काश! कॉलेज के ये दिन कभी ना बीतें। जिंदगी यूं ही थमी रहे और दोस्तों के साथ हरदम मस्ती का दौर चलता रहे। ना कोई फ्रिक ना कोई टेंशन बस फुल एन्जॉय।
'यार ये लड़के अपने आप को समझते क्या हैं? हमें देखते ही यूं स्टाइल मारने लगते हैं, जैसे सलमान खान हों, पर लगते पूरे जोकर हैं।' अदिती ये बोली ही थी कि मैं जोर-जोर से हंसने लगी। मैं बोली, 'तू अभी से टेंशन ले रही है। अरे, अभी तो हमें कॉलेज ज्वॉइन करे हुए, जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए हैं। आगे-आगे देख, होता है क्या। अब हमें बिंदास बनकर अपनी लाइफ गुजारनी है। फुल मस्ती, नो टेंशन।' मैं और अदिती बचपन के दोस्त हैं। साथ में स्कूलिंग की है और अब कॉलेज में भी साथ-साथ आ धमके हैं। हमने हमेशा गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की, सो लड़कों के पढ़ने के नाम से ही मन धड़कने लगता है। ना जाने कैसे होंगे। मन में खयाल आता कि हमें परेशान करेंगे। पर ये सब के सब तो पढ़ाकू निकले। कुछ एक टपोरी टाइप के लडक़े हमें देखकर चारों ओर मंडराने लगते हैं। पर हम कौनसा उन्हें भाव देते हैं। कॉलेज में आते ही ऐसा लगता है कि अरे पढ़ाई का असली मजा तो यही हैं। हमने स्कूल की बजाय सीधे की कॉलेज में एडमिशन लिया होता, तो कितना मजा आता। मन में तो यही उमंग है कि अब स्कूल की पाबंदियों से छुटकारा मिल गया। मन मयूर की तरह नाचता रहता है। एक तरफ लगता है कि चलो अब स्कूल यूनिफॉर्म और प्रेयर का झंझट खत्म हुआ। साथ ही कुछ अजीब विचार भी मन में आते हैं। चारों तरफ के दिखावे पर नजर पड़ती है, तो मन सोचता कि ये पढ़ने की जगह है या कोई फैशन शो। स्टाइल मारने में सारे बंदे परफेक्ट। कभी मन सोचता है कि यही तो दिन कॅरियर संवारने के हैं, दूसरी तरफ समाज की कई सच्चाइयां सामने आती हैं, तो मन में घिन्न होने लगती है। दरअसल पिछले दिनों मेरे साथ पढ़ने वाली रीना हमारी ही क्लास के सुरेश के साथ कहीं चली गई। सब कहते हैं कि वो सुरेश के साथ भाग गई। पर मैं सोचती हूं कि क्या सुरेश नहीं भागा था उसके साथ। फिर सब रीना को ही दोष क्यों देते हैं। अदिती ने मुझे बताया कि वे दोनों एक-दूसरे को प्यार करते थे। तो भई, प्यार करना कोई जुर्म थोड़े ही ना है। पर दोनों को अगर किसी पवित्र बंधन में बंधना ही था, तो घरवालों को प्यार की बात बताते और उन्हें समझा-बुझाकर शादी करते। इस तरह कायरों की तरह घर वालों को दुखी करके कहीं जाने से कौनसा वे ताउम्र खुश रह पाएंगे। चलिए ये तो हुई मेरे कॉलेज की बात। पर एक ऐसी बात भी आपको बताना जरूरी है, जिसके बिना मेरी कॉलेज लाइफ अधूरी है। इसी साल तो मुझे पापा ने नया मोबाइल और स्कूटी लाकर दी है। अब तो मानो मैं आसमान में उड़ती रहती हूं। जमीन पर तो कदम ही नहीं रखती। मोबाइल पर कब हम सब दोस्त मिलकर पार्टी की प्लानिंग कर लेते हैं, किसी को पता ही नहीं लगता। अब तो मम्मी ने मेरी पॉकेट मनी भी बढ़ा दी है। जो भी ड्रेस पसंद आती है, दोस्तों के साथ जाकर खरीद लाती हूं। थोड़े पैसे खुद के पास होते हैं और थोड़े दोस्तों से उधार। अरव्, सब चलता है, मैं भी तो मदद करती हूं सबकी। हां, मम्मी जरूर समझाती है कि बेटी, तू पैसे बहुत