19 March 2009

मंदी में मौज

मंदी के दौर में हम सबके लिए जरूरी हो गया है कि अपनी जरूरतों पर लगाम कसी जाए और बचत के सूत्र को जीवन में उतारा जाए। आपको पता ही नहीं होता और छोटे-छोटे खर्चों से आपकी जेब ढीली होती जाती है। फाइनेंस एक्सपर्ट गौरिका चौधरी बता रही हैं कि मंदी के दौर में आम लोग खासकर महिलाएं किस तरह रुपए-पैसे की बचत करें। आइए जानते हैं कुछ मनी मंत्र-
पैसा आज की सबसे बड़ी जरूरत है। मंदी के दौर में इस बारे में सोचना निहायती जरूरी हो गया है। महिलाओं के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कदम-कदम पर उनका वास्ता रुपए-पैसे से पड़ता है, पर उन्हें नहीं पता होता कि यह कैसे आता है और कहां-कैसे जाता है। इंश्योरेंस, शेयर बाजार जैसे विषयों पर उनकी राय नहीं ली जाती। अक्सर हिंदुस्तानी पति नहीं चाहते कि उनकी पत्नी पैसे के बारे में किसी जानकार से राय ले। महिलाओं को पता नहीं होता कि उनके पति का बिजनेस का टर्नओवर कितना है? मेरा मानना है कि घर के आर्थिक मामलों में महिलाओं की भूमिका में इजाफा होना चाहिए। जेब और जीवनशैली का गहरा नाता है। अगर आपके पास ज्यादा पैसे हैं, तो जाहिर सी बात है कि आप अपना और परिवार का जीवन स्तर सुधारना चाहेंगे। मंदी के दौर में जेबें छोटी हो गई हैं, पर लोगों के सपने अभी भी बड़े हैं। ऐसे में पूरे परिवार को ही हर फैसले में कदम फूंक-फूंक कर रखने होंगे। आज नौकरियां जा रही हैं। कंपनियां अपने कर्मचारियों को आधी तनख्वाह ही दे रही हैं। ऐसे में परिवार संभालने के लिए महिला की भूमिका बहुत बढ़ जाती है।

खुद के लिए बचत

मेरे शो 'गौरिका चौधरी शो' में ऐसी महिलाएं आती हैं, जो अपने परिवार की किसी न किसी तरह से मदद करना चाहती हैं। उन्हें पता है कि पति को बिजनेस में घाटा हो रहा है, पर वह खुलकर अपनी परेशानी बताने से बच रहा है। कमाने वाली महिलाएं भी खुद की बजाय घर को सामने रखकर ही पैसों के बारे में कोई फैसला लेती हैं। यह कुछ हद तक ठीक है। पर महिला को अपने बारे में भी सोचना चाहिए। हर महिला को खुद की निजी जरूरतों के हिसाब से बचत करनी चाहिए, जिस पर सिर्फ उसका हक हो। परिवार के लिए आप इतना कुछ करती हैं, पर अगर आने वाले समय में परिवार आपका साथ नहीं दे, तो इससे आपके पास पैसों का कोई जरिया तो होगा। उधार लेकर घी पीने की आदतों से हमें निजात पानी होगी। अक्सर हम एक-दूसरे को देखकर फिजूलखर्ची में मशगूल हो जाते हैं, पर मेरी सलाह है कि दरअसल फिजूलखर्ची व्यक्तित्व का एक हिस्सा होती है। पैसों को खर्च करने में कभी देखादेखी नहीं करनी चाहिए। हो सकता है जो मेरी जरूरत है, वो आपके लिए फिजूलखर्ची हो। यह पूरी तरह इंसान की सोच पर निर्भर है। इस समय हमें बचत पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। आज अच्छी-अच्छी कंपनियां डूबने की कगार पर हैं। ऐसे में बाजार पर पैनी नजर रखना जरूरी है।

निवेश सोच-समझकर

इस समय इक्विटी और सोने में निवेश करना खतरों से भरा है। ऐसी चीजों में निवेश की जरूरत है, जो काम पड़ने पर काम आ सके। हम भारतीय अक्सर छोटे-छोटे निवेश में दिलचस्पी लेते हैं। अगर आप गोल्ड में निवेश करते हैं, तो यह मेरे मुताबिक सही नहीं होगा, क्योंकि हम अक्सर सोने को बेचते कहां हैं। अगर आपको पैसों को कहीं निवेश करना है, सबसे सुरक्षित जगह फिक्स डिपोजिट में पैसा जमा करें। आज के समय में बैंक में ही धन सुरक्षित है। बैंक आपको ब्याज भी अच्छा दे रहे हैं। साथ ही बैलेंस्ड फंड्स में भी निवेश करना अच्छा रहेगा। पहले लोग सोचते थे कि टैक्स सेविंग के लिहाज से घर खरीदने में पैसा निवेश किया जाए, पर आप सबको पता है कि रियल स्टेट मार्केट में गजब की गिरावट है। इसलिए आप इससे दूर रहें, तो ही भला है। इस वक्त घर खरीदने की नहीं सोचें। दो-तीन महीने रुक जाएं। हां, अगर आप रहने के लिए घर खरीदना चाहते हैं, तो इस समय मोलभाव अच्छे से कर सकते हैं। इंवेस्ट के लिहाज से मैं मना कर रही हूं। पैसे को लेकर आप अपनी प्राथमिकताएं तय कर लीजिए। कौन-कौनसी ऐसी चीजें हैं, जिन पर पैसा खर्च करना आवश्यक है, उनकी लिस्ट बना लीजिए। इस मंदी के समय में आपको घर में तीन-चार महीने की तनख्वाह रिजर्व में रखनी होगी, अगर आपकी नौकरी चली जाती है, तो यही पैसा काम आएगा। अगर आप पीपीएस में निवेश करें, तो बहुत अच्छा है। इसमें आपको साढ़े आठ फीसदी तक का अच्छा रिटर्न मिलता है। इंश्योरेंस में कुछ बंदिश होती हैं और इसके डूबने के आसार भी बन सकते हैं। यूलिप खरीदने से भी आपको बचना चाहिए। लंबी अवधि के लिए पैसा लगाना है, तभी म्यूचुअल फंड अच्छे हो सकते हैं, वरना नहीं।

दिखावा नहीं जरूरत समझें

मंदी के दौर में घर के सभी सदस्यों को मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार हो जाना चाहिए। मूवी और आउटिंग पर परिवार सबसे ज्यादा पैसा खर्च करता है। इससे बचना चाहिए। अक्सर लोग मुझसे कहते हैं कि हमारव् लिए बच्चे सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं, हम उनके खर्चों में कटौती नहीं कर सकते। पर हमें बच्चों को समझाना होगा। पिज्जा, बर्गर की बजाय दूसरी चीजें भी खा सकते हैं। आज लोग सब चीजें बाहर से ही मंगवाते हैं। मेरा मानना तो यह है कि शाम को घर पर ही चाय बनाकर आनंद लीजिए। थोक में सामान खरीदने की आदत डालिए। बिजली के बिल को कम करने की कोशिश भी जरूरी है। सप्ताह में एक बार ही वाशिंग मशीन चलाइए। घंटों टीवी देखने पर भी कंट्रोल करना जरूरी है। कभी-कभी बिना एसी के भी तो रहा जा सकता है ना। जिन लोगों ने अच्छे माहौल में पैसे जमा कर लिए, उनके लिए तो कोई दिक्कत नहीं है। जिन्होंने अपनी चादर से ज्यादा पांव नहीं पसारी, वे आज मजे कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि मंदी के दौर में भी कुछ लोग अपनी लाइफ स्टाइल में बदलाव करना नहीं चाहते। भई, अगर छोटी गाड़ी से आप ऑफिस पहुंच सकते हैं, तो दिखावे के लिए बड़ी गाड़ी खरीदने की जरूरत क्या थी। मेरा मानना है कि अभी अपने सपनों को टालिए। चाहे आपके पास पैसे हों, पर खर्च करने की बजाय उन्हें जमा कीजिए। यही पैसा आगे आपके काम आएगा।

(आशीष जैन से बातचीत के आधार पर)

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14 March 2009

हर रंग कुछ कहता है

रंग कहां नहीं हैं? सारा संसार रंगमय है। रंग रसोईघर के मसालों से भरे हैं। फलों और साग-भाजियों में उनकी गहरी पैठ है। परिधानों में रंग लिपटे हुए हैं। रंग मां की माथे की बिंदिया में, बेटी की आंख के काजल में, बहिन के हाथों की मेंहदी में हैं। रंग कभी दादी के पांव की नुपूर में झकनते हैं, तो कभी प्रियतमा के होठों की लाली में बस जाते हैं। रंग प्रकृति की जय में हैं, विजय में हैं। रंगों की महक से ही तो भंवरे चंपा-चमेली से चुगली कर रहे हैं। गेंदे और सूरजमुखी में गलबांही इन्हीं की वजह से ही तो होती है। बगिया रंगों की बस्ती है, जहां हर रंग अपनी धुन में मगन है। रंगों से हर रोज खेलने वाले चितेरे से पूछें, तो पता लगेगा कि रंग तो बहुत ही मासूम हैं। कभी तिरंगे में केसरिया, सफेद और हरा रंग बनकर वे हमारे दिल में बस जाते हैं, तो कभी बारिश की नन्ही बूंदों के सहारे इंद्रधनुष बनकर फिजा में फैल जाते हैं।रंगों की दुनिया का अपना अलग ही एहसास है। इनकी बात चलती है, तो हर मन में नया उल्लास, उमंग और जोश सा भर जाता है। रंग असल में हमारे मन के उत्सव की परछाई हैं। मानव मन ने हर क्षण को जीवंतता से जीने का एक बहाना ढूंढा है। रंग कभी त्योहार बनकर हमसे मिलते हैं, तो कभी खुशियों की वजह बन जाते हैं। फिर चाहे कोई भी रूप हो, रंग सदा हमारे साथ रहते हैं। हर खुशी, हर गम में रंग की खासी भूमिका रहती है। बच्चे की किलकारी में, बारिश की बूंदों में, बांसती सरसों में या फिर दुल्हन की चुनर में। हमें कभी लाल, पीले या नीले रंग खोजने नहीं पड़ते हैं। रंग खुद हमसे बातें करते हैं। मानव जीवन भी रंगों से बेखबर दुनिया नहीं जी सकता। हर मोड पर कोई ना कोई रंग हमसे टकरा ही जाता है। रंगों से हर रोज खेलने वाले चितेरे से पूछें, तो पता लगेगा कि रंग तो बहुत ही मासूम हैं। कभी तिरंगे के केसरिया, सफेद और हरे रंग बनकर वे दिल में बस जाते हैं, तो कभी बारिश की नन्ही बूंदों के सहारव् इंद्रधनुष बनकर फिजा में फैल जाते हैं। बसंत के मौसम में थोड़ी सी देर के लिए अगर प्रकृति से उसका पीला रंग उधार मांगकर रख लें, तो बहारों में वो रौनक रह जाएगी। अगर सूरज की लालिमा मिटने लगे, तो क्या हमारे दिलों में सुकून रह पाएगा। रंगों से ही तो रोशन हैं दुनिया के जमीन और आसमान। यूं तो रंगों की अपनी एक अलग दुनिया है, पर जब रंग इंसानी जज्बात के साथ मिलते हैं, तो गजब का जादू बिखेरते हैं।जीवन की मुस्कान हरे, नीले पीले, लाल, गुलाबी रंग मानवीय उल्लास के ही तो प्रतीक हैं। रोते हुए बच्चे को अगर एक रंग-बिरंगा गुब्बारा थमा दें, तो उसके होठों पर मुस्कान तैरने लगती है। प्रेयसी जब आपका घंटों इंतजार करते-करते थक सी जाती है, तो आप ही तो उसके लिए सुर्ख लाल या गुलाबी रंग का गुलाब का फूल ले जाते हैं। आपकी प्रियतमा फूल की रंगीन दुनिया में खो जाती है और इंतजार के शिकन को भुला देती है। बसंत के पीले रंग से सजी खेतों की चुनर पर सर्वस्व लुटाने को जी चाहता है। बचपन के दिन याद कीजिए, जब हम दो रंग मिलाते थे और तीसरा रंग बन जाता था। जिंदगी में खुशी और गम, मिलना और बिछुड़ना, संवाद और विवाद रंगों की तरह की तरह साथ-साथ मिलकर एहसास की गहराइयों में नए-नए भावों को पैदा करती रहती है। यूं तो हर रंग का एक खास मानी होता है। नीला रंग शांति देता है, पीला रंग बौद्धिक क्षमता विकसित करता है। पर मेरी समझ में ये चीज आज तक नहीं आई कि क्योंकर हम टे्रफिक लाइट की लाल बत्ती देखकर तो परेशान हुए जाते हैं, वहीं दुल्हन को सुर्ख लाल जोड़ा पहने देखकर बधाइयां गाने लगते हैं। भई रंग तो एक ही है। फिर यह मन भेद क्यों हो जाता है? मुझे तो लगता है कि रंग भी मन के धागों से मिलकर हर बार अपने लिए एक नया अर्थ या प्रयोजन गढ़ते जाते हैं। चलिए छोड़िए, इस लाल रंग को वरना हो सकता है, कोई सांड (वामपंथी भी हो सकता है) आपको प्यार करने के वास्ते दौड़ा चला आ रहा हो।
अब हम अपने चारों ओर निगाह डालते हैं। पहली बारगी क्या नजर आता है? सतरंगी पंछी, मटमैले पहाड़, नीला अंबर। हां, मुझे भी तो ऐसा कुछ नजर आ रहा है। पर गौर करने वाली बात है कि इन सबमें खास बात है रंगों का मन पर गहरे असर की छाप। पूरी प्रकृति अपने मन, वचन और कर्म से रंगभरी है, किसी बच्चों की ड्राइंग की कॉपी की तरह। पर इस कॉपी को देखने के लिए बच्चों की सी ही निगाह भी चाहिए। रंगों के मायने अगर हमें सीखने हैं, तो सबसे सही तरीका है किसी बच्चों के साथ पूरा एक दिन गुजारा जाए। तब हमें पता लगेगा कि रंगों को जीना, देखना, महसूस करना और खुद में संजोना कितना आसान है।लोग कहते हैं कि रंग बदलना में गिरगिट बहुत माहिर होता है, पर इंसानी फितरत भी तो पल-पल बदलती रहती है, हम यह क्यों भूल जाते हैं? रंगों की तासीर को दिल में बसा लेने की ख्वाहिश ही तो हमें होली जैसे त्योहार से जोड़े रखती है। आइए रंगों से सराबोर हो, हम भी गिले-शिकवों को भूलकर नई नजर से दुनिया के नए रंगों से रूबरू हो जाएं। प्यार बांटें, प्यार पाएं और खुश हो जाएं।
-आशीष जैन

