर यहां तक पहुंचे।Ó पुरस्कारों के बारे में धनंजयन कहते हैं, 'इंदिरा गांधी अपनी हत्या से 10 दिन पहले दिल्ली में हमसे मिली थीं और उन्होंने हमसे पूछा कि मैं आपके लिए क्या कर सकती हूं, तो हमने विनम्रतापूर्वक ना कह दिया। मुझे कई पुरस्कार और पद मिलने की बातें होती थीं, पर मेरा मानना था कि उसे उसके सही हकदार को ही दिया जाना चाहिए। भारत सरकार के कलाक्षेत्र को अधिग्रहण करने से पहले सरकारी अधिकारियों ने मुझसे कहा कि क्या आपके इसके डायरेक्टर बनना चाहेंगे? तो मेरा जवाब था कि इस पद के लिए मुझे नहीं, किसी और योग्य व्यक्ति को चुना जाना चाहिए।Ó
कला और कलाकार
वी.पी. धनंजयन अपनी किताब 'बियोंड परफॅारमेंसÓ में कला के इतर विषयों के बारे में बताते हैं, 'इस किताब में मैंने कला से जुड़ी सच्चाइयों का साफगोई से जिक्र किया था, अब अगर सच बोलने से कोई विवाद होता है तो लोग नाराज क्यों होते हैं? मैं तो शुरू से ही कला और कलाकारों के हित की बात करता हूं। जब लोग भारतीय शास्त्रीय नृत्य को डांस कहकर पुकारते हैं, तो मैं एतराज जताता हूं। भरतनाट्यम एक बड़ी और परिपूर्ण कला है। इसे उचित सम्मान मिलना चाहिए।Ó कलाकारों के राजनीति में प्रवेश के बारे में उनका कहना है कि कई कलाकार संसद में मनोनीत किए जाते हैं। पर कोई भी कला के प्रोत्साहन के लिए खास कदम नहीं उठाता। अगर मुझे ऐसा मौका मिला, ताकि मैं कला की शिक्षा और पहुंच बढ़ाने के लिए कुछ ठोस कदम उठा सकूं।
हम साथ-साथ हैं
केरल के पेयन्नुर में 1939 में पैदा हुए धनंजयन ने भरतनाट्यम और कथकली नृत्य में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। उनके पिता ए. रामा अध्यापक थे। उनके परिवार में यूं तो कोई नृत्य से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं था, पर पिता नाटकों में हिस्सा लिया करते थे। यहीं से उन्हें प्रेरणा मिली और वे नृत्य कला के प्रति गंभीर होते चले गए। धनंजय को बचपन से ही संस्कृत साहित्य से बहुत लगाव था और वे आठ साल की उम्र से ही कविताएं लिखने लग गए थे। उनके पिता ने बढ़ती पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें 'कलाक्षेत्रÓ में भेज दिया। वहां उन्हें न केवल प्रवेश मिला, साथ ही नृत्य में बेहतरीन साधना के लिए स्कॉलरशिप भी दी गई।
शांता मलेशिया के एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हैं। शांता का जन्म यूं तो मलेशिया में हुआ, पर वे खुद को केरल से ही जुड़ा हुआ मानती हैं। दरअसल उनका परिवार तीन पीढिय़ों पहले केरल से मलेशिया में बस गया था। शांता ने भी नृत्य की बारीकियां धनंजयन के साथ ही कलाक्षेत्र में सीखीं। उनके पिता बीबीसी में अकाउंटेट के पद पर थे। बचपन में शांता की नृत्य के प्रति बढ़ती रुचि को देखकर उन्होंने उसे कलाक्षेत्र में भर्ती करा दिया। शांता शुरू से ही कला के प्रति बेहद गंभीर थीं। यहीं पर वे धनंजयन से मिलीं और दोनों ने साथ-साथ नृत्य नाटिकाएं पेश करना शुरू कर दिया। राम और सीता के किरदार करते-करते दोनों को एक-दूसरे का साथ भाने लगा और 1966 में दोनों ने शादी कर ली।
आज भी दोनों मिलकर गरीब और प्रतिभावान बच्चों को नृत्य की बारीकियां सिखाते हैं और विदेशों में भी भरतनाट्यम के बारे में प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहते हैं। भारतकलांजलि में आज भी गुरुकुल परंपरा के अनुरूप शिक्षा दी जाती है। भरतनाट्यम को नित नए आयाम देने के लिए यह दंपती रचनात्मक संसार में जी-जान से जुटा है। उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा संजय अपनी पत्नी के साथ अमरीका में रहता है और चेन्नई में रहने वाला छोटा बेटा सत्यजीत मशहूर फोटोग्राफर और नृत्यकार है। दोनों कमाल के गुरु हैं। उनके शिष्यों के लिए वे भगवान की तरह हैं। दोनों अपने शिष्यों को सिर्फ भरतनाट्यम ही नहीं सिखाते, बल्कि उन्हें भारतीय परंपरा और संस्कृति से भी रूबरू करवाते हैं।
-आशीष जैन

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12 August 2009

लोकतंत्र की दीवानी सू की


पिछले बीस सालों से घर में नजरबंद रहने के बावजूद म्यांमार की आंग सांग सू की ने हार नहीं मानी है और म्यामांर में लोकतंत्र की स्थापना के लिए जी जान से जुटी हुई हैं।
1945 में 19 जून को रंगून में एक सितारा जमीन पर उतर चुका था। ऊपरवाले ने पहले ही उसकी किस्मत में लिख दिया था कि उसे जीवनभर अपने देश के नागरिकों के हक की लड़ाई लडऩी है और लोकतंत्र का अगुआ बनना है। पति कैंसर की बीमारी से जूझते हुए गुजर गए, पर वे अपने संघर्ष की धार को कम नहीं करना चाहती थीं, इसलिए अपने पति को संभालने भी नहीं गईं। पिछली साल म्यांमार में आए नरगिस तूफान से सू की का घर तबाह हो गया। अब उनके अस्थायी घर में रोशनी नहीं रहती और वे रात को अपना ज्यादातर समय मोमबत्तियों के बीच गुजारती हैं। उन्होंने छोटी सी उम्र से ही तय कर लिया था कि वे म्यांमार में लोकतंत्र की एक ऐसी लड़ाई लडऩे जा रही हैं, जिसमें घर-परिवार सब कुछ छूट सकता है। उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया और जुटी हुई हैं अपने मिशन पर।