फिजूलखर्च करने लगी है। पर आप ही बताइए, अगर ड्रैस, मेकअप और गिफ्ट पर पैसे खर्च नहीं करूंगी, तो भला मेरे दोस्त क्या कहेंगे? कहेंगे, अभी भी बच्ची ही है क्या। हां, जब-जब शाहरूख की मूवी लगती है, मैं फ्रैड्स के साथ कॉलेज से बंक मारकर फिल्म जरूर देखती है। यार सच कहूं, कॉलेज से बंक मारने का भी एक अलग मजा है। बंक मारो और किसी दोस्त को पकड़ लो। फिर तो कोई भी बहाना बनाकर उससे मैक्डी में ट्रीट ले ही लेते हैं। बाद में उसे बताते हैं कि आज तो तू बकरा बन गया हो.. हो.. हो..। यूं तो हमारे कॉलेज का टाइम सुबह 11 से 3 बजे तक का है, पर हमारी मित्रमंडली तो 6 बजे तक कैंटीन में गप्पें ही लड़ाती रहती है। फिर जब थक-हारकर बोर होने लगते हैं, तो सबको बाय कहके निकले पड़ते हैं घरों की ओर। मम्मी-पापा से ज्यादा दोस्तों के साथ रहना-बातें करने को जी चाहता है। सब कुछ सुहाना-सा लगता है। लगता है कि ये दिन कभी खत्म ना हों। एक बार कहीं बैठ गए, तो घंटों बैठे रहें और बातों का सिलसिला चले, तो फिर कभी खत्म ना हो। घर पर भी जाकर चैन थोड़े ही ना पड़ता है। दादा-दादी, चाची-बुआ सबको अपनी राम-कहानी सुनाने लगती हूं। ये हुआ, ये खाया, यूं मजे किए। मेरे साथ-साथ पूरा घर की जवान हो उठता है। अब तो खुली आंखों से सपने देखती हूं। खुलकर जीती हूं। इन दिनों सब कुछ धुला-धुला, साफ-साफ और नया-नया नजर आता है। मेरी तो यही ख्वाहिश है कि हमेशा के लिए ये दिन मेरी आंखों में बस जाए और जिंदगी यूं ही खुशनुमा बनी रहे।
30 March 2009
लाइफ में बिंदास मस्ती
बचपना बीता जाए रे...
मैं हूं छवि। नटखट, अलबेली और चुलबुली। आपको पता है- मेरे नाम की भी एक कहानी है। ननिहाल में पैदा हुई, तो सारी औरतें बातें बनाने लगी थीं- ये इस पर गई है, उस पर गई है, पर बड़ी मौसी बोली, 'अरे हमारी लाडो रानी में तो सबकी ही छवि नजर आती है, तेरी, मेरी, मां की सबकी। इसका नाम तो छवि ही होना चाहिए। छवि मासूम है, दिल से। रंगों भरी इस दुनिया में सबसे जुदा। सब मुझे बहुत प्यार करते हैं। यूं तो मेरा एक छोटा भाई छुटकू भी है, पर सब मेरी बात पहले सुनते हैं। अभी मैंने उम्र के 13 बसंत ही तो देखे हैं। पर इन दिनों मैं महसूस कर रही हूं कि मां की पाबंदियां मुझ पर कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। अब तो मां मुझे पड़ोस के गंपू के साथ भी खेलने नहीं देती। सांझ ढले ही मां की आवाज पड़ने लगती है। पता नहीं उन्हें हो क्या गया है। सामान लेने बाजार जाती हूं, तो भी मां छुटकू के साथ भेजती हैं। उनकी हिदायतें भी अजीब होती हैं कि संभल के चलना। जिस रास्ते जाए, वहीं से आना। और पता नहीं क्या-क्या। बाजार जाती हूं, तो पास से गुजरते लोग भी घूरते रहते हैं। मुझे यह सब कतई अच्छा नहीं लगता। दादी भी मुझे लंगड़ी टांग खेलने नहीं देती। पहले तो मेरी हर बात मानती थी। मुझे याद है बहुत दिनों पहले वे मेरे लिए एक गुड्डा लेकर आई थी और बोली कि इससे तेरा ब्याह रचाएंगे। उस वक्त मैंने पूछा था कि ये ब्याह क्या होता है दादी। तो वे बोली, 'मेरी प्यारी गुड्डू, ये तो एक खेल है, जोग-संजोग का।' उनकी यह बात मेरे आज तक पल्ले नहीं पड़ी है। पिताजी तो सदा अपने काम में