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12 March 2009

रंगीली छटा के अंदाज


होली सिर्फ हम ही नहीं मनाते। होली तो हर देश में मनाई जाती है, नाम और तरीका चाहे अलग हो, पर भावना सबकी एक है- प्रेम, उमंग और उल्लास।
आशीर्वाद बुजुर्गों का
फ्रांस में 19 मार्च को होली की तरह एक त्योहार डिबोडिबी के नाम से मनाया जाता है। वहां इस दिन पिछले वर्ष की विदाई और नए साल के स्वागत में खुशियां मनाई जाती हैं। मिस्त्र में 13 अप्रैल की रात्रि को जंगल में आग जलाकर यह पर्व मनाया जाता है। आग में लोग अपने पूर्वजों के पुराने कपड़े भी जलाते हैं। तेरह अप्रैल को ही थाइलैंड में भी नव वर्ष 'सौंगक्रान' शुरू होता है । इसमें बुजुर्गों के हाथों इत्र मिश्रित जल डलवाकर आशीर्वाद लिया जाता है। म्यांमार में इसे जल पर्व के नाम से जाना जाता है।नाचो- गाओ, खुशी मनाओजर्मनी में ईस्टर के दिन घास का पुतला बनाकर जलाया जाता है। लोग एक दूसरे पर रंग डालते हैं। अफ्रीका में 'ओमेना वोंगा' त्योहार मनाया जाता है। इसी नाम के एक अन्यायी राजा को लोगों ने जिंदा जला डाला था। उसका पुतला जलाकर लोग नाचते-गाते हैं और खुश होते हैं। पोलैंड में 'आर्सिना' पर लोग एक दूसरे पर रंग और गुलाल मलते हैं। यह रंग फूलों से बना होने की वजह से काफी सुगंधित होता है। लोग परस्पर गले मिलते हैं। अमरीका में 'मेडफो' पर्व मनाने के लिए लोग नदी किनारे इकट्ठे होकर गोबर तथा कीचड़ से बने गोले एक-दूसरे पर फेंकते हैं। चेक और स्लोवाक क्षेत्र में 'बोलिया कोनेंसे' त्योहार पर युवा लड़के-लड़कियां एक दूसरे पर पानी और इत्र डालते हैं। बेल्जियम के लोग होली को मूर्ख दिवस के रूप में मनाते हैं। यहां पुराने जूतों की होली जलाई जाती है।
जीवन में बहार
इटली में 'रेडिका' त्योहार फरवरी के महीने में एक सप्ताह तक मनाया जाता है। लकड़ियों के ढेर चौराहों पर जलाए जाते हैं। लोग अग्नि की परिक्रमा करके आतिशबाजी करते हैं। एक दूसरे को गुलाल भी लगाते हैं। रोम में इसे 'सेंटरनेविया' कहते हैं तो यूनान में 'मेपोल'। स्पेन में भी लाखों टन टमाटर एक दूसरे को मार कर होली खेली जाती है। जापान में 16 अगस्त की रात को 'टेमोंजी ओकुरिबी' पर्व पर कई स्थानों पर आग जलाकर यह त्योहार मनाया जाता है। चीन में इसे 'च्वेजे' नाम से मनाते हैं। यह पंद्रह दिन तक मनाया जाता है। लोग आग से खेलते हैं और अच्छे परिधानों में सज-धज कर गले मिलते हैं। नार्वे और स्वीडन में सेंट जॉन का पवित्र दिन होली की तरह से मनाया जाता है। शाम को किसी पहाड़ी पर होलिका दहन की तरह लकड़ी जलाई जाती है और लोग आग के चारों ओर नाचते-गाते हैं। इंग्लैंड में मार्च के अंतिम दिनों में लोग अपने मित्रों और संबंधियों को रंग भेंट करते हैं ताकि उनके जीवन में रंगों की बहार आए।

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09 March 2009

नारी कभी ना हारी

नारी के ना जाने कितने रंग है? कभी एक रंग को पकड़ता हूं, तो लगता है कि अरे यह तो छूट ही गया। दया, प्रेम, करुणा जैसे गुणों की बात करने लगता हूं, तो जीवटता, सहनशीलता, मर्यादा जैसे रंगों पर बात अधूरी रह जाती है। आज मन कर रहा है कि चलो कोशिश करूं और देखूं कि महिला के जिंदगी के कितने रंगों में समाई है? महिला दिवस आ रहा है। लोग चारों ओर महिलाओं की उपलब्धियों की बात करेंगे। चारों दिशाओं में गूंजते नारों से लगेगा कि महिला ही आज सर्वोपरि है। सरकार भी तो अपने गाल बचाएगी। जननी सुरक्षा लागू कर दी। फिर भी दूर-दराज में आज भी प्रसव मां के लिए सुरक्षित नहीं है। अरे सरकार खुद कहती है कि पिछले 20 सालों में करीब 1 करोड़ बच्चियों को गर्भ में ही मार डाला गया। अब अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की भी तो सुन लो। कहता है कि दुनियाभर में 75 फीसदी महिलाएं कोई ना कोई काम करती है। हमने पूछा फिर तो महिलाओं के पास बहुत-सी संपत्ति होनी चाहिए। पर जवाब आता है- जी नहीं। इन काम करने वाली वामाओं में से सिर्फ 0.01 फीसदी महिलाओं के पास संपत्ति का मालिकाना हक है। वाह रे दुनिया बनाने वाले। काम कोई करे और मजा कोई ले। बचपन में नानी, मामी, फूफी, बहन, पत्नी और मां जैसे रिश्तों में बंधी नारी आज तो हमारी अफसर बन गई है। प्रतिभाताई को भूल गए क्या। राष्ट्रपति हैं। देश में कोई बड़ा फैसला उनके हस्ताक्षर के बिना कोई करके तो दिखाए। कभी जमाने भर से दबी-कुचली नारी अब आजाद हो गई है। विद्या नाम चाहे कहीं सुनाई ना दे, पर माया की खनक चहुंओर है। अजी गौर कीजिएगा, मैं तो दानवी मायावती की बात कर रहा हूं। खुद जिंदा है, पर लोगों की याददाश्ती के लिए खुद की आदमकद मूर्ति बनाकर खड़ी कर दी है। क्या पता कल वो ना रहे, मूर्ति के बहाने उसकी याद तो ताजा होती रहेगी। और तो और आज तो फिजा का जमाना है। जो दर-दर अपने चंदू को खोज रही है। मीडिया है ना उसका साथ देने के लिए। ऐसे में चंद्रयान के लिए काम करने वाली खुशबू मिर्जा को कौन पूछे। होगी कोई। हमें तो मसाला चाहिए। अपन पूछते हैं फिर आप सानिया के पीछे क्यों पड़े रहते हो। वो भी तो देश का नाम ही ऊंचा कर रही है। अजी वो कहते हैं हमें कौनसा टेनिस से मतलब है। हमें तो उसके स्कर्ट से काम है। सतयुग में हम कहते थे कि देखो नारी हो, तो मैत्रयी या गार्गी जैसी। गार्गी जैसी नारी जिसने याज्ञक्ल्वय जैसे विद्वान को शास्त्रार्थ में मात दी। आज चाहे गार्गी कहीं नजर न आए, पर हर गली मोहल्ले में उसकी बहनें अपने-अपने पतियों से यूं वाकयुद्ध लड़ती रहेंगी कि मानो लड़ाई जीतने पर उन्हें ही परमयोद्धा का खिताब मिलने जा रहा हो। भई त्रेता युग को भूल गए क्या। जब प्रभु राम हुए। तब की नारियां क्या कम थीं। सीता, केकैयी, अहल्या और शबरी। हर किसी में कुछ खास बातें। आज की महिला को तो सीता शब्द ही गाली लगता है। केकैयी ना होती, तो हिंदुस्तानी फिल्मों की ललिता पंवार को कौन याद रखता। शबरी जैसी तिरस्कृत नारी के झूठे बेर खाकर रामजी कितना खुश हुए, ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है। हां, अहल्या जैसी पतिव्रता पत्नी कहीं ना हो, जो इंद्र को ऋषि गौतम मान बैठी, तो बेचारी को पति ने ही श्राप दे डाला और पत्थर की बनकर रह गई। वो तो शुक्र है राम जैसे दया के सागर ने उन्हें छू लिया और वापस नारी बना डाला। चलिए छोड़िए जी, आप तो द्वापर युग पर नजर डालिए। क्या टाइम था भाईजी। यशोदा का लाल किशन कन्हैया। गोपियों के बीच घिरा हुआ। राधा के संग रास रचाकर सारी दुनिया को प्यार का नया पाठ सिखला गए। यशोदा भी कितना स्नेह उड़लेती थी अपने गोपी बजैया पर। मैं तो इतना ही जानता हूं कि जैसे-जैसे समय बदलता है, स्त्री भी अपनी महानता दिखाने से नहीं चूकती। अब कलियुग को ही देख लीजिए। पन्नाधाय, क्या महिला थी। स्वामिभक्ति और त्याग की उनसे बड़ी मिसाल शायद ही कोई और हो। उदयसिंह की खातिर अपने पुत्र को बनवारी की तलवार के आगे लिटा दिया। कैसा दृश्य रह होगा, जब अपनी आंखों के सामने अपने बेटे को तलवार से कटते देखा होगा। अब मैं ज्यादा तो नहीं बोलूंगा पर इतना कहूंगा कि हमारे बेटे-बेटियों को तो मल्लिका और करीना ही भाती हैं। इनके गुणों से अवगत कराते हुए अक्सर हमसे कहते रहते हैं कि बापू आज तो करीना के जीरो फिगर वाली ड्रेस पहन ही लेने दो। हम भी क्या करें, आखिर नौजवान पीढ़ी है। खुशी-खुशी हां कर दी, तो ठीक। वरना विद्रोह भी कर सकती है। बहू आजादी के नाम पर अपना पल्लू सिर से कब का पीछे ले जा चुकी है और बेटी न जाने कब स्कूटी के सहारे अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने में मशगूल है। देखो जी, हम तो ठहरे जी सज्जन जीव। हमें तो सब भला ही दिखता है। हम तो यही मान लेते हैं कि यही है असल महिला सशक्तिकरण। अजी आप भी टेंशन मत लो। आज की नारी खुद समझदार है। वो खुद को संभाल लेगी। अगर मैंने या आपने ज्यादा भाषण झाड़ने की हिम्मत की, तो खैर नहीं होगी।
-आशीष जैन

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होली आई रे


बसंत में हर कली मुस्कुराई,

फागुन की मस्ती चंहुओर है छाई,

मदभरा रंगीं नजारा हर कहीं नजर आता है,

सुनहरा रंग फिजाओं में पसर जाता है,

चंग की ढाप चौक-चौराहों में गूंज रही है,

फागणियों को फाग गाने की सूझ रही है,

लोग-लुगाई होली की मस्ती में सराबोर हैं,

हर तरफ होली आई रे होली आई रे का शोर है।

पिचकारी

ऐसी मारत रंग भरी पिचकारी,

जिसकी मार लगे है प्यारी,

ऐसी छूटत रंग भरी पिचकारी,

देत मजा, मस्ती अति भारी,

जब मारत सजनिया पे पिचकारी,

चढ़ जात है,

भंग की सी खुमारी।

गुलाल

थोड़ा हरा रंग उड़ाएंगे,

थोड़ा डालेंगे रंग लाल,

बाजार में अबके आया है,

प्यार भरा गुलाल,

मुट्ठीभर पीला फेकेंगे,

ले आएंगे गुलाबी रंग भी उधार,

बाजार में अबके आया है,

प्यार भरा गुलाल,

आंगन रंग-बिरंगा कर देंगे,

बैंगनिया रंग से चौखट भर देंगे,

दरोदीवार नीले से करेंगे सराबोर,

केसरिया छिटकाएंगे चंहुओर,

गली कर देंगे गहरे लाल से निहाल,

बरसते मनभावन रंगों से फिजा को ना होगा मलाल,

बाजार में अबके आया है,

प्यार भरा गुलाल।

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05 March 2009

ये निराली होलियां

धमाल हो, गींदड़ नृत्य हो या न्हाण राजस्थानी फिजाओं में होली के लिए अलग-अलग परंपराएं हैं। आइए हम भी डूबते हैं राजस्थानी होली के रंगों में-
राजस्थान में होली। भई ब्रज की होली देख ली, पर अगर कभी धोरां री धरती पर होली के नजारे नहीं देखे, तो समझो जीवन में उल्लास की असली तस्वीर ही नहीं देख पाए। यहां होली का मतलब खुद को भुलाकर मस्ती में डूबना है, तो भगवान को याद करना भी है। अपनी पूरी ऊर्जा के साथ यहां के लोग होली को सबसे बड़ा त्योहार मानते हैं। यहां होली हर क्षेत्र में अलग-अलग तरह से मनाई जाती है। धमाल, गींदड़ नृत्य और न्हाण की परंपरा यहां बरसों पुरानी हैं।

