03 November 2008

चाहिए एक संगिनी ऐसी

ख्वाबों की शहजादी कहें या सपनों की परी, हर पुरुष चाहता है कि उसकी जीवनसंगिनी ऐसी हो जो सारे जमाने से अलहदा और हरदिल अजीज हो।

शादी जिंदगी में एक नया मोड़ लेकर आती है। कुछ को यह रिश्ता ताउम्र लुभाता है, तो कुछ को लगता है कि हमेशा साथ निभाने वाले हमसफर में कोई न कोई खास बात होनी चाहिए, जो जमाने भर में ढूंढ़ने पर भी कहीं नजर न आए। हमने बात की कुछ पुरुषों से और जाना कि कैसी होनी चाहिए आपकी ड्रीम वाइफ।
आंखों में झांककर दिल पढ़ ले
वो लड़की बिल्कुल मेरी दोस्त जैसी हो। आखिर उसे मेरे साथ ताउम्र रहना है। ऐसे में दोस्त की तरह मेरी मुश्किलों को समझे, मेरा हौसला बढ़ाए और प्यार करे। वह दिखने में चाहे कैसी भी हो, इससे कोई फर्क मुझे नहीं पड़ेगा। हां, अगर मैं गलत राह पर जाऊं, तो मुझे सही राह भी दिखला सके। मेरे बोलने से पहले मेरी आंखों में झांककर ही मेरे मन की बात समझ सके। कभी अगर मैं जिंदगी के सफर में हताश हो जाऊं, तो मुझे प्रेरित करे, ऐसी वाइफ मिल जाए, तो मेरी लाइफ बन जाए।
-रवि कुमार शर्मा, उम्र- 36 वर्ष
सबका दिल जीत ले
उस लड़की की शक्लोसूरत खूबसूरत हो। हम दोनों की सोच भी मिले। पत्नी के साथ-साथ परिवार में दूसरी भूमिकाओं जैसे भाभी, बहू और मां को निभाने में भी कुशल हो। घर में सबकी इच्छाओं के लिए अगर थोड़ा बहुत अपनी सुविधाओं के साथ एडजस्ट करना पड़े, तो खुशी-खुशी तैयार हो जाए। जहां भी वह जाए, अपनी बातों से सबका दिल जीत ले और हाथ के हुनर में पारंगत हो। फिर चाहे वह अच्छी कुक हो या अच्छी पेंटर। कुछ ना कुछ ऐसी खासियत जरूर होनी चाहिए कि हर कोई कहे, वाह! क्या बीवी है।
-बुद्धप्रकाश सैनी, उम्र-34 वर्ष
मस्त, बिंदास और जिम्मेदार
मेरा हमसफर थोड़ा चुलबुला, चंचल और शरारती हो। मस्त, बिंदास हो, साथ ही जिम्मेदार भी। वह खुले विचारों की हो और समय के हिसाब से खुद को ढाल सके। मैं जिस भी प्रोफेशन में रहूं, वह उसे समझे और मेरी मदद भी करे। खुद को अपडेट रखे। आपने आस-पास की चीजों की जानकारी रखने वाली हो। वह इमोशनल भी होनी चाहिए ताकि रिश्तों की डोर को मजबूती से संभाले रख सके। तन की सुंदरता से ज्यादा मन की खूबसूरती को तवज्जो देने वाली हो। तभी मैं कहूंगा कि जोडिय़ां तो फरिश्ते तय करके भेजते हैं।
- विनोद भंडारी, 23 वर्ष
खुद को ना बदले
मेरी तलाश ऐसी अर्द्धांगिनी की है, जो वाकई मेरी पूरक हो। मेरी पहचान हो। सूरत और सीरत में कोई फर्क ना हो। बिना बताए अपने फर्ज को समझने वाली हो। आधुनिक हो पर ज्यादा फैशनबल ना हो। चाहे साड़ी पहने या सलवार पर हो हिंदुस्तानी तहजीब को समझने वाली। परंपराओं को दिल से निभाए और मुश्किलों में मेरा साथ दे। मन की सारी भली-बुरी बातें मुझसे शेयर करे। मेरी ख्वाहिशों के चलते वह खुद को ना बदले। जैसी है, सदा वैसी ही रहे। वह खुद कहे कि मैं हूं बीवी नंबर वन।
- आदित्य बोहरा, 26 वर्ष