मगन रहते हैं। उनके हिस्से का प्यार भी मां ही करती हैं। पिछले दिनों की बात है, एकाएक पेट में बहुत दर्द होने लगा। यूं लगा मानो मर ही जाऊंगी। मैं जोर-जोर से रोने लगी। दौड़कर मां मेरे पास आई और बोली, 'इन दिनों में ये सब होता है।' उस दिन सारे दिनभर मैं बिस्तर पर ही सोती रही। कुछ भी अच्छा नहीं लगा। ना ढंग से खाना खाया, ना ही कहीं गई। रात को मां ने अकेले में समझाया कि बेटी अब तू बड़ी हो गई है। तू अब बच्ची नहीं रही। अब हर महीने ऐसा ही होगा। ये तेरे औरत बनने की तैयारी है। ये दर्द कुछ दिन तक रहेगा, फिर ठीक हो जाएगा। अब तू साफ-सफाई का ज्यादा ध्यान रखा कर। चौके में भी मत घुसना। पानी से थोड़ा दूर ही रहना। इसके अलावा ढेरों सलाह उन्होंने दी। मुझे लगा कि वाकई अब मैं सबसे अलग हो गई हूं। मां ने बताया कि अब तू लड़कों के साथ खेलना छोड़ दे। मैं मन ही मन सोचती कि मां मेरी खुशियां मुझसे मत छीनो। इसमें कोई मेरा कसूर नहीं है। मुझ पर इतनी पाबंदियां क्यों हैं? उन चंद दिनों के लिए दादी भी मुझे अछूत मानने लगी। मेरे लिए अलग बिस्तर लगने लगा। एक बारगी तो मन में आया कि कह दूं मां से, मुझसे मेरा बचपन क्यों छीना जा रहा है? होली जैसे त्योहार पर भी किसी दोस्त को रंग नहीं लगाने दिया। मैं क्या करूं, मन ही मन दुखी होकर रह जाती हूं। मां से पूछती हूं, तो उनका एक ही जवाब रहता है कि तू लड़की है, लड़का नहीं। खुद को खूब कोसती हूं कि काश, मैं लड़का होती, तो मुझसे मेरा बचपन तो नहीं छिनता।आज भी मां की बचपन में लाई छोटी सी फ्रॉक देखती हूं, तो बहुत खुश होती हूं। बचपन से आज तक मां कितने प्यार से मेरे बालों में सरसों का तेल लगाती आई हैं। कहती हैं, 'बालों को रोज तेल नहीं लगाया, तो कमजोर हो जाएंगे।' पहले घर के आंगन में आम का पेड़ था। उस पर सब बच्चे झूला डालकर मस्ती करते थे। अब तो मां वहां खड़ा देखते ही डांटने लगती है। कांच की चूड़ियों के टुकड़े से भी तो हम खूब खेलते थे। मेरे बचपन से सारे दोस्त आज भी मुझे याद करते होंगे। जब पहली बार स्कूल गई थी, तो और बच्चों की तरह रोई थोड़े ही थी मैं। बिल्कुल सयानी बच्ची की तरह पूरे सात घंटे घर से दूर रही थी। शरारती तो थी, पर घरवालों को कभी परेशान नहीं किया। छुटकू की शैतानियों से तंग आकर पिताजी जरूर उसे चपत लगा दिया करते थे। दादी हमेशा छुटकू का पक्ष लेती। छुटकू को मैं बहुत प्यार करती हूं। वो गुस्से में कभी-कभी मेरी चुटिया पकड़कर फिराने लगता, तो पूरा घर हंसता, पर मेरव् बालों को खींचने पर हुए दर्द के बारे में कोई नहीं पूछता। ठीक है, भई मैं लड़की हूं, पर दर्द तो मुझे भी होता है। दर्द होने पर भी मुझे हंसना पड़ेगा, कभी सोचा नहीं था। मां कहती है कि पढ़ाई ढंग से करेगी तो आगे की जिंदगी सही से गुजर जाएगी। तुझे काम नहीं करना। छुटकू को इंजीनियर बनाने की बात करते हैं, पर मेरे भविष्य के सवाल पर सब मौन हो जाते हैं। कहते हैं कि तू मत सोच, हम सब सही करेंगे। अब तो मैं भी मान चुकी हूं कि मेरा अस्तित्व पर लगे प्रश्न चिह्न भविष्य ही हल कर पाएगा।
19 March 2009
मंदी में मौज