गाओ रे धमाल
राजस्थान में एक जिला है-अलवर। वहां के खैरथल कस्बे में रह रहे पुष्करणा समाज के लोगों के लिए फागुन का मतलब होता है- कृष्ण रस में डूब जाना। समाज के लोग होली के अद्भुत रसिये रहे हैं व इस रस का राज छुपा है 'धमाल' में। धमाल मतलब ढोलक पर धम-धम करते हुए मस्ती और उल्लास के गीत। भगवान की फाग लीलाओं को अनुभूत करने के बाद भक्त कवियों ने ही ये रचनाएं लिखी थीं। खैरथल में होली का उत्सव बहुत पहले ही शुरू हो जाता है। बसंत पंचमी के दिन सभी बुजुर्ग और युवा मिलकर होली के स्वागत में श्री राधाकृष्ण मंदिर में धमाल शुरू करते हैं। फिर शिवरात्रि को धमाल रस की गंगा बहती है व शुक्ल पक्ष की अष्टमी के बाद तो यहां हरेक फागुन के रंग में रम जाता है व शाम से देर रात तक हर रोज 'धमाल' रस की होलियां गाई जाती हैं। महिलाएं भी अपने समूह में पूरे फागुन मास में शाम के समय 'धमाल' गाती हैं। सैकड़ों लोग घेरे में बैठ कर ताशों, मंजीरों व विशिष्ट शैली से बज रहे ढोलक की मीठी तान में जब तल्लीन होकर धमाल गाते हैं, तो एक अलग ही नजारा होता है। हर धमाल की अलग गायन शैली होती है। केसर, सुरंगी, गूजरी सहित करीब 20 से ज्यादा विशिष्ट धमाल हैं। इनमे सबसे मधुर होरिया की तान पर तो मानों देवता भी रीझ जाएं। एक धमाल 20 मिनट से 1 घंटे तक गाई जाती है व बीच के अंतरालों में भक्त कवियों के 'सवैये' गाये जाते हैं। 'सवैयों' में सभी बारी-बारी से उच्च स्वर में विशिष्ट शैली से गायन करते हैं व एक अनूठा रसमय माहौल बन जाता है। एकादशी से तो रोज रात को धमाल समाप्त होने के बाद देर रात तक सभी युवक समूह बनाकर फाग गाते हुए गांव की गलियों में निकलते हैं व होलिका दहन स्थल तक जाते हैं। धमाल के बाद हर रोज चने की विशेष प्रसादी जिसे 'फगुआ' कहते हैं, का वितरण किया जाता है। कहते हैं कि जब भगवान श्रीकृष्ण होली मनाते थे, तब भी यह विशिष्ट फगुआ प्रसादी ही बनती थी। यहां के लोग चाहे देश के किसी भी कोने में क्यों ना हो होली के अवसर पर धमाल में जरूर शामिल होते हैं। धुलंडी की शाम की धमाल के बाद पूरा समाज मंदिर के प्रांगण में बैठता है व सामूहिक प्रार्थना जिसे 'पल्लो' कहते हैं, में भगवान द्वारकाधीश से सुख, शांति व समृद्धि की अर्ज करता है। है ना होली मनाने का अद्भुत उल्लास।
चंग संग गींदड़
चलिए अब शेखावाटी की ओर रुख करते हैं। यहां का गींदड़ नाच। फतेहपुर, रामगढ़-शेखावाटी, राजलदेसर, सुजानगढ़ कस्बों में फागुन में क्या गजब नजारा रहता है। सांझ ढलते ही गली, मोहल्ले, चौक, गुवाड़ और चौराहों पर लोगों का जमावड़ा। फिर देर रात तक चलता फाग और मस्ती का दौर। एक से बढ़कर एक लोकगीत, स्वांग, ढप की ताल में ताल मिलाते मंजीरे, नगारी और बांसुरी की सुरीली आवाज, मानो अंचल की लोक संस्कृति की तस्वीर खींच रहे हों।'आज मान्ह रमता ने लाडूड़ों सो लाध्यो ये माय, म्हारी गींदड़ रमबा ने द्गयास्या' यह लोकगीत बताता है कि अंचलवासियों को गींदड़ नृत्य लड्डूओं से भी प्यारा लगता है। गींदड़ नृत्य का कार्यक्रम पांच-छह दिन तक चलता है। इसमें महिला के वस्त्र पहने पुरुष नृत्य करते हैं। गींदड़ में पुरुष दोनों हाथों में डंडे लेकर एक गोल घेरे में घूमते हुए नृत्य करते हैं। नर्तक आपस में लयबद्ध तरीके से डंडे टकराते चलते हैं। घेरे के बीच में कुछ लोग बांसुरी, नगारी, मंजीरे व चंग बजाते हुए लोकगीत गाते हैं। नृत्य की विशेषता है कि इसमें डंडों के टकराव, पैरों की गति व चंग की ताल का सामंजस्य होता है। गींदड़ नृत्य में वेशभूषा से लेकर हाव-भाव सब कुछ एक ही लय में होता है। लोग मेहरी बनते हैं, स्वांग रचते हैं जो देखने में अच्छा लगता हैं। चूरू जिले के सुनहरे धोरों की धरती के बीच रचे बसे राजलदेसर में चंग, झांझ और नगाड़े की धमक-छमक से मुखरित, गौरवमय परम्परा का मूर्त रूप फाल्गुनी नृत्य गींदड़ राजस्थान का ही नहीं वरन सम्पूर्ण देश के लिए अनुठा एवं बसंतोत्सव के आयोजनों का हार श्रृंगार है। कहा जाता है कि राव बीका के सुपुत्र राजसी ने सन्‌ 1607 में राजलदेसर की जागीर मिलने पर खुश होकर गींदड नृत्य का पहली बार आयोजन करवाया था, जो आज भी जारी है। गींदड़ नृत्य में बंदनवारों और रोशनी से सजे-धजे गोलाकार इन गींदड़ स्थलों के मध्य लगभग पन्द्रह फीट ऊंची-ऊंची बांस की बल्लियों के सहारे पाट्टे-तख्तों से बनाये मंच देखते ही बनते है। विभिन्न वेशभूषाओं में स्वांग धार, पांवों में घुंघरू बांधकर और हाथ में डंडियां लेकर गींदड़ के गेड़ (घेरे) के अंग बन जाते है जहां नगाड़ों की धमक, घुंघरूओं की छमक, डंडिये की तड़क, नारी रूप नृतक के घाघरे के घेर की घमक और अंग संचालन की ठसक के साथ लोक गीतों की सुरीली तान पर पूरा घुमाव ले-ले कर एक दूसरे से डंडिया भिड़ाते हुए रसिये रात-रात भर आनन्द लेते रहते है । दुग्ध ध्वल पूर्णिमा की चांदनी रात्री में गींदड़ रमते रसियों व दर्शकों की मौज मस्ती देखते ही बनती है।
किन्नरों का न्हाण
चलिए अब आपको हाडोती ले चलते हैं। हाडोती में न्हाण की परंपरा सालों पुरानी है। होली के दूसरे दिन से ही पड़ोसी व रिश्तेदारों के घर रंग डालने की परंपरा है। यह होली के द्वाद्वश तक जारी रहती है। कई जगह इसे धूमधाम और शोभायात्रा के रूप में मनाया जाता है। इनमें सांगोद का न्हाण खास है। इसकी शुरुआत 1632 में हुई। कहा जाता है कि पन्द्रहवीं शताब्दी में होली की पंचमी के दिन सांगा नामक योद्धा ने 12 कस्बों के योद्धाओं से एक साथ युद्ध किया और शहीद हो गया। उसके बलिदान दिवस पर न्हाण की सवारी निकाली जाने लगी। जिसमें लोगों पर रंग डालते शोभायात्रा निकालती। न्हाण के दिन यहां राज्य के बाहर से भी किन्नर शोभायात्रा में शामिल होते हैं। इनकी महासभा भी होती है। किन्नर इस न्हाण में शामिल होना सौभाग्य मानते हैं और वीरता के प्रति प्रतिबद्धता दोहराते हैं। ऐसी मान्यता है कि किन्नर ब्रह्माणी माता को मानते हैं और न्हाण में हर शोभायात्रा ब्रह्माणी माता मंदिर से शुरू होती है। न्हाण में काला जादू के हैरतअंगेज करतब और बादशाह की सवारी को बहुत तवज्जो दी जाती है। जिसमें सांगोद के ही एक परिवार के बच्चे को बादशाह बनाकर सोने से लादा जाता है और सजे धजे हाथी पर शोभायात्रा निकाली जाती है। देवविमान तडक़े दो तीन घंटे काला जादू में कच्चे धागे से बैलगाड़ी का पहिया बांधना, उल्टे चाकू में नींबू अटका कर मटका बांधना, बारह भालों की लागे और किन्नारों के नृत्य भी लोगों का मन मोह लेते हैं। तो भई अब तो आप भी जान गए ना कि किस तरह धोरों की धरा पर होली अपनी मस्ती के रंग बिखेरती है।
-आशीष जैन

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04 March 2009

कहां गया मेरी बगिया का फूल?


मुंबई में हुए आतंकी हमलों ने पूरे देश की रूह को छलनी किया है। देश जवाब मांगता है दुश्मनों से। आखिर क्या हासिल हुआ, हमारी बगिया के फूलों को उजाड़कर।
क्या लहू का कोई मजहब हो सकता है? क्या अश्कों में तड़पती आह से राम या रहीम को अलग-अलग दर्द होता है? अगर नहीं, तो फिर क्यों गुलशन को उजाड़ने पर आमादा है आतंक। सपनों की पोटली लिए मुंबई में घूमते सैकड़ों बेगुनाह ही नहीं, पूरी दुनिया की रूह को कंपाने की कोशिश है हाल में मुंबई में हुआ आतंकी हमला। रोज की भागदौड़, हजारों परेशानियां और अब उसमें शामिल है एक डर। आतंक का डर। कब किस ठौर विस्फोट हो और जिंदगी की रोशनी बेनूर होकर हजारों परिवारों के घरों को हमेशा के लिए अंतहीन अंधेरा दे जाए। पर कभी न थमने की हम देशवासियों की शपथ हमेशा रंग लाती है और हम फिर खुशी की बहार को अपने आंगन में बिखरने के लिए बुला लेते हैं।
बाबुल का ये घर बहना...
22 साल की जसमीन की आंखों में भी गजब की चमक थी, तो बातों में कुछ कर गुजरने की तमन्ना। घरवालों के सपनों को परवाज देने के लिए मोहाली से मुंबई के सफर के लिए रवाना हुई पर वापस फिर कभी अपने घर ना लौट सकी। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह मुंबई में उस काली रात ओबरॉय के रिसेप्शन पर बैठी हुई थी। होटल मैनेजमेंट में गे्रजुएट जसमीन दो महीने पहले ही मास्टर डिग्री के कोर्स के लिए सपनों की नगरी मुंबई आई थी। पापा डीआईजी भुर्जी अपनी लाडली को तन्नू कहकर पुकारते थे। जब उन्होंने टीवी पर मुंबई पर आतंकी हमले की खबर देखी, तो बेटी को फोन मिलाया। पर फोन उठाने वाले हाथ हमेशा के लिए निस्तेज हो चुके थे। तन्नू की मां दीप कौर और भाई परमीत की जुबान खामोश और आंखों में छलकते दर्द के सिवा कुछ नहीं बचा। परमीत को वो ख्वाब तो अधूरा ही रह गया, जिसमें दिन-रात वो अपनी फूल सी नाजुक बहन की डोली को सजाने की सोचा करता था। मम्मी-पापा ने जिस लाडो का हर नाज इस उम्मीद से उठाया कि एक दिन उसे घर से विदा करना है, वो तो दुनिया से ही रूखसत ले चुकी थी।
सोचा था मुस्कान देंगे
उनकी बातों में गजब का जोश था। अपने काम में माहिर। दिल में बस एक ख्वाहिश कैसे इस देश में अमन कायम रहे। वे शायद अकेले ऐसे पुलिस अफसर जिनके चाहने वालों ने उनके नाम से सोलापुर में करकरव् फैन क्लब तक बना रखा है। महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, जिन्हें अपने काम और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। अब वे इस दुनिया के लिए मिसाल बन चुके हैं। कामा अस्पताल में जाते वक्त उन पर पीछे से गोलीबारी हुई और वे मोबाइल पर अपनी बात पूरी न सके। पीछे छोड़ गए पत्नी कविता, दो बेटियां और एक बेटा। अभी कुछ दिनों पहले ही तो उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के हाथ पील किए थे। लंदन में पढ़ने वाली दूसरी बेटी और मुंबई में पढ़ रहे बेटे को देश के हवाले कर अपने अनजाने सफर पर निकल गए। पूरा देश हेमंत के बलिदान को नहीं भूल पाएगा पर उन बच्चों को क्या दोष है, जो अपने पापा को जहान भर की खुशियां देना चाहते थे। सोचा था कि आने वाले समय में जब उनके पिता बुढ़ापे की दहलीज पर होंगे, तो उन्हें मुस्कान देते रहेंगे। ताउम्र देश की सेवा करने वाले करकरे की आंखों में भी सपना था कि काश वो दिन जल्द से जल्द आए जब इस देश में कोई आंख नम ना हो। हर तरफ बस खुशियों का डेरा हो। करकरे की शहादत को सच्चा सलाम तभी होगा, जब उनका सपना पूरा करने के लिए हम सब एक हो जाएं और दुश्मनों को दिखा दें कि जब देश का एक बेटा शहीद होता है, तो अपनी फर्ज निभाने हजारों सपूत और पैदा हो जाते हैं।
कहीं छुप गया है वो
मेरा इकलौता बेटा था जहीन। उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था हैवानों। मेरी उम्मीदों को कफन उठाकर तुम्हें आखिर क्या हासिल हुआ। ये तो बता देते। मां सलमा के दामन में अब आंसुओं के सैलाब के सिवा बचा भी क्या है? भीलवाड़ा से चलकर घर का चिराग मुंबई पहुंचा और हमेशा के लिए बुझ गया। ताज होटल में एक्जीक्यूटिव कुक जहीन अब इस दुनिया में नहीं है। पर दादा मोईनुद्दीन को अब भी लगता है कि घर के किसी कोने में छुपा हुआ नटखट जहीन उन्हें आवाज देगा, 'बाबा, आप मुझे नहीं पकड़ पाओगे। मैं छुप गया हूं। आपको नजर नहीं आऊंगा।' दादी कर रही है, 'मेरा पोता कहीं नहीं गया। वो तो सबसे नाराज है। इसलिए कहीं छुप गया है।' वाकई जहीन कहीं छुप गया। दादा-दादी की आंखें अब उसे कैसे ढूंढ़ेंगी। क्या गुजर रही होगी सलमा पर जब शादी के सेहरे की जगह आज अपने जिगर के टुकड़े के जनाजे को टकटकी लगाए देख रही होगी? किसी की दुनिया को उजाड़ कर आखिर मौत के सौदागरों को क्या मिला? क्या कोई बता पाएगा तन्नू, हेमंत या जहीन के घरवालों को।
-आशीष जैन

