07 August 2009

सलामत रहे मेरा वीरा


कहते हैं कि दर्द की शक्ल चाहे जैसी हो, लेकिन इसकी कसक एक जैसी होती है। दर्द का एक सैलाब दलबीर कौर के दिल में भी उमड़ रहा है। यह दर्द है अपने भाई से जुदा होने का, उसकी जिंदगी को बचा पाने की नाउम्मीदी का। बीस साल हो गए, भाई सरबजीत सरहद पार पाकिस्तान की जेल में बंद है और किसी भी पल उसके जीवन की डोर टूट सकती है। लेकिन बहन दलबीर की बूढ़ी आंखों में उम्मीद की लौ आज भी झिलमिलाती है। तभी तो वे दुआ करती हैं कि वाहेगुरु......इतनी जिंदगी जरूर बाकी रखना कि मैं अपने भाई को वापस अपनी सरजमीं पर देख सकूं। आइए, राखी के इस पर्व पर एक बहन के हौसलों को मजबूती से थामने की कोशिश करें और यह दुआ मांगें कि उसकी दुआ जरूर कबूल हो।

'चंदा रे मेरे भैया से कहना, बहना याद करे...' दलबीर कौर के मोबाइल फोन पर बजती कॉलर ट्यून बरबस ही भाई-बहन के प्यार की याद दिलाती है। पाकिस्तान के जेल में बीस सालों से कैद है सरबजीत सिंह। इधर बहन दलबीर जी-जान से जुटी है कि उसकी फांसी की सजा माफ हो जाए। दलबीर बार-बार कहती है, 'मेरा भाई आतंकी नहीं है, उसको फंसाया गया है, वो बेकसूर है। पाकिस्तान सरकार उसे मंजीत बताकर झूठे केस में फंसा रही है।'
कोई बहन अपने भाई से न बिछुड़े
पिछले बीस सालों से दलबीर हर बरस रक्षाबंधन की थाली सजाती है, राखी खरीदती है, वीरा की पसंदीदा मिठाई भी खरीदती है, पर कलाई की जगह उसकी तस्वीर को राखी बांधकर दिल को दिलासा देती है। जब दलबीर का दबा हुआ दर्द आंसुओं की धार में बहता है, तो वे रुंधे हुए गले से कहती हैं, 'जब भाई साथ में था, तो मैं राखी से एक दिन पहले ही बाजार से राखी और मिठाई खरीद लाती थी, गुझिया बनाती थी। मैं उससे कहा करती थी कि जब तक मैं राखी न बांध दूं, कुछ मत खाना। उस दिन सरबजीत जानबूझकर मुझे परेशान करने और चिढ़ाने के लिए शोर मचाता रहता कि 'दीदी जल्दी राखी बांधो, मुझे बहुत भूख लगी है।'

18 साल की जुदाई, 48 मिनट का मिलन
पिछले 24 अप्रैल को अपने वीरा के साथ पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बिताए 48 मिनट आज भी दलबीर की स्मृतियों में हैं। सरबजीत की यादें लेकर जब परिवार लौट रहा था तो कुछ आंसू खुशी के थे, तो कुछ गम के। उनकी दोनों बेटियों पूनम और स्वप्निल, पत्नी और बहन दलबीर कौर के लिए वे पल सपनों जैसे थे। सलाखों के एक ओर सरबजीत था और दूसरी ओर बहन दलबीर और पूरा परिवार। रक्षाबंधन के त्योहार पर दलबीर हर बार सरबजीत की राखी को सहेज कर रख लेती थी। उसे आस थी कि एक न एक दिन वह इन राखियों को भाई की कलाई पर जरूर बांधेगी। जेल में दलबीर अपने साथ पिछले 18 सालों की 18 राखियां लेकर गई थीं। जब दलबीर राखी बांधने लगी, तो सरबजीत ने पूछा- इतनी राखियां? फिर बचपन की तरह उन पर झपट पड़ा। उसने वीरा की कलाई पर 18 राखियां बांधीं और हाथ को चूमा, तो सभी भावुक हो गए। सरबजीत के गालों पर मोटे-मोटे आंसू भरभरा गए। वो बोला, 'बहना, हिम्मत रख। मैं बेकसूर हूं, मैं वापस जरूर आऊंगा। आज तो मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है। सिवा शुभकामना के मैं क्या दे सकता हूं।' फिर सरबजीत ने खुद अपने हाथों से चाय बनाई। जब सरबजीत ने अपनी बेटी को देखा, तो उसके मुंह से पहला शब्द निकला, 'पूनम मेरी बेटी...' और फिर एक बेटी अपने बाप से लिपट गई। लेकिन बाप बेटी के बीच सलाखें थीं, इसलिए पूनम ठीक से अपने पापा के गले नहीं मिल सकी। अठारह सालों की जुदाई में मिलन के 48 मिनट कब गुजर गए, पता ही नहीं लगा। जब विदाई का वक्त आया, तो बहन की आंखें छलछला उठीं, सब बिलख उठे।
दीवारों से बातें करता होगा
दलबीर बार-बार खुद से सवाल करती हैं, 'एक छोटी-सी कोठरी में मेरा भाई धरती पर कैसे सोता होगा, वहां तो न सोने के लिए बिस्तर है, न ओढऩे के लिए चादर। बस चारों ओर तन्हाई पसरी रहती है। जब हमारी याद आती होगी, तो दीवारों से बातें करता होगा। मैं तो इसी आस में जिंदा हूं कि एक दिन वो लौटकर घर आएगा और हमारा घर खुशियों से चहकेगा। पिछली राखी पर पाकिस्तान सरकार ने मुझे वीजा नहीं दिया था, पर इस बार मुझे उम्मीद है कि मैं पाकिस्तान जाकर अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने की तमन्ना जरूर पूरी करूंगी।'
- अमलेंद्रु उपाध्याय के साथ आशीष जैन का राखी पर छोटा सा प्रयास

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06 August 2009

हिंदुस्तानी रंग हैं प्रिय


अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने हाल की अपनी भारत यात्रा के दौरान अपने पहनावे को लेकर काफी सुर्खियां बटोरीं। आइए जानते हैं क्या है उनके बेहतरीन पहनावे का राज-उम्र के हर दौर में हिलेरी अपने पहनावे को लेकर कॉन्शियस रही हैं। उनका फैशन स्टेटमैंट बहुत सीधा है- कूल एंड कंफर्ट डे्रसिंग। वे मौसम के मुताबिक कपड़े पहनना पसंद करती हैं। अगर उन्हें लगता है कि लाल रंग के सूट के साथ उन पर ज्वैलरी फबेगी, तो बेहिचक नया ज्वैलरी कलैक्शन खरीद लेती हैं। वैसे ब्लैक एंड व्हाइट का कॉम्बिेशन उनका ऑलटाइम फेवरेट ड्रेस है। मशहूर फैशन डिजाइनर रितु कुमार का कहना है कि वे पारंपरिक कपड़ों को बेहद सलीके से पहनती हैं। उनका नजरिया चाहे अमरीकन हो, पर उनकी डे्रसेज के रंग अधिकतर भारतीय होते हैं।

बकौल फैशन डिजाइनर तरुण ताहिलियानी हिलेरी हमेशा इस बात का ध्यान रखती हैं कि कहां-क्या पहनना चाहिए। अगर वे किसी राजनीतिक मुलाकात के लिए निकलती हैं, तो उनके कपड़ों में सादगी और सौम्यता रहती है, वहीं पार्टीज और हॉलीडे पर जाते वक्त वे कूल डे्रस प्रिफर करती हैं। जब भी वे भारत की यात्रा पर होती हैं, तो उनके सिंगल टोन सूट्स की बहार देखते ही बनती है। फैशन डिजाइनर डेविड अब्राहम का मानना है कि वे अपने पहनावे में गजब के इमेजिनेशन का इस्तेमाल करती हैं। चाहे वे पश्चिमी संस्कृति के कपड़े पहनती हों, पर उन्हें पहनने का अंदाज वाकई तारीफ के काबिल है।
इकसठ साल की हिलेरी जब अपने पति और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ भारत दौरे पर आई थीं, तब भी उनके स्टाइलिश कपड़ों से सभी इंप्रेस थे। इस बार की यात्रा के दौरान उनके चमकदार बंद गले के बिजनेस सूट और गले में पतले प्लेटिनम-गोल्ड नेकलैस ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। डे्रसेज का चुनाव करते वक्त वे अपनी हेयर स्टाइल का भी बहुत खयाल रखती हैं। अपने पहनावे से वे एक असर छोड़ती हैं और जतलाती हैं कि वे निर्भीक और बुलंद इरादों की महिला हैं। उनकी मुस्कान उनके पहनावे में चार चांद लगा देती है।
कॉलेज के दिनों में वे स्कर्ट, शार्ट फ्रॉक और डेनिम पसंद करती थीं। बाद में वे डोन्ना कारान और ऑस्कर डेला रेंटा के डिजाइन किए हुए लॉन्ग स्लीव्स, हाई कॉलर्स और नेकलाइन ज्वैलरी प्रिफर करने लगीं। शादी के वक्त उनका पहना सफेद गाउन रिश्तों के लिए उनके समर्पण को दर्शा रहा था। 1983 में जब उन्होंने ब्ल्यू हैट के साथ मेजंटा और व्हाइट चैक्ड शर्ट पहनी, तो सबकी तारीफें बटोरीं। उनका मानना है कि वे अपने पहनावे के प्रति सजग है और लगातार इसमें बदलाव की हिमायती हैं।
-आशीष जैन

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05 August 2009

उइगरों की रेबिया


बासठ साल की रेबिया को चीन की सरकार हाल में हुए दंगों के लिए जिम्मेवार ठहराया है। पर वे खुद को मानवाधिकार की हितैषी बताती हैं। जानते हैं रेबिया की जिंदगी के अनछुए पहलुओं को-
मानवाधिकार के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने के लिए उन्हें 2004 में 'राफ्टो पुरस्कारÓ से सम्मानित किया गया। उइगर लोग संघर्ष करते वक्त उनकी तस्वीरें हाथों में लिए होते हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी के छह साल चीन की जेल में गुजारे हैं। बच्चों की शिक्षा के लिए वे अपने डिपार्टमेंटल स्टोर के कमरों में क्लासेज चलाती थीं। उन्होंने उइगर महिलाओं को खुद का रोजगार विकसित करने के लिए 'थाउजेंड मदर मूवमेंटÓ चलाया। हम बात कर रहे हैं रेबिया कदीर की।

वे कभी चीन की सबसे अमीर महिलाओं में से एक हुआ करती थीं, पर आज उनके पास अपना एक पैसा भी नहीं है और वे अमरीका के वॉशिंगटन में निर्वासित जीवन बिता रही हैं। हान जाति और शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर जाति के बीच में हुए दंगों के सरकार उन्हें जिम्मेवार ठहरा रही है।
उइगरों की मां
रोचक बात है कि जिस राबिया पर चीन में दंगे फैलाने का आरोप लगाया जा रहा है, उन्हें 2006 में नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। उसी साल म्यूनिख में उन्हें 'विश्व उइगर कांग्रेस' का चेयरमैन बनाया गया है। वे एक करोड़ से ज्यादा उइगरों की मां मानी जाती हैं। गौर करने वाली है कि रेबिया कभी चीन की संसद की सदस्य थीं और चीन की सरकार ने एक समय उनके कामों की सराहना की थी और 1992 में उन्हें 'पालिटिकली कन्सलटेटिव कांग्रेसÓ का सदस्य नियुक्त किया गया था। साथ ही 1995 में यूनाइटेड नेशंस के महिलाओं पर हुए चौथे विश्व सम्मलेन में वे चीन की तरफ से भेजे गए डेलीगेट्स में एक सदस्य थीं। उसी चीन की सरकार ने उन पर आरोप लगा दिया कि वे राष्ट्र विरोधी कामों में संलग्न हैं। देशद्रोह के आरोप लगाकर चीन की सरकार उन्हें छह साल के जेल में डाल दिया। पूरी दुनिया के दबाव में आकर चीन सरकार ने उन्हें बरी तो किया, पर निर्वासित जीवन जीने पर मजबूर कर दिया।
संघर्ष से संवारी जिंदगी
रेबिया का जन्म 21 जनवरी 1947 को एक गरीब परिवार में हुआ। पर वे शुरु से ही संघर्षशील महिला रहीं। लॉन्ड्री के काम से अपने बिजनेस की शुरुआत करके वे एक टे्रडिंग कंपनी की मालिक बनीं। उन्होंने एक प्रोजेक्ट के तहत उइगर महिलाओं को रोजगार शुरू करने के लिए धन मुहैया कराया। 1997 के शिनजियांग के गुलजा उइगर नरसंहार के बाद वे चीनी सरकार के विरोध में उतर आईं। 1999 के आते-आते चीनी सरकार ने उन पर देशद्रोह का इल्जाम लगाकर जेल में डाल दिया। साल 2005 में उस समय की अमरीकी विदेश मंत्री कोंडालिसा राइस के हस्तक्षेप के चलते उन्हें रिहा किया गया। उन्होंने दो शादियां की। रेबिया के ग्यारह बच्चे हैं। उनके दो बच्चे अभी भी जेल में हैं। वे उइगरों के हक के लिए किए जाने वाले शांतिपूर्ण संघर्ष की पक्षधर रही हैं।
-आशीष जैन

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दोस्त दोस्त ना रहा

जिंदगी की कड़ी धूप में दोस्ती के नाजुक फूलों को मुरझाने बचाओ, वरना दिल की बगिया सूनी हो जाएगी। पेश हैं दोस्ती की कुछ ऐसी मिसालें, जो वक्त की धूप में धूमिल हो चुकी हैं।
'दीए जलते हैं, फूल खिलते हैं, बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं...' आनंद बख्शी ने जब यह गीत लिखा होगा, तो शायद उनका मन जमाने में सबसे अच्छे दोस्त की खोज में भटक रहा होगा। वाकई अच्छे और सच्चे दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। दोस्ती निभाते वक्त कई बार आप-हम मुश्किल दौर से गुजरते हैं, डर लगता है कि दोस्ती का दीया वक्त की आंधी में बुझ ना जाए। ऐसे में विश्वास की ओट काम आती है और दोस्ती की लौ को और तेज कर देती है। अगर यह जज्बा हर किसी के दिल में उतर जाएगा, तो फिर किसी को ना कहना पड़े- दोस्त दोस्त ना रहा।

मेरे पास दोस्त था (जावेद अख्तर-सलीम खान)
सबसे ज्यादा मेहनताना, सबसे ज्यादा सम्मान और सबसे गहरी दोस्ती... संघर्ष की आंधियों से लड़ता एक एक्टर सलीम जब हजारों लेखकों के बीच में खुद को साबित करने को बेताब लेखक जावेद से मिलता है, उसी दिन यह तय हो जाता है कि विचारों की नाव कल्पना के समंदर में तैरने को तैयार है। जावेद अख्तर और सलीम खान फिल्मी स्क्रिप्ट और संवाद लिखना शुरू करते हैं, तो दुनिया को 'शोले', 'दीवार', 'शक्ति' जैसी फिल्मों का नायाब तोहफा मिलता है। एक टीम के रूप में वे सफलता के हर शिखर को छूते चले जाते हैं। एकाएक जावेद और सलीम की जिंदगी में भूचाल-सा आता है और उनकी राहें जुदा होने लगती हैं। कुछ कहते हैं कि जावेद की जिंदगी में शबाना के आने से ये सब हुआ, वहीं दूसरी ओर यह आवाज भी सुनाई देती है कि सलीम को जावेद का गीत लिखना पसंद नहीं था। जब वे जोड़ी के रूप में संवाद लिखते हैं, तो गीतकार के रूप में जावेद के अकेले का नाम क्यों आए? उनके अलगाव ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को चौंका दिया। अक्सर दोनों कहते हैं, 'क्या अब भी वो मेरे बारे में पूछता है?'

