मिस्र में लाल सागर के किनारे स्थित है- शर्म अल शेख। यह शहर गोताखोरों और विंडसर्फिंग के शौकीनों की पसंदीदा जगह है। पिछले दिनों यही हुआ गुट निरेपक्ष आंदोलन (नैम) का दो दिवसीय 15वां शिखर सम्मेलन। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से कई देश जुड़ चुके हैं। इसी क्रम में गुट निरपेक्ष आंदोलन के 118 सदस्य देशों के नेताओं और प्रतिनिधियों को एक मंच पर देखना वाकई सुखद अनुभूति रहता है। इस बार नैम में पहली बार यहां पर 'प्रथम महिला सम्मेलनÓ का आयोजन हुआ। इसमें देशों की प्रथम महिलाओं ने संबोधन किया और इस सम्मेलन का विषय था-'संकट प्रबंधन में महिलाएं- महत्व एवं चुनौतियां।Ó इस बार के गुट निरपेक्ष आंदोलन के शिखर सम्मेलन का विषय था- विश्व की एकता, शांतिपूर्ण विकास। मिश्र के राष्ट्रपति हुस्ने मुबारक गुट निरपेक्ष आंदोलन के नए अध्यक्ष बने हैं। उन की कार्यावधि तीन साल होगी। इस तरह मिश्र गुट निरपेक्ष आंदोलन का अध्यक्ष देश बन गया है।
जाकी रही भावना जैसी
मिस्र के शर्मअलशेख में हाल में हुए 15वें गुटनिरपेक्ष सम्मलेन (नैम समिट) ने एक बार सोचने पर विवश कर दिया है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता पर विचार किया जाए। दो सैन्य शक्तियों (सोवियत रूस और अमरीका) में बंटी हुई दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए यह जरूरी था कि उपनिवेश की दासता से मुक्तहुए नए स्वतंत्र देश संतुलन बनाए रखें। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद गुटीय राजनीति से खुद को दूर रखने के लिए एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के स्वतन्त्र राज्यों ने गुटनिरपेक्षता की नीति का अनुसरण करना उचित समझा। एशिया, अफ्रीका के इन तमाम देशों के सामने दो विकल्प थे या तो वे इनमें से किसी एक गुट के साथ हो जाते या अपनी अलग पहचान कायम करते। उस वक्त दुनिया के तीन नेता सामने आए और एक साहसिक और दूरगामी कदम उठाते हुए उन्होंने गुटनिरपेक्षता की अवधारणा रखी। कुछ जानकारों का मानना है कि नैम सिर्फ नाम का रह गया है। यह औपनिवेशिक काल में संघर्ष तक तो ठीक था, पर अब यह तानाशाही का सर्टिफिकेट बनता जा रहा है। यूं सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया की धुरियां अमरीका और सोवियत संघ की बजाय कई केंद्रों पर टिक गई हैं, पर फिर भी गुटनिरपेक्ष की भावना तिरोहित हो चुकी है। देखा जाए, तो ऐसे नाममात्र के देश बचे हैं, जो किसी गुट से संबंध नहीं रखते। अमरीका जैसे देश भारत की भावना को दूषित करके गुटनिरपेक्ष आंदोलन को सफल होता नहीं देख सकते। नेहरू-नासिर-टीटो की पहल पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन शुरू हुआ। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन शीत युद्ध के समय शुरू हुआ एक आन्दोलन था जिसके अनुसार इसके सदस्य राष्ट्र किसी भी देश (सोवियत संघ या अमेरिका) का समर्थन या विरोध नहीं करेंगे। यह आंदोलन भारत के भारत के प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासर एवं युगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रॉज टीटो ने शुरु किया था है।
कारवां बढ़ता गया
इसकी स्थापना अप्रेल 1955 में हुई थी और आज इसके 118 सदस्य और 15 ऑब्जर्वर देश हो चुके हैं। शीत युद्ध के दौरान 1955 में प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नेताओं पंडित जवाहरलाल नेहरु, कर्नल नासिर और सुकर्णो आदि ने 29 एशियाई और अफ्रीकन देशों के सहयोग से इस संगठन की नींव रखी। अब तक 15 शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। पहला शिखर सम्मेलन यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में 1 से 6 सितम्बर 1961 में हुआ था जिसमें 25 देशों के शासनाध्यक्षों ने भाग लिया। सम्मेलन के अन्त में निशस्त्रीकरण करने, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक पिछड़ेपन को दूर करने, घरेलू मामलों में विदेशी हस्तक्षेप और रंगभेद की निन्दा तथा विश्व शांति की घोषणाएं की गई। तब से अब तक आन्दोलन निरंतर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श का मंच बनता रहा है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन हर तीसरे वर्ष अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श करने के योजनाएं निर्धारित करने के लिए सदस्य देशों का शिखर सम्मेलन आयोजित करता है जिसमें निर्णय बिना मतदान सर्वसम्मति से होते है। आज इसके सदस्यों की संख्या 25 से बढ़कर 118 तक पहुंच चुकी है। 1950 और 60 के दौर में इसने स्वाधीनता का नारा दिया। 1970-74 में इसने आर्थिक सहयोग और नवीन अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के प्रयास किए। 1979 की हवाना घोषणा के अनुसार इस संगठन का उद्देश्य गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की राष्ट्रीय स्वतंत्रता, सार्वभौमिकता, क्षेत्रीय एकता एवं सुरक्षा को युद्ध के दौरान साम्राज्यवाद, जातिवाद, रंगभेद एवं विदेशी आक्रमण, सैन्य अधिकरण, हस्तक्षेप आदि मामलों के विरुद्ध सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही किसी पावर ब्लॉक के पक्ष या विरोध में ना होकर निष्पक्ष रहना है। कार्टागेना (1995) सम्मेलन में आर्थिक मुद्दों पर विशेष बातचीत करते हुए विकसित और विकासशील देशों के बीच संवाद कायम करने के प्रयासों पर बल दिया गया।
खा गए इस बार मात
यह संगठन संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्यों की संख्या का लगभग 2/3 एवं विश्व की कुल जनसंख्या के 55 फीसदी भाग का प्रतिनिधित्व करता है। खासकर इसमें तीसरी दुनिया यानी विकासशील देश सदस्य हैं। इंदिरा गांधी और फिदेल कास्त्रो जैसे नेताओं ने गुटनिरपेक्षता के महत्व को समझकर जरूरी कदम भी उठाए, पर इनके बाद यह आंदोलन अपनी धार खोता चला गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि जब सोवियत रूस के ही टुकड़े हो गए थे, तो दो गुटों की बात भी नहीं रह गई। यूं पहली नजर में लगता है कि उनका मानना सही है। पर आज दुनिया दो टुकड़ों में नहीं, कई टुकड़ों में बंटी है। ऐसे में आतंकवाद जैसी समस्या से निपटने के लिए बिना किसी गुटबाजी के सही बात को सबके सामने रखने की जरूरत है। पिछली बार सितंबर 2006 में क्यूबा में हुए 14वें गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में भारत की पहल पर आतंकवाद के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी। इस बार के सम्मेलन में देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह मात खा गए और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी को बिना मांगे ही तोहफा दे आए। भारत-पाक के संयुक्त वक्तव्य को सुनकर हर कोई चकित है। पाकिस्तान में बलूचिस्तान में गड़बडिय़ों के लिए हिंदुस्तान को दोषी ठहरा दिया है। वक्तव्य में कश्मीर का जिक्र तक नहीं है। वहीं आतंकवाद पर कार्रवार्ई को समग्र वार्ता से बाहर रखने की बात सुनकर हर भारतीय निराश हुआ है। 24 और 25 फरवरी 2003 को कुआलालंपुर में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की 13वीं शिखर बैठक हुई। इस शिखर सम्मेलन में अमरीका की इराक के खिलाफ की गई कार्यवाही की निंदा की गई।
नैम की सफलता और विफलता
गुटनिरपेक्ष आंदोलन को शुरू से ही कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। सबसे बड़ी परेशानी तो अमरीका और सोवियत संघ ही थे। इनकी कोशिश रहती थी कि किसी भी तरह गुटनिरपेक्ष देशों को विघटित किया जाए। अमरीका दक्षिण अमरीकी राज्यों पर निरंतर दबाव बनाता रहता है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन से ये देश बाहर आ जाएं। अमेरीका निकारागुआ को गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित करने से रोकने में भी सफल रहा। साथ ही सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि गुटनिरपेक्ष देश आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। कमजोर आर्थिक दशा के चलते ये देश एक नए तरह के उपनिवेशवाद से घिरते जा रहे हैं। कमजोर आर्थिक दशा ने गुटनिरपेक्ष राज्यों को नवीन उपनिवेशवाद के अधीन कर दिया है। नई आर्थिक विश्व व्यवस्था तथा विश्व व्यापार संगठन के होते हुए भी अमेरीका संरक्षणात्मक तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार नीति अपनाता है। मार्च 2003 में इराक पर अमेरीकी हमला तेल पर कब्जा जमाने की कोशिशों का ही परिणाम है। अब गुटनिरपेक्ष राज्य ईरान को भी वह शक के घेरे में खड़ा कर रहा है। अमरीका की गुप्तचर संस्थाएं भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन को कमजोर करने में प्रयासरत हैं। क्यूबा में फिदेल कास्त्रो सरकार को पदच्युत करने की कोशिश की गई। चिली के राष्ट्रपति की हत्या करवायी। गुटनिरपेक्ष देशों की खुद की कलह भी इसकी असफलता का बड़ा कारण है। कोलंबो (1976) सम्मेलन में बंगलादेश ने भारत के साथ गंगा के पानी के बंटवारे के सवाल को शिखर सम्मेलन में उठाने का प्रयास किया। 1979 का हवाना शिखर सम्मेलन मिश्र के निष्कासन और कम्बुजिया के प्रश्न पर विभाजित था, जकार्ता (1992) शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान ने कश्मीर को मसला बनाया। 996 में सीटीबीटी प्रारुप पर भारत का साथ देने के लिए एक भी देश तैयार नहीं था। अर्जेंटिना, ब्राजील और मिश्र ने अमेरीका और पश्चिमी देशों का साथ दिया। ऐसा नहीं है कि इस आंदोलन के पास सिर्फ विफलताओं का पुलिंदा है। इसके खाते में कई सफलताएं भी दर्ज हैं। प्रशांत महासागर, कैरेबियन सागर, हिन्द महासागर के कई देशों का आंदोलन के साथ जुडऩा इसकी सफलता को ही दर्शाता है। 1955 के बांडुग सम्मेलन में नेहरु, नासिर, टीटो तथा चाउ-एन-लाई द्वारा गुटनिरपेक्षता के संगठित समर्थन ने दुनिया के गुलाम देशों के समर्थन में आवाज उठाना शुरू की थी और एक-एक करके देश आजाद होने लगे। साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, रंगभेद, बाहरी हस्तक्षेप, अन्याय और शोषण से मुक्ति दिलाना इसकी प्रमुख उपलब्धि हैं।
-आशीष जैन
13 August 2009
शर्म अल शेख में नैम
भूखे भजन ना होय...
देश में लाखों-करोड़ों परिवार आज भी भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उदारवादी अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी बाजार के आने से यूं तो लगता है कि भुखमरी जैसी समस्या आज देश में खत्म हो चुकी है, पर ऐसा नहीं है। आज भी लोगों को दो जून का खाना खोजने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इस बार के लोकसभा के चुनावों में देश की ज्यादातर राजनीतिक दलों ने गरीबों के लिए रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराएंगे। चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस ने भी भोजन के अधिकार पर काम करने की अपनी इच्छा जताई है। भुखमरी, कुपोषण और गरीबी ऐसे अभिशाप बन गए हैं, जो भारत की करीब तीस-पैंतीस करोड़ आबादी का दामन छोडऩे को तैयार नहीं हैं। देश की आजादी के वक्त भी देश की जनसंख्या लगभग इतनी ही थी। आजादी के बासठ साल बाद भी भारत की बीस करोड़ से अधिक आबादी कुपोषण और भुखमरी की शिकार है।
भूख आंकड़ों में
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ भारत में करीब 20 करोड़ लोग खाली पेट रात में सोने के लिए विवश हैं। पूरी दुनिया मेंं हर दिन करीब 18 हजार बच्चे भूख से मर रहे हैं। दुनिया की करीब 85 करोड़ आबादी रात में भूखे पेट सोने के लिए विवश है। पूरी दुनिया में करीब 92 करोड़ लोग भुखमरी की चपेट में हैं। अपने देश में 42.5 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। अकेले साल 2006 में भूख या इससे होने वाली बीमारियों के कारण पूरी दुनिया में 36 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। पूरी दुनिया के मुकाबले देश में बड़े पैमाने पर बाल पोषण कार्यक्रम चलाया जा रहा है, पर फिर भी देश के हालात चिंताजनक हैं। देश में उदारवाद आने के बाद स्थितियां तेजी से बदली हैं और देखने वाली बात है कि भारत चाहे दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हो, पर हर पेट को भोजन की मंजिल अभी बहुत दूर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में जारी अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्था के विश्व भुखमरी सूचकांक -2007 में भारत को 118 देशों में 94वें स्थान पर रखा गया है। भारत का सूचकांक अंक 25.03 है, जो साल 2003 (25.73) के मुकाबले कुछ ही बेहतर हुआ है। देश में अमीरों और गरीबों का अनुपात तेजी से बिगड़ रहा है। देश के 35 अरबपति परिवारों की संपत्ति 80 करोड़ गरीब, किसानों, मजदूरों, शहरी झुग्गी-झोंपड़ी वालों की कुल संपत्ति से ज्यादा है। अफसोस की बात है कि आज तक भी किसी सरकार ने भोजन के अधिकार का कानून नहीं बनाया। कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इस बारे में विधेयक विधानसभा में लाने की घोषणा की थी। बाकी राज्य सरकारें अभी तक चुप्पी साधे बैठी हैं। खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के एक प्रस्ताव पर गौर करें, तो पता लगेगा कि प्रस्तावित भोजन के अधिकार के तहत वह सरकार की भूमिका को सिर्फ 25 किलोग्राम चावल और तीन रुपए प्रति किलो गेहूं की दर से आपूर्ति करना चाहती है। वह भी गरीबों के लिए। पर जिन गरीबों के पास रहने को घर भी नहीं हैं, वे किस तरह इस अनाज को पकाएंगे और खाएंगे। सरकार भी बीपीएल की परिभाषा भी हजम नहीं होती। वह योजनाओं को सिर्फ गरीबी रखने से नीचे रहने वाले बीपीएल कार्ड धारकों को ही देना चाहती है। आंकड़े बताते हैं कि देश में 8.13 करोड़ लोगों के पास बीपीएल कार्ड है और 2.5 करोड़ लोग अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत आते हैं। अगर इन्हें भी बीपीएल कार्डधारियों के साथ जोड़ दिया जाए तो कुल संख्या होती है लगभग ग्यारह करोड़। योजना आयोग के एक आकलन के अनुसार देशभर के गांवों में बाईस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं और शहरों में इनकी आबादी आठ करोड़ है, यानी कुल तीस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। उन्नीस करोड़ लोग सिर्फ कार्ड नहीं रहने की वजह से इस योजना का लाभ उठाने से वंचित रह जाएंगे। इस योजना का लाभ वे भी नहीं उठा पाएंगे, जिन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के तहत साल भर में सौ दिनों का काम मिल रहा है। सरकार उन्हें गरीबी रेखा से नीचे नहीं मानती, क्योंकि साल भर में वे आठ हजार रुपए कमा लेते हैं, यानी औसतन प्रति माह करीब 670 रुपए। 1999-2000 राष्ट्रीय नमूना सर्वे संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार उसी व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे माना गया है, जिसकी मासिक आय 568.80 रुपए से कम है। इस सर्वे को योजना आयोग भी मानती है। नतीजतन जो लोग नरेगा के तहत लाभान्वित हो रहे हैं, उन्हें सरकार अब गरीबी रेखा के नीचे नहीं मानती।
भूख से लड़ाई में जनहित याचिका
देश में कुपोषण और भुखमरी की भयावह स्थिति और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में भ्रष्टाचार, लापरवाही को देखते हुए 2001 में मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने भोजन के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित चायिका दायर की। याचिका में कहा गया कि भोजन के अधिकार को कानूनी रूप दिया जाए। यह याचिका उस समय दायर की गई, जब एक ओर देश के सरकारी गोदामों में अनाज का भरपूर भंडार था, वहीं दूसरी ओरदेश के विभिन्न हिस्सों में सूखे की स्थिति एवं भूख से मौत के मामले सामने आ रहे थे। पीयूसीएल की दायर की गयी इस याचिका का आधार संविधान का अनुच्छेद 21 है जो व्यक्ति को जीने का अधिकार देता है। जीने का अर्थ गरिमापूर्ण जीवन से है और यह भूख और कुपोषण से जूझ रहे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। यह एक मौलिक अधिकार है। सरकार का दायित्व है इसकी रक्षा करना। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार जीने के अधिकार को परिभाषित किया है, इसमें इज्जत से जीवन जीने का अधिकार और रोटी के अधिकार आदि शामिल हैं।
इस न्यायालयीन हस्तक्षेप के बावजूद भी मध्यप्रदेश कुपोषण और भुखमरी में पहले स्थान पर है। स्थिति को सुधारने के लिए ससरकार द्वारा कुछ कार्यक्रम चलाये जा रहे है। जिन्हें चार भागों में बांटा जा सकता है - बच्चों के भोजन का अधिकार (समेकित बाल विकास योजना, मध्यान्ह भोजन योजना), खाद्य सहायता कार्यक्रम (सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं अंत्योदय अन्न योजना), रोजगार कार्यक्रम (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, काम के बदले अनाज कार्यक्रम) एवं सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम (राष्ट्रीय मातृत्व सहायता योजना, जननी सुरक्षा योजना, राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना और राष्ट्रीय परिवार सहायता कार्यक्रम)। पर इनके सही परिणाम अभी भी सामने आने बाकी हैं।
इस याचिका के अंतर्गत करीब 400 शपथ-पत्र अभी तक दायर किए गए हैं और साथ ही 60 अंतरिम आवेदन लगाये जा चुके हैं। यह केस दुनिया का पहला ऐसा केस है, जिसमें पिछले 8 वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय 65 से अधिक अंतरिम आदेश दे चुकी है।
28 नवम्बर 2001 को सर्वोच्च न्यायालय के दिए गए अंतरिम आदेश में खाद्य सुरक्षा और रोजगार योजना कानूनी अधिकार में बदल गया है। इसी आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार और राज्य सरकारों को यह निर्देशित किया है कि जब तक इस केस का अंतिम आदेश नहीं आ जाता, तब तक इन योजनाओं को न्यायालय के आदेष के बिना नहीं बदला जाएगा और न ही बंद किया जाएगा। अभियान का मानना है कि इस केस के माध्यम से भोजन के अधिकार की मौलिक अधिकारों में शामिल कर लिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये आदेष के अंतर्गत समेकित बाल विकास योजना की सभी सेवाओं को सर्वव्यापीकरण की बात कहीं गयी है। इसके अंतर्गत सभी बच्चों को मध्यान्ह भोजन में पका हुआ भोजन देने की बात कही गयी है।
समेकित बाल विकस योजना को न्यायालय द्वारा यह कहकर परिभाषित किया है कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों में 0 से 6 वर्ष के बच्चे गर्भवती, धात्री एवं किशोरी बालिकाओं को कुछ प्रमुख सेवायें दी जाएंगी, जिसमें हर 6 वर्ष तक के बच्चे को 300 कैलोरी और 8-10 ग्राम प्रोटीन दिया जाएगा, हर किशोरी बालिका को 500 कैलोरी और 20-25 ग्राम प्रोटीनयुक्त भोजन दिया जाएगा, हर गर्भवती एवं धात्री महिला को 500 कैलोरी और 20-25 ग्राम प्रोटीनयुक्त भोजन दिया जाएगा और हर कुपोषित बच्चे को 600 कैलोरी और 16-20 ग्राम प्रोटीनयुक्त भोजन दिया जाएगा। इसे लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों ने कोई जवाब नहीं दिया तो न्यायालय ने 7 अक्टूबर 2004 को आदेश पारित किया कि सरकार देश में 14 लाख आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थापना करें। समाज के वंचित वर्गों और गरीबों को इसका लाभ सीधे पहुंचाने के लिए इस आदेश के अनुसार हर दलित, आदिवासी मोहल्ले एवं आबादी में जल्द से जल्द इसे खोला जा। आंगनबाड़ी केन्द्र में पोषण आहार पहुंचाने के लिए ठेकेदार का उपयोग नहीं किया जायेगा और पोषण आहार की आपूर्ति केवल स्थानीय महिला समूह द्वारा की जाएगी। न्यायालय के इस हस्तक्षेप की वजह से भोजन के अधिकार को मुद्दे को समाज की मुख्यधारा के सामने लाने में सफलता हासिल हुई है।
पूरी दुनिया में है अधिकार
भोजन का अधिकार मानवाधिकार से जुड़ा मसला है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की प्रसंविदाओं में भी इसे बार-बार दोहराया गया है। भोजन के अधिकार को अनेकों राष्ट्रों के संविधानों में जगह प्रदान की गई है। सामान्य टिप्पणी (क्रमांक 12) (जो कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की समिति ने दी थी) में भोजन के अधिकार को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक पुरुष, स्त्री और बच्चों को अकेले और समुदाय के रूप में भौतिक और आर्थिक रूप से हर समय पर्याप्त भोजन अथवा उसकी अभिप्राप्ति के साधन मानवीय गरिमा के साथ सुसंगत रहेंगे, इसे ही भोजन का अधिकार माना गया है। इस लिहाज से साधारण टिप्पणी के अनुसार भोजन के अधिकार का अर्थ तीन प्रकार के दायित्वों का आशय भी रखता है-सम्मान करने का दायित्व, संरक्षण और उसकी प्रतिपूर्ति। अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (ईएससीआर) के अनुच्छेद 2 (1) के अंतर्गत राज्य यह अभिस्वीकृत करते हैं कि वे ऐसे कदम उठाएंगे जिनसे कि वे अपने उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप उच्चतम सीमा तक पर्याप्त भोजन के अधिकार की प्राप्ति सुनिश्चित कर सकें। अनुच्छेद 2 (2) में कहा गया है कि राज्य इस बात के लिए भी सहमत हैं कि वे जिस भोजन की गारंटी प्रदान करेंगे, वह बिना भेदभाव के अमल में लाई जाएगी। अनुच्छेद-3 यह कहता है कि राष्ट्र यह भी विश्वास दिलाता है कि स्त्री और पुरुषों के बीच भोजन के अधिकार के उपभोग के मामले में समान अधिकार प्राप्त होगा।
विश्व खाद्य दिवस..
