02 January 2009
जीने की राह संयम
31 December 2008
सुना मैंने नया साल आया
पुराना मेजपोश अब दिल को नहीं भाता।
गर्द जमी रहती है कुर्सियों पर
मुझसे मिलने अब कोई नहीं आता।
अंगीठी की आंच धीमी पड़ गई है
रोटियों का स्वाद कसैला सा है।
दीवारों पर स्याही के छीटें हैं
मेरा प्यारा पीकदान मैला सा है।
बचपन के प्यारे एलबम में सारी फोटूएं
न जाने क्यों आपस में चिपककर धुंधली हो गई हैं।
वो चिडिया का घोसला अब खाली है
बचा है, तो बस घास-फूंस का ढेर।
पुराने अखबारों के पुलिंदों के बीच में
दबा सा मैं सोचता हूं- ये सब क्या है?
मेरे मोजे, रूमाल, तौलिया सब रूठे हुए
बोलते हैं तू घिस गया है हमें इस्तेमाल करते-करते।
बल्ब जो सालों से टिमटिमा रहा है बंद-बदबूदार कमरे में
अब आजाद होना चाहता है।
किवाड़ सारे चरमराते रहते हैं
वक्त की सुइयां टूटी हुई हैं।
क्या यही वाजिब समय है
जब मैं बदल दूं अपना कलैंडर।
ले आऊं चंद खुशियां।
क्या वो 2009 में लटक रहा नो
मेरी जिंदगी में उम्मीदों को यस कह पाएगा।
हां थोड़ी आशा तो है कि मैं सपनों को सपनों से ज्यादा कुछ तो मानूंगा।
मैं भरोसा करूंगा कि मैं मौजूद तो हूं इस दुनिया में चाहे
उसी नाम से जिससे बचपन से मेरे मां-बाप मुझे बुलाते हैं
और अब दोस्त पुकार लेते हैं गाहे-बगाहे।
हां, मैं झिलमिलाती रोशनी हूं 2009 की।
मैं बदल तो सकता हूं खुद को
पर शर्त है कि तुम मेरे रूप से नाराज नहीं होओगे, चिढ़ाओगे नहीं मुझे।
नहीं तो मैं अपने खोल में वापस घुस जाऊंगा
और अगले साल तक वापस नहीं निकल पाऊंगा।
मुझे भरोसा है कि इस बार आप मेरी मदद करोगे
मेरी सारे कूड़े-करकट को बाहर का रास्ता दिखलाने में।
- आशीष जैन
29 December 2008
ख्वाब हो या हो कोई हकीकत
26 December 2008
नई उमंगों का सवेरा
आशा
15 December 2008
मैं रफ्तार हूं
दौ सौ किलो वजनी 600 सीसी की होंडा सीबीआर बाइक। उसे बच्चों के किसी खिलौने की तरह दौड़ाने के लिए तैयार है वह। पलक झपकते ही 210 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार छूना उसका शगल है। उसका कहना है,'मैं रफ्तार हूं। सबसे तेज। बिजली-सी कौंधने वाली रफ्तार। मेरी जिंदगी बाइक के लिए है और मैं मरूंगी भी बाइकिंग के लिए। बाइकिंग मेरव् खून में है।' यह है चेन्नई की 19 वर्षीय अलीशा अब्दुल्लाह। बाइकिंग के लिए दीवानगी की झलक उसके ईमेल आईडी 'लिवफॉरस्पीड' से मिलती है।
11 December 2008
कहां गया मेरी बगिया का फूल?
क्या लहू का कोई मजहब हो सकता है? क्या अश्कों में तड़पती आह से राम या रहीम को अलग-अलग दर्द होता है? अगर नहीं, तो फिर क्यों गुलशन को उजाड़ने पर आमादा है आतंक। सपनों की पोटली लिए मुंबई में घूमते सैकड़ों बेगुनाह ही नहीं, पूरी दुनिया की रूह को कंपाने की कोशिश है हाल में मुंबई में हुआ आतंकी हमला। रोज की भागदौड़, हजारों परेशानियां और अब उसमें शामिल है एक डर। आतंक का डर। कब किस ठौर विस्फोट हो और जिंदगी की रोशनी बेनूर होकर हजारों परिवारों के घरों को हमेशा के लिए अंतहीन अंधेरा दे जाए। पर कभी न थमने की हम देशवासियों की शपथ हमेशा रंग लाती है और हम फिर खुशी की बहार को अपने आंगन में बिखरने के लिए बुला लेते हैं।
रिंग की रानी को सलाम
रिंग में एक के बाद एक बरसते फौलादी पंच। बॉक्सिंग ग्लव्स और दो खिलाडिय़ों के हौसलों की भिडंत। बचाव के लिए हैं सिर्फ दो हाथ। अगर जरा सी चूक हुई, तो नाक या मुंह पर जबरदस्त चोट। यह रोमांच है बॉक्सिंग खेल का। इसी के सहारव् खुद का नाम मणिपुर की वादियों से पूरी दुनिया में फैलाने वाली महिला बॉक्सर हैं- एम.सी. मैरी कोम। उनके नाम में एम.सी. का मतलब है- मांगते चुन्गनेईजंग। हाल ही चीन में संपन्न हुई विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में 46 कि.ग्रा. वर्ग में लगातार चौथी बार गोल्ड मैडल जीतकर उन्होंने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।
छोटी जेब, बड़ा खर्च
एक माह का औसतन खर्चा
