30 January 2009

जिंदगी कभी रिटायर नहीं होती



रिटायर्ड लोगों को नौकरी मुहैया कराने की मुहिम में जुटे बुजुर्ग पानगड़िया दंपती।


'छह महीने पहले की ही तो बात है, जब हमें बुजुर्गों को नौकरी दिलाने के लिए वेबसाइट बनाने का आइडिया आया। शुरू में लगा कि कैसे यह सब होगा। पर हमने पहल की और देखिए हम सफल रहे। आज हम लगभग 750 बुजुर्गों को नई नौकरी दिला चुके हैं।' यह पंक्तियां पढ़कर आपको लगकर रहा होगा कि हम उत्साह से लबरेज किन्हीं युवाओं की बात कर रहे हैं। जी नहीं, यह जोश तो पानगड़िया दंपती की बातों में नजर आता है। जयपुर निवासी 61 साल के रवि पानगड़िया अपनी 59 साल की पत्नी आशा के साथ मिलकर रिटायर्ड हो चुके लोगों को रोजगार दिलाने की मुहिम में लगे हुए हैं। वे http://www.jobsretired.com/ नाम की एक वेबसाइट का खुद संचालन कर रहे हैं और इसकी मदद से बुजुर्गों की क्षमता के मुताबिक उन्हें मनमाफिक काम मुहैया करा रहे हैं। नौकरी के दौरान ही रवि और आशा को पता लग चुका था कि आने वाला समय कंप्यूटर और इंटरनेट का होगा। धीरे-धीरे उन्होंने इंटरनेट पर समय बिताना शुरू कर दिया और इस पर महारत हासिल कर ली।


स्थायी संपर्क इंटरनेट


1970 में इंजीनियरिंग पास कर चुके रवि बताते हैं, 'साल 2006 में भिलाई में एच ई जी लिमिटेड कंपनी से सीनियर वाइस प्रेसीडेंट के पद से रिटायर होने के बाद जयपुर आ गया। यहां आकर मैंने मैनेजमेंट कंसलटेंसी शुरू करने की कोशिशें की। पर इस काम में मुझे लगभग दो महीने लग गए और काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उस वक्त मुझे लगा कि अगर मुझ जैसे रिटायर्ड आदमी को इतनी परेशानी आई हैं, तो मेरे जैसे और बुजुर्गों को भी काम-धंधे ढूढ़ने में परेशानी आती होगी। तब मैंने 1 जनवरी, 2008 को स्थानीय अखबार में बुजुर्ग लोगों से नौकरी के लिए बायोडाटा मांगे और साथ ही कंपनियों से भी आग्रह किया कि उन्हें किस तरह के लो लोग चाहिए।' शुरुआत तो रवि कर चुके थे। बुजुर्गों का गजब का रिस्पॉन्स देखकर आशा और रवि को लगा कि वाकई बुजुर्ग उनके इस आइडिया को पसंद कर रहे हैं। अभी भी रिटायर्ड लोगों को काम की तलाश है। दोनों ने ठान लिया कि अब तो आगे की जिंदगी अपने जैसे बुजुर्गों को काम दिलाने में ही गुजारेंगे। धीरे-धीरे पानगड़िया दंपती बुजुर्गों के लिए नई आस बन गए। बुजुर्गों को नौकरियां भी मिलने लगीं। पर अखबार में बार-बार महंगे विज्ञापन देने का आर्थिक भार बहुत था। साथ ही बुजुर्गों और कंपनियों से संपर्क बनाए रखना कठिन काम था। ऐसे में उन्होंने सोचा कि किस तरह लोगों से स्थायी संपर्क साधा जाए। इंटरनेट से तो रवि और आशा दोनों वाकिफ थे ही, इसलिए दोनों ने सोच-विचाकर अपने परिचित मित्र से एक वेबसाइट बनाने की गुजारिश की और 30 जून, 2008 को रवि ने 'जॉब्सरिटायर्ड डॉट कॉम' नाम की एक वेबसाइट शुरू कर दी। फिर तो पानगड़िया दंपती को सारी समस्याओं से निजात मिल गई।


कोई फीस नहीं


पिताजी बी. एल. पानगड़िया के नाम पर स्थापित ट्रस्ट 'बी.एल. पानगड़िया मेमोरियल ट्रस्ट' इस वेबसाइट को मैनेज करता है। वेबसाइट को अपडेट करने के काम में पानगड़िया दंपती माहिर है। जब कोई बुजुर्ग इस वेबसाइट पर जाता है, तो निशुल्क लॉग इन करके खुद के बारे में मांगी गई जानकारियां भर सकता है। इसी तरह कंपनियां भी लॉग इन करके अपने यहां खाली पड़ी नौकरियां और इच्छित योग्यता भर देती हैं। दंपती कंपनियों को अपने पास आए आवेदनों को भेज देती हैं और इस तरह बुजुर्गों को नौकरियां पाने के लिए एक मंच मिल जाता है। जो लोग कंप्यूटर से पूरी तरह परिचित नहीं हैं, उनके लिए वेबसाइट में ईमेल की भी सुविधा है। काम के लिए अधिकतर आवेदन रिटायर्ड सरकारी और बैंक कर्मचारियों की तरफ से आ रहे हैं। आशा बताती हैं, 'वेबसाइट बनाने के बाद अब लोग आसानी से दुनिया के किसी भी हिस्से से नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं। अब हमसे हर तरह के रिटायर्ड प्रोफेशनल संपर्क कर रहे हैं। वेबसाइट पर नौकरी के लिए जो पहला आवेदन आया था, वह आयकर विभाग के रिटायर्ड चीफ कमिश्नर का था।' इस काम के बारे में रवि बताते हैं, 'नौकरी दिलाने के इस काम में हालांकि 'हैल्पएज इंडिया' नौकरी चाहने वाले बुजुर्गों का संपर्क हमसे करवाता है। पर आर्थिक रूप से हम किसी से मदद नहीं ले रहे हैं। नौकरी लेने और देने वालों से हम किसी तरह का कोई पैसा नहीं लेते। वेबसाइट से पूरे देश के बुजुर्ग देश में हर जगह नौकरियां पा रहे हैं।' अपने आगे की योजना के बारे में आशा का कहना है, 'अभी देश में बुजुर्ग कंप्यूटर और इंटरनेट से पूरी तरह परिचित नहीं हुए हैं। ऐसे में हम रिटायर्ड लोगों को कंप्यूटर साक्षर बनाने की योजना बना रहे हैं।'


-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

22 January 2009

जीने की राह


प्रयास
कुआ नया-नया ही बना था। पनिहारिन ने पानी भरने के लिए कुए की जगत पर घड़ा रखा, तो वह लुढक़ने लगा। कुए की जगत पर लगा हुआ पत्थर हंसा और घड़े को बेपेंदे का कहकर उसकी खिल्ली उड़ाने लगा। घड़ा चुप रहा। लगातार कुछ दिन घड़ा उस जगह पर रखते-रखते वहां पर एक गोल गड्ढा सा बन गया। अब घड़ा स्थिर रखा जाने लगा। तब घड़े ने पत्थर से कहा- 'देख भाई पत्थर! मैंने निरंतर प्रयास से अपने कोमल अंगों की ही रगड़ से तुम्हारे कठोर शरीर में भी अपने लिए स्थान बना लिया।'
भाग्यवान
एक बूढ़ा किसी ठूंठ के नीचे बैठा सर्दी में सिकुड़ रहा था। पेड़ पर ऊपर की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि वह भी उसी की तरह बूढ़ा हो गया है। बूढ़े ने अपने विगत वैभव की गाथा गाई और पेड़ के साथ सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहा- तुम्हें भी मेरी ही तरह भाग्य ने सताया है न? ठूंठ ने कहा- मैं तुम्हारे जैसा दुखी नहीं हूं। बसंत निकट आ रहा है। मैं उसी की सुखद कल्पना में खोया रहता हूं और खुश रहता हूं कि न जाने कितने और बसंत देखने मेरे भाग्य में बदे हैं। मेरे भाग्यवान होने को धन्यवाद दो और अपने बीते हुए समय की चिंता मत करो।
- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

16 January 2009

आने वाला कल हमारा है

गणतंत्र के साठ साल पूरे होने को हैं, इस दौरान बहुत कुछ बदला, लेकिन औरतों के लिए जिंदगी फिर भी दुश्वार बनी रही। इसके बावजूद किरण बेदी हताश नहीं हैं। वे कहती हैं, 'मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाला वक्त हम महिलाओं का ही है। चाहे कितनी बाधाएं आएं, हम हार मानने वाली नहीं हैं। मैं पूरे देश की महिलाओं को यकीन दिला देना चाहती हूं कि वे जिस शिद्दत से अपने-अपने कामों को अंजाम दे रही हैं, उसकी बदौलत आने वाला वक्त हमारी मुट्ठी में होगा।'

मैं शुरू से मानती रही हूं कि महिलाओं को दबाकर रखा गया है। समाज ने हमेशा कोशिश की है कि महिलाएं घर-परिवार तक ही सीमित रहें, पर हमने कभी हार नहीं मानी। इसी का नतीजा है कि अब महिलाओं की स्थिति में बदलाव साफ नजर आने लगा है। देश के कई हिस्सों में जाने पर मुझे पता लगता है कि गरीब से गरीब महिला में भी संघर्ष करने का गजब का हौसला है। वे बिना किसी मदद के आगे बढ़ रही हैं। पति, भाई या पिता के साथ की दरकार अब उन्हें नहीं रह गई है। वे अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के लिए छोटे-छोटे काम कर रही हैं। अपना परिवार चला रही हैं। छोटी-छोटी बचत करके भविष्य के सपने भी संजो रही हैं। कुछ सालों पहले मेरे सामने शारदा नाम की एक ऐसी महिला का केस आया, जो दस बच्चों की विधवा मां थी। उसका बेटा अपराधी बन गया था। पर उसने कड़ी मेहनत की और बहुत अच्छे से बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी निभाई। मैं मानती हूं कि एक शारदा अगर ऐसा कर सकती है, तो देश की दूसरी 'शारदाएं' भी मुसीबतों के पहाड़ के आगे सिर नहीं झुकाएंगी।
हालात पहले से सुधरे
लेकिन महिलाओं पर होने वाले जुल्मों में कमी नहीं आई है। आज भी वे पति, जेठ, सास या आस-पास वालों की क्रूरता का शिकार बनती हैं। अब महिलाओं की सोच में बदलाव जरूर आया है। पहले महिलाओं को सिखाया जाता था कि वे पुरुषों की ज्यादतियां सहने के लिए ही हैं। पर अब गरीब, दलित और आदिवासी महिला भी अपने पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है। ऐसा नहीं है कि मेरे साथ कभी ज्यादतियां नहीं हुई, पर मैंने इनसे घबराई नहीं, इनका डटकर सामना किया। मैंने क्रेन बेदी पुकारे जाने से लेकर तिहाड़ जेल के सुधारों तक, कभी हालात से समझौता नहीं किया बल्कि उन्हें बदलने में जी-जान से जुटी रही। मैंने पुलिस की नौकरी छोड़ी ताकि लोगों से सीधे तौर पर जुड़ सकूं। हालात पहले से सुधरे हैं। पर हमें और भी आगे जाना है।
अब हम मजबूर नहीं हैं
मैं देखती हूं कि देश की बेटियां पढ़-लिख कर अपनी मांओं के अधूरे सपने पूरे करना चाहती हैं। अब वे कॅरियर के लिहाज से कोई भी निर्णय लेने से नहीं हिचकतीं। सेना हो या साइंस का क्षेत्र, हर जगह उन्होंने खुद को साबित कर दिया है। उन्हें बहुत कम अवसर मिले, पर उन्हीं चंद मौकों से उन्होंने अपनी किस्मत संवारी। नारी ने जता दिया कि अब उनकी पहचान सिर्फ चूड़ी-बिंदी या चूल्हे-चौके तक ही सीमित नहीं रह गई है। उनकी खुद की अलग पहचान है। आंचल अब घर-परिवार के छोटे-से आंगन से बाहर निकलकर आसमान में परचम की मानिंद फहरा रहा है। मेरे टीवी शो 'आपकी कचहरी' में महिलाएं अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के बारे में खुल कर बोल रही हैं। आज की नारी ज्यादा मुखर हो गई है। हाल के घरेलू हिंसा कानून के तहत महिलाओं ने खुलकर अपनी परेशानियां पुलिस को बताई हैं। अब पुरुषों को एकबारगी सोचने पर विवश होना पड़ा है कि वे कहां तक सही हैं?
आज की नारी मेरा आदर्श
मेरे मन में अक्सर यह सवाल आता था कि आखिर महिलाएं परेशानियों के आगे खुद-ब-खुद घुटने क्यों टेक देती हैं? पर अब हालात बदले हैं। वे हर समस्या पर सोचने लगी हैं। उन्होंने घर-परिवार के साथ-साथ खुद के लिए जीना सीख लिया है। आज की नारी बेटियों की शिक्षा-दीक्षा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती।शुरू में लोग कहते थे कि आप देश की लड़कियों के लिए आदर्श हैं। पर आज की महिलाओं के जज्बे को देखकर वे मुझे खुद का आदर्श नजर आने लगी हैं। आज देश के सर्वोच्च पद पर महिला आसीन है। कई काम जिनको करने में पुरुष भी हिचकते हैं, उन्हें महिलाएं बखूबी अंजाम दे रही हैं। यह कमाल आगे भी होता रहेगा और जल्द ही ऐसा समय आएगा, जब महिलाओं के ऊपर से बेबसी का ठप्पा पूरी तरह से हट जाएगा।
-किरण बेदी (लेखिका, देश की पहली महिला आईपीएस अफसर हैं।)
प्रस्तुति- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