छोटे कदम बड़ा संघर्ष
बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। उनके पिता की हत्या कर दी गई। कई मुश्किलों के बीच उनकी मां खिन की ने रंगून में सू की और उसके दो भाइयों आंग सांग लिन और आंग सांग ओ का लालन-पालन किया। थोड़ी बड़ी हुई थीं कि आठ साल की छोटी उम्र में उन्हें अपने प्यारे भाई आंग सांग लिन की मौत का सदमा झेलना पड़ा। बड़ा भाई भी आंग सांग ओ भी उन्हें छोड़कर कैलिफोर्निया में जा बसा। लंदन से पढ़ाई करके लौटने के बाद 1988 में सू की वापस बर्मा लौटी और लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने लगीं। नब्बे के दशक में हुए चुनावों में सू की की पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की, सारी दुनिया को लगा कि सू की का संघर्ष अपनी मंजिल पा गया है। पर उनके समर्थकों को शायद यह पता नहीं था कि असली लड़ाई शुरू ही तब हुई थी। इस जीत के बाद तय था कि अब म्यांमार की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आंग सांग सू की बैठेंगी। पर सैन्य शासकों ने सत्ता छोडऩे से इंकार कर दिया था और सू की को घर में ही नजरबंद कर दिया था। सू की घबराई नहीं और पूरी दुनिया को संदेश देती रहीं कि वे अपनी आखिरी सांस तक हार नहीं मानेंगी।
पति से मिलीं सिर्फ पांच बार
1995 का क्रिसमस वे शायद ही भूला पाएं, इसी दिन उनकी और पति मिशेल की आखिरी मुलाकात हुई थी। इसके बाद वे कभी नहीं मिले। परेशानियां ने फिर भी सू की का पीछा नहीं छूटा। कुछ समय बाद मिशेल को प्रोस्टेट कैंसर हो गया, तब भी बर्मा के तानाशाहों ने उन्हें सू की से मिलने के लिए वीजा जारी नहीं किया। उस समय सू की अस्थायी तौर पर नजरबंदी से मुक्त थीं, वे अपने पति से मिलने लंदन जा सकती थीं, पर उन्होंने सोचा कि अगर वे पति की तबियत की चिंता के चलते एक बार देश से बाहर निकल गईं, तो सैन्य शासक उसे वापस देश में घुसने की इजाजत कभी नहीं देंगे। 1999 आते-आते उनके पति मिशेल की मौत हो गई। दुखद बात यह रही कि उनका निधन अपने 53वें जन्मदिन पर हुआ। सू की के संघर्ष में मिसाल है कि 1989 में पहली बार घर में नजरबंदी के बाद 1995 को क्रिसमस की आखिरी मुलाकात तक, वे अपने पति से सिर्फ पांच बार मिल पाईं। उनके दोनों बच्चे भी उनसे दूर यूनाइटेड किंगडम में रहते हैं।
संघर्ष लहू बनकर दौड़ता है
नाम भी दिलचस्प है आंग सांग सू की का। उनके नाम में 'आंग सांगÓ शब्द उनके पिता, 'सूÓ उनकी दादी और 'कीÓ उनकी मां के नाम से लिया हुआ है। 64 साल की आंग सांग सू की के पिता ने 'मॉर्डन बर्मा आर्मीÓ की स्थापना की और 1947 में यूनाइटेड किंगडम से बर्मा को आजादी दिलाने में अपना योगदान दिया, तो मां भी बर्मा की राजनीति में जाना-माना चेहरा रहीं। जी हां, इसी वजह से आंग सांग सू की की रगों में ही संघर्ष लहू बनकर दौड़ता है। 1960 में उनकी मां भारत और नेपाल में बर्मा की राजदूत नियुक्त की गईं। उस दौरान आंग सांग सू की भी भारत में रहीं और उन्होंने नई दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से 1964 में राजनीति में एक डिग्री के साथ अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद भी पढ़ाई का सिलसिला चलता रहा और 1969 में सू की ने ऑक्सफोर्ड से दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र में बीए और 1985 में लंदन यूनिवसिर्टी से पीएचडी पूरी कर ली। लंदन में रहने के दौरान उनकी मुलाकात डॉ. मिशेल एरिस से हुई और फिर शादी। सू की की दो बेटे हैं- एलेक्जेंडर एरिस और किम। सू की को उनके प्रयासों के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं। 1991 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1992 में भारत सरकार ने उनके शांतिपूर्ण संघर्ष के लिए 'जवाहर लाल नेहरू शांति पुरस्कारÓ दिया।
तानाशाही को पसंद नहीं रिहाई
म्यांमार में पिछले 47 सालों से फौजी हुकूमत है। महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाली सू की भी उनकी तरह अहिंसा के रास्ते पर चलकर अपने देश को सैन्य शासन से मुक्ति दिलाना चाहती हैं। सू की को बगैर सरकार की इजाजत के किसी को उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी जाती। उनकी टेलीफोन की लाइन को भी काट दिया गया है। इस साल मई में सू की की नजरबंदी का समय पूरा हो गया था। पर सैन्य सरकार ने सू की पर आरोप लगा दिए कि उन्होंने नजरबंदी के कानून का उल्लंघन किया है। कानून के मुताबिक उनके साथ रहने वाली दो महिलाओं के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति उन तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल हाल ही एक अमरीकी व्यक्ति ने किसी तरह सू की के घर पर पहुंचने की कोशिश की थी। अब तानाशाह इसी बात को मुद्दा बनाकर सू की को पांच सालों की जेल कराना चाहते हैं, ताकि अगले साल होने वाले चुनावों में सू की और उनकी पार्टी 'नेशनल डेमोक्रेसी लीगÓ का कोई दखल न रह जाए।
- आशीष जैन

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06 August 2009

हिंदुस्तानी रंग हैं प्रिय


अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने हाल की अपनी भारत यात्रा के दौरान अपने पहनावे को लेकर काफी सुर्खियां बटोरीं। आइए जानते हैं क्या है उनके बेहतरीन पहनावे का राज-उम्र के हर दौर में हिलेरी अपने पहनावे को लेकर कॉन्शियस रही हैं। उनका फैशन स्टेटमैंट बहुत सीधा है- कूल एंड कंफर्ट डे्रसिंग। वे मौसम के मुताबिक कपड़े पहनना पसंद करती हैं। अगर उन्हें लगता है कि लाल रंग के सूट के साथ उन पर ज्वैलरी फबेगी, तो बेहिचक नया ज्वैलरी कलैक्शन खरीद लेती हैं। वैसे ब्लैक एंड व्हाइट का कॉम्बिेशन उनका ऑलटाइम फेवरेट ड्रेस है। मशहूर फैशन डिजाइनर रितु कुमार का कहना है कि वे पारंपरिक कपड़ों को बेहद सलीके से पहनती हैं। उनका नजरिया चाहे अमरीकन हो, पर उनकी डे्रसेज के रंग अधिकतर भारतीय होते हैं।

बकौल फैशन डिजाइनर तरुण ताहिलियानी हिलेरी हमेशा इस बात का ध्यान रखती हैं कि कहां-क्या पहनना चाहिए। अगर वे किसी राजनीतिक मुलाकात के लिए निकलती हैं, तो उनके कपड़ों में सादगी और सौम्यता रहती है, वहीं पार्टीज और हॉलीडे पर जाते वक्त वे कूल डे्रस प्रिफर करती हैं। जब भी वे भारत की यात्रा पर होती हैं, तो उनके सिंगल टोन सूट्स की बहार देखते ही बनती है। फैशन डिजाइनर डेविड अब्राहम का मानना है कि वे अपने पहनावे में गजब के इमेजिनेशन का इस्तेमाल करती हैं। चाहे वे पश्चिमी संस्कृति के कपड़े पहनती हों, पर उन्हें पहनने का अंदाज वाकई तारीफ के काबिल है।
इकसठ साल की हिलेरी जब अपने पति और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ भारत दौरे पर आई थीं, तब भी उनके स्टाइलिश कपड़ों से सभी इंप्रेस थे। इस बार की यात्रा के दौरान उनके चमकदार बंद गले के बिजनेस सूट और गले में पतले प्लेटिनम-गोल्ड नेकलैस ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। डे्रसेज का चुनाव करते वक्त वे अपनी हेयर स्टाइल का भी बहुत खयाल रखती हैं। अपने पहनावे से वे एक असर छोड़ती हैं और जतलाती हैं कि वे निर्भीक और बुलंद इरादों की महिला हैं। उनकी मुस्कान उनके पहनावे में चार चांद लगा देती है।
कॉलेज के दिनों में वे स्कर्ट, शार्ट फ्रॉक और डेनिम पसंद करती थीं। बाद में वे डोन्ना कारान और ऑस्कर डेला रेंटा के डिजाइन किए हुए लॉन्ग स्लीव्स, हाई कॉलर्स और नेकलाइन ज्वैलरी प्रिफर करने लगीं। शादी के वक्त उनका पहना सफेद गाउन रिश्तों के लिए उनके समर्पण को दर्शा रहा था। 1983 में जब उन्होंने ब्ल्यू हैट के साथ मेजंटा और व्हाइट चैक्ड शर्ट पहनी, तो सबकी तारीफें बटोरीं। उनका मानना है कि वे अपने पहनावे के प्रति सजग है और लगातार इसमें बदलाव की हिमायती हैं।
-आशीष जैन

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05 August 2009

उइगरों की रेबिया


बासठ साल की रेबिया को चीन की सरकार हाल में हुए दंगों के लिए जिम्मेवार ठहराया है। पर वे खुद को मानवाधिकार की हितैषी बताती हैं। जानते हैं रेबिया की जिंदगी के अनछुए पहलुओं को-
मानवाधिकार के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने के लिए उन्हें 2004 में 'राफ्टो पुरस्कारÓ से सम्मानित किया गया। उइगर लोग संघर्ष करते वक्त उनकी तस्वीरें हाथों में लिए होते हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी के छह साल चीन की जेल में गुजारे हैं। बच्चों की शिक्षा के लिए वे अपने डिपार्टमेंटल स्टोर के कमरों में क्लासेज चलाती थीं। उन्होंने उइगर महिलाओं को खुद का रोजगार विकसित करने के लिए 'थाउजेंड मदर मूवमेंटÓ चलाया। हम बात कर रहे हैं रेबिया कदीर की।