याद कीजिए प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' के नन्हे पात्र हामिद मियां को। कैसे वह दोस्तों के साथ ईद के मेले में जाकर अपनी बचत के तीन पैसों से मिठाई और खिलौने नहीं खरीदता बल्कि बूढ़ी दादी अमीना के लिए चिमटा लेकर जाता है। उसे अपनी दादी की जरूरतों का खयाल रहता है। वहीं आज के बच्चे बचत की बजाय खुद की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं।
पैसा आया फिर खर्च किया
हमारा मानना है
27 November 2008
चांद पर तिरंगे की खुशबू
उत्तरप्रदेश के अमरोहा शहर की खुशबू मिर्जा ने इसरो में चंद्रयान प्रथम की सफलता में निभाई अहम भूमिका।
चांद पर अब तिरंगा भी लहरा रहा है। देश ने चंद्रयान के बहाने अपनी क्षमताओं का एक फिर परिचय दिया है। इस पूरे मिशन में एक ऐसी लड़की की मेहनत छुपी है जिसे बचपन से ही अंतरिक्ष की असीम गहराइयां लुभाती रही। उत्तरप्रदेश के छोटे से कस्बे अमरोहा से निकलकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) तक पहुंचने वाली 23 साल की इस लड़की का नाम है- खुशबू। अपने नाम की तरह वह अपने काम से भी सबका दिल महका देती है। खुशबू चंद्रयान प्रथम के सैटेलाइट सिस्टम को तैयार करने वाली बारह सदस्यीय इंजीनियर टीम में शामिल है। इनके चेक आउट डिवीजन दल ने यान के हर पुर्जे की थर्मल और वैक्यूम जांच की।
पैसा नहीं दिल की खुशी चाहिए
20 November 2008
प्रज्ञा पर प्रश्न चिह्न
18 November 2008
बड़ी खूबसूरत है ये दुनिया
सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन के कामयाब कलाकार फारूक शेख उन चंद लोगों में से हैं जो समाज से जुड़े हर विषय पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। उनकी आवाज में गर्मजोशी है, तो बातों में नर्म दिल होने की झलक। पिछले दिनों जयपुर आगमन पर हमने उनसे अपनी जिंदगी के बारे में कुछ खास बातें की। पेश है उनसे हुई अंतरंग बातचीत के खास अंश-
परिवार को कितना समय दे पाते हैं?
परदे पर और असल जिंदगी के फारूक में क्या फर्क है?
छोटे परदे पर आपका शो 'जीना इसी का नाम है' बड़ा मशहूर हुआ था। आपका क्या कहना है?
आपकी सहकलाकार रह चुकीं दीप्ति नवल डायरव्क्शन के फील्ड में आ गई हैं, आप भी निर्देशन करने की सोच रहे हैं...?
दिल में धड़के हिंदुस्तान
10 November 2008
ये बच्चे बड़े सयाने हैं
ये बच्चे बड़े सयाने हैं
ये दुनिया से अनजाने हैं।
ईश्वर अल्लाह गॉड खुदा रब
मन से सदा पावन रहते ये सब।
इनकी बात निराली है
इनके चेहरों पर लाली है।
बातों में है एक भोलापन
जुड़ जाते इनके झट से मन।
ये अदा बड़ी दिखलाते हैं।
नटखट हरकत कर इतराते हैं।
ये बच्चे बड़े सयाने हैं
ये दुनिया से अनजाने हैं।
हर भाषा इनकी प्यारी है
हर रंग रूप में न्यारी है।
ये प्यार प्रेम हैं सिखलाते
दुनिया को सच्चाई दिखलाते।
ये सबके लिए इक सौगात हैं
इनसे जग के दिन-रात हैं।
बच्चों को दे प्यार ही प्यार
सब कुछ दें उन पर वार।
यही देश का नाम करेंगे
जग में अपना काम करेंगे।
-आशीष जैन
03 November 2008
चाहिए एक संगिनी ऐसी
ख्वाबों की शहजादी कहें या सपनों की परी, हर पुरुष चाहता है कि उसकी जीवनसंगिनी ऐसी हो जो सारे जमाने से अलहदा और हरदिल अजीज हो।
शादी जिंदगी में एक नया मोड़ लेकर आती है। कुछ को यह रिश्ता ताउम्र लुभाता है, तो कुछ को लगता है कि हमेशा साथ निभाने वाले हमसफर में कोई न कोई खास बात होनी चाहिए, जो जमाने भर में ढूंढ़ने पर भी कहीं नजर न आए। हमने बात की कुछ पुरुषों से और जाना कि कैसी होनी चाहिए आपकी ड्रीम वाइफ।
आंखों में झांककर दिल पढ़ ले
वो लड़की बिल्कुल मेरी दोस्त जैसी हो। आखिर उसे मेरे साथ ताउम्र रहना है। ऐसे में दोस्त की तरह मेरी मुश्किलों को समझे, मेरा हौसला बढ़ाए और प्यार करे। वह दिखने में चाहे कैसी भी हो, इससे कोई फर्क मुझे नहीं पड़ेगा। हां, अगर मैं गलत राह पर जाऊं, तो मुझे सही राह भी दिखला सके। मेरे बोलने से पहले मेरी आंखों में झांककर ही मेरे मन की बात समझ सके। कभी अगर मैं जिंदगी के सफर में हताश हो जाऊं, तो मुझे प्रेरित करे, ऐसी वाइफ मिल जाए, तो मेरी लाइफ बन जाए।