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28 February 2009

...हम हौसलों से उड़ा करते हैं

कलम थामने वाली कोमल कलाइयों ने फाइटर प्लेन को भी बखूबी कंट्रोल किया। अलीगढ़ की सुमन शर्मा ने सेना में कोई प्रशिक्षण नहीं लेने के बावजूद मिग-35 और एफ-16 को बड़ी कुशलता से उड़ाया। अब वे रूसी मिग उड़ाने वाली दुनिया की पहली महिला बन चुकी हैं। इस जोशीले सफर की कहानी, खुद सुमन शर्मा की जुबानी-
20 हजार फीट की ऊंचाई। हाथ में फाइटर प्लेन का कंट्रोल स्टिक। मुंह पर ऑक्सीजन मॉस्क। तेजी से धड़कता दिल। प्लेन का एसी चालू है, पर चेहरे पर पसीने छूट रहे हैं। नीचे झांकने पर पूरी दुनिया छोटा-सा खिलौना नजर आने लगी। ऐसे में जरा सी चूक हो जाए, तो जान पर बन आने का डर। कुछ-कुछ ऐसा ही एहसास मुझे 9 फरवरी को सातवें एयरो इंडिया में हुआ जब मैंने एफ-16 फाइटर प्लेन को उड़ाया। हवा को चीरते हुए प्लेन ज्यों ही आगे बढ़ा, मानो जिंदगी थम सी गई है। लगा मैं कोई पंछी हूं। बचपन में आसमान में उड़ते परिंदों को देखकर अक्सर मन करता था कि मैं भी नीलगगन में किसी पंछी की तरह उड़ती फिरूं। यकीन ही नहीं हुआ कि खुली आंखों से देखा मेरा सपना साकार हो रहा है। फिर तो कुछ ऐसा जोश आया कि तीन दिन बाद ही लड़ाकू विमान मिग-35 को भी उड़ा लिया।
मुकाबला गुरुत्वाकर्षण से

मैंने सुन रखा था कि उड़ान के दौरान मुझे गुरुत्वाकर्षण का दबाव झेलना पड़ेगा, पर इसका अनुभव कतई नहीं था। उड़ान भरते ही कुछ सैकंड के लिए गुरुत्वाकर्षण ने असर दिखाना शुरू कर दिया। मेरा खास 'जी सूट' फूलता चलता गया। मैंने एफ-16 की उड़ान के दौरान 6 'जी' और मिग-35 की उड़ान के दौरान 7 'जी' गुरुत्वाकर्षण झेला। दरअसल 'जी' गुरुत्वाकर्षण को मापने की इकाई है। जितना 'जी' मुझ पर पड़ा, कुछ सैकंड के लिए मेरा वजन उतना गुना बढ़ गया। मैं सांस जल्दी-जल्दी लेने लगी। प्लेन ऊपर जा रहा था और गुरुत्वाकर्षण नीचे की ओर खींच रहा था। हृदय ने रक्त को तेजी से पंप करना शुरू कर दिया ताकि मस्तिष्क तक रक्त पहुंचता रहे और मैं बेहोश ना होऊं। उड़ान के दौरान बेहोश होने के बचने के लिए मैंने कुछ खास उपाय किए। उड़ान के 2 घंटे पहले ढेर सारा पानी पिया, मुझे पेट से तेजी से सांस लेनी थी और शरीर के निचले हिस्से को दबाए रखना था। उड़ान के दौरान मैं लगातार पायलट के संपर्क में रही। वे मुझे सुझाव और चेतावनियां देते रहे। फ्लाइट से 4 घंटे पहले पायलट ने मुझे पूरी चीजें समझाईं। मैंने एफ-16 चालीस मिनट तक और मिग-35 बयालीस मिनट तक उड़ाया। आगे मेरा सपना है कि मैं सुपरक्रूज स्पीड उड़ाऊं।
ना चक्कर ना बेहोशी
कई लोग कहते थे कि फाइटर प्लेन उड़ाने के लिए गजब की मानसिक शक्ति होनी चाहिए। हर कोई ऐरा-गैरा इन्हें नहीं उड़ा पाएगा। मैंने अब पूरी दुनिया को बता दिया कि हम महिलाओं को कम ना समझें। फाइटर प्लेन उड़ाने का सफर भी बड़ा रोमांचक रहा। तीन साल पहले मैं बंगलौर गई थी। वहां सेंट्रीफ्यूगल चैंबर में पायलट ट्रेनिंग हो रही थी। शौक-शौक में मैं भी उसमें बैठ गई। फिर तो पूरे एक घंटे तक मैंने उड़ान भरी। इस दौरान न तो मुझे चक्कर आए, न ही बेहोश हुई। इसी दौरान पिछले साल मैं अमरीका गई और वहां एफ-16 लड़ाकू विमान की फैक्ट्री में गई। वहां मैंने इसके सिम्युलेटर को बखूबी उड़ा लिया।तैयारी पूरी थीडिफेंस की रिपोर्टिंग के दौरान मुझे पता लगा कि हिंदुस्तानी एयरफोर्स के लिए 126 लड़ाकू विमान खरीदे जा रहे हैं। मैंने शुरू से ही सारे मामले पर नजर रखी। मेरी इच्छा थी कि क्यों न मैं इन फाइटर प्लेन को उड़ाकर देखूं। इसके लिए मैंने 2007 में पिछले एयरो इंडिया में एफ-16 की कंपनी को अर्जी दी कि मुझे प्लेन उड़ाने की इजाजत दी जाए। इस साल के एयरो इंडिया में मुझे इसके लिए इजाजत मिली। मैंने अपनी तैयारियां शुरू कर दीं। इंटरनेट पर लड़ाकू विमानों से जुड़ी हुई सामग्री खोजी। पुराने पायलट के बात की। साथ ही डॉक्टर्स से भी जानकारी ली कि मेरा शरीर उड़ान के दौरान कितना दबाव झेल पाएगा। शरीर को संतुलित रखने के लिए जैज डांस सीख लिया था।
मुश्किल नहीं है कुछ भी
मेरा जन्म गुजरात के जामनगर में हुआ, पर रहने वाले हम अलीगढ़ के हैं। दिल्ली में शुरुआती पढ़ाई के बाद देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडमी में इंस्ट्रेक्टर का काम किया। तभी से मेरा मन सेना से जुड़ गया। बाद में मैं पत्रकारिता की दुनिया में आ गई और डिफेंस के बारे में फ्रीलांसिंग करने लगीं। आज मैं दिल्ली में 'साउथ एशिया डिफेंस एंड स्ट्रेटजिक रिव्यू' में रक्षा मामलों के लिए रिपोर्टिंग करती हूं। मम्मी प्रेमा, पापा रिटायर्ड कमांडर एचपी शर्मा और भैया कर्नल राजेश के सहयोग के बिना यह काम करना मुश्किल था। अपनी जैसी लड़कियों से कहना चाहती हूं कि दुनिया में कोई भी काम मुश्किल नहीं है। हो सकता है लक्ष्य मिलने में थोड़ा समय लगे, पर अगर आप धैर्य रखकर काम में लगे रहेंगे, तो देर-सवेर फतह आपकी ही होगी। मेरा मानना है कि सफलता के लिए स्वस्थ शरीर भी होना चाहिए, तभी आप अपने सपने पूरे कर सकते हैं।(जैसा उन्होंने आशीष जैन को बताया)

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21 February 2009

लहरों के सरताज

नौसेना में जिंदगी के असली अनुभवों से गुजरने वाले पांच फाइनलिस्ट में तीन महिलाएं भी।

'पांच फाइनलिस्ट, उनमें भी तीन लड़कियां। पानी के बीच सैन्य अभ्यास। हर कदम पर युवा दिलों के हौसले की कड़ी परीक्षा।' इन दिनों नेशनल जियोग्राफिक चैनल पर हर सोमवार रात 9 बजे दिखाए जा रहे 'मिशन नेवी- लहरों के सरताज' में युद्धपोत, पनडुब्बी से लेकर मिसाइल तक, हर वह चीज शामिल है, जो नौसेना के लिए दिल में रोमांच पैदा कर दे। चयन के दौरान प्रतिभागियों को कई शारीरिक और मानसिक जांचों से गुजरना पड़ा। पांच अंतिम फाइनलिस्टों को नौसेना एक माह का असल प्रशिक्षण दे रही है। जिस फाइनलिस्ट को सीरीज के अंत में सबसे योग्य पाया जाएगा, उसे नौसेना के साथ एक अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर जाने का मौका मिलेगा। इन पांच में से तीन लड़कियां भी हैं- साक्षी, चैतन्या और सुरंजनी। 20 साल की साक्षी हवनूर बंगलौर की हैं और पुणे में बीए फर्स्ट इयर की पढ़ाई कर रही हैं। इनके पापा आर्मी में थे। साक्षी पढ़ाई पूरी करके पायलट बनना चाहती हैं। 28 साल की चैतन्या दातला पैदा आंध्रप्रदेश में हुई। पांडिचेरी में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे बंगलौर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर विभाग में काम कर रही हैं। चैतन्या मिशन उड़ान में भी अंतिम 15 तक पहुंचने में कामयाब रही थीं। बकौल चैतन्या, 'मेरे लिए वाकई गर्व की बात है कि मैं भारतीय नौसेना की हिस्सा बनी। मेरे लिए यह नया सीखने का बहुत अच्छा अनुभव रहा।' 25 वर्षीया सुरंजनी एचआर बंगलौर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। साथ ही वे पर्यावरण के लिए काम कर रहे एक एनजीओ से भी जुड़ी हैं। वे बताती हैं, 'इस कंपीटिशन में चयन होने के लिए मैंने अपने भाई से वादा किया था। मैं आज तक 8 स्कूलों और 3 कॉलेजों में पढ़ाई कर चुकी हूं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में आसानी से एडजस्ट हो जाती हूं।' सुरंजनी अपनी सफलता का मंत्र बताती हैं, 'सोचो मत, करो।' तीनों में एक बात समान है कि तीनों जिंदगी में संघर्ष को अहमियत देती हैं और आगे बढ़ने के लिए हर तरह की मुसीबत से टकराने के लिए तैयार रहती हैं।
-आशीष जैन