यारी का कठिन खेल (लिएंडर पेस-महेश भूपति)
टेनिस के पैशन की परिभाषा समझनी है, तो लिएंडर पेस और महेश भूपति को जानना जरूरी है। जब इन दोनों खिलाडिय़ों की जोड़ी मैदान पर उतरती है, तो देश को पुरस्कार की आशा बंधने लगती है। 1999 दोनों के कॅरियर के लिए एक शानदार साल था, जब ये जोड़ी टेनिस के चारों ग्रैंडस्लैम्स के फाइनल में पहुंची और विंबलडन और फ्रेंच ओपन जीतकर देशवासियों की झोली में खुशियां भर दीं। उस दौर में सफलता के सबसे ऊंचे पायदान पर चढ़कर वे देश में खूब लोकप्रिय हुए, मैग्जींस के कवर पर छाने लगे, टीवी कार्यक्रमों में अपनी बातें करने लगे। एकाएक न जाने किसकी नजर उन्हें लगी कि दोनों की सफलता के बीच में अहंकार आड़े आ गया। दोनों अपने कोचों को लेकर झगडऩे लगे। 2006 के आते-आते दोनों के बीच रंजिश बढ़ चुकी थी। जल्द ही दोनों खिलाडिय़ों ने फैसला कर लिया कि अब वे एक साथ कभी नहीं खेलेंगे, हालांकि वे बीजिंग ओलंपिक में साथ खेले, पर वहां भी एक-दूसरे को समझने की बजाय कलह बढ़ता ही गया। अब खेलप्रेमियों को शायद ही उनकी जोड़ी एक मैदान पर देखने को मिले।
कहां गुम हुआ याराना... (बच्चन-गांधी परिवार)
एक तरफ फिल्म इंडस्ट्री का बेताज बादशाह है, तो दूसरी ओर हिंदुस्तानी सियासत का सबसे ताकतवर परिवार। आज से लगभग चार दशक पहले इलाहाबाद के बच्चन और गांधी परिवार की दोस्ती मशहूर थी। हरिवंशराय बच्चन और तेजी बच्चन दिवगंत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत निकट थे। कहा तो ये भी जाता है कि संघर्ष के दिनों में अमिताभ को फिल्म इंडस्ट्री में सैट करने के लिए इंदिरा गांधी ने पत्र तक लिखे थे। यह जोड़ उस वक्त सीमेंट की तरह मजबूत हो गया, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अमिताभ ने हेमवतीनंदन बहुगुणा को हराकर राजनीति में प्रवेश किया। समस्या तब खड़ी हुई, जब बोफोर्स दलाली कांड के चलते प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर आंच आई और अमिताभ भी इससे अछूते नहीं रहे। अमिताभ को लगा कि राजनीति उनके लिए नहीं बनी है और उन्होंने सांसद के पद से इस्तीफा दे दिया। 1991 में राजीव की हत्या के बाद बच्चन और गांधी परिवार की खाई गहरी होती गई। तभी बच्चन की जिंदगी में मुलायम सिंह और अमर सिंह का आना हुआ। 'एबीसीएलÓ की विफलता के बाद अमर सिंह के सहयोग से अमिताभ खुद को संभाल पाए। अमिताभ की प्राथमिकताओं में कांग्रेस की बजाय समाजवादी पार्टी आ गई। गांधी-बच्चन परिवार कभी खुलकर एक-दूसरे के विरोध में नहीं आए, पर जया बच्चन ने जब कहा, 'गांधी परिवार मेरे पति के साथ ठीक नहीं कर रहा।', तो राहुल गांधी का जवाब था, 'पूरा देश जानता है कि किसने किसे छोड़ा।'-
दो अलबेली सहेलियां (क्वीनी ढोढी और अंजु तारपोरेवाला)
पूर्व मिस इंडिया क्वीनी ढोढी और थिएटर कलाकार तथा सोशलाइट अंजु तारपोरेवाला मुंबई में अपनी दोस्ती के लिए मशहूर थीं। एक-दूसरे के घर को अपना समझने वाली क्वीनी और अंजु की जिंदगी अच्छी चल रही थी, तभी उनकी जिंदगी में जलजला आया। चारों ओर अफवाह ने जोर पकड़ लिया कि अंजु के पति फरहाद तारपोरेवाला और क्वीनी के बीच अफेयर है। क्वीनी ने एक मैग्जीन को दिए इंटरव्यू में इस बात को पुख्ता कर दिया। दोनों परिवारों की ओर से समझाइश की कोशिशें की गईं, पर बात नहीं बनीं। क्वीनी के पति राजा को तो एक झटका लगा, पर अंजु ने तो अपना पति और सबसे अच्छी दोस्त दोनों को खो दिया। अंजु अपनी आंखों के सामने यह सब होता देख रही थीं, पर फिर भी उन्होंने खुद को संभाल लिया। अब अंजु दुबारा से थिएटर के काम में लग गई हैं। वहीं फरहाद और क्वीनी अब साथ-साथ पार्टियों में और मूवीज जाते हुए नजर आने लगे हैं। हाल ही क्वीनी की नई ज्वैलरी लाइन के लॉन्च के मौके पर दोनों साथ ही थे।
-आशीष जैन

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29 July 2009

निरूपमा का जवाब नहीं


एक अगस्त से देश के विदेश सचिव का पद संभालने वाली निरूपमा राव की जिंदगी के कुछ अनछुए पहलू-
एक ओर विदेश सेवा के संजीदा काम की धूप और दूसरी ओर काव्य और संगीत की ठंडी छांव। जब ये धूप-छांव मिलती हैं, तो ऐसे व्यक्तित्व का सृजन होता है, जो हर परिस्थिति में उचित निर्णय लेता है। देश की नई विदेश सचिव निरूपमा राव की यही खूबी उन्हें भीड़ से जुदा करती है। वे 1973 बैच की आईएफएस टॉपर हैं। 21 साल की उम्र में विदेश सेवा से जुडऩे वाली निरूपमा को विदेश मंत्रालय की पहली महिला प्रवक्ता होने का गौरव हासिल है।

संवेदनाओं से लबरेज
वे अपने साथियों के बीच अच्छे ड्रेसअप के लिए जानी जाती हैं। उनके पास ज्वैलरी का अच्छा कलैक्शन है। वे एक प्रशिक्षित क्लासिकल डांसर हैं और सावर्जनिक रूप से परफॅार्मेंस दे चुकी हैं। वे गिटार भी बजाती हैं। उन्हें कविताएं लिखने का शौक है। उनकी कई कविताएं छप भी चुकी हैं। साथ ही वे कर्नाटक संगीत की भी अच्छी जानकार हैं। काव्य और संगीत का असर उनके व्यक्तित्व में साफ झलकता है। उनकी आवाज में कवियों के ओज और नारी की कोमलता का अद्भुत मिश्रण है। एक कवयित्री के तौर पर वे संवेदनाओं और भावनाओं से लबरेज हैं। पर जब वे बड़े फैसले लेती हैं, तो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखती हैं। छह दिसंबर, 1950 को केरल में जन्मीं निरूपमा एक आर्मी अफसर की बेटी हैं। उन्होंने महाराष्ट्र की मराठा यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया है। उनके पति सुधाकर राव भी भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। उनके दो बेटे हैं। दिलचस्प बात है कि लोकसभा की पहली महिला स्पीकर मीराकुमार और निरुपमा एक ही आईएफएस बैच से थीं।
खरी-खरी सुनाती हैं
बतौर विदेश सचिव उनके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश में अशांति के माहौल में अपना दृढ़ पक्ष रखना एक प्रमुख काम है, वहीं अमरीका की कूटनीतिक चालों का जवाब देने में भी उन्हें अपना कौशल दिखाना होगा। वे इस पद को पाने वाली देश की दूसरी महिला होंगी। इससे पहले 2001 में कुछ समय के लिए चोकिला अय्यर भी विदेश सचिव के पद पर काम कर चुकी हैं। 58 साल की निरुपमा अभी चीन में भारत की राजदूत हैं। चीन में राजदूत बनने से पहले वे बतौर विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता दुनिया को खरी-खरी बातें सुनाने के लिए मशहूर रहीं। उन्होंने पाकिस्तान, चीन, नेपाल, अमरीका जैसे देशों के सामने देश का पक्ष बड़ी मजबूती और बेहद विनम्रता से रखा, बिल्कुल तनाव मुक्त होकर। वे श्रीलंका में उच्चायुक्त और पेरू में देश की राजदूत रह चुकी हैं। वे मॉस्को स्थित भारतीय मिशन में भी काम कर चुकी हैं। साथ ही विदेश मंत्रालय में पूर्वी एशिया मामलों की संयुक्त सचिव भी रह चुकी हैं।
-प्रस्तुति: आशीष जैन

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08 July 2009

सुअरों से फ्लू: स्वाइन फ्लू

स्वाइन फ्लू का नाम कुछ दिनों पहले शायद डॉक्टरों या इतिहासकारों को ही पता था, पर अब इस बीमारी से पूरी दुनिया वाकिफ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) इसे विश्व महामारी घोषित कर चुका है। स्वाइन फ्लू या इन्फ्लुएन्जा या एक अत्यन्त संक्रामक किस्म के जुकाम के खिलाफ अब पूरी दुनिया में छठे स्तर का अलर्ट जारी है। पिछले चालीस सालों में पहली बार किसी बीमारी को वैश्विक स्तर पर खतरे की उच्चतम छठी अवस्था तक आंका गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का आश्वासन है कि इस बीमारी का टीका सितंबर तक आ जाएगा। हमारे देश में इस वक्त स्वाइन फ्लू से पीडि़तों की संख्या 70 के करीब बताई जा रही है और तेजी से संख्या में इजाफा भी हो रहा है।

स्वाइन फ्लू का वायरस दुनिया के 80 देशों में फैला हुआ है और करीब 50 हजार लोग इससे पीडि़त हैं। इस बीमारी से 200 लोगों की मौत भी हो चुकी है। हमारे देश के नीतिनिर्धारकों को इस बीमारी पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। पोलियो, मलेरिया जैसी पुरानी बीमारियों के बीच इस नई बीमारी पर नियंत्रण के लिए हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। गौरतलब बात है कि जिन देशों में स्वाइन फ्लू का असर ज्यादा देखने में आया है, वे सभी विकसित राष्ट्र रहे हैं, इन देशों की स्वास्थ्य प्रक्रिया का पूरा विकसित तंत्र है। ऐसे में विकासशील देशों को अपने सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए कुछ खास कदम उठाने होंगे।
नया फ्लू है ये
स्वाइन फ्लू सुअरों से उत्परिवर्तित वायरस से हुआ है। सुअरों को एविएन और ह्यूमन एन्फ्लूएंजा स्ट्रेन दोनों का संक्रमण हो सकता है। इसलिए उसके शरीर में एंटीजेनिक शिफ्ट के कारण नए एन्फ्लूएंजा स्ट्रेन का जन्म हो सकता है। किसी भी एन्फ्लूएंजा के वायरस का मानवों में संक्रमण श्वास प्रणाली के माध्यम से होता है। इस वायरस से संक्रमित व्यक्ति का खांसना और छींकना या ऐसे उपकरणों का स्पर्श करना जो दूसरों के संपर्क में भी आता है, उन्हें भी संक्रमित कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सुअर (स्वाइन), पक्षी और इंसान तीनों के जीन मिलने से बना एच1एन1 वायरस सामान्य स्वाइन फ्लू वायरस से अलग है। पिछले कुछ सालों में मनुष्य में संक्रमित होने वाले इंन्फ्लुएंजा वायरस से इसका कोई वास्ता नहीं है। वैज्ञानिक अभी इस खोज में लगे हुए हैं कि इस वायरस का मूल स्रोत क्या है। बर्ड फ्लू और मानवीय फ्लू के विषाणु से सुअरों में संक्रमण शुरू हुआ। फिर सुअर के राइबोन्यूक्लिक एसिड (आरएनए) से मिलकर नए वायरस स्वाइन इन्फ्लुएंजा ए (एच1एन1) का जन्म हुआ। तब इन्फ्लुएंजा ए (एच1 एन1) का सुअर से मनुष्य में संक्रमण संभव हो सका। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह वायरस किसी भी मौसम में फैल सकता है और हर आयुवर्ग के लोगों को आसानी से अपनी चपेट में ले सकता है। स्वाइन फ्लू के दौरान बुखार, तेज ठंड लगना, गला खराब हो जाना, मांसपेशियों में दर्द होना, तेज सिरदर्द होना, खांसी आना, कमजोरी महसूस करना आदि लक्षण तेजी से उभरने लगते हैं। एन्फ्लूएंजा वायरस लगातार अपना स्वरूप बदलने के लिए जाना जाता है। यही वजह है कि एन्फ्लूएंजा के वैक्सीन का भी इस वायरस पर असर नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि छींक के दौरान सभी लोगों को अपनी नाक पर रुमाल या कपड़ा रखना चाहिए। बाहरी खान-पान से ही परहेज ही रखना चाहिए। इस बीमारी में यह शंका गलत है कि हमें यात्रा से बचना चाहिए, नहीं तो हमें यह फ्लू हो सकता है। सुअर का मांस खाने से स्वाइन फ्लू नहीं होता। स्वाइन फ्लू खाने के जरिए नहीं फैलता। इसलिए सुअर के मांस से बने फूड प्रोडक्ट इस मामले में सुरक्षित हैं। कुछ एंटी वायरल दवाइयां स्वाइन फ्लू से राहत देने में असरकारक साबित हुई हैं। टेमिफ्लू तथा रेलेंजा जैसी दवाईयां इस फ्लू में फायदा देती हैं।

कैसे पड़ा नाम
इन्फ्लुएंजा ए वायरस की सतह पर दो प्रोटीन हीमाग्लूटीनिन (एच) और न्यूरामिनिडेज (एन) होते हैं। आनुवांशिक उत्परिवर्तन के कारण इन प्रोटीनों की संरचना में परिवर्तन होता है और वायरस की दूसरी किस्में तैयार हो जाती हैं। हर किस्म का नाम एक एच और एक एन संख्या के आधार पर तय किया जाता है। मनुष्यों में एच की 1,2,3 और एन की 1 और 2 किस्में पाई जाती हैं।

इंसान में स्वाइन फ्लू की अवस्थाएं-
स्थापित रोगी (कन्फम्र्ड)- ऐसे रोगी जिनमें स्वाइन फ्लू रोग के सारे लक्षण होते हैं। वे स्थापित रोगी होते हैं। इनके रोग की पुष्टि रियल टाइम पी.सी.आर. या वाइरस कल्चर या एच1एन1 वाइरस स्पेसिफिक न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज के स्तर में चार गुना इजाफे की बात एक या सब जांचों से पता हो चुकी होती है।
संभावित रोगी (सस्पेक्टेड)- वे रोगी जिनमें स्थापित रोगी के संपर्क में आने के सात दिन के अंदर-अंदर फ्लू के लक्षण उत्पन्न हुए हों और जिनकी जांच से पुष्टि होना शेष हो।
निकट संपर्क वाले रोगी (क्लोज कॉन्टेक्ट)- स्थापित और संभावित रोगी के आस-पास 6 फुट के दायरे में रहने वाले व्यक्ति जो अभी प्रकट रूप से स्वस्थ दिख रहे हों।