-रवि कुमार शर्मा, उम्र- 36 वर्ष
सबका दिल जीत ले
उस लड़की की शक्लोसूरत खूबसूरत हो। हम दोनों की सोच भी मिले। पत्नी के साथ-साथ परिवार में दूसरी भूमिकाओं जैसे भाभी, बहू और मां को निभाने में भी कुशल हो। घर में सबकी इच्छाओं के लिए अगर थोड़ा बहुत अपनी सुविधाओं के साथ एडजस्ट करना पड़े, तो खुशी-खुशी तैयार हो जाए। जहां भी वह जाए, अपनी बातों से सबका दिल जीत ले और हाथ के हुनर में पारंगत हो। फिर चाहे वह अच्छी कुक हो या अच्छी पेंटर। कुछ ना कुछ ऐसी खासियत जरूर होनी चाहिए कि हर कोई कहे, वाह! क्या बीवी है।
-बुद्धप्रकाश सैनी, उम्र-34 वर्ष
मस्त, बिंदास और जिम्मेदार
मेरा हमसफर थोड़ा चुलबुला, चंचल और शरारती हो। मस्त, बिंदास हो, साथ ही जिम्मेदार भी। वह खुले विचारों की हो और समय के हिसाब से खुद को ढाल सके। मैं जिस भी प्रोफेशन में रहूं, वह उसे समझे और मेरी मदद भी करे। खुद को अपडेट रखे। आपने आस-पास की चीजों की जानकारी रखने वाली हो। वह इमोशनल भी होनी चाहिए ताकि रिश्तों की डोर को मजबूती से संभाले रख सके। तन की सुंदरता से ज्यादा मन की खूबसूरती को तवज्जो देने वाली हो। तभी मैं कहूंगा कि जोडिय़ां तो फरिश्ते तय करके भेजते हैं।
- विनोद भंडारी, 23 वर्ष
खुद को ना बदले
मेरी तलाश ऐसी अर्द्धांगिनी की है, जो वाकई मेरी पूरक हो। मेरी पहचान हो। सूरत और सीरत में कोई फर्क ना हो। बिना बताए अपने फर्ज को समझने वाली हो। आधुनिक हो पर ज्यादा फैशनबल ना हो। चाहे साड़ी पहने या सलवार पर हो हिंदुस्तानी तहजीब को समझने वाली। परंपराओं को दिल से निभाए और मुश्किलों में मेरा साथ दे। मन की सारी भली-बुरी बातें मुझसे शेयर करे। मेरी ख्वाहिशों के चलते वह खुद को ना बदले। जैसी है, सदा वैसी ही रहे। वह खुद कहे कि मैं हूं बीवी नंबर वन।
- आदित्य बोहरा, 26 वर्ष
-आशीष जैन
दोस्ती कमाल की
सिसली के राजा ने डेयन को किसी अपराध के कारण मृत्यु दण्ड दिया। मृत्यु दण्ड से पहले राजा ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी तो उसने कहा- मुझे ग्रीस जाकर परिवार का प्रबंध करने के लिए एक साल का समय चाहिए। राजा बोला- मैं तुम्हारी अंतिम इच्छा पूरी करना चाहता हूं, पर तुम्हारी जगह कारागृह में कौन रहेगा? और तुम्हारे नहीं लौटने पर मृत्यु दण्ड लेने को कौन तैयार होगा? उसका मित्र पीथियस पास में ही खड़ा था। उसने कहा- मैं डेयन की जगह कारावास जाने को तैयार हूं, अगर वह लौटकर नहीं आया तो मैं मृत्यु दण्ड पाने को भी तैयार हूं। राजा ने डेयन को जाने की अनुमति दे दी। लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी बनीं कि डेयन समय पर लौट कर नहीं आ सका। पीथियस को फांसी की पूरी तैयारी कर ली गई। जैसे ही फंदा उसके गले में डाला जा रहा था, तभी हांफता हुआ डेयन लौट कर आ गया और उसने कहा- मैं आ गया हूं, मेरे मित्र को छोड़ दो और मृत्युदण्ड मुझे ही दो। पीथियस ने कहा- काश तुम देर से आते तो आज मित्रता का मिसाल कायम हो जाती। समझदार राजा ने दोनों क मित्रता को समझा और प्रशंसा करते हुए उन्हें छोड़ दिया। राजा ने उम्हें कई उपहार भी दिए और कहा- मुझे भी तुम्हारे जैसे मित्रों की आवश्यकता है। यदि तुम दोनों मेरे मित्र बन जाओगो तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।
...आगे पढ़ें!बहकते नन्हे कदम
घटना1- 11 दिसंबर 2007 को गुडगांव के एक स्कूल में दो स्कूली छात्रों ने आठवीं कक्षा के अपने दोस्त पर 5 गोलियां दागकर उसे मार डाला।
घटना2- 3 जनवरी 2008 को मध्यप्रदेश के सतना जिले के चोरवाड़ी गांव में दसवीं कक्षा के एक छात्र ने अपने से जूनियर कक्षा 8 के एक छात्र को गोली चलाकर मार डाला।