दुनियाभर में विश्व खाद्य दिवस हर साल 16 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह खाद्य और कृषि संगठन की स्थापना के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। वर्ष 1945 में इस संगठन की स्थापना की गई थी। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य लोगों को विश्व में व्याप्त भुखमरी के प्रति आगाह करना और उसे मिटाने के लिए ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना है। हर वर्ष 150 से ज्यादा देश इसे मनाकर अभियान की सार्थकता में अपना योगदान देते हैं। 1981 से हर साल विश्व खाद्य दिवस पर विषयवस्तु निर्धारित की जाने लगी और इसे ही लक्ष्य मानकर सभी देशों ने अपने स्तर पर काम किए हैं। वर्ष 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा में प्रतिष्ठापित भोजन के अधिकार को अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक उपायों द्वारा मजबूत किया जाना था। विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन और सहस्त्राब्दी घोषणा में इस संबंध में उच्च स्तर पर प्रण लिए गए और उन अधिकारों को पूरा सम्मान दिया गया। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने इन प्रायोगिक दिशानिर्देशों को फैलाया और उन्हें लागू करने के लिए अनुशंसाएं उपलब्ध कराईं। जिससे वैधानिक मान्यता और उसके कार्यान्वयन के अंतर को खत्म किया जा सके ।
अन्न पैदा करने वाला खुद भूखा
आर्थिक सुधारों के शुरुआती दौर में 1999 में प्रति व्यक्ति उपभोग 178 किलोग्राम था, जो 2002-03 में 155 किलोग्राम रह गया। निचले स्तर के लोगों का रोज ग्रहण किए जाने वाला कैलोरी का स्तर भी घटा है। कुल आबादी का पच्चीस प्रतिशत, जो 1987-88 में 1683 कैलोरी ग्रहण करता था, 2004-05 में वह घटकर 1624 कैलोरी रह गई है। भारत अनाज पैदा करने वालों के दुख-दर्द पर आंखें नहीं मूंद सकता। अनाज पैदा करने वाला अधिकतर ग्रामीण समुदाय भयानक भूख के दौर से गुजर रहा है। दुनियाभर में देखा जाए, तो भूखों की आधी आबादी तो उनकी है, जो खुद अनाज पैदा करते हैं। खेती के काम में महंगे निवेश के चलते किसान कर्ज में डूब जाते हैं। कर्ज चुकाने के चक्कर में उन्हें अपनी सारी पैदावार बेचनी पड़ती है। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के मूल में भी यही कारण है। खाद्यान्न पैदा करने वाले लोगों को भूख से बचाने के लिए कि सस्ते, कम कीमत वाले कृषि उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए, साथ ही ऐसी कृषि को बढ़ावा देना चाहिए जो पारिस्थितिकी के अनुरूप हो।
-आशीष जैन
मुंडे मुंडे नाल इश्क लडाओ...
दो जुलाई का दिन समलिंगियों के लिए तोहफा लेकर आया। समझ में नहीं आ रहा है कि ये बिरादरी एकाएक टीवी के परदों पर कैसे अवतरित हो गई। कल तक तो कोई यह बात खुले दिल से स्वीकार नहीं कर पाता था और आज एक फैसला मात्र आने से फिजा बदल गई है। केंद्र सरकार ने लाख कोशिशें की कि ये फैसला ना आए, उसने बहुत-सी दलीलें भी दीं, पर कोर्ट को उन दलीलों में कोई सार नजर नहीं आया। केंद्र ने कहा कि देश में समलैंगिकों की आबादी महज 0.3 फीसदी है। यदि समलैंगिक संबंधों को मान्यता दी गई, तो बाकी 99.07 आबादी के लिए शालीन और नैतिक जीवन जीने में बाधा पहुंचेगी। केंद्र सरकार ने धार्मिक उदाहरणों के भी बात समझाने की कोशिश की, पर कोर्ट ने कहा कि आप जाइए और वैज्ञानिक आधार लाइए। अब देश में हडकंप मचना लाजिमी था। मुल्ला-मौलवी-पंडित-पादरी, जैन गुरू सब विरोध में उतर आए। योग गुरू बाबा रामदेव और खूबसूरत तारिका सेलिना जेटली की समलैंगिकता पर तीखी नोंकझोंक भी टीवी पर आपने देखी होगी। भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी के हौसले की तारीफ करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक-दो जज हर बात का फैसला नहीं कर सकते। संसद, देश और समाज न्यायपालिका से भी ऊंचे हैं। दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले को ज्योतिष सुरेश कुमार कौशल ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, तो सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और उच्च न्यायालय में समलैंगिकों की पैरवी करने वाली नाज फाउंडेशन को नोटिस थमा दिया। मामला आगे चलता जाएगा, पर एक बात साफ है कि इससे भारतीय जनमानस की शुचिता की सीमाओं को लांघकर समलैंगिक शब्द उनकी जुबान पर चढ़ गया। सारे टीवी चैनल वालों के लिए तो यह मुद्दा टीआरपी का खजाना बन चुका था। नजारा देखिए कि टीवी पर जब से ये खबरें चली, सात समलैंगिकों की शादी के मामले देशभर में सामने भी आ गए। वाकई दो जुलाई एलजीबीटी के लिए के खुशी का दिन था। पर पहला सवाल उठता है कि ये एलजीबीटी आखिर है क्या? एल मतलब लेस्बियन मतलब दो महिलाओं के बीच यौन संबंध, जी मतलब गे मतलब दो पुरुषों के बीच यौन संबंध, बी मतलब बाइसेक्चुअल मतलब महिला और पुरुष दोनों से संबंध रखने वाले स्त्री-पुरुष और टी मतलब ट्रांसजेंडर मतलब जो पुरुष या महिला अपना सेक्स बदल लेते हैं।
आईपीसी का विवादित सेक्शन 377- जो भी स्वेच्छा से किसी व्यक्ति, महिला या पशु से कुदरती व्यवस्था के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाएगा, उसे उम्रकैद या दस साल तक के कारावास और जुर्माने की सजा दी जाएगी। यह कानून करीब 150 साल पुराना है। सन् 1861 के भारतीय दंड विधान की धारा 377 का समावेश लार्ड मैकॉले ने किया था। इस धारा के अनुसार समलैंगिक संबंध और अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करना गैर कानूनी और सजापात्र गुनाह माना गया है. धारा 377 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध [गुदामैथुन] ( स्वैच्छा से ही सही) स्थापति करता है तो यह अपराध है। 1935 में इस धारा में सुधार किया गया और इसमें मुखमैथुन भी जोड़ दिया गया।
ये है फैसला
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एपी शाह और न्यायाधीश एस मुरलीधर की खंडपीठ ने दो जुलाई को अपने फैसले के पैराग्राफ 132 में कहा कि हम घोषणा करते हैं कि भारतीय दंड विधान की धारा 377, जो एकांत में समान लिंग के व्यस्कों के बीच आपसी रजामंदी से बनाए गए संबंधों को अपराध मानती है, संविधान के अनुच्छेद 21, 14 और 15 का उल्लंघन है। लेकिन धारा 377 के तहत बिना रजामंदी के समान लिंग वालों के बीच यौन संबंध और अवयस्क के साथ यौन संबंध अपराध माने जाएंगे। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह फैसला पूरे देश में लागू होगा या सिर्फ दिल्ली में।
उच्च न्यायालय के निर्णय के मुख्य बिंदु-
धारा 377 संविधान के खिलाफ है और मानव के गौरव की रक्षा का हनन करती है।
18 वर्ष से ऊपर के समलिंगी व्यक्तियों के बीच स्थापित होने वाला यौन सबंध गैर कानूनी नही है।
वयस्क व्यक्ति आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध स्थापित कर सकते हैं।
18 वर्ष से कम उम्र के लोगों के बीच यौन संबंध मान्य नही है।
परदे के पीछे
यह फैसला 2001 में एक इतरलिंगी महिला और नाज फाउंडेशन की संस्थापिका अंजलि गोपालन के प्रयासों का नतीजा है। अंजलि ने धारा 377 के कुछ प्रावधानों को न्यायिक हस्तक्षेप से हटाने की मांग की थी। नाज फाउंडेशन ने दलील दी कि वह ऐसे समलैंगिक पुरुषों के बीच में एड्स रोकथाम कार्यक्रम चलाना चाहता है, पर उसे धारा 377 के चलते काम में दिक्कत आ रही है। 2001 में दिल्ली हाइकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। पांच साल बाद उच्चतम न्यायालय ने इसे वापस अदालत को भेज दिया। इस बार अंजलि ने आनंद ग्रोवर के नेतृत्व में लायर्स कलेक्टिव के वकीलों के मदद से जीत हासिल कर ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता पर प्रतिबंध को धार्मिक उद्धरण के जरिये न्यायोचित ठहराने के लिए पिछले 16 अक्टूबर को केंद्र सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि इसे उचित ठहराने के लिए वह कोई वैज्ञानिक रिपोर्ट पेश करे। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पीपी मल्होत्रा ने प्रतिबंध को उचित ठहराने के लिए धार्मिक उद्धरण पेश किया। मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा यह एक धार्मिक निकाय का एकतरफा बयान है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। यह धार्मिक सिद्धांत का एक हिस्सा है। हमें कुछ वैज्ञानिक रिपोर्ट दिखाई जाए, जो दर्शाए कि समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। महिला और पुरुष समलिंगियों की ओर से 15 याचिकाएं दायर कर इन कानूनों को चुनौती दी गई। इनमें उन्होंने अपनी पीड़ा का भी बखान किया है। पुलिस और दूसरे लोगों द्वारा किस तरह उन्हें उत्पीडऩ झेलना पड़ता रहा है इसका उन्होंने अपनी याचिकाओं में जिक्र किया है। बंगलौर स्थित गैर-सरकारी संगठन 'अल्टरनेटिव लॉ फोरमÓ के मुताबिक धारा 377 के कारण समलिंगियों को काफी उत्पीडऩ झेलना पड़ा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय का मानना है कि समलैंगिक कृत्य में शामिल लोगों को भारतीय समाज अपराधी मानती है इसलिए यह सार्वजनिक तौर पर नहीं हो रहा है। ऐसे में यदि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को हटा दिया जाए तो समलैंगिक कृत्य बड़े पैमाने पर होने लगेंगे। दूसरी ओर स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि आपसी सहमति के आधार पर शारीरिक संबंध बनाने वाले समलैंगिक व्यक्तियों को सजा से दूर रखा जाना चाहिए।
चाल है या सुरक्षा है
कुछ लोगों का आरोप है कि जिस नाज फाउंडेशन ने यह मामला अदालत में जीता है, उसके कर्ता-धर्ता को पुलिस ने दस साल पहले इसलिए पकड़ा था कि उन्होंने बेंगलुरू में लोगों को समलैंगिक रिश्तों का प्रशिक्षण देने के लिए बाकायदा कक्षाएं शुरू कर दी थीं। नाज फाउंडेशन देश में समलैंगिकता के प्रसार के लिए काम कर रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि समलैंगितकता को वैध बनाने के वैश्विक सेक्स माफिया काम कर रहा है। वह भारत को मैक्सिको और थाइलैंड से भी बड़ा सेक्स बाजार बनाना चाहता है। हाइकोर्ट का फैसला आते ही जिस तरह लोग खुशी में सड़कों पर उतर आए, उसके पीछे भी कोई साजिश समझी जा रही है। क्या यह वाकई कोई इतनी बड़ी बात थी कि पूरा देश में चेहरे गद्गद् हो जाएं। संस्कृति पुरोधाओं की सोच है कि सेक्स इंडस्ट्री दुनिया की तीसरी सबसे ताकतवर इंडस्ट्री है। तीन ट्रिलियन डॉलर की यह इंडस्ट्री 1985 से ही भारत को अपने कब्जे में लेना चाहती थी। पर धारा 377 उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा थी। अब इस फैसले के बाद दिल्ली, मुंबई जैसी मैट्रो सिटीज में गे-पार्लर और गे क्लब खुलने में देर नहीं लगेगी। हो सकता है, वेश्यावृत्ति को भी कानूनी दर्जा मिल जाए। जानकारों का मानना है कि इस धारा का इस्तेमाल नाबालिगों की यौन उत्पीडऩ से रक्षा करने में भी किया जाता रहा है। अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जे. एन. सल्डान्हा ने भी एक बार इस धारा का इस्तेमाल यौन उत्पीडऩ के शिकार हुए 10 साल के बच्चे को इंसाफ देने में किया था और इस मामले में दोषी पाए गए एक तांत्रिक को 10 साल की कैद व 25 लाख रुपये के जुर्माने की सजा मिली थी। न्यायाधीश सल्डान्हा ने खुद युवा वकील के तौर पर तीन दशक पहले मुंबई में लड़े गए एक केस का हवाला दिया। इस मामले में एक युवा कॉलगर्ल ने एक अरबी के खिलाफ शिकायत की थी। उस कॉलगर्ल की शिकायत थी कि अरबी नागरिक ने उसके साथ अप्राकृतिक कुकर्म कर उसे चोट पहुंचाई थी। हालांकि इस मामले में यौन संबंध सहमति से हुआ था, लेकिन वह व्यक्ति समलैंगिक प्रवृत्ति का था। कॉलगर्ल मुआवजा चाहती थी और आखिरकार उस व्यक्ति को दो लाख रुपये का मुआवजा देना पड़ा। ये तो हुई संस्कृति पुराधाओं की बातें। अब खुद समलिंगी समाज की बातों पर भी गौर कर लें। कुछ लड़के व्यस्क होने के बाद लड़कियों की तरह व्यवहार करना शुरू कर देते हैं। घरवालों को जब यह पता लगता है, तो वे उन्हें परेशान करना शुरू कर देते हैं। उनके निराशा, कुंठा घर करने लगती है। गे और लेस्बियन होना एक मानसिकता है। ऐसे में उन्हें बुरी नजरों से देखने की बजाय उनकी सोच को समझने की जरूरत ज्यादा होती है। जयपुर में समलैंगिकों के लिए पिछले डेढ़ साल से काम कर रही संस्था नई भोर गे और किन्नरों के मनोविज्ञान को समझने के लिए रिसर्च कर रही है। राज्य में लाखों समलैंगिक होने का दावा करने वाली संस्था के कार्यकर्ता बताते हैं कि हमारे पास आने वाले समलैंगिक कई तरह की समस्याएं लेकर आते हैं। समाज, घर-परिवार और कानून से जुड़े लोगों की ब्लैकमेलिंग से ये लोग परेशान रहते हैं। किसी तरह ये लोग अपने जोड़ीदार के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। कभी इनके मन में सेक्स चैंज करवाने की बात भी आती है, पर सेक्स चेंज करवाने के चलते इनमें हार्मोनल डिसऑर्डर पैदा हो सकता है। साथ ही सेक्स चैंज करवाने में खर्चा भी काफी आता है, ऐसे में ये लोग ताउम्र परेशान रहते हैं। अब कोर्ट का फैसला आने के बाद यह वर्ग खुद को कानूनी रूप से सुरक्षित महसूस कर रहा है।
पूरी दुनिया में है
26 लाख भारतीय समलैंगिकों में 25 लाख गे और एक लाख लेस्बियन हैं। महाराष्ट्र में देश के सबसे ज्यादा समलैंगिक रहते हैं। अकेले महाराष्ट्र में 48 हजार गे हैं। समलैंगिक यौनसंबंधों को कानूनी मान्यता देने वाला भारत दुनिया का 127 वां देश बन गया है। दुनिया के कई अन्य देश इसे पहले से ही मान्यता दे चुके हैं वहीं अभी भी 80 देश ऐसे हैं जहाँ यह मान्य नहीं है। तुर्की, सऊदी अरब और ईरान में यह अब भी प्रतिबंधित है। दक्षिण अफ्रीका एकमात्र ऐसा देश है, जहां संवैधानिक रूप से लैंगिक आधार पर भेदभाव की मनाही है। अमरीका के न्यूयॉर्क में वर्ष 1969 में स्टोनवाल पब में दंगे भड़के थे और इन घटनाओं को समलैंगिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष की बुनियाद माना जाता है। समलैंगिक सेक्स को मान्यता देने वाला प्रथम देश डेनमार्क था। यहां 1989 को समलैंगिंक सबंधों को मान्यता दी गई थी। इसके बाद कई अन्य यूरोपीय देशों जैसे कि नार्वे, स्वीडन और आयरलैंड ने भी इसे मान्यता दी। 2001 में नीदरलैंड ने समलैंगिक युगल को नागरिक विवाह अधिकार देकर नई प्रथा शुरू की और कई यूरोपीय देशों ने उसका अनुसरण भी किया। 16 देशों में समलैंगिक जोड़ों के संयोजन को मान्यता प्राप्त है। नीदरलैंड, बेल्जियम, स्पेन, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और नार्वे में समलैंगिक विवाह मान्य हैं। भारत जैसी दण्ड संहिता को अख्तियार करने वाले सिंगापुर ने साफ किया है कि वह अपने यहां समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से नहीं हटायेगा।
इतिहास से झांकता समलिंगी