-आशीष जैन

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दोस्ती कमाल की

सिसली के राजा ने डेयन को किसी अपराध के कारण मृत्यु दण्ड दिया। मृत्यु दण्ड से पहले राजा ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी तो उसने कहा- मुझे ग्रीस जाकर परिवार का प्रबंध करने के लिए एक साल का समय चाहिए। राजा बोला- मैं तुम्हारी अंतिम इच्छा पूरी करना चाहता हूं, पर तुम्हारी जगह कारागृह में कौन रहेगा? और तुम्हारे नहीं लौटने पर मृत्यु दण्ड लेने को कौन तैयार होगा? उसका मित्र पीथियस पास में ही खड़ा था। उसने कहा- मैं डेयन की जगह कारावास जाने को तैयार हूं, अगर वह लौटकर नहीं आया तो मैं मृत्यु दण्ड पाने को भी तैयार हूं। राजा ने डेयन को जाने की अनुमति दे दी। लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी बनीं कि डेयन समय पर लौट कर नहीं आ सका। पीथियस को फांसी की पूरी तैयारी कर ली गई। जैसे ही फंदा उसके गले में डाला जा रहा था, तभी हांफता हुआ डेयन लौट कर आ गया और उसने कहा- मैं आ गया हूं, मेरे मित्र को छोड़ दो और मृत्युदण्ड मुझे ही दो। पीथियस ने कहा- काश तुम देर से आते तो आज मित्रता का मिसाल कायम हो जाती। समझदार राजा ने दोनों क मित्रता को समझा और प्रशंसा करते हुए उन्हें छोड़ दिया। राजा ने उम्हें कई उपहार भी दिए और कहा- मुझे भी तुम्हारे जैसे मित्रों की आवश्यकता है। यदि तुम दोनों मेरे मित्र बन जाओगो तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।

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बहकते नन्हे कदम

घटना1- 11 दिसंबर 2007 को गुडगांव के एक स्कूल में दो स्कूली छात्रों ने आठवीं कक्षा के अपने दोस्त पर 5 गोलियां दागकर उसे मार डाला।
घटना2- 3 जनवरी 2008 को मध्यप्रदेश के सतना जिले के चोरवाड़ी गांव में दसवीं कक्षा के एक छात्र ने अपने से जूनियर कक्षा 8 के एक छात्र को गोली चलाकर मार डाला।

हाल ही हुई बच्चों में बढ़ती हिंसा की घटनाओं ने सबके सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों बालमन भटक रहा है? मासूमियत कहां गुम होती जा रही है? यह प्रवृत्ति परिवार, देश-समाज के लिए नासूर बने, उससे पहले सोचना होगा कि कैसे नन्हे कदमों को भटकने से रोका जा सकता है? इसी का खुलासा कर रहा है यह लेख-

आंकड़ों की जुबानी
1. पिछले दस सालों में बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में 400 फीसदी बढ़ोतरी हुई है।(इंडियन एसोसिएशन फॉर चाइल्ड एंड एडोलेसेंट मेंटल हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक)

2. हर 10 में से चार बच्चे अवसादग्रस्त हैं। (विमहंस के अध्ययन के मुताबिक)

3. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सन्‌ 2020 तक बचपन में न्यूरोसाइकरेटिक समस्या में 50 फीसदी तक का इजाफा हो जाएगा और रोग व मृत्युदर में इजाफे के लिए जिम्मेदार पांच कारणों में एक प्रमुख कारण होगा।
4. विद्यासागर मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरो विज्ञान संस्थान (विमहंस) ने 1200 बच्चों पर किए एक अध्ययन के आधार पर बताया है कि दिल्ली में पिछले एक दशक में 15 से 18 साल के बच्चों में तम्बाकू और अल्कोहल का इस्तेमाल चार गुना बढ़ गया है।
ये घटनाएं आजकल सबके बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। सभी को बच्चों में बढ़ती हिंसा ने हैरत में डाल दिया है। बच्चों में इस कदर बढ़ती हिंसा वाकई चिंता का विषय है। मनोवैज्ञानिक बच्चों के इस बदलते व्यवहार को व्यापक दायरे में देखते हैं और इसके लिए कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। अगर इसे समय पर नहीं सुलझाया गया, तो समाज में बच्चों की स्थिति बिगड़ सकती है और हम सबको इसके नकारात्मक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।
कोमल मन, मिट्टी समान
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। बच्चे अपने परिवार, परिवेश, समाज और स्कूल से बहुत कुछ सीखते हैं। उनमें यह समझ नहीं होती कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। ऐसे में वे कई बार गलत कदम उठा लेते हैं। मुंबई में बच्चों की काउंसलर दिव्या प्रसाद इसी बात का समर्थन करते हुए कहती हैं, 'बच्चों का मन कच्ची मिट्टी की तरह होता है। ऐसे में बच्चे हर चीज से बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं। बच्चों में सही-गलत का निर्णय लेने का गुण विकसित करना बेहद जरूरी है।'
बढ़ती सुख-सुविधा और पैसा
उदारीकरण के दौर में भारतीय परिवारों की आय में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके चलते सुख-सुविधाओं की वस्तुएं बढ़ी है। बच्चों को भी ज्यादा जेबखर्च दिया जाने लगा है। बच्चे इस पैसे का गलत इस्तेमाल करते हैं। पैसे के बल पर माता-पिता के खरीदे लाइसेंस्ड हथियार बच्चों तक आसानी से पहुंच जाते हैं। घर में रखे हथियारों के प्रति बच्चों में उत्सुकता बनी रहती है। बच्चे मौका देखते ही हथियार को लेकर उसका असल जिंदगी में प्रदर्शन करते हैं और दोस्तों के बीच आपनी धौंस जमाने लगते हैं। कभी-कभी इन हथियारों के जरिए अपना गुस्सा जाहिर करने से भी नहीं चूकते।
पढ़ाई का तनाव
आज प्रतिस्पर्धा का दौर है। मां-बाप व अध्यापक से लेकर रिश्तेदार और साथी-संगी सभी चाहते हैं कि बच्चा स्कूल में हमेशा टॉप पर रहे। बच्चे के मन को समझने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। ऐसे में बच्चा अपनी पढ़ाई को लेकर हमेशा तनाव में रहता है। बच्चा अपने मन की बात किसी से नहीं कह पाता और ऐसे में मन ही मन परेशान रहने लगता है। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को समय से पूर्व ही करियर का भूत भी सताते लगता है। माता-पिता की बढ़ती अपेक्षाओं के चलते बच्चा अवसाद में आ जाता है।
टीवी और इंटरनेट, कम्प्यूटर गेम्स