मंदी के दौर में हम सबके लिए जरूरी हो गया है कि अपनी जरूरतों पर लगाम कसी जाए और बचत के सूत्र को जीवन में उतारा जाए। आपको पता ही नहीं होता और छोटे-छोटे खर्चों से आपकी जेब ढीली होती जाती है। फाइनेंस एक्सपर्ट गौरिका चौधरी बता रही हैं कि मंदी के दौर में आम लोग खासकर महिलाएं किस तरह रुपए-पैसे की बचत करें। आइए जानते हैं कुछ मनी मंत्र-
पैसा आज की सबसे बड़ी जरूरत है। मंदी के दौर में इस बारे में सोचना निहायती जरूरी हो गया है। महिलाओं के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कदम-कदम पर उनका वास्ता रुपए-पैसे से पड़ता है, पर उन्हें नहीं पता होता कि यह कैसे आता है और कहां-कैसे जाता है। इंश्योरेंस, शेयर बाजार जैसे विषयों पर उनकी राय नहीं ली जाती। अक्सर हिंदुस्तानी पति नहीं चाहते कि उनकी पत्नी पैसे के बारे में किसी जानकार से राय ले। महिलाओं को पता नहीं होता कि उनके पति का बिजनेस का टर्नओवर कितना है? मेरा मानना है कि घर के आर्थिक मामलों में महिलाओं की भूमिका में इजाफा होना चाहिए। जेब और जीवनशैली का गहरा नाता है। अगर आपके पास ज्यादा पैसे हैं, तो जाहिर सी बात है कि आप अपना और परिवार का जीवन स्तर सुधारना चाहेंगे। मंदी के दौर में जेबें छोटी हो गई हैं, पर लोगों के सपने अभी भी बड़े हैं। ऐसे में पूरे परिवार को ही हर फैसले में कदम फूंक-फूंक कर रखने होंगे। आज नौकरियां जा रही हैं। कंपनियां अपने कर्मचारियों को आधी तनख्वाह ही दे रही हैं। ऐसे में परिवार संभालने के लिए महिला की भूमिका बहुत बढ़ जाती है।
14 March 2009
हर रंग कुछ कहता है
12 March 2009
रंगीली छटा के अंदाज
आशीर्वाद बुजुर्गों का
09 March 2009
नारी कभी ना हारी
नारी के ना जाने कितने रंग है? कभी एक रंग को पकड़ता हूं, तो लगता है कि अरे यह तो छूट ही गया। दया, प्रेम, करुणा जैसे गुणों की बात करने लगता हूं, तो जीवटता, सहनशीलता, मर्यादा जैसे रंगों पर बात अधूरी रह जाती है। आज मन कर रहा है कि चलो कोशिश करूं और देखूं कि महिला के जिंदगी के कितने रंगों में समाई है? महिला दिवस आ रहा है। लोग चारों ओर महिलाओं की उपलब्धियों की बात करेंगे। चारों दिशाओं में गूंजते नारों से लगेगा कि महिला ही आज सर्वोपरि है। सरकार भी तो अपने गाल बचाएगी। जननी सुरक्षा लागू कर दी। फिर भी दूर-दराज में आज भी प्रसव मां के लिए सुरक्षित नहीं है। अरे सरकार खुद कहती है कि पिछले 20 सालों में करीब 1 करोड़ बच्चियों को गर्भ में ही मार डाला गया। अब अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की भी तो सुन लो। कहता है कि दुनियाभर में 75 फीसदी महिलाएं कोई ना कोई काम करती है। हमने पूछा फिर तो महिलाओं के पास बहुत-सी संपत्ति होनी चाहिए। पर जवाब आता है- जी नहीं। इन काम करने वाली वामाओं में से सिर्फ 0.01 फीसदी महिलाओं के पास संपत्ति का मालिकाना हक है। वाह रे दुनिया बनाने वाले। काम कोई करे और मजा कोई ले। बचपन में नानी, मामी, फूफी, बहन, पत्नी और मां जैसे रिश्तों में बंधी नारी आज तो हमारी अफसर बन गई है। प्रतिभाताई को भूल गए क्या। राष्ट्रपति हैं। देश में कोई बड़ा फैसला उनके हस्ताक्षर के बिना कोई करके तो दिखाए। कभी जमाने भर से दबी-कुचली नारी अब आजाद हो गई है। विद्या नाम चाहे कहीं सुनाई ना दे, पर