पौराणिक इतिहास का सबसे चर्चित समलिंगी पात्र शायद शिखंडी है। भीष्म की मृत्यु में महत्वपूर्ण पात्र निभाने वाले शिखंडी का जन्म कन्या के रूप में हुआ था परंतु उसके पिता को यकीन था कि शिव के वचनानुसार शिखंडी एक दिन पुरूष बन जाएगा और उसे उसी तरह से पाला गया था। इससे शिखंडी महिला और पुरूष के बीच में पीस गया। मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की महिला समलैंगिकता पर लिखी किताब 'लिहाफÓ पर 1941 में जोरदार हंगामा हुआ था और उन पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया था। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में समलैंगिक रिश्तों का जिक्र करते हुए कई बड़े-बड़े लोगों को फटकार लगाई थी कि उन्होंने अपनी जिस्म की भूख मिटाने के लिए लड़के रख रखे हैं। कहा जाता है कि लखनऊ के कई नवाब, माइकल एंजिलो, अरस्तू, सुकरात, शेक्सपीयर, अब्राहम लिंकन, फ्लोरेंस नाइटेंगल, टेनिस खिलाड़ी मार्टिना नवरातिलोवा, हिटलर जैसे कई लोग कम या ज्यादा मात्रा में समलिंगी थे। सिकंदर और नेपोलियन की सेनाओं में ऐसे संबंध आम थे। प्रसिद्ध लेखक सलीम किदवई के अनुसार मीर तकी मीर और शरमद शाहीद जिन्हें हरे भरे शाह के नाम से भी जाना जाता है, भी समलैंगिक थे। मशहूर उर्दू शायर हाफिज फारसी कहते थे- गर आन तुर्क शीराजी बे-दस्त आरद दिल-ए-मारा, बा खाल हिंदोश बख्शम समरकंद ओ बुखारा। इसका अर्थ है- अगर यह तुर्क लड़का मेरे दिल की पुकार सुन ले, तो इसके माथे पर लगे मस्से के लिए मैं समरकंद और बुखारा कुर्बान कर दूं। शायर मीर को पढि़ए- तुर्क बच्चे से इश्क किया था रेख्ते मैंने क्या क्या कहे, रफता रफता हिंदुस्तान से शेर मेरा ईरान गया। समकालीन उर्दू कविता में इफतिखार नसीम 'इफतीÓ खुद को समलैंगिक मानते थे। हिंदी साहित्य में श्याम मनोहर जोशी में अपने लेखन में समलैंगिक संबंधों को खूब दुत्कारा है।
-आशीष जैन
चीन में दंगा
चीन मुश्किल में है। पिछली साल तिब्बत में दंगे और अब उइगरों के गढ़ शिनजियांग में मुसीबत। चीन सोच रहा है कि कम्युनिस्ट राज्य बनने की हीरक जयंती (60 साल) सकुशल पूरी हो जाए और वह दुनिया को बताए कि वह कम्युनिज्म को खुशी-खुशी अपनाए हुए है। पर मुश्किल कम नहीं हैं। दंगों पर लगाम तो कस ली गई है, पर वैश्विक स्तर पर चीन की जो किरकिरी हुई है, उसके चलते वह सोच रहा है कि क्या दमन नीति ही सर्वोच्च नीति है? चीन के शिनजियांग प्रांत की राजधानी उरुमची में हाल के दिनों में जातीय दंगे हुए। चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ को आनन-फानन में इटली से जी-5 के सम्मेलन को छोड़कर अपने देश पहुंचना पड़ा। चीनी सरकार ने दंगों पर नियंत्रण तो पा लिया है, पर इन दंगों ने दुनिया के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ये जातीय दंगे पिछले साल तिब्बत की राजधानी ल्हासा में हुए दंगों का दूसरा संस्करण मालूम पड़ते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह एक तरह से व्यापक इस्लामिक गोलबंदी के तहत किया जा रहा है। गौरतलब बात है कि कश्मीर में पकड़े गए विदेशी आतंकवादियों में शिनजियांगवासी उइगरों के नाम भी उजागर हुए। ऐसे में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
दंगे की शुरुआत
जून में हॉन्गकॉन्ग के नजदीक दक्षिणी चीन के शहर ग्वांगदांग में एक खिलौना फैक्ट्री में चीन की बहुसंख्यक हान जाति के मजदूरों ने दो उइगर मजदूरों को किसी हान महिला से बलात्कार के आरोप में पीट-पीटकर मार डाला था। इस आपसी भिडंत में 118 लोग घायल भी हुए। इसके बाद उत्साहित हान समुदाय के लोगों ने वेबसाइटों के माध्यम से उइगरों पर जीत का एलान कर दिया। हान समुदाय ने चीन के सारे उइगर समुदाय को समाप्त करने का एलान कर दिया। इससे उइगर भड़क गए। जुलाई माह में उइगर जाति के लोग उस घटना का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे और पूरे मामले की जांच की बात कह रहे थे। इस प्रदर्शन में पुलिसिया कार्रवाई और हिंसक हुई भीड़ के चलते लगभग 160 लोग मारे गए और एक हजार से ज्यादा लोग घायल हो गए। आश्चर्य की बात है कि शुरुआती लड़ाई ग्वांगदांग की खिलौना फैक्ट्री में हुई थी, जबकि इसका अंजाम ग्वांगदांग से बहुत दूरी पर स्थित शिनजियांग प्रांत की राजधानी उरुमची में देखने को मिला। कहा यह भी जाता है कि उइगरों के अलकायदा से संबंध हैं, जबकि सभी उइगर खुद को स्वतंत्र सोच के प्रजातांत्रिक व्यक्ति बताते हैं। उनके मुताबिक चीन की सरकार उन्हें अल्पसंख्यक साबित करके हमारे क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए ऐसा कर रही है। बीजिंग ओलिम्पिक आयोजन के दौरान भी उइगर कट्टरपंथियों के हमले में 17 पुलिसकर्मियों को जिंदा जला दिया गया था। इसके बाद उइगर आबादी पर चीनी सेना का दमन चक्र चला था। उस समय चीन का आरोप था कि बीजिंग ओलंपिक में बाधा डालने के लिए अमरीका ने उइगरों को भड़काया है।
उइगर और शिनजियांग प्रांत
चीन के बहुसंख्यक हान बौद्ध समुदाय और 55 अल्पसंख्यक समुदायों के बीच हमेशा तनावपूर्ण और नाजुक संबंध रहे हैं। ध्यान देने वाली बात है कि हान समुदाय चीनी आबादी का लगभग 93 फीसदी है। उइगर नेता शिनजियांग को पूर्वी तुर्किस्तान कहते हैं। यह चीन का उत्तर-पश्चिम प्रांत है। इसकी सीमाएं पाकिस्तान, भारत, अफगानिस्तान, खिरनीस्तान, कजाकिस्तान, रूस और मंगोलिया से मिली हुई हैं। यहां तुर्की भाषा से मिलती-जुलती भाषा बोली जाती है और यह प्रांत अपने आपको सेंट्रल एशिया के देशों के अधिक करीब पाता है। हालांकि शिनजियांग को स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा प्राप्त है, लेकिन चीनी अधिकारी बाहर से हान समुदाय को लाकर शिनच्यांग में बसा रहे हैं ताकि उग्यूर अपने ही प्रांत में अल्पसंख्यक हो जाएं। टकराव की असल वजह यही है। उइगर तुर्की मूल के मुसलमान हैं। शिनजियांग प्रांत में उइगर समुदार की जनसंख्या 45 फीसदी है। वहीं हान चीनी समुदाय के लोगों की जनसंख्या 40 फीसदी है। 20 वीं शताब्दी के शुरुआत में उइगरों ने आजादी का एलान किया था लेकिन यह अधिक समय तक टिक नहीं सकी और 1949 में पूर्वी तुकिस्तान पर फिर कब्जा कर लिया गया। तब से वहां बड़ी संख्या में हान चीनी लोग बसने लगे हैं। उइगर लोग अपनी पारंपरिक संस्कृति को लेकर चिंतित हैं। साल 1991 से वहां रुक-रुककर हिंसा होती रही है। चार अगस्त, 2008 में काशगार में 16 चीनी पुलिसकर्मी मारे गए। शिनजियांग प्रांत में उइगर समुदाय की आबादी लगभग 80 लाख के करीब है, वहीं प्रांत की राजधानी में हान समुदाय के लोगों की संख्या 23 लाख है। शिनजियांग चीन का 1/6 हिस्सा है और इसकी आबादी 210 लाख है। इसमें 47 देशज गुट हैं। इनमें सबसे बडा गुट 80 लाख उइगर मुस्लिमों का है। भौगोलिक रूप से कश्मीर से सटा और आकार में भारत का आधा शिनजियांग प्रांत न सिर्फ चीन के कुल क्षेत्रफल का छठा हिस्सा घेरे हुए है बल्कि तेल-गैस और धातुओं के मामले में चीनी अर्थव्यवस्था इस पर पूरी तरह निर्भर करती है।
चीन की विस्तारवादी नीति के चलते तिब्बत, हेन्नान और शिनजियांग प्रांत में भी अब धार्मिक और नस्लीय तनाव हिंसा में बदलने लगा है। जिस तरह चीन ने तिब्बत पर कब्जा करके वहां बड़ी संख्या में हान लोगों को बसाया था, उसी तरह इस बार शिनजियांग प्रांत में भी शिकायत आ रही है कि उइगरों के मुकाबले हान लोगों को बसाकर चीन सरकार उस क्षेत्र में उइगरों को अल्पसंख्यक साबित करना चाहती है।
सांस्कृतिक रूप से संपन्न
चीन में केवल एक मुस्लिम बहुल प्रांत है- शिनजियांग। यहां लगभग आधी आबादी उइगर मुसलमानों की है, जो पूर्वी तुर्किस्तानी मूल के हैं। उनके चेहरे, भाषा, खान-पान, रहन-सहन सब कुछ चीन की मुख्यभूमि के हान समाज से एकदम अलग हैं। 18वीं सदी के मध्य में चीन ने पूर्वी तुर्किस्तान पर कब्जा कर उसे शिनजियांग नाम दिया था। इसका शाब्दिक अनुवाद है-नया सीमांत। उइगरों की भाषा तुर्की परिवार की है, जो आज भी अरबी लिपि में लिखी जाती है। हालाकि चीन सरकार ने वहा उइगर भाषा ही नहीं, कुरान भी चीनी लिपि में पढ़ानी शुरू की है। काशगर यहां का मुख्य महानगर है। यह संपूर्ण क्षेत्र ग्यारह शताब्दियों तक बौद्ध मत का अनुगामी रहा। यहा हजारों की संख्या में बौद्ध स्तूप, मठ, मंदिर और अनुवाद शालाओं का निर्माण हुआ। कश्मीर से आए युवा भिक्षु कुमार जीव ने इस क्षेत्र में अपने ज्ञान और करुणा के माध्यम से बौद्ध मत का प्रसार किया। दसवीं शताब्दी के मध्य में चंगेज खान की फौजों ने बौद्ध मंदिरों को तबाह करते हुए सारी आबादी को जबरदस्ती इस्लाम मंजूर करवाया था। लुयान, कुचा के बौद्ध शिल्प और तुरपान की बौद्ध गुफाएं आज भी सुरक्षित हैं। उस समय यह क्षेत्र चीन में बौद्ध मत के प्रवेश का प्रथम द्वार था और शाति एवं अहिंसा के मंत्रों से दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कला और साहित्य के सृजन का गढ़ बना था। इस्लामी हमलावरों ने उस समय के समाज को पूरी तरह से तबाह कर दिया। बीच में बीजिंग के सम्राटों का दखल चलता रहा। कुमार जीव को बीजिंग के सम्राट ने अपने दरबार में आमंत्रित कर उन्हें 'राजगुरुÓ की उपाधि दी थी। उसी दखलंदाजी और संबंधों का हवाला देकर चीन शिनजियांग पर अपना प्राचीन नियंत्रण होने का दावा करता है। ऊरुमकी को मूल उर्वशी भी माना जाता है। शिनजियांग नामकरण से पूर्व भारतीय शास्त्रों तथा बौद्ध ग्रंथों में यह क्षेत्र 'रत्नभूमिÓ के नाम से प्रसिद्ध रहा है। यहा की स्त्रिया उर्वशी के समान सुंदर, पुरुष कद्दावर और बलिष्ठ तथा धरती रत्नगर्भा मानी गई है। चीन ने शिनजियांग के तालिबानों पर नियंत्रण के लिए पाकिस्तान पर भरोसा किया। कहा जाता है कि ओसामा बिन लादेन ने चीन सरकार को संदेश भिजवाया था कि इस क्षेत्र को अमेरिकी दखल से मुक्त रखने के लिए वह चीन के सहयोग के लिए तैयार है। शिनजियांग की प्रांतीय सरकार ने अफगानिस्तान के तालिबानों को नब्बे अरब डालर की मदद की।
रेबिया कदीर उग्रवादी या समाजसेवी
रेबिया कदीर और दलाई लामा दोनों ही चीन में अपने-अपने लोगों के हकों के लिए काम कर रहे हैं। जहां दलाई लामा तिब्बत की आजादी के लिए प्रयासरत हैं। वहीं रेबिया कदीर उइगरों के हक के लिए सोचती हैं। वे कभी चीन की सबसे अमीर महिलाओं में से एक हुआ करती थीं, पर आज उनके पास अपना एक पैसा भी नहीं है और वे अमरीका के वॉशिंगटन में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। रेबिया कदीर के यूं तो ग्यारह बच्चे हैं, पर वे एक करोड़ से ज्यादा उइगरों की मां हैं। बासठ साल की रेबिया को चीन की कम्युनिस्ट सरकार उग्रवादी के रूप में देखती है। गौर करने वाली है कि रेबिया कभी चीन की संसद की सदस्य थीं और चीन की महिलाओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व किया करती थीं। कभी उनका बहुत सम्मान करने वाली चीन की सरकार ने उन पर आरोप लगा दिया कि वे शिनजियांग प्रांत में छपने वाले स्थानीय अखबारों को वे अपने पति सिद्दीक रौजी के लिए देश से बाहर भेजती थीं। इस काम के लिए उन्हें चीन की सरकार ने छह साल के जेल में डाल दिया। पूरी दुनिया के दबाव में आकर चीन सरकार ने उन्हें बरी तो किया, पर निर्वासित जीवन जीने पर मजबूर कर दिया। अब रेबिया ने अपने जीने का एक ही उद्देश्य बना लिया है, वह है-शिनजियांग की आजादी। चीन में हान समुदाय और उइगर लोगों से बीच में हुए दंगों का आरोप रेबिया पर लगाया गया है। जिस तरह चीन में साल 2008 को तिब्बत विद्रोह के रूप में जाना गया, वैसे ही साल 2009 को उइगर विद्रोह के रूप में देखा जाएगा। चाहे चीन सरकार ने चप्पे-चप्पे पर पुलिस का पहरा तैनात करके विद्रोह को दबा दिया है, पर बगावत से यह बात तो साबित ही हुई है कि चीन दमन नीति को आज भी सर्वोपरि समझता है। रेबिया का जन्म 21 जनवरी 1947 को एक गरीब परिवार में हुआ। लॉन्ड्री के काम से अपने बिजनेस की शुरुआत करके वे एक टे्रडिंग कंपनी की मालिक बनीं। उन्होंने एक प्रोजेक्ट के तहत उइगर महिलाओं को रोजगार शुरू करने के लिए धन मुहैया कराया। 1997 के शिनजियांग के गुलजा उइगर नरसंहार के बाद वे चीनी सरकार के विरोध में उतर आईं। 1999 के आते-आते चीनी सरकार ने उन पर देशद्रोह का इल्जाम लगाकर जेल में डाल दिया। साल 2005 में उस समय की विदेश मंत्री कोंडालिसा राइस के हस्तक्षेप के चलते उन्हें रिहा किया गया। रोचक बात है कि जिस राबिया पर चीन में दंगे फैलाए जाने का आरोप लगाया जा रहा है, उन्हें 2006 में नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया। उन्हें समाजसेवा के लिए 2004 में 'राफ्टो पुरस्कारÓ से भी सम्मानित किया गया था। रेबिया ने दो शादियां की थीं। उनके दो बच्चे अभी भी जेल में हैं। वे उइगरों के हक के लिए किए जाने वाले शांतिपूर्ण संघर्ष की पक्षधर रही हैं। चीन उन पर आरोप लगाता आया है कि उनके संबंध पूर्वी तुर्किस्तान के उग्रवादी संगठन इस्लामिक मूवमेंट से है। गौर करने वाली बात है कि शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर मुस्लिमों के तुर्की से काफी गहरे सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध रहे हैं। शिनजियांग चीन में प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा स्रोत है और इसकी सीमाएं रूस, मंगोलिया, कजाकिस्तान, किरगिस्तान, तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत से मिलती हैं।
अंतरराष्ट्रीय सोच
पश्चिमी देश चीन को घेरने के लिए दक्षिणी और पश्चिमी प्रांतों तिब्बत और शिनचियांग का सहारा लेते हैं। कम्युनिस्ट चीन के संस्थापक माओत्से तुंग जो भी यह बात पता थी। तभी वे अपने देश की सबसे बड़ी समस्याओं में हान बनाम गैर हान टकराव को प्रमुख तरजीह देते थे। उन्होंने सरकार के नीति निर्देशक तत्वों में इस बात को शामिल करवाया कि किसी भी कीमत पर इनमें शत्रुतापूर्ण संबंध ना पनप पाएं। पर ऐसा ज्याादा समय तक हो नहीं पाया। जनसंख्या का अनुपात बदलते रहने से लोगों के बीच में कटुता बढ़ती ही जा रही है। शिनजियांग में किसी न किसी रूप में मुस्लिम असंतोष पनपता रहे, इसमें अमेरिका और ब्रिटेन के उन रणनीतिकारों की गहरी दिलचस्पी है जो मध्य एशिया में चीन के वर्चस्व को कम करते हुए अमेरिकी प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। माना जाता है कि पश्चिमी देश उइगरों के बड़े समर्थक हैं। तुर्की के प्रधानमंत्री एर्डोगान का बयान भी मायने रखता है कि चीन में दंगे नहीं, सामूहिक नरसंहार हो रहा है। उनका तो यहां तक कहना है कि वह रेबिया कदीर को तुर्की का वीजा देने की तैयारी कर रहे हैं।
क्या है इतिहास
चीन के कम्युनिज्म के जन्मदाता नेता माओत्से तुंग तिब्बत और शिनजियांग पर कब्जे के साथ-साथ इन दोनों क्षेत्रों के बीच में गलियारे के रूप में भारत के अक्साई चिन क्षेत्र को चाहते थे। उन्होंने ऐसा किया भी। 1949 में शिनजियांग पर कब्जा करने के एक साल बाद ही तिब्बत को चीनी शासन के अधीन ले लिया। तभी से वह भारत के 38,000 वर्ग किलोमीटर के अक्साई चिन इलाके पर अतिक्रमण करने लगा। यह क्षेत्र करीब-करीब स्विट्जरलैंड के जितना है। फिर माओ ने 1962 में भारत के साथ लड़ाई में अक्साई चिन को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया। अब चीन अक्साई चिन की कुनलुन पहाडिय़ों के जरिए तिब्बत और शिनजियांग तक पहुंचने वाले एकमात्र गलियारे पर अपना कब्जा रखता है। चीनी गणराज्य का करीब 60 प्रतिशत भूभाग ऐसा है जिस पर सीधे हान शासन नहीं चलता था। क्षेत्र के हिसाब से हान सत्ता अपने उत्कर्ष पर है। यह इस बात से पता चलता है कि चीन की दीवार चीन के बाहरी क्षेत्र के घेरे में बनाई गई थी।
तारीख पर भारी तवारीख