हाल ही हुई बच्चों में बढ़ती हिंसा की घटनाओं ने सबके सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों बालमन भटक रहा है? मासूमियत कहां गुम होती जा रही है? यह प्रवृत्ति परिवार, देश-समाज के लिए नासूर बने, उससे पहले सोचना होगा कि कैसे नन्हे कदमों को भटकने से रोका जा सकता है? इसी का खुलासा कर रहा है यह लेख-
आंकड़ों की जुबानी
1. पिछले दस सालों में बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में 400 फीसदी बढ़ोतरी हुई है।(इंडियन एसोसिएशन फॉर चाइल्ड एंड एडोलेसेंट मेंटल हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक)
2. हर 10 में से चार बच्चे अवसादग्रस्त हैं। (विमहंस के अध्ययन के मुताबिक)
3. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सन् 2020 तक बचपन में न्यूरोसाइकरेटिक समस्या में 50 फीसदी तक का इजाफा हो जाएगा और रोग व मृत्युदर में इजाफे के लिए जिम्मेदार पांच कारणों में एक प्रमुख कारण होगा।
4. विद्यासागर मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरो विज्ञान संस्थान (विमहंस) ने 1200 बच्चों पर किए एक अध्ययन के आधार पर बताया है कि दिल्ली में पिछले एक दशक में 15 से 18 साल के बच्चों में तम्बाकू और अल्कोहल का इस्तेमाल चार गुना बढ़ गया है।
ये घटनाएं आजकल सबके बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। सभी को बच्चों में बढ़ती हिंसा ने हैरत में डाल दिया है। बच्चों में इस कदर बढ़ती हिंसा वाकई चिंता का विषय है। मनोवैज्ञानिक बच्चों के इस बदलते व्यवहार को व्यापक दायरे में देखते हैं और इसके लिए कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। अगर इसे समय पर नहीं सुलझाया गया, तो समाज में बच्चों की स्थिति बिगड़ सकती है और हम सबको इसके नकारात्मक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।
कोमल मन, मिट्टी समान
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। बच्चे अपने परिवार, परिवेश, समाज और स्कूल से बहुत कुछ सीखते हैं। उनमें यह समझ नहीं होती कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। ऐसे में वे कई बार गलत कदम उठा लेते हैं। मुंबई में बच्चों की काउंसलर दिव्या प्रसाद इसी बात का समर्थन करते हुए कहती हैं, 'बच्चों का मन कच्ची मिट्टी की तरह होता है। ऐसे में बच्चे हर चीज से बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं। बच्चों में सही-गलत का निर्णय लेने का गुण विकसित करना बेहद जरूरी है।'
बढ़ती सुख-सुविधा और पैसा
उदारीकरण के दौर में भारतीय परिवारों की आय में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके चलते सुख-सुविधाओं की वस्तुएं बढ़ी है। बच्चों को भी ज्यादा जेबखर्च दिया जाने लगा है। बच्चे इस पैसे का गलत इस्तेमाल करते हैं। पैसे के बल पर माता-पिता के खरीदे लाइसेंस्ड हथियार बच्चों तक आसानी से पहुंच जाते हैं। घर में रखे हथियारों के प्रति बच्चों में उत्सुकता बनी रहती है। बच्चे मौका देखते ही हथियार को लेकर उसका असल जिंदगी में प्रदर्शन करते हैं और दोस्तों के बीच आपनी धौंस जमाने लगते हैं। कभी-कभी इन हथियारों के जरिए अपना गुस्सा जाहिर करने से भी नहीं चूकते।
पढ़ाई का तनाव
आज प्रतिस्पर्धा का दौर है। मां-बाप व अध्यापक से लेकर रिश्तेदार और साथी-संगी सभी चाहते हैं कि बच्चा स्कूल में हमेशा टॉप पर रहे। बच्चे के मन को समझने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। ऐसे में बच्चा अपनी पढ़ाई को लेकर हमेशा तनाव में रहता है। बच्चा अपने मन की बात किसी से नहीं कह पाता और ऐसे में मन ही मन परेशान रहने लगता है। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को समय से पूर्व ही करियर का भूत भी सताते लगता है। माता-पिता की बढ़ती अपेक्षाओं के चलते बच्चा अवसाद में आ जाता है।
टीवी और इंटरनेट, कम्प्यूटर गेम्स