माया की खनक चहुंओर है। अजी गौर कीजिएगा, मैं तो दानवी मायावती की बात कर रहा हूं। खुद जिंदा है, पर लोगों की याददाश्ती के लिए खुद की आदमकद मूर्ति बनाकर खड़ी कर दी है। क्या पता कल वो ना रहे, मूर्ति के बहाने उसकी याद तो ताजा होती रहेगी। और तो और आज तो फिजा का जमाना है। जो दर-दर अपने चंदू को खोज रही है। मीडिया है ना उसका साथ देने के लिए। ऐसे में चंद्रयान के लिए काम करने वाली खुशबू मिर्जा को कौन पूछे। होगी कोई। हमें तो मसाला चाहिए। अपन पूछते हैं फिर आप सानिया के पीछे क्यों पड़े रहते हो। वो भी तो देश का नाम ही ऊंचा कर रही है। अजी वो कहते हैं हमें कौनसा टेनिस से मतलब है। हमें तो उसके स्कर्ट से काम है। सतयुग में हम कहते थे कि देखो नारी हो, तो मैत्रयी या गार्गी जैसी। गार्गी जैसी नारी जिसने याज्ञक्ल्वय जैसे विद्वान को शास्त्रार्थ में मात दी। आज चाहे गार्गी कहीं नजर न आए, पर हर गली मोहल्ले में उसकी बहनें अपने-अपने पतियों से यूं वाकयुद्ध लड़ती रहेंगी कि मानो लड़ाई जीतने पर उन्हें ही परमयोद्धा का खिताब मिलने जा रहा हो। भई त्रेता युग को भूल गए क्या। जब प्रभु राम हुए। तब की नारियां क्या कम थीं। सीता, केकैयी, अहल्या और शबरी। हर किसी में कुछ खास बातें। आज की महिला को तो सीता शब्द ही गाली लगता है। केकैयी ना होती, तो हिंदुस्तानी फिल्मों की ललिता पंवार को कौन याद रखता। शबरी जैसी तिरस्कृत नारी के झूठे बेर खाकर रामजी कितना खुश हुए, ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है। हां, अहल्या जैसी पतिव्रता पत्नी कहीं ना हो, जो इंद्र को ऋषि गौतम मान बैठी, तो बेचारी को पति ने ही श्राप दे डाला और पत्थर की बनकर रह गई। वो तो शुक्र है राम जैसे दया के सागर ने उन्हें छू लिया और वापस नारी बना डाला। चलिए छोड़िए जी, आप तो द्वापर युग पर नजर डालिए। क्या टाइम था भाईजी। यशोदा का लाल किशन कन्हैया। गोपियों के बीच घिरा हुआ। राधा के संग रास रचाकर सारी दुनिया को प्यार का नया पाठ सिखला गए। यशोदा भी कितना स्नेह उड़लेती थी अपने गोपी बजैया पर। मैं तो इतना ही जानता हूं कि जैसे-जैसे समय बदलता है, स्त्री भी अपनी महानता दिखाने से नहीं चूकती। अब कलियुग को ही देख लीजिए। पन्नाधाय, क्या महिला थी। स्वामिभक्ति और त्याग की उनसे बड़ी मिसाल शायद ही कोई और हो। उदयसिंह की खातिर अपने पुत्र को बनवारी की तलवार के आगे लिटा दिया। कैसा दृश्य रह होगा, जब अपनी आंखों के सामने अपने बेटे को तलवार से कटते देखा होगा। अब मैं ज्यादा तो नहीं बोलूंगा पर इतना कहूंगा कि हमारे बेटे-बेटियों को तो मल्लिका और करीना ही भाती हैं। इनके गुणों से अवगत कराते हुए अक्सर हमसे कहते रहते हैं कि बापू आज तो करीना के जीरो फिगर वाली ड्रेस पहन ही लेने दो। हम भी क्या करें, आखिर नौजवान पीढ़ी है। खुशी-खुशी हां कर दी, तो ठीक। वरना विद्रोह भी कर सकती है। बहू आजादी के नाम पर अपना पल्लू सिर से कब का पीछे ले जा चुकी है और बेटी न जाने कब स्कूटी के सहारे अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने में मशगूल है। देखो जी, हम तो ठहरे जी सज्जन जीव। हमें तो सब भला ही दिखता है। हम तो यही मान लेते हैं कि यही है असल महिला सशक्तिकरण। अजी आप भी टेंशन मत लो। आज की नारी खुद समझदार है। वो खुद को संभाल लेगी। अगर मैंने या आपने ज्यादा भाषण झाड़ने की हिम्मत की, तो खैर नहीं होगी।