चीन में कम्युनिस्ट सत्ता को इस साल 60 साल पूरे हो रहे हैं। चीनी सरकार इस बार बड़ा जश्न मनाना चाहती है, ऐसे में वह किसी भी तरह के विद्रोह को दबाने के लिए तैयार है। चीन का तकरीबन 60 फीसदी भूभाग ऐसे क्षेत्रों से मिलकर बना है, जो ऐतिहासिक तौर पर हान साम्राज्य के अधीन नहीं थे। आज शिनजियांग और तिब्बत कुल मिलाकर चीन का तकरीबन आधा क्षेत्र है। इस बार 4 जून (इसी तारीख को 1989 को थियानमन चौक पर लोकतंत्र समर्थकों के मौत के घाट उतारा गया था) के बीस साल पूरे होने पर बीजिंग में बहुत तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। चीन के पूर्वी तुर्किस्तान को खुद में मिलाने के 60 बरस पूरे होने के अवसर पर उइगरों का विद्रोह एक प्रतीकात्मक संकेत देता है। चीनी सरकार भी कम नहीं है। वह 28 मार्च (तिब्बत पर सीधे शासन की घोषणा की पचासवीं वर्षगांठ) को 'गुलाम उद्धार दिवसÓ के रूप में मनाकर खुद को ऊंचा साबित कर रही है, वहीं दूसरी ओर इस बात पर भी खुश हो रही है कि चीन के कब्जे के खिलाफ तिब्बत के राष्ट्रीय विद्रोह और इसके बाद दलाई लामा के विमान से सकुशल भारत चले जाने की पचासवीं सालगिरह बिना शोर-शराबे के गुजर गए। हान समुदाय में मंचू लोगों को साथ मिलाने और स्थानीय लोगों को अंदरूनी मंगोलिया में ठूंसने के बाद तिब्बती और शिनजिंयाग के तुर्की बोलने वाले परंपरागत मुस्लिम समूह ही भिन्न समुदाय के रूप में बचे हैं। यहां पर जहां स्थानीय लोगों को छोटे-मोटे काम ही मिले, वहीं बाहर से आकर बसे हान समुदाय के लोगों को अच्छी कमाई वाली नौकरियां मिलीं।
-आशीष जैन
बलूचिस्तान के बहाने भारत पर निशाने
अच्छे-अच्छे राजनीतिज्ञों को आज तक एक बात समझ नहीं आई कि पाकिस्तान के पास इतने बेहतरीन हुक्मरान हैं, फिर भी यह देश पिछड़ा हुआ क्यों है? जब ये नेता अपनी कुटिल चालों और वक्तव्यों से पूरी दुनिया को पगला बना सकते हैं, तो खुद अपने देश का भला क्यों नहीं कर सकते? क्यों वे पाकिस्तान के विकास की गाड़ी को संभाल नहीं पाते। ताजा संदर्भ मिस्र के शर्म अल शेख में गुटनिरेपक्ष आंदोलन के 15वें शिखर सम्मेलन को लेकर है।
मानना पड़ेगा, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी बड़े कूटनीतिज्ञ हैं। भारत के भोले-भाले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन को साझा घोषणा पत्र में उलझाकर रख दिया। उन्होंने बड़ी सफाई से यह जतला दिया कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान में भारत की वजह से गड़बड़ी हो रही है। सबसे दिलचस्प बात है कि इस सबमें कश्मीर का जिक्र तक नहीं आया। पाकिस्तान से अब लगभग हर रोज बलूचिस्तान और हिंदुस्तान के झूठे गठजोड़ की खबरें आ रही हैं। दरअसल पाकिस्तान विश्व समुदाय का ध्यान मुंबई बम हमलों के आरोपियों से हटाना चाहता है और यह दिखलाना चाहता है कि वह भी आतंक से पीडि़त है। वह दुनिया की सहानुभूति बटोरना चाहता है और पीछे से मुंबई हमलों के आरोपियों को पाकिस्तान में खुली छूट देना चाहता है। यूं उसे भारत के खिलाफ आतंकियों को पोसने से कोई गुरेज नहीं है, पर जब खुद के हालात सुधारने की बात आती है, तो वह कदम पीछे क्यों हटाता है, यह समझ से परे है। पाकिस्तान की नीति रही है कि किसी भी मुद्दे पर भारत को फंसाकर विश्व समुदाय के सामने अपनी वाहवाही लूटना। यहीं भारत के नेता मात खाते हैं। वे दूरगामी सोच की बजाय मुद्दों को सतही तौर पर लेते हैं। अगर ऐसी बात नहीं होती, तो यह आसान बात नहीं थी कि भारत-पाक साझा घोषणा पत्र में बलूचिस्तान का जिक्र आ जाता और देश के प्रधानमंत्री को सबको सफाई देनी पड़ती।
धूल भरी आंधी, रेतीले इलाके, बंजर जमीन और बर्बर लड़ाकू कबीले ही बलूचिस्तान की असल तस्वीर हैं। वहां इन कबीलों का खुद का कानून चलता है। इस कानून में हाथ के बदले हाथ और सिर के बदले सिर लेने की परंपरा आम है। बलूचिस्तान पाकिस्तान का पश्चिमी प्रांत है। इसकी राजधानी क्वेटा है। यहां के लोगों की प्रमुख भाषा बलूची है। इस प्रांत में 27 जिले हैं। 1944 में बलूचिस्तान की आजादी का खयाल जनरल मनी के दिमाग में आया था, पर 1947 में ब्रिटिश सरकार के इशारे पर इसे पाकिस्तान में शामिल कर लिया गया । 1970 के दशक में बलोच राष्ट्रवाद का उदय हुआ, जिसमें बलूचिस्तान को पाकिस्तान से आजाद करने की मांग उठने लगी। यह प्रदेश पाकिस्तन के सबसे कम आबाद इलाकों में से एक है । सत्तर के दशक में यहां पाकिस्तानी शासन के खिलाफ मुक्ति अभियान भी चलाया गया था, पर उसे कुचल दिया गया । पाकिस्तान के 40 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र में फैले बलूचिस्तान में जिंदगी नरक से भी बदतर है। पर पाकिस्तान सरकार चाहती है कि किसी तरह यह इलाका पूरी तरह से उसके कब्जे में रहे। इसका कारण हैं- वहां पाए जाने वाले यूरेनियम, पेट्रोल, नेचुरल गैस, तांबा। पाकिस्तान किसी तरह से इन संसाधनों पर अपना कब्जा करना चाहता है। इसीलिए पाकिस्तान को बलूचियों की अफगानिस्तानियों से बढ़ती नजदीकियां रास नहीं आती। पाकिस्तानी सरकार के पास अभी बलूचिस्तान के पांच फीसदी हिस्से पर ही कब्जा है। बाकी के 95 फीसदी हिस्से पर कबीलों का राज चलता है। पाकिस्तान सरकार उसी हिस्से को पाने के लिए संघर्ष करती रहती है और सारे विद्रोह को भारत की कारस्तानी साबित करना चाहती है।
बलूचिस्तान के हक की बात करने वाले नवाब बुगती की मौत को बलूची लोग अभी पूरी तरह भुला नहीं पाए हैं। विद्रोही नेता अकबर बुगती को जनरल परवेज मुशर्रफ के इशारों पर सुरक्षाबलों ने 2006 में मुठभेड़ में मार गिराया। तब पूरा बलूचिस्तान में हडकंप मच गया। पाकिस्तान ने इसे दबाने की बहुत कोशिशें कीं, पर पूरी तरह बलूचियों पर लगाम नहीं लगा पाए। भारत ने 2006 में बुगती की मौत पर दुख प्रकट किया था, तो पाकिस्तान की भौंहें तन गई थीं। पर वही पाकिस्तान बलूचिस्तान की समस्या को लोकतांत्रिक तरीके से निपटाने की बजाय गोलियों के दम पर खत्म करना चाहता है। हद तो यह है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गाहे-बगाहे बता रहा है कि बलूचिस्तान में असल समस्या भारत ने पैदा की है। 1970 के दशक में बलूचिस्तान में हुए सशस्त्र विद्रोह को भी पाकिस्तान ने ईरान की मदद से कुचल दिया गया था। अब लगभग 30 साल बाद दुबारा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी पाकिस्तान सरकार को जबरदस्त चुनौती पेश कर रही है। बलूचियों का मानना है कि हम तो अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे इलाकों में पंजाबियों का प्रभुत्व बढ़े। बलूचिस्तान के लोगों के पास मूलभूत सुविधाओं की कमी है। पीने के पानी का अभाव, बच्चों के लिए स्कूल, अस्पताल से लेकर दो जून की रोटी के लिए वहां के लोग तरसते हैं। ऐसे में पाकिस्तान सरकार को चाहिए कि वह भारत पर निराधार आरोप मढऩे की बजाय अपने नागरिकों की आम जरूरतों के लिए ईमानदारी से कुछ खास प्रयास करे। तब पूरी दुनिया देखेगी कि अपने आप ही बलूचिस्तान की समस्या हल हो जाएगी। पाकिस्तान सरकार यह क्यों भूल जाती है कि उसने ही अपने कर्मों की वजह से तालिबानियों को स्वात घाटी और वजीरिस्तान सौंपे हैं। भारत तो सदैव अपने पड़ोसियों का भला चाहता है और चाहता रहेगा।
-आशीष जैन
12 August 2009
मदर इंडिया का देशवासियों के नाम खुला पत्र
धन्यवाद। मैं आज बड़ी खुश हूं। आज मेरा जन्मदिन है। मेरे हर जन्मदिन पर तुम मुझे बधाई देते आए हो। मेरा मन किया कि इस बार मैं खुद तुम्हें खत लिखूं। तुमने सदा मुझे खुशी का ध्यान रखा। तुम्हारे हौसलों की वजह से ही वक्त की आंधी में मेरे चेहरे की रंगत नहीं उड़ पाई है। कभी तुम गांधी बनकर, तो कभी भगतसिंह बनकर मेरी हिफाजत करते रहे। आज भी तुम मेरा नाम रोशन कर रहे हो, कभी रहमान, तो कभी गुलजार बनकर। मेरी बेटियां भी कमाल की हैं- सानिया, सायना, किरण, मेधा, प्रतिभा, मीरा, निरूपमा। सब मुझे कितना चाहती हैं।
जब-जब मुझ पर आंच आई, तुम सब भाई-बहनों ने एकजुट होकर दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए। तुमने आगे से किसी पर हमला न बोलने की कसम निभाई है, इस बात का मुझे बड़ा फख्र है। तुम्हारी फौलादी बाहों के घेरे में मैं खुद को बड़ा महफूज महसूस करती हूं। तुम्हारे जज्बे की रोशनी के कारण आतंक की काली छाया कभी मुझ पर हावी नहीं हो पाई। आज जब मैं चारों ओर बड़े पुल, कारखाने, इमारतें देखती हूं, तो अपने पुराने दिनों में डूब जाती हूं। किस तरह दिन-रात जुटकर तुम सबने मेरी तरक्की की नई इबारतें लिखीं।
जिंदगी उतार-चढ़ाव का नाम है। पिछले 62 सालों में मेरी जिंदगी में भी कई उतार चढ़ाव आए, पर तुमने मेरी अस्मिता- मेरी आजादी- को बचाए रखा। यूं मेरा हर बेटा मेरी बड़ी परवाह करता है। पर मुझे वल्लभ भाई पटेल की बहुत याद आती है। ताउम्र जुटा रहा कि मैं अखंड बनी रहूं। उसने देश की हर रियासत को जोड़े रखने में दिन-रात एक कर दिए। अगर वह नहीं होता, तो आज मैं न जाने कितने टुकड़ों में बंट चुकी होती। धन्य है मेरा बेटा पटेल। तुम्हारा ही भाई लालबहादुर शास्त्री कहा करता था, 'हम भूखे रह लेंगे, पर आजादी पर आंच नहीं आने देंगे।' सादगी और मेहनत की मिसाल था वह। मेरे करोड़ों बेटे-बेटियों ने मेरी सांसों की डोर को अपने नेक इरादों से थामे रखा, वरना पता नहीं मेरा अस्तित्व भी बचता या नहीं। जब होली, दीवाली, ईद पर तुम सब आपस में गले मिलते हो, मैं खुशी से फूली नहीं समाती। आज सरकार हर हाथ को रोजगार देने की बात कर रही है। सूचनाओं का लेन-देन सरल हो गया है। जिन जानकारियों को लेने के लिए पहले सालों लग जाते थे, उन्हें एक महीने में लोगों को देने के लिए हर ऑफिस पाबंद है। ये अच्छी बात है कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के चलते अमरीकी मंदी तुम्हें ज्यादा परेशान नहीं कर पाई है। आज हमारे पास विदेशी मुद्रा का बड़ा भंडार है। हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर मेरा नाम बड़ी शान से लिया जाता है। तुम्हारे मेहनत और दिमाग का लोहा सारी दुनिया मानती है। आज तुम जरूरत का हर सामान खुद बना रहे हो और दूसरे देशों को निर्यात भी कर रहे हो।
कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो मुझे परेशान करती हैं। तुम में से कुछ बड़े ओहदों पर हो, कुछ के पास देश संभालने की जिम्मेदारी भी है। फिर तुम भेदभाव क्यों करते हो। गरीब लोग भी तो तुम्हारे ही भाई हैं, ये क्यों भूल जाते हो। मिल-बैठकर कोई ऐसी योजना क्यों नहीं बनाते कि हर पेट को समय पर खाना नसीब हो सके। क्यों तुम धर्म के नाम पर दंगे करने को तैयार हो जाते हो। आरक्षण, क्षेत्रवाद और न्याय में देरी जैसी समस्याओं को मेरे ऊपर क्यों लाद रखा है? इस वजन से मैं मुक्त होना चाहती हूं। तुम में से ज्यादातर बेटे-बेटियों का एक ही जुमला है, 'सब चलता है।Ó सब चलता है कि वजह से तुम बेवजह स्वार्थी हो जाते हो। सड़क पर कचरा फैलाते हो, पेड़-पौधों को काटते हो, सावर्जनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हो, समय पर टैक्स नहीं भरते। तुम ये क्यों नहीं सोचते कि इन सबसे तुम्हारा ही नुकसान होता है। क्या मैं तुम्हारी मां नहीं हूं। क्या मां के साथ कोई खिलवाड़ करता है भला? मुझे यकीन है, तुम मेरी बात मानने की कोशिश जरूर करोगे।
तुम्हारी प्यारी,
मदर इंडिया
प्रस्तुतिः आशीष जैन
कितना बदल गया इंसान
किताबों का संसार
एक दौर था घरों में किताबें आती थीं, फिर पत्रिकाएं आना शुरू हुईं और अब सिर्फ अखबार रह गए हैं। वह भी सुबह के दो घंटे के बाद रद्दी हो जाता है। गीता प्रेस, गोरखपुर की 'कल्याण', गायत्री परिवार की 'अखंड ज्योति' को पढऩे की होड़ खत्म हो गई है। आज फैशन और फिल्मी मैगजींस को देखने और उन जैसा बनने का क्रेज है। अब रवींद्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि', हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला', जयशंकर प्रसाद की 'कामायिनी', प्रेमचंद्र के 'बड़े भाईसाहब' को भूलकर बच्चे-बच्चे की जुबान पर जे. के. रॉलिंग की 'हैरी पॉटर सीरिज', चेतन भगत की 'द फाइव प्वाइंट समवन', रॉबिन शर्मा की 'द मॉन्क हू सोल्ड हिज फरारी', अरूंधती राय की 'द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स' और सलमान रुश्दी की 'मिडनाइट चिल्ड्रन' चढ़ चुकी हैं।
मेल-मिलाप का तरीका
पहले शादी की हर रस्म में पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता था, अब लोग सिर्फ स्वभोज निमंत्रण की तारीख ही याद रखते हैं। मेहंदी से लेकर ढोलक, दूल्हे की शेरवानी से लेकर दुल्हन के लहंगे तक सब कुछ रेडिमेड आता है। शादी कुछ घंटों का खेल बनकर रह गई है। पहले अपनी बातें कहने के लिए मंच का इस्तेमाल किया जाता था, भीड़ जुटती थी, सभाएं होती थीं। आज बंद कमरों में कंप्यूटर्स के सामने बैठकर इंटरनेट के सहारे क्रांति की योजनाएं बनाई जाती हैं। युवा चैटिंग करते हैं, नेटीजन ब्लॉगियाने लगे हैं। श्रोतागण टिपयाते हैं। ऑरकुट और फेसबुक के वर्चुअल वल्र्ड में डूबने से लोगों को पता रहता है कि लंदन में बैठा उनका दोस्त क्या खा रहा ह। पर उन्हें यह नहीं पता कि पड़ोसी किस बीमारी से अस्पताल में भर्ती है।
कॅरियर और शिक्षा की भूलभुलैया
पाठशाला कब प्ले स्कूल में बदली, पता ही नहीं लगा। आज केजी में भी बच्चों की मैरिट लिस्ट बनती है। 80 फीसदी से नंबर कम आने पर माता-पिता बच्चे को एडमिशन फीस, ट्यूशन फीस सब कुछ याद दिला देते हैं। पहले समाज सेवा के लिए लोग नौकरियां छोड़ देते थे। आज समाज सेवा में युवाओं को कॅरियर नजर आने लगा है। आज समाज सेवा के अवसर कम हैं और स्वयंसेवी संगठन ज्यादा हैं। बाबू और मास्साब बनाने की बजाय युवा मीडिया, टीवी, रैंप पर जाकर चमकना चाहते हैं। सेना के पद रिक्त हैं और एमबीए के लिए कॉलेजों में मारामारी है। राजनीति भी कॅरियर बन गया है। इसमें पहले समाजसेवी आए, फिर वकीलों का दबदबा रहा। धीरे-धीरे धन्ना सेठ और अपराधी आने लगे। लेटेस्ट ट्रेंड युवाओं, महिलाओं और प्रोफेशनल्स का है।
सेहत का हाल
पहले तुलसी, नीम, हल्दी और फिटकरी जैसी घरेलू चीजों से हर बीमारी का इलाज हो जाता था। अब एम्स में भी लंबी कतार है। पहले मलेरिया और हैजा जैसी बीमारी का नाम सुनकर भी डर लगने लगता था। अब एड्स, कैंसर के ही न जाने कितने रूप पनप चुके हैं। फास्ट फूड खाते-खाते डायबिटीज और मोटापे की समस्या आईं और स्टेटस सिंबल बन गईं। कसरत धीरे-धीरे जिम में बदल गई। अब सफाई ज्यादा है, पर हम बीमार जल्दी पड़ते हैं। मिट्टी में खेलकर बड़े होने वाले मिट्टी में कीटाणु बताने लगे।
फिल्म और टीवी का क्रेज
पहले 'राजा हरिशचंद्र', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम' जैसी फिल्में थीं। लोग परिवार के साथ 'जय मां संतोषी' फिल्म देखने जाते थे और टॉकिज के बाहर चप्पलें उतारते थे। आज 'भूत', 'डर', 'अज्ञात' फिल्में देखने के लिए दोस्त या प्रेमिका के साथ मल्टीप्लैक्स में जाते हैं और हाथों में होता है- पॉपकार्न का पैकेट। पहले हीरो 'लार्जर देन लाइफ' हुआ करता था। अब फिल्म का कोई भी किरदार हीरो बनकर सामने आ सकता है। फिल्में सच्चाई के ज्यादा करीब बनने लगी हैं। 'हम लोग', 'बुनियाद', 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' हकीकत में बदलकर 'सच का सामना' और 'राखी का स्वयंवर' जैसे रिएलिटी शो के रूप में लोगों को मनोरंजन (?) कर रहे हैं। बीच में सास-बहू मार्का सीरियल्स, लॉफ्टर शोज और पैसा बनाओ शोज ने भी लोगों को बांधे रखा। दूरदर्शन पर खबरें देखने वालों को 'अब तक' चाहिए। सैटेलाइट चैनल्स और एफएम बिना किसी नियंत्रण के ऊलजलूल तरीके से सब कुछ दर्शकों को दिखा रहे हैं। वाकई सब कुछ...