तकनीक ने हमारी जीवनशैली का स्तर सुधारा है। पर तकनीक के बढ़ते प्रभाव के चलते बच्चे असल जिंदगी और टीवी के किरदारों में फर्क महसूस नहीं कर पाते। टेलीविजन पर दिखलाई जाने वाली हिंसा बाल-मन पर कुप्रभाव छोड़ती है। वहीं इंटरनेट पर जानकारियों का अनवरत प्रवाह के बीच बच्चे भ्रमित होकर हिंसा को वास्तविक जीवन की सच्चाई मानने लगते हैं। वहीं आजकल कम्प्यूटर गेम्स के बढ़ते चलन से बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता सिकुड़ गई है। कम्प्यूटर गेम्स जैसे हिटमैन, ब्लड मनी, रोड रश बच्चों को सीधे तौर पर हिंसा के जरिए अपना काम निकालने का संदेश देते हैं। बच्चे कम्प्यूटर गेम्स के इस मायावी संसार को असल जिंदगी में भी लागू करते हैं। उसके परिणाम बहुत घातक होते हैं।
तेज जीवनशैली और खान पान
आज के युग में किसी के पास समय नहीं है। हर किसी को जल्द से जल्द परिणाम चाहिए। बच्चे भी तेजी से खुद को बड़ा साबित करना चाहते हैं। इस होड़ में बच्चे अपनी कोमलता छोड़कर प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गए हैं। वे अपनी हार बर्दाश्त नहीं कर सकते। बच्चे सफलता में बाधा बनने वाली हर चीज का हल हथियार में ढूंढने लग जाते हैं। वहीं कई शोध साबित करते हैं कि जंक फूड खाने से भी बच्चों की मानसिकता प्रभावित होती है। फास्ट फूड के बढ़ते चलन से बच्चों का बौद्धिक स्तर कम हुआ है। अकेलापन
आधुनिक समय में माता-पिता दोनों रोजगार के लिए दिन के समय घर से बाहर रहते हैं। जिस समय बच्चा स्कूल से घर आता है उसे चाहिए मां का दुलार, उसके ममता भरे बोल। लेकिन उसे इसकी बजाय खालीपन मिलता है।वह घर पर सारे दिन अकेला रहता है। बच्चा इस अकेलेपन को सहन नहीं कर पाता है। अकेलापन हावी होने से उसकी मानसिकता में विकृति आने लगती है। अकेलेपन का कोई रचनात्मक उपयोग न होने की वजह से बच्चे में तनाव, अवसाद और निराशा घर करने लगती है।
कुछ खास बातें
बच्चों के कुछ खास लक्षणों को देखकर आप पता लगा सकते हैं कि आपका लाडला भी किसी मानसिक परव्शानी या अवसाद से तो नहीं गुजर रहा-
1. हमेशा उदास रहना और अनावश्यक तनाव लेकर आंसू बहाते रहना।
2. हमेशा माता-पिता का साथ पसंद करना और एक पल को भी उनसे दूर नहीं होना।
3. स्कूल में अपने सहपाठियों से घुल-मिल नहीं पाना और हमेशा उनसे लड़ने को उतारू रहना।
4. प्रायः उल्टी, सिरदर्द की शिकायत करना।
5. खेल, पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों से अचानक मन उचटना।
6. खान-पान की आदतों में बदलाव और कम नींद लेना।
7. अल्कोहल या ड्रग लेना या एकाएक बहुत ज्यादा वजन बढ़ना।
8. बात-बात पर गुस्सा करना और तोड़फोड़ करना।
9. दोस्तों के नए समूह में शामिल होना
मनोचिकित्सक प्रवीण दादाचांजी और अनिल ताम्बी के मुताबिक अपने बच्चे में कोई मानसिक समस्या देखें, तो इससे निजात के लिए आपको निम्न उपाय करने चाहिए-
1. बच्चों के साथ समय गुजारें- जब तक आप अपने बच्चों के साथ स्तरीय समय व्यतीत नहीं करेंगे, बच्चे को सही राह नजर नहीं आ सकती है। माता-पिता को बच्चों की समस्याएं सुननी चाहिए व उनके साथ बैठकर हल खोजना चाहिए।
2. बच्चों को प्रेरणादायी और सकारात्मक किस्से सुनाएं- आज के युग में बच्चे दिशाहीन होते जा रहे हैं। ऐसे समय में अगर उन्हें प्रेरणादायी किस्से और सकारात्मक बातें बताई जाएं, तो उनका तनाव कम होगा और वे गलत राह पर जाने से बचे रहेंगे।