कौनसी बीमारी है महामारी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक किसी बीमारी को महामारी घोषित करने के छह चरण तय किए गए हैं।
1. जब इंसान में संक्रमण की वजह किसी जानवर से आया इन्फ्लुएंजा वायरस नहीं होता।
2. जब पालतू या जंगली जानवर में फैल रहे वायरस से मनुष्य में संक्रमण फैलता है।
3. जब जानवरों में फैल रहा कोई वायरस या इंसान और जानवर के जीनों के मिलने से बना कोई वायरस एक बड़े समूह के बीच संक्रमण का कारण बनता है।
4. जब इंसान से इंसान में संक्रमण फैलने की पुष्टि हो जाती है।
5. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक क्षेत्र के ही दो या दो से अधिक देशों में संक्रमण बड़े पैमाने पर फैलने लगे।
6. विश्व स्वास्थ्य संगठन के ही किसी दूसरे क्षेत्र का कम से कम एक और देश जब इसी संक्रमण की चपेट में आ जाए।

स्वाइन फ्लू का इतिहास
1918 की ब्लैक डेथ डिजीज- 1918 में स्वाइन फ्लू की बीमारी इंफ्लुएंजा वाइरस एच1एन1 की वजह से फैली थी। रोग का वायरस सुअरों से इंसानों में फैला और फिर इंसानों के इंसानों में संपर्क में आने से पूरी दुनिया को चपेट में लेता गया। दुनियाभर में इससे करीब दो करोड़ लोगों की मौत हुई। तब इस बीमारी को ब्लैक डैथ का नाम दे दिया गया।
अमरीका में 1976 का स्वाइन फ्लू- 5 फरवरी, 1976 को अमरीका के फोर्ट डिक्स में अमरीकी सेना के सैनिकों को थकान की समस्या होने लगी। बाद में पता लगा कि यह बीमारी स्वाइन फ्लू ही है और एच1एन1 वायरस के नए स्ट्रेन की वजह से फैल रही है। इस वायरस का प्रकोप 19 जनवरी से 9 फरवरी तक ही रहा। यह वायरस फोर्ट डिक्स से बाहर नहीं फैल पाया। उस दौरान इसका टीका तैयार किया गया, जो तकरीबन 4 करोड़ लोगों को लगाया गया। इस टीके से कुछ लोगों की मौत भी हुई, तो तत्कालीन सरकार ने इस पर रोक लगा दी।
1988 का वॉलवर्थ काउंटी स्वाइन फ्लू- 1988 में जब एक दंपती बारबरा वीनर्स और एड वॉलवर्थ काउंटी में सुअरों के मेले में गए, तो वापस लौटने पर उन्हें फ्लू हो गया। डॉक्टर गर्भवती बारबरा को नहीं बचा पाए, पर उसका बच्चे को जीवित बचा लिया गया। बाद में सुअरों के साथ रहने वाले सैकड़ों लोगों में संक्रमण पाया गया। यह बीमारी गंभीर रूप धारण नहीं कर पाई। बाद में वैज्ञानिकों को पता लगा कि यह वायरस स्वाइन फ्लू वाइरस स्टे्रन एच1एन1 में उत्परिवर्तन के कारण सुअरों में विकसित हुआ था, जो बाद में इंसानों तक पहुंच गया था।
2007 का फिलीपींस का स्वाइन फ्लू- फिलीपींस में 20 अगस्त 2007 में नुयेवा एसिजा और सेंट्रल ल्यूजोन में स्वाइन फ्लू फैला था। इसमें रोगियों को भयंकर रूप से उल्टियां और दस्त होने लगे। स्थानीय लोगों ने इसे हॉग कॉलरा कहकर पुकारा। फिलीपींस में रेड अलर्ट जारी किया गया और यह विश्वव्यापी महामारी बनने से बच गया।
2009 का मैक्सिको का स्वाइन फ्लू- मैक्सिको से शुरू हुआ स्वाइन फ्लू इस बार फिर पूरी दुनिया में फैल चुका है और इससे पीडि़त लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बीमारी को अब विश्वस्तरीय महामारी भी घोषित कर दिया है।

महामारियां अब तक
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 1889 से अब तक दुनिया में पांच बार महामारियों का प्रकोप हो चुका है। 1889 में रशियन फ्लू से तकरीबन 10 लाख लोगों की मौत हुई। 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू से लगभग दो-तीन करोड़ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। 1957 के एशियन फ्लू में लगभग 30 लाख लोगों की जानें गईं। 1968 के हांगकांग फ्लू में 15 लाख लोग मरे और 2009 में इन्फ्लुएंजा ए (एच1एन1) वायरस से लगभग 200 लोगों की मौत हो चुकी है।

भारत में महामारी
बंगाल में हैजा
1816 से 1826 के बीच बंगाल में हैजा महामारी से दस हजार से ज्यादा लोगों की जानें गई थीं।
स्पेनिश फ्लू
1918 से 1919 के दौरान भारत में फैले स्पेनिश फ्लू से तकरीबन एक लाख से ज्यादा लोगों को अपने हाथ से जान गंवानी पड़ी।
कोढ़ की बीमारी
1980 के दशक में चीन और इजिप्ट के साथ-साथ हमारे देश में फैली कोढ़ की बीमारी से बीस लाख से ज्यादा लोग विकलांग हो गए थे।
प्लेग
1994 में गुजरात के सूरत में फैले प्लेग से 52 लोगों की जानें गईं।

कुछ खास संक्रमित बीमारियां
सार्स
सार्स का पूरा नाम है- सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम। यह बीमारी चीन में 2002 और 2003 के बीच में फैली थी। इस बीमारी ने 37 देशों को जकड़ लिया था और लगभग एक हजार लोगों की मौतें हुईं।
एंथे्रक्स
2001 में अमरीका में एथे्रक्स के बायोलॉजिकल आक्रमण होने लगे और हजारों अमरीकी इससे संक्रमित हो गए।
-आशीष जैन

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लेबनान में लोकतंत्र की बहार

पूरी दुनिया की निगाह हमेशा की तरह दक्षिण एशिया पर टिकी हुई है। अमरीका के नए राष्ट्रपति बराक ओबामा और विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन चाहते हैं कि मध्यपूर्व में उनकी सत्ता हमेशा कायम रहे। मध्य पूर्व के इराइराल-फिलिस्तीन, ईरान, लेबनान, सीरिया जैसे देशों की राजनीतिक गणित दरअसल अमरीका ने ही बिगाड़ रखी है। इन सब देशों में भी मध्य-पूर्व में बसे लेबनान देश पर पूरी दुनिया की निगाह हमेशा से टिकी रहती हैं। खासकर इन दिनों दुबारा उस पर अमरीका सहित दुनिया के देशों का ध्यान है। हाल ही लेबनान में संपन्न आम चुनावों में लेबनान में सत्तारूढ़ मार्च 14 गठबंधन ने भारी बहुमत हासिल किया और फिर से सरकार बनाने का दावा पेश किया। इस गठबंधन को अमरीका, फ्रांस, इजिप्ट और सऊदी अरब का समर्थन हासिल था। अमरीका और उसके समर्थक देश चाहते थे कि सत्तारूढ़ गठबंधन इस बार भी विजय प्राप्त करे और उसे लेबनान के लिए अपनी नीतियों में ज्यादा फेरबदल ना करना पड़े। जबकि दूसरी ओर इन चुनावों में सीरिया और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह गठबंधन था। चुनावों में इसको करारी हार का सामना करना पड़ा। मार्च 14 गठबंधन के अध्यक्ष साद हरीरी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद जताई जा रही है। लेबनान की संसद में कुल मिलाकर 128 सीट हैं। जिनमें 64 मुसलमानों के लिए और 64 ईसाइयों के लिए हैं। इन चुनावों में मार्च 14 गठबंधन को 71 सीटें मिली हैं। चरमपंथी हिजबुल्लाह समर्थित क्रिस्चियन पार्टी को 57 सीटें ही मिलीं। हिज्बुल्लाह को शिया उग्रवादी समूह माना जाता रहा है। दरअसल लेबनान का ईसाई समुदाय दोनों खेमों के बीच बंटा रहता है। हिजबुल्लाह को भी ईसाइयों और शियों के समर्थन से इस चुनाव में जीत की उम्मीद थी। लेबनान में मतदान करने के योग्य लोगों की संख्या तकरीबन 30 लाख है।

इतना मतदान पहली बार
खास बात है कि साद हरीरी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ मार्च 14 गठबंधन ने ही 2005 में भारी जीत के साथ सरकार बनाई थी। साद हरीरी लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी के बेटे हैं। उसी वर्ष साद हरीरी के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की बेरूत में एक कार बम धमाके में मौत हो गई थी। इस कार बम धमाके के बाद सीरिया को करीब 29 वर्ष बाद लेबनान से हटना पड़ा था क्योंकि उस पर कार बम धमाके में शामिल होने के आरोप लगे थे। हालांकि सीरिया इसका खंडन करता रहा है। रफीक हरीरी की मौत के बाद सीरिया विरोधी पार्टियों ने मिलकर मार्च 14 गठबंधन का एलान किया था। इस गठबंधन का एजेंडा लेबनान की सरकार में सीरिया के हितों के लिए काम कर रहे तत्वों को खत्म करना और लेबनान में तैनात सीरिया के सैनिकों को वापस भेजना था। सीरिया ने 1976 में लेबनान में चल रहे गृह युद्ध को खत्म करने के लिए वहां अपने 40,000 सैनिक तैनात किए थे। लेकिन गृह युद्ध खत्म होने के बाद भी सीरिया के सैनिक लेबनान में ही रहे। रफीक हरीरी की मौत के बाद बने दबाव के चलते सीरिया ने 2005 में अपने सारे सैनिकों को वापस बुला लिया था। इतना मतदान लेबनान के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। साल 2005 के मुकाबले इस बार ज्यादा लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया और चुनावों में करीब 52 फीसदी मत पड़े। इन नतीजों से अमरीका को राहत मिली है, क्योंकि उसने स्पष्ट किया था कि अगर विपक्षी गठबंधन को चुनाव में जीत मिलती है तो अमरीका लेबनान से अपने रिश्तों की समीक्षा करेगा। ऐसे में अमरीका चुनावी नतीजों से बेहद खुश है।
हिजबुल्लाह को जनता का समर्थन
लेबनान सालों से युद्ध की विभीषिका, सम्प्रदायिक हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता को झेल रहा है। ऐसे में स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रणाली से दुबारा स्थायी सरकार का बनना देश के भविष्य के लिए सुखद संदेश है। लेबनान की घटनाएं मध्यपूर्व की सामरिक स्थिति में बदलाव का संकेत प्रस्तुत करती हैं। 2006 की बात करें, तो उस वक्त इजराइल ने लेबनान पर हमला कर दिया था। ऐसे में हिजबुल्लाह ने ही इजराइल को मुंह की खाने पर विवश कर दिया था। इजराइल अमरीका का समर्थन प्राप्त करके लेबनान पर धावा बोल चुका था और अमरीका लोकतंत्र का छद्म चेहरा दुनिया के सामने बेनकाब हो चुका था। ऐसे में हिजबुल्लाह ने राष्ट्रवादी नीतियों को तवज्जोह देते हुए लेबनान को संकट से बचाया था। ऐसे में अगर अमरीका दुनिया के सामने यह कहता है कि अगर इन चुनावों में हिजबुल्लाह की जीत हो जाती, तो लेबनान में नए संकट आ सकते थे, पूरी तरह गलत है। 2006 के हमले के दौरान इजराइल ने लेबनान को तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेबनान के एक हजार से ज्यादा नागरिकों की जानें गई थीं। ऐसे में लेबनानी सरकार ने इजराइल को सबक सिखाने की बजाय हिजबुल्लाह के निशस्त्रीकरण की मांग शुरू कर दी थी। यह सब अमरीका की ही कारगुजारियां थीं। ऐसे में हिजबुल्लाह ने भी सरकार में एक तिहाई भागीदारी की मांग की। उस वक्त सिनोरिया सरकार अड़ी रही और हिजबुल्लाह के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। पर हिजबुल्लाह ने भी सिनोरिया सरकार को धूल चटा दी क्योंकि हिजबुल्लाह को भी लेबनान में जनता का भारी समर्थन प्राप्त है।
राष्ट्रपति चुनाव अभी बाकी हैं
सिनोरिया सरकार की चाल थी कि वह अपने देश लेबनान की सेना को इजराइल के खिलाफ नहीं बल्कि हिजबुल्लाह के खिलाफ उतारना चाहती थी। सिनोरिया सरकार समर्थक पार्टियों में उस वक्त सबसे बड़े घटक के नेता साद हरीरी एक बड़ी निर्माण कंपनी के मालिक हैं, इस कंपनी की गणना दुनिया की 500 सबसे बड़ी कंपनियों में होती है। साद हरीरी ने संभवत यही सोचा होगा कि इजराइली हमलों से लेबनान के विध्वंस से उनकी कंपनी को बहुत सा कारोबारी फायदा हो सकता है। इसके साथ ही अब मार्च 14 गठबंधन चाहता है कि किसी तरह राष्ट्रपति पद भी उनके कब्जे में आ जाए। अभी लेबनान में सीरिया समर्थक राष्ट्रपति एमीले लाहोद सत्ता में हैं। 2004 में सीरिया के दबाव के चलते लेबनान में संविधान में संशोधन करते हुए लाहोद के कार्यकाल को विवादास्पद रूप से तीन सालों से लिए बढ़ाया था। तब से लेकर लगातार मांग उठ रही है कि राष्ट्रपति लाहोद को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। यह मुद्दा अभी सुलझना बाकी है। मार्च 14 गठबंधन ने अपना नाम इस तर्ज पर रखा है कि जब 2005 में रफीफ हरीरी की हत्या हुई थी, तो 14 मार्च को ही बेरूत में सीरिया के प्रभाव को लेबनान से कम करने के लिए इस गठबंधन ने भारी विरोध प्रदर्शन किए थे। इन चुनावों में मार्च 14 गठबंधन को जिताने में अमरीका सरकार ने जी-जान लगा दी थी। उसने लेबनान के लोगों को चेतावनी भी दी थी कि अगर हिजबुल्लाह को वे जीताते हैं, तो अमरीका द्वारा दी जाने वाली सारी मदद रोकी जा सकती है। लेबनानी लोगों को भी पता था कि जब फिलीस्तीन में हमास की जीत हुई थी, तो अमरीका ने उसे आर्थिक मदद देना बंद कर दिया और इजराइल को उस पर हमला करने की छूट दे दी थी। ऐसे में देखना दिलचस्प रहेगा कि लेबनान के राष्ट्रपति चुनावों का क्या हाल रहता है और सीरिया की दखलअंदाजी को खत्म करके गठबंधन 14 मार्च किस तरह लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है।
-आशीष जैन

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07 July 2009

बीमारियां बड़ी मस्त-मस्त

मैंने जिंदगी में कुछ नहीं किया। यूं ही जिया और लगता है कि यूं ही मर जाऊंगा। काम मैं भी करता हूं, पर नाम नहीं होता। अब तो कई बीमारियों ने भी घेर लिया है। वैसे कुछ बीमारियां होती ही इतनी दिलचस्प हैं कि आदमी खुद जाकर उनसे चिपक जाता है। मुझे खुद की तारीफ करने की नई बीमारी लग चुकी है। जब तक रोज सुबह और सांझ ढले खुद की कीर्ति का गुणगान ना कर लूं, खाना हजम ही नहीं होता। मैं हरदम इस फिराक में रहता हूं कि कोई मिले और मैं उसे पकड़कर अपनी तारीफ के कम से कम दो बोल तो उछाल ही दूं। बदले में मिली वाहवाही से मेरा भोजन आसानी से पच जाता है। जैसे बंद नाक होने पर आप-हम दिनभर जोर लगाते रहते हैं कि किसी तरह नासिक से हवा का प्रवाह सतत हो जाए, उसी तरह मैं भी अपने रोज के कामों में से इतिहास सर्जन के पल खोजता रहता हूं। मुझे पता है कि कुछ लोग मुझसे चिढ़ते हैं, इसीलिए वे मेरी तारीफ सुनना पसंद नहीं करते और मुझे देखते ही दूर से ही भाग खड़े होते हैं। वैसे लोग बीमारियों से चिंताग्रस्त रहते हैं, पर मैं अपनी इस बीमारी से बहुत खुश हूं।