वे कभी चीन की सबसे अमीर महिलाओं में से एक हुआ करती थीं, पर आज उनके पास अपना एक पैसा भी नहीं है और वे अमरीका के वॉशिंगटन में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। हान जाति और शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर जाति के बीच में हुए दंगों के सरकार उन्हें जिम्मेवार ठहरा रही है।
उइगरों की मां
रोचक बात है कि जिस राबिया पर चीन में दंगे फैलाने का आरोप लगाया जा रहा है, उन्हें 2006 में नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। उसी साल म्यूनिख में उन्हें 'विश्व उइगर कांग्रेस' का चेयरमैन बनाया गया है। वे एक करोड़ से ज्यादा उइगरों की मां मानी जाती हैं। गौर करने वाली है कि रेबिया कभी चीन की संसद की सदस्य थीं और चीन की सरकार ने एक समय उनके कामों की सराहना की थी और 1992 में उन्हें 'पालिटिकली कन्सलटेटिव कांग्रेसÓ का सदस्य नियुक्त किया गया था। साथ ही 1995 में यूनाइटेड नेशंस के महिलाओं पर हुए चौथे विश्व सम्मलेन में वे चीन की तरफ से भेजे गए डेलीगेट्स में एक सदस्य थीं। उसी चीन की सरकार ने उन पर आरोप लगा दिया कि वे राष्ट्र विरोधी कामों में संलग्न हैं। देशद्रोह के आरोप लगाकर चीन की सरकार उन्हें छह साल के जेल में डाल दिया। पूरी दुनिया के दबाव में आकर चीन सरकार ने उन्हें बरी तो किया, पर निर्वासित जीवन जीने पर मजबूर कर दिया।
संघर्ष से संवारी जिंदगी
रेबिया का जन्म 21 जनवरी 1947 को एक गरीब परिवार में हुआ। पर वे शुरु से ही संघर्षशील महिला रहीं। लॉन्ड्री के काम से अपने बिजनेस की शुरुआत करके वे एक टे्रडिंग कंपनी की मालिक बनीं। उन्होंने एक प्रोजेक्ट के तहत उइगर महिलाओं को रोजगार शुरू करने के लिए धन मुहैया कराया। 1997 के शिनजियांग के गुलजा उइगर नरसंहार के बाद वे चीनी सरकार के विरोध में उतर आईं। 1999 के आते-आते चीनी सरकार ने उन पर देशद्रोह का इल्जाम लगाकर जेल में डाल दिया। साल 2005 में उस समय की अमरीकी विदेश मंत्री कोंडालिसा राइस के हस्तक्षेप के चलते उन्हें रिहा किया गया। उन्होंने दो शादियां की। रेबिया के ग्यारह बच्चे हैं। उनके दो बच्चे अभी भी जेल में हैं। वे उइगरों के हक के लिए किए जाने वाले शांतिपूर्ण संघर्ष की पक्षधर रही हैं।
-आशीष जैन

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29 July 2009

निरूपमा का जवाब नहीं


एक अगस्त से देश के विदेश सचिव का पद संभालने वाली निरूपमा राव की जिंदगी के कुछ अनछुए पहलू-
एक ओर विदेश सेवा के संजीदा काम की धूप और दूसरी ओर काव्य और संगीत की ठंडी छांव। जब ये धूप-छांव मिलती हैं, तो ऐसे व्यक्तित्व का सृजन होता है, जो हर परिस्थिति में उचित निर्णय लेता है। देश की नई विदेश सचिव निरूपमा राव की यही खूबी उन्हें भीड़ से जुदा करती है। वे 1973 बैच की आईएफएस टॉपर हैं। 21 साल की उम्र में विदेश सेवा से जुडऩे वाली निरूपमा को विदेश मंत्रालय की पहली महिला प्रवक्ता होने का गौरव हासिल है।

संवेदनाओं से लबरेज
वे अपने साथियों के बीच अच्छे ड्रेसअप के लिए जानी जाती हैं। उनके पास ज्वैलरी का अच्छा कलैक्शन है। वे एक प्रशिक्षित क्लासिकल डांसर हैं और सावर्जनिक रूप से परफॅार्मेंस दे चुकी हैं। वे गिटार भी बजाती हैं। उन्हें कविताएं लिखने का शौक है। उनकी कई कविताएं छप भी चुकी हैं। साथ ही वे कर्नाटक संगीत की भी अच्छी जानकार हैं। काव्य और संगीत का असर उनके व्यक्तित्व में साफ झलकता है। उनकी आवाज में कवियों के ओज और नारी की कोमलता का अद्भुत मिश्रण है। एक कवयित्री के तौर पर वे संवेदनाओं और भावनाओं से लबरेज हैं। पर जब वे बड़े फैसले लेती हैं, तो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखती हैं। छह दिसंबर, 1950 को केरल में जन्मीं निरूपमा एक आर्मी अफसर की बेटी हैं। उन्होंने महाराष्ट्र की मराठा यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया है। उनके पति सुधाकर राव भी भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। उनके दो बेटे हैं। दिलचस्प बात है कि लोकसभा की पहली महिला स्पीकर मीराकुमार और निरुपमा एक ही आईएफएस बैच से थीं।
खरी-खरी सुनाती हैं
बतौर विदेश सचिव उनके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश में अशांति के माहौल में अपना दृढ़ पक्ष रखना एक प्रमुख काम है, वहीं अमरीका की कूटनीतिक चालों का जवाब देने में भी उन्हें अपना कौशल दिखाना होगा। वे इस पद को पाने वाली देश की दूसरी महिला होंगी। इससे पहले 2001 में कुछ समय के लिए चोकिला अय्यर भी विदेश सचिव के पद पर काम कर चुकी हैं। 58 साल की निरुपमा अभी चीन में भारत की राजदूत हैं। चीन में राजदूत बनने से पहले वे बतौर विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता दुनिया को खरी-खरी बातें सुनाने के लिए मशहूर रहीं। उन्होंने पाकिस्तान, चीन, नेपाल, अमरीका जैसे देशों के सामने देश का पक्ष बड़ी मजबूती और बेहद विनम्रता से रखा, बिल्कुल तनाव मुक्त होकर। वे श्रीलंका में उच्चायुक्त और पेरू में देश की राजदूत रह चुकी हैं। वे मॉस्को स्थित भारतीय मिशन में भी काम कर चुकी हैं। साथ ही विदेश मंत्रालय में पूर्वी एशिया मामलों की संयुक्त सचिव भी रह चुकी हैं।
-प्रस्तुति: आशीष जैन

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03 June 2009

बाखबर बरखा

बरखा दत्त टीवी पत्रकारिता का एक मशहूर चेहरा। करगिल वार जैसी मुश्किल कवरेज इनके खाते में दर्ज है। आइए जानते हैं, इनके कॅरियर और निजी जिंदगी के दिलचस्प वाकयों के बारे में, खुद उनकी जुबानी-
इस बात से मैं बेहद खुश हूं कि लोग मेरे काम को इतना पसंद करते हैं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं जर्नलिस्ट बनूंगी। मैं तो डॉक्यूमेंटी फिल्ममेकर या वकील बनना चाहती थी। अभी भी वकील बनने का मेरा ख्वाब जिंदा है। मेरी मां प्रभा दत्त भी पत्रकार थीं। उन्होंने जंग तक की कवरेज की थी। इसलिए न्यूज में मेरी शुरू से ही दिलचस्पी थी। मैंने शुरू में रिपोर्टिंग के साथ प्रोडक्शन का काम भी किया था। जामिया मिलिया के साथ-साथ कोलंबिया के पत्रकारिता संस्थान से भी मास्टर्स पूरा किया था। कोलंबिया जाने के समय मैंने पत्रकारिता के कॅरियर से डेढ़ साल की छुट्टी ले ली थी।