सहना मुझे मंजूर नहीं

गणतंत्र दिवस के मौके पर यह जानना दिलचस्प रहेगा कि संविधान बनने के बाद देश की आधी आबादी के हितों के लिए क्या कानून बने हैं और उन्हें अमल में कैसे लाया जाए?

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005-
अगर महिला के घर पर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, तो उसे घरेलू हिंसा माना जाएगा।
- गाली-गलौच, मारपीट, ठीक से भोजन न देना, मानसिक रूप से परेशान करना भी घरेलू हिंसा में शामिल है।
- इस कानून में महिला किसी महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करा सकती है। यह कानून पुरुष प्रताड़ना से संरक्षण देता है।
- धारा 12 के मुताबिक विवाहित या अविवाहित महिला घर पर प्रताड़ित महसूस करने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकती है। मजिस्ट्रेट उसे घर में रहने की व्यवस्था के निर्देश दे सकता है। घर के सदस्यों को भरण-पोषण के लिए निर्देश दिए जा सकते हैं।
- महिला अगर शादीशुदा है, तो पति, देवर या ससुर के खिलाफ शिकायत कर सकती है।
- अगर वह अविवाहित है, तो भाई या पिता की प्रताड़ना के खिलाफ शिकायत कर सकती है।
- अगर प्रताड़ना के मामले में घर वाले मजिस्ट्रेट के आदेश की पालना नहीं करते हैं, तो वह एक साल तक की सजा और बीस हजार रुपए तक का जुर्माना कर सकता है।
हिंदू विवाह अधिनियम 1955-
धारा 24 के मुताबिक पति-पत्नी के बीच न्यायालय में कोई विवाद लंबित हो, तो पत्नी पति से मासिक भरण-पोषण की मांग कर सकती है। न्यायाधीश तय करता है कि पति को कितना पैसा पत्नी को देना चाहिए।
- धारा 25 के अनुसार अगर पति-पत्नी के बीच विवाह विच्छेद का फैसला लागू हो जाता है, तो उस समय या बाद में पत्नी को एक मुश्त भरण-पोषण पाने का अधिकार है।
- महिला पारिवारिक न्यायालय, जिला न्यायाधीश के सामने एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करके भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
- महिला का पर-पुरुष के साथ संबंध होने या पति के परित्याग करने पर वह भरण-पोषण की अधिकारी नहीं रह जाती।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956-
पिता की पैतृक संपत्ति में लड़कियों की लड़कों के बराबर हिस्सेदारी होती है।- लड़की का ससुराल जाने पर भी पिता की संपत्ति पर अधिकार है।
- अगर लड़की के पति की मृत्यु हो जाए, तो वह अपने पिता से भी भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
- अगर महिला अवयस्क है और पति जिंदा है, पर पति किसी वजह से पत्नी का भरण-पोषण नहीं कर पाए, तब भी अपने पिता से भरण-पोषण की मांग कर सकती है।

-धारा 14 के तहत हिंदू महिला के पास खुद की कोई संपत्ति है, तो वह पूर्ण रूप से उसकी ही संपत्ति होगी। महिला की संतान खुद इस संपत्ति की मांग नहीं कर सकती।
हिंदू दत्तक भरण-पोषण अधिनियम 1956-
धारा 8 के मुताबिक कोई भी वयस्क और स्वस्थचित्त हिंदू महिला किसी भी बच्चे को गोद ले सकती है। महिला का शादीशुदा होना जरूरी नहीं है।
- अगर महिला किसी लड़के को गोद लेती है, तो लड़के की उम्र महिला से 21 साल कम होनी चाहिए।
- गोद लेने वाली महिला के पास पहले से कोई जीवित संतान नहीं होनी चाहिए।
- अगर किसी के पास इकलौती संतान है, तो उसे गोद नहीं ले सकते।
-अगर महिला विवाहित है, तो उसके पति की सहमति जरूरी है।
- बच्चे को गोद देने व लेने वाली महिला के बीच स्टांप पेपर पर एक गोदनामा तैयार किया जाता है।
- हर जिले में मौजूद रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर गोदनामे को पंजीकृत करवाना जरूरी है।
दहेज निषेध अधिनियम 1961-
सिंध लेती-देती एक्ट 1949 को लागू करने के पीछे दहेज की प्रथा को रोकना ही था।
- धारा 3 के अनुसार अगर कोई दहेज के लेन-देन में लिप्त पाया जाता है, तो उन्हें पांच साल तक की सजा और15 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।
- धारा 4 के मुताबिक अगर कोई दहेज की मांग करता है, तो मजिस्ट्रेट दो साल तक की सजा और दस हजार रुपए तक का जुर्माना कर सकता है।
-आशीष जैन(राजस्थान उच्च न्यायालय के एडवोकेट भरत सैनी से बातचीत के आधार पर)

...आगे पढ़ें!

09 January 2009

उम्र जुदा, जज्बा एक

सिक्कों की खनक से लेकर सितारों की चमक तक, हर जगह भारतीय मूल की महिलाएं छाई हुई हैं। 52 वर्षीय मंजु गनेरीवाला से लेकर 18 साल की नंदिनी शर्मा का जज्बा अपने सपनों को साकार करना है।



अभी आसमां बाकी है

भारतीय मूल की मंजु गनेरीवाला बनीं अमरीका के वर्जीनिया राज्य की वित्त मंत्री।अब तक वे वर्जीनिया के गर्वनर को बजट तैयार करने, राजस्व का अनुमान लगाने, ऋण जारी करने जैसे कामों में सलाह देती रही हैं। ये हैं भारतीय मूल की मंजु गनेरीवाला। उन्हें अमरीका के वर्जीनिया राज्य का वित्त मंत्री (टे्रजरर) बनाया गया है। वे जुलाई 1985 से राज्य सरकार के साथ काम कर रही हैं। जून 2000 से जनवरी 2006 तक उन्होंने मेडिकल असिस्टेंस सर्विसेज विभाग में वित्त और प्रशासन के लिए बतौर डिप्टी डायरव्क्टर अपनी सेवाएं दीं। 2006 से वे वित्त विभाग में उपमंत्री के पद पर थीं। जनवरी 2009 से वे वर्जीनिया राद्गय के ट्रेजरी बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में काम करेंगी। इसके तहत उनके पास 8 से 10 बिलियन डॉलर के निवेश और प्रबंधन की जिम्मेदारी रहेगी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय विश्लेषण और प्रबंधन के मामले में अमरीका के सबसे बेहतरीन राज्य वर्जीनिया के वर्चस्व को बनाए रखना है।

यादों में बसा है मुंबई

मंजु का जन्म महाराष्ट्र के अकोला में हुआ और मुंबई में पली-बढ़ीं। वडाला के छोटे से स्कूल से वर्जीनिया की वित्त मंत्री बनने तक का सफर काफी उतार-चढ़ाव से भरा था। मंजु ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से वाणिद्गय से स्नातक किया है। इसके बाद उन्होंने आस्टिन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास से एमबीए की डिग्री हासिल की। उनका पैतृक घर राजस्थान के झुंझुनू और ससुराल फतेहपुर में है। मुंबई में शिवाजी पार्क स्थित उनके घर में पिता राधेश्याम अग्रवाल और माता कलावती उनकी इस उपलब्धि से बेहद खुश हैं। मां कलावती कहती हैं कि पहले मंजु डॉक्टर बनना चाहती थी, पर घर के बड़े लोगों ने इसके लिए अनुमति नहीं दी। पर आज वह काफी अच्छी जगह पर है। मुंबई के बारे में खुद मंजु का कहना है कि मेरे बच्चे अक्सर मुझसे पूछते हैं, 'मुंबई से आपको इतना लगाव क्यों है? आप बार-बार मुंबई जाने की बात क्यों कहती हैं?' तो मेरा एक ही जवाब होता है कि मुंबई की गलियों में खेल-कूद कर ही मैंने बचपन गुजारा है और उस जगह को मैं ताउम्र नहीं भूल सकती।
प्राथमिकता कॅरियर को

मंजु के पिता राधेश्याम बताते हैं, 'वह हमेशा से ही अपने कॅरियर को प्राथमिकता देती आई है। सिर्फ हाउस वाइफ बनकर वह जिंदगी बसर नहीं करना चाहती थी। मेडिक्लेम पॉलिसीज के फंड जुटाने के छोटे से काम से शुरुआत करके आज वह इस पद तक पहुंची है।' मंजु के पति सूरी ने भी आस्टिन में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास से पीएचडी की है। वे 'स्पैक्ट्रा क्विस्ट' के मालिक हैं। यह कंपनी मशीनों में आने वाली खामियों का पता लगाने के लिए विशेषज्ञ इंजीनियरों के लिए तकनीक विकसित करती है। 1976 में वह शादी करके अमरीका चली गई थीं। 52 वर्षीय मंजु के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा राकेश अमरीकी सेना में लेफ्टिनेंट है और इराक से 15 महीनों के सैन्य अभियान से लौटा है। दूसरा बेटा ऋषि अभी यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में इंजीनियरिंग का स्टूडेंट है।

नभ में चमकता नन्हा सितारा


भारतीय मूल की अमरीकी छात्रा नंदिनी शर्मा के नाम पर रखा गया है एक ग्रह का नाम।वे एक नन्हा सितारा बनकर चमकने को तैयार हैं। जी हां, सचमुच का सितारा। भारतीय मूल की अमरीकी छात्रा नंदिनी शर्मा के नाम पर एक ग्रह का नाम '23228 नंदिनी शर्मा' रखा गया है। मूलतः असम की नंदिनी को यह सम्मान इंटेल इंटरनेशनल के 'विज्ञान औप इंजीनियरिंग मेले 2007' में माइक्रोबॉयलोजी प्रोजेक्ट के लिए विजेता बनने पर दिया गया है। इस ग्रह की खोज अमरीका की लिंकन लैब नियर अर्थ एस्टेरॉइड रिसर्च टीम ने 21, नवंबर 2000 में की थी।