मार्केट में जो बीमारी इन दिनों सबसे ज्यादा बिक रही है, वो है स्वाइन फ्लू। सुना है कि इस बीमारी का मूल विषाणु सुअर से आया। वैसे हमारी गली में तो बड़े प्यारे-प्यारे सुअर हैं। वे स्वच्छता पसंद हैं, इसलिए उन्हें डरने की कोई जरूरत ही नहीं है। कुछ आवारा सुअरों को जरूर ये बीमारी हो सकती है, पर मैं आज शाम ही उन सब की मीटिंग लेकर उन्हें इस बीमारी के बारे में विस्तार से समझा दूंगा और कह दूंगा कि किसी भी तरह से ये बीमारी हमारी गली में ना घुस पाए। वैसे कुछ लोगों को बोलने की बीमारी होती है। और ये बीमारी खासकर हमारे देश में पाई जाती है। बोलना वाकई एक नशे की तरह होता है। बतोड़ों से पूछिए कि लगातार बोलने में कितना मजा छुपा है। कोई सुने ना सुने, उन्हें तो बस धाराप्रवाह बोलते जाना होता है। बोल-बोल के चाहे मुंह में दर्द हो जाए, जब तक सुनने वाला रोने नहीं लगेगा, ये उस निरीह जीव को छोडेंग़े नहीं। बोलने की परिणाम तो आप हाल के चुनावों में भी देख चुके हैं। ससुरे शुरू से अंत तक बोलते ही गए हमारे नेता और एकाध तो ऐसे हैं कि हार गए, पर बोलना नहीं छोड़ा। चाहे पार्टी से निकलने की नौबत आ जाए, पर लगातार अनाश-शनाप बोलने की आदत नहीं छूटी।
अब हाल देख लीजिए बीजेपी का। सुधीजन तो कह रहे हैं कि अगर शताब्दी एक्सप्रेस की तरह पार्टी के नेताओं के बयान आते रहे, तो आने वाले सालों में पता भी नहीं लगेगा कि कोई इस नाम की पार्टी भी भारतवर्ष में हुआ करती थी। हमने सुना है कि जब अंग्रेज लोग बीमार होते हैं, तो दारू पीने लगते हैं। जर्मन लोगों को दर्द लगता है, तो वे नाचने लगते हैं। पर हम हिंदुस्तानी जब भी बीमार पडऩे लगते हैं, तो वे बोलने की आदत से ग्रस्त हो जाते हैं। बीमारी से ज्यादा बीमारी तो बोलने में नजर आने लगती है। वैसे हमारी घरवाली को तो शापिंग की तगड़ी बीमारी है। चाहे जरूरत हो या ना हो, हर हफ्ते जब तक हजार रुपए खर्च ना करे, उसे उल्टियों का सा मन करने लगता है। अब हम उल्टी की बजाय पैसे फुंक जाना ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं बच्चों को कभी कंप्यूटर चाहिए, तो कभी वीडियो गेम्स। क्या ये बीमारी नहीं है। हम तो बिना बिजली खर्च करे ही घर के आंगन में दिनभर खेला करते थे। वैसे इन बीमारियों को कोई अंत नहीं है। पाकिस्तान को भारत को परेशान करने की बीमारी है, तो अमरीका को पूरी दुनिया को धौंस दिखाने की बीमारी, अमीर को दिखावा करने की बीमारी, तो गरीब तो दिनभर फालतू ही अपना रोना रोने की बीमारी। मेरा तो मानना है कि मन जब किसी काम को लगातार करने लगता है, तो धीरे-धीरे वो काम लत बनता है और फिर बीमारी बनने लगता है। भई, मेरी तो यही राय है कि हम सबको कुछ ना कुछ नया करते रहना चाहिए ताकि कोई भी चीज दिलोदिमाग पर हावी ना हो पाए और हम खुशी-खुशी अपनी जिंदगी गुजार सके।
-आशीष जैन

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महिलाओं ने हिला दिया

आज हमारी घरवाली बड़ी खुश है। खूब प्यार से बात कर रही है, खाना भी बहुत स्वादिष्ट बनाया है। आज तो ऑफिस से लेट आने पर ताने भी नहीं मारे। क्या बात है, ये सूरज पश्चिम से कैसे उग रहा है। जरूर हो ना हो, दाल में कुछ काला है। रोज तो अपने दुख-दर्द का पिटारा लेकर बैठ जाती थी, कहती थी कि तुम मर्दों ने हमारी जिंदगी तबाह कर रखी है। तुमने हमें दबाकर रखा हुआ है। हमें आगे बढऩा चाहती हैं। और आज कह रही है कि तुम बहुत अच्छे हो, मेरा हर कहा मानते आए हो। मुझे तुम्हारा साथ बहुत भाता है। ये सुनकर मैं वैसे ही उलझन में था, इतने में ही उसने एक सवाल भी दाग दिया कि आगे भी मेरा साथ दोगे ना। मैं सोच में पड़ गया कि कैसे साथ देने की बात कर रही है ये। जरूर कोई बड़ा फंदा लाई है, ये मुझे फंसाने के लिए। मैं सर्तक हो गया। सोचने लगा कि इन दिनों में कुछ खास तो नहीं हुआ।

तभी हमें याद आया कि 100 दिन की मियाद में सरकार महिलाओं को देश की सबसे बड़ी पंचायत में आरक्षण देने जा रही है। जरूर इसे किसी ने बता दिया हो। अब तो ये जरूर चुनाव लडऩे की प्लानिंग बना रही होगी। दरअसल जब भी हमारी बीवी खुश होती है, मायावती और ममता बनर्जी के गुणगान करने लगती है। बोलती है, काश! मुझे भी मौका मिलता चुनाव लडऩे का। तुम जैसे पतियों की तो अकल ठिकाने पर लगा देती। हमें तो शुरू से ही पता है कि स्त्री शक्ति का कोई सानी नहीं है। अगर स्त्री जाग गई, तो सबको सुला देगी। आज जब बिना आरक्षण के ही महिलाओं ने अपना डंका चहुंओर मचा रखा है, तो फिर तो पुरुषों के बोलती ही बंद हो जाएगी।
मेरी पत्नी को तो मीरा कुमार की आवाज में भी कोयल की बोली नजर आती है, कहती है, कितना मीठा बोलती है। अब मीठा बोल-बोलकर संसद में सबको चुप कराएगी। हैडमास्टरनी बन गई है, सब नेताओं की। देखा ना बस एक पोस्ट बची थी, जिस पर महिला नहीं थी, अब तो वो भी पूरी हो गई। अपनी प्रतिभा ताई, सोनिया मैडम और इंदिरा गांधी की तरह ये भी अपना परचम लहराएगी। वैसे मेरा मानना है कि यूं अगर महिलाओं को आरक्षण नहीं भी मिलेगा, तो जल्द ही वो दिन भी आएगा, जब पूरी संसद में महिलाएं नजर आएंगी और जो बचे-कुचे पुरुष होंगे, वे सब मौन में चले जाएंगे। उन्हें ये डर हमेशा सताएगा कि कहीं ये औरतें अपने बैगों में बेलन छुपाकर ना लाई हों। अगर ज्यादा भड़भड़ाहट की, तो तपाक से बेलन निकालकर मारेंगी।
अब देख लीजिए शुरुआत तो हो चुकी है, उनसठ महिलाओं ने बाजी मार ली ना इस बार के चुनावों में।
आरक्षण आएगा, तो ऐसी महिला क्रांति लाएगा, जिसकी उम्मीद तो शायद महिला सशक्तिकरण करवाने वाली संस्थाओं ने भी नहीं की होगी। पुरुषों की बजाय अब महिलाएं चाय की थडिय़ों का मंच हथिया लेंगी। सारी औरतें मिलकर वहीं कंट्री के फ्यूचर की प्लानिंग करेंगी। पनवाड़ी की दुकान पर महिला पान बेचती नजर आएंगी, रैलियों में महिलाओं की भीड़ उमड़ेगी, बसों में पुरुष आरक्षित सीटें नजर आएंगी, महिला आयोग के दफ्तर पर ताला लग जाएगा और सारे पुरुष मिलकर पुरुष आयोग की मांग करने लगेंगे। दहेज पीडि़त महिलाएं नदारद हो जाएंगी और महिलाओं द्वारा उत्पीडि़त पुरुषों की संख्या में भारी इजाफा देखने को मिलेगा। राष्ट्रपिता, राष्ट्रपति जैसे शब्दों की तरह ही संविधान में राष्ट्रमाता, राष्ट्रपत्नी जैसे शब्दों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की जाएगी। आतंकवादियों की नई फौज में महिला आतंकवादियों का वर्चस्व बढऩे लगेगा... इत्यादि इत्यादि। यूं तो मेरे पास भावी परिवर्तनों की बहुत लंबी लिस्ट है, पर उन सब बातों का यहां उल्लेख करना ठीक नहीं रहेगा। वरना लाखों पुरुष शरद यादव की तरह ही आत्महत्या करने की योजना बना लेंगे। मैं नहीं चाहता कि मेरी जात मतलब पुरुष बिरादरी घबराहट में कुछ गलत उठा ले। भाईयो, अभी डरने की नहीं धैर्य करने की जरूरत है। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आप पर ज्यादा आंच नहीं आएगी। हम अपनी माताओं-बहनों-बीवियों से फरियाद करेंगे कि वे अपने बाप-भाई-पति का पूरा ध्यान रखेंगी। हम उनके साथ समझौता करने को तैयार हैं। वो हमें समय पर चारा मतलब भोजन मुहैया करवाएंगी बदले में हम घर की सफाई कर दिया करेंगे। वो हमसे थोड़ा प्यार से बात कर लिया करेंगी और हम बदले में बच्चों की पोटी साफ कर दिया करेंगे।
हम इतना सोच कर पसीने-पसीने हो गए और मन किया कि अपनी पत्नी के पांव छू लें और उसे अभी से पटा लें। पर क्या देखते हैं कि पत्नी कलैंडर लेकर सामने खड़ी थी। बोले बस कुछ ही दिन तो बचे हैं। हमने सोचा कि इसने 100 दिनों में से उल्टी गिनती शुरू कर दिया दिखता है। पर वो बोली कि मुझे मायका जाना है, बच्चों की छुट्टियां खत्म होने में कुछ दिन ही बचे हैं। आप घर का ध्यान रखना, मैं जल्द ही आ जाऊंगी। इतना कहकर वो मायके जाने की तैयारी करने लगी और हम सकुचाए से अपने भविष्य के संकट के बारे में दुबारा विचारमग्न हो गए।
-आशीष जैन

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बारिश आई किस्मत चमकाई

अल्लाह मेघ दे..मेघ दे.. पानी दे..। टिप-टिप बरसा पानी... पड़ोस में रहने वाले पपीताराम के घर से लगातार ऊंची-ऊंची आवाजें आ रही थीं। मैं घबरा गया, सोचने लगा कि वैसे तो हमारा पूरा मोहल्ले की संगीतकारों से भरा पड़ा है, पर ये भरी गर्मी में पानी को याद करके कौन हमारे जख्मों को हरा कर रहा है। उससे पूछें, तो जवाब मिलेगा कि तुम्हारा क्या ले रहा हूं। मैं तो गीत गा रहा हूं। हमसे पूछो, तो वो एक नंबर का गधा है। सबको अपनी बेसुरी आवाज से घायल करना चाहता है। उसे हमारा सुख नहीं देखा जाता। लगा रहता है किसी ना किसी सिंगिंग कंपीटीशन की तैयारी में। कहता है कि मैं तो अपनी आवाज से रियाज कर रहा हूं।

वैसे आज के उसके गीत में कुछ ना कुछ राज छुपा हुआ है। नहीं तो वो तपती धूप में कैसे एकाएक पानी को याद करने लगा और उसने तो घर में ही बोरिंग खुदवा रखी है, पानी की तो वैसे भी उसके घर में कोई कमी नहीं है। वैसे उसकी नजरों में जरा पानी नहीं है, ये दूसरी बात है। उससे एक बाल्टी पानी मांगने जाओ, इस तरह एहसास जताकर देता है, मानो बाल्टी भरकर नोट दे रहा हो। यूं आषाण के महीने में ही सावन को याद करने की उसकी अदा वाकई बड़ी निराली है। घर की सारी खिड़कियां खोलकर पानी आ, पानी आ यूं चिल्ला रहा है, मानो उसके कहने से बादल अपनी सारी सप्लाई हमारे मोहल्ले की तरफ मोड़ देंगे।
दरअसल वो एक पीडब्ल्यूडी का ठेकेदार है। हर साल सावन आते-आते वो पूरा हरा नजर आने लगता है। बारिश की पहली बंूद इस धरा पर टपकती है, तो लगता है कि उसे पुनर्जन्म मिल गया हो। पता नहीं पानी से उसे इतना प्यार क्यों है। हम इस बात को सोचकर बहुत परेशान रहते हैं। पर जब देखा कि वो सड़क बनवाने के लिए सरकार से टेंडर लेता है, तो हमारे मगज में एक बार में ही सारी बात फिट बैठ गई कि क्यों वो पानी से इतना प्यार करता है। दरअसल वो ज्यादातर टेंडर लेता ही, बरसात के दिनों में है। सड़क के नाम पर रोड पर डामर बिछा देता है। बारिश आती है और उसके सारे पापों को धो जाती है। तभी वो बारिश के पानी को गंगाजल समझकर प्रणाम करता है। सड़कों टूटती हैं, गड्ढ़े होते हैं, उसका क्या जाता है, बारिश उसके सारे कुकर्मों को ढक लेती है। फिर दूसरी बार वो टेंडर लेता है, गड्ढे भरने का। गड्ढे भरने के नाम पर नोटों से उसका घर भरता जाता है। बारिश खत्म होती है, तो पता लगता है कि पपीताराम ने नई कार ले ली है। अमरीका जा रहा है घूमने इत्यादि। वैसे इसमें एक मजेदार बात है कि सरकार उसी को टेंडर क्यों देती है? क्या कोई उसकी शिकायत नहीं करता कि बेकार सड़क बनाने में उसी का हाथ है। इसके पीछे साफ थ्योरी काम करती है। कहेगा कौन, सुनेगा कौन। कहेंगे ये चट्टू पत्रकार, तो उनकी तो पहले से ही जेबें गर्म करके रखो और अगर ज्यादा प्रेशर आ भी जाए, तो साफ कह दो, इस काम में मेरा नहीं मजदूरों का हाथ है। और सुनने वालों को तो कान बंद रखने के लिए पहले ही सोने के सिक्के थमा दो। उनकी आवाज के सामने जनता की आवाज भला नेता कभी सुन पाए हैं, जो अब सुनेंगे। वैसे जब नेताओं की गाडिय़ां पपीताराम की बनाई सड़कों से गुजरती है, तो उनकी तोंद का सारा पानी बराबर हो जाता है, तब उन्हें पता लगता है कि वाकई गोलमाल ज्यादा ही है और कमीशन कम। पपीताराम तो चाहता है कि मैं भी उसके धंधे में पार्टनर बन जाऊं, पर हिम्मत नहीं होती। मैं उससे कहता हूं कि क्या होगा, पाप की कमाई से। इस बात पर पपीताराम हंसता है और बोलता है कि अब सीधे का जमाना कहां रह गया है जी। जैसे भी माल हाथ लगे, बस बटोरो और चलते बनो। वैसे भी ये तो सीजनेबल धंधा है। हम कौनसा बारहों महीने माल सूतते हैं। हमसे बड़े कई पापी हैं, जो साल के 365 दिन बस सरकारी नोट गिनने में लगे रहते हैं। हम सोच रहे थे कि कह तो इसकी सही है कि कलयुग में जब सत्य बचा ही नहीं है, तो फिर थोड़ा-बहुत पाप करने में जाता क्या है। हम बड़ा फैसला करने के मूड में ही थे कि इतने में कमबख्त हमारी आत्मा आडे आ गई और अपने बापू की बचपन में सिखाई बातें याद करा गई और हम दुबारा सदाचार की पटरी पर आ गए। अब तो शायद अगले सावन में ही हम पपीताराम के पाले में आ पाएंगे, चलो तब तक क्यों ना सावन की ठंडी फुहारों का मजा लेकर ही दिल को तसल्ली दी जाए।
- आशीष जैन