-आशीष जैन
होली आई रे
गुलाल
05 March 2009
ये निराली होलियां
धमाल हो, गींदड़ नृत्य हो या न्हाण राजस्थानी फिजाओं में होली के लिए अलग-अलग परंपराएं हैं। आइए हम भी डूबते हैं राजस्थानी होली के रंगों में-
राजस्थान में होली। भई ब्रज की होली देख ली, पर अगर कभी धोरां री धरती पर होली के नजारे नहीं देखे, तो समझो जीवन में उल्लास की असली तस्वीर ही नहीं देख पाए। यहां होली का मतलब खुद को भुलाकर मस्ती में डूबना है, तो भगवान को याद करना भी है। अपनी पूरी ऊर्जा के साथ यहां के लोग होली को सबसे बड़ा त्योहार मानते हैं। यहां होली हर क्षेत्र में अलग-अलग तरह से मनाई जाती है। धमाल, गींदड़ नृत्य और न्हाण की परंपरा यहां बरसों पुरानी हैं।
04 March 2009
कहां गया मेरी बगिया का फूल?
क्या लहू का कोई मजहब हो सकता है? क्या अश्कों में तड़पती आह से राम या रहीम को अलग-अलग दर्द होता है? अगर नहीं, तो फिर क्यों गुलशन को उजाड़ने पर आमादा है आतंक। सपनों की पोटली लिए मुंबई में घूमते सैकड़ों बेगुनाह ही नहीं, पूरी दुनिया की रूह को कंपाने की कोशिश है हाल में मुंबई में हुआ आतंकी हमला। रोज की भागदौड़, हजारों परेशानियां और अब उसमें शामिल है एक डर। आतंक का डर। कब किस ठौर विस्फोट हो और जिंदगी की रोशनी बेनूर होकर हजारों परिवारों के घरों को हमेशा के लिए अंतहीन अंधेरा दे जाए। पर कभी न थमने की हम देशवासियों की शपथ हमेशा रंग लाती है और हम फिर खुशी की बहार को अपने आंगन में बिखरने के लिए बुला लेते हैं।
28 February 2009
...हम हौसलों से उड़ा करते हैं
कलम थामने वाली कोमल कलाइयों ने फाइटर प्लेन को भी बखूबी कंट्रोल किया। अलीगढ़ की सुमन शर्मा ने सेना में कोई प्रशिक्षण नहीं लेने के बावजूद मिग-35 और एफ-16 को बड़ी कुशलता से उड़ाया। अब वे रूसी मिग उड़ाने वाली दुनिया की पहली महिला बन चुकी हैं। इस जोशीले सफर की कहानी, खुद सुमन शर्मा की जुबानी-
20 हजार फीट की ऊंचाई। हाथ में फाइटर प्लेन का कंट्रोल स्टिक। मुंह पर ऑक्सीजन मॉस्क। तेजी से धड़कता दिल। प्लेन का एसी चालू है, पर चेहरे पर पसीने छूट रहे हैं। नीचे झांकने पर पूरी दुनिया छोटा-सा खिलौना नजर आने लगी। ऐसे में जरा सी चूक हो जाए, तो जान पर बन आने का डर। कुछ-कुछ ऐसा ही एहसास मुझे 9 फरवरी को सातवें एयरो इंडिया में हुआ जब मैंने एफ-16 फाइटर प्लेन को उड़ाया। हवा को चीरते हुए प्लेन ज्यों ही आगे बढ़ा, मानो जिंदगी थम सी गई है। लगा मैं कोई पंछी हूं। बचपन में आसमान में उड़ते परिंदों को देखकर अक्सर मन करता था कि मैं भी नीलगगन में किसी पंछी की तरह उड़ती फिरूं। यकीन ही नहीं हुआ कि खुली आंखों से देखा मेरा सपना साकार हो रहा है। फिर तो कुछ ऐसा जोश आया कि तीन दिन बाद ही लड़ाकू विमान मिग-35 को भी उड़ा लिया।
मुकाबला गुरुत्वाकर्षण से
21 February 2009
लहरों के सरताज
नौसेना में जिंदगी के असली अनुभवों से गुजरने वाले पांच फाइनलिस्ट में तीन महिलाएं भी।
19 February 2009
फैशन वही जो दिल को छू ले