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19 February 2009

फैशन वही जो दिल को छू ले

फैशन के रंग डिजाइनर राघवेंद्र राठौड़ की जुबानी।

फैशन यानी जो मन को भाए या फिर जो पर्सनेलिटी को निखारे। शायद वही जो मन को जमा, पहना और बन गए स्टाइलिश। पर फैशनेबल फिर भी नहीं बन पाएंगे क्योंकि असल में फैशन छुपा होता है हमारी पर्सनेलिटी में, जिसे आप एक सादा-सी शर्ट में भी इम्प्रेसिव बना सकते हैं। बस प्रजेंट करने का तरीका आना चाहिए। परिधान किसी भी शैली के हों अगर आपने बिंदास तरीके से उन्हें पहन लिया, तो यकीन मानिए, लोग आपके कायल हो जाएंगे। एक फैशन डिजाइनर होने के नाते फैशन को मैं इन्हीं शब्दों में बांध सकता हूं। बॉलीवुड और फैशन इंडस्ट्री के लोग जब मुझसे यह पूछते हैं कि एक उम्दा डिजाइन की प्रेरणा मुझे कहां से मिलती है, तो मैं यही कहता हूं मेरे लिए फैशन एक सोच है। इसके लिए मुझे कहीं जाना नहीं पड़ता। मेरी जहां नजर पड़ती है, वहां से नया आइडिया मिल जाता है और इस तरह प्रकृति से लेकर संस्कृति तक सब कुछ मेरी डिजाइनिंग का हिस्सा बन जाता है।
कुदरत है पाठशाला
इस कायनात को जिसने भी डिजाइन किया है, वह अद्भुत है। हर तरह के रंगों को लेकर पेड़-पौधे, फूल-पत्तियों को जिस खूबसूरती से बनाया गया है, उसे देखकर अक्सर मैं दंग रह जाता हूं। कहीं झरने का निर्मल सफेद पानी, तो कहीं अंधेरे की कालिमा। क्या आपने कभी बया का घोंसला देखा है। किस खूबसूरती से वह अपना घर डिजाइन करती है। स्टाइल के लिए मुझे कहीं जाना नहीं पड़ता, मैं प्रकृति से ही अपने डिजाइंस की प्रेरणा लेता हूं। फैशन तो पूरी दुनिया में एक-सा रहता है। हां, हर देश के मुताबिक वहां के लोगों का नजरिया बदलता जाता है और फिर बदलाव होते-होते वहां की संस्कृति में ढल जाता है। आज हमारे यहां के बंधेज और साडिय़ां विदेशों में मशहूर हो रही हैं और हमारे देश में बाहर के स्टाइल जुड़ रहे हैं। कण-कण में डिजाइनराजस्थान के कण-कण में डिजाइन बसे हैं। चूंकि मैं जोधपुर में पला-बढ़ा हूं, इसकी माटी की महक ही मुझे मदहोश कर देती है। राजस्थानी महिला जिस तरह से घूंघट करके रहती है और कालबेलिया नृत्यांगना जिस जोश से चारों ओर घूमती है, वे मेरे दिमाग में उनके पहनावे के लिए खास जिज्ञासा पैदा करते हैं। राजस्थान की मिट्टी में ही ऐसी खासियत है कि यहां के लोग अपने सादा कपड़ों में भी दूर से ही चमकीले नजर आते हैं। उनके कपड़ों का कमाल है कि लगता नहीं कि किसान खेत में दिनभर मेहनत करके घर लौट रहा है। एक राजस्थानी किसान की इमेज सोचते ही पगड़ी, धोती, मोजड़ी और मूंछें एक साथ ही दिमाग में आ जाती हैं। इन्हीं को बढ़ावा देने के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूं। कपड़ों के डिजाइंस के साथ-साथ मैं टेक्सटाइल पर भी ध्यान देने लगा हूं। मेरा मानना है कि कपड़ों को एक कॉम्बिनेशन की दरकार होती है। अक्सर हम सोचते हैं कि फलां शर्ट फलां पेंट पर जंचेगी या नहीं। पर अगर हम अपने बालों, जूतों, चेहरे के आकार को भी इसमें शामिल कर लें, तो आपको मिस्टर या मिस परफेक्ट होने से कोई नहीं रोक सकता।
कम्युनिकेशन का जरिया
कम्युनिकेशन का एक बेहतरीन जरिया है कपड़े। कपड़ों की मदद से लोग अपने मन की बात कहते हैं। अगर मैं पीला चोला डाल लेता हूं, तो आपके मन में एकाएक ही मेरे लिए धार्मिक छवि आने लगेगी। पहली नजर में लोग पहनावे से ही आपको परखते हैं। आप किसी शोक सभा में जा रहे हैं, तो खुद-ब-खुद सफेद या सादे कपड़े पहनना पसंद करेंगे। आपने जो पहना है, वह सामने वाले को आपके बारे में अदृश्य संदेश भेजता है। इसी से सामने वाला आपकी इमेज बनाता है, इसलिए खुद को परखें। फिल्मों को देखकर प्रभावित ना हों। किसी की नकल करने से अच्छा है, खुद का स्टाइल पैदा करें। मैं खुद बहुत स्टाइलिश कपड़े पहनना पसंद नहीं करता। मुझे सफेद रंग बहुत लुभाता है। कॉटन पेंट, सफेद शर्ट, बंद जैकेट और नोकदार जोधपुरी जूतियां मुझे परफेक्ट लुक देने के लिए काफी हैं। फिल्म इंडस्ट्री में अमिताभ बच्चन का डे्रस सेंस कमाल का है। उन्हें फैशन की जबरदस्त समझ है। कोई फैशन डिजाइनर भी उन्हें अनफिट कपड़े पहनाने लगे, वे मना कर देते हैं। उनके शो 'कौन बनेगा करोड़पति' के लिए ड्रेस डिजाइन करने में बहुत मजा आया, पर मेरे दिल के करीब 'एकलव्य' है। इस फिल्म में राजस्थानी कपड़ों के खूबसूरत प्रेजेंटेशन का बहुत दबाव था। मुझे खुशी है, दर्शकों को मेरे डिजाइन पसंद आए।
सादगी की बहार होगी
अक्सर कहा जाता है कि फैशन डिजाइनर सिर्फ रैंप या मूवीज के लिए कपड़े डिजाइन करते हैं, पर ऐसा नहीं है। मैं हमेशा लोगों की भावनाओं और देश के मौजूदा हालातों के मुताबिक कपड़ों की डिजाइनिंग पर जोर देता हूं। आने वाले समय में डिजाइनिंग पर देश के हालातों का असर पड़ेगा। मुंबई बम हादसों के बाद हमारी यही कोशिश है कि अब सादगी पसंद चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जाए। चकाचौंध की बजाय लोगों के दिलों को छूने वाले कपड़े मार्केट में आएं। अब जो फैशन मार्केट में आएगा, वह हकीकत के नजदीक होगा।
-आशीष जैन

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10 February 2009

साहस की नैया सफलता का किनारा

छप्पन साल की अमरीकी महिला जेनिफर फिगे बनीं अटलांटिक महासागर तैरकर पार करने वाली दुनिया की पहली महिला।

'पानी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा है। इसे छूते ही मुझमें गजब का जोश आ जाता है। मैंने 24 दिन पानी में गुजारे और 3,380 किलोमीटर की दूरी समंदर में तैरकर पार कर ली। फिर जब मैंने अपने पांवों के नीचे कैरव्बियाई बालू महसूस की, तो मेरी सारी थकान दूर हो गई। मैं खुशी से पागल हुए जा रही थी।' यह बात एक जलपरी कह रही है। जी हां, 56 वर्षीय अमरीकी महिला जेनिफर फिगे किसी जलपरी से कम नहीं हैं। जेनिफर ने अफ्रीका के केप वर्डे द्वीप से त्रिनिदाद तक तैराकी की और अब वे अटलांटिक महासागर तैरकर पार करने वाली दुनिया की पहली महिला बन गई हैं।
काश, शार्क मिलती
उन्होंने अपनी यात्रा इसी 12 जनवरी को शुरू की थी। तेज हवाओं और नौ मीटर ऊंची लहरों का सामना भी उन्होंने किया, पर हिम्मत नहीं हारी। अटलांटिक महासागर की यात्रा के दौरान उनका सामना बहुत सी व्हेलों, कछुओं और डॉल्फिनों से हुआ। वे बताती हैं, 'मैं समंदर में एक बार शार्क से सामना करना चाहती थी, पर रास्ते में मुझे एक भी शार्क नजर नहीं आई। शार्क से मुकाबले के लिए मैं एक खास किस्म के खोल में तैरती थी।'इस यात्रा से पहले उन्होंने अपने घर के स्वीमिंग पूल में घंटों मेहनत की और खुद को समंदर की परिस्थितयों से निपटने के लिए तैयार किया। इस सफर के बारे में जेनिफर कहती हैं, 'मेरा सालों पुराना सपना पूरा हो गया। मैंने बचपन में ही अपनी मम्मी को बता दिया था कि मुझे अटलांटिक महासागर पार करना है। जब मैं 11 साल की थी, तब एक बार मैं अपनी मां के साथ इटली जा रही थी। अटलांटिक महासागर के ऊपर से हवाई यात्रा के दौरान मैंने मजाक में मम्मी से कहा कि काश, मैं समुद्र में गिर पड़ूं और आगे का सफर तैरकर पूरा करूं और आज मेरा वही सपना पूरा हो गया है।'
आठ घंटे पानी में
सफर के बारे में बताते हुए जेनिफर रोमांचित हो उठती हैं और बोलती हैं, 'रोज मेरे आठ घंटे पानी में बीतते थे और उसके बाद मैं अपनी नाव में वापस आ जाती थी।' जब वे तैरती थी, तो उनकी नाव पर उनके साथ चलने वाली टीम उन्हें एनर्जी ड्रिंक फेंकते थे। कभी-कभी जब लहरें बहुत तेज चलती थीं, तो टीम के सदस्य खुद उनके पास जाकर पेय पदार्थ देकर आते थे। जेनिफर बोट पर सुबह 7 बजे उठती थीं। पास्ता और भुने हुए आलू खाकर समुद्री मौसम का अनुमान लगाती थीं। ऐसा भी हुआ कि खराब मौसम के चलते एक बार समुद्र में वे सिर्फ 21 मिनट तक ही तैर सकीं। तैराकी के समय फिगे लाल टोपी और वैट सूट पहनती थी। इसका कारण पूछने पर उनका जवाब रहता है, '1926 में इंगलिश चैनल तैरकर पार करने वाली पहली महिला गेर्टरूडे एडरले की एक तस्वीर हमेशा मेरे पास रहती है। वे भी तैराकी को अपनी जिंदगी मानती थीं। वे मेरव् लिए सबसे बड़ी आदर्श हैं और सबसे बड़ी बात है कि तैराकी के दौरान वह भी यही ड्रेस पहनती थीं।' साथ ही वे 1952 में 39 साल की उम्र में अटलांटिक महासागर में पहली बार नाव चलाने वाली महिला अन्ना डेविसन से भी बहुत प्रभावित हैं। बकौल फिगे, 'मैं अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और पिता की साइन की गई लाल शर्ट को भी अंदर पहनकर रखती हूं। यह मेरे लिए लकी चार्म है। इसी ने मुझे मुश्किलों से बचाया।' रात के समय वे मांस-मछली पर निर्भर रहती थीं। खान-पान पर इतना ध्यान देने की खास वजह थी कि उन्हें रोज 8 हजार कैलोरी बर्न करनी होती थी।
भटकी पर हारी नहीं
ऐसा नहीं है कि उनके लिए सब आसान था, पर जेनिफर बताती हैं, 'मैं कभी डरी नहीं। मैं हमेशा से ही बड़ा काम करने में भरोसा रखती थी। मुझे बहामा द्वीप समूह तक पहुंचना था, पर मैं थोड़ा भटक गई और 5 फरवरी को त्रिनिदाद के एक टापू तक पहुंचने में सफल हुई। मैंने लोगों को बता दिया कि एक महिला भी तूफानों का सामना कर सकती है।' पूरे सफर के दौरान उनके एक मित्र डेविड हिगडॉम उनसे संपर्क में रहे। आगे उनकी योजना फरवरी के अंत तक त्रिनिदाद से ब्रिटिश वर्जिन द्वीप तक तैरकर जाने की है। इसके बाद वह एस्पेन के कोलोराडो स्थित अपने घर जाकर अलास्काई रिश्तेदारों के साथ कुछ दिन बिताएंगी। फिगे का सत्ररह साल का बेटा एलेक्स रव्सिंग कार ड्राइवर है और अपनी मां की तरह ही रोमांचक खेलों को अपनी जिंदगी बनाना चाहता है।
-प्रस्तुतिः आशीष जैन

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05 February 2009

क्या यही प्यार है?