तकनीक ने हमारी जीवनशैली का स्तर सुधारा है। पर तकनीक के बढ़ते प्रभाव के चलते बच्चे असल जिंदगी और टीवी के किरदारों में फर्क महसूस नहीं कर पाते। टेलीविजन पर दिखलाई जाने वाली हिंसा बाल-मन पर कुप्रभाव छोड़ती है। वहीं इंटरनेट पर जानकारियों का अनवरत प्रवाह के बीच बच्चे भ्रमित होकर हिंसा को वास्तविक जीवन की सच्चाई मानने लगते हैं। वहीं आजकल कम्प्यूटर गेम्स के बढ़ते चलन से बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता सिकुड़ गई है। कम्प्यूटर गेम्स जैसे हिटमैन, ब्लड मनी, रोड रश बच्चों को सीधे तौर पर हिंसा के जरिए अपना काम निकालने का संदेश देते हैं। बच्चे कम्प्यूटर गेम्स के इस मायावी संसार को असल जिंदगी में भी लागू करते हैं। उसके परिणाम बहुत घातक होते हैं।
तेज जीवनशैली और खान पान
आज के युग में किसी के पास समय नहीं है। हर किसी को जल्द से जल्द परिणाम चाहिए। बच्चे भी तेजी से खुद को बड़ा साबित करना चाहते हैं। इस होड़ में बच्चे अपनी कोमलता छोड़कर प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गए हैं। वे अपनी हार बर्दाश्त नहीं कर सकते। बच्चे सफलता में बाधा बनने वाली हर चीज का हल हथियार में ढूंढने लग जाते हैं। वहीं कई शोध साबित करते हैं कि जंक फूड खाने से भी बच्चों की मानसिकता प्रभावित होती है। फास्ट फूड के बढ़ते चलन से बच्चों का बौद्धिक स्तर कम हुआ है। अकेलापन
आधुनिक समय में माता-पिता दोनों रोजगार के लिए दिन के समय घर से बाहर रहते हैं। जिस समय बच्चा स्कूल से घर आता है उसे चाहिए मां का दुलार, उसके ममता भरे बोल। लेकिन उसे इसकी बजाय खालीपन मिलता है।वह घर पर सारे दिन अकेला रहता है। बच्चा इस अकेलेपन को सहन नहीं कर पाता है। अकेलापन हावी होने से उसकी मानसिकता में विकृति आने लगती है। अकेलेपन का कोई रचनात्मक उपयोग न होने की वजह से बच्चे में तनाव, अवसाद और निराशा घर करने लगती है।
कुछ खास बातें
बच्चों के कुछ खास लक्षणों को देखकर आप पता लगा सकते हैं कि आपका लाडला भी किसी मानसिक परव्शानी या अवसाद से तो नहीं गुजर रहा-
1. हमेशा उदास रहना और अनावश्यक तनाव लेकर आंसू बहाते रहना।
2. हमेशा माता-पिता का साथ पसंद करना और एक पल को भी उनसे दूर नहीं होना।
3. स्कूल में अपने सहपाठियों से घुल-मिल नहीं पाना और हमेशा उनसे लड़ने को उतारू रहना।
4. प्रायः उल्टी, सिरदर्द की शिकायत करना।
5. खेल, पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों से अचानक मन उचटना।
6. खान-पान की आदतों में बदलाव और कम नींद लेना।
7. अल्कोहल या ड्रग लेना या एकाएक बहुत ज्यादा वजन बढ़ना।
8. बात-बात पर गुस्सा करना और तोड़फोड़ करना।
9. दोस्तों के नए समूह में शामिल होना
मनोचिकित्सक प्रवीण दादाचांजी और अनिल ताम्बी के मुताबिक अपने बच्चे में कोई मानसिक समस्या देखें, तो इससे निजात के लिए आपको निम्न उपाय करने चाहिए-
1. बच्चों के साथ समय गुजारें- जब तक आप अपने बच्चों के साथ स्तरीय समय व्यतीत नहीं करेंगे, बच्चे को सही राह नजर नहीं आ सकती है। माता-पिता को बच्चों की समस्याएं सुननी चाहिए व उनके साथ बैठकर हल खोजना चाहिए।
2. बच्चों को प्रेरणादायी और सकारात्मक किस्से सुनाएं- आज के युग में बच्चे दिशाहीन होते जा रहे हैं। ऐसे समय में अगर उन्हें प्रेरणादायी किस्से और सकारात्मक बातें बताई जाएं, तो उनका तनाव कम होगा और वे गलत राह पर जाने से बचे रहेंगे।
3. टीवी और कम्प्यूटर गेम्स की बजाय उन्हें पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें- अगर बच्चे कम्प्यूटर की बजाय पुस्तकें पढ़ने की आदत विकसित करेंगे, तो वे अपना समय कहीं बेहतर ढंग से व्यतीत कर सकेंगे। पुस्तकें बच्चों की सबसे अच्छी मित्र साबित हो सकती हैं।
4. सामाजिक मान्यताओं के सम्मान की सीख दें- अपने बच्चों को सिखाएं कि व्यक्ति का विकास समाज में रहकर ही हो सकता है। सामाजिक मान्यताओं का आदर करना बहुत जरूरी है।
5. खुद मर्यादित व्यवहार करें- अक्सर बच्चे अपने माता-पिता को देखकर काफी कुछ सीखते हैं। अगर माता-पिता खुद अपना व्यवहार मर्यादित रखेंगे, तो बच्चों के सामने एक मिसाल कायम होगी और उनके कदम बहकने से बचेंगे।