पत्थर के पीछे कई रातें
जर्नलिज्म में नौकरी को लेकर काफी असुरक्षा रहती है, पर फिर भी मैंने रिस्क लिया और वहां गई। और देखिए, मेरी वापसी के आठ महीने बाद ही करगिल की लड़ाई शुरू हो गई थी। करगिल वार की कवरेज के दौरान मेरे पास एक ही जींस रह गई थी, मैं 15 दिन तक उसी को पहने रही। करगिल में मेरे किरदार को फिल्म 'लक्ष्यÓ में प्रीति जिंटा ने बखूबी निभाया। लड़ाई का कवरेज करते वक्त डर तो लगता है, पर वहां घटनाक्रम इतनी तेजी से बदलता है कि डर पीछे छूट जाता है। उस वक्त आपको समझ नहीं आता कि आप किस तरह का जोखिम ले रहे हैं, पर बाद में उन दिनों को याद करके हैरान रह जाती हूं कि मैंने इतने ज्यादा रिस्क लिए थे।
मुझे आज भी याद है कि करगिल वार के दौरान हम जिस गाड़ी में थे, उस पर गोलीबारी हो गई और हमने कई रातें एक बड़े पत्थर के पीछे छुपकर गुजारीं। दिल-दिमाग पर बस लड़ाई का कवरेज छाया हुआ था, ना खाने की फिक्र, ना नहाने की। जो हेलीकॉप्टर्स शवों को ले जाते थे, हम उनसे कवरेज के टेप साथ में ले जाने की गुजारिश करते थे। वहां पर मोबाइल की बजाय सैटेलाइट फोन थे। बंकरों में छुपकर मैंने सैटेलाइट फोन से रिपोट्र्स भेजीं।
थोड़ा-सी सनक चाहिए
मेरा बचपन नई दिल्ली और न्यूयार्क में गुजरा। बचपन के कई साल मैंने न्यूयॉर्क में गुजारे थे। मेरे पिताजी एयर इंडिया में काम करते थे और उनके ट्रांसफर के चलते हमें न्यूयार्क जाना पड़ा था। मैंने दुनिया बहुत घूमी है। पर मैं बचपन में शरारती नहीं थी बिल्कुल खामोश रहती थी। उस वक्त भी मैं बहुत किताबें पढ़ती थीं। आज भी खाली समय में किताबें ही पढ़ती हूं। मैं अपनी मां और उनके काम से बहुत प्रभावित थी। पर जब मैं मात्र तेरह साल की थी, तो ब्रेन हैमरेज से उनका देहांत हो गया। मुझमें आज भी न्यूज को लेकर बहुत ज्यादा भूख है। या यूं कहूं कि न्यूज को लेकर थोड़ा-सा पागलपन भी है। एक बार मैंने किसी लेख में लिखा था कि टीवी जर्नलिज्म होने के लिए आपको थोड़ा सनकी भी होना चाहिए और यह बात मुझ पर सटीक बैठती है।
मैं असल जिंदगी में जो स्टाइल अपनाती हूं, वही तरीका मैं कैमरा फेस करते हुए भी इस्तेमाल करती हूं। शुरुआती दौर में एक बार मैंने राहुल द्रविड़ से कह दिया कि मुझे क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं है। इसके बाद मुझे कभी इंटरव्यू नहीं मिला। मैं जिंदगी में जैसे बात करती हूं, वैसे ही टीवी पर बात करती हूं। करगिल पर मेरे बेहतरीन काम को देखकर एक बार अमिताभ बच्चन ने मुझे फोन करके बधाई दी।
मेहनती होना चाहिए
मैं सद्दाम हुसैन के जमाने में इराक गई थीं। वहां अमरीकी सैनिकों ने हमें पकड़ लिया और टेप ले लिए। फिर जैसे-तैसे वहां से छूटी। मेरे साथ ऐसे कई वाकए कॅरियर के हर मोड़ पर हुए हैं। जब मैंने सलमान रुश्दी का इंटरव्यू किया, तो मैं बहुत घबराई हुई थी। मुझे इस बात का डर था कि चाहे मैं कुछ भी पूछ लूं, वे इतने चतुर हैं कि अपनी बात को सही साबित कर देंगे। रतन टाटा का इंटरव्यू लेना भी काफी मुश्किल है, वह अंतर्मुखी हैं और बहुत कम बोलते हैं। सोनिया गांधी बहुत ही शर्मीली महिला हैं। मैंने बेनजीर भुट्टो की हत्या के तीन दिन बाद आसिफ अली जरदारी से लरकाना में इंटरव्यू किया। उस वक्त मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इंटरव्यू में निजी बातें कितनी पूछूं और राजनीतिक कितनी।
पद्मश्री मिलने पर मैं बहुत अभिभूत महसूस कर रही थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि उम्र के तीसरे दशक में मुझे पद्मश्री जैसा पुरस्कार मिलेगा। मैं आलोचनाओं को भी काफी ईमानदारी से लेती हूं, पर उसमें झूठ शामिल नहीं होना चाहिए। खाली समय में बहुत-सी फिल्में देखती हूं। मुझे मर्डर मिस्ट्री और जासूसी सीरीज देखना बेहद पसंद है। फिल्मों में शशि कपूर मेरे फेवरिट हैं। लोगों को लगता है कि टीवी जर्नलिज्म बड़ा ग्लैमर वाला प्रोफेशन है, पर ऐसा नहीं है। इस पेशे में वही टिक सकता है, जो बहुत मेहनती है। मैं बहुत भावुक हूं। गुस्सा जल्दी आ जाता हूं, तो आंसू भी जल्दी आते हैं।
-आशीष जैन

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13 May 2009

यूं मिली कामयाबी की डगर

मुजफ्फरनगर की श्वेता सिंघल ने सिविल सर्विसेज एग्जाम में हासिल की 17वीं रैंक और हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों में दूसरा स्थान।

'जब मुझे पता लगा कि सिविल सर्विसेज एग्जाम में मुझे 17वीं रैंक हासिल हुई है, तो एकबारगी तो यकीन ही नहीं हुआ। लगा मेरी सालों की मेहनत और माता-पिता का आशीर्वाद काम आ ही गया। यह कहना है सिविल सर्विसेज एग्जाम में 17 वीं रैंक हासिल करने वाली उत्तप्रदेश के मुजफ्फरनगर की 27 वर्षीय श्वेता सिंघल का। हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों में उन्हें दूसरा स्थान मिला है। उनकी आंखों में देश के विकास के सपने हैं, तो बातों में कुछ कर गुजरने का आत्मविश्वास। अपनी कामयाबी में उन्होंने ग्रामीण परिवेश को कभी आड़े नहीं आने दिया। हालांकि श्वेता का यह तीसरा प्रयास था, पर उन्होंने पढ़ाई का तनाव कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे कहती हैं, 'लड़की होने के नाते मेरे ऊपर ज्यादा जिम्मेदारियां थीं। मुझे खुद को साबित करना था।

विषय को समझा गहराई से
मुजफ्फरनगर के श्यामली कस्बे में पैदा हुई श्वेता के पिता अरुण सिंघल मेडिकल स्टोर संभालते हैं। मां उषा गृहिणी हैं और भाई नितिन आईएएस की तैयारी कर रहा है। बड़ी बहन रश्मि की शादी हो चुकी है। श्वेता ने शुरुआती पढ़ाई श्यामली में ही की। इसके बाद वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के लिए दिल्ली आ गईं। लेडी श्रीराम कॉलेज से हिंदी ऑनर्स से बीए करने के बाद उन्होंने हिंदू कॉलेज से एमए किया। हिंदी विषय में ही उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही एमफिल भी किया। सिर्विल सर्विसेज के बारे में श्वेता पहले गंभीर नहीं थी। पर एमफिल करने के बाद उन्होंने एग्जाम के लिए कमर कस ली। शुरू के दो प्रयासों में उन्हें इस परीक्षा को करीब से समझने का मौका मिला। उन्हें यह बात समझ में आई कि जब तक विषय की गहराई में नहीं जाएंगे, सफलता मिलना मुश्किल है। पढ़ाई के दौरान श्वेता कॉलेज हॉस्टल में ही रहती थीं। उसके बाद वे सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए अपने भाई के साथ किराए के फ्लैट में रहने लगी।
आत्मविश्वास और मेहनत
सिलसिलेवार तरीके से पढ़ाई करते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य पर निगाह जमाए रखी। प्री एग्जाम में भूगोल विषय लेकर मुख्य परीक्षा भूगोल और हिंदी साहित्य से पास की। साक्षात्कार में सफलता के लिए उन्होंने खान स्टडी गु्रप में ट्रेनिंग ली। इस बारे में वे कहती हैं, ' मेरे सर ए. आर. खान ने व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी मदद की। उन्होंने मुझे पर्सनलिटी डवलपमेंट के गुर सिखाए। इसी की बदौलत मैं यह सफलता पा सकी। अपने ग्रामीण परिवेश के बारे में वे कहती हैं, 'ग्रामीण विद्यार्थियों को शुरू में सब कुछ अटपटा लगता है। न तो सही गाइडेंस होती है और न ही उचित संसाधन। ऐसे में आत्मविश्वास और मेहनत ही काम आते हैं। अपने साक्षात्कार के बारे में वे बताती हैं, 'इंटरव्यू के दौरान मुझसे पूछा गया कि इंटरव्यू देने आते वक्त आप क्या सोचकर आईं? साथ ही धर्म, इतिहास, बाल विकास, महिला सशक्तीकरण, अर्थव्यवस्था पर सवाल पूछे गए। हिंदी माध्यम को श्वेता अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती हैं। वे कहती हैं, 'हिंदी भाषा मेरा आत्मविश्वास है। हिंदी मेरे लिए कभी बाधा नहीं बनी, बल्कि हिंदी की वजह से ही मेरा चयन हो पाया। अपने भविष्य के बारे में उनकी सोच साफ है। बकौल श्वेता, 'मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाकर सबसे पहले फील्ड की बारीकियां सीखूंगी। लोगों की समस्याओं से रूबरू होऊंगी। इसके बाद मैं सरकारी अफसर और जनता के बीच बनी हुई संवादहीनता खत्म करूंगी। मेरा मानना है कि जब तक लोगों के मन से सरकारी सिस्टम का डर नहीं निकलेगा, तब तक देश का विकास अधूरा रहेगा।
-आशीष जैन

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सफलता का सफर

जानते हैं सिविल सर्विसेज एग्जाम में टॉप करने वाली शुभ्रा सक्सेना के बारे में।
आईआईटी रुड़की से अमरीका, यूनाइटेड किंगडम और सिंगापुर... फिर सिविल सर्विसेज एग्जाम के शिखर पर काबिज होने का शानदार मोड़। वाकई शुभ्रा सक्सेना के लिए जिंदगी का सफर काफी रोमांचक रहा।