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01 July 2009

इस जवानी की जय हो

उम्र के 97 पड़ाव पूरे कर चुकीं वरिष्ठ रंगकर्मी, अभिनेत्री और डांसर जोहरा सहगल आज भी गुनगुनाती हैं- अभी तो मैं जवान हूं। उन्हें देखकर लगता है कि जिंदगी का दूसरा नाम जोहरा ही है। जानते हैं उनकी जिंदगी के अनछुए पहलुओं को खुद उनकी जुबानी-


जब 1983 में मैं पाकिस्तान गई थी, तो लोगों ने मुझे कहा था कि आप पाकिस्तानी शायर हफीज जालंधरी की लिखी पंक्तियां- अभी तो मैं जवान हूं- सुनाइए ना। फिर तो मैं भूल गई कि कहां खड़ी हूं और मेरे सामने कौन लोग हैं। मैं नज्म की उन पंक्तियों को गुनगुनाने लगी। चीनी कम और सांवरिया के बाद मैं परदे पर नजर नहीं आई, लोग मुझसे सवाल पूछने लगे। मैं आपको बताना चाहती हूं कि जब तक मैं अपने पात्र और चरित्र के साथ आत्मीय संबंध नहीं बना लेती, तब तक मैं फिल्म मंजूर नहीं करती।
सपनों की सीढिय़ां चढ़ती रही
फिल्मी परदे पर मैं ज्यादातर ऐसी मां या दादी की भूमिकाएं निभाई हैं, जो अपने बच्चों को अंत में जाकर जीने की आजादी देती है। दरअसल ये भूमिकाएं मेरी जिंदगी के सचों से जुड़ी हुई हैं। मैं रोहिल्ला पठान परिवार में पैदा हुई थी। वहां मुझे अपने सपनों के मुताबिक जीने की आजादी नहीं थी। मेरे परिवार में बुर्का जरूरी था। मैं तो नीलगगन में उडऩा चाहती थी। गाना और नाचना चाहती थी। एक दिन यूरोप में रहने वाले मेरे चाचा ने ब्रिटेन के एक कलाकार के बारे में मुझे बताया और कहा कि अगर तुम वहां जाओगी, तो तुम्हारे सपने पूरे हो जाएंगे। तब मैंने ईरान, मिस्र होते हुए यूरोप तक सड़क और पानी के रास्तों से अपना सफर पूरा किया। मेरे घरवाले मुझे सात भाई-बहनों में सबसे अलग मानते थे। वे अक्सर कहते थे कि तुम्हें लड़की नहीं, लड़का होना चाहिए। और इस तरह यूरोप जाना मेरे सपनों तक पहुंचने की सीढ़ी साबित हुआ। जब कोई इंसान अपने मन के मुताबिक चलता है, तो सब उसका विरोध करते हैं, सो मेरा विरोध भी हुआ। लेकिन धीरे-धीरे सब बदल जाता है। यूरोप में पहली बार मैंने उदय शंकर का बैले शिव-पार्वती देखा। वहीं मेरी मुलाकात कामेश्वर सहगल से हुई। प्रेम हुआ और शादी कर ली। मुझे लगता है कि वाकई ऊपरवाला हमारी किस्मत लिखकर भेजता है। जब पंडित जवाहर लाल नेहरु मेरी शादी में आए, तो उन्होंने पूछा कि तुम खुश तो हो ना। यह सुनकर मैं रोमांचित हो उठी थी।
रचनात्मकता पर तकनीक हावी
पिछले सत्तर सालों में मैंने लाहौर से मुंबई और फिर यूरोप से लेकर फिल्म, टीवी और रंगमंच का एक लंबा सफर तय किया। वैसे मैं शुरू में केवल कोरियोग्राफर बनना चाहती थी। मैंने राजकपूर की 'आवाराÓ का ड्रीम्स सीक्वेंस कोरियोग्राफ किया था। तब सब कुछ हमने अपने हाथों से किया था। अब तो रचनात्मकता पर तकनीक हावी हो गई है। शायद इसीलिए ये लोग लोगों के मन के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ पाते। बाजी, सीआईडी और आवारा में भूमिकाएं करते-करते तो मैं अभिनय के फील्ड में भी आ गई। विभाजन के बाद मैं बच्चों के साथ मुंबई आ गई और पृथ्वी थिएटर के साथ इप्टा के नाटकों में काम करना शुरू कर दिया। जिंदगी को हम लोग बांध नहीं सकते। साठ के दशक में भारत आई, तो अल्मोड़ा में उदय शंकर के स्कूल में पढ़ाने चली गई। फिर मेरे पति कामेश्वर का निधन हो गया। मैं लंदन लौटकर बच्चों में बिजी हो गई। इस दौरान एक बार्बर शॉप में लोगों के बाल भी काटे थे। फिर मेरी वापसी सही मायने में जेम्स आयवरी के साथ हुई। यह मेरे कॅरियर की दूसरी शुरुआत थी। उस दौरान ज्वेल इन द क्राउन, तंदूरी नाइट्स मेरे लोकप्रिय शो थे।
हंसते-मुस्कराते कट जाएं रस्ते
मेरे लिए भाषा हमेशा एक समस्या रही। अंग्रेजी में कोई दिक्कत नहीं थी, पर हिंदी में काम करने के लिए मुझे संवादों को उर्दू या रोमन में लिखवाना पड़ता था। मैं राजकपूर और चेतन आनंद को कभी भुला नहीं सकती। हां, गोविंदा के साथ फिल्म चलो इश्क लड़ाएं में बड़ा मजा आया। उसमें मुझे हर पांच मिनट में उसे एक जोर का थप्पड़ लगाना था और गोविंदा शॉट के बाद चुपचाप एक तरफ जाकर बैठ जाता था। इस फिल्म में मुझे मोटर साइकिल चलाने का मौका भी मिला। लोग अक्सर पूछते हैं कि आप उम्र का शतक पूरा करने जा रही हैं, ऐसे में जिंदगी को किस नजरिए से देखती हैं, तो मेरा एक ही जवाब रहता है कि जिंदगी तो खुश रहने के लिए ही मिली है। फिर फालतू टेंशन लेकर क्यों इसे बर्बाद किया जाए। उम्र आपके शरीर में नहीं दिमाग में होती है और खुशी दिल में समाई रहती है। इसलिए मैं हमेशा हंसने और मुस्कराने के सामान ढूंढ ही लेती हूं। वैसे मैं एक सख्त नियम वाली इंसान हूं। आज भी मैं अपनी आवाज को बनाए रखने के लिए रियाज करती हूं। अब मैं नाच नहीं पाती, पर अपनी बेटी किरण सहगल के साथ अभिव्यक्ति और प्रभावों के लिए रोज प्रैक्टिस करती हूं।
-प्रस्तुति- आशीष जैन

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मस्ती की रेल पढ़ाई की पटरी पर

बच्चों के छोटे हाथों को चांद-सितारे छूने दो/ चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे.......बचपन की उम्र ही ऐसी होती है, जब दुनिया बड़ी हसीन और रंगीन नजर आती है। और माहौल जब छुट्टियों का हो, तो मस्ती का कोई ओर-छोर नहीं होता। लेकिन जनाब अब खत्म हो चली हैं छुट्टियां और फिर से शुरू हो गए हैं स्कूल। मिट्टी के घरौंदे बनाने वाले नन्हे, नाजुक हाथ अब किताबों का बोझ उठाते नजर आएंगे और जिन मासूम आंखों में अब तक थे फूल, तितली, झूले और चांद-सितारों के सतरंगी सपने, उनमें होगी एक जद्दोजहद.....जिंदगी की दौड़ में आगे, और आगे निकलने की। यहीं उठता है यह अहम सवाल कि बच्चों की कोमल भावनाओं को किताबों और हमारी उम्मीदों के बोझ तले दबाकर कहीं हम कोई गंभीर अपराध तो नहीं कर रहे?

याद रखें कि पढ़ाई जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए है। अगर हम अपने बच्चों को ऐसी बेहतरी नहीं दे पाते, तो यकीनी तौर पर हम एक ऐसा अपराध कर रहे हैं, जिसका असर आने वाले कई सालों तक हमें नजर आएगा। माता-पिता के पास अगर बच्चे के मन में झांकने की फुरसत होगी, तो वे जान पाएंगे कि किताबी दुनिया से ही समझ विकसित नहीं होती। न्यूटन से लेकर एडीसन तक कई बड़े वैज्ञानिक पढ़ाई में कमजोर थे, पर उनकी सोच और चीजों को देखने का नजरिया बिल्कुल जुदा था। क्यों ना हम भी अपने बच्चों को एक ऐसा माहौल दें, जहां वे खुलकर सोच सकें और चीजों को अपने नजरिए से पेश कर सकें। बच्चे तो आज भी सपनीले संसार में रहकर ही सीखना-पढऩा और आगे बढऩा चाहते हैं। उनके सपने बड़े नहीं हैं, सुंदर हैं। वे चाहते हैं कि बैट-बॉल और बस्ते के बीच की दीवार ढहा दी जाए, प्ले ग्राउंड और प्रेयर हॉल को मिला दिया जाए। वे माहौल को समझ सकें, ढल सकें और अपनी पूरी एनर्जी से एक बार फिर पढ़ाई में जुट जाएं।
स्कूल बने दूसरा घर
फिल्म तारे जमीं पर और उसका लीड कैरेक्टर ईशान अवस्थी तो आपको याद होगा। दिनभर शरारत और मस्ती के बाद पढ़ाई का नंबर सबसे आखिर में। फिर जब निकुंभ सर क्लास में आते हैं, तो बच्चों को पढ़ाई में भी मजा आने लगता है। क्या तारे जमीं पर की तरह कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता कि बच्चों को स्कूल में भी मजा आए, स्कूल ही उनके लिए दूसरा घर बन जाए। छुट्टियां होने पर भी वे स्कूल की तरफ भागें। यह सब हो सकता है, बस हम सबको मिलकर थोड़ा सा प्रयास करने की जरूरत है।
नन्हे की बातें सुनें
समाजशास्त्री ज्योति सिडाना का कहना है, 'आजकल बच्चों को छुट्टियां नाममात्र की मिलती हैं और इन छुट्टियों में भी उन पर हॉबी क्लासेज ज्वाइन करने का प्रेशर डाल दिया जाता है। ऐसे में ना तो वे आउटडोर गेम्स का मजा उठा सकते हैं और ना ही दोस्तों के साथ मस्ती कर सकते हैं। छुट्टियों में भी माता-पिता एक पूरे दिन का शैड्यूल उन्हें थमा देते हैं। इससे बच्चे को लगता है कि क्या सिर्फ लगातार पढ़ाई ही उनकी जिंदगी का मकसद रह गया है? हम सबकी जिम्मेदारी है कि बच्चों को एहसास कराएं कि पढ़ाई जिंदगी के लिए है, जिंदगी पढ़ाई के लिए नहीं है।Ó पांंच साल के रोहित के पिता अमन शर्मा रात में उसके साथ बैठते हैं और स्कूल में होने वाली हर एक्टिविटी को बड़े ध्यान से सुनते हैं। इससे बच्चे को लगता है कि उसकी पढ़ाई में मम्मी-पापा की भी रुचि है और उसे कोई परेशानी आएगी, तो वह मम्मी-पापा के साथ आसानी से शेयर कर सकता है।
शर्म की बात होगी
हाल ही मानव विकास संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने भी माना है कि बच्चों पर पढ़ाई का बड़ा दबाव है और हमें एजुकेशन सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। वे नवीं और दसवीं क्लास की बोर्ड परीक्षाएं खत्म करके ग्रेडिंग सिस्टम शुरू करने के लिए जरूरी कदम उठाने की वकालत कर रहे हैं। शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों के कई अध्ययन इस बात का खुलासा करते हैं कि बच्चे पढ़ाई के तनाव में घुलकर अपना जीवन तबाह कर रहे हैं। इन आंकड़ों पर जरा गौर कीजिए- पिछले तीन सालों के अंदर लगभग 16 हजार बच्चे परीक्षा परिणाम के दिनों में खुदकुशी कर चुके हैं। हालांकि इन सारे बच्चों ने सिर्फ परीक्षा के नतीजों की वजह से जिंदगी को अलविदा नहीं कहा, लेकिन कहीं ना कहीं पढ़ाई का तनाव उनके अवचेतन में जरूर रहा होगा। अगर पढ़ाई के नाम पर इसी तरह हमारे नौनिहाल आत्महत्या के रास्ते पर चलते रहें, तो यह वाकई हमारे लिए शर्म की बात है।
जिंदगी की पाठशाला
माता-पिता को उन्हें बताना चाहिए कि स्कूल कोई हौवा नहीं है, बल्कि जिंदगी की पाठशाला है। यहां सिर्फ किताबों को चाटने से कुछ नहीं होगा। यहीं से बच्चों को सामाजिकता और व्यावहारिकता के वे गुर मिलेंगे, जो ताउम्र उनके काम आएंगे। इस सबके बीच में शिक्षक का भी अहम रोल है। पहले दिन ही कोर्स की बात करने की बजाय उनसे दोस्ती करनी चाहिए। हर बच्चे से उसका शौक पूछना चाहिए। इससे बच्चे के मन को भी शिक्षक आसानी से समझ पाएगा। तभी तो हम अक्सर अपने बच्चों के मुंह से सुनते हैं कि उन्हें फलां मैम बहुत पसंद हैं... क्योंकि वह टीचर भी बालमन के कौतुक को समझकर उनके धैर्य से उनके हर सवाल का जवाब देती है।

मुश्किल नहीं है कोई

आज के बच्चों का दिमाग कंप्यूटराइज्ड हो गया है। वे कॅरियर ओरिएंटेड हैं और जानते हैं कि स्कूल खुलते ही उन्हें पढ़ाई में लगना है। ऐसे में उन्हें कोई दिक्कत नहीं आती। हमारे यहां बच्चे जल्द से जल्द स्कूल आना चाहते हैं। उन्हें टीचर्स से डर नहीं लगता, वे स्कूल में भी घर की तरह ही मस्ती करते हैं।
- राज अग्रवाल, प्रिंसिपल, केंद्रीय विद्यालय नंबर 1, जयपुर
आलेख- आशीष जैन

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18 June 2009

गंदी, मंदी और नजरबंदी

बचपन से ही हमें एक अजीब किस्म का शौक है। हम खाली टाइम में कॉपी और पेन लेकर नए-नए शब्दों से खेलते रहते हैं। कभी कुछ बनाते हैं, कभी कुछ मिटाते हैं। कभी समय मिले, तो घर आइएगा, सारी दीवारें इन्हीं कारस्तानियों का नमूना दिखाई देंगी। राम को टाम बना दिया। रावण को चांवण बना दिया और फिर उनका अर्थ खोजने लग जाते हैं। हमें हमेशा से अक्षरों से मिलकर शब्द और शब्दों से मिलकर वाक्य बनाने की प्रक्रिया को कौतुकता से देखने का शौक है। अब हमें लगता है कि वाकई शब्द ब्रह्म होता है। नहीं तो क्या कभी ऐसा होता है कि कुंती की बिंदी हटते ही ये शब्द एक गाली नजर आने लगे। दादाजी में से जी शब्द हटाते ही गली के गुंडे की याद आने लगे। राम, काम, नाम... बड़ा, कड़ा, लड़ा... एक अक्षर बदलने से पूरा मतलब ही बदल जाता है। शब्दों में वाकई बड़ी ताकत होती है।