6. रचनात्मकता को बढ़ावा दें- हर बच्चे में कुछ खास करने की इच्छा होती है। इसलिए आपको बच्चों की रचनात्मकता को विकसित करने का मौका देना चाहिए। पेंटिंग्स, लेखन और डांस से बच्चों को कुछ नया करने का मौका मिलता है और वे ज्यादा सकारात्मक बन पाते हैं।
7. एंगर मैनेजमनेंट की सीख दें- अगर बच्चे को बात-बात पर गुस्सा आता है, तो उसे गुस्सा कम करने की तकनीक बताएं। गुस्से के वक्त उसे अपनी सांस पर ध्यान देने की सलाह दें। ध्यान और योग से भी बच्चों के गुस्से को कम किया जा सकता है।
क्या कहना है स्कूल प्रिंसिपल्स और निदेशकों का
जयपुर के स्कूल के प्रिंसिपल्स और निदेशकों से जब स्कूल परिसर में बच्चों में बढ़ती हिंसा के बारव् में बातचीत की गई, तो पता लगा कि सभी को इस घटना के बारव् में पता था और इस घटना के पीछे छुपे संकेतों को भी सभी समझते थे। अधिकतर स्कूलों ने इस घटना के तुरंत बाद अध्यापकों के साथ मीटिंग की और बच्चों की भावनाओं को समझने की वकालत की। पर प्रायः स्कूलों ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी किसी ठोस कार्रवाई की बात नहीं कही।
नैतिक शिक्षा जरूरी
जैसे ही मुझे गुडगांव की हृदयविदारक घटना के बारे में पता लगा, मैंने स्कूल के अध्यापकों और बच्चों के साथ मीटिंग की और बच्चों को समझाया। मैं अध्यापकों को बच्चों को नैतिक शिक्षा देने की बात कही है।
- आर एल शर्मा, निदेशक, ब्राइट फ्यूचर सीनियर सैकण्डरी स्कूल
शिक्षक से मन की बात कहें
गुडगांव और चोरवाड़ी घटना के बाद हम बच्चों से पूछताछ कर रहे हैं कि उन्हें किसी साथी से डर तो नहीं है। हम निगाह रखते हैं कि किसी बच्चे का व्यवहार असामान्य तो नहीं है। अगर किसी बच्चे को किसी भी तरह की परव्शानी है, तो वह सीधे अपने शिक्षक से बात कर सकता है।
- बेला जोशी, प्रिंसिपल, सुबोध पब्लिक स्कूल
हर हरकत पर निगाह
आज बच्चों के दिल में जो गुबार है,उसे बाहर निकालना बहुत जरूरी है। मैं तो बच्चों के पास जाकर बच्चों जैसी हो जाती हूं। उनकी हर बात ध्यान से सुनती हूं। स्कूल में शिक्षकों को बच्चों की असंदिग्ध हरकतों पर निगाह रखने के निर्देश दिए हुए हैं। पर हर बच्चे की चैंकिंग करना नामुमकिन है।
- राज अग्रवाल, प्रिंसिपल, केन्द्रीय विद्यालय नं.1
हिदायत दी हुई है
स्कूल की हर कक्षा में कैमरे लगे हुए हैं, जिससे हम बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। अध्यापकों को बच्चों के लड़ाई-झगड़े निपटाने के भी निर्देश दे दिए हैं। बच्चों को हिदायत दी है कि अगर आप कुछ गलत चीज स्कूल में लेकर आए, तो आपको स्कूल से निकाला जा सकता है।
-मोहिनी बक्शी, प्रिंसिपल, सीडलिंग स्कूल
काउंसलिंग करवाते हैं
वैसे कोई बड़ा कदम तो नहीं उठाया है। हां, नियमित रूप से अकस्मात चैकिंग का काम चलता रहता है। इससे बच्चे किसी तरह का गलत काम करने से डरते हैं। बच्चों की काउंसलिंग का कार्यक्रम भी बढ़ा दिया है।- माला अग्निहोत्री, वाइस प्रिंसिपल, इंडिया इंटरनेशनल स्कूल
समझाइश से काम होगा
हम माता-पिता को समझा रहे हैं कि हथियारों को बच्चों की पहुंच से दूर रखें। बच्चों को भी पढ़ाई का तनाव नहीं लेने की सलाह दी है। बच्चों को हथियारों के नुकसान से भी चेताया है।
- कर्नल कौशल मिश्रा, प्रिंसिपल, महावीर दिगंबर सीनियर सैकंडरी स्कूल
आलेख- आशीष जैन
नखरा बड़ा खाने-पीने में
01 November 2008
क्या खूब याददाश्त है...
असली परीक्षा तो माता-पिता की है
क्या इन दिनों आपके घर का माहौल बदला हुआ है? बच्चों की परीक्षा ने आपको टेंशन में डाल दिया है। बच्चे क्या पढ़ें, कैसे पढ़ें, क्या खाएं, क्या पिएं, कब सोएं, कब जागें- ढेरों सवाल आपके दिमाग में भी घूमते रहते हैं। घूमने भी चाहिए। अरे भई! आप बच्चों के माता-पिता जो हैं। इन दिनों आपके बच्चे ही इम्तहान नहीं दे रहे, बल्कि आप भी परीक्षा दे रहे हैं जनाब!