पैसे की माया
पहले रूपए-पैसे का सारा हिसाब-किताब घर के बड़े करते थे। आज बच्चों का भी बैंक में अकाउंट खुला है। पहले पैसा जमा कराने के लिए डाकघर में लाइन लगती थी। अब थोड़ा सा पैसा पास में आते ही शेयर बाजार की तरफ भागते हैं। पहले लोग कहते थे कि ज्यादा पैसा जेब में नहीं होना चाहिए, कोई चुरा लेगा। आज प्लास्टिक के क्रेडिट कार्ड में लाखों रुपए घुस गए हैं। गली-गली में एटीएम हैं। हां, नकली नोट भी आसानी से मिल जाएंगे। सारे लेन-देन ई... ई... ईलेक्टोनिक हो गए हैं। पहले लोग ताजा माल के लिए दूसरे शहर भी चले जाया करते थे। अब आलम यह है कि जेब भरकर मॉल में घुसो और पाउच और सैशे में सामान घर ले आओ। नकली-असली कोई नहीं देखता। दवा से लेकर दारू तक कुछ भी नकली हो सकता है। पहले सेठ-साहूकारों से मुश्किल से पैसा मिल पाता था, अब आपको पैसा देने के लिए सब तैयार हैं। चारों तरह लोन मिल रहा है। हां, वसूली का ध्यान रखिएगा...
फैशन और सफरकी चाहत
पहले शादी-समारोह में ही अच्छे कपड़े पहने जाते थे। आज सोते समय भी स्टाइलिश ट्राउजर चाहिए। महिलाएं सोलह शृंगार का मतलब ज्यादा गोरा होने से लगा रही हैं। पहले कपड़ों से संस्कृति झलकती थी और आज नाभि। 'मोटा पहनो' अब 'पारदर्शी पहनो' में बदल चुका है। अब मन की सुंदरता की जगह तन की चमक को तरजीह दी जाती है। बैलगाडिय़ों के बाद जब शुरू में रेलगाड़ी आई, तो उसमें बैठने से लोग कतराते थे, आज हम मेट्रो ट्रेन में लटकर सफर करने को तैयार हैं। बीच में 'हमारा बजाज' के चलते सबको स्कूटर रास आने लगे। समय के साथ हाई-फाई मोटरबाइक्स और कारें आईं। अब लोगों को नेनो का शगल है। पर फिर भी लोग एक दूसरे से मिलने से कतराते हैं। मोबाइल फोन झूठ बोलने का साधन बन चुका है।
-आशीष जैन
लोकतंत्र की दीवानी सू की
1945 में 19 जून को रंगून में एक सितारा जमीन पर उतर चुका था। ऊपरवाले ने पहले ही उसकी किस्मत में लिख दिया था कि उसे जीवनभर अपने देश के नागरिकों के हक की लड़ाई लडऩी है और लोकतंत्र का अगुआ बनना है। पति कैंसर की बीमारी से जूझते हुए गुजर गए, पर वे अपने संघर्ष की धार को कम नहीं करना चाहती थीं, इसलिए अपने पति को संभालने भी नहीं गईं। पिछली साल म्यांमार में आए नरगिस तूफान से सू की का घर तबाह हो गया। अब उनके अस्थायी घर में रोशनी नहीं रहती और वे रात को अपना ज्यादातर समय मोमबत्तियों के बीच गुजारती हैं। उन्होंने छोटी सी उम्र से ही तय कर लिया था कि वे म्यांमार में लोकतंत्र की एक ऐसी लड़ाई लडऩे जा रही हैं, जिसमें घर-परिवार सब कुछ छूट सकता है। उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया और जुटी हुई हैं अपने मिशन पर।
छोटे कदम बड़ा संघर्ष
बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। उनके पिता की हत्या कर दी गई। कई मुश्किलों के बीच उनकी मां खिन की ने रंगून में सू की और उसके दो भाइयों आंग सांग लिन और आंग सांग ओ का लालन-पालन किया। थोड़ी बड़ी हुई थीं कि आठ साल की छोटी उम्र में उन्हें अपने प्यारे भाई आंग सांग लिन की मौत का सदमा झेलना पड़ा। बड़ा भाई भी आंग सांग ओ भी उन्हें छोड़कर कैलिफोर्निया में जा बसा। लंदन से पढ़ाई करके लौटने के बाद 1988 में सू की वापस बर्मा लौटी और लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने लगीं। नब्बे के दशक में हुए चुनावों में सू की की पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की, सारी दुनिया को लगा कि सू की का संघर्ष अपनी मंजिल पा गया है। पर उनके समर्थकों को शायद यह पता नहीं था कि असली लड़ाई शुरू ही तब हुई थी। इस जीत के बाद तय था कि अब म्यांमार की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आंग सांग सू की बैठेंगी। पर सैन्य शासकों ने सत्ता छोडऩे से इंकार कर दिया था और सू की को घर में ही नजरबंद कर दिया था। सू की घबराई नहीं और पूरी दुनिया को संदेश देती रहीं कि वे अपनी आखिरी सांस तक हार नहीं मानेंगी।
पति से मिलीं सिर्फ पांच बार
1995 का क्रिसमस वे शायद ही भूला पाएं, इसी दिन उनकी और पति मिशेल की आखिरी मुलाकात हुई थी। इसके बाद वे कभी नहीं मिले। परेशानियां ने फिर भी सू की का पीछा नहीं छूटा। कुछ समय बाद मिशेल को प्रोस्टेट कैंसर हो गया, तब भी बर्मा के तानाशाहों ने उन्हें सू की से मिलने के लिए वीजा जारी नहीं किया। उस समय सू की अस्थायी तौर पर नजरबंदी से मुक्त थीं, वे अपने पति से मिलने लंदन जा सकती थीं, पर उन्होंने सोचा कि अगर वे पति की तबियत की चिंता के चलते एक बार देश से बाहर निकल गईं, तो सैन्य शासक उसे वापस देश में घुसने की इजाजत कभी नहीं देंगे। 1999 आते-आते उनके पति मिशेल की मौत हो गई। दुखद बात यह रही कि उनका निधन अपने 53वें जन्मदिन पर हुआ। सू की के संघर्ष में मिसाल है कि 1989 में पहली बार घर में नजरबंदी के बाद 1995 को क्रिसमस की आखिरी मुलाकात तक, वे अपने पति से सिर्फ पांच बार मिल पाईं। उनके दोनों बच्चे भी उनसे दूर यूनाइटेड किंगडम में रहते हैं।
संघर्ष लहू बनकर दौड़ता है
नाम भी दिलचस्प है आंग सांग सू की का। उनके नाम में 'आंग सांगÓ शब्द उनके पिता, 'सूÓ उनकी दादी और 'कीÓ उनकी मां के नाम से लिया हुआ है। 64 साल की आंग सांग सू की के पिता ने 'मॉर्डन बर्मा आर्मीÓ की स्थापना की और 1947 में यूनाइटेड किंगडम से बर्मा को आजादी दिलाने में अपना योगदान दिया, तो मां भी बर्मा की राजनीति में जाना-माना चेहरा रहीं। जी हां, इसी वजह से आंग सांग सू की की रगों में ही संघर्ष लहू बनकर दौड़ता है। 1960 में उनकी मां भारत और नेपाल में बर्मा की राजदूत नियुक्त की गईं। उस दौरान आंग सांग सू की भी भारत में रहीं और उन्होंने नई दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से 1964 में राजनीति में एक डिग्री के साथ अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद भी पढ़ाई का सिलसिला चलता रहा और 1969 में सू की ने ऑक्सफोर्ड से दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र में बीए और 1985 में लंदन यूनिवसिर्टी से पीएचडी पूरी कर ली। लंदन में रहने के दौरान उनकी मुलाकात डॉ. मिशेल एरिस से हुई और फिर शादी। सू की की दो बेटे हैं- एलेक्जेंडर एरिस और किम। सू की को उनके प्रयासों के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं। 1991 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1992 में भारत सरकार ने उनके शांतिपूर्ण संघर्ष के लिए 'जवाहर लाल नेहरू शांति पुरस्कारÓ दिया।
तानाशाही को पसंद नहीं रिहाई
म्यांमार में पिछले 47 सालों से फौजी हुकूमत है। महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाली सू की भी उनकी तरह अहिंसा के रास्ते पर चलकर अपने देश को सैन्य शासन से मुक्ति दिलाना चाहती हैं। सू की को बगैर सरकार की इजाजत के किसी को उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी जाती। उनकी टेलीफोन की लाइन को भी काट दिया गया है। इस साल मई में सू की की नजरबंदी का समय पूरा हो गया था। पर सैन्य सरकार ने सू की पर आरोप लगा दिए कि उन्होंने नजरबंदी के कानून का उल्लंघन किया है। कानून के मुताबिक उनके साथ रहने वाली दो महिलाओं के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति उन तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल हाल ही एक अमरीकी व्यक्ति ने किसी तरह सू की के घर पर पहुंचने की कोशिश की थी। अब तानाशाह इसी बात को मुद्दा बनाकर सू की को पांच सालों की जेल कराना चाहते हैं, ताकि अगले साल होने वाले चुनावों में सू की और उनकी पार्टी 'नेशनल डेमोक्रेसी लीगÓ का कोई दखल न रह जाए।
- आशीष जैन
07 August 2009
सलामत रहे मेरा वीरा
'चंदा रे मेरे भैया से कहना, बहना याद करे...' दलबीर कौर के मोबाइल फोन पर बजती कॉलर ट्यून बरबस ही भाई-बहन के प्यार की याद दिलाती है। पाकिस्तान के जेल में बीस सालों से कैद है सरबजीत सिंह। इधर बहन दलबीर जी-जान से जुटी है कि उसकी फांसी की सजा माफ हो जाए। दलबीर बार-बार कहती है, 'मेरा भाई आतंकी नहीं है, उसको फंसाया गया है, वो बेकसूर है। पाकिस्तान सरकार उसे मंजीत बताकर झूठे केस में फंसा रही है।'
कोई बहन अपने भाई से न बिछुड़े
पिछले बीस सालों से दलबीर हर बरस रक्षाबंधन की थाली सजाती है, राखी खरीदती है, वीरा की पसंदीदा मिठाई भी खरीदती है, पर कलाई की जगह उसकी तस्वीर को राखी बांधकर दिल को दिलासा देती है। जब दलबीर का दबा हुआ दर्द आंसुओं की धार में बहता है, तो वे रुंधे हुए गले से कहती हैं, 'जब भाई साथ में था, तो मैं राखी से एक दिन पहले ही बाजार से राखी और मिठाई खरीद लाती थी, गुझिया बनाती थी। मैं उससे कहा करती थी कि जब तक मैं राखी न बांध दूं, कुछ मत खाना। उस दिन सरबजीत जानबूझकर मुझे परेशान करने और चिढ़ाने के लिए शोर मचाता रहता कि 'दीदी जल्दी राखी बांधो, मुझे बहुत भूख लगी है।'
18 साल की जुदाई, 48 मिनट का मिलन
पिछले 24 अप्रैल को अपने वीरा के साथ पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बिताए 48 मिनट आज भी दलबीर की स्मृतियों में हैं। सरबजीत की यादें लेकर जब परिवार लौट रहा था तो कुछ आंसू खुशी के थे, तो कुछ गम के। उनकी दोनों बेटियों पूनम और स्वप्निल, पत्नी और बहन दलबीर कौर के लिए वे पल सपनों जैसे थे। सलाखों के एक ओर सरबजीत था और दूसरी ओर बहन दलबीर और पूरा परिवार। रक्षाबंधन के त्योहार पर दलबीर हर बार सरबजीत की राखी को सहेज कर रख लेती थी। उसे आस थी कि एक न एक दिन वह इन राखियों को भाई की कलाई पर जरूर बांधेगी। जेल में दलबीर अपने साथ पिछले 18 सालों की 18 राखियां लेकर गई थीं। जब दलबीर राखी बांधने लगी, तो सरबजीत ने पूछा- इतनी राखियां? फिर बचपन की तरह उन पर झपट पड़ा। उसने वीरा की कलाई पर 18 राखियां बांधीं और हाथ को चूमा, तो सभी भावुक हो गए। सरबजीत के गालों पर मोटे-मोटे आंसू भरभरा गए। वो बोला, 'बहना, हिम्मत रख। मैं बेकसूर हूं, मैं वापस जरूर आऊंगा। आज तो मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है। सिवा शुभकामना के मैं क्या दे सकता हूं।' फिर सरबजीत ने खुद अपने हाथों से चाय बनाई। जब सरबजीत ने अपनी बेटी को देखा, तो उसके मुंह से पहला शब्द निकला, 'पूनम मेरी बेटी...' और फिर एक बेटी अपने बाप से लिपट गई। लेकिन बाप बेटी के बीच सलाखें थीं, इसलिए पूनम ठीक से अपने पापा के गले नहीं मिल सकी। अठारह सालों की जुदाई में मिलन के 48 मिनट कब गुजर गए, पता ही नहीं लगा। जब विदाई का वक्त आया, तो बहन की आंखें छलछला उठीं, सब बिलख उठे।
दीवारों से बातें करता होगा
दलबीर बार-बार खुद से सवाल करती हैं, 'एक छोटी-सी कोठरी में मेरा भाई धरती पर कैसे सोता होगा, वहां तो न सोने के लिए बिस्तर है, न ओढऩे के लिए चादर। बस चारों ओर तन्हाई पसरी रहती है। जब हमारी याद आती होगी, तो दीवारों से बातें करता होगा। मैं तो इसी आस में जिंदा हूं कि एक दिन वो लौटकर घर आएगा और हमारा घर खुशियों से चहकेगा। पिछली राखी पर पाकिस्तान सरकार ने मुझे वीजा नहीं दिया था, पर इस बार मुझे उम्मीद है कि मैं पाकिस्तान जाकर अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने की तमन्ना जरूर पूरी करूंगी।'
- अमलेंद्रु उपाध्याय के साथ आशीष जैन का राखी पर छोटा सा प्रयास
06 August 2009
हिंदुस्तानी रंग हैं प्रिय
बकौल फैशन डिजाइनर तरुण ताहिलियानी हिलेरी हमेशा इस बात का ध्यान रखती हैं कि कहां-क्या पहनना चाहिए। अगर वे किसी राजनीतिक मुलाकात के लिए निकलती हैं, तो उनके कपड़ों में सादगी और सौम्यता रहती है, वहीं पार्टीज और हॉलीडे पर जाते वक्त वे कूल डे्रस प्रिफर करती हैं। जब भी वे भारत की यात्रा पर होती हैं, तो उनके सिंगल टोन सूट्स की बहार देखते ही बनती है। फैशन डिजाइनर डेविड अब्राहम का मानना है कि वे अपने पहनावे में गजब के इमेजिनेशन का इस्तेमाल करती हैं। चाहे वे पश्चिमी संस्कृति के कपड़े पहनती हों, पर उन्हें पहनने का अंदाज वाकई तारीफ के काबिल है।
इकसठ साल की हिलेरी जब अपने पति और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ भारत दौरे पर आई थीं, तब भी उनके स्टाइलिश कपड़ों से सभी इंप्रेस थे। इस बार की यात्रा के दौरान उनके चमकदार बंद गले के बिजनेस सूट और गले में पतले प्लेटिनम-गोल्ड नेकलैस ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। डे्रसेज का चुनाव करते वक्त वे अपनी हेयर स्टाइल का भी बहुत खयाल रखती हैं। अपने पहनावे से वे एक असर छोड़ती हैं और जतलाती हैं कि वे निर्भीक और बुलंद इरादों की महिला हैं। उनकी मुस्कान उनके पहनावे में चार चांद लगा देती है।
कॉलेज के दिनों में वे स्कर्ट, शार्ट फ्रॉक और डेनिम पसंद करती थीं। बाद में वे डोन्ना कारान और ऑस्कर डेला रेंटा के डिजाइन किए हुए लॉन्ग स्लीव्स, हाई कॉलर्स और नेकलाइन ज्वैलरी प्रिफर करने लगीं। शादी के वक्त उनका पहना सफेद गाउन रिश्तों के लिए उनके समर्पण को दर्शा रहा था। 1983 में जब उन्होंने ब्ल्यू हैट के साथ मेजंटा और व्हाइट चैक्ड शर्ट पहनी, तो सबकी तारीफें बटोरीं। उनका मानना है कि वे अपने पहनावे के प्रति सजग है और लगातार इसमें बदलाव की हिमायती हैं।
-आशीष जैन
05 August 2009
उइगरों की रेबिया
मानवाधिकार के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने के लिए उन्हें 2004 में 'राफ्टो पुरस्कारÓ से सम्मानित किया गया। उइगर लोग संघर्ष करते वक्त उनकी तस्वीरें हाथों में लिए होते हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी के छह साल चीन की जेल में गुजारे हैं। बच्चों की शिक्षा के लिए वे अपने डिपार्टमेंटल स्टोर के कमरों में क्लासेज चलाती थीं। उन्होंने उइगर महिलाओं को खुद का रोजगार विकसित करने के लिए 'थाउजेंड मदर मूवमेंटÓ चलाया। हम बात कर रहे हैं रेबिया कदीर की।