उड़ान ऊंची है

नंदिनी अभी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मोलिक्यूलर बॉयलोजी की पढ़ाई कर रही हैं। वह विज्ञान और इंजीनियरिंग मेले में 2005 से 2007 तक तीन बार विजेता रह चुकी हैं। विज्ञान संबंधित खोजों, बायोमेडिकल और कैंसर के क्षेत्र में उन्होंने कई रिसर्च की हैं। नंदिनी की ख्वाहिश है कि वह माइक्रोबॉयलोजी के क्षेत्र में ही अपने शोध कार्य जारी रखें। वे अभी स्वास्थ्य से जुड़ी जोखिमों का हल निकालने के लिए शोध कार्य कर रही हैं। उनका शोध प्राकृतिक फूड के प्रिजरवेशन पर आधारित है। अपने शोध से उन्होंने इस बात को साबित किया है कि अदरक को कृत्रिम फूड प्रिजरवेटिव्स के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। 18 वर्षीय नंदिनी अभी असम के बारपेटा जिले के पाठशाला में अपने दादा-दादी से मिलने आई हैं। पिता गिरीश शर्मा अमरीका की एक कंपनी में मुख्य वैज्ञानिक के पद पर नियुक्त हैं। वह अमरीका के कानसास के ओवरलैंड पार्क में पिता गिरीश शर्मा, मां मीनाक्षी और भाई अरूप के साथ रहती हैं।
शौक हैं कई

धाराप्रवाह स्पेनिश भाषा बोलने वाली नंदिनी को टेनिस खेलने का शौक है। उन्हें संगीत से बहुत प्यार है। छह साल की उम्र से वह पियानो बजा रही हैं और इससे संबंधित कई प्रतियोगिताएं भी जीत चुकी हैं। साथ ही साथ सात साल की उम्र से वह नृत्य का अभ्यास भी कर रही हैं। भरतनाट्यम और असम के लोकप्रिय बीहू नृत्य में उनकी खासी दिलचस्पी है। वह समाज सेवा के लिए एक स्वयंसेवी संगठन 'आईईओपी' भी बना चुकी हैं।





-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

मैं हूं नीलगगन की रानी


रंग-बिरंगी पतंगों में न जाने क्या जादू है? जी चाहता है कि पतंगबाजी के गुर जिंदगी में भी समा जाएं, तो क्या खूब रहे।
दुबले-पतले से रहमान चाचा, हमारे लिए पतंगों के सौदागर हैं। दिनभर लगे रहते हैं कांच के चूरे को डोर पर घिसने में। कागज के रंग-बिरंगे टुकड़ों को बारीक सी सींक से सहारा देकर आकार देते हैं उड़ान की परी पतंग को। ये कागज के चंद टुकड़े ही उनकी संतान हैं। पान तारा, चांद तारा, चिरैया, बेगम और कनकौवा, न जाने कितनी सारी पतंगें हैं उनके पास। किसी डोर को सद्दा बना दिया, तो किसी पर मेहनत कर उसे मांझे में ढाल दिया। उनके घर की चूल्हे की परवाह ये पतंगें ही तो करती हैं। हम सब घेरे रहते हैं उन्हें मुफ्त का मांझा पाने को। चाचा बताते हैं कि बच्चों, इन कागज के टुकड़ों को यूं ही न समझना, इन में भी रूह समाई रहती है। इस रूह को तसल्ली तभी मिलती है, जब ये हवा में पहुंचती है और झूमकर आसमान पर राज कर लेती है। चाचा की असल मेहनत रंग लाती है मकर संक्रांति के दिन।

मांझे में लिपटा मन
'चलो, भई राजू, गीता, छुटकी। सब चढ़ जाओ अपनी-अपनी अटरिया पर। ले आओ चकरी। मांझे की चकरी, सद्दे की चकरी और पतंगों का ढेर। हो जाओ जंग के लिए तैयार। आज तो बिल्लू को मजा चखाकर रहेंगे। कमबख्त ने पिछली बार मांझा दोहरा करके पतंग काटी थी ना, इस बार मजा चखाएंगे उसे।' कुछ-कुछ इसी तरह की आवाजें हर छत से आने लगती। हम जब छत पर पतंग उड़ाने चढ़ते, तो एक बात ठान लेते कि चाहे हम पतंग काटें या अपनी कटे, शोर खूब मचाना है। अलसुबह की हमारी धमाचौकड़ी के बीच बाबूजी की कुछ हिदायतें हमारे साथ होती, 'मुंडेर पर मत चढ़ जाना। सूरज सिर पर चढ़ जाए, तो नीचे आ जाना।' पर हमारी अक्ल में कुछ भी नहीं घुसता। पतंग की कन्नी बांधते वक्त ही लगने लगता कि देखते हैं इस पतंग की किस्मत में क्या लिखा है? क्या यही पतंग हमारी फतह का सेहरा लेगी या यह भी औरों की तरह निराश करव्गी। धीरे-धीरे जब छुटकी जिसे हम प्यार से मोटा बुलाते थे, हमारी पतंग को छुट्टी देती, तो पतंग ऊपर चढ़ने लगती और हम सबकी सांसें थम जाती। मन में बस एक ही बात रहती कि किसी भी तरह बस जीतना है। ढील से या खींच से, बस सामने वाले को धूल चटानी है। पहले-पहल हम सब मस्तमौला होकर पतंग उड़ाते थे। पतंगबाजी भी कोई कला है, इससे नावाकिफ। पर फिर चाचाजी ने समझाना शुरू किया, 'अगर आसमान पर खुद की पतंग को ही इतराते देखना है, तो कुछ पैंतरे सीखने होंगे। झुकना भी होगा। हवा के रुख को पहचान कर सही समय का इंतजार करना होगा। मांझा कितना ही अच्छा हो, इतराना मत। कुछ देर हवा के साथ बहना। लहरने देना और जब सामने वाला ज्यादा ही सीना ताने तो बस दिखा देना कि तुम क्या हो।' चाचाजी की ये बातें इंसानी जिंदगी पर भी लागू की, तो सौ फीसदी सही लगी। हां, खींच के नियम के लिए जान चाहिए, हाथों और फेफड़ों में। थोड़ी सी हड़बड़ी की, तो मांझे से हाथ में खून भी आ सकता है भई। चाहे हम बिल्लू को हराने की कितनी ही कोशिश करते, पर कभी उसकी तरह मांझे को दोहरा नहीं करा और न ही मांझे पर गांठें लगाईं। कई बार पतंगों पर पैबंद भी लगाए, पर उनकी उड़ान में कभी आड़े नहीं आए।
...वो कटवाया
कभी-कभी दूसरों की इठलाती पतंगों को देख मन में खयाल आता कि धोखा देकर नीचे से हथ्था मार दूं और उसकी पतंग को चित्त कर दूं। पर दूसरे ही पल मन कहता कि मजा तो सामने जाकर ललकारने में ही है। इसमें भी कोई शान है कि सिर्फ जीतने के लिए गलत पैंतरों का इस्तेमाल करूं। पतंग कटने के बाद अक्सर हम सब चकरी दोनों हाथों में लेकर अपने ही तरीके से गोल-गोल घुमाकर डोर समेटने लगते। पर धीरे-धीरे पतंगबाजी को जाना, तो उसूल समझ में आया कि हार को भी स्वीकार करना होगा, पेंच में अगर खुद की पतंग कट गई, तो खुद की हाथों से तोड़ दो डोर को। चंद पैसों की डोर को समेटकर अपनी हार के एहसास को ज्यादा मत करो। जीतने पर तो 'वो काटा' सभी कहते हैं पर 'वो कटवाया' कहकर हार को भी पूरी शान से मानो। पतंग हमेशा मुझसे कहती कि छुटकू, तुम भी चाहते हो ना कि बिना रोक-टोक के हमेशा आगे बढ़ते रहो, तो एक बात गांठ कर रख लो कि जैसे मैं हवा और डोर की मदद लेकर संतुलन साधती हूं, तुम्हें भी दुनिया में सबका साथ लेकर खुद को साधना है। आज भी मैं खूब पतंग उड़ाता हूं। पतंगों के संसार में मुझे अपने मन की उड़ान नजर आती है। याद आती है पतंग की तरह जोश के साथ पूरे होश से उड़ने की बात। हां, जिंदगी की टेढ़ी-मेढ़ी राहों में कभी-कभी लगता है कि मेरी पतंग ही सबसे ऊपर हो, सबसे शानदार पतंग, तो मैं हथ्था देता हूं या अपने मांझे को दोहरा कर दूसरों की पतंगों की राह में आडे़ आता हूं, धोखे से आगे बढ़ने की सोचता हूं, तो पतंगों के सबक को याद करके खुद को संभाल लेता हूं और निकल पड़ता हूं अपनी नई उड़ान की ओर।
- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

05 January 2009

तन चंगा कठौती में गंगा

हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वास्थ्य केवल साधन है कोई साध्य नहीं।
- स्वामी विवेकानंद
जिस कारण से देह बिगड़ी हो उससे बिल्कुल उल्टा रहन-सहन रखने से प्रकृति का संतुलन लौट आता है।
- नेपोलियन बोनापार्ट
अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।
- साइरस
स्वास्थ्य परिश्रम में है और श्रम के अतिरिक्त वहां पहुंचने का कोई दूसरा शाही रास्ता नहीं है।
- वेंडेल फिलिप्स
स्वास्थ्य रूपी घर को स्थिर रखने के लिए उसके तीनों पाए- आहार, स्वप्न, ब्रह्मचर्य ठीक-ठाक रहने चाहिए।
- अज्ञात
अच्छी हंसी और गहरी नींद डॉक्टरों की किताब में सबसे अच्छा उपचार हैं।
-आयरिश कहावत

...आगे पढ़ें!

02 January 2009

जीने की राह संयम



घटना 1914 की है। वैज्ञानिक टॉमस अल्वा एडीसन की प्रयोगशाला और कारखाना धू-धू कर जल रहा था। उसकी लपटें आकाश छूने की होड़ कर रही थीं। एडीसन उन लपटों में अपनी आशाओं को जलता देख रहे थे। पास ही उनका बेटा खड़ा था। इस भयंकर अग्निकांड को देखकर वह भी स्तब्ध रह गया।बुजुर्ग एडीसन ने अपने युवा पुत्र से कहा, 'देखते क्या हो? जाओ, अपनी मां को बुला लाओ। उससे कहना कि जीवन में फिर कभी ऐसा दृश्य देखने को न मिलेगा।कुछ देर बाद उनकी पत्नी भी आ गई। उसने कहा, 'बीस लाख डॉलर के कीमती यंत्रों के साथ आपने ताउम्र जो सृजन किए, उनके संपूर्ण कागजात भी तो इसी प्रयोगशाला में थे, वे भी अग्नि को समर्पित हो गए। अब क्या होगा?' एडीसन बोले, 'पहले तो ईश्वर को धन्यवाद दो कि हम सबकी भूलें भी इसमें जलकर राख हो गई हैं। अब हम नए सिरे से अपना काम शुरू करेंगे। प्रत्येक हानि भी तो अपने साथ कुछ न कुछ लाभ छिपाकर लाती है।'एडीसन ऐसे सहज रूप से उन अग्निकांड को देखते रहे जैसे उनका उससे कोई सरोकार ही नहीं।यही मनोवृत्ति जीवन के हर बदलते मोड़ पर हो, तो खिन्नता का कोई कारण शेष नहीं रह सकता।

...आगे पढ़ें!