सिविल सर्विसेज एग्जाम 2008 में टॉप करने वाली शुभ्रा ने आईआईटी रुड़की से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की, पर आईटी सेक्टर की शानदार नौकरी छोड़कर देश सेवा में लगने का फैसला किया। पढ़ाई के चार साल बाद तक वे तीन आई टी कंपनियों में काम करती रहीं। उन्होंने 2006 में अपनी नौकरी छोड़ी और नई दिल्ली के राजेंद्र नगर में किराए का अपार्टमेंट लेकर आईएएस बनने की तैयारी करने लगी। वे सुबह आईएएस की तैयारी करवाने वाले संस्थान में पढ़ाती थीं और बचे हुए समय में खुद तैयारी करती थीं। इंजीनियर शुभ्रा ने साइकोलॉजी और पब्लिक एडमिनिस्टे्रशन विषय से एग्जाम दी। आईएएस बनने की इच्छा के बारे में शुभ्रा कहती हैं, 'बोकारो में कोयले की खदानों के आस-पास मजदूरों के खेलते हुए बच्चों को देखकर मुझे लगा कि क्यों न ऐसा काम किया जाए, जिससे इन बच्चों का भला हो सके। फिर तो मैंने ठान लिया कि मैं आईएएस बनकर दिखाऊंगी। उत्तरप्रदेश के बरेली में पैदा हुई 30 वर्षीय शुभ्रा के पिता अशोक चंद्र सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड में अधिशासी अभियंता हैं। झारखंड के हजारीबाग से स्कूलिंग करने के बाद शुभ्रा आईआईटी से बीटेक करने के लिए रुड़की आ गई। फिर आईटी सेक्टर में नौकरी के चलते अमरीका, यूनाइटेड किंगडम और सिंगापुर भी गई। पर वे अपने काम से खुश नहीं थीं। इसलिए अपनी मां के पास यहां आकर आईएएस की तैयारी करने लगी। शुभ्रा की शादी छह साल पहले नोएडा के शशांक गुप्ता से हुई। शशांक अभी नोएडा में सीएससी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। आईएएस एग्जाम के इतिहास में भी ऐसा पहली बार हुआ है, जब पहले तीन स्थानों पर महिलाओं ने बाजी मारी है। शुरुआती 25 स्थानों में 10 लड़कियां शामिल हैं। उन्होंने साबित कर दिखाया है कि अब देश चलाने के लिए महिलाएं कमर कस चुकी हैं।
-आशीष जैन

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29 April 2009

चट्टान को चुनौती

रोहतांग दर्रे की सपाट चट्टानों पर क्लाइबिंग करके छोड़ दीजिए अपने हौसलों के निशान।
तेज होती सांसें... चोटी पर पहुंचने का जुनून... नीचे गहरी खाई से उठता धुआं... ऊपर खुला विशाल आसमान। ये सब नजारव् हैं रॉक क्लाइंबिंग के। चट्टान की चुनौतियां स्वीकार ली हैं, तो अब घबराने से काम नहीं चलने वाला है। सपाट चट्टान की छाती पर हौसलों के निशान बनाते हुए आगे बढ़ने का मजा ही कुछ और है। हवाएं आपको बेचैन कर रही हैं कि कब टॉप पर पहुंचेंगे। वहीं चट्टान पर रेंगते छोटे कीड़े आपको आगे लगातार बढ़ने को कह रहे हैं। दरारों से झांकती हुई काई, तह दर तह तक जमी बर्फ। कभी फिसलन तो कभी रपटन। विश्राम का कोई नामलेवा नहीं। किसी का नाम आप पुकारने लगे, तो बार-बार वही नाम चारों ओर से गूंजने लगे। ऊपर से लुढ़कते पत्थरों से घबराना भी मना है। एक बात तो इस सबमें तय है कि पहाड़ पर चढ़ने के लिए ताकत की बजाय हिम्मत ज्यादा जरूरी है। कुल्लू जिले में 13050 फीट की ऊंचाई पर स्थित रोहतांग दर्रे को रॉक क्लाइबिंग के लिए बहुत मुफीद माना जाता है। लाहौल घाटी जाने के लिए आपको रोहतांग दर्रे से होकर गुजरना पड़ता है। रोहतांग दर्रा ही कुल्लू और लाहुल को आपस में जोड़ता है। इस दर्रे का पुराना नाम है- भृग-तुंग। यह दर्रा तेजी से मौसम बदलाव के लिए भी बहुत मशहूर है। बर्फबारी के चलते अक्सर नवंबर से अप्रेल तक इस दर्रे को बंद कर दिया जाता है। यहां की चट्टानों पर चढ़ाई करते वक्त आपको चारों और ग्लेशियरों, छोटी-बड़ी चोटियों, लाहौल घाटी से बहती चंद्रा नदी और प्रकृति के मनोरम दृश्यों का लुत्फ आसानी से मिलेगा। रॉक क्लाइंबिंग के लिए कई लोग बिना किसी बाहरी मदद से उंगलियों से ही ऊपर चढ़ने की जुगत करते हैं। आजकल कई उपकरणों की मदद से रॉक क्लाइबिंग आसान हो गई है। रस्सी और जीवन रक्षक उपकरण आपको थामे रहते हैं और आप ऊपर चढ़ते जाते हैं। कमर में बंधी रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ते हुए आपको खयाल रखना होगा कि आप बिल्कुल चोटी की बजाय मात्र दो फुट आगे ही निगाह रखें। इस तरह आप धीरे-धीरे बिना घबराए अपनी मंजिल पा लेंगे। इसके लिए शरीर में लचक होना भी बहुत जरूरी है। रॉक क्लाइबिंग में संतुलन, शक्ति और हलन-चलन पर नियंत्रण जैसी चीजों पर ध्यान रखना जरूरी है। चढ़ाई करते वक्त आपको कपड़ों और जूतों के चयन का खास खयाल रखना होगा। माउंट आबू, सरिस्का, पावागढ़, मनाली घाटी, मणिकर्ण, रोहतांग दर्रा, हंपी, दार्जिलिंग और स्पिति जैसी जगहों पर आप रॉक क्लाइबिंग की योजना बना सकते हैं।
कैसे पहुंचें- निकटतम सड़क मार्ग, रेलमार्ग और एयरपोर्ट मनाली (51 किलोमीटर)।
-आशीष जैन

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आसमान में तैराकी


बीलिंग की हवाओं में ग्लाइडर के सहारे तैरने को तैयार हो जाइए विशाल आसमान में।
क्या आपका मन पंछियों की तरफ बेफ्रिक उड़ने का नहीं करता? क्या आप भी आसमां की बुलंदियों को छूना चाहते हैं, तो सोचिए मत, पैराग्लाइडिंग का निराला संसार आपकी बाट जोह रहा है। जिंदगी की फुल फॉर्म जाननी है, तो ग्लाइडर से हाथ मिला ही लीजिए। 50 से 60 फुट ऊंचे घने देवदार के दरख्तों से घिरा खुला लंबा मैदान हो, मैदान पर हरी मखमली घास की चादर बिछी हो, चारों ओर बादलों से ढके पर्वत हों, तो समझ लीजिए आपके पास मौका है एक नई उड़ान भरने का। आपकी आंखों के सामने एकाएक एक छतरी हवा में उड़ती है और मस्ती से नील गगन में हिचकोले खाने लगती है। छतरी के सहारे एक इंसान कभी पंछियों तो कभी बादलों से बातें करने लगता है। है ना वाकई रोमांच का दूसरा नाम- पैराग्लाइडिंग। हिमाचल की घाटियों में ये उड़नखटोले रोज नजर आते हैं। बर्फीले पहाड़ों की भव्यता में जमीन से ऊपर उठकर जमीन पर झांकने की इस कोशिश में कई लोग हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी के बिलिंग तक पहुंचते हैं। बिलिंग पहुंचने के लिए बीड़ से होकर जाना पड़ता है। बीड़ से गुजरने के दौरान चाय के बागानों की सौंधी-सौंधी महक और बौद्ध मंदिरों की घंटियों की आवाज साफ सुनाई देती है। इस घाटी में इस साथ दर्जनों पैराग्लाइडर खड़े किए जा सकते हैं। धौलाधार पहाडिय़ों के पीछे की तरफ बनी जगह पर बनी जगह पर हवा का रुख कुछ इस तरह से रहता है कि सब कुछ आसान लगता है। धौलाधार की पहाड़ियों में आप 150 किलोमीटर के क्षेत्र में 5500 मीटर की ऊंचाई तक आराम से उड़ान भर सकते हैं। इस तैरते रोमांच में जोश, जुनून और उमंग के साथ हर वो चीज शामिल है, जो जिंदगी जीने के लिए निहायती जरूरी है। 1978 में फ्रांस में पैराग्लाइडिंग की शुरुआत हुई। वहां पहली बार एल्प्स पर्वत की ऊंचाई पर जाकर उड़ान भरी गई। हमारव् देश में यह खेल 1991 में उस वक्त आया, जब कुछ विदेशी पैराग्लाइडिंग पायलट्स ने कुल्लू घाटी में पैराग्लाइडर के सहारव् उड़ान भरने की योजना बनाना शुरू की। पैराग्लाइडिंग सीखना बस कुछ घंटों का काम है। अगर पैराग्लाइडिंग में लॉन्चिंग, टर्निंग और लैंडिंग का तरीका आपने अच्छे से सीख लिया, तो बस यकीन मानिए आपको आसमान में उड़ने से कोई नहीं रोक सकता। एक ग्लाइडर का वजन लगभग 7 किलोग्राम के करीब होता है। इसे 10 मिनट में आसानी से फोल्ड किया जा सकता है। ग्लाइडर में कपड़े से बनी दो सतह होती हैं। इन्हें सिलकर छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है। आप आराम से ग्लाइडर में टिककर दौड़ लगाते हैं, इसमें हवा भरने लगती है और आप हवा में तैरने लगते हैं। इससे आप आसानी से तीन घंटे तक 15 हजार फीट की ऊंचाई से आसमान की सैर कर सकते हैं। घाटियों के जादुई सौंदर्य में पैराग्लाइडिंग का अलग ही मजा है। हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा जिले की चामुंडा पीक और बिलिंग, बिलासपुर की बंदला घाटी, मंडी की जोगिंद्रनगर घाटी और कुल्लू की सोलंग घाटी पैराग्लाइडिंग के जानी जाती हैं। वहीं मध्यप्रदेश में महू, मैसूर में चामुंडा पहाडिय़ां और बैंगलूर में कोनिकट के साथ-साथ राजस्थान में अरावली पर्वत श्रेणियां भी पैराग्लाइडिंग करने वालों की पसंदीदा जगह हैं।
कैसे पहुंचें- निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट। निकटतम एयरपोर्ट गुग्गल। धर्मशाला (70 किमी.), मंडी (70 किमी.) से बसें।