वे कभी चीन की सबसे अमीर महिलाओं में से एक हुआ करती थीं, पर आज उनके पास अपना एक पैसा भी नहीं है और वे अमरीका के वॉशिंगटन में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। हान जाति और शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर जाति के बीच में हुए दंगों के सरकार उन्हें जिम्मेवार ठहरा रही है।
उइगरों की मां
रोचक बात है कि जिस राबिया पर चीन में दंगे फैलाने का आरोप लगाया जा रहा है, उन्हें 2006 में नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। उसी साल म्यूनिख में उन्हें 'विश्व उइगर कांग्रेस' का चेयरमैन बनाया गया है। वे एक करोड़ से ज्यादा उइगरों की मां मानी जाती हैं। गौर करने वाली है कि रेबिया कभी चीन की संसद की सदस्य थीं और चीन की सरकार ने एक समय उनके कामों की सराहना की थी और 1992 में उन्हें 'पालिटिकली कन्सलटेटिव कांग्रेसÓ का सदस्य नियुक्त किया गया था। साथ ही 1995 में यूनाइटेड नेशंस के महिलाओं पर हुए चौथे विश्व सम्मलेन में वे चीन की तरफ से भेजे गए डेलीगेट्स में एक सदस्य थीं। उसी चीन की सरकार ने उन पर आरोप लगा दिया कि वे राष्ट्र विरोधी कामों में संलग्न हैं। देशद्रोह के आरोप लगाकर चीन की सरकार उन्हें छह साल के जेल में डाल दिया। पूरी दुनिया के दबाव में आकर चीन सरकार ने उन्हें बरी तो किया, पर निर्वासित जीवन जीने पर मजबूर कर दिया।
संघर्ष से संवारी जिंदगी
रेबिया का जन्म 21 जनवरी 1947 को एक गरीब परिवार में हुआ। पर वे शुरु से ही संघर्षशील महिला रहीं। लॉन्ड्री के काम से अपने बिजनेस की शुरुआत करके वे एक टे्रडिंग कंपनी की मालिक बनीं। उन्होंने एक प्रोजेक्ट के तहत उइगर महिलाओं को रोजगार शुरू करने के लिए धन मुहैया कराया। 1997 के शिनजियांग के गुलजा उइगर नरसंहार के बाद वे चीनी सरकार के विरोध में उतर आईं। 1999 के आते-आते चीनी सरकार ने उन पर देशद्रोह का इल्जाम लगाकर जेल में डाल दिया। साल 2005 में उस समय की अमरीकी विदेश मंत्री कोंडालिसा राइस के हस्तक्षेप के चलते उन्हें रिहा किया गया। उन्होंने दो शादियां की। रेबिया के ग्यारह बच्चे हैं। उनके दो बच्चे अभी भी जेल में हैं। वे उइगरों के हक के लिए किए जाने वाले शांतिपूर्ण संघर्ष की पक्षधर रही हैं।
-आशीष जैन
दोस्त दोस्त ना रहा
जिंदगी की कड़ी धूप में दोस्ती के नाजुक फूलों को मुरझाने बचाओ, वरना दिल की बगिया सूनी हो जाएगी। पेश हैं दोस्ती की कुछ ऐसी मिसालें, जो वक्त की धूप में धूमिल हो चुकी हैं।
'दीए जलते हैं, फूल खिलते हैं, बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं...' आनंद बख्शी ने जब यह गीत लिखा होगा, तो शायद उनका मन जमाने में सबसे अच्छे दोस्त की खोज में भटक रहा होगा। वाकई अच्छे और सच्चे दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। दोस्ती निभाते वक्त कई बार आप-हम मुश्किल दौर से गुजरते हैं, डर लगता है कि दोस्ती का दीया वक्त की आंधी में बुझ ना जाए। ऐसे में विश्वास की ओट काम आती है और दोस्ती की लौ को और तेज कर देती है। अगर यह जज्बा हर किसी के दिल में उतर जाएगा, तो फिर किसी को ना कहना पड़े- दोस्त दोस्त ना रहा।
मेरे पास दोस्त था (जावेद अख्तर-सलीम खान)
सबसे ज्यादा मेहनताना, सबसे ज्यादा सम्मान और सबसे गहरी दोस्ती... संघर्ष की आंधियों से लड़ता एक एक्टर सलीम जब हजारों लेखकों के बीच में खुद को साबित करने को बेताब लेखक जावेद से मिलता है, उसी दिन यह तय हो जाता है कि विचारों की नाव कल्पना के समंदर में तैरने को तैयार है। जावेद अख्तर और सलीम खान फिल्मी स्क्रिप्ट और संवाद लिखना शुरू करते हैं, तो दुनिया को 'शोले', 'दीवार', 'शक्ति' जैसी फिल्मों का नायाब तोहफा मिलता है। एक टीम के रूप में वे सफलता के हर शिखर को छूते चले जाते हैं। एकाएक जावेद और सलीम की जिंदगी में भूचाल-सा आता है और उनकी राहें जुदा होने लगती हैं। कुछ कहते हैं कि जावेद की जिंदगी में शबाना के आने से ये सब हुआ, वहीं दूसरी ओर यह आवाज भी सुनाई देती है कि सलीम को जावेद का गीत लिखना पसंद नहीं था। जब वे जोड़ी के रूप में संवाद लिखते हैं, तो गीतकार के रूप में जावेद के अकेले का नाम क्यों आए? उनके अलगाव ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को चौंका दिया। अक्सर दोनों कहते हैं, 'क्या अब भी वो मेरे बारे में पूछता है?'
यारी का कठिन खेल (लिएंडर पेस-महेश भूपति)
टेनिस के पैशन की परिभाषा समझनी है, तो लिएंडर पेस और महेश भूपति को जानना जरूरी है। जब इन दोनों खिलाडिय़ों की जोड़ी मैदान पर उतरती है, तो देश को पुरस्कार की आशा बंधने लगती है। 1999 दोनों के कॅरियर के लिए एक शानदार साल था, जब ये जोड़ी टेनिस के चारों ग्रैंडस्लैम्स के फाइनल में पहुंची और विंबलडन और फ्रेंच ओपन जीतकर देशवासियों की झोली में खुशियां भर दीं। उस दौर में सफलता के सबसे ऊंचे पायदान पर चढ़कर वे देश में खूब लोकप्रिय हुए, मैग्जींस के कवर पर छाने लगे, टीवी कार्यक्रमों में अपनी बातें करने लगे। एकाएक न जाने किसकी नजर उन्हें लगी कि दोनों की सफलता के बीच में अहंकार आड़े आ गया। दोनों अपने कोचों को लेकर झगडऩे लगे। 2006 के आते-आते दोनों के बीच रंजिश बढ़ चुकी थी। जल्द ही दोनों खिलाडिय़ों ने फैसला कर लिया कि अब वे एक साथ कभी नहीं खेलेंगे, हालांकि वे बीजिंग ओलंपिक में साथ खेले, पर वहां भी एक-दूसरे को समझने की बजाय कलह बढ़ता ही गया। अब खेलप्रेमियों को शायद ही उनकी जोड़ी एक मैदान पर देखने को मिले।
कहां गुम हुआ याराना... (बच्चन-गांधी परिवार)
एक तरफ फिल्म इंडस्ट्री का बेताज बादशाह है, तो दूसरी ओर हिंदुस्तानी सियासत का सबसे ताकतवर परिवार। आज से लगभग चार दशक पहले इलाहाबाद के बच्चन और गांधी परिवार की दोस्ती मशहूर थी। हरिवंशराय बच्चन और तेजी बच्चन दिवगंत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत निकट थे। कहा तो ये भी जाता है कि संघर्ष के दिनों में अमिताभ को फिल्म इंडस्ट्री में सैट करने के लिए इंदिरा गांधी ने पत्र तक लिखे थे। यह जोड़ उस वक्त सीमेंट की तरह मजबूत हो गया, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अमिताभ ने हेमवतीनंदन बहुगुणा को हराकर राजनीति में प्रवेश किया। समस्या तब खड़ी हुई, जब बोफोर्स दलाली कांड के चलते प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर आंच आई और अमिताभ भी इससे अछूते नहीं रहे। अमिताभ को लगा कि राजनीति उनके लिए नहीं बनी है और उन्होंने सांसद के पद से इस्तीफा दे दिया। 1991 में राजीव की हत्या के बाद बच्चन और गांधी परिवार की खाई गहरी होती गई। तभी बच्चन की जिंदगी में मुलायम सिंह और अमर सिंह का आना हुआ। 'एबीसीएलÓ की विफलता के बाद अमर सिंह के सहयोग से अमिताभ खुद को संभाल पाए। अमिताभ की प्राथमिकताओं में कांग्रेस की बजाय समाजवादी पार्टी आ गई। गांधी-बच्चन परिवार कभी खुलकर एक-दूसरे के विरोध में नहीं आए, पर जया बच्चन ने जब कहा, 'गांधी परिवार मेरे पति के साथ ठीक नहीं कर रहा।', तो राहुल गांधी का जवाब था, 'पूरा देश जानता है कि किसने किसे छोड़ा।'-
दो अलबेली सहेलियां (क्वीनी ढोढी और अंजु तारपोरेवाला)
पूर्व मिस इंडिया क्वीनी ढोढी और थिएटर कलाकार तथा सोशलाइट अंजु तारपोरेवाला मुंबई में अपनी दोस्ती के लिए मशहूर थीं। एक-दूसरे के घर को अपना समझने वाली क्वीनी और अंजु की जिंदगी अच्छी चल रही थी, तभी उनकी जिंदगी में जलजला आया। चारों ओर अफवाह ने जोर पकड़ लिया कि अंजु के पति फरहाद तारपोरेवाला और क्वीनी के बीच अफेयर है। क्वीनी ने एक मैग्जीन को दिए इंटरव्यू में इस बात को पुख्ता कर दिया। दोनों परिवारों की ओर से समझाइश की कोशिशें की गईं, पर बात नहीं बनीं। क्वीनी के पति राजा को तो एक झटका लगा, पर अंजु ने तो अपना पति और सबसे अच्छी दोस्त दोनों को खो दिया। अंजु अपनी आंखों के सामने यह सब होता देख रही थीं, पर फिर भी उन्होंने खुद को संभाल लिया। अब अंजु दुबारा से थिएटर के काम में लग गई हैं। वहीं फरहाद और क्वीनी अब साथ-साथ पार्टियों में और मूवीज जाते हुए नजर आने लगे हैं। हाल ही क्वीनी की नई ज्वैलरी लाइन के लॉन्च के मौके पर दोनों साथ ही थे।
-आशीष जैन
29 July 2009
निरूपमा का जवाब नहीं
एक ओर विदेश सेवा के संजीदा काम की धूप और दूसरी ओर काव्य और संगीत की ठंडी छांव। जब ये धूप-छांव मिलती हैं, तो ऐसे व्यक्तित्व का सृजन होता है, जो हर परिस्थिति में उचित निर्णय लेता है। देश की नई विदेश सचिव निरूपमा राव की यही खूबी उन्हें भीड़ से जुदा करती है। वे 1973 बैच की आईएफएस टॉपर हैं। 21 साल की उम्र में विदेश सेवा से जुडऩे वाली निरूपमा को विदेश मंत्रालय की पहली महिला प्रवक्ता होने का गौरव हासिल है।
संवेदनाओं से लबरेज
वे अपने साथियों के बीच अच्छे ड्रेसअप के लिए जानी जाती हैं। उनके पास ज्वैलरी का अच्छा कलैक्शन है। वे एक प्रशिक्षित क्लासिकल डांसर हैं और सावर्जनिक रूप से परफॅार्मेंस दे चुकी हैं। वे गिटार भी बजाती हैं। उन्हें कविताएं लिखने का शौक है। उनकी कई कविताएं छप भी चुकी हैं। साथ ही वे कर्नाटक संगीत की भी अच्छी जानकार हैं। काव्य और संगीत का असर उनके व्यक्तित्व में साफ झलकता है। उनकी आवाज में कवियों के ओज और नारी की कोमलता का अद्भुत मिश्रण है। एक कवयित्री के तौर पर वे संवेदनाओं और भावनाओं से लबरेज हैं। पर जब वे बड़े फैसले लेती हैं, तो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखती हैं। छह दिसंबर, 1950 को केरल में जन्मीं निरूपमा एक आर्मी अफसर की बेटी हैं। उन्होंने महाराष्ट्र की मराठा यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया है। उनके पति सुधाकर राव भी भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। उनके दो बेटे हैं। दिलचस्प बात है कि लोकसभा की पहली महिला स्पीकर मीराकुमार और निरुपमा एक ही आईएफएस बैच से थीं।
खरी-खरी सुनाती हैं
बतौर विदेश सचिव उनके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश में अशांति के माहौल में अपना दृढ़ पक्ष रखना एक प्रमुख काम है, वहीं अमरीका की कूटनीतिक चालों का जवाब देने में भी उन्हें अपना कौशल दिखाना होगा। वे इस पद को पाने वाली देश की दूसरी महिला होंगी। इससे पहले 2001 में कुछ समय के लिए चोकिला अय्यर भी विदेश सचिव के पद पर काम कर चुकी हैं। 58 साल की निरुपमा अभी चीन में भारत की राजदूत हैं। चीन में राजदूत बनने से पहले वे बतौर विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता दुनिया को खरी-खरी बातें सुनाने के लिए मशहूर रहीं। उन्होंने पाकिस्तान, चीन, नेपाल, अमरीका जैसे देशों के सामने देश का पक्ष बड़ी मजबूती और बेहद विनम्रता से रखा, बिल्कुल तनाव मुक्त होकर। वे श्रीलंका में उच्चायुक्त और पेरू में देश की राजदूत रह चुकी हैं। वे मॉस्को स्थित भारतीय मिशन में भी काम कर चुकी हैं। साथ ही विदेश मंत्रालय में पूर्वी एशिया मामलों की संयुक्त सचिव भी रह चुकी हैं।
-प्रस्तुति: आशीष जैन
08 July 2009
सुअरों से फ्लू: स्वाइन फ्लू
स्वाइन फ्लू का नाम कुछ दिनों पहले शायद डॉक्टरों या इतिहासकारों को ही पता था, पर अब इस बीमारी से पूरी दुनिया वाकिफ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) इसे विश्व महामारी घोषित कर चुका है। स्वाइन फ्लू या इन्फ्लुएन्जा या एक अत्यन्त संक्रामक किस्म के जुकाम के खिलाफ अब पूरी दुनिया में छठे स्तर का अलर्ट जारी है। पिछले चालीस सालों में पहली बार किसी बीमारी को वैश्विक स्तर पर खतरे की उच्चतम छठी अवस्था तक आंका गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का आश्वासन है कि इस बीमारी का टीका सितंबर तक आ जाएगा। हमारे देश में इस वक्त स्वाइन फ्लू से पीडि़तों की संख्या 70 के करीब बताई जा रही है और तेजी से संख्या में इजाफा भी हो रहा है।
स्वाइन फ्लू का वायरस दुनिया के 80 देशों में फैला हुआ है और करीब 50 हजार लोग इससे पीडि़त हैं। इस बीमारी से 200 लोगों की मौत भी हो चुकी है। हमारे देश के नीतिनिर्धारकों को इस बीमारी पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। पोलियो, मलेरिया जैसी पुरानी बीमारियों के बीच इस नई बीमारी पर नियंत्रण के लिए हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। गौरतलब बात है कि जिन देशों में स्वाइन फ्लू का असर ज्यादा देखने में आया है, वे सभी विकसित राष्ट्र रहे हैं, इन देशों की स्वास्थ्य प्रक्रिया का पूरा विकसित तंत्र है। ऐसे में विकासशील देशों को अपने सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए कुछ खास कदम उठाने होंगे।
नया फ्लू है ये
स्वाइन फ्लू सुअरों से उत्परिवर्तित वायरस से हुआ है। सुअरों को एविएन और ह्यूमन एन्फ्लूएंजा स्ट्रेन दोनों का संक्रमण हो सकता है। इसलिए उसके शरीर में एंटीजेनिक शिफ्ट के कारण नए एन्फ्लूएंजा स्ट्रेन का जन्म हो सकता है। किसी भी एन्फ्लूएंजा के वायरस का मानवों में संक्रमण श्वास प्रणाली के माध्यम से होता है। इस वायरस से संक्रमित व्यक्ति का खांसना और छींकना या ऐसे उपकरणों का स्पर्श करना जो दूसरों के संपर्क में भी आता है, उन्हें भी संक्रमित कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सुअर (स्वाइन), पक्षी और इंसान तीनों के जीन मिलने से बना एच1एन1 वायरस सामान्य स्वाइन फ्लू वायरस से अलग है। पिछले कुछ सालों में मनुष्य में संक्रमित होने वाले इंन्फ्लुएंजा वायरस से इसका कोई वास्ता नहीं है। वैज्ञानिक अभी इस खोज में लगे हुए हैं कि इस वायरस का मूल स्रोत क्या है। बर्ड फ्लू और मानवीय फ्लू के विषाणु से सुअरों में संक्रमण शुरू हुआ। फिर सुअर के राइबोन्यूक्लिक एसिड (आरएनए) से मिलकर नए वायरस स्वाइन इन्फ्लुएंजा ए (एच1एन1) का जन्म हुआ। तब इन्फ्लुएंजा ए (एच1 एन1) का सुअर से मनुष्य में संक्रमण संभव हो सका। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह वायरस किसी भी मौसम में फैल सकता है और हर आयुवर्ग के लोगों को आसानी से अपनी चपेट में ले सकता है। स्वाइन फ्लू के दौरान बुखार, तेज ठंड लगना, गला खराब हो जाना, मांसपेशियों में दर्द होना, तेज सिरदर्द होना, खांसी आना, कमजोरी महसूस करना आदि लक्षण तेजी से उभरने लगते हैं। एन्फ्लूएंजा वायरस लगातार अपना स्वरूप बदलने के लिए जाना जाता है। यही वजह है कि एन्फ्लूएंजा के वैक्सीन का भी इस वायरस पर असर नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि छींक के दौरान सभी लोगों को अपनी नाक पर रुमाल या कपड़ा रखना चाहिए। बाहरी खान-पान से ही परहेज ही रखना चाहिए। इस बीमारी में यह शंका गलत है कि हमें यात्रा से बचना चाहिए, नहीं तो हमें यह फ्लू हो सकता है। सुअर का मांस खाने से स्वाइन फ्लू नहीं होता। स्वाइन फ्लू खाने के जरिए नहीं फैलता। इसलिए सुअर के मांस से बने फूड प्रोडक्ट इस मामले में सुरक्षित हैं। कुछ एंटी वायरल दवाइयां स्वाइन फ्लू से राहत देने में असरकारक साबित हुई हैं। टेमिफ्लू तथा रेलेंजा जैसी दवाईयां इस फ्लू में फायदा देती हैं।