31 December 2008

सुना मैंने नया साल आया


खिड़कियों के पुराने परदे बदल दो।
पुराना मेजपोश अब दिल को नहीं भाता।
गर्द जमी रहती है कुर्सियों पर
मुझसे मिलने अब कोई नहीं आता।
अंगीठी की आंच धीमी पड़ गई है
रोटियों का स्वाद कसैला सा है।
दीवारों पर स्याही के छीटें हैं
मेरा प्यारा पीकदान मैला सा है।
बचपन के प्यारे एलबम में सारी फोटूएं
न जाने क्यों आपस में चिपककर धुंधली हो गई हैं।
वो चिडिया का घोसला अब खाली है
बचा है, तो बस घास-फूंस का ढेर।
पुराने अखबारों के पुलिंदों के बीच में
दबा सा मैं सोचता हूं- ये सब क्या है?
मेरे मोजे, रूमाल, तौलिया सब रूठे हुए
बोलते हैं तू घिस गया है हमें इस्तेमाल करते-करते।
बल्ब जो सालों से टिमटिमा रहा है बंद-बदबूदार कमरे में
अब आजाद होना चाहता है।
किवाड़ सारे चरमराते रहते हैं
वक्त की सुइयां टूटी हुई हैं।
क्या यही वाजिब समय है
जब मैं बदल दूं अपना कलैंडर।
ले आऊं चंद खुशियां।
क्या वो 2009 में लटक रहा नो
मेरी जिंदगी में उम्मीदों को यस कह पाएगा।
हां थोड़ी आशा तो है कि मैं सपनों को सपनों से ज्यादा कुछ तो मानूंगा।
मैं भरोसा करूंगा कि मैं मौजूद तो हूं इस दुनिया में चाहे
उसी नाम से जिससे बचपन से मेरे मां-बाप मुझे बुलाते हैं
और अब दोस्त पुकार लेते हैं गाहे-बगाहे।
हां, मैं झिलमिलाती रोशनी हूं 2009 की।
मैं बदल तो सकता हूं खुद को
पर शर्त है कि तुम मेरे रूप से नाराज नहीं होओगे, चिढ़ाओगे नहीं मुझे।
नहीं तो मैं अपने खोल में वापस घुस जाऊंगा
और अगले साल तक वापस नहीं निकल पाऊंगा।
मुझे भरोसा है कि इस बार आप मेरी मदद करोगे
मेरी सारे कूड़े-करकट को बाहर का रास्ता दिखलाने में।
- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

29 December 2008

ख्वाब हो या हो कोई हकीकत


पार्वती ओमानकुट्टन मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में बनीं फर्स्ट रनरअप।

सुंदरता को कोई रंगों के माध्यम से चित्र में संजोने की कोशिश करता है, तो कोई छंदों के जरिए गीत में कहने की कोशिश करता है पर केरल की 21 वर्षीय सुंदरी पार्वती ओमानकुट्टन के रूप को रंगों या छंदों के माध्यम से बांधने की हर कोशिश जाया जाती है। आखिर वे हैं ही इतनी सुंदर। पूरे 8 साल बाद कोई भारतीय सुंदरी मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता के फाइनल राउंड में पहुंची। पार्वती हाल ही हुई मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में मिस वर्ल्ड बनते-बनते रह गईं और फर्स्ट रनरअप बनीं। मिस वर्ल्ड में भारतीय सुंदरियों की फेहरिस्त पर नजर डालें, तो कोई लंबी सूची नहीं बनती। सबसे पहले 1966 में रीता फारिया ने मिस वर्ल्ड के सिलसिले को शुरू किया, वह ऐश्वर्या राय (1994), डायना हेडेन (1997), युक्ता मुखी (1999) से होता हुआ प्रियंका चोपड़ा (2000) पर आकर रुक गया। इस साल पूरे देश को पार्वती से उम्मीदें थीं, उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत भी की और इसी की बदौलत वे प्रतियोगिता में फर्स्ट रनर अप बनीं और सफलता से सिर्फ एक पायदान दूर रह गईं।

हौले-हौले सफर

पार्वती केरल के कोट्टयम में चंगानाचेरी में 13 जुलाई 1987 को पैदा हुई। जब वे छह महीने की थीं, तभी पूरा परिवार मुंबई में आकर बस गया। उन्होंने अपनी पढ़ाई मुंबई में ही की। मुंबई के मीठीबाई कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई करने वाली पार्वती की मम्मी हाउस वाइफ हैं और पिता एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। उनका छोटा भाई अभी क्लास 11 में पढ़ता है। बकौल पार्वती, 'मैं हमेशा से ही मिस इंडिया बनने का सपना देखा करती थी। फिर मैं फैशन शोज में भाग लेने लगी। फिर मिस मलयालम बनकर ही दम लिया। जब मैंने ऐश्वर्या राय को टीवी पर मिस वर्ल्ड बनते देखा, तो पापा से कहा कि मैं भी मिस वर्ल्ड बनकर दिखाऊंगी। वे बडे़ खुश हुए और मेरी मदद के लिए तैयार हो गए। '

तैयार पूरी है

पांच फुट नौ इंच लंबी पार्वती ने मिस इंडिया कंपीटीशन में जहां 28 भारतीय लड़कियों को हराकर ताज हासिल किया वहीं दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग शहर में आयोजित 58वीं मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में उनका मुकाबला 108 लड़कियों के साथ था। मुकाबले के लिए पार्वती ने अपने ट्रेनर्स के साथ काफी पसीना बहाया। पर्सनेलिटी डवलपमेंट गुरुओं से लेकर ड्रैस डिजाइनर्स तक की हर बात पर अमल किया। अप्रेल में मिस इंडिया प्रतियोगिता जीतने के बाद से ही वे इसके लिए जुट गईं। मम्मी-पापा से सीखापार्वती के मुताबिक, 'प्रतियोगिता में रंग-रूप से साथ-साथ दिमाग पर भी काफी ध्यान देना पड़ता है। हाजिरजवाबी तो मुझमें पहले से ही थी, इसी की बदौलत मैं फाइनल तक पहुंच सकी। मम्मी से जहां मैंने सादगी सीखी, तो पापा से बड़प्पन।' पार्वती को संगीत सुनने, नाचने, पेंटिंग और किताबें पढ़ने का बहुत शौक है। भारतीय क्लासिकल डांस में उन्हें महारत हासिल है। साथ ही उन्हें तैराकी, बास्केटबॉल और बैडमिंटन खेलना बहुत भाता है। दूसरी सुंदरियों की तरह वे भी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाना चाहती हैं। बकौल पार्वती, 'मैं सलमान खान और रितिक रोशन की बहुत बड़ी फैन हूं। उनके साथ फिल्में करने की मेरी दिली इच्छा है। पर इससे पहले मैं अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं।' मिस इंडिया बनने के बाद के दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, 'जब मैं मिस इंडिया बन गई, तो मेरे प्रति लोगों का नजरिया ही बदल गया। लोग मेरे ऑटोग्राफ के लिए पीछे पड़ने लगे।'

सपने सोने नहीं देते

पार्वती को सबसे ज्यादा सब्यसाची के ड्रैस किए हुए डिजाइन पसंद आते हैं। अपने माता-पिता को अपनी ताकत मानने वाली पार्वती आत्मविश्वास और भगवान में आस्था को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानती हैं। जब उनसे उनकी कमजोरी के बारे में पूछा जाता है, तो वे बेबाकी से कहती हैं,'मुझे गलत चीज पर गुस्सा बहुत जल्दी आता है।' अपने सपनों के राजकुमार के बारे में उनका मानना है कि वह शख्स मेरी भावनाओं को समझने वाला होना चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का एक वाक्य, 'सपने वो नहीं होते, जो सोते समय आते हैं, सपने तो वो होते हैं, जो आपको सोने ही नहीं देते।' उन्हें बहुत अच्छा लगता है। मां के हाथ के बने खाने को वे अपने व्यस्त शिड्यूल में बहुत मिस करती हैं। खूबसूरती के बारे में उनका कहना है, 'मैं बाहर की बजाय मन की सुंदरता को ज्यादा तरजीह देती हूं। सुंदरता के लिए मैं मेकअप की बजाय हैल्थ पर ध्यान देती हूं।'

- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

26 December 2008

नई उमंगों का सवेरा



नए साल पर जीवन में कुछ खास बातों को साकार करना अच्छा रहेगा, तो क्यों न मशहूर साहित्यकारों के लेखन पर एक नजर डाली जाए-




उल्लास


स्वागत! जीवन के नवल वर्ष


आओ, नूतन-निर्माण लिए


इस महा जागरण के युग में


जाग्रत जीवन अभिमान लिए


दीनों दुखियों का त्राण लिए


मानवता का कल्याण लिए।


सोहनलाल द्विवेदी (नववर्ष)


स्वप्न


जा तेरे स्वप्न बड़े हों।


भावना की गोद से उतर कर


जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।


चांद तारों सी अप्राप्य ऊंचाइयों के लिए


रूठना मचलना सीखें।


दुष्यंत कुमार (एक आशीर्वाद)


विश्वास


मैं बढ़ा ही जा रहा हूं,


पर तुम्हें भूला नहीं हूं ।


चल रहा हूं, क्योंकि चलने से थकावट दूर होती,


जल रहा हूं, क्योंकि जलने से तमिस्त्रा चूर होती,


गल रहा हूं, क्योंकि हल्का बोझ हो जाता हृदय का,


ढल रहा हूं, क्योंकि ढलकर साथ पा जाता समय का ।


शिवमंगल सिंह सुमन (मैं बढ़ा ही जा रहा हूं)


संघर्ष


तप रे मधुर-मधुर मन !


विश्व वेदना में तप प्रतिपल,


जग-जीवन की ज्वाला में गल,


बन अकलुष, उज्ज्वल औ' कोमल


तप रे विधुर-विधुर मन !


सुमित्रानंदन पंत (गुंजन(कविता संग्रह))


निश्चय


प्रातः होगा, होगा निश्चय,


अंधेरे को छंटना ही है,


तुम्हारी स्वर्णिम वाणी को,


दूर नभ से फटना ही है!


रवींद्रनाथ टैगोर (गीतांजलि)


शुभकामना


नए साल की शुभकामनाएं !


खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पांव को


कुहरे में लिपटे उस छोटे से गांव को


नए साल की शुभकामनाएं...


इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को


चौके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को


नए साल की शुभकामनाएं !


सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (नए साल की शुभकामनाएं ! )


हौसला


वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है


थक कर बैठ गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं है


चिंगारी बन गई लहू की बूंद गिरी जो पग से


चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से


बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है


थक कर बैठ गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं है


रामधारी सिंह दिनकर (आशा का दीपक)

आशा


शैशव के सुंदर प्रभात का


मैंने नव विकास देखा...


जग-झंझा-झकोर में


आशा-लतिका का विलास देखा।


आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का


क्रम-क्रम से प्रकाश देखा॥


सुभद्राकुमारी चौहान (उल्लास)


प्रस्तुति- आशीष जैन







...आगे पढ़ें!