इसी तरह इन दिनों एक शब्द 'दीÓ हमें बड़ा परेशान किए हुए है। दी ने पूरी दुनिया का जीना हराम कर रखा है। दरअसल हम शुरू से मानते थे कि हमारी वाइफ बड़ी गंदी है। ना तो घर में सफाई, ना बातों में सच्चाई और दिल में सफाई। जब बोलेगी, कुछ गंदा ही बोलेगी। अब सोच रहे होंगे कि हम अपनी ही धर्मपत्नी के सरेबाजार बुराई कर रहे हैं। पर ऐसा नहीं है कि उसके जन्मजात दुश्मन हैं। हम क्या करें, उसके अत्याचार दिलोदिमाग में घूम-फिरकर जुबान से ही तो निकलेंगे। अगर हम झूठ बोलते हैं, तो किसी भी वक्त सप्रेम हमारे घर आकर देख लीजिए। अपने आप समझ में आ जाएगा। वैसे चीजें तो और भी कई गंदी होती हैं, पर हमें तो गंदी का एक ही अर्थ नजर आता है- हमारी बीवी। अब कई लोग दीदी को शार्ट फॉर्म में दी कहने लगे हैं। तो ये ममता दी कौनसा भला करने वाली हैं। देख लीजिएगा, अगले रेल बजट में किराया बढ़ाकर ही दम लेंगी। ये उनका कसूर नहीं है, ये तो उन्हें दी... दी... पुकारने वालों का दोष है।
दी का काला जादू आज पूरी दुनिया पर चढ़ चुका है। अब मंदी को ही देख लीजिए। मंदी ने क्या कहर ढहा रखा है। कसम से सारे कॉन्फिडेंस का तेल निकाल कर रख दिया है। पहले हमें लगता था कि नौकरी हमारे पीछे घूमती है। पर आज हमें लग रहा है कि कहीं मंदी की चपेट में आ गए, तो लोगों को कई सालों के बाद डायनासोर की तरह हमारे अवशेष ही मिल पाएंगे, वो भी आधे-अधूरे। अमरीका के युवाओं की तो वैसे ही बोलती बंद है। कुछ भी करने को तैयार हैं नौकरी के लिए। चाहें तो इस वक्त आप उनसे अपने घर की सफाई भी करवा सकते हैं। मंदी की रेल बड़ी सरपट चली, सबका मुंह बंद है। ऐसे लगता है कि खाना तो है, पर पानी गायब है। भोजन पचता ही नहीं है। क्या काम करें, सूझता ही नहीं है। क्या कोई अमीर सेठ हमारी फरियाद सुनकर हमें मक्खी मारने के धंधे में लगा सकता है क्या। इन दिनों मक्खी मारने में महारत हासिल कर ली है। जब भी मंडी जाते हैं, तो मंदी याद आती है। मंडी में आम है, अंगूर हैं, पपीते और चीकू भी हैं। हम उन्हें हाथ में लेते हैं, तो वे कहते हैं कि अबे हमें ले चल अपने घर। पर हम तो सिर्फ उनकी खुशबू ही घर तक ले जा पाते हैं। जेब में पुराने कागजों के सिवा बचा ही क्या है। जेब भी सोचती होगी कि कैसा मालिक मिला है, महीनों से सौ की नोट की गंध तक नहीं लेने दी।
अब तो बस एक लाल नोट ही ऊपर ही जेब में रखा रहता है, लाल नोट मतलब बीस का नोट और क्या। कल रात को जब घर लौट रहे थे, तो एक गुंडे ने पकड़ लिया। कसम से उसको हमारी मंदी पर इतना दर्द आया कि पूरे हफ्ते की वसूली हमें दे दी। इन दिनों उसे से तो जिंदगी कट रही है। ऐसा नहीं है कि हम जन्मजात भिखारी थे। वो तो बॉस की नजर लग गई। बॉस ने ऑफिस में ही नजरबंद करके रख दिया था। पास के पान वाले के गुटखा खाने जाता, तो टोक देते थे। हमने भी कह दिया कि लानत है, ऐसी नौकरी से। ठोकर मार दी नौकरी को। हमें क्या आंग सान सूकी, समझकर नजरबंद ही रखोगे क्या। वो म्यांमार हैं भाईजान। जुंटा तो जी-जान से जुटा है कि सूकी को जेल में सड़ा-सड़ाकर मार डाले, पर सूकी भी तो गांधीजी की पक्की चेली है। उससे बढिय़ा सत्याग्रह भला कोई कर सकता है। लोकतंत्र की हिमायती ऐसी महिला को देखकर ही तो हमने भी ऑफिस में विद्रोह किया था। अब हम भी सूकी की जमात में शामिल हो गई हैं। हमें अब कोई डर नहीं है। सूकी ही हमारी रक्षा करेगी। अब हम पहले से थोड़ा ज्यादा निर्भीक हो गए हैं। अब हमें मंदी, नजरबंदी या हमारी गंदी वाइफ कोई नहीं डरा सकता।
-आशीष जैन

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17 June 2009

बेटी पर फख्र है

धारावाहिक 'सबकी लाडली बेबो' में पिता का किरदार निभाने वाले कंवलजीत बता रहे हैं पिता और बेटी के अनोखे रिश्ते के बारे में -
मेरे लिए बेटियां ईश्वर का वरदान हैं। बेटों के लिए अक्सर कहा जाता है कि बेटे तब तक ही बेटे हैं, जब तक कि बीवियां नहीं आतीं, जबकि एक बेटी ताउम्र अपने पिता का साथ निभाती है। मेरी बेटी मरियम गॉड गिफ्टेड है। दिल्ली में शूटिंग के वक्त 8 साल की उम्र में नन्ही मरियम ने मुझे कुक्कू अंकल कहकर पुकारा। मैं उसे घर ले आया, बाद में वो मुझे डैड कहने लगी। अभी वो अमरीका में है।

जब किसी घर में बेटी होती है, तो पिता खुशी से फूला नहीं समाता। वही बेटी आगे जाकर किसी की मां, बहन या बीवी बनती है, ऐसे में सबको उसकी इज्जत करना सीखना चाहिए। लड़की घर में होने पर पिता को उसे पूरी तरह सुरक्षा का एहसास देना चाहिए। मैं अपने दोनों बच्चों सिद्धार्थ और आदित्य को भी यही सिखाता हूं कि लड़कियों का पूरा रेस्पेक्ट करना चाहिए। साइकॉलोजी के हिसाब से देखें, तो बेटी के सबसे करीब उसका पिता होता है। बेटी की सबसे ज्यादा चिंता एक पिता को ही होती है। जब तक वह शादी करके उसे विदा नहीं कर देता, वह बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित रहता है। मेरे कोई बहन नहीं थी, इसलिए मुझे पता नहीं था कि किस तरह एक भाई अपनी बहन की हिफाजत के लिए परेशान रहता है।
परदे पर बेटियों को ज्यादा लाड़ दिया जाता है, क्योंकि मेरे मानना है कि ऐसा करने से लोगों के पास संदेश जाता है कि बेटियां भी बेटों की तरह ही हैं। लोग बेटों के पीछे पागल होने की बजाय बेटियों को ही पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा करें। एक पिता को मैं यही राय देना चाहता हूं कि अपनी बेटियों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान दें। उसके शौक को मरने ना दें, फिर देखिए वो अपना नाम ऊंचा करके रहेगी। आज जमाना ऐसा है कि अगर लड़कियां शादी करके ससुराल भी चली जाएं, तो घर-गृहस्थी के साथ अपना कॅरियर भी संवार लेती हैं। इसलिए लड़कियों को पूरी शिक्षा का हक मिलना ही चाहिए। जहां तक दहेज जैसी समस्या की बात है, तो अब तो लड़कियां इतनी होनहार हो गई हैं कि लड़की के पिता को अपनी बेटी की शादी के लिए लड़कों से दहेज लेना चाहिए। मैं तो लड़कियों से यही कहना चाहता हूं कि अपने ऊपर भरोसा रखो, डरो मत, आगे बढ़ो, तुम्हारे पापा तुम्हारे साथ हैं।
-आशीष जैन

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16 June 2009

कसम से कोई सगा नहीं

पता नहीं आजकल हमें हो क्या गया है? कहीं मन नहीं लगता। मन करता है कि किसी दूसरी दुनिया में चलें जाएं। चारों तरफ परेशानी ही परेशानी है। बीवी मायके गई है। खाने तक के लाले पड़ गए हैं। ऊपर से घर की बिजली हमेशा गुल रहती है। ये सब सोचते-सोचते हमें लगा कि आज तो हम अपने दोस्त कन्फ्यूजन सिंह के घर ही हो आते हैं। कन्फ्यूजन की सबसे बड़ी समस्या है कि वह खुद तो कन्फ्यूज रहता ही है, हमें भी कान फ्यूज कर देता है। मतलब उसकी बातें सुन-सुनकर हमारे कानों में दर्द होने लगता है। वैसे भी उसकी बातें बेसिर-पैर की ही होती हैं। कभी कहता है कि मैं पानी में आग लगा सकता हूं। कभी कहता है कि भ्रष्टाचार मिटाने का फार्मूला है मेरे पास। कभी-कभी तो कहता है कि मैं सबके मन की बात जान सकता हूं।

अब तो मैंने ठान ही लिया कि उसकी सच्चाई जानकर रहूंगा। वैसे भी आधा बावला वो खुद नजर आता है और रही-सही कसर उसकी बातें पूरी कर देती हैं। मैं उसके घर पहुंचा और पूछने लगा कि चल बता इस वक्त मेरे मन में क्या चल रहा है? तो बोला, 'अभी तो तू मुझे गालियां दे रहा है और सोच रहा है कि आज इसकी सच्चाई पता लगाकर रहूंगा।Ó मैं तो भौचक्का रह गया। मैंने पूछा कि मेरे मन की बात कैसे जान गया तो उसका जवाब था- टैलीपेथी से। 'अरे ये क्या बला है? टेलीविजन का विकसित रूप है क्या?Ó 'नहीं यार, तू बस इतना समझ ले कि जादू है जादू।Ó
हमने सोचा, 'हमें इससे क्या? हम तो इसे दूसरों की सच्चाई पता करने में इस्तेमाल करेंगे?Ó हमने पूछा, 'चल बता, तेरी भाभी मतलब मेरी बीवी उबटन, इस वक्त पीहर में बैठी-बैठी क्या सोच रही है?Ó कन्फ्यूजन बोला, 'उबटन भाभी तो अभी टीवी देख रही है और सोच रही है कि कैसे पति के पल्ले पड़ गई, जो मुझे मायके में छोड़कर खुद मजे उड़ता है। वो तुझ पर शक करती है और सोचती है कि जरूर तेरा किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर है, तभी मुझे मायके छोड़ रखा है। इसीलिए वो तेरी पड़ोसन मंथरा को फोन करके तेरी जासूसी करती है।Ó यह सुनकर तो हमारे होश फाख्ता हो गए। हमने कहा कि तू सच तो कह रहा है ना। वो बोला, 'सोलह आना सच बोल रहा हूं मेरे दोस्त।Ó एक बारगी तो हमने उसे भी शक की निगाह से देखा, पर अगले ही पल हमें अपनी पड़ोसन मंथरा याद आ गई, जो वाकई मौके-बेमौके मेरे घर के इर्द-गिर्द पाई जाती है। जब मैं उसे टोकता हूं, तो कहती है कि भाईसाहब घर में चीनी खत्म हो गई थी, सो मैं तो आपसे चीनी लेने आ रही थी।
अब जब बात चली थी, तो मैंने सोचा क्यों ना अपने बॉस उघाड़मल की सच्चाई भी पता कर लूं। जब मैंने अपने बॉस के मन की बात जाननी चाही, तो कन्फ्यूजन सिंह बोला, 'भई देखो, वैसे तो तुम्हारा बॉस बड़ा नेक दिल है, पर अभी मंदी के दौर में वो तुम पर टेढ़ी निगाह रखे हुए है। वो वैसे तो भोला कबूतर है, पर इन दिनों मंदी के चलते उसमें बिल्ली की आत्मा घुस गई है। वो घात लगाकर बैठा है कि कब तुम गलती करो, कब वो तुम्हें बर्खास्तगी का लैटर थमाए। यूं तो और लोग भी उसकी निगाह में थे, पर उन्होंने तो बॉस को मक्खन लगाकर अपनी कुर्सी बचा ली। पर तुम चूक गए। कल-परसों तुम्हें नौकरी से हमेशा के लिए छुट्टी मिलने वाली है।Ó अब तो कन्फ्यूजन ने वाकई हमें कन्फ्यूज कर दिया था। वाकई इन दिनों बॉस का बर्ताव हमारे प्रति बदल गया था। अब वो हमारी हर गलती पर मुस्कारता है। कभी-कभी तो हमारे हाल-चाल भी पूछ लेते हैं। पहले तो बिल्कुल शांत रहता था। इन दिनों ही ज्यादा फडफ़ड़ा रहा है। मतलब साफ है कि कन्फ्यूजन के कहे मुताबिक वो मुझे नौकरी से निकालने की पूरी बिसात बिछा चुका है।
अब जब पूरे का पूरा आसमान खुद पर गिरता दिख रहा था, तो हमने कन्फ्यूजन से पूछा कि तू ये तो बता कि मेरी गर्लफ्रैंड चिंचपोकली तो मेरे साथ ही रहेगी ना। इस बात पर कन्फ्यूजन हंसने लगा और बोला, 'तू भी क्या चिंचपोकली के पीछे पड़ा हुआ है। इतनी अच्छी उबटन भाभी है और तू कॉलेज के जमाने की महबूबा पर ही जान छिड़कता है। पर अब चिंचपोकली तेरे झांसे में नहीं फंसने वाली। थोड़े ही दिनों में उसे पता लगने वाला है कि तेरी शादी हो चुकी है। फिर अब तेरी नौकरी जाने के बाद तो उस पर पैसे भी नहीं उड़ा पाएगा, तो फिर वो तुझे ठोकर मारकर आगे बढ़ जाएगी।Ó अब तो हमारी जान गले तक आ चुकी थी। हम सोच रहे थे कि कन्फ्यूजन को हम यूं ही बेवकूफ समझते थे। अब हमें याद आया कि क्यों चिंचपोकली हर मुलाकात में हमारे पर्स की तरफ दौड़ती थी। उसे तो है ही पैसों से मतलब। सोचते-सोचते मेरी हार्टबीट बढऩे लगी। डर के मारे मुझे चक्कर से आने लगे। कन्फ्यूजन सिंह बोला, 'अरे, क्या हुआ? तूने ही तो कहा था सच्चाई बता।Ó मैं निस्तब्ध और एकदम शांत सोच रहा था कि मैं इसके पास आया ही क्यों? इसकी टेलीपेथी इसी को मुबारक कर देता। अब होशियारी के चक्कर में मैं परेशान होता रहूंगा और मेरी पत्नी, नौकरी और महबूबा तीनों मेरे हाथ से निकल जाएंगी। मेरे धन्य हो टेलीपेथी विद्या।
-आशीष जैन