कैसे पड़ा नाम
इन्फ्लुएंजा ए वायरस की सतह पर दो प्रोटीन हीमाग्लूटीनिन (एच) और न्यूरामिनिडेज (एन) होते हैं। आनुवांशिक उत्परिवर्तन के कारण इन प्रोटीनों की संरचना में परिवर्तन होता है और वायरस की दूसरी किस्में तैयार हो जाती हैं। हर किस्म का नाम एक एच और एक एन संख्या के आधार पर तय किया जाता है। मनुष्यों में एच की 1,2,3 और एन की 1 और 2 किस्में पाई जाती हैं।
इंसान में स्वाइन फ्लू की अवस्थाएं-
स्थापित रोगी (कन्फम्र्ड)- ऐसे रोगी जिनमें स्वाइन फ्लू रोग के सारे लक्षण होते हैं। वे स्थापित रोगी होते हैं। इनके रोग की पुष्टि रियल टाइम पी.सी.आर. या वाइरस कल्चर या एच1एन1 वाइरस स्पेसिफिक न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज के स्तर में चार गुना इजाफे की बात एक या सब जांचों से पता हो चुकी होती है।
संभावित रोगी (सस्पेक्टेड)- वे रोगी जिनमें स्थापित रोगी के संपर्क में आने के सात दिन के अंदर-अंदर फ्लू के लक्षण उत्पन्न हुए हों और जिनकी जांच से पुष्टि होना शेष हो।
निकट संपर्क वाले रोगी (क्लोज कॉन्टेक्ट)- स्थापित और संभावित रोगी के आस-पास 6 फुट के दायरे में रहने वाले व्यक्ति जो अभी प्रकट रूप से स्वस्थ दिख रहे हों।
कौनसी बीमारी है महामारी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक किसी बीमारी को महामारी घोषित करने के छह चरण तय किए गए हैं।
1. जब इंसान में संक्रमण की वजह किसी जानवर से आया इन्फ्लुएंजा वायरस नहीं होता।
2. जब पालतू या जंगली जानवर में फैल रहे वायरस से मनुष्य में संक्रमण फैलता है।
3. जब जानवरों में फैल रहा कोई वायरस या इंसान और जानवर के जीनों के मिलने से बना कोई वायरस एक बड़े समूह के बीच संक्रमण का कारण बनता है।
4. जब इंसान से इंसान में संक्रमण फैलने की पुष्टि हो जाती है।
5. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक क्षेत्र के ही दो या दो से अधिक देशों में संक्रमण बड़े पैमाने पर फैलने लगे।
6. विश्व स्वास्थ्य संगठन के ही किसी दूसरे क्षेत्र का कम से कम एक और देश जब इसी संक्रमण की चपेट में आ जाए।
स्वाइन फ्लू का इतिहास
1918 की ब्लैक डेथ डिजीज- 1918 में स्वाइन फ्लू की बीमारी इंफ्लुएंजा वाइरस एच1एन1 की वजह से फैली थी। रोग का वायरस सुअरों से इंसानों में फैला और फिर इंसानों के इंसानों में संपर्क में आने से पूरी दुनिया को चपेट में लेता गया। दुनियाभर में इससे करीब दो करोड़ लोगों की मौत हुई। तब इस बीमारी को ब्लैक डैथ का नाम दे दिया गया।
अमरीका में 1976 का स्वाइन फ्लू- 5 फरवरी, 1976 को अमरीका के फोर्ट डिक्स में अमरीकी सेना के सैनिकों को थकान की समस्या होने लगी। बाद में पता लगा कि यह बीमारी स्वाइन फ्लू ही है और एच1एन1 वायरस के नए स्ट्रेन की वजह से फैल रही है। इस वायरस का प्रकोप 19 जनवरी से 9 फरवरी तक ही रहा। यह वायरस फोर्ट डिक्स से बाहर नहीं फैल पाया। उस दौरान इसका टीका तैयार किया गया, जो तकरीबन 4 करोड़ लोगों को लगाया गया। इस टीके से कुछ लोगों की मौत भी हुई, तो तत्कालीन सरकार ने इस पर रोक लगा दी।
1988 का वॉलवर्थ काउंटी स्वाइन फ्लू- 1988 में जब एक दंपती बारबरा वीनर्स और एड वॉलवर्थ काउंटी में सुअरों के मेले में गए, तो वापस लौटने पर उन्हें फ्लू हो गया। डॉक्टर गर्भवती बारबरा को नहीं बचा पाए, पर उसका बच्चे को जीवित बचा लिया गया। बाद में सुअरों के साथ रहने वाले सैकड़ों लोगों में संक्रमण पाया गया। यह बीमारी गंभीर रूप धारण नहीं कर पाई। बाद में वैज्ञानिकों को पता लगा कि यह वायरस स्वाइन फ्लू वाइरस स्टे्रन एच1एन1 में उत्परिवर्तन के कारण सुअरों में विकसित हुआ था, जो बाद में इंसानों तक पहुंच गया था।
2007 का फिलीपींस का स्वाइन फ्लू- फिलीपींस में 20 अगस्त 2007 में नुयेवा एसिजा और सेंट्रल ल्यूजोन में स्वाइन फ्लू फैला था। इसमें रोगियों को भयंकर रूप से उल्टियां और दस्त होने लगे। स्थानीय लोगों ने इसे हॉग कॉलरा कहकर पुकारा। फिलीपींस में रेड अलर्ट जारी किया गया और यह विश्वव्यापी महामारी बनने से बच गया।
2009 का मैक्सिको का स्वाइन फ्लू- मैक्सिको से शुरू हुआ स्वाइन फ्लू इस बार फिर पूरी दुनिया में फैल चुका है और इससे पीडि़त लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बीमारी को अब विश्वस्तरीय महामारी भी घोषित कर दिया है।
महामारियां अब तक
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 1889 से अब तक दुनिया में पांच बार महामारियों का प्रकोप हो चुका है। 1889 में रशियन फ्लू से तकरीबन 10 लाख लोगों की मौत हुई। 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू से लगभग दो-तीन करोड़ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। 1957 के एशियन फ्लू में लगभग 30 लाख लोगों की जानें गईं। 1968 के हांगकांग फ्लू में 15 लाख लोग मरे और 2009 में इन्फ्लुएंजा ए (एच1एन1) वायरस से लगभग 200 लोगों की मौत हो चुकी है।
भारत में महामारी
बंगाल में हैजा
1816 से 1826 के बीच बंगाल में हैजा महामारी से दस हजार से ज्यादा लोगों की जानें गई थीं।
स्पेनिश फ्लू
1918 से 1919 के दौरान भारत में फैले स्पेनिश फ्लू से तकरीबन एक लाख से ज्यादा लोगों को अपने हाथ से जान गंवानी पड़ी।
कोढ़ की बीमारी
1980 के दशक में चीन और इजिप्ट के साथ-साथ हमारे देश में फैली कोढ़ की बीमारी से बीस लाख से ज्यादा लोग विकलांग हो गए थे।
प्लेग
1994 में गुजरात के सूरत में फैले प्लेग से 52 लोगों की जानें गईं।
कुछ खास संक्रमित बीमारियां
सार्स
सार्स का पूरा नाम है- सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम। यह बीमारी चीन में 2002 और 2003 के बीच में फैली थी। इस बीमारी ने 37 देशों को जकड़ लिया था और लगभग एक हजार लोगों की मौतें हुईं।
एंथे्रक्स
2001 में अमरीका में एथे्रक्स के बायोलॉजिकल आक्रमण होने लगे और हजारों अमरीकी इससे संक्रमित हो गए।
-आशीष जैन
लेबनान में लोकतंत्र की बहार
पूरी दुनिया की निगाह हमेशा की तरह दक्षिण एशिया पर टिकी हुई है। अमरीका के नए राष्ट्रपति बराक ओबामा और विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन चाहते हैं कि मध्यपूर्व में उनकी सत्ता हमेशा कायम रहे। मध्य पूर्व के इराइराल-फिलिस्तीन, ईरान, लेबनान, सीरिया जैसे देशों की राजनीतिक गणित दरअसल अमरीका ने ही बिगाड़ रखी है। इन सब देशों में भी मध्य-पूर्व में बसे लेबनान देश पर पूरी दुनिया की निगाह हमेशा से टिकी रहती हैं। खासकर इन दिनों दुबारा उस पर अमरीका सहित दुनिया के देशों का ध्यान है। हाल ही लेबनान में संपन्न आम चुनावों में लेबनान में सत्तारूढ़ मार्च 14 गठबंधन ने भारी बहुमत हासिल किया और फिर से सरकार बनाने का दावा पेश किया। इस गठबंधन को अमरीका, फ्रांस, इजिप्ट और सऊदी अरब का समर्थन हासिल था। अमरीका और उसके समर्थक देश चाहते थे कि सत्तारूढ़ गठबंधन इस बार भी विजय प्राप्त करे और उसे लेबनान के लिए अपनी नीतियों में ज्यादा फेरबदल ना करना पड़े। जबकि दूसरी ओर इन चुनावों में सीरिया और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह गठबंधन था। चुनावों में इसको करारी हार का सामना करना पड़ा। मार्च 14 गठबंधन के अध्यक्ष साद हरीरी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद जताई जा रही है। लेबनान की संसद में कुल मिलाकर 128 सीट हैं। जिनमें 64 मुसलमानों के लिए और 64 ईसाइयों के लिए हैं। इन चुनावों में मार्च 14 गठबंधन को 71 सीटें मिली हैं। चरमपंथी हिजबुल्लाह समर्थित क्रिस्चियन पार्टी को 57 सीटें ही मिलीं। हिज्बुल्लाह को शिया उग्रवादी समूह माना जाता रहा है। दरअसल लेबनान का ईसाई समुदाय दोनों खेमों के बीच बंटा रहता है। हिजबुल्लाह को भी ईसाइयों और शियों के समर्थन से इस चुनाव में जीत की उम्मीद थी। लेबनान में मतदान करने के योग्य लोगों की संख्या तकरीबन 30 लाख है।
इतना मतदान पहली बार
खास बात है कि साद हरीरी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ मार्च 14 गठबंधन ने ही 2005 में भारी जीत के साथ सरकार बनाई थी। साद हरीरी लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी के बेटे हैं। उसी वर्ष साद हरीरी के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की बेरूत में एक कार बम धमाके में मौत हो गई थी। इस कार बम धमाके के बाद सीरिया को करीब 29 वर्ष बाद लेबनान से हटना पड़ा था क्योंकि उस पर कार बम धमाके में शामिल होने के आरोप लगे थे। हालांकि सीरिया इसका खंडन करता रहा है। रफीक हरीरी की मौत के बाद सीरिया विरोधी पार्टियों ने मिलकर मार्च 14 गठबंधन का एलान किया था। इस गठबंधन का एजेंडा लेबनान की सरकार में सीरिया के हितों के लिए काम कर रहे तत्वों को खत्म करना और लेबनान में तैनात सीरिया के सैनिकों को वापस भेजना था। सीरिया ने 1976 में लेबनान में चल रहे गृह युद्ध को खत्म करने के लिए वहां अपने 40,000 सैनिक तैनात किए थे। लेकिन गृह युद्ध खत्म होने के बाद भी सीरिया के सैनिक लेबनान में ही रहे। रफीक हरीरी की मौत के बाद बने दबाव के चलते सीरिया ने 2005 में अपने सारे सैनिकों को वापस बुला लिया था। इतना मतदान लेबनान के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। साल 2005 के मुकाबले इस बार ज्यादा लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया और चुनावों में करीब 52 फीसदी मत पड़े। इन नतीजों से अमरीका को राहत मिली है, क्योंकि उसने स्पष्ट किया था कि अगर विपक्षी गठबंधन को चुनाव में जीत मिलती है तो अमरीका लेबनान से अपने रिश्तों की समीक्षा करेगा। ऐसे में अमरीका चुनावी नतीजों से बेहद खुश है।
हिजबुल्लाह को जनता का समर्थन
लेबनान सालों से युद्ध की विभीषिका, सम्प्रदायिक हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता को झेल रहा है। ऐसे में स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रणाली से दुबारा स्थायी सरकार का बनना देश के भविष्य के लिए सुखद संदेश है। लेबनान की घटनाएं मध्यपूर्व की सामरिक स्थिति में बदलाव का संकेत प्रस्तुत करती हैं। 2006 की बात करें, तो उस वक्त इजराइल ने लेबनान पर हमला कर दिया था। ऐसे में हिजबुल्लाह ने ही इजराइल को मुंह की खाने पर विवश कर दिया था। इजराइल अमरीका का समर्थन प्राप्त करके लेबनान पर धावा बोल चुका था और अमरीका लोकतंत्र का छद्म चेहरा दुनिया के सामने बेनकाब हो चुका था। ऐसे में हिजबुल्लाह ने राष्ट्रवादी नीतियों को तवज्जोह देते हुए लेबनान को संकट से बचाया था। ऐसे में अगर अमरीका दुनिया के सामने यह कहता है कि अगर इन चुनावों में हिजबुल्लाह की जीत हो जाती, तो लेबनान में नए संकट आ सकते थे, पूरी तरह गलत है। 2006 के हमले के दौरान इजराइल ने लेबनान को तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेबनान के एक हजार से ज्यादा नागरिकों की जानें गई थीं। ऐसे में लेबनानी सरकार ने इजराइल को सबक सिखाने की बजाय हिजबुल्लाह के निशस्त्रीकरण की मांग शुरू कर दी थी। यह सब अमरीका की ही कारगुजारियां थीं। ऐसे में हिजबुल्लाह ने भी सरकार में एक तिहाई भागीदारी की मांग की। उस वक्त सिनोरिया सरकार अड़ी रही और हिजबुल्लाह के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। पर हिजबुल्लाह ने भी सिनोरिया सरकार को धूल चटा दी क्योंकि हिजबुल्लाह को भी लेबनान में जनता का भारी समर्थन प्राप्त है।
राष्ट्रपति चुनाव अभी बाकी हैं
सिनोरिया सरकार की चाल थी कि वह अपने देश लेबनान की सेना को इजराइल के खिलाफ नहीं बल्कि हिजबुल्लाह के खिलाफ उतारना चाहती थी। सिनोरिया सरकार समर्थक पार्टियों में उस वक्त सबसे बड़े घटक के नेता साद हरीरी एक बड़ी निर्माण कंपनी के मालिक हैं, इस कंपनी की गणना दुनिया की 500 सबसे बड़ी कंपनियों में होती है। साद हरीरी ने संभवत यही सोचा होगा कि इजराइली हमलों से लेबनान के विध्वंस से उनकी कंपनी को बहुत सा कारोबारी फायदा हो सकता है। इसके साथ ही अब मार्च 14 गठबंधन चाहता है कि किसी तरह राष्ट्रपति पद भी उनके कब्जे में आ जाए। अभी लेबनान में सीरिया समर्थक राष्ट्रपति एमीले लाहोद सत्ता में हैं। 2004 में सीरिया के दबाव के चलते लेबनान में संविधान में संशोधन करते हुए लाहोद के कार्यकाल को विवादास्पद रूप से तीन सालों से लिए बढ़ाया था। तब से लेकर लगातार मांग उठ रही है कि राष्ट्रपति लाहोद को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। यह मुद्दा अभी सुलझना बाकी है। मार्च 14 गठबंधन ने अपना नाम इस तर्ज पर रखा है कि जब 2005 में रफीफ हरीरी की हत्या हुई थी, तो 14 मार्च को ही बेरूत में सीरिया के प्रभाव को लेबनान से कम करने के लिए इस गठबंधन ने भारी विरोध प्रदर्शन किए थे। इन चुनावों में मार्च 14 गठबंधन को जिताने में अमरीका सरकार ने जी-जान लगा दी थी। उसने लेबनान के लोगों को चेतावनी भी दी थी कि अगर हिजबुल्लाह को वे जीताते हैं, तो अमरीका द्वारा दी जाने वाली सारी मदद रोकी जा सकती है। लेबनानी लोगों को भी पता था कि जब फिलीस्तीन में हमास की जीत हुई थी, तो अमरीका ने उसे आर्थिक मदद देना बंद कर दिया और इजराइल को उस पर हमला करने की छूट दे दी थी। ऐसे में देखना दिलचस्प रहेगा कि लेबनान के राष्ट्रपति चुनावों का क्या हाल रहता है और सीरिया की दखलअंदाजी को खत्म करके गठबंधन 14 मार्च किस तरह लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है।