15 December 2008

मैं रफ्तार हूं



मिलते हैं देश की अकेली महिला सुपर बाइक रेसर अलीशा अब्दुल्लाह से।



दौ सौ किलो वजनी 600 सीसी की होंडा सीबीआर बाइक। उसे बच्चों के किसी खिलौने की तरह दौड़ाने के लिए तैयार है वह। पलक झपकते ही 210 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार छूना उसका शगल है। उसका कहना है,'मैं रफ्तार हूं। सबसे तेज। बिजली-सी कौंधने वाली रफ्तार। मेरी जिंदगी बाइक के लिए है और मैं मरूंगी भी बाइकिंग के लिए। बाइकिंग मेरव् खून में है।' यह है चेन्नई की 19 वर्षीय अलीशा अब्दुल्लाह। बाइकिंग के लिए दीवानगी की झलक उसके ईमेल आईडी 'लिवफॉरस्पीड' से मिलती है।


मजा है लड़कों को हराने में


देश की सबसे कम उम्र की महिला सुपर बाइक रव्सर अलीशा अब्दुल्लाह ने आठ साल की उम्र से ही बाइक चलाना शुरू कर दिया था। वह बताती है, 'पुरुषों के साथ मुकाबला वाकई रोमांचक रहता है क्योंकि 110 सीसी और 600 सीसी बाइकिंग में कोई भी महिला प्रतिभागी नहीं होती। मुझे लड़कों को हराने में बहुत मजा आता है। मुझे तब ज्यादा खुशी मिलती है, जब लड़के गर्दन झुकाए खड़े रहते हैं। उनमें से कुछ तो रोने तक लगते हैं, पर जीत मुझे मिलती है। जब लोग मुझसे पूछते हैं कि तुम्हारा सबसे बड़ा सपना क्या है, तो मेरा जवाब रहता है, 'मुझे दुनिया का सबसे तेज बाइकर बनना है।'


शौक मरने नहीं दूंगा


उसके पिता आर. ए. अब्दुल्ला भी जाने-माने बाइकर रह चुके हैं और सात बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीत चुके हैं। वे ही अलीशा को बाइकिंग की टे्रनिंग देते हैं। बकौल अलीशा, 'जब कभी रव्सिंग करते हुए मैं घायल हो जाती हूं तो पापा कहते हैं कि तुम एक रव्सर हो, तुम हार नहीं सकती। इससे मुझे गजब का हौसला मिलता है।' उसके पिता बताते हैं, 'मुझे बचपन में ही उसकी क्षमताओं का पता लग गया था। मैं उसे खूब सिखलाता और प्रोत्साहित करता, पर उसके लायक कार और बाइक्स का इतंजाम नहीं कर पाता था। फिर भी मैंने बेटी के शौक को मरने नहीं दिया और कार रव्सिंग की बजाय बाइकिंग में किस्मत आजमाने की सलाह दी और तब अलीशा हर रविवार रव्सटै्रक पर नजर आने लगी। आज उसकी बाइकिंग वाकई शानदार हो गई है। रेसिंग के दौरान हमेशा उसका नजरिया करो या मरो का रहता है। हार उसे कतई मंजूर नहीं है। पर जब कभी उसकी रेस में थोड़ी चूक रह जाती है, तो मैं उसे धीरज का सबक देता हूं। मैं हमेशा उससे कहता हूं कि अगर तुम गति पर नियंत्रण रखना सीख लोगी, तो रेस में आधी जंग खुद-ब-खुद जीत जाओगी।'


बस जोश चाहिए


बाइक को अपनी जिंदगी बताते हुए अलीशा कहती है, 'बाइक, हैलमेट और जंपसूट मिलने पर लगता है कि मैं पूरी हो गई हूं। इनके बिना लगता है कि मैं अधूरी-सी हूं।' जब उससे पूछा जाता है कि सुपर बाइकिंग जैसा खतरनाक काम तो खास तौर पर लड़के ही कर सकते हैं, तो वे तपाक से कहती हैं, 'क्या सारे जोखिम वाले काम करने का ठेका लड़कों ने ही ले रखा है? जिसमें जोश है, वह सब कुछ कर सकता है। मैं कभी लड़कियों के साथ रेस नहीं लगाती बल्कि सबसे तेज बाइक चलाने वाले लड़कों को हराने के बारे में सोचती हूं। मैं ऑटोक्रॉस रेसेज, गो कार्टिंग और फामूर्ला रेसेज तक में प्रतिस्पर्धा कर चुकी हूं।' पढ़ाई में भी अलीशा कभी कमजोर नहीं रही। अभी वह समाजशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई कर रही है। आगे उसकी एमबीए करने की इच्छा है।


दुआओं का असर


अलीशा को टेनिस खेलने का भी बहुत शौक है। उसके पिता मुस्लिम हैं और मां ईसाई। वह कहती है कि पिताजी से अच्छी बाइक चलाते आज तक मैंने किसी को नहीं देखा। मुझे अभी काफी कुछ सीखना है तभी मैं रव्सिंग की बेताज बादशाह बन पाऊंगी। उसने 2003 में एमआरएफ नेशनल गोकार्टिंग चैंपियनशिप जीती। उसके बाद वह फार्मूला वन कार रव्सिंग की तरफ मुड़ गई और 2004 में जेके टायर नेशनल चैंपियनशिप में पांचवा स्थान हासिल किया। उसका कहना है , 'अब मेरा मकसद जेके टायर नेशनल रोड रेसिंग चैंपियनशिप जीतना है। फिर मैं अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में हिस्सा लूंगी।' अभी हाल ही उसे यंग अचीवर्स अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है। बाइकिंग के उसके जुनून के चलते एक नामी कंपनी ने उसे अपने उत्पाद का ब्रांड एंबेसेडर भी बनाया है।


- प्रस्तुतिः आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

11 December 2008

कहां गया मेरी बगिया का फूल?


मुंबई में हुए आतंकी हमलों ने पूरे देश की रूह को छलनी किया है। आज देश जवाब मांगता है दुश्मनों से। आखिर क्या हासिल हुआ, हमारी बगिया के फूलों को उजाड़कर।


क्या लहू का कोई मजहब हो सकता है? क्या अश्कों में तड़पती आह से राम या रहीम को अलग-अलग दर्द होता है? अगर नहीं, तो फिर क्यों गुलशन को उजाड़ने पर आमादा है आतंक। सपनों की पोटली लिए मुंबई में घूमते सैकड़ों बेगुनाह ही नहीं, पूरी दुनिया की रूह को कंपाने की कोशिश है हाल में मुंबई में हुआ आतंकी हमला। रोज की भागदौड़, हजारों परेशानियां और अब उसमें शामिल है एक डर। आतंक का डर। कब किस ठौर विस्फोट हो और जिंदगी की रोशनी बेनूर होकर हजारों परिवारों के घरों को हमेशा के लिए अंतहीन अंधेरा दे जाए। पर कभी न थमने की हम देशवासियों की शपथ हमेशा रंग लाती है और हम फिर खुशी की बहार को अपने आंगन में बिखरने के लिए बुला लेते हैं।

बाबुल का ये घर बहना...

22 साल की जसमीन की आंखों में भी गजब की चमक थी, तो बातों में कुछ कर गुजरने की तमन्ना। घरवालों के सपनों को परवाज देने के लिए मोहाली से मुंबई के सफर के लिए रवाना हुई पर वापस फिर कभी अपने घर ना लौट सकी। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह मुंबई में उस काली रात ओबरॉय के रिसेप्शन पर बैठी हुई थी। होटल मैनेजमेंट में ग्रेजुएट जसमीन दो महीने पहले ही मास्टर डिग्री के कोर्स के लिए सपनों की नगरी मुंबई आई थी। पापा डीआईजी भुर्जी अपनी लाडली को तन्नू कहकर पुकारते थे। जब उन्होंने टीवी पर मुंबई पर आतंकी हमले की खबर देखी, तो बेटी को फोन मिलाया। पर फोन उठाने वाले हाथ हमेशा के लिए निस्तेज हो चुके थे। तन्नू की मां दीप कौर और भाई परमीत की जुबान खामोश और आंखों में छलकते दर्द के सिवा कुछ नहीं बचा। परमीत को वो ख्वाब तो अधूरा ही रह गया, जिसमें दिन-रात वो अपनी फूल सी नाजुक बहन की डोली को सजाने की सोचा करता था। मम्मी-पापा ने जिस लाडो का हर नाज इस उम्मीद से उठाया कि एक दिन उसे घर से विदा करना है, वो तो दुनिया से ही रूखसत ले चुकी थी।

सोचा था मुस्कान देंगे

उनकी बातों में गजब का जोश था। अपने काम में माहिर। दिल में बस एक ख्वाहिश कैसे इस देश में अमन कायम रहे। वे शायद अकेले ऐसे पुलिस अफसर जिनके चाहने वालों ने उनके नाम से सोलापुर में करकरव् फैन क्लब तक बना रखा है। महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, जिन्हें अपने काम और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। अब वे इस दुनिया के लिए मिसाल बन चुके हैं। कामा अस्पताल में जाते वक्त उन पर पीछे से गोलीबारी हुई और वे मोबाइल पर अपनी बात पूरी न सके। पीछे छोड़ गए पत्नी कविता, दो बेटियां और एक बेटा। अभी कुछ दिनों पहले ही तो उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के हाथ पील किए थे। लंदन में पढ़ने वाली दूसरी बेटी और मुंबई में पढ़ रहे बेटे को देश के हवाले कर अपने अनजाने सफर पर निकल गए। पूरा देश हेमंत के बलिदान को नहीं भूल पाएगा पर उन बच्चों को क्या दोष है, जो अपने पापा को जहान भर की खुशियां देना चाहते थे। सोचा था कि आने वाले समय में जब उनके पिता बुढ़ापे की दहलीज पर होंगे, तो उन्हें मुस्कान देते रहेंगे। ताउम्र देश की सेवा करने वाले करकरे की आंखों में भी सपना था कि काश वो दिन जल्द से जल्द आए जब इस देश में कोई आंख नम ना हो। हर तरफ बस खुशियों का डेरा हो। करकरे की शहादत को सच्चा सलाम तभी होगा, जब उनका सपना पूरा करने के लिए हम सब एक हो जाएं और दुश्मनों को दिखा दें कि जब देश का एक बेटा शहीद होता है, तो अपनी फर्ज निभाने हजारों सपूत और पैदा हो जाते हैं।

कहीं छुप गया है वो

मेरा इकलौता बेटा था जहीन। उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था हैवानों। मेरी उम्मीदों को कफन उठाकर तुम्हें आखिर क्या हासिल हुआ। ये तो बता देते। मां सलमा के दामन में अब आंसुओं के सैलाब के सिवा बचा भी क्या है? भीलवाड़ा से चलकर घर का चिराग मुंबई पहुंचा और हमेशा के लिए बुझ गया। ताज होटल में एक्जीक्यूटिव कुक जहीन अब इस दुनिया में नहीं है। पर दादा मोईनुद्दीन को अब भी लगता है कि घर के किसी कोने में छुपा हुआ नटखट जहीन उन्हें आवाज देगा, 'बाबा, आप मुझे नहीं पकड़ पाओगे। मैं छुप गया हूं। आपको नजर नहीं आऊंगा।' दादी कर रही है, 'मेरा पोता कहीं नहीं गया। वो तो सबसे नाराज है। इसलिए कहीं छुप गया है।' वाकई जहीन कहीं छुप गया। दादा-दादी की आंखें अब उसे कैसे ढूंढ़ेंगी। क्या गुजर रही होगी सलमा पर जब शादी के सेहरे की जगह आज अपने जिगर के टुकड़े के जनाजे को टकटकी लगाए देख रही होगी? किसी की दुनिया को उजाड़ कर आखिर मौत के सौदागरों को क्या मिला? क्या कोई बता पाएगा तन्नू, हेमंत या जहीन के घरवालों को।

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

रिंग की रानी को सलाम


विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में लगातार चौथी बार स्वर्ण पदक जीतकर मैरी कोम ने किया देश का सिर गर्व से ऊंचा।


रिंग में एक के बाद एक बरसते फौलादी पंच। बॉक्सिंग ग्लव्स और दो खिलाडिय़ों के हौसलों की भिडंत। बचाव के लिए हैं सिर्फ दो हाथ। अगर जरा सी चूक हुई, तो नाक या मुंह पर जबरदस्त चोट। यह रोमांच है बॉक्सिंग खेल का। इसी के सहारव् खुद का नाम मणिपुर की वादियों से पूरी दुनिया में फैलाने वाली महिला बॉक्सर हैं- एम.सी. मैरी कोम। उनके नाम में एम.सी. का मतलब है- मांगते चुन्गनेईजंग। हाल ही चीन में संपन्न हुई विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में 46 कि.ग्रा. वर्ग में लगातार चौथी बार गोल्ड मैडल जीतकर उन्होंने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