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15 June 2009

मियां गुमसुम और बत्तोरानी का तबादला

या खुदा, ये दिन किसी को देखना ना पड़े। सब हंसते-खेलते रहें, तो मन को अच्छा लगता है। हम तो चाहते हैं कि इस झुलसती गर्मी में किसी भी प्राणी मात्र को कोई भी वेदना ना झेलनी पड़े। जीते-जी मरन का सा एहसास होने लगता है। छुईमुई से चेहरों की हवाइयां सी उड़ जाती हैं। सारे कसमें-वादे अधूरे से रह जाते हैं। जिंदगी अधरझूल सी लगने लगती है। ऐसा लगता है कि खाना खाते-खाते मुंह में कंकड़ आ गया हो। सारा स्वाद किरकिरा हो जाता है। अब क्या बताएं कल तक अपने ऑफिस में बादशाह की तरह थे मियां गुमसुम और बत्तोरानी।

जो उन्होंने कह दिया, कर दिया, वही सबके सिर-माथे। किसी की क्या मजाल, जो उनके काम पर उंगली तो उठाए। जो यह गलती करता था, वो तो समझो गया काम से। उसका तो जीना हराम हो जाता था। सौ बातें सुननी पड़ती थीं और रहते वही थे ढाक के तीन पात। रहो बेटा, कुढ़ते। खुद काम करते रहो और उनको फायदे की मलाई खाते देखते रहो। काम में कोई गलती हो जाए, तो हमारे सिर और तारीफ सारी उनके खाते में। गधे की तरह पिदें हम और घोड़े की तरह घास चरें वो। उनकी हर बात को खुदा की सलाह की तरह मानकर दिन-रात घुसे रहते थे अपने काम में। हमें लगता था कि यही है जिंदगी। हम सोचते थे कि ये ही हमारे तारणहार हैं। पर उन तारणहार की तो खुद की ही किश्ती डूब गई। किसी ने कहा है ना कि खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान। तो हम भी कौनसे सदा के लिए गधे रहने वाले थे। वो खिसक लिए और हम जम गए। खुदा कसम, शुरू में अखबार में ये मंदी-मंदी सुनकर हमें डर नहीं लगता था। सोचते थे कि ऐसा भी कहीं होता है कि अमरीका में मंदी और फर्क पड़े हमारे देश पर। नौकरियां जा रही हैं, तो जाएं। अमरीका से हमें क्या वास्ता। पर जब अपन के देश को ये बीमारी लगी, तो गाज तो अपने साथी लोगों पर ही आकर गिरी। उनका तबादला हो गया। हमें लगा कि ये क्या हुआ, गाज तो हम पर गिरनी चाहिए थी। सबकी नजर में गधे तो हम ही थे ना। पर मंदी की मार तो सारे घोड़ों को ले मरी। किसी को कहां फेंका, किसी को कहां। कोई जंगल में डाल दिया गया, तो किसी को बार्डर एरिया मिल गया। अब चरो बैठकर आराम से घास। कसम ऑफिस में चलते कूलर और पंखों की। आज तक हमने कभी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं देखी। उन्हें देखकर लगता था कि क्या कूल लाइफ है इनकी। काम की कोई टेंशन ही नहीं और एक हम हैं कि कूलर के सामने बैठकर भी पसीने में तरबतर रहते हैं। काम की टेंशन के चलते हांफते हुए कुत्ते बन जाते हैं। कसम से जब वे जा विदाई ले रहे थे, तो हमने कइयों की आंखों में आंसू तक देखे हैं। कुछ का उनसे स्नेह का संबंध का था, तो किसी का वास्ता प्यार के रिश्ते से। अब कैसे दिन कटेगा। हमारे मियां गुमसुम और बत्तोरानी तो अब विदा हो रहे हैं। मियां गुमसुम का चेहरा देखकर हंसी के फव्वारे छूटते थे और बत्तोरानी की बातें हमारे चांद-सितारों की सैर करा देती थी। ऑफिस में उनके बिना तो 'बिन पानी सब सूनÓ वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। गम तो हमें भी था कि इतने दिनों हमारे साथ काम किया, अब एकदम से सारा काम हमें ही करने पड़ेगा। पर हमें यह ज्यादा लग रहा था कि जान बची, तो लाखों पाए। वे तो समझ नहीं पाए कि कब, क्यूं और कैसे ये हुआ। कल तक तो सब सही था। फिर एकदम से घंटी बजी और ट्रांसफर का लैटर हाथ में। मन ही मन सोचने लगे, 'कहां कमी रह गई, सारी सेटिंग तो ठीक थी। कोई बयानबाजी नहीं, कोई हंसी-मजाक नहीं। सोचा था कि ये सारी खुराफातें तो तबादलों के दौर के बाद में कर लेंगे। बॉस की भी खूब चापलूसी की थी। हो ना हो, जरूर किसी ने हमारी शिकायत की है।Ó इन सब बातों के बीच में वे ये भूल गए कि ये जो बॉस नाम की जीव होता है, वो यूं तो हमेशा आपकी तारीफ करेगा, हमेशा मुस्कराता रहेगा, पर जब आखिरी दांव लगाना पड़ेगा, तो निखट्टुओं को ही आगे करेगा। उसे पता है कि अगर गधों की तरह पिदने वालों को बाहर भेज दिया, तो फिर ऑफिस का काम कौन करेगा। दरअसल हमें हमारे गुरु ने पहले ही एक मंत्र दे रखा था कि ये बॉस नामक जीव कभी किसी का सगा नहीं होता। अगर वो आपकी तारीफ नहीं कर रहा, तो घबराने की जरूरत नहीं है। भई, ये बॉस चिंघाड़ते मतलब बोलते तब ही हैं, जब आपसे कोई गलती हो गई हो। तो भाईजान, हम तो तबादलों की चक्की में पिसने से बच गए। पर मियां गुमसुम और बत्तोरानी अपने गमजदा चेहरे पर हंसने की भाव-भंगिमा बनाकर हमें यह दिखाने की कोशिश कर रहें कि लल्लू, हमारे ऊपर कोई असर नहीं पड़ता, हम तो जहां जाएंगे, वहां एक नया चमन बना लेंगे।
-आशीष जैन

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नया नवेला आइडिया

हमारे एक परम मित्र हैं, गफलत कुमार। वे हमेशा इसी गफलत में रहते हैं कि वे कुछ नया करने वाले हैं। उनका तो तकिया कलाम बन चुका है- हम कुछ नया करने वाले हैं। देश-दुनिया से जब भी किसी नाम काम या किसी नए आविष्कार की खबर आती है, तो वह चहक उठते हैं और बोलते हैं कि देखो, हमारी बिरादरी के लोग बढ़ते जा रहे हैं और नए-नए कामों को अंजाम दे रहे हैं। हम उसे बस देखते रह जाते हैं और वो अपनी हर पुरानी चीज पर नए की मोहर लगाकर सबको उल्लू बनाते रहते हैं। नया-नया चिल्लाने से कोई चीज नई नहीं हो जाती है।

नई चीज पाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और ये ही एकमात्र चीज है, जो गफलत कुमार से कभी नहीं हो सकती। हमें पता है, वो आइडिया चुराने में बहुत माहिर है और हम तो बचपन से मानते हैं कि ये पूरी दुनिया गोल है। जो एक छोर से चलता है, वही आपको दूसरी छोर पर बैठा मिलेगा। पूरी दुनिया गोल चक्कर में दौड़े जा रही है। कुछ नया नहीं है। अगर आपको उनको पकडऩा है, तो कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है। बंदा चक्कर लगाते हुए आपके पास से तो गुजरेगा ही, बस वहीं उसे थाम लीजिएगा। हम तो यह भी पक्की तौर पर जानते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, तो फिर नई चीज कैसे हो सकती है। नई तो नजर होती है जी। आंखों में जब तक नई नजर का चश्मा पहने रखोगे, तभी तक चीजें नई नजर आएंगी। हमारी बातों पर भरोसा नहीं है, तो अपने चारों ओर नजर उठाकर देख लीजिए। राजनीति में राहुल बाबा वही बात कह रहे हैं, जो सालों पहले उनके पापा राजीव गांधी कह चुके। बस पंद्रह पैसे को पांच पैसे में बदल दिया। राज ठाकरे वही कर रहे हैं, जो बाल ठाकरे कर चुके। और तो और वरुण गांधी कौनसा नया नुस्खा खोजकर लाए, वही पुरानी चाल। गठबंधन पहले भी होते थे, आगे भी जरूर होएंगे।
बाजार में चले जाइए, वही पुराने माल को नए पैकेट में पैक करके बेचा जा रहा है। एक से साथ एक फ्री की तरकीब पुरानी हो गई, तो एक के साथ पांच माल मुफ्त में दे रहे हैं। अरे! दुकानदार तो फिर भी खूब धन कूट रहा है और ग्राहक तो आज भी पहले की तरह ही दुखी है। बाजार में पहले भी बीवी नखरे दिखाकर सस्ते माल को महंगे में खरीद लाती थी और आज तो पूरा परिवार ही ऐसा करने में लगा है। राशन के पहले लाइनें लगती थी, पर आज तो राशन ही गायब हो जाता है। पहले लोग आपस में मिल-बैठकर दुख-सुख की बातें किया करते थे, आज भी मिलते हैं, पर इसकी जगह टीवी सीरियल्स के कपड़ों और गहनों ने ले ली है। गफलत कुमार को कौन समझाए कि जिस दिन से इंसान एक धरती पर आया है, उसने कुछ नया नहीं किया है। अगर उसे कुछ नया करना होता, तो वो ना जाने कब का भ्रष्टाचार मिटा चुका होता। कब का धर्म के नाम पर लडऩा बंद कर देता। पर उसे कुछ नया करने की सूझती ही नहीं। जैसे पहले परीक्षाओं में नकल हुआ करती थी, उससे ज्यादा हो रही है, पेपर ही आउट हो रहे हैं। आप अगर कोई किताब लिखते हैं, तो दो रोज बाद ही उससे मिलती-जुलती एक नई किताब मार्केट में आपको चिढ़ाती हुई नजर आने लग जाती है। फैशन में बदलाव की बात कहने वालों को शायद इतिहास का ज्ञान नहीं है। पुराने फैशन में दो-चार बदलाव का नाम नया फैशन है। क्रिएटिविटी के नाम पर पुराने की धज्जियां उठाते चलो और उस रहे-सहे में भी अपनी टांग फंसा दो। दसियों बार देवदास फिल्म बना लो। अमिताभ को डॉन बना दिया, तो अब शाहरुख को भी बना दो। यह है नयापन। सास-बहू के सीरियल कभी पुराने हुए क्या। हर बार दावा करते हैं कि नया-नया है और जब पास जाकर पैकेट खोलो, तो वही पुराना माल।
अरे गलती इन नया-पुराना बनाने वालों की नहीं है जी। हमें ही बासी खाना खाने की आदत हो गई है। कुछ भी नया पचता ही नहीं है। नए को नकारना हमारी आदत हो चुकी है। कोई नया विचार, नई सोच हमसे कहेगा, तो हम कहेंगे, ससुरा पागल हो गया है। उसे चैन से जीने नहीं देंगे। जब तो वो ढर्रे पर चलने का आदी नहीं हो जाएगा, उसे चैन नहीं लेने देंगे। हम नया करने के नाम पर बस इतना ही कर सकते हैं कि अपने नए माल की पोल ना खुलने दें कि इसे आखिर चुराया कहां से है। अब तो कोई इंसान कोई नया काम या नई खोज करता है, तो गुणीजन उसकी दाद नहीं देते बल्कि उसे शक की निगाह से देखते हैं और कुछ तो ये भी पूछ लेते हैं कि कहां से जुगाड़ लगाया इस प्लान का। लोगों को आज उम्मीद ही नहीं है कि कुछ नया हो सकता है क्या। ऐसे में वाकई जो लोग मेहनत करके कुछ नया पैदा करने की सोचते होंगे, उनका क्या हाल होता होगा, खुदा ही जाने।
- आशीष जैन

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14 June 2009

एनजीओ: एक अद्भुत जीव

इन दिनों हमारे भारत विशाल में एक नई किस्म की मकड़ी अवतरित हुई है। क्या मकड़ी है, जी। हमें तो लग रहा है कि इस प्रजाति के बिना पूरा मकड़ी समुदाय ही बैचेन था। कब से आस लगाकर बैठी थीं मकडिय़ां कि हमारी तारणहार मकड़ी जल्द से जल्द स्वर्ग से उतरे और धरा पर आए। इसकी खूबी देखिए कि इसका बनाया जाल पूरे के पूरे शहर को अपने शिकंजे में कस सकता है। इसे भोजन करने के लिए कभी परेशान नहीं होता पड़ता। बेचारे भोले-भाले छोटे-छोटे जीव खुद-ब-खुद चलकर इसके जाल में फंसते हैं और ये मजे से उनका आहार करती है और आराम करती है। मुझे लोग अक्सर कहते हैं कि हम तो इसे एनजीओ पुकारते हैं, फिर तुम इसे मकड़ी क्यों कहते हो। हमने उनसे कहा कि जिस दिन तुम इसके जाल में फंसोगे, तुम सब समझ में आ जाएगा कि एनजीओ वाकई एक विशालकाय मकड़ी ही है।

यूं तो धरती पर अनादिकाल से विद्यमान है, पर कलियुग में इसका प्रचार-प्रसार बहुत तेजी से हो रहा है। गांव-शहर-कस्बे, गली-नुक्कड़-चौराहे हर जगह इसकी की चर्चा है। इस मकड़ी को सरकार अपनी पाले में कभी नहीं आने देती। इसीलिए इसे गैर सरकारी मकड़ी कहा जाता है। पर यह गैर सरकारी मकड़ी अपनी बासी तरकारी बड़े ही सरकारी ढंग से लोगों को मुहैया कराती है। लोगों का दिल बहलाने के लिए इसके पास कई सारी कैटेगिरी हैं। दुख-सुख, लाभ-हानि, पाप-पुण्य जो आपको पसंद है, बोलिए। ये मुफ्त में सेवा प्रदान कराने के लिए भी काफी मशहूर है। इन सब कामों के लिए ये इंसानी रूप धारण करके इंसानी भाषा भी बोल लेती है। आपका दिल जीतने के लिए क्या नहीं करती। सबकी मदद करने के बहाने सबका सब कुछ लेने की जो अदा ऊपरवाले ने इसे दी है, वो वाकई कमाल है।
एनजीओ आजकल फैशनबेल भी हो गई है। हर चमक-दमक का सामान इसके पास मौजूद है। देखकर लगता ही नहीं कि ये कोई मकड़ी की प्रजाति का जीव है। दुनिया में सबसे प्यारा व्यक्ति एनजीओ को पत्रकार लगता है। अगर आप पत्रकार हैं, तो आपको बिना काटे आपके साथ घंटों बिता सकती है। इस दौरान आपको इसके कारनामों और करामातों की लंबी लिस्ट सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए। एनजीओ को अपना फोटू अखबार में छपवाना बहुत भाता है। इसलिए आपको सख्त हिदायत है कि पत्रकार होने के नाते जब भी आप इससे मिलने जाएं, आपके गले में कैमरा जरूर टंगा होना चाहिए। वरना यह क्रोधित हो सकती है। वार्ता के अंत में दो-चार क्लिक अगर आप ज्यादा कर देंगे, तो आपको अलग से पुरस्कृत करने की व्यवस्था भी इसने करवा रखी है। एनजीओ से सरकार चलती है। इसे शायद भगवान शिव से वशीकरण मंत्र भी मिला हुआ। जिससे ये सारे नेता, अभिनेताओं को अपने वश में कर लेती है। नेता और अभिनेता के बहाने लोगों को सीरियस काम में भी लगातार मनोरंजन तत्व मिलता रहता है। उनका इस्तेमाल यह अपने महिमामंडन के लिए करती है। इसके लिए सबसे तुच्छ चीज है- पैसा। इसे तो रुपयों से मतलब रहता है, हां, अगर बात डॉलर और पौंड की हो, तो इसके मुंह में लार आसानी से देखी जा सकती है।
एनजीओ नियम-कायदे कानून को भी दिल से मानती है। ये औरतों को काम-धंधा खोलने के लिए पैसे देती है और बदले में मोटा ब्याज लेती है। ये किसी से भेदभाव भी नहीं करती। मकड़ी होने पर भी ये हर इंसान की बात को पूरे ध्यान से तब तक सुनती है, जब तक कि इसका मतलब पूरा ना हो जाए। ये दिखावा पसंद भी है। अंदर से चाहे थकी हो, पर चेहरे पर हमेशा स्माइल रखती है, पता नहीं कब कोई फोटू ही खींच ले। यूं इसका कोई परिवार नहीं है। पर अलग-अलग जगहों पर ये किसी को अपना भाई, किसी को भतीजा बनाती हुई पाई जाती है। जो एक बार इसके पास आता है, इसी का होकर रह जाता है। ये खुद पूरा इंसान को चबाकर मंच पर शाकाहार की वकालात करती है। एक बार इसने देश में कन्याभ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों से चिंतित होकर एक गोष्ठी का आयोजन करवाया और बाद में वहां आए डॉक्टरों को अल्ट्रासाउंड की नई तकनीक भी सप्लाई कर दी। इसे कहते हैं, एक तीर से दो निशाने। बच्चों से भी इसे बड़ा प्यार है। बच्चों के हर मामले पर इसका बयान तीर की तरह तुरंत आता है।
इसकी देश की हर गतिविधि पर पूरी नजर रहती है। चुनावों में किसने-क्या किया, खेलों में कौन हारा-कौन जीता इत्यादि, इत्यादि। इस नजर रखने का इसे बहुत फायदा मिलता है। नजर रखने के दौरान अगर कहीं दाल में कुछ काला पाया जाता है, तो उसे सफेद बनाए रखने के लिए ये करोड़ों रुपए चट करने में उस्ताद है। हां, एक जरूरी बात। वैसे इसके पास अपने कामों की बड़ी लिस्ट है। हर टाइम उन्हें करने में लगी रहती है, पर परिणाम कुछ खास नहीं मिलता। दरअसल इसे काम करने में बड़ा आलस आता है। इसे तो बस माल चाहिए। काम के बजाय आप इससे सुनहरे सपनों की संपूर्ण व्याख्या सुन सकते हैं। इन दिनों यह अपना मकडज़ाल पहले से भी मजबूत कर चुकी है। तो अगर आप अपनी जिंदगी से नाखुश हैं, तो इसके जाल में फंस जाइए और ताउम्र जाल में औंधे मुंह लटके रहिए। बाकी आपकी मर्जी, धन्यवाद।
-आशीष जैन