-आशीष जैन

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लहरें ललकारती हैं


गंगा की लहरों पर सवार होकर निकल पड़िए पनीले सफर पर और लुत्फ लीजिए राफ्टिंग का।
लहरों की अठखेलियों के बीच खुद को मुक्त छोड़ दीजिए... कुछ देर आराम से पानी पर सरपट आगे बढ़ते जाइए... अरे ये क्या पानी की लहरें ऊंची हो गई... तो घबराना कैसा। पैडलर का सहारा और खुद की हिम्मत.. लो हो गए पार। यही है रिवर रॉफ्टिंग का असल रोमांच। पहाड़ों से निकलते पानी की तेज धार में रफ्टिंग करने पर ही आपकी दिलेरी साबित होती है। राफ्टिंग करते वक्त रास्ते में उबड़-खाबड़ चट्टानों से थोड़ा बचकर रहिएगा। कभी सीधा, तो कभी टेड़ा हर रास्ते पर डटा रहना है। जरूरी नहीं कि आप रॉफ्टिंग के मास्टर ही हों, गाइड आपकी मदद करने को तैयार हैं। रिवर रॉफ्टिंग करने वाले के लिए ऋषिकेश से लेकर श्रीनगर तक का पनीला रास्ता स्वर्ग के समान है। इस रास्ते पर पड़ती है एक जगह शिवपुरी। वहां गंगा के किनारे आपको राफ्टिंग करवाने वाले कैंप बरबस ही नजर आने लगेंगे। यहां राफ्टिंग करने में दो से तीन घंटे तक लगते हैं। शुरुआत में 15 से 18 किलोमीटर की राफ्टिंग आप आराम से कर सकते हैं। राफ्टिंग के लिए ऋषिकेश जाइए, वहीं हैं बुकिंग ऑफिस। रॉफ्टिंग करने के साथ-साथ कैंप में रुकने का खर्चा अधिकतम 5000 रुपए है। दिलचस्प बात बताते चलें कि इसके लिए तैराकी आना जरूरी नहीं है। उम्र की भी कोई पाबंदी नहीं है, बस आपकी फिटनेस लाजबाव होनी चाहिए। हां, तीन दिन की राफ्टिंग करना चाहते हैं, तो तैराकी सीखने में ही भला है। भई, आपको पैडलिंग जो लगातार करनी पड़ेगी। तीन दिन में आप 135 किलोमीटर का राफ्टिंग ट्रिप आराम से पूरा कर लेंगे। राफ्टिंग करते वक्त सुरक्षा के लिहाज से नदी में कम से कम दो राफ्ट होनी चाहिए। इस दौरान आपका लाइफ जैकेट और एक हैलमेट पहनना निहायती जरूरी है। राफ्ट पर अगर एक-दो वाटरप्रूफ बैग होंगे, तो अच्छा रहेगा, ताकि उसमें प्राथमिक उपचार का सामान रखा जा सके। राफ्टिंग करते-करते थक जाएं, तो नदी किनारे बने कैंपों में आराम फरमाइए। मौसम के लिहाज से देखें, तो गर्म मौसम में जाना सही रहेगा क्योंकि गर्मियों में पहाड़ों के बीच कल-कल बहते गंगा नदी के जल की शीतलता के सामने सूर्यदेव भी एक बारगी नतमस्तक हुए जाते हैं। देश में ऋषिकेश की गंगा नदी, जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में सिंध नदी, लद्दाख की जांसकर वैली, उत्तरप्रदेश में अलकनंदा नदी रिवर राफ्टिंग के लिए काफी मशहूर हैं। राफ्टिंग के लिए अपने पांच-छह दोस्तों का गु्प बनाइए, जिसमें एक रिवर गाइड भी मौजूद हो। और चप्पू खेते हुए दीजिए लहरों को चुनौती। कैसे पहुंचें- निकटतम एयरपोर्ट देहरादून (50 किमी.), निकटतम रेलमार्ग वाया हरिद्वार
-आशीष जैन

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गुफ्तगू मछलियों से


लक्षद्वीप के बरगरम और कदमत द्वीप में स्कूबा डाइविंग से लीजिए पानी के अंदर की दुनिया का आनंद।
हम बात इस दुनिया की बजाय समंदर के नीचे की रोमांचक दुनिया की करें, तो कैसा लगेगा? बरबस ही आपके मुंह से निकल पड़ेगा.... वाह.. अद्भुत। समंदर की लहरों को देखने का अपनी ही मजा है... कभी रात्रि की तरह एकदम शांत, तो कभी भूचाल की मानिंद सब कुछ उथल-पुथल। गोताखोरी या स्कूबा डाइविंग एक ऐसी ही विधा है, जिसमें आप समंदर की लहरों के नीचे की दुनिया से रूबरू होते हैं। छोटे-छोटे घोंघों, रंग-बिरंगी मछलियों और भयानक शार्क से नजर मिलाने के साथ-साथ अनगिनत समुद्री जीवों को जानने का मौका। खूबसूरत मूंगा-चट्टान, अजीबोगरीब शैवाल और समुद्री पादपों को नजदीक से देखने का लुत्फ। जहां तक आपकी निगाह जाएगी, बस आपको नीला और सपनीला पानी ही नजर आएगा। इन सबके बीच में खुद की हस्ती बड़ी छोटी महसूस होगी आपको। लक्षद्वीप में बरगरम और कदमत द्वीप में स्कूबा डाइविंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं। बरगरम द्वीप 128 एकड़ में फैला एक छोटा और सुंदर द्वीप है। यह दुनिया के 10 सबसे अच्छे 'सीक्रेट बीच' में शामिल है। नारियल और मछलियों के इस स्वर्ग में क्रीम रंग की बालू रेत में आप जब चांदी की तरह चमकते तटों पर जाएंगे और गोताखोरी करेंगे, तो वहां से कभी ना लौटने का मन करव्गा। यहां स्कूबा डाइविंग सिखाने के लिए कई केंद्र हैं। यहीं पर मशहूर एड गुरू प्रहलाद कक्कड़ का डाइविंग प्रशिक्षण केंद्र भी है। यहां स्कूबा डाइविंग का तीन दिन का कोर्स करवाया जाता है। स्कूबा का मतलब होता है- सेल्फ कन्टेंड अंडरवाटर ब्रीदिंग अपरेटस और डाइविंग का अर्थ है- गोताखोरी। यानी जब आप गोताखोरी के लिए खास उपकरणों की मदद से पानी के नीचे जाते हैं। स्कूबा डाइविंग के पहले उपकरण की खोज 1943 में फ्रेंच गोताखोर जैक्स कोस्टीयू ने एमिले गागनान के साथ मिलकर की। हिंद महासागर में लक्षद्वीप और बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान द्वीप और गोवा स्कूबा डाइविंग के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं। स्कूबा उपकरण में एक फेसमास्क, उत्पलावन जैकेट, मछलीनुमा पर, गोताखारी टैंक (जिसमें संपीडित हवा भरी रहती है) और सांस लेने का उपकरण शामिल होता है। खास बात है कि समंदर में 8 मीटर से ज्यादा गहराई में उतरने पर आक्सीजन विषैली हो जाती है। ऐसे समय में संपीडित हवा काम में आती है। शुरुआत में आप 20 मीटर तक की गहराई में डुबकी लगा सकते हैं। स्कूबा डाइविंग के लिए आपको शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होना चाहिए। ह्दय रोगी, उच्च-निम्न रक्तचाप वाले लोगों को इससे बचना ही चाहिए। 10 साल के छोटे बच्चों को स्कूबा डाइविंग नहीं करनी चाहिए। तैराकी में माहिर होने की बजाय तैराकी की आधारभूत योग्यता होनी चाहिए।कैसे पहुंचें- कोच्चि से अगत्ती पहुंचकर हेलीकॉप्टर से बरगरम द्वीप। कोच्चि से शिप से भी। रेल और सड़क मार्ग से लक्षद्वीप नहीं पहुंचा जा सकता।
-आशीष जैन