पेट भरने के लिए खेल

मणिपुर के ग्रामीण इलाके के मोइरंग लमखाई के कांगाथेई गांव में 1 मार्च 1983 को मांगते टोन्गपा कोम और मांगते सानेईखोम कोम के घर मैरी कोम का जन्म हुआ। 5 फुट 2 इंच लंबी मैरी अपनी गजब की फुर्ती से सामने वाले बॉक्सर को इस कदर परेशान कर देती है कि उसे आखिरकार घुटने टेकने ही पड़ते हैं। मैरी कहती हैं, '2000 में ही देश में आधिकारिक रूप से महिला मुक्केबाजी की शुरुआत हुई। तब लोग महिलाओं को इसके काबिल नहीं समझते थे। मैं एक किसान की बेटी हूं। अपने परिवार का पेट भरने के लिए इस खेल में आई। मैं चाहती थी कि अपने परिवारवालों को एक घर दिला सकूं और मैं तो बारहवीं तक ही पढ़ सकी पर अपने तीन बहनों और एक भाई की पढ़ाई अच्छी से अच्छी हो सके।' स्कूल के दिनों में मैरी को सारे खेल ही लुभाते थे। फुटबॉल और एथलेटिक्स उसे बहुत पसंद थे। उन दिनों उसने मोहम्मद अली के बारे में सुन रखा था और उनकी बॉक्सर बेटी लैला अली को एक बार उन्होंने टीवी पर देखा, तो बॉक्सिंग के बारे में सोचने लगी। उन्हीं दिनों 1998 में मणिपुर के डिंकू सिंह बैंकाक एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे, तो मैरी ने ठान लिया कि अब तो वे भी मुक्केबाजी में मैडल हासिल करके रहेंगी। एक दिन वह बिना किसी से कहे स्थानीय इंडिया सेंटर खेल अथोरिटी में बॉक्सिंग कोच से मिलने पहुंच गईं और मुक्केबाजी की अपनी इच्छा के बारे में उन्हें बताया। इस तरह सन 2000 में उन्होंने मुक्केबाजी शुरू की। इससे पहले वे जैवेलियन थ्रो जैसे खेलों में भी हिस्सा ले चुकी थीं। खेल में जल्द ही महारत हासिल करके वे जिला और राज्य स्तरीय बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगी। शुरू में माता-पिता को मैरी की बॉक्सिंग के बारे में पता नहीं था। एक बार राज्य चैंपियनशिप जीतने के बाद उनका फोटो अखबारों में छपा, तो घरवालों को जानकारी हुई। पिताजी नाराज भी हुए पर मैरी ने कह दिया कि बॉक्सिंग के बिना उनकी जिंदगी अधूरी है। जब मैरी को पूरे देश में प्रतियोगिताओं के सिलसिले में जाना पड़ता, तो उन्हें भाषा और भोजन की भी दिक्कतें आतीं। पर उन्होंने एक ही चीज ठान रखी थी कि हर कीमत में बॉक्सिंग में महारत हासिल करनी ही है। बैंकाक में पहली एशियाई महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप के सलैक्शन कैंप में भाग लेने जाते वक्त उनका सारा सामान और पासपोर्ट तक चोरी हो गया था। माता-पिता ने कहा, 'घर वापस लौट आओ।' पर मैरी ने हार नहीं मानी। वहां से खाली हाथ लौटने पर वे फिर अपने खेल में निखार लाने में जुट गईं। मैरी को सबसे ज्यादा दुख इस बात का होता है कि महिला बॉक्सिंग ओलंपिक खेलों में शामिल नहीं है। जीत का सिलसिला 2001 में अमरीका में पहली विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा। अगले साल तुर्की में हुई महिला बॉक्सिंग में तो उन्होंने गोल्ड मैडल लेकर ही दम लिया। फिर तो लगातार स्वर्ण पदक जीतने का सिलसिला चल ही पड़ा और अब नवंबर में चीन में लगातार चौथा स्वर्ण पदक हासिल कर पूरे देश को खुशी का मौका दिया। नई दिल्ली में हुई विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप जीतने के बाद उन्होंने अपने जुड़वां बच्चों की देखरेख के लिए दो साल के लिए खेल से अपना ध्यान हटा लिया। पर सिर्फ चार महीने के प्रशिक्षण के बाद वापसी इतना शानदार होगी यह किसी को भरोसा नहीं था।

मैरी बताती हैं, 'इस वापसी में मेरे पति के. ओनखोलेर कोम का बहुत बड़ा हाथ रहा। मेरे खेल को चमकाने में मेरे कोच इबोमचा, नरजीत, किशेन और खोइबी सलाम का भी सहयोग रहा।' मैरी कोम को उनके बेहतरीन खेल के लिए साल 2003 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार पाने वाली वह पहली महिला मुक्केबाज बनीं। इसके बाद 2006 में उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार दिया गया। पिछले साल उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के नामांकित भी किया गया था। मणिपुर सरकार ने मैरी कोम के बेहतरीन खेल प्रदर्शन को देखते हुए खेल गांव की एक सड़क का नाम मैरी कोम रोड रखा। यह वाकई उनके लिए बड़ी उपलब्धि है।

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

छोटी जेब, बड़ा खर्च



'द ग्रेट मिडिल क्लास' अब और बड़ी 'ग्रेटनैस' की तरफ अग्रसर है। एसोचैम के सर्वे के मुताबिक देश के शहरी मध्यम वर्ग के बच्चों के जेबखर्च में भारी बढ़ोतरी हुई है। चारों तरफ छाई आर्थिक मंदी के इस दौर में बच्चों की बढ़ती जेबखर्ची कितनी बढ़ी है, सुनकर चौंक जाएंगे आप। 486 करोड़ रुपए। कार्टून नेटवर्क की ओर से देश के 14 शहरों में सात से चौदह साल की उम्र के 6000 बच्चों पर करवाए गए एक सर्वे के मुताबिक देश में हर साल करीब 486 करोड़ रुपए पॉकेटमनी के नाम पर खर्च कर दिए जाते हैं। एसोचैम के सर्वे के मुताबिक पिछले दस सालों में बच्चों की पॉकेटमनी में छह गुना इजाफा हुआ है।


एक माह का औसतन खर्चा

मोबाइल- 350 रुपए

मिठाई, चॉकलेट, क्रिस्प और कोल्ड ड्रिंक- 200 रूपए

मूवीज- 150 रुपए

घूमने पर - 250 रुपए

गिफ्ट्स- 250 रूपए

मैग्जीन- 50 रुपए

डीवीडी या वीडियो- 100 रुपए

कंप्यूटर गेम्स- 100 रुपए


याद कीजिए प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' के नन्हे पात्र हामिद मियां को। कैसे वह दोस्तों के साथ ईद के मेले में जाकर अपनी बचत के तीन पैसों से मिठाई और खिलौने नहीं खरीदता बल्कि बूढ़ी दादी अमीना के लिए चिमटा लेकर जाता है। उसे अपनी दादी की जरूरतों का खयाल रहता है। वहीं आज के बच्चे बचत की बजाय खुद की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं।
पैसा आया फिर खर्च किया

उदारीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से लोगों की आय में गजब का इजाफा हुआ है। पैसा बढ़ेगा, तो तय है कि उसे बेतरतीब ढंग से खर्च भी किया जाएगा। शुरू में लगा कि मध्यमवर्गीय परिवार ही पैसे से मालामाल हुए हैं। पर अब एसोचैम का सर्वे बताता है कि इसका असर बच्चों पर भी पड़ा है। महानगरीय बच्चों को अब पहले की तुलना में छह गुना ज्यादा पॉकेट मनी मिल रही है। एक दशक पहले जहां शहरी बच्चों को औसतन 300 रूपए प्रति माह पॉकेट मनी मिलती थी, वहीं अब मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को औसतन 1800 रूपए प्रति माह पॉकेट मनी के रूप में मिलने लगे हैं। महानगरों के 2500 बच्चों पर किए एसोचैम के सर्वे में यह बात सामने आई है कि सबसे ज्यादा पैसा दिल्ली के बच्चों को मिलता है। इसके बाद बंगलौर, चेन्नई, मुंबई और कोलकाता के बच्चों को। सर्वे के अनुसार देश में लगभग 65 फीसदी बच्चों को पॉकेट मनी दी जाती है। साथ ही यह भी कि लड़कों से ज्यादा पैसे लड़कियों को मिल रहे हैं। लड़के जहां वीडियो गेम्स और गिफ्ट पर ज्यादा पैसे खर्च करते हैं, वहीं लड़कियां अपनी पॉकेट मनी का 58 फीसदी हिस्सा कपड़ों पर खर्च कर रही हैं। कार्टून नेटवर्क की ओर से करवाए गए एक सर्वे से भी इस बात की पुष्टि होती है कि देश के 98 फीसदी बच्चे टीवी के आदी हो चुके हैं और टीवी पर देखे गए उत्पादों को मनमाने ढंग से खरीदने लगे हैं। ऐसे में बच्चों के कदम बहकना स्वाभाविक है।

बचत एक सपना

नई पीढ़ी के पास पैसों को खर्च करने के लिए विज्ञापनों का सहारा है। आज के दौर के विज्ञापनों का खास फोकस भी बच्चे ही होते हैं। विज्ञापन की लुभावनी भाषा के पीछे छुपी सच्चाई को बच्चे समझ नहीं पाते हैं और उस उत्पाद पर पैसे खर्च करने से खुद को रोक नहीं पाते। सर्वे में बच्चों ने यह बात भी स्वीकारी है कि हमें पैसे खर्च करने के लिए मिलते हैं, बचाने के लिए नहीं। अब बच्चों के लिए बचत कोई मायने नहीं रखती है। कक्षा 10 में पढऩे वाले शुभम का मानना है कि पढ़ाई के सारे खर्च तो मम्मी-पापा उठा ही लेते हैं। फिर जब पैरंट्स पैसे दे रहे हैं, तो इसे कहीं न कहीं खर्च भी तो करेंगे ही ना। इसमें गलत क्या है? पैसे को तुरंत खर्च करने के पीछे साथियों की देखादेखी और दिखावा अहम वजह है। अपने ग्रुप के बच्चों में वे खुद को बेहतर साबित करने के लिए तरह-तरह की चीजें खरीद लाते हैं। मम्मी-पापा के सामने उनका एक ही जवाब रहता है कि इसे मैंने अपनी पॉकेट मनी से खरीदा है। तब पैरेंट्स भी बच्चों की इन बातों को नजरअंदाज कर देते हैं। सिर्फ पैसे देकर माता-पिता अपनी जिम्मेदारियों को इतिश्री समझ रहे हैं। उनके पास पैसा तो है, पर बच्चों के लिए समय नहीं है। महंगे शौक हैंएक मल्टीनेशनल कंपनी में एग्जीक्यूटिव ऑफिसर महेंद्र सिंह के मुताबिक हम बच्चों को समझा सकते हैं कि पैसे किस चीज पर खर्च करने चाहिए। पर हर समय उनके साथ तो हम भी नहीं रह सकते हैं ना। इस माहौल में मोबाइल फोन के जादू से बच्चे भी नहीं बच पाए हैं। वे महंगे मोबाइल फोन पर अपनी पॉकेट मनी खर्च कर रहे हैं। अधिकतर स्कूलों में मोबाइल फोन लाने पर प्रतिबंध है फिर भी बच्चे चोरी छुपे अपने साथ मोबाइल फोन लाते हैं और अपने अपने दोस्तों के बीच रौब गांठते हैं। वहीं आज ज्यादातर बच्चे इंटरनेट और चैटिंग पर भी काफी खर्च कर रहे हैं। कक्षा 9 में पढ़ने वाले अंकुर जायसवाल घंटों साइबर कैफे में बैठे रहते हैं और दोस्तों से चैटिंग करते हैं। मम्मी-पापा के नौकरी पर जाने के बाद अंकुर घर पर अकेला रह जाता है और अपना समय गुजारने के लिए अक्सर चैटिंग करता है।
हमारा मानना है