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13 June 2009

मायका मार गया

भरी गर्मी में जब कोई किसी को तड़पता छोड़ दे, तो क्या उस शख्स स्वर्ग नसीब हो सकता है? स्वर्ग तो क्या उसे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। अब क्या बताएं आपको, कहां-कहां तड़पना नहीं पड़ता हमें। बीवी मायके में जाकर जम चुकी है, ऑफिस से बिजली गायब है और पता नहीं शहर में कहां से इतनी भीड़ आ गई है कि बस में कदम रखने को जगह नहीं मिलती। पता नहीं ऊपर वाले ने ये ग्रीष्म ऋतु किससे पूछकर बनाई थी। जरूर पैसे वालों ने रिश्वत दी होगी उन्हें। उनका क्या है, एसी कारों में घूमते हैं। मोबाइल फोन पर बीवियों से बतियाते हैं। हम क्या करें, लू के थपेड़े खाएं, पत्नी को चिट्ठी लिखेंगे, तो क्या होगा? दस दिन में उसे मिलेगी और उसका जबाव पंद्रह दिनों में लौटकर आएगा। जब तक तो हमारा अंत ही हो जाएगा। हम तो आप से ही एक सवाल करते हैं, सच-सच बताना, क्या जून का महीना आपको रास आता है। हमें पता है कि चाहे वजह कोई भी हो, पर पूरी दुनिया इस जून के महीने से तंग आ चुकी है।

अब क्या बताएं कि क्या-क्या दर्द हैं, इस जिया में। जब से हमारी घरवाली मायके गई, घर का सारा काम हमको ही करना पड़ता है। बर्तन धोते समय लगता है कि अगर मैं इतने अच्छे तरह से बर्तन मांजता जाऊं, तो फिर तो मुझे किसी अच्छे फाइव स्टार होटल में वेटर की नौकरी मिलते देर नहीं लगेगी। ऊपर वाले ने मायका एक ऐसी जगह बनाई है, जहां जाकर हर बीवी खुद को शहंशाह समझने लगती है, फिर तो वो खुदा की भी नहीं सुनती। काम-धाम तो करना नहीं पड़ता, बस इधर-उधर की बातें बनवा लो। गर्मी क्यों आती है? यह हम आज तक नहीं समझ पाए। अगर मैं खुदा होता, तो सबसे पहले इस गर्मी के मौसम को मौसम की लिस्ट में से निकाल फेंकता। गर्मी तो है ही, उस पर ये छुट्टियां और खाज का काम करती हैं। कसम से कहने को तो ये छुट्टियां बच्चों के लिए आई हैं, पर इसका सारा मजा बीवियां ही लूटती हैं। अब लगो रहो घर की दीवारों से बात करने में।
अब इधर-उधर मुंह मारने के दिन भी तो नहीं रहे। आजकल हर बीवी सर्तक है। ऐसे में पतियों की निगरानी करने के लिए पड़ोसन को बाकायदा ड्यटी देकर जाती है। पड़ोसन को तो उसकी बात माननी ही पड़ती है। आखिर उसका भी तो सांड सा पति है और वो भी तो मायके जाएगी, फिर उसकी निगरानी हमारी बीवी रखा करेगी। तभी हमारी पड़ोसन दिनभर दरवाजे पर पहरेदार की तरह बैठी रहती है। बीवियों की ये जो बिरादरी होती है ना, ये अपने अच्छे भले पति को बिगाड़ देती हैं। अगर पति दिनभर काम करके थका-हारा घर पर आता है, तो सोचती हैं कि जरूर दाल में कुछ काला है और जब यही पति किसी के साथ मजे उड़ाकर घर आता है और बीवी से मीठी-मीठी बातें करता है, तो पत्नी रहती है खुश। हमारे सालों रिसर्च करके एक बात तो पता कर ली है कि ये पत्नियां मायके जाती क्यों हैं? पत्नियां मायके जाए बिना भी खुश रह सकती हैं और मां-बाप से मिलना तो एक बहाना है। वो तो मायके जाकर पति को अंगूठे के नीचे रखने की नई-नई विचार-गोष्ठियों का आयोजन करती है और ऐसी तकनीकें ईजाद करती हैं कि पति नाम का जीव सदा उसके चंगुल में फंसा रहे। मायके में सारी सुविधाएं हैं, किसी भी मंथरा को घर पर आमंत्रित करो और योजनाएं बनाओ।
मैंने कहीं सुना था कि पत्नियां मायके रिचार्ज होने जाती हैं, अरे, मैं कहता हूं कि पत्नियां तो मायके हमें डिस्चार्ज करने जाती हैं। गर्मी में हमें अमरस पिए हुए कितने दिन हो गए, अगर बीवी होती, तो कितने प्यार से जूस निकालकर पिलाती। हम तो एक योजना बना चुके हैं, कलैंडर के किसी तरह से जून का महीना ही गायब कर दें। इसके लिए चाहे हमें एक नया महीना ईजाद करना पड़े, पर हम हार नहीं मानेंगे। मैं तो इस पक्ष में पूरे देश के पीडि़त पति मेरा साथ दें और कानून से मांग करें कि बीवियों के मायके जाने पर कानूनन रूप से रोक लगाई जाए। बीवियों के मायके जाने से पति वर्ग परेशान हो जाता है और इससे देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। हमें पूरी आशा है कि आप हमारी बात को समझ रहे होंगे और जल्द से जल्द हमारे पति पीडि़त संघ में शामिल होकर अपना दर्द हमारे साथ बांटेंगे।
-आशीष जैन

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पिटाई और धुनाई में अंतर

मुझे बड़ा गर्व है कि मैं हिंदुस्तानी हूं और अपने ही देश में रहता हूं। ये देश वाकई कमाल का है। यहां के लोग बड़े सहिष्णु होते हैं। यहां पत्थरों को भगवान समझकर पूजा जाता है। आप क्या सोच रहे हैं। हम भाट नहीं हैं। देश की स्तुति भी नहीं कर रहे हैं। वाकई ये सच्चाई है कि अपना देश महान है। इस देश ने गांधी को जन्म दिया है, तो भगतसिंह को भी। यहां शांति और पौरुषता का अनोखा मेल देखने को मिलता है, जो पूरी दुनिया में कहीं नजर नहीं आता। पूरी दुनिया हमें घूरने मतलब घूमने आती है। उनकी यहां की दिलकश जगहों को देखने की बजाय यहां रहने वालों में ज्यादा दिलचस्पी है। उन्हें आश्चर्य इस बात पर है कि किस तरह हर तरह के संकट से जूझते हुए हम खुशी-खुशी अपनी-अपनी जिंदगी में मगन रहते हैं।

हम जब-जब इन विदेशी पर्यटकों को देखते हैं, तो सोचते हैं कि ये आखिर खाते क्या हैं। खा-पीकर बिल्कुल सांड रहते हैं। क्या आपने कभी कोई ऐसा विदेशी देखा है, जो मरियल हो, बीमार दिखाता हो। तो हम तो उन्हें देखकर डर जाते हैं कि कहीं अगर किसी दिन किसी विदेशी ने गलती से हमारे कंधे पर हाथ रख दिया, तो उस दिन तो सीधा खड़ा रहना ही मुश्किल हो जाएगा। जिस जगह पर हमें ये नजर आ जाते हैं, हम तो दस फुट दूर खिसक लेते हैं। इसका यह मतलब कतई नहीं कि हम कमजोर हैं। ये तो हमारा सीधापन है जी। वरना... हम तो...। अब रहने भी दीजिए।
वैसे हम अगर किसी से डरते हैं, तो एकमात्र अपनी बीवी से। रोज हमारी बीवी खुद को आस्ट्रेलिया समझकर हम पर हमला बोल देती है, पर हम आह तक नहीं भरते। उसके शस्त्र बदलते रहते हैं, पर हमारी खाल तो वही रहती है ना। पिटते-पिटते तो एक बार गधा भी अपने मालिक को दुलत्ती मारकर भाग छूटता है और एक हम हैं कि बस पिटे जाते हैं। यूं तो पिटने और पीटने में बस एक मात्रा को उल्टा-सीधा करने की देर रहती है। पर यह कदम पता नहीं, हम आज तक क्यों नहीं उठा पाए? जब भी मात्रा को बड़ा करने की कोशिश करते हैं, छोटी मात्रा की मात्रा हम पर इस कदर हावी होती है कि पूरा शरीर दर्द से कराहने लगता है। हम भी आस्ट्रेलिया रहने वाले भारतीय स्टूडेंट्स की तरह थोड़ा-सा हल्ला-गुल्ला मचाकर शांत पड़ जाते हैं और हमारी बीवी के हौसले बढ़ते ही जाते हैं। आप समझ रहे हैं ना कि हम क्या कह रहे हैं।
मेरा एक दोस्त आस्ट्रेलिया में रहता है। कुछ दिनों पहले उसका फोन आया। कहने लगा कि यार हम हिंदुस्तानी क्या इतने कमजोर हैं कि हर कोई हमें तंग करके चला जाता है और हम देखते रह जाते हैं। ये आस्ट्रेलिया के गोरे पता नहीं अपने आप को समझते क्या हैं? आज दुनिया कहां की, कहां पहुंच गई और ये अभी भी काले-गोरे के चक्कर में फंसे हुए हैं। मैंने उसे समझाया और कहा कि पिटते तो हम भी हैं। वो बोला कि तुम पिटते हो और हमारी तो धुनाई ही हो जाती है। हम उससे पिटाई और धुनाई का अंतर पूछने लगे, तो वो बात घुमा गया और दुखी होने लगा। हमने उसे शांत करने के लिए लगे हाथ एक कहानी सुना डाली।
कहानी दरअसल यूं है कि एक बार भगवान ने सोचा कि क्यों ना मैं भी रोटी सेक कर देखूं। उन्होंने रोटी बेलना शुरू किया। जो पहली रोटी उन्होंने तवे पर सेकी, वो एकदम जली हुई थी। तब भगवान ने दूसरी रोटी सेकनी शुरू की। दूसरी रोटी अच्छी सेकने के चक्कर में वो कच्ची ही रह गई। तब आखिर में जाकर भगवान ने एकदम परफेक्ट रोटी सेकी। ना जली हुई और ना ही कच्ची। फिर भगवान ने रोटियां जमीन पर फेंक दीं। जली हुई रोटी जहां गिरी, वहां अफ्रीका बन गया। जहां कच्ची रोटी फेंकी, वहां इंग्लैंड जैसे देश बस गए और जहां एकदम गेहुंआ रोटी गिरी, वहां हिंदुस्तान बस गया। मतलब साफ है कि जहां साफ-सुथरे, गेहुंआ लोग रहते सकते हैं, वो जगह हिंदुस्तान ही है। तो ये कहानी सुनकर हमारा दोस्त भी मान गया वाकई हिंदुस्तानियों का कोई मुकाबला ही नहीं हो सकता। अब अगर आस्ट्रेलिया में हम पर हमला होता है, तो हमें खाली हाथ पर हाथ धरे तो बैठा नहीं रहना चाहिए। कब तक हम हमले सहते रहेंगे, संसद पर हमला हुआ, तो क्या हुआ था। मेरे देश के कर्णधारों, कम से कम इस बार तो उन्हें बता दो, वो पढऩे के लिए आए हैं, उनकी रक्षा करो। वैसे हमें लगता है कि जब आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम ही हमारे भज्जियों को भाजी बनाकर खा जाती है, तो ये तो देश का मामला है, इसमें वो कोई कोर-कसर थोड़े ही रखेंगे। हमें तो पूरा शक है कि जहां-जहां हिंदुस्तानी स्टूडेंट्स पर हमले हुए, उन कॉलोनियों में जरूर ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट टीम के सदस्य भी रहते होंगे। क्या पता खेल-खेल में 'खेलÓ कर गए हों।
घर जाकर जब हमने बीवी को ये सारी बातें सुनाईं, तो भड़क गईं। वो बोली कि तुम भी किस मिट्टी के बने हो। पिटाई और धुनाई का अंतर नहीं समझ पाए। वो कहने लगी कि गलती मेरी ही है। मैंने ही कभी तुम्हें धुनाई से रूबरू नहीं करवाया। चलो आज तुम्हें धुनाई से मिलवा ही देती हूं। फिर जो उसने मेरा हाल किया, वो मैं अभी आपको बता नहीं पाऊंगा। दरअसल मैं बड़ा कमजोर दिल इंसान हूं। हो सकता है कि बताते-बताते रोने लगूं। पर उस धुनाई से मुझे पता लग गया कि पिटाई और धुनाई में बेसिक अंतर क्या होता है। आप भी जानना चाहते हैं, तो लीजिए सुनिए। पिटाई तो वो है, जो किसी बात पर की जाए। सामने वाले को बताकर की जाए। जबकि धुनाई तभी की जाती है, जब कोई वजह तो होती नहीं है, बिना कारण से बस खुन्नस निकाली जाती है और सामने वाले की एक भी सुनी नहीं जाती। यही सब तो आस्ट्रेलिया रहने वाले मेरे भारतीय दोस्तों के साथ हुआ है। चलिए, अब ये बात अपने तक ही रखना, किसी को बताना मत। वरना मैं पिटाई या धुनाई कुछ भी कर सकता हूं।
-आशीष जैन

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