'आइसक्रीम खाओगी?' 'नहीं, जानू आज पिज्जा खाना है।' 'यार, इस ड्रैस में तुम बड़ी हॉट लग रही हो।' 'डियर, आज नाइट को क्या खास कर रहे हो?' 'बाय डार्लिंग, आई लव यू।' ये है आज का प्यार करने का अंदाज। समय बदला, दुनिया बदली और बदले हैं प्यार करने के तरीके। पर एक चीज जो जस की तस है, वह है जज्बात, दिल और उसके धड़कने का अंदाज। गौर करते हैं वेलेंटाइन डे के बहाने।
युवा कौन? अक्सर सवाल मन में उठता है। हर बार दिल से यही आवाज आती है, जो सारे बंधनों को तोड़ दे और पूरी दुनिया को प्यार के धागों में बांधते हुए आगे बढ़ता जाए, वही है असल मायने में युवा। तन-मन, जीवन हर कोने से प्यार की सुगंध महके। बातों में मिठास भरा उल्लास हो। मतलब जिंदगी से प्यार साफ-साफ झलके।

चाहिए मैक्डी में ट्रीट
जब कोई बांका जवान या युवती प्यार की राह पर आगे बढ़ते हैं, तो दिल का धड़कना दूर से ही सुनाई देता है। झरने के ठंडे पानी की तरह मन में अजीब-सी छुअन महसूस होती है। कोई ख्वाबों का राजकुमार या सपनों की शहजादी, मिली नहीं कि लगने लगता है, बस अब सारे सपने पूरे हो गए। अब जमाने को दिखा देंगे कि हमारे पास भी बॉयफ्रैंड और गर्लफ्रैंड है। 'हाय, वो कितनी स्वीट है। मैं तो मर ही जाऊंगा।' 'वाउ, कितना मजा आएगा, जब मैं उसकी पल्सर पर उसके साथ बैठूंगी।' इन्हीं खयालों के साथ झूमने को दिल करता है। मुलाकात होती है, नजरें आज भी उसी अदा से मिलती-झुकती हैं, पर नखरे हैं, अदा है, शरारत है साथ ही खट्टी-मीठी नोंक-झोंक भी। 'स्वीट हार्ट, आज तुमने नया मोबाइल खरीदा है, मुझे मैक्डी में ट्रीट चाहिए।' अब होठों पर कोई चाह दबी नहीं है, प्यार में डिमांड शामिल हो गई है। हर तरह की डिमांड।
बिंदास मेरा साथी
आज के युवा प्रेमियों के पास इंतजार का वक्त नहीं है। उसे झकास साथी चाहिए, बोल्ड और बिंदास। उसकी हर जरूरत को पूरा करने वाला। उसके पास सिक्स पैक एब भी होने चाहिए और 'गजनी' के आमिर जैसा हेयर स्टाइल। प्यार स्टेटस सिंबल है, अगर अपने फ्रैंड्स से मिलवाऊं, तो सब की जुबान पर एक ही बात होनी चाहिए 'काश! तेरा बॉयफ्रैंड मुझे मिल जाए।' सैंटी या बहनजी टाइप की नहीं, प्यार के लिए तो बिंदास कुड़ी ही चलेगी।
युवा मन के लिए प्यार एक ऐसा नशा है, जो जिंदगी की पहली जरूरत है। पहले मुलाकात, दोस्ती और फिर डेटिंग के रास्ते कब प्यार की बांसुरी बजने लगती है, इस बात से वे खुद बेखबर होते हैं। मिलने का मन करा, तो मोबाइल के बटनों से खेलने लगे। सजे-संवरे भंवरे अपने प्यार के लिए सबसे अच्छे तोहफे की खोज में दर-दर भटकते हैं। तब जाकर कहीं बैचेन दिल को करार आता है। 'उसने बोला था कि 11 बजे आ जाएगी, पर आई नहीं। बात करता हूं।' और शुरू हो गए मोबाइल फोन पर। हजारों का बिल आता-जाता है, पर बातें होती रहती हैं। रूठना, मनाना, हंसना, रोना सब चीज मोबाइल पर ही पूरी होती हैं। सच पूछें, तो आशिक अक्सर उस शख्स को दुआ देते मिलते हैं, जिसने मोबाइल बना छोड़ा। और कुछ नहीं, तो एसएमएस का सिलसिला यूं शुरू होता है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। चोरी के इमोशनल मैसेज लिख-लिखकर झूठी वाहवाही बटोरते हैं। बाकी कसर इंटरनेट, ई-मेल और चैटिंग पूरी कर देते हैं। शहर से दूर कहीं जाना हुआ, तो टेंशन किस बात की, ऑरकुट पर चैटिंग करेंगे न।
हो जाए रोमांटिक मूवी
किताबें हाथों में होती हैं, पर दिल करता है कि अपने जानेमन के सलोने चेहरे को ही पढ़ते रहें। क्लास में जब तक साथी के पास वाली सीट न मिल जाए, मन में उथल-पुथल मची रहती है। कैंटीन में बैठे, हाथों में हाथ डाले समय कब पंख लगाकर उड़ जाता है, पता नहीं लगता। मॉर्निंग वॉक से सुबह की शुरुआत होती है, तो विंडो शॉपिंग के बहाने शाम गुलजार होती है। चाहे पार्टी हो या कोई जश्न, जाना तो साथ ही है। पापा से, दोस्तों से सब से मिन्नतें मांगीं, उधार लिया और पहुंच गए किसी मल्टीप्लैक्स में रोमांटिक मूवी देखने। खुद को राज और प्रियतम को सिमरन मानकर डूब गए ख्वाबों की हसीन वादियों में। हर चीज में सपनीला संसार। गिफ्ट भी थोड़ा हटके और सरप्राइजिंग ही देंगे। 'तुम हमेशा पीली टीशर्ट ही क्यों पहनती हो?' जीभर कर तारीफ चाहे न कर पाएं, पर जो चीज मन को नहीं भाती, उसे सीधे मुंह पर बोल देते हैं। 'डैड, ये रोहन है, मेरा बैस्ट फ्रैंड।' अपने प्यार को घरवालों से मिलवाने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं।
खुलकर प्यार करेंगे
'डार्लिंग, आज तो बिजी हूं। प्रिया के साथ डेट पर जा रहा हूं। तुमसे कल बात करूंगा।' इस तरह एक-दूसरे को चिढ़ाने के बाद मनाने में जो मजा है, उसका जवाब नहीं। प्यार में कुछ तो नया होना चाहिए। कुछ एक्साइटिंग सा, कुछ थ्रिल भरा। प्यार करा है भई, जमकर करेंगे। किसी के रोके, रुकेंगे थोड़ा ही न। जिंदगी एक जश्न का नाम है। क्या पता, कल हो न हो। हमारे प्यार से दुनिया जलती है, तो हम क्या करें? जिसे चाहते हैं, उसका हाथ पकड़कर चल लिए, तो जमाने का क्या बिगाड़ दिया? प्यार, इश्क और मोहब्बत नहीं, युवा इसे चाहत का नाम देते हैं। कहते हैं प्यार, इश्क या मोहब्बत में इनके शब्दों की तरह ही कुछ आधा-अधूरा रहता है। पूरी तो चाहत ही होती। क्या खूब है युवा मन की उड़ान।
-आशीष जैन

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30 January 2009

जिंदगी कभी रिटायर नहीं होती



रिटायर्ड लोगों को नौकरी मुहैया कराने की मुहिम में जुटे बुजुर्ग पानगड़िया दंपती।


'छह महीने पहले की ही तो बात है, जब हमें बुजुर्गों को नौकरी दिलाने के लिए वेबसाइट बनाने का आइडिया आया। शुरू में लगा कि कैसे यह सब होगा। पर हमने पहल की और देखिए हम सफल रहे। आज हम लगभग 750 बुजुर्गों को नई नौकरी दिला चुके हैं।' यह पंक्तियां पढ़कर आपको लगकर रहा होगा कि हम उत्साह से लबरेज किन्हीं युवाओं की बात कर रहे हैं। जी नहीं, यह जोश तो पानगड़िया दंपती की बातों में नजर आता है। जयपुर निवासी 61 साल के रवि पानगड़िया अपनी 59 साल की पत्नी आशा के साथ मिलकर रिटायर्ड हो चुके लोगों को रोजगार दिलाने की मुहिम में लगे हुए हैं। वे http://www.jobsretired.com/ नाम की एक वेबसाइट का खुद संचालन कर रहे हैं और इसकी मदद से बुजुर्गों की क्षमता के मुताबिक उन्हें मनमाफिक काम मुहैया करा रहे हैं। नौकरी के दौरान ही रवि और आशा को पता लग चुका था कि आने वाला समय कंप्यूटर और इंटरनेट का होगा। धीरे-धीरे उन्होंने इंटरनेट पर समय बिताना शुरू कर दिया और इस पर महारत हासिल कर ली।


स्थायी संपर्क इंटरनेट


1970 में इंजीनियरिंग पास कर चुके रवि बताते हैं, 'साल 2006 में भिलाई में एच ई जी लिमिटेड कंपनी से सीनियर वाइस प्रेसीडेंट के पद से रिटायर होने के बाद जयपुर आ गया। यहां आकर मैंने मैनेजमेंट कंसलटेंसी शुरू करने की कोशिशें की। पर इस काम में मुझे लगभग दो महीने लग गए और काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उस वक्त मुझे लगा कि अगर मुझ जैसे रिटायर्ड आदमी को इतनी परेशानी आई हैं, तो मेरे जैसे और बुजुर्गों को भी काम-धंधे ढूढ़ने में परेशानी आती होगी। तब मैंने 1 जनवरी, 2008 को स्थानीय अखबार में बुजुर्ग लोगों से नौकरी के लिए बायोडाटा मांगे और साथ ही कंपनियों से भी आग्रह किया कि उन्हें किस तरह के लो लोग चाहिए।' शुरुआत तो रवि कर चुके थे। बुजुर्गों का गजब का रिस्पॉन्स देखकर आशा और रवि को लगा कि वाकई बुजुर्ग उनके इस आइडिया को पसंद कर रहे हैं। अभी भी रिटायर्ड लोगों को काम की तलाश है। दोनों ने ठान लिया कि अब तो आगे की जिंदगी अपने जैसे बुजुर्गों को काम दिलाने में ही गुजारेंगे। धीरे-धीरे पानगड़िया दंपती बुजुर्गों के लिए नई आस बन गए। बुजुर्गों को नौकरियां भी मिलने लगीं। पर अखबार में बार-बार महंगे विज्ञापन देने का आर्थिक भार बहुत था। साथ ही बुजुर्गों और कंपनियों से संपर्क बनाए रखना कठिन काम था। ऐसे में उन्होंने सोचा कि किस तरह लोगों से स्थायी संपर्क साधा जाए। इंटरनेट से तो रवि और आशा दोनों वाकिफ थे ही, इसलिए दोनों ने सोच-विचाकर अपने परिचित मित्र से एक वेबसाइट बनाने की गुजारिश की और 30 जून, 2008 को रवि ने 'जॉब्सरिटायर्ड डॉट कॉम' नाम की एक वेबसाइट शुरू कर दी। फिर तो पानगड़िया दंपती को सारी समस्याओं से निजात मिल गई।


कोई फीस नहीं


पिताजी बी. एल. पानगड़िया के नाम पर स्थापित ट्रस्ट 'बी.एल. पानगड़िया मेमोरियल ट्रस्ट' इस वेबसाइट को मैनेज करता है। वेबसाइट को अपडेट करने के काम में पानगड़िया दंपती माहिर है। जब कोई बुजुर्ग इस वेबसाइट पर जाता है, तो निशुल्क लॉग इन करके खुद के बारे में मांगी गई जानकारियां भर सकता है। इसी तरह कंपनियां भी लॉग इन करके अपने यहां खाली पड़ी नौकरियां और इच्छित योग्यता भर देती हैं। दंपती कंपनियों को अपने पास आए आवेदनों को भेज देती हैं और इस तरह बुजुर्गों को नौकरियां पाने के लिए एक मंच मिल जाता है। जो लोग कंप्यूटर से पूरी तरह परिचित नहीं हैं, उनके लिए वेबसाइट में ईमेल की भी सुविधा है। काम के लिए अधिकतर आवेदन रिटायर्ड सरकारी और बैंक कर्मचारियों की तरफ से आ रहे हैं। आशा बताती हैं, 'वेबसाइट बनाने के बाद अब लोग आसानी से दुनिया के किसी भी हिस्से से नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं। अब हमसे हर तरह के रिटायर्ड प्रोफेशनल संपर्क कर रहे हैं। वेबसाइट पर नौकरी के लिए जो पहला आवेदन आया था, वह आयकर विभाग के रिटायर्ड चीफ कमिश्नर का था।' इस काम के बारे में रवि बताते हैं, 'नौकरी दिलाने के इस काम में हालांकि 'हैल्पएज इंडिया' नौकरी चाहने वाले बुजुर्गों का संपर्क हमसे करवाता है। पर आर्थिक रूप से हम किसी से मदद नहीं ले रहे हैं। नौकरी लेने और देने वालों से हम किसी तरह का कोई पैसा नहीं लेते। वेबसाइट से पूरे देश के बुजुर्ग देश में हर जगह नौकरियां पा रहे हैं।' अपने आगे की योजना के बारे में आशा का कहना है, 'अभी देश में बुजुर्ग कंप्यूटर और इंटरनेट से पूरी तरह परिचित नहीं हुए हैं। ऐसे में हम रिटायर्ड लोगों को कंप्यूटर साक्षर बनाने की योजना बना रहे हैं।'


-आशीष जैन

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22 January 2009

जीने की राह


प्रयास
कुआ नया-नया ही बना था। पनिहारिन ने पानी भरने के लिए कुए की जगत पर घड़ा रखा, तो वह लुढक़ने लगा। कुए की जगत पर लगा हुआ पत्थर हंसा और घड़े को बेपेंदे का कहकर उसकी खिल्ली उड़ाने लगा। घड़ा चुप रहा। लगातार कुछ दिन घड़ा उस जगह पर रखते-रखते वहां पर एक गोल गड्ढा सा बन गया। अब घड़ा स्थिर रखा जाने लगा। तब घड़े ने पत्थर से कहा- 'देख भाई पत्थर! मैंने निरंतर प्रयास से अपने कोमल अंगों की ही रगड़ से तुम्हारे कठोर शरीर में भी अपने लिए स्थान बना लिया।'
भाग्यवान
एक बूढ़ा किसी ठूंठ के नीचे बैठा सर्दी में सिकुड़ रहा था। पेड़ पर ऊपर की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि वह भी उसी की तरह बूढ़ा हो गया है। बूढ़े ने अपने विगत वैभव की गाथा गाई और पेड़ के साथ सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहा- तुम्हें भी मेरी ही तरह भाग्य ने सताया है न? ठूंठ ने कहा- मैं तुम्हारे जैसा दुखी नहीं हूं। बसंत निकट आ रहा है। मैं उसी की सुखद कल्पना में खोया रहता हूं और खुश रहता हूं कि न जाने कितने और बसंत देखने मेरे भाग्य में बदे हैं। मेरे भाग्यवान होने को धन्यवाद दो और अपने बीते हुए समय की चिंता मत करो।
- आशीष जैन