कई बच्चे तो स्कूल में टिफिन ले जाने की बजाय कैंटीन से खरीदकर खाना पसंद करते हैं। उन्हें घर के पौष्टिक खाने की बजाय पिज्जा, बर्गर और पेटीज पसंद आते हैं। बच्चों की इस सोच पर स्कूल्स के नियंत्रण की बात भी सामने आती है। जयपुर के केंद्रीय विद्यालय नं. 1 की प्रिंसिपल राज अग्रवाल के मुताबिक हम इस बात पर पूरी निगाह रखते हैं कि हर बच्चा अपना टिफिन लाए और समय पर खाना खा ले। कैंटीन में भी द्गयादा महंगा सामान नहीं रखा जाता है। पर साथ ही माता-पिता को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि अगर वे बच्चों को जरूरत से ज्यादा पैसे दे रहे हैं तो इसमें हम क्या कर सकते हैं? बच्चा उसे गलत चीजों पर खर्च करेगा ही।समाजशास्त्री ज्योति सिडाना कहती हैं कि आज बाजार संस्कृति के बढ़ावे की वजह से बच्चों की इच्छाएं काफी बढ़ गई हैं। उन्हें हर चीज ब्रांडेड चाहिए। माता-पिता भी बच्चों को यही सिखा रहे हैं, 'जो है, आज है। कल का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए पैसे को कल के लिए बचाने की बजाय खर्च करना ही ज्यादा अच्छा है।' यह सोच बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाली है। इससे बच्चे मेहनत का महत्त्व भूलने लगे हैं। उन्हें बस शौक पूरा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे चाहिए।

समाजशास्त्री रश्मि जैन के मुताबिक बच्चों में निर्णय लेने की क्षमता उम्र के साथ-साथ ही बढ़ती है। उनका बालमन पैसों की अहमियत समझे बिना उन्हें खर्च करने लगता है। माता-पिता को उन्हें समझाना चाहिए कि जेबखर्च आपकी मासिक कमाई है और उसका कुछ हिस्सा हमेशा बचाकर रखना चाहिए। बच्चे किस चीज पर पैसा खर्च कर रहे हैं, यह ब्यौरा भी समय-समय पर उनसे लेते रहना चाहिए। उन्हें पैसे का सदुपयोग सिखाने से कोई समस्या नहीं आएगी।

-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

27 November 2008

चांद पर तिरंगे की खुशबू




उत्तरप्रदेश के अमरोहा शहर की खुशबू मिर्जा ने इसरो में चंद्रयान प्रथम की सफलता में निभाई अहम भूमिका।

चांद पर अब तिरंगा भी लहरा रहा है। देश ने चंद्रयान के बहाने अपनी क्षमताओं का एक फिर परिचय दिया है। इस पूरे मिशन में एक ऐसी लड़की की मेहनत छुपी है जिसे बचपन से ही अंतरिक्ष की असीम गहराइयां लुभाती रही। उत्तरप्रदेश के छोटे से कस्बे अमरोहा से निकलकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) तक पहुंचने वाली 23 साल की इस लड़की का नाम है- खुशबू। अपने नाम की तरह वह अपने काम से भी सबका दिल महका देती है। खुशबू चंद्रयान प्रथम के सैटेलाइट सिस्टम को तैयार करने वाली बारह सदस्यीय इंजीनियर टीम में शामिल है। इनके चेक आउट डिवीजन दल ने यान के हर पुर्जे की थर्मल और वैक्यूम जांच की।


बस कड़ी मेहनत करनी है


25 जुलाई, 1985 को अमरोहा के मोहल्ला चाहगौरी निवासी सिकंदर मिर्जा और फरहत मिर्जा के घर एक नन्ही कली खुशबू ने जन्म लिया। सात साल की उम्र में ही उसके सिर से पिता का साया उठ गया। पिता इंजीनियर थे, इसलिए मां ने ठान लिया कि अपने सभी बच्चों को भी इंजीनियर ही बनाना है। बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिए परिवार के पेट्रोल पंप की जिम्मेदारी संभाली। आज खुशबू का बड़ा भाई खुशतर भी इंजीनियर कर चुका है और छोटी बहन महक भी यही पढ़ाई कर रही है। अपने पुराने दिनों की परेशानियों के बारे में खुशबू की मां फरहत बताती हैं, 'जब खुशबू पैदा हुई थी, तो यहां पीने के लिए पानी बहुत मुश्किल से मिलता था। मुझे कुएं से पानी लाना पड़ता था। हमारे इलाके में महिलाएं बुरका पहनती थी, पर खुशबू को जींस पहनना पसंद था। लोग तरह-तरह की बातें करके हमें परव्शान करते थे। पर मैं उससे हमेशा कड़ी मेहनत करने को कहती थी।'


खुशबू की शुरुआती पढ़ाई स्थानीय कृष्णा बाल मंदिर में हुई। सन्‌ 2000 में वह दसवीं कक्षा में 73 फीसदी अंक पाकर टॉपर बनी। आगे की पढ़ाई उसने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पूरी की। 2002 में इंटर की परीक्षा में 83 फीसदी अंक पाकर फिर से टॉपर बनी। स्कूल के दिनों में वह वॉलीबॉल की अच्छी खिलाड़ी रही। उसने वॉलीबॉल के लिए उत्तरप्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व भी किया। इसी की बदौलत खेल कोटा से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीटेक(इलेक्ट्रोनिक्स) करने का मौका मिला। 2006 में बीटेक में 96 फीसदी अंक प्राप्त करके वह विश्वविद्यालय की गोल्ड मैडलिस्ट भी बनी।
पैसा नहीं दिल की खुशी चाहिए


बीटेक के बाद उसने बहुराष्ट्रीय कंपनी एडोबे में अच्छी नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दिया और नवंबर 2006 में आधी तनख्वाह में इसरो से जुड़ गई। काम के प्रति लगन को देखते हुए जनवरी 2007 में उसे चंद्रयान मिशन के लिए चुना गया। तब से लेकर अब तक वह लगातार चंद्रयान के सफलतापूर्वक चांद की जमीन पर उतरने के लिए दुआ करती रही और आखिरकार यह मिशन सफल भी रहा। अब हिंदुस्तान अमरीका, रूस और जापान के बाद चांद पर झंडा गाड़ने वाला चौथा देश बन गया है। खुशबू मानती हैं,' हां मैं आधुनिक वेशभूषा पहनती हूं। पर मैं साथ में अपनी परंपराओं का निर्वहन भी करती हूं। मैं दिन में पांच बार नमाज अदा करती हूं और रमजान के महीने में रोजे भी रखती हूं। हर भारतीय की तरह मैं भी शुरू से ही अंतरिक्ष कार्यक्रमों को लेकर उत्सुक रही। चंद्रयान का प्रक्षेपण मेरे लिए बड़ा रोमांचकारी अनुभव रहा और मुझे इस दौरान काफी कुछ सीखने को मिला।'


- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

20 November 2008

प्रज्ञा पर प्रश्न चिह्न





मालेगांव बम धमाके के सिलसिले में गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जिंदगी पर एक नजर-


अधूरी हसरतों का दूसरा नाम है प्रज्ञा। उसकी जिंदगी के हर पन्ने में एक कहानी छुपी हुई है। मध्यप्रदेश के भिंड जिले के लहार कस्बे के गल्ला मंडी रोड पर आयुर्वेदिक क्लिनिक चलाने वाले वैद्य पिता चंद्रपाल सिंह और मां सरला देवी की बेटी है प्रज्ञा। उनका जन्म तो मध्यप्रदेश के दतिया जिले में हुआ पर लालन-पालन लहार में। चार बेटियों और एक बेटे में दूसरे नंबर की प्रज्ञा में बचपन से ही लड़कों जैसी चपलता थी। जूड़ो-कराटे में महारत हासिल करके वह बिगडै़ल लड़कों की पिटाई तक कर दिया करती थी। लड़कियों की बजाय उसे लड़कों जैसे कपड़े- जींस और कमीज पहनना पसंद था। कॉलेज के दिनों से ही वह मोटर साइकिल पर घूमने की शौकीन थी। पल्सर और बुलैट जैसी भारी गाडियां भी प्रज्ञा आसानी से चला लेती थी। पढ़ाई में औसत विद्यार्थी थी। लहार से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की और भिंड कॉलेज से इतिहास में स्नातक भी किया।सिलसिला चलता रहाकॉलेज के दिनों में वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गई। नब्बे के दशक के आखिर तक वह विद्यार्थी परिषद में रही। वाक्‌पटुता और हाजिरजवाबी के चलते काफी मशहूर हुई और भोपाल, देवास, जबलपुर, इंदौर में अपने भाषणों से छा गई। ऐसा माना जाता है कि 1998 के विधानसभा चुनाव से पहले भिंड जिले की मेहगांव सीट से चुनाव लड़ने की भी उसने कोशिशें कीं। गुजरात चुनाव के दौरान भी उसे चुनावी सभाओं में देखा गया। सन्‌ 2002 में उसने 'जय वंदेमातरम' और 'राष्ट्रीय जागरण मंच' बनाया।प्रज्ञा के साध्वी बनने के पीछे में प्रेम में असफलता को खासी वजह माना जाता रहा। अपने एक साथी नेता की किसी और से शादी होने पर फिर कभी शादी के बारे में नहीं सोचा। सन्‌ 2004 में उसके पिता लहार छोड़कर सूरत में बस गए।


बन गई संन्यासिन

जनवरी 2007 में जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद के समक्ष संन्यास लेकर साध्वी पूर्ण चेतनानंद गिरि बन गई और प्रवचन करने लगी। सूरत को अपनी कार्यस्थली के रूप में स्थापित करने के बाद वहां अपना आश्रम बना लिया। उनके परिजन अभी सूरत में ही रह रहे हैं। उसके पिता चंद्रपाल सिंह का कहना है, 'मुझे 99 फीसदी विश्वास है कि प्रज्ञा का मालेगांव बम मुझे विस्फोट में कोई हाथ नहीं है। पर एक फीसदी अविश्वास इसलिए है क्योंकि साध्वी बनने के बाद वह पिछले दो साल से घर नहीं लौटी। अब वह मुझे पिताजी नहीं डॉक्टर साहब कहकर पुकारती है। सबकी तरह मैं भी चाहता हूं कि सच्चाई जल्द से जल्द सबके सामने आए।'

- प्रस्तुति- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

18 November 2008

बड़ी खूबसूरत है ये दुनिया





मशहूर अभिनेता फारूक शेख खुलासा कर रहे हैं अपनी जिंदगी के चंद अनछुए पहलुओं का।
सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन के कामयाब कलाकार फारूक शेख उन चंद लोगों में से हैं जो समाज से जुड़े हर विषय पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। उनकी आवाज में गर्मजोशी है, तो बातों में नर्म दिल होने की झलक। पिछले दिनों जयपुर आगमन पर हमने उनसे अपनी जिंदगी के बारे में कुछ खास बातें की। पेश है उनसे हुई अंतरंग बातचीत के खास अंश-




आपके लिए खुशी के मायने...।


खुशी का राज सबको साथ लेकर चलने में है। परिवार से ऊपर उठकर समाज के बारे सोचने में है। आदमी अपनी जिंदगी दुनिया या बाजार में नहीं गुजारता बल्कि दिमाग के अंदर गुजारता है। अगर दिल और दिमाग संतुष्ट है, तो हजारों अभाव होने पर भी हम खुद को खुश पाएंगे। अगर मैं यह सोचने लगूं कि पूरी दुनिया मेरी जरूरतों को पूरा करने के लिए बनी है, तो यह गलत होगा। हम दुनिया नहीं, दुनिया का एक हिस्सा हो सकते हैं। यही तसल्ली तो असली खुशी देती है।


शायर ने कहा भी है-


चमन में इख्तिलाफे रंगो-बू से बात बनती है


हम ही हम हैं, तो क्या हम हैं


तुम ही तुम हो, तो क्या तुम हो।



परिवार को कितना समय दे पाते हैं?