मधु, निशा, अनन्या और माधुरी शाम के समय बतिया रही थी। चारों के बच्चों के एग्जाम चल रहे हैं। चारों इन दिनों अपने बच्चों को लेकर काफी पशोपेश में हैं। सब अपना-अपना दुखड़ा एक-दूसरे को सुनाने लगती हैं। मधु कहती है, 'मेरी बेटी ने तो इन दिनों खाना-पीना बिल्कुल छोड़ दिया है।' इस पर माधुरी बोलती है, 'मेरा बेटा रोहित तो हमेशा टेंशन में रहता है कि अच्छे नंबर आएंगे भी या नहीं।' अनन्या की अलग ही परेशानी है। उसका बेटा इन दिनों ठीक से सो ही नहीं पा रहा है। निशा कहती है, 'मेरी बिटिया तो चौबीसों घंटे किताबों के चिपकी रहती है, ना हंसती है, ना बात करती है।' चारों सोचती हैं कि हमें बच्चों को किसी डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। चारों सहेलियां अपने बच्चों की समस्याएं आपस में बांट ही रही थी कि उनकी डॉक्टर सहेली हेमलता आती है और उनकी बातों में शामिल हो जाती है। उनकी बातें सुनकर हेमलता कहती है, 'तुम यूं ही घबराती हो। बच्चों में एग्जाम के दिनों में ये समस्याएं आ सकती हैं। डॉ. के पास जाने के बजाय तुम्हें ही कुछ करना चाहिए। तुम्हें समझना चाहिए कि अब बच्चों की परीक्षा के साथ-साथ तुम्हारी भी परीक्षा है।
जी हां, हेमलता सही कह रही हैं। एग्जाम के दिनों में सभी मांओं की हालत इन चार सहेलियों जैसी हो जाती है। पर परीक्षा की इस घड़ी को सिर्फ अपने बच्चों की परीक्षा ना समझें, यह समय आपके लिए भी किसी परीक्षा से कम नहीं है। बच्चों की एग्जाम की टेंशन को थोड़ी सी समझदारी से सुलझाया जा सकता है।
माता-पिता ही सर्वश्रेष्ठ काउंसलर
एनसीईआरटी से ट्रेनिंग प्राप्त काउंसलर गीतांजलि कुमार का कहना है, 'परीक्षा के दिनों में एक बच्चे के लिए माता-पिता ही सबसे अच्छे काउंसलर साबित हो सकते हैं। मां-पिता बच्चे को नजदीक से जानते हैं और उसकी भावनाओं को अच्छे से समझ सकते हैं। अगर बच्चे को कोई भी परेशानी महसूस हो, तो माता-पिता को खुद आगे होकर बच्चों से बात करनी चाहिए।' माता-पिता को बच्चों के सामने एक दोस्त की भूमिका निभानी होगी, तभी बच्चे एग्जाम के डर के बारे में उनसे बातचीत कर पाएंगे। माता-पिता को बच्चे को यकीन दिलाना चाहिए कि परीक्षाएं जीवन-मरण का प्रश्न नहीं हैं। बच्चों में भरोसा पैदा करने के लिए उन्हें याद दिलाना चाहिए कि उन्होंने पूरी साल पढ़ाई की है और अब एग्जाम भी अच्छे ही होंगे। साइकेट्रिस्ट डॉ. रेशमा अग्रवाल का मानना है, 'परीक्षा के दिनों में अगर पूरा परिवार बच्चे के साथ रहेगा, तो उसे रिलेक्स महसूस होगा और उसमें एंग्जाइटी भी पैदा नहीं होगी।'
चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. अंजलि मुखर्जी का कहना है, 'माता-पिता को अपने बच्चे की एग्जाम को नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए।' बच्चे पर कभी प्रेशर ना बनाएं कि फलां से ज्यादा नंबर आने चाहिए या फलां का पेपर तो बहुत अच्छा हुआ है। पेपर देने के बाद अपने बच्चे से यह कभी नहीं पूछें कि कितने नम्बर आएंगे? बच्चा अगर अपने दोस्त के साथ पढ़ाई करने जाता है, तो उस पर शक न करें। करियर, सोसाइटी, नौकरी की बातों को अच्छे नंबर्स के साथ जोडक़र पेश न करें। बच्चों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उन्हें बताएं, 'अभी तो बहुत समय है। तुम, कर सकते हो।' बच्चों को अपनी पढ़ाई और एग्जाम के अच्छे अनुभवों के किस्से सुनाएं। इससे बच्चों को लगेगा कि मम्मी-पापा ने भी तो एग्जाम दी है। वे सही ही सलाह दे रहे हैं। एग्जाम के दिनों में बच्चों को कभी पढ़ाई के विषय में अपमानित न करें। बच्चों में असुरक्षा की भावना को पनपने की बजाय उनकी हर बात को ध्यान और धैर्य से सुनें। माता-पिता को बच्चों को एग्जाम के दिनों में गहरी सांस लेने व छोडऩे की सलाह देनी चाहिए। सबसे सही और उपयुक्त बात तो यही है कि बच्चों को आप पर पूरा यकीन हो जाए और वे कहने लगें, 'मुझे कोई टेंशन कैसे हो सकती है, मेरे मम्मी-पापा मेरे साथ जो हैं।' तभी आप भी इस एग्जाम में पास माने जाएंगे।