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रोमांच की सैरगाह


सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां
जिंदगी गर मिल भी जाए तो नौजवानी फिर कहां।
सैर करने में क्या रस छुपा है, यह इस्माइल मेरठी ने अपने शब्दों में बखूबी बयां किया है। यायावर राहुल सांकृत्यायन ने तो घर-बार छोड़कर दुनिया की सैर की ठान ली थी। घूमने पर लिखना शुरू किया, तो घुमक्कड़ शास्त्र से हमें रूबरू करवाया। हमने भी सोचा क्यों ना गर्मियों की छुट्टियों में घूमने-फिरने का मजा लिया जाए। हमने जब ट्यूरिज्म में एडवेंचर का तड़का लगाया, तो आंखों के सामने पैराग्लाइडिंग के लिए खुले बीलिंग के मैदान थे, दूसरी ओर फूलों की घाटी से आती सुगंध। मन किया अपने आराध्य को याद करने का, तो बद्रीनाथ और अमरनाथ तक पहुंच गए। सूरज सिर पर चढ़कर तांडव करने लगा, तो स्कूबा डाइविंग के बहाने पानी की गहराइयों में तांकझांक कर ली। थोड़ी मस्ती और रंगीनी की चाह वाले क्रूज तलाशने लगे। स्वर्ग की सुंदरता के मुरीद श्रीनगर को खोजने लगे, वहीं रफ्तार पसंद साथी रिवर रॉफ्टिंग के लिए गंगा किनारे शिवपुरी को रवाना हो लिए। इस सबके लिए ट्यूर पैकेजेज और कुछ खास जानकारी वाली वेबसाइट्स ने हमारी सारी उलझन एक बार में हल कर दी। कुछ का हौसला चट्टान की तरह मजबूत था, तो वे रॉक क्लाइंबिंग में मशगूल रहे। कुछ जोग फॉल इस तमन्ना के साथ पहुंचे कि गिरते पानी में कुदरत के खूबसूरत रंगों को तलाश सकें। आखिर में लगा कि ये पूरी दुनिया ही एक सैरगाह है और हम मुसाफिर। हम रूक कैसे सकते हैं। तो फिर आप भी तैयार हो जाइए हमारे साथ कुदरत के नायाब रोमांच से हाथ मिलाने के लिए। अब सोचिए मत, आलस छोड़कर हमारे साथ निकल पड़िए रोमांच की सैरगाह पर।

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15 April 2009

बैंकिंग से पॉलिटिक्स तक

बैंकिंग के शानदार जॉब को छोड़कर राजनीति में आकर समाज सुधार करना चाहती हैं मीरा सान्याल।
'मुझे लगता है कि यह समय बैंकिंग के क्षेत्र में रहने का नहीं है। अब मुझे राजनीतिक जागरूकता लाने के लिए भी कुछ करना चाहिए।' ये हैं एबीएन एमरो बैंक की कंट्री हैड मीरा सान्याल। दक्षिण मुंबई में एबीएन एमरो का कार्यालय होटल ताजमहल पैलेस के पीछे है। पिछले 26 नवंबर को जब ताज होटल पर हमला हुआ, तो बैंक के कर्मचारी दंग रह गए थे। मीरा का कहना है कि 26/11 की घटना ने मेरे मन पर गहरा असर डाला और मुझे लगा कि समाज की सोच में बदलाव लाने के लिए मुझे राजनीति में जाना ही होगा। ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने जर्नलिज्म का कोर्स करने वाली मीरा का बैंकिंग इंडस्ट्री में 25 साल का अनुभव रहा है, अब इस क्षेत्र को छोड़कर देश की जनता को जागरूक करना चाहती हैं। वे कहती हैं, 'लोगों के पास वोट डालने के लिए सही शख्स का विकल्प ही मौजूद नहीं होता, ऐसे में वे वोट डालने ही नहीं जाते।' मीरा ने अपने बैंक से 15 मई तक की छुट्टी ले ली है और अब वे लोकसभा चुनावों के लिए दक्षिण मुंबई से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुई हैं। वे खुद को 'मध्यवर्गीय लोगों का उम्मीदवार' कहलाना पसंद करती हैं। वे पांच बिंदुओं (निवेश लाना, रोजगार निर्माण, आधारभूत ढांचा, सुरक्षा और शिक्षा) की कार्ययोजना लेकर जनता के सामने जाएंगी। उनका मुख्य संदेश है कि वे मुंबई को वापस अमन की नगरी की पहचान दिलाएंगी।
-आशीष जैन

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राजनीति की आंखों का ऑपरेशन

38 साल की नेत्र सर्जन मोना शाह शिक्षित लोगों को राजनीति से जोडऩे के लिए लड़ रही हैं चुनाव।

'मेरा पेशा है, लोगों की नजर सही करना। मैं चाहती हूं कि राजनीति की दृष्टि में भी कुछ सुधार करूं।' ऐसी ही कुछ सोच है दक्षिण मुंबई के मुन्सिपल अस्पताल की नेत्र सर्जन 38 साल की मोना शाह की। मोना दक्षिण मुंबई से लोकसभा का चुनाव लड़ रही हैं। बकौल मोना, 'अब प्रोफेशनल्स को राजनीति में ज्यादा से ज्यादा आना होगा। अगर पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आएंगे, तो विकास की संभावना ज्यादा रहेगी। वे सही और त्वरित फैसले ले सकेंगे। संसद में जाने वाले एमपी को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए। मेरा लक्ष्य नोन-वोट बैंक के संपर्क में आना है। मैं दक्षिण मुंबई के उन शिक्षित लोगों से वोट डालने की अपील कर रही हूं, जो अपने काम के चलते वोट डालने को ज्यादा तरजीह नहीं देते। मैं चाहती हूं कि वे राजनीतिक नेतृत्व की अहमियत को समझें।' वे इस ओर ध्यान दिलाती हैं कि पिछले आम चुनावों में दक्षिण मुंबई में केवल 37 फीसदी मध्यवर्गीय मतदाता वोट देने पहुंचे थे। अगर मैं इस आंकड़े को 70 फीसदी तक पहुंचाने में कामयाब हो जाती हूं, तो मेरी जीत पक्की है। उन्होंने दिसंबर से ही अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया था। पहले वे निर्दलीय खड़ा होने का मानस बना चुकी थी। पर फिर पीपीआई (प्रोफेशनल पार्टी ऑफ इंडिया) से चुनाव लड़ना तय किया। 2007 में स्थापित पुणे की इस पार्टी का गठन कुछ प्रोफेशनल्स के एक समूह ने किया है। इसका मकसद उन लोगों को चुनावों के लिए प्रोत्साहित करना है, जिनके पास चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं है। शाह के प्रचार में दो खास मुद्दों की झलक साफ दिखाई दे रही है। वे सुरक्षा और आधारभूत ढांचे में सुधार को मुंबई की सबसे बड़ी जरूरत बताती हैं। वे राजनेताओं से सवाल पूछती हैं कि करोड़ों रुपए टैक्स में देने के बावजूद भी आधारभूत ढांचे में कोई बदलाव नहीं आया है। साथ ही वे पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई पर हुए हमलों को लेकर भी जनता की आंखें खोलना चाहती हैं। वे एलान करती हैं, 'अब समय आ गया है, जब हमें राजनीतिक रूप से जागरुक हो जाना चाहिए।'
-आशीष जैन

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बदलाव का बिगुल

ना मेरे पास मनी है, न मशीनरी और न ही मसल पावर। पर वंचितों को उनका हक दिलाने की मुहिम के लिए ही मैं राजनीति में आई हूं। मुझे यकीन है कि बदलाव होकर रहेगा।