मेरी बीवी ही घर की गृहमंत्री हैं। हम अपनी दोनों बेटियों साहिस्ता और सना को बेहद प्यार करते हैं। बेटी साहिस्ता एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करती है और सना एनजीओ से जुड़ी हुई है। जब मैं घर पर होता हूं, तो एक आम आदमी की तरह अपनी जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश करता हूं। पर जब शहर से बाहर होता हूं, तो मेरी बीवी सब संभाल लेती है।



परदे पर और असल जिंदगी के फारूक में क्या फर्क है?


जाहिरा तौर पर एक बड़ा फर्क है। हम चाहें खुद कितने ही परेशान क्यों न हों, परदे पर अगर लोगों को हंसाना है, तो हंसाना पड़ेगा। असल जिंदगी मुश्किलों से भरी है। यहां हम अपने भावों को कितनी देर तक छुपा पाएंगे। इसलिए अपनी सोच को विशाल दायरा देकर सारी जिम्मेदारियों को समझना पड़ता है। असल जिंदगी में एक आम आदमी हूं, जो इस खूबसूरत दुनिया और इसके बाशिंदों को बेहद प्यार करता है।
छोटे परदे पर आपका शो 'जीना इसी का नाम है' बड़ा मशहूर हुआ था। आपका क्या कहना है?


यह शो मेरे दिल के करीब है। दर्शकों ने शो के लिए मुझे बहुत सराहा। शो के दौरान कई शख्सियतों के बारे में करीब से जानने का मौका मिला। अगर प्रोड्यूसर दुबारा यह शो लेकर मेरे पास आते हैं, तो मैं जरूर करूंगा।


फिल्मों से इतर आपके आदर्श कौन हैं?


गांधीजी ने मुझ पर खासा असर डाला है। उन्होंने कहा था- मेरी जिंदगी ही मेरा संदेश है। हमें भी अपनी जिंदगी को इस तरह जीना चाहिए कि दिखावे के लिए कोई जगह ना हो।


क्या आप राजनीति में आना चाहेंगे?


नहीं भई, नौजवान, शिक्षित, मेहनती और समझदार नेता ही देश की किस्मत बदल सकते हैं। मैं आम आदमी की तरह देश की राजनीति में रुचि रखता हूं, पर इसमें आना नहीं चाहता।


इन दिनों छोटे परदे पर आ रहे कार्यक्रमों के बारे में आपकी क्या राय है?


हर इक शै से जुड़ी है हर इक शै यहां


इक फूल को तोड़ो तारे का दिल हिलेगा।


छोटे परदे पर पेश होने वाले कार्यक्रमों का समाज पर गहरा असर पड़ता है। चाहे सीरियल्स हों या कोई रियलिटी शो, एक सीमा रव्खा तय की जानी जानी चाहिए। इन्हें देखकर लगता है, मानो यही हमारी संस्कृति है। बिना किसी को नीचा दिखाए भी तो लोगों को हंसाया जा सकता है। अब समय आ गया है कि दर्शकों को जागरूक हो जाना चाहिए। उन्हें प्रोड्यूसर्स को ऐसे कार्यक्रम बंद करने के लिए खत लिखने होंगे और फोन करने होंगे। गलत कार्यक्रमों के आते ही चैनल बदलना होगा। निजी चैनल लोगों की प्रतिक्रिया पर ध्यान देंगे और अपने कार्यक्रमों के स्तर को सुधारने पर मजबूर हो जाएंगे।


आज की फिल्मों के बारे में क्या कहेंगे?


भई, आजकल फिल्में भी फास्टफूड की तरह बन रही हैं। मल्टीप्लैक्स की बाढ़ के चलते फिल्में पूरी तरह प्रॉडक्ट बनकर रह गई हैं। सैकड़ों फिल्मों में से एकाध ही ऐसी होती हैं, जिन्हें हम लंबे समय तक याद रख पाते हैं। हास्य फिल्मों में फूहड़ता आ गई है, मैसेज गायब है। आज की कॉमेडी देखकर मुझे बड़ा दुख होता है। मैंने हाल में अनुपम खेर अभिनीत 'खोसला का घोसला' देखी, इस का प्रजेंटेशन मुझे बेहद पसंद आया।


लंबे अरसे के बाद आपकी फिल्म 'सास, बहू और सेंसेक्स' रिलीज हुई है...।


मेरा मानना है कि कलाकार को अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए और फिर सारा फैसला जनता के हाथ में छोड़ देना चाहिए। अगर फिल्म फ्लॉप हो जाती है, तो कमियों पर ध्यान देकर अगली बार सुधार करना चाहिए। अब तो मैंने फैसला कर लिया है कि अगर अच्छी स्क्रिप्ट और बेहतरीन डायरव्क्टर का साथ मिलता है, तो साल में एक फिल्म जरूर करूंगा।



आपकी सहकलाकार रह चुकीं दीप्ति नवल डायरव्क्शन के फील्ड में आ गई हैं, आप भी निर्देशन करने की सोच रहे हैं...?


दीप्ति बड़ी अच्छी कलाकार हैं। अपनी फिल्म 'दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश' में वे अपना बेहतर काम पेश करेंगी, मुझे पूरा यकीन है। और जहां तक मेरे डायरव्क्शन का सवाल है, मैं खुद को इस काबिल नहीं समझता कि मुझमें लोगों से काम निकलवाने की समझ है। मैं तो एक्टर ही ठीक हूं।


युवाओं के लिए कोई संदेश।


कभी सैलेरी के लिए अपनी सोच और ईमानदारी को मत बेचो। पैसा ही जिंदगी नहीं है। काम के लिए जिओगे, तो पैसा पीछे भागेगा। जिंदगी का मकसद सारे समाज की खुशहाली होना चाहिए। आज अगर आपको आगे बढ़ने के अच्छे अवसर मिल रहे हैं, तो कुछ काम करने चाहिए कि आने वाली पीढिय़ों को भी कुछ अच्छा हासिल हो सके।


- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

दिल में धड़के हिंदुस्तान



सोनल शाह अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा की खास सलाहकार बनने जा रही भारतीय मूल की अमरीकी नागरिक सोनल शाह को जानते हैं खुद उन्हीं की जुबानी-


मेरा काम मेरी पहचान है


यह नवंबर माह मेरे लिए सबसे खुशी का महीना साबित हुआ है। अब मुझे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका के राष्ट्रपति के साथ काम करने का मौका मिलेगा। अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने मुझे अपने 15 सदस्यीय सलाहकार मंडल में बतौर सदस्य शामिल किया है। यह समिति निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुभव रखने वाले लोगों से मिलकर बनाई गई है। मैं ओबामा को प्रशासन चलाने के लिए काबिल लोगों के नामों की सिफारिश करूंगी। यह मेरे लिए वाकई गर्व की बात है। मैं एक अमरीकी अर्थशास्त्री हूं। अभी मैं गूगल डॉट ओरआरजी के साथ वैश्विक विकास दल में काम कर रही हूं। इससे पहले मैं गोल्डमैन एंड कंपनी की वाइस प्रेसीडेंट थी। वहां मैंने गोल्डमेन सोक्स की पर्यावरण संबंधी प्रोजेक्ट को पूरा करने में अहम भूमिका निभाई। मैं सेंटर ऑफ अमरीकन प्रोग्रेस में राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक नीति विभाग की सहायक निदेशक भी रह चुकी हूं। इसके साथ ही मैंने बोसनिया और कोसावो के युद्ध पीड़ित लोगों के लिए भी काम किया है और वहां से मुझे धैर्य, समर्पण जैसे कई गुण सीखने को मिले। कोई भी शख्स लगातार काम करके ही सीखता है, मैंने भी कई जगह और कई लोगों के साथ काम किया है। इसी की बदौलत आज इस मुकाम हैं।


देश के लिए जज्बात


मूलतः मैं गुजरात के साबरकांठा की हूं। मेरा जन्म 1968 में मुंबई में हुआ। सन्‌ 1970 में मेरव् पिताजी रमेश शाह गुजरात से जाकर न्यूयार्क में स्थायी तौर पर बस गए। 1972 में मैं भी अपनी मां कोकिला शाह के साथ न्यूयार्क जाकर बस गई। वहीं मेरी पढ़ाई-लिखाई हुई। मेरे भाई आनंद और बहन रूपल के साथ मिलकर मैंने 2001 में इंडीकॉप्स नाम के एक गैर सरकारी संस्था की स्थापना की। यह संस्था प्रवासी भारतीय को आपस में जोड़कर भारत में विकास के कामों में भागीदार बनाती है और भारत में डवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए भारतीय मूल के लोगों को एक साल की फैलोशिप देती है। मेरा मानना है कि देश से बाहर रहने वाले भारतीयों के मन में भी देश के लिए जज्बात होते हैं और वे हिंदुस्तान में सामाजिक कामों में भागीदारी करना चाहते हैं, पर उन्हें कोई मौका नहीं मिल पाता। इंडीकॉप्स के तहत युवा प्रवासी स्वेच्छा से भारतीय ग्रामीण लोगों की शिक्षा, जागृति, स्वास्थ्य जैसे विषयों पर एक साल तक भारत में काम करने के लिए आते हैं। इससे उन्हें ग्रामीण भारत की नई तस्वीर देखने का मौका मिलता है। सन्‌ 2003 में इंडिया एब्रोड प्रकाशन ने मुझे मेरे काम और नेतृत्व क्षमता के लिए 'पर्सन ऑफ द ईयर' घोषित किया।


आसमान छू सकते हैं


मुझे ओबामा की सोच और काम करने का तरीका बेहद पसंद है। वे बहुत स्पष्टवादी हैं। उनकी तरह मैं भी कहे हुए काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध रहती हूं। मुझे किताबें पढ़ने का बहुत शौक है और अच्छी एथलीट भी हूं। खासकर टेनिस और बॉलीबॉल तो मुझे बहुत भाते हैं। मैं स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानती हूं। वे कहा करते थे कि भयमुक्त होने पर ही इंसान कोई बड़ा काम कर सकता है। साथ ही मैं अपनी सफलता का श्रेय समाजसेवी पांडुरंग आठवाले को भी देती हूं। उन्हीं से मुझे समाज से करीब से जुड़ने की प्रेरणा मिली। मैं खुद को धन्य मानती हूं कि मुझे इतने अच्छे माता-पिता मिले, जिन्होंने सदा मेरा साथ दिया और हम काम में मेरी हौसला अफजाई की। मैं भारतीय युवाओं को हमेशा यही बात समझाती हूं कि उनमें क्षमता है बदलाव लाने की। वे समाज को एक नई दिशा दे सकते हैं। अगर आप आसमान के बारे में सोच सकते हैं, तो आसमान पा भी सकते हैं।


- आशीष जैन

...आगे पढ़ें!

10 November 2008

ये बच्चे बड़े सयाने हैं

ये बच्चे बड़े सयाने हैं
ये दुनिया से अनजाने हैं।
ईश्वर अल्लाह गॉड खुदा रब
मन से सदा पावन रहते ये सब।
इनकी बात निराली है
इनके चेहरों पर लाली है।
बातों में है एक भोलापन
जुड़ जाते इनके झट से मन।
ये अदा बड़ी दिखलाते हैं।
नटखट हरकत कर इतराते हैं।
ये बच्चे बड़े सयाने हैं
ये दुनिया से अनजाने हैं।
हर भाषा इनकी प्यारी है
हर रंग रूप में न्यारी है।
ये प्यार प्रेम हैं सिखलाते
दुनिया को सच्चाई दिखलाते।
ये सबके लिए इक सौगात हैं
इनसे जग के दिन-रात हैं।
बच्चों को दे प्यार ही प्यार
सब कुछ दें उन पर वार।
यही देश का नाम करेंगे
जग में अपना काम करेंगे।
-आशीष जैन

...आगे पढ़ें!