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16 January 2009

आने वाला कल हमारा है

गणतंत्र के साठ साल पूरे होने को हैं, इस दौरान बहुत कुछ बदला, लेकिन औरतों के लिए जिंदगी फिर भी दुश्वार बनी रही। इसके बावजूद किरण बेदी हताश नहीं हैं। वे कहती हैं, 'मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाला वक्त हम महिलाओं का ही है। चाहे कितनी बाधाएं आएं, हम हार मानने वाली नहीं हैं। मैं पूरे देश की महिलाओं को यकीन दिला देना चाहती हूं कि वे जिस शिद्दत से अपने-अपने कामों को अंजाम दे रही हैं, उसकी बदौलत आने वाला वक्त हमारी मुट्ठी में होगा।'

मैं शुरू से मानती रही हूं कि महिलाओं को दबाकर रखा गया है। समाज ने हमेशा कोशिश की है कि महिलाएं घर-परिवार तक ही सीमित रहें, पर हमने कभी हार नहीं मानी। इसी का नतीजा है कि अब महिलाओं की स्थिति में बदलाव साफ नजर आने लगा है। देश के कई हिस्सों में जाने पर मुझे पता लगता है कि गरीब से गरीब महिला में भी संघर्ष करने का गजब का हौसला है। वे बिना किसी मदद के आगे बढ़ रही हैं। पति, भाई या पिता के साथ की दरकार अब उन्हें नहीं रह गई है। वे अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के लिए छोटे-छोटे काम कर रही हैं। अपना परिवार चला रही हैं। छोटी-छोटी बचत करके भविष्य के सपने भी संजो रही हैं। कुछ सालों पहले मेरे सामने शारदा नाम की एक ऐसी महिला का केस आया, जो दस बच्चों की विधवा मां थी। उसका बेटा अपराधी बन गया था। पर उसने कड़ी मेहनत की और बहुत अच्छे से बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी निभाई। मैं मानती हूं कि एक शारदा अगर ऐसा कर सकती है, तो देश की दूसरी 'शारदाएं' भी मुसीबतों के पहाड़ के आगे सिर नहीं झुकाएंगी।
हालात पहले से सुधरे
लेकिन महिलाओं पर होने वाले जुल्मों में कमी नहीं आई है। आज भी वे पति, जेठ, सास या आस-पास वालों की क्रूरता का शिकार बनती हैं। अब महिलाओं की सोच में बदलाव जरूर आया है। पहले महिलाओं को सिखाया जाता था कि वे पुरुषों की ज्यादतियां सहने के लिए ही हैं। पर अब गरीब, दलित और आदिवासी महिला भी अपने पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है। ऐसा नहीं है कि मेरे साथ कभी ज्यादतियां नहीं हुई, पर मैंने इनसे घबराई नहीं, इनका डटकर सामना किया। मैंने क्रेन बेदी पुकारे जाने से लेकर तिहाड़ जेल के सुधारों तक, कभी हालात से समझौता नहीं किया बल्कि उन्हें बदलने में जी-जान से जुटी रही। मैंने पुलिस की नौकरी छोड़ी ताकि लोगों से सीधे तौर पर जुड़ सकूं। हालात पहले से सुधरे हैं। पर हमें और भी आगे जाना है।
अब हम मजबूर नहीं हैं
मैं देखती हूं कि देश की बेटियां पढ़-लिख कर अपनी मांओं के अधूरे सपने पूरे करना चाहती हैं। अब वे कॅरियर के लिहाज से कोई भी निर्णय लेने से नहीं हिचकतीं। सेना हो या साइंस का क्षेत्र, हर जगह उन्होंने खुद को साबित कर दिया है। उन्हें बहुत कम अवसर मिले, पर उन्हीं चंद मौकों से उन्होंने अपनी किस्मत संवारी। नारी ने जता दिया कि अब उनकी पहचान सिर्फ चूड़ी-बिंदी या चूल्हे-चौके तक ही सीमित नहीं रह गई है। उनकी खुद की अलग पहचान है। आंचल अब घर-परिवार के छोटे-से आंगन से बाहर निकलकर आसमान में परचम की मानिंद फहरा रहा है। मेरे टीवी शो 'आपकी कचहरी' में महिलाएं अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के बारे में खुल कर बोल रही हैं। आज की नारी ज्यादा मुखर हो गई है। हाल के घरेलू हिंसा कानून के तहत महिलाओं ने खुलकर अपनी परेशानियां पुलिस को बताई हैं। अब पुरुषों को एकबारगी सोचने पर विवश होना पड़ा है कि वे कहां तक सही हैं?
आज की नारी मेरा आदर्श
मेरे मन में अक्सर यह सवाल आता था कि आखिर महिलाएं परेशानियों के आगे खुद-ब-खुद घुटने क्यों टेक देती हैं? पर अब हालात बदले हैं। वे हर समस्या पर सोचने लगी हैं। उन्होंने घर-परिवार के साथ-साथ खुद के लिए जीना सीख लिया है। आज की नारी बेटियों की शिक्षा-दीक्षा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती।शुरू में लोग कहते थे कि आप देश की लड़कियों के लिए आदर्श हैं। पर आज की महिलाओं के जज्बे को देखकर वे मुझे खुद का आदर्श नजर आने लगी हैं। आज देश के सर्वोच्च पद पर महिला आसीन है। कई काम जिनको करने में पुरुष भी हिचकते हैं, उन्हें महिलाएं बखूबी अंजाम दे रही हैं। यह कमाल आगे भी होता रहेगा और जल्द ही ऐसा समय आएगा, जब महिलाओं के ऊपर से बेबसी का ठप्पा पूरी तरह से हट जाएगा।
-किरण बेदी (लेखिका, देश की पहली महिला आईपीएस अफसर हैं।)
प्रस्तुति- आशीष जैन

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सहना मुझे मंजूर नहीं

गणतंत्र दिवस के मौके पर यह जानना दिलचस्प रहेगा कि संविधान बनने के बाद देश की आधी आबादी के हितों के लिए क्या कानून बने हैं और उन्हें अमल में कैसे लाया जाए?

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005-
अगर महिला के घर पर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, तो उसे घरेलू हिंसा माना जाएगा।
- गाली-गलौच, मारपीट, ठीक से भोजन न देना, मानसिक रूप से परेशान करना भी घरेलू हिंसा में शामिल है।
- इस कानून में महिला किसी महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करा सकती है। यह कानून पुरुष प्रताड़ना से संरक्षण देता है।
- धारा 12 के मुताबिक विवाहित या अविवाहित महिला घर पर प्रताड़ित महसूस करने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकती है। मजिस्ट्रेट उसे घर में रहने की व्यवस्था के निर्देश दे सकता है। घर के सदस्यों को भरण-पोषण के लिए निर्देश दिए जा सकते हैं।
- महिला अगर शादीशुदा है, तो पति, देवर या ससुर के खिलाफ शिकायत कर सकती है।
- अगर वह अविवाहित है, तो भाई या पिता की प्रताड़ना के खिलाफ शिकायत कर सकती है।
- अगर प्रताड़ना के मामले में घर वाले मजिस्ट्रेट के आदेश की पालना नहीं करते हैं, तो वह एक साल तक की सजा और बीस हजार रुपए तक का जुर्माना कर सकता है।
हिंदू विवाह अधिनियम 1955-
धारा 24 के मुताबिक पति-पत्नी के बीच न्यायालय में कोई विवाद लंबित हो, तो पत्नी पति से मासिक भरण-पोषण की मांग कर सकती है। न्यायाधीश तय करता है कि पति को कितना पैसा पत्नी को देना चाहिए।
- धारा 25 के अनुसार अगर पति-पत्नी के बीच विवाह विच्छेद का फैसला लागू हो जाता है, तो उस समय या बाद में पत्नी को एक मुश्त भरण-पोषण पाने का अधिकार है।
- महिला पारिवारिक न्यायालय, जिला न्यायाधीश के सामने एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करके भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
- महिला का पर-पुरुष के साथ संबंध होने या पति के परित्याग करने पर वह भरण-पोषण की अधिकारी नहीं रह जाती।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956-
पिता की पैतृक संपत्ति में लड़कियों की लड़कों के बराबर हिस्सेदारी होती है।- लड़की का ससुराल जाने पर भी पिता की संपत्ति पर अधिकार है।
- अगर लड़की के पति की मृत्यु हो जाए, तो वह अपने पिता से भी भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
- अगर महिला अवयस्क है और पति जिंदा है, पर पति किसी वजह से पत्नी का भरण-पोषण नहीं कर पाए, तब भी अपने पिता से भरण-पोषण की मांग कर सकती है।

-धारा 14 के तहत हिंदू महिला के पास खुद की कोई संपत्ति है, तो वह पूर्ण रूप से उसकी ही संपत्ति होगी। महिला की संतान खुद इस संपत्ति की मांग नहीं कर सकती।
हिंदू दत्तक भरण-पोषण अधिनियम 1956-
धारा 8 के मुताबिक कोई भी वयस्क और स्वस्थचित्त हिंदू महिला किसी भी बच्चे को गोद ले सकती है। महिला का शादीशुदा होना जरूरी नहीं है।
- अगर महिला किसी लड़के को गोद लेती है, तो लड़के की उम्र महिला से 21 साल कम होनी चाहिए।
- गोद लेने वाली महिला के पास पहले से कोई जीवित संतान नहीं होनी चाहिए।
- अगर किसी के पास इकलौती संतान है, तो उसे गोद नहीं ले सकते।
-अगर महिला विवाहित है, तो उसके पति की सहमति जरूरी है।
- बच्चे को गोद देने व लेने वाली महिला के बीच स्टांप पेपर पर एक गोदनामा तैयार किया जाता है।
- हर जिले में मौजूद रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर गोदनामे को पंजीकृत करवाना जरूरी है।
दहेज निषेध अधिनियम 1961-
सिंध लेती-देती एक्ट 1949 को लागू करने के पीछे दहेज की प्रथा को रोकना ही था।
- धारा 3 के अनुसार अगर कोई दहेज के लेन-देन में लिप्त पाया जाता है, तो उन्हें पांच साल तक की सजा और15 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।
- धारा 4 के मुताबिक अगर कोई दहेज की मांग करता है, तो मजिस्ट्रेट दो साल तक की सजा और दस हजार रुपए तक का जुर्माना कर सकता है।
-आशीष जैन(राजस्थान उच्च न्यायालय के एडवोकेट भरत सैनी से बातचीत के आधार पर)

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09 January 2009

उम्र जुदा, जज्बा एक

सिक्कों की खनक से लेकर सितारों की चमक तक, हर जगह भारतीय मूल की महिलाएं छाई हुई हैं। 52 वर्षीय मंजु गनेरीवाला से लेकर 18 साल की नंदिनी शर्मा का जज्बा अपने सपनों को साकार करना है।



अभी आसमां बाकी है

भारतीय मूल की मंजु गनेरीवाला बनीं अमरीका के वर्जीनिया राज्य की वित्त मंत्री।अब तक वे वर्जीनिया के गर्वनर को बजट तैयार करने, राजस्व का अनुमान लगाने, ऋण जारी करने जैसे कामों में सलाह देती रही हैं। ये हैं भारतीय मूल की मंजु गनेरीवाला। उन्हें अमरीका के वर्जीनिया राज्य का वित्त मंत्री (टे्रजरर) बनाया गया है। वे जुलाई 1985 से राज्य सरकार के साथ काम कर रही हैं। जून 2000 से जनवरी 2006 तक उन्होंने मेडिकल असिस्टेंस सर्विसेज विभाग में वित्त और प्रशासन के लिए बतौर डिप्टी डायरव्क्टर अपनी सेवाएं दीं। 2006 से वे वित्त विभाग में उपमंत्री के पद पर थीं। जनवरी 2009 से वे वर्जीनिया राद्गय के ट्रेजरी बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में काम करेंगी। इसके तहत उनके पास 8 से 10 बिलियन डॉलर के निवेश और प्रबंधन की जिम्मेदारी रहेगी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय विश्लेषण और प्रबंधन के मामले में अमरीका के सबसे बेहतरीन राज्य वर्जीनिया के वर्चस्व को बनाए रखना है।

यादों में बसा है मुंबई

मंजु का जन्म महाराष्ट्र के अकोला में हुआ और मुंबई में पली-बढ़ीं। वडाला के छोटे से स्कूल से वर्जीनिया की वित्त मंत्री बनने तक का सफर काफी उतार-चढ़ाव से भरा था। मंजु ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से वाणिद्गय से स्नातक किया है। इसके बाद उन्होंने आस्टिन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास से एमबीए की डिग्री हासिल की। उनका पैतृक घर राजस्थान के झुंझुनू और ससुराल फतेहपुर में है। मुंबई में शिवाजी पार्क स्थित उनके घर में पिता राधेश्याम अग्रवाल और माता कलावती उनकी इस उपलब्धि से बेहद खुश हैं। मां कलावती कहती हैं कि पहले मंजु डॉक्टर बनना चाहती थी, पर घर के बड़े लोगों ने इसके लिए अनुमति नहीं दी। पर आज वह काफी अच्छी जगह पर है। मुंबई के बारे में खुद मंजु का कहना है कि मेरे बच्चे अक्सर मुझसे पूछते हैं, 'मुंबई से आपको इतना लगाव क्यों है? आप बार-बार मुंबई जाने की बात क्यों कहती हैं?' तो मेरा एक ही जवाब होता है कि मुंबई की गलियों में खेल-कूद कर ही मैंने बचपन गुजारा है और उस जगह को मैं ताउम्र नहीं भूल सकती।
प्राथमिकता कॅरियर को