फैशन के रंग डिजाइनर राघवेंद्र राठौड़ की जुबानी।
कुदरत है पाठशाला
10 February 2009
साहस की नैया सफलता का किनारा
छप्पन साल की अमरीकी महिला जेनिफर फिगे बनीं अटलांटिक महासागर तैरकर पार करने वाली दुनिया की पहली महिला।
05 February 2009
क्या यही प्यार है?
'आइसक्रीम खाओगी?' 'नहीं, जानू आज पिज्जा खाना है।' 'यार, इस ड्रैस में तुम बड़ी हॉट लग रही हो।' 'डियर, आज नाइट को क्या खास कर रहे हो?' 'बाय डार्लिंग, आई लव यू।' ये है आज का प्यार करने का अंदाज। समय बदला, दुनिया बदली और बदले हैं प्यार करने के तरीके। पर एक चीज जो जस की तस है, वह है जज्बात, दिल और उसके धड़कने का अंदाज। गौर करते हैं वेलेंटाइन डे के बहाने।
युवा कौन? अक्सर सवाल मन में उठता है। हर बार दिल से यही आवाज आती है, जो सारे बंधनों को तोड़ दे और पूरी दुनिया को प्यार के धागों में बांधते हुए आगे बढ़ता जाए, वही है असल मायने में युवा। तन-मन, जीवन हर कोने से प्यार की सुगंध महके। बातों में मिठास भरा उल्लास हो। मतलब जिंदगी से प्यार साफ-साफ झलके।
30 January 2009
जिंदगी कभी रिटायर नहीं होती
22 January 2009
जीने की राह

कुआ नया-नया ही बना था। पनिहारिन ने पानी भरने के लिए कुए की जगत पर घड़ा रखा, तो वह लुढक़ने लगा। कुए की जगत पर लगा हुआ पत्थर हंसा और घड़े को बेपेंदे का कहकर उसकी खिल्ली उड़ाने लगा। घड़ा चुप रहा। लगातार कुछ दिन घड़ा उस जगह पर रखते-रखते वहां पर एक गोल गड्ढा सा बन गया। अब घड़ा स्थिर रखा जाने लगा। तब घड़े ने पत्थर से कहा- 'देख भाई पत्थर! मैंने निरंतर प्रयास से अपने कोमल अंगों की ही रगड़ से तुम्हारे कठोर शरीर में भी अपने लिए स्थान बना लिया।'
भाग्यवान
एक बूढ़ा किसी ठूंठ के नीचे बैठा सर्दी में सिकुड़ रहा था। पेड़ पर ऊपर की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि वह भी उसी की तरह बूढ़ा हो गया है। बूढ़े ने अपने विगत वैभव की गाथा गाई और पेड़ के साथ सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहा- तुम्हें भी मेरी ही तरह भाग्य ने सताया है न? ठूंठ ने कहा- मैं तुम्हारे जैसा दुखी नहीं हूं। बसंत निकट आ रहा है। मैं उसी की सुखद कल्पना में खोया रहता हूं और खुश रहता हूं कि न जाने कितने और बसंत देखने मेरे भाग्य में बदे हैं। मेरे भाग्यवान होने को धन्यवाद दो और अपने बीते हुए समय की चिंता मत करो।
- आशीष जैन
16 January 2009
आने वाला कल हमारा है
गणतंत्र के साठ साल पूरे होने को हैं, इस दौरान बहुत कुछ बदला, लेकिन औरतों के लिए जिंदगी फिर भी दुश्वार बनी रही। इसके बावजूद किरण बेदी हताश नहीं हैं। वे कहती हैं, 'मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाला वक्त हम महिलाओं का ही है। चाहे कितनी बाधाएं आएं, हम हार मानने वाली नहीं हैं। मैं पूरे देश की महिलाओं को यकीन दिला देना चाहती हूं कि वे जिस शिद्दत से अपने-अपने कामों को अंजाम दे रही हैं, उसकी बदौलत आने वाला वक्त हमारी मुट्ठी में होगा।'
सहना मुझे मंजूर नहीं
गणतंत्र दिवस के मौके पर यह जानना दिलचस्प रहेगा कि संविधान बनने के बाद देश की आधी आबादी के हितों के लिए क्या कानून बने हैं और उन्हें अमल में कैसे लाया जाए?