परीक्षा के दिनों में माता-पिता को बच्चे की दिनचर्या सामान्य बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। काउंसलर बिंदु प्रसाद कहते हैं, 'एग्जाम के दिनों में अपने बच्चों को समझाएं, कि वे अपनी नियमित दिनचर्या में कतई फेर-बदल न करें। सामान्य दिनों की तरह ही हल्का-फुल्का समय मनोरंजन के लिए भी निकालें।' माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों का स्टडी रूम व्यवस्थित रूप से जमा दें। एग्जाम हॉल में ले जाने वाली जरूरी चीजों को नियत स्थान पर रखें। माता-पिता को चाहिए, एग्जाम के दिनों में बच्चा साफ कपड़े पहने, ताकि उसका तन-मन अच्छा रहे और पढ़ाई ध्यान से कर पाएं। पढ़ाई की जगह हवादार हो और कमरे में में पर्याप्त रोशनी हो। परीक्षाओं के दिनों में मम्मी-पापा को भी टीवी कम ही देखना चाहिए, ताकि उनके बच्चों का ध्यान ना भटके।
डाइट कंसलटेंट आरती शाह का मानना है कि परीक्षा के दिनों में बच्चों को आयरन और प्रोटीन से भरपूर भोजन खिलाना चाहिए। बच्चों को वसा युक्त, तला-भुना और गरिष्ठ भोजन नहीं दें। साथ ही माता-पिता को यह भी ख्याल रखना चाहिए कि बच्चे को लगातार और थोड़ा-बहुत खाने को देते रहें। ज्यूस और ठंडा पानी भी पिलाते रहना चाहिए। द्गयूस में अगर थोड़ा नमक मिलाकर देंगे, तो बच्चों के शरीर में नमक की कमी भी नहीं होगी। सबसे जरूरी बात है कि एग्जाम के दिनों में बच्चों को याददाश्त बढ़ाने वाली दवाइयां कतई न दें। बच्चों को खुद पर विश्वास बनाए रखने की सलाह दें। बच्चों को देर रात तक पढ़ाई की राय देने से भी बचें। हां! सुबह जल्दी जगाकर उन्हें कुछ देर टहलने को कहें और फिर पढ़ाई की बातें करें। उनके कोर्स को और पेपर पैटर्न को आप भी समझने की कोशिश करें। अगर बच्चे के मन में परीक्षाओं से संबंधित कोई सवाल है, तो उसे टालें नहीं, उसका सही जवाब दें।
-आशीष जैन
24 October 2008
आई है दिवाली
आज समय किसी के पास नहीं है। तो हाइटेक जमाने में दीपावली पूजन के लिए पंडितजी को खोजने की भी जरूरत नहीं।
महानगर में एक पंडितजी है दीनानाथ जी। अब भई दीपावली का समय है तो श्रेष्ठ चौघड़ियों के हिसाब से हर कोई फटाफट और सटीक समय पर दीनानाथजी को अपने साथ ले जाना चाहता है। दीनानाथजी भी चाहते हैं कि हर यजमान की इच्छा पूरी हो। समझ में नहीं आ रहा, कैसे इस समस्या से निजात पाएं। इसके लिए काम आया केबल नेटवर्क। केबल नेटवर्क की मदद से दीनानाथजी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग की और सारव् यजमान उनके बताए अनुसार उपयुक्त मुहूर्त में पूजा का मार्गदर्शन लेते रहे। पंडितजी के बताए अनुसार मंत्र पढ़ते लोग खुशी-खुशी महालक्ष्मी की आराधना करते रहे।
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बदलते समय और लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर अब बाजार में दीपावली पूजन का ऑडियो कैसेट भी मिल रहा है। इन कैसेटों में पूजा के मंत्र और विधान दोनों हैं। कई कैसेटों के साथ तो पूजन सामग्री भी मिल रही है। बाजार में इस तरह की थाली उपलब्ध है, जिन्हें तुरंत खरीदें और पूजा करना शुरू कर दें। इस थाली को गेरू,चंदन, गोटा-सितारव् और कोैड़ियों से सजाया गया है और इसमें लक्ष्मी-गणेश, दीपक, लौंग, कपूर, खील-बताशे, रोली, मौली सब कुछ मौजूद हैं।
अब तो बाजार में बहीखाते के विकल्प के रूप में बोनचाइना की खिलौनानुमा किताब भी मिलने लगी है। इसमें एक पेज पर गणपति बने हैं, तो दूसरे पर लक्ष्मीजी के मंत्र। इस तरह देखा जाए, तो पूरा बाजार ही आपकी सुविधा के लिए तैयार खड़ा है।
-आशीष जैन