मंजु के पिता राधेश्याम बताते हैं, 'वह हमेशा से ही अपने कॅरियर को प्राथमिकता देती आई है। सिर्फ हाउस वाइफ बनकर वह जिंदगी बसर नहीं करना चाहती थी। मेडिक्लेम पॉलिसीज के फंड जुटाने के छोटे से काम से शुरुआत करके आज वह इस पद तक पहुंची है।' मंजु के पति सूरी ने भी आस्टिन में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास से पीएचडी की है। वे 'स्पैक्ट्रा क्विस्ट' के मालिक हैं। यह कंपनी मशीनों में आने वाली खामियों का पता लगाने के लिए विशेषज्ञ इंजीनियरों के लिए तकनीक विकसित करती है। 1976 में वह शादी करके अमरीका चली गई थीं। 52 वर्षीय मंजु के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा राकेश अमरीकी सेना में लेफ्टिनेंट है और इराक से 15 महीनों के सैन्य अभियान से लौटा है। दूसरा बेटा ऋषि अभी यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में इंजीनियरिंग का स्टूडेंट है।

नभ में चमकता नन्हा सितारा


भारतीय मूल की अमरीकी छात्रा नंदिनी शर्मा के नाम पर रखा गया है एक ग्रह का नाम।वे एक नन्हा सितारा बनकर चमकने को तैयार हैं। जी हां, सचमुच का सितारा। भारतीय मूल की अमरीकी छात्रा नंदिनी शर्मा के नाम पर एक ग्रह का नाम '23228 नंदिनी शर्मा' रखा गया है। मूलतः असम की नंदिनी को यह सम्मान इंटेल इंटरनेशनल के 'विज्ञान औप इंजीनियरिंग मेले 2007' में माइक्रोबॉयलोजी प्रोजेक्ट के लिए विजेता बनने पर दिया गया है। इस ग्रह की खोज अमरीका की लिंकन लैब नियर अर्थ एस्टेरॉइड रिसर्च टीम ने 21, नवंबर 2000 में की थी।


उड़ान ऊंची है

नंदिनी अभी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मोलिक्यूलर बॉयलोजी की पढ़ाई कर रही हैं। वह विज्ञान और इंजीनियरिंग मेले में 2005 से 2007 तक तीन बार विजेता रह चुकी हैं। विज्ञान संबंधित खोजों, बायोमेडिकल और कैंसर के क्षेत्र में उन्होंने कई रिसर्च की हैं। नंदिनी की ख्वाहिश है कि वह माइक्रोबॉयलोजी के क्षेत्र में ही अपने शोध कार्य जारी रखें। वे अभी स्वास्थ्य से जुड़ी जोखिमों का हल निकालने के लिए शोध कार्य कर रही हैं। उनका शोध प्राकृतिक फूड के प्रिजरवेशन पर आधारित है। अपने शोध से उन्होंने इस बात को साबित किया है कि अदरक को कृत्रिम फूड प्रिजरवेटिव्स के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। 18 वर्षीय नंदिनी अभी असम के बारपेटा जिले के पाठशाला में अपने दादा-दादी से मिलने आई हैं। पिता गिरीश शर्मा अमरीका की एक कंपनी में मुख्य वैज्ञानिक के पद पर नियुक्त हैं। वह अमरीका के कानसास के ओवरलैंड पार्क में पिता गिरीश शर्मा, मां मीनाक्षी और भाई अरूप के साथ रहती हैं।
शौक हैं कई

धाराप्रवाह स्पेनिश भाषा बोलने वाली नंदिनी को टेनिस खेलने का शौक है। उन्हें संगीत से बहुत प्यार है। छह साल की उम्र से वह पियानो बजा रही हैं और इससे संबंधित कई प्रतियोगिताएं भी जीत चुकी हैं। साथ ही साथ सात साल की उम्र से वह नृत्य का अभ्यास भी कर रही हैं। भरतनाट्यम और असम के लोकप्रिय बीहू नृत्य में उनकी खासी दिलचस्पी है। वह समाज सेवा के लिए एक स्वयंसेवी संगठन 'आईईओपी' भी बना चुकी हैं।





-आशीष जैन

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मैं हूं नीलगगन की रानी


रंग-बिरंगी पतंगों में न जाने क्या जादू है? जी चाहता है कि पतंगबाजी के गुर जिंदगी में भी समा जाएं, तो क्या खूब रहे।
दुबले-पतले से रहमान चाचा, हमारे लिए पतंगों के सौदागर हैं। दिनभर लगे रहते हैं कांच के चूरे को डोर पर घिसने में। कागज के रंग-बिरंगे टुकड़ों को बारीक सी सींक से सहारा देकर आकार देते हैं उड़ान की परी पतंग को। ये कागज के चंद टुकड़े ही उनकी संतान हैं। पान तारा, चांद तारा, चिरैया, बेगम और कनकौवा, न जाने कितनी सारी पतंगें हैं उनके पास। किसी डोर को सद्दा बना दिया, तो किसी पर मेहनत कर उसे मांझे में ढाल दिया। उनके घर की चूल्हे की परवाह ये पतंगें ही तो करती हैं। हम सब घेरे रहते हैं उन्हें मुफ्त का मांझा पाने को। चाचा बताते हैं कि बच्चों, इन कागज के टुकड़ों को यूं ही न समझना, इन में भी रूह समाई रहती है। इस रूह को तसल्ली तभी मिलती है, जब ये हवा में पहुंचती है और झूमकर आसमान पर राज कर लेती है। चाचा की असल मेहनत रंग लाती है मकर संक्रांति के दिन।

मांझे में लिपटा मन
'चलो, भई राजू, गीता, छुटकी। सब चढ़ जाओ अपनी-अपनी अटरिया पर। ले आओ चकरी। मांझे की चकरी, सद्दे की चकरी और पतंगों का ढेर। हो जाओ जंग के लिए तैयार। आज तो बिल्लू को मजा चखाकर रहेंगे। कमबख्त ने पिछली बार मांझा दोहरा करके पतंग काटी थी ना, इस बार मजा चखाएंगे उसे।' कुछ-कुछ इसी तरह की आवाजें हर छत से आने लगती। हम जब छत पर पतंग उड़ाने चढ़ते, तो एक बात ठान लेते कि चाहे हम पतंग काटें या अपनी कटे, शोर खूब मचाना है। अलसुबह की हमारी धमाचौकड़ी के बीच बाबूजी की कुछ हिदायतें हमारे साथ होती, 'मुंडेर पर मत चढ़ जाना। सूरज सिर पर चढ़ जाए, तो नीचे आ जाना।' पर हमारी अक्ल में कुछ भी नहीं घुसता। पतंग की कन्नी बांधते वक्त ही लगने लगता कि देखते हैं इस पतंग की किस्मत में क्या लिखा है? क्या यही पतंग हमारी फतह का सेहरा लेगी या यह भी औरों की तरह निराश करव्गी। धीरे-धीरे जब छुटकी जिसे हम प्यार से मोटा बुलाते थे, हमारी पतंग को छुट्टी देती, तो पतंग ऊपर चढ़ने लगती और हम सबकी सांसें थम जाती। मन में बस एक ही बात रहती कि किसी भी तरह बस जीतना है। ढील से या खींच से, बस सामने वाले को धूल चटानी है। पहले-पहल हम सब मस्तमौला होकर पतंग उड़ाते थे। पतंगबाजी भी कोई कला है, इससे नावाकिफ। पर फिर चाचाजी ने समझाना शुरू किया, 'अगर आसमान पर खुद की पतंग को ही इतराते देखना है, तो कुछ पैंतरे सीखने होंगे। झुकना भी होगा। हवा के रुख को पहचान कर सही समय का इंतजार करना होगा। मांझा कितना ही अच्छा हो, इतराना मत। कुछ देर हवा के साथ बहना। लहरने देना और जब सामने वाला ज्यादा ही सीना ताने तो बस दिखा देना कि तुम क्या हो।' चाचाजी की ये बातें इंसानी जिंदगी पर भी लागू की, तो सौ फीसदी सही लगी। हां, खींच के नियम के लिए जान चाहिए, हाथों और फेफड़ों में। थोड़ी सी हड़बड़ी की, तो मांझे से हाथ में खून भी आ सकता है भई। चाहे हम बिल्लू को हराने की कितनी ही कोशिश करते, पर कभी उसकी तरह मांझे को दोहरा नहीं करा और न ही मांझे पर गांठें लगाईं। कई बार पतंगों पर पैबंद भी लगाए, पर उनकी उड़ान में कभी आड़े नहीं आए।
...वो कटवाया
कभी-कभी दूसरों की इठलाती पतंगों को देख मन में खयाल आता कि धोखा देकर नीचे से हथ्था मार दूं और उसकी पतंग को चित्त कर दूं। पर दूसरे ही पल मन कहता कि मजा तो सामने जाकर ललकारने में ही है। इसमें भी कोई शान है कि सिर्फ जीतने के लिए गलत पैंतरों का इस्तेमाल करूं। पतंग कटने के बाद अक्सर हम सब चकरी दोनों हाथों में लेकर अपने ही तरीके से गोल-गोल घुमाकर डोर समेटने लगते। पर धीरे-धीरे पतंगबाजी को जाना, तो उसूल समझ में आया कि हार को भी स्वीकार करना होगा, पेंच में अगर खुद की पतंग कट गई, तो खुद की हाथों से तोड़ दो डोर को। चंद पैसों की डोर को समेटकर अपनी हार के एहसास को ज्यादा मत करो। जीतने पर तो 'वो काटा' सभी कहते हैं पर 'वो कटवाया' कहकर हार को भी पूरी शान से मानो। पतंग हमेशा मुझसे कहती कि छुटकू, तुम भी चाहते हो ना कि बिना रोक-टोक के हमेशा आगे बढ़ते रहो, तो एक बात गांठ कर रख लो कि जैसे मैं हवा और डोर की मदद लेकर संतुलन साधती हूं, तुम्हें भी दुनिया में सबका साथ लेकर खुद को साधना है। आज भी मैं खूब पतंग उड़ाता हूं। पतंगों के संसार में मुझे अपने मन की उड़ान नजर आती है। याद आती है पतंग की तरह जोश के साथ पूरे होश से उड़ने की बात। हां, जिंदगी की टेढ़ी-मेढ़ी राहों में कभी-कभी लगता है कि मेरी पतंग ही सबसे ऊपर हो, सबसे शानदार पतंग, तो मैं हथ्था देता हूं या अपने मांझे को दोहरा कर दूसरों की पतंगों की राह में आडे़ आता हूं, धोखे से आगे बढ़ने की सोचता हूं, तो पतंगों के सबक को याद करके खुद को संभाल लेता हूं और निकल पड़ता हूं अपनी नई उड़ान की ओर।
- आशीष जैन

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05 January 2009

तन चंगा कठौती में गंगा

हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वास्थ्य केवल साधन है कोई साध्य नहीं।
- स्वामी विवेकानंद
जिस कारण से देह बिगड़ी हो उससे बिल्कुल उल्टा रहन-सहन रखने से प्रकृति का संतुलन लौट आता है।
- नेपोलियन बोनापार्ट
अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।
- साइरस
स्वास्थ्य परिश्रम में है और श्रम के अतिरिक्त वहां पहुंचने का कोई दूसरा शाही रास्ता नहीं है।
- वेंडेल फिलिप्स
स्वास्थ्य रूपी घर को स्थिर रखने के लिए उसके तीनों पाए- आहार, स्वप्न, ब्रह्मचर्य ठीक-ठाक रहने चाहिए।
- अज्ञात
अच्छी हंसी और गहरी नींद डॉक्टरों की किताब में सबसे अच्छा उपचार हैं।
-आयरिश कहावत

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02 January 2009

जीने की राह संयम



घटना 1914 की है। वैज्ञानिक टॉमस अल्वा एडीसन की प्रयोगशाला और कारखाना धू-धू कर जल रहा था। उसकी लपटें आकाश छूने की होड़ कर रही थीं। एडीसन उन लपटों में अपनी आशाओं को जलता देख रहे थे। पास ही उनका बेटा खड़ा था। इस भयंकर अग्निकांड को देखकर वह भी स्तब्ध रह गया।बुजुर्ग एडीसन ने अपने युवा पुत्र से कहा, 'देखते क्या हो? जाओ, अपनी मां को बुला लाओ। उससे कहना कि जीवन में फिर कभी ऐसा दृश्य देखने को न मिलेगा।कुछ देर बाद उनकी पत्नी भी आ गई। उसने कहा, 'बीस लाख डॉलर के कीमती यंत्रों के साथ आपने ताउम्र जो सृजन किए, उनके संपूर्ण कागजात भी तो इसी प्रयोगशाला में थे, वे भी अग्नि को समर्पित हो गए। अब क्या होगा?' एडीसन बोले, 'पहले तो ईश्वर को धन्यवाद दो कि हम सबकी भूलें भी इसमें जलकर राख हो गई हैं। अब हम नए सिरे से अपना काम शुरू करेंगे। प्रत्येक हानि भी तो अपने साथ कुछ न कुछ लाभ छिपाकर लाती है।'एडीसन ऐसे सहज रूप से उन अग्निकांड को देखते रहे जैसे उनका उससे कोई सरोकार ही नहीं।यही मनोवृत्ति जीवन के हर बदलते मोड़ पर हो, तो खिन्नता का कोई कारण शेष नहीं रह सकता।

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