-धारा 14 के तहत हिंदू महिला के पास खुद की कोई संपत्ति है, तो वह पूर्ण रूप से उसकी ही संपत्ति होगी। महिला की संतान खुद इस संपत्ति की मांग नहीं कर सकती।
हिंदू दत्तक भरण-पोषण अधिनियम 1956-
धारा 8 के मुताबिक कोई भी वयस्क और स्वस्थचित्त हिंदू महिला किसी भी बच्चे को गोद ले सकती है। महिला का शादीशुदा होना जरूरी नहीं है।
- अगर महिला किसी लड़के को गोद लेती है, तो लड़के की उम्र महिला से 21 साल कम होनी चाहिए।
- गोद लेने वाली महिला के पास पहले से कोई जीवित संतान नहीं होनी चाहिए।
- अगर किसी के पास इकलौती संतान है, तो उसे गोद नहीं ले सकते।
-अगर महिला विवाहित है, तो उसके पति की सहमति जरूरी है।
- बच्चे को गोद देने व लेने वाली महिला के बीच स्टांप पेपर पर एक गोदनामा तैयार किया जाता है।
- हर जिले में मौजूद रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर गोदनामे को पंजीकृत करवाना जरूरी है।
दहेज निषेध अधिनियम 1961-
सिंध लेती-देती एक्ट 1949 को लागू करने के पीछे दहेज की प्रथा को रोकना ही था।
- धारा 3 के अनुसार अगर कोई दहेज के लेन-देन में लिप्त पाया जाता है, तो उन्हें पांच साल तक की सजा और15 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।
- धारा 4 के मुताबिक अगर कोई दहेज की मांग करता है, तो मजिस्ट्रेट दो साल तक की सजा और दस हजार रुपए तक का जुर्माना कर सकता है।
-आशीष जैन(राजस्थान उच्च न्यायालय के एडवोकेट भरत सैनी से बातचीत के आधार पर) ...आगे पढ़ें!
09 January 2009
उम्र जुदा, जज्बा एक
अभी आसमां बाकी है

नभ में चमकता नन्हा सितारा

मैं हूं नीलगगन की रानी
दुबले-पतले से रहमान चाचा, हमारे लिए पतंगों के सौदागर हैं। दिनभर लगे रहते हैं कांच के चूरे को डोर पर घिसने में। कागज के रंग-बिरंगे टुकड़ों को बारीक सी सींक से सहारा देकर आकार देते हैं उड़ान की परी पतंग को। ये कागज के चंद टुकड़े ही उनकी संतान हैं। पान तारा, चांद तारा, चिरैया, बेगम और कनकौवा, न जाने कितनी सारी पतंगें हैं उनके पास। किसी डोर को सद्दा बना दिया, तो किसी पर मेहनत कर उसे मांझे में ढाल दिया। उनके घर की चूल्हे की परवाह ये पतंगें ही तो करती हैं। हम सब घेरे रहते हैं उन्हें मुफ्त का मांझा पाने को। चाचा बताते हैं कि बच्चों, इन कागज के टुकड़ों को यूं ही न समझना, इन में भी रूह समाई रहती है। इस रूह को तसल्ली तभी मिलती है, जब ये हवा में पहुंचती है और झूमकर आसमान पर राज कर लेती है। चाचा की असल मेहनत रंग लाती है मकर संक्रांति के दिन।