-आशीष जैन
07 July 2009
बीमारियां बड़ी मस्त-मस्त
मैंने जिंदगी में कुछ नहीं किया। यूं ही जिया और लगता है कि यूं ही मर जाऊंगा। काम मैं भी करता हूं, पर नाम नहीं होता। अब तो कई बीमारियों ने भी घेर लिया है। वैसे कुछ बीमारियां होती ही इतनी दिलचस्प हैं कि आदमी खुद जाकर उनसे चिपक जाता है। मुझे खुद की तारीफ करने की नई बीमारी लग चुकी है। जब तक रोज सुबह और सांझ ढले खुद की कीर्ति का गुणगान ना कर लूं, खाना हजम ही नहीं होता। मैं हरदम इस फिराक में रहता हूं कि कोई मिले और मैं उसे पकड़कर अपनी तारीफ के कम से कम दो बोल तो उछाल ही दूं। बदले में मिली वाहवाही से मेरा भोजन आसानी से पच जाता है। जैसे बंद नाक होने पर आप-हम दिनभर जोर लगाते रहते हैं कि किसी तरह नासिक से हवा का प्रवाह सतत हो जाए, उसी तरह मैं भी अपने रोज के कामों में से इतिहास सर्जन के पल खोजता रहता हूं। मुझे पता है कि कुछ लोग मुझसे चिढ़ते हैं, इसीलिए वे मेरी तारीफ सुनना पसंद नहीं करते और मुझे देखते ही दूर से ही भाग खड़े होते हैं। वैसे लोग बीमारियों से चिंताग्रस्त रहते हैं, पर मैं अपनी इस बीमारी से बहुत खुश हूं।
मार्केट में जो बीमारी इन दिनों सबसे ज्यादा बिक रही है, वो है स्वाइन फ्लू। सुना है कि इस बीमारी का मूल विषाणु सुअर से आया। वैसे हमारी गली में तो बड़े प्यारे-प्यारे सुअर हैं। वे स्वच्छता पसंद हैं, इसलिए उन्हें डरने की कोई जरूरत ही नहीं है। कुछ आवारा सुअरों को जरूर ये बीमारी हो सकती है, पर मैं आज शाम ही उन सब की मीटिंग लेकर उन्हें इस बीमारी के बारे में विस्तार से समझा दूंगा और कह दूंगा कि किसी भी तरह से ये बीमारी हमारी गली में ना घुस पाए। वैसे कुछ लोगों को बोलने की बीमारी होती है। और ये बीमारी खासकर हमारे देश में पाई जाती है। बोलना वाकई एक नशे की तरह होता है। बतोड़ों से पूछिए कि लगातार बोलने में कितना मजा छुपा है। कोई सुने ना सुने, उन्हें तो बस धाराप्रवाह बोलते जाना होता है। बोल-बोल के चाहे मुंह में दर्द हो जाए, जब तक सुनने वाला रोने नहीं लगेगा, ये उस निरीह जीव को छोडेंग़े नहीं। बोलने की परिणाम तो आप हाल के चुनावों में भी देख चुके हैं। ससुरे शुरू से अंत तक बोलते ही गए हमारे नेता और एकाध तो ऐसे हैं कि हार गए, पर बोलना नहीं छोड़ा। चाहे पार्टी से निकलने की नौबत आ जाए, पर लगातार अनाश-शनाप बोलने की आदत नहीं छूटी।
अब हाल देख लीजिए बीजेपी का। सुधीजन तो कह रहे हैं कि अगर शताब्दी एक्सप्रेस की तरह पार्टी के नेताओं के बयान आते रहे, तो आने वाले सालों में पता भी नहीं लगेगा कि कोई इस नाम की पार्टी भी भारतवर्ष में हुआ करती थी। हमने सुना है कि जब अंग्रेज लोग बीमार होते हैं, तो दारू पीने लगते हैं। जर्मन लोगों को दर्द लगता है, तो वे नाचने लगते हैं। पर हम हिंदुस्तानी जब भी बीमार पडऩे लगते हैं, तो वे बोलने की आदत से ग्रस्त हो जाते हैं। बीमारी से ज्यादा बीमारी तो बोलने में नजर आने लगती है। वैसे हमारी घरवाली को तो शापिंग की तगड़ी बीमारी है। चाहे जरूरत हो या ना हो, हर हफ्ते जब तक हजार रुपए खर्च ना करे, उसे उल्टियों का सा मन करने लगता है। अब हम उल्टी की बजाय पैसे फुंक जाना ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं बच्चों को कभी कंप्यूटर चाहिए, तो कभी वीडियो गेम्स। क्या ये बीमारी नहीं है। हम तो बिना बिजली खर्च करे ही घर के आंगन में दिनभर खेला करते थे। वैसे इन बीमारियों को कोई अंत नहीं है। पाकिस्तान को भारत को परेशान करने की बीमारी है, तो अमरीका को पूरी दुनिया को धौंस दिखाने की बीमारी, अमीर को दिखावा करने की बीमारी, तो गरीब तो दिनभर फालतू ही अपना रोना रोने की बीमारी। मेरा तो मानना है कि मन जब किसी काम को लगातार करने लगता है, तो धीरे-धीरे वो काम लत बनता है और फिर बीमारी बनने लगता है। भई, मेरी तो यही राय है कि हम सबको कुछ ना कुछ नया करते रहना चाहिए ताकि कोई भी चीज दिलोदिमाग पर हावी ना हो पाए और हम खुशी-खुशी अपनी जिंदगी गुजार सके।
-आशीष जैन
महिलाओं ने हिला दिया
आज हमारी घरवाली बड़ी खुश है। खूब प्यार से बात कर रही है, खाना भी बहुत स्वादिष्ट बनाया है। आज तो ऑफिस से लेट आने पर ताने भी नहीं मारे। क्या बात है, ये सूरज पश्चिम से कैसे उग रहा है। जरूर हो ना हो, दाल में कुछ काला है। रोज तो अपने दुख-दर्द का पिटारा लेकर बैठ जाती थी, कहती थी कि तुम मर्दों ने हमारी जिंदगी तबाह कर रखी है। तुमने हमें दबाकर रखा हुआ है। हमें आगे बढऩा चाहती हैं। और आज कह रही है कि तुम बहुत अच्छे हो, मेरा हर कहा मानते आए हो। मुझे तुम्हारा साथ बहुत भाता है। ये सुनकर मैं वैसे ही उलझन में था, इतने में ही उसने एक सवाल भी दाग दिया कि आगे भी मेरा साथ दोगे ना। मैं सोच में पड़ गया कि कैसे साथ देने की बात कर रही है ये। जरूर कोई बड़ा फंदा लाई है, ये मुझे फंसाने के लिए। मैं सर्तक हो गया। सोचने लगा कि इन दिनों में कुछ खास तो नहीं हुआ।
तभी हमें याद आया कि 100 दिन की मियाद में सरकार महिलाओं को देश की सबसे बड़ी पंचायत में आरक्षण देने जा रही है। जरूर इसे किसी ने बता दिया हो। अब तो ये जरूर चुनाव लडऩे की प्लानिंग बना रही होगी। दरअसल जब भी हमारी बीवी खुश होती है, मायावती और ममता बनर्जी के गुणगान करने लगती है। बोलती है, काश! मुझे भी मौका मिलता चुनाव लडऩे का। तुम जैसे पतियों की तो अकल ठिकाने पर लगा देती। हमें तो शुरू से ही पता है कि स्त्री शक्ति का कोई सानी नहीं है। अगर स्त्री जाग गई, तो सबको सुला देगी। आज जब बिना आरक्षण के ही महिलाओं ने अपना डंका चहुंओर मचा रखा है, तो फिर तो पुरुषों के बोलती ही बंद हो जाएगी।
मेरी पत्नी को तो मीरा कुमार की आवाज में भी कोयल की बोली नजर आती है, कहती है, कितना मीठा बोलती है। अब मीठा बोल-बोलकर संसद में सबको चुप कराएगी। हैडमास्टरनी बन गई है, सब नेताओं की। देखा ना बस एक पोस्ट बची थी, जिस पर महिला नहीं थी, अब तो वो भी पूरी हो गई। अपनी प्रतिभा ताई, सोनिया मैडम और इंदिरा गांधी की तरह ये भी अपना परचम लहराएगी। वैसे मेरा मानना है कि यूं अगर महिलाओं को आरक्षण नहीं भी मिलेगा, तो जल्द ही वो दिन भी आएगा, जब पूरी संसद में महिलाएं नजर आएंगी और जो बचे-कुचे पुरुष होंगे, वे सब मौन में चले जाएंगे। उन्हें ये डर हमेशा सताएगा कि कहीं ये औरतें अपने बैगों में बेलन छुपाकर ना लाई हों। अगर ज्यादा भड़भड़ाहट की, तो तपाक से बेलन निकालकर मारेंगी।
अब देख लीजिए शुरुआत तो हो चुकी है, उनसठ महिलाओं ने बाजी मार ली ना इस बार के चुनावों में।
आरक्षण आएगा, तो ऐसी महिला क्रांति लाएगा, जिसकी उम्मीद तो शायद महिला सशक्तिकरण करवाने वाली संस्थाओं ने भी नहीं की होगी। पुरुषों की बजाय अब महिलाएं चाय की थडिय़ों का मंच हथिया लेंगी। सारी औरतें मिलकर वहीं कंट्री के फ्यूचर की प्लानिंग करेंगी। पनवाड़ी की दुकान पर महिला पान बेचती नजर आएंगी, रैलियों में महिलाओं की भीड़ उमड़ेगी, बसों में पुरुष आरक्षित सीटें नजर आएंगी, महिला आयोग के दफ्तर पर ताला लग जाएगा और सारे पुरुष मिलकर पुरुष आयोग की मांग करने लगेंगे। दहेज पीडि़त महिलाएं नदारद हो जाएंगी और महिलाओं द्वारा उत्पीडि़त पुरुषों की संख्या में भारी इजाफा देखने को मिलेगा। राष्ट्रपिता, राष्ट्रपति जैसे शब्दों की तरह ही संविधान में राष्ट्रमाता, राष्ट्रपत्नी जैसे शब्दों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की जाएगी। आतंकवादियों की नई फौज में महिला आतंकवादियों का वर्चस्व बढऩे लगेगा... इत्यादि इत्यादि। यूं तो मेरे पास भावी परिवर्तनों की बहुत लंबी लिस्ट है, पर उन सब बातों का यहां उल्लेख करना ठीक नहीं रहेगा। वरना लाखों पुरुष शरद यादव की तरह ही आत्महत्या करने की योजना बना लेंगे। मैं नहीं चाहता कि मेरी जात मतलब पुरुष बिरादरी घबराहट में कुछ गलत उठा ले। भाईयो, अभी डरने की नहीं धैर्य करने की जरूरत है। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आप पर ज्यादा आंच नहीं आएगी। हम अपनी माताओं-बहनों-बीवियों से फरियाद करेंगे कि वे अपने बाप-भाई-पति का पूरा ध्यान रखेंगी। हम उनके साथ समझौता करने को तैयार हैं। वो हमें समय पर चारा मतलब भोजन मुहैया करवाएंगी बदले में हम घर की सफाई कर दिया करेंगे। वो हमसे थोड़ा प्यार से बात कर लिया करेंगी और हम बदले में बच्चों की पोटी साफ कर दिया करेंगे।
हम इतना सोच कर पसीने-पसीने हो गए और मन किया कि अपनी पत्नी के पांव छू लें और उसे अभी से पटा लें। पर क्या देखते हैं कि पत्नी कलैंडर लेकर सामने खड़ी थी। बोले बस कुछ ही दिन तो बचे हैं। हमने सोचा कि इसने 100 दिनों में से उल्टी गिनती शुरू कर दिया दिखता है। पर वो बोली कि मुझे मायका जाना है, बच्चों की छुट्टियां खत्म होने में कुछ दिन ही बचे हैं। आप घर का ध्यान रखना, मैं जल्द ही आ जाऊंगी। इतना कहकर वो मायके जाने की तैयारी करने लगी और हम सकुचाए से अपने भविष्य के संकट के बारे में दुबारा विचारमग्न हो गए।
-आशीष जैन
बारिश आई किस्मत चमकाई
अल्लाह मेघ दे..मेघ दे.. पानी दे..। टिप-टिप बरसा पानी... पड़ोस में रहने वाले पपीताराम के घर से लगातार ऊंची-ऊंची आवाजें आ रही थीं। मैं घबरा गया, सोचने लगा कि वैसे तो हमारा पूरा मोहल्ले की संगीतकारों से भरा पड़ा है, पर ये भरी गर्मी में पानी को याद करके कौन हमारे जख्मों को हरा कर रहा है। उससे पूछें, तो जवाब मिलेगा कि तुम्हारा क्या ले रहा हूं। मैं तो गीत गा रहा हूं। हमसे पूछो, तो वो एक नंबर का गधा है। सबको अपनी बेसुरी आवाज से घायल करना चाहता है। उसे हमारा सुख नहीं देखा जाता। लगा रहता है किसी ना किसी सिंगिंग कंपीटीशन की तैयारी में। कहता है कि मैं तो अपनी आवाज से रियाज कर रहा हूं।
वैसे आज के उसके गीत में कुछ ना कुछ राज छुपा हुआ है। नहीं तो वो तपती धूप में कैसे एकाएक पानी को याद करने लगा और उसने तो घर में ही बोरिंग खुदवा रखी है, पानी की तो वैसे भी उसके घर में कोई कमी नहीं है। वैसे उसकी नजरों में जरा पानी नहीं है, ये दूसरी बात है। उससे एक बाल्टी पानी मांगने जाओ, इस तरह एहसास जताकर देता है, मानो बाल्टी भरकर नोट दे रहा हो। यूं आषाण के महीने में ही सावन को याद करने की उसकी अदा वाकई बड़ी निराली है। घर की सारी खिड़कियां खोलकर पानी आ, पानी आ यूं चिल्ला रहा है, मानो उसके कहने से बादल अपनी सारी सप्लाई हमारे मोहल्ले की तरफ मोड़ देंगे।
दरअसल वो एक पीडब्ल्यूडी का ठेकेदार है। हर साल सावन आते-आते वो पूरा हरा नजर आने लगता है। बारिश की पहली बंूद इस धरा पर टपकती है, तो लगता है कि उसे पुनर्जन्म मिल गया हो। पता नहीं पानी से उसे इतना प्यार क्यों है। हम इस बात को सोचकर बहुत परेशान रहते हैं। पर जब देखा कि वो सड़क बनवाने के लिए सरकार से टेंडर लेता है, तो हमारे मगज में एक बार में ही सारी बात फिट बैठ गई कि क्यों वो पानी से इतना प्यार करता है। दरअसल वो ज्यादातर टेंडर लेता ही, बरसात के दिनों में है। सड़क के नाम पर रोड पर डामर बिछा देता है। बारिश आती है और उसके सारे पापों को धो जाती है। तभी वो बारिश के पानी को गंगाजल समझकर प्रणाम करता है। सड़कों टूटती हैं, गड्ढ़े होते हैं, उसका क्या जाता है, बारिश उसके सारे कुकर्मों को ढक लेती है। फिर दूसरी बार वो टेंडर लेता है, गड्ढे भरने का। गड्ढे भरने के नाम पर नोटों से उसका घर भरता जाता है। बारिश खत्म होती है, तो पता लगता है कि पपीताराम ने नई कार ले ली है। अमरीका जा रहा है घूमने इत्यादि। वैसे इसमें एक मजेदार बात है कि सरकार उसी को टेंडर क्यों देती है? क्या कोई उसकी शिकायत नहीं करता कि बेकार सड़क बनाने में उसी का हाथ है। इसके पीछे साफ थ्योरी काम करती है। कहेगा कौन, सुनेगा कौन। कहेंगे ये चट्टू पत्रकार, तो उनकी तो पहले से ही जेबें गर्म करके रखो और अगर ज्यादा प्रेशर आ भी जाए, तो साफ कह दो, इस काम में मेरा नहीं मजदूरों का हाथ है। और सुनने वालों को तो कान बंद रखने के लिए पहले ही सोने के सिक्के थमा दो। उनकी आवाज के सामने जनता की आवाज भला नेता कभी सुन पाए हैं, जो अब सुनेंगे। वैसे जब नेताओं की गाडिय़ां पपीताराम की बनाई सड़कों से गुजरती है, तो उनकी तोंद का सारा पानी बराबर हो जाता है, तब उन्हें पता लगता है कि वाकई गोलमाल ज्यादा ही है और कमीशन कम। पपीताराम तो चाहता है कि मैं भी उसके धंधे में पार्टनर बन जाऊं, पर हिम्मत नहीं होती। मैं उससे कहता हूं कि क्या होगा, पाप की कमाई से। इस बात पर पपीताराम हंसता है और बोलता है कि अब सीधे का जमाना कहां रह गया है जी। जैसे भी माल हाथ लगे, बस बटोरो और चलते बनो। वैसे भी ये तो सीजनेबल धंधा है। हम कौनसा बारहों महीने माल सूतते हैं। हमसे बड़े कई पापी हैं, जो साल के 365 दिन बस सरकारी नोट गिनने में लगे रहते हैं। हम सोच रहे थे कि कह तो इसकी सही है कि कलयुग में जब सत्य बचा ही नहीं है, तो फिर थोड़ा-बहुत पाप करने में जाता क्या है। हम बड़ा फैसला करने के मूड में ही थे कि इतने में कमबख्त हमारी आत्मा आडे आ गई और अपने बापू की बचपन में सिखाई बातें याद करा गई और हम दुबारा सदाचार की पटरी पर आ गए। अब तो शायद अगले सावन में ही हम पपीताराम के पाले में आ पाएंगे, चलो तब तक क्यों ना सावन की ठंडी फुहारों का मजा लेकर ही दिल को तसल्ली दी जाए।
- आशीष जैन
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