मल्लिका साराभाई। कुचिपुड़ी और भारतनाट्यम जैसे नृत्य के क्षेत्र में जाना-माना चेहरा। मशहूर वैज्ञानिक विक्रम साराभाई और शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी की बेटी। थिएटर और सिनेमा जिनमें रचे-बसे हैं। माता-पिता की बनाई 'दर्पण एकेडमी' के जरिए वे कला को नए आयाम प्रदान कर रही हैं। क्या 56 वर्षीय मल्लिका का परिचय पूरा हो गया। जी नहीं, अब जानिए उनकी शख्सियत का एक और नया पहलू। वे चुनाव लड़ रही हैं, वह भी पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ और बिना किसी पार्टी से जुड़े हुए। उनका कहना है कि मैं डमी कैंडिडेट नहीं हूं। मैं जीतने के लिए जी-जान लगा दूंगी। अब शायद आईआईएम अहमदाबाद से किए गए एमबीए का इस्तेमाल वे अपने चुनावी प्रबंधन में करेंगी।
राजनीति में अपराधी
जानना दिलचस्प रहेगा कि 1984 में राजीव गांधी ने मल्लिका को पार्टी टिकट की पेशकश की थी। उस वक्त उनका मानना था कि राजनीति में प्रवेश किए बिना ही वे गलत चीजों पर खुलकर विरोध दर्ज करेंगी। पर पिछले 25 सालों में राजनीति का जिस तरह अपराधीकरण हुआ, उसे देखकर अब उन्हें महसूस होता है कि अगर बदलाव लाना है, तो राजनीति में शामिल होना ही होगा। बकौल मल्लिका, 'मैं किसी पार्टी से जुड़ी नहीं हूं, क्योंकि हर पार्टी में भ्रष्टाचार और अपराध का बोलबाला है। लोग मुझसे पूछते हैं कि आपको लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ने की क्या सूझी, तो मेरा जवाब होता है कि मैं गांधीनगर में ही पैदा हुई हूं। यहीं पली-बढ़ी और पिछले 20 साल से यहां के लोगों के साथ मिलकर काम कर रही हूं। फिर आडवाणीजी जिस रथयात्रा को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं, मेरी नजर में उसने ही देश के सामाजिक ताने-बाने को सबसे ज्यादा क्षति पहुंचाई है।'
बदलाव का बिगुल
जब मल्लिका गांधीनगर कलेक्टर के पास अपना चुनावी नामांकन भरने के लिए गई, तो बांस की टोकरी में इसके लिए 10 हजार रुपए इकट्ठे किए। आगे भी चुनावी प्रचार के लिए पारिवारिक मदद लेने की बजाय जनता से ही चंदा प्राप्त करेंगी। मल्लिका ने अपना चुनाव चिह्न नगाड़ा चुना है। इसका संदेश है कि अब बदलाव का बिगुल बज चुका है और बदलाव होकर रहेगा। उनका मानना है कि अब राजनीति में पढ़े-लिखे लोगों को आना चाहिए। देश की सबसे बड़ी समस्याओं में सांप्रदायिकता भी अहम मुद्दा है। अगर लोग राजनीति में सुधार चाहते हैं, तो उन्हें राजनीति में आना चाहिए और अपनी बात खुलकर लोगों तक पहुंचानी चाहिए। आज नेता इस तरह व्यवहार करते हैं, मानो लोकतंत्र उनके पास गिरवी रखा हो। हमें बदलाव चाहिए और इसके लिए हमें ही पहल करनी होगी। मैं चाहती हूं कि राजनीति में भी पारदर्शिता आए और लोगों के नेताओं के प्रति नजरिए में बदलाव आए। मैं लोगों को यकीन दिलाना चाहती हूं कि आम जिंदगी में आज भी विचारधारा और आदर्शों के लिए उचित स्थान बचा हुआ है। मेरा मकसद है कि समाज के उन चंद ठेकेदारों को सबक सिखाऊं, जो निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। महिलाओं को उचित सम्मान दिलाना भी मेरी प्राथमिकता है।
-आशीष जैन

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09 April 2009

मैं नहीं डरूंगी

भारी विरोध के बीच भी मुंबई हमलों के दौरान पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब का केस लड़ने का हौसला दिखाया वकील अंजलि वाघमारे ने।
क्या आप तुकाराम आंबले को जानते हैं? सहायक हवलदार तुकाराम मुंबई हमलों के दौरान शहीद हो गए थे। मुठभेड़ के दौरान उनके पास कोई हथियार नहीं था। वे आतंकी कसाब को पकड़ने के लिए निहत्थे ही उसकी राइफल पर झपट पडे़ थे। शहीद तुकाराम की पत्नी तारा आंबले आज भी गहरे सदमे में हैं। उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि जिस कसाब ने उसके पति को मारा उसका केस उसके पड़ोस में रहने वाली वकील अंजलि वाघमारे लड़ रही हैं। तारा की तरह ही अंजलि भी वर्ली पुलिस क्वाटर्स में ही रहती हैं। क्योंकि अंजलि के पति रमेश वाघमारे भी एक पुलिस अधिकारी हैं। एक पुलिस अधिकारी की बीवी होकर अंजलि उस व्यक्ति का मुकदमा लड़ रही हैं, जिसने मुंबई के कर्तव्यपरायण पुलिसकर्मियों को गोलियों से भून दिया था, तारा के दर्द को अंजलि समझती हैं और इसीलिए पसोपेश में हैं कि क्या वाकई उनका अजमल कसाब की तरफ से मुकदमा लड़ने का फैसला सही है?

जिंदगी दांव पर
अंजलि वाघमारे। कुछ दिन पहले तक यह नाम मुंबईवासी भी शायद नहीं जानते थे। आज यह नाम पूरे देश में चर्चित हो चुका है। एक खतरनाक मुलजिम जिसने मुंबई सहित पूरे देश को हिला दिया, उसका मुकदमा लड़ने जा रही हैं 40 वर्षीया अंजलि वाघमारे। अंजलि की शुरुआती कशमकश शिवसैनिकों की धमकी की वजह से कम और शहीद पुलिसकर्मियों की विधवाओं और उनके परिवार को लेकर ज्यादा थीं। लेकिन जल्द ही वह इस भावनात्मक अवसाद से निकलकर वास्तविकता के धरातल पर आ पहुंचीं। मुंबई हमलों के बाद वकीलों ने कसाब का केस लड़ने से मना कर दिया था।
बात रखने का मौका सबको
अंजलि का मानना है, 'अगर कसाब को सरकारी वकील नहीं मिलता, तो मुंबई हमलों का मामला और उलझ सकता है। मैं भी चाहती हूं कि शहीद पुलिसकर्मियों की विधवाओं को जल्द से जल्द न्याय मिले। अगर मैं कसाब का मुकदमा लड़ने को तैयार नहीं होती, तो मामला लंबा भी खिंच सकता था। मेरे कानूनी कॅरियर का यह सबसे चुनौतीपूर्ण मामला है। यह एक भावनात्मक मुद्दा है और मेरा विरोध करने वालों को मेरी बात समझने में थोड़ा समय लग सकता है। मैं देश और देशवासियों की भलाई के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर यह काम हाथ में ले रही हूं। भारतीय कानून सबको अपना पक्ष रखने का मौका देता है और कसाब को भी अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए। मैं कसाब का समर्थन नहीं करती, लोगों को भी मेरी असल भावनाओं को समझना चाहिए।' कसाब के वकील की मांग पर विशेष अदालत ने महाराष्ट्र सेवा कानूनी प्राधिकार की अंजलि वाघमारे को सरकारी वकील के तौर पर नियुक्त किया था। वाघमारे ने अपने ऊपर हुए हमले को लेकर पुलिस में भी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।
चार्जशीट पढ़ना शुरू
अंजलि का जन्म पुणे में हुआ। वहां के सिम्बॉयोसिस संस्थान से शुरुआती पढ़ाई के बाद कानून की पढ़ाई उन्होंने पुणे यूनिवर्सिटी से की। अंजलि पिछले 10 सालों से वकालत कर रही हैं। उन्होंने अपनी ज्यादातर प्रेक्टिस पुणे में की है। 2000 की शुरुआत में शादी के बाद वे मुंबई आ गईं। उच्च न्यायालय और सेशन कोर्ट में कानूनी प्रेक्टिस के साथ-साथ उन्होंने पुलिसकर्मियों की पत्नियों के कल्याण के लिए एक संगठन 'महिला सतकर्म सेवा संघ' भीबनाया था। अब वाघमारे ने 11 हजार पेजों की केस की चार्जशीट पढ़ना शुरू कर दिया है। उन्हें इस बात का पूरा भरोसा है कि ट्रायल शुरू होने तक वे सभी आंकड़ों को जुबानी याद कर लेंगी। अंजलि मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस आरोप पत्र पढ़ने में कसाब की मदद करेंगी क्योंकि अंजलि को अंग्रेजी और मराठी दोनों भाषाओं का ज्ञान है।
-आशीष जैन





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