3. टीवी और कम्प्यूटर गेम्स की बजाय उन्हें पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें- अगर बच्चे कम्प्यूटर की बजाय पुस्तकें पढ़ने की आदत विकसित करेंगे, तो वे अपना समय कहीं बेहतर ढंग से व्यतीत कर सकेंगे। पुस्तकें बच्चों की सबसे अच्छी मित्र साबित हो सकती हैं।
4. सामाजिक मान्यताओं के सम्मान की सीख दें- अपने बच्चों को सिखाएं कि व्यक्ति का विकास समाज में रहकर ही हो सकता है। सामाजिक मान्यताओं का आदर करना बहुत जरूरी है।
5. खुद मर्यादित व्यवहार करें- अक्सर बच्चे अपने माता-पिता को देखकर काफी कुछ सीखते हैं। अगर माता-पिता खुद अपना व्यवहार मर्यादित रखेंगे, तो बच्चों के सामने एक मिसाल कायम होगी और उनके कदम बहकने से बचेंगे।
6. रचनात्मकता को बढ़ावा दें- हर बच्चे में कुछ खास करने की इच्छा होती है। इसलिए आपको बच्चों की रचनात्मकता को विकसित करने का मौका देना चाहिए। पेंटिंग्स, लेखन और डांस से बच्चों को कुछ नया करने का मौका मिलता है और वे ज्यादा सकारात्मक बन पाते हैं।
7. एंगर मैनेजमनेंट की सीख दें- अगर बच्चे को बात-बात पर गुस्सा आता है, तो उसे गुस्सा कम करने की तकनीक बताएं। गुस्से के वक्त उसे अपनी सांस पर ध्यान देने की सलाह दें। ध्यान और योग से भी बच्चों के गुस्से को कम किया जा सकता है।
क्या कहना है स्कूल प्रिंसिपल्स और निदेशकों का
जयपुर के स्कूल के प्रिंसिपल्स और निदेशकों से जब स्कूल परिसर में बच्चों में बढ़ती हिंसा के बारव् में बातचीत की गई, तो पता लगा कि सभी को इस घटना के बारव् में पता था और इस घटना के पीछे छुपे संकेतों को भी सभी समझते थे। अधिकतर स्कूलों ने इस घटना के तुरंत बाद अध्यापकों के साथ मीटिंग की और बच्चों की भावनाओं को समझने की वकालत की। पर प्रायः स्कूलों ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी किसी ठोस कार्रवाई की बात नहीं कही।
नैतिक शिक्षा जरूरी
जैसे ही मुझे गुडगांव की हृदयविदारक घटना के बारे में पता लगा, मैंने स्कूल के अध्यापकों और बच्चों के साथ मीटिंग की और बच्चों को समझाया। मैं अध्यापकों को बच्चों को नैतिक शिक्षा देने की बात कही है।
- आर एल शर्मा, निदेशक, ब्राइट फ्यूचर सीनियर सैकण्डरी स्कूल
शिक्षक से मन की बात कहें
गुडगांव और चोरवाड़ी घटना के बाद हम बच्चों से पूछताछ कर रहे हैं कि उन्हें किसी साथी से डर तो नहीं है। हम निगाह रखते हैं कि किसी बच्चे का व्यवहार असामान्य तो नहीं है। अगर किसी बच्चे को किसी भी तरह की परव्शानी है, तो वह सीधे अपने शिक्षक से बात कर सकता है।
- बेला जोशी, प्रिंसिपल, सुबोध पब्लिक स्कूल
हर हरकत पर निगाह
आज बच्चों के दिल में जो गुबार है,उसे बाहर निकालना बहुत जरूरी है। मैं तो बच्चों के पास जाकर बच्चों जैसी हो जाती हूं। उनकी हर बात ध्यान से सुनती हूं। स्कूल में शिक्षकों को बच्चों की असंदिग्ध हरकतों पर निगाह रखने के निर्देश दिए हुए हैं। पर हर बच्चे की चैंकिंग करना नामुमकिन है।
- राज अग्रवाल, प्रिंसिपल, केन्द्रीय विद्यालय नं.1
हिदायत दी हुई है
स्कूल की हर कक्षा में कैमरे लगे हुए हैं, जिससे हम बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। अध्यापकों को बच्चों के लड़ाई-झगड़े निपटाने के भी निर्देश दे दिए हैं। बच्चों को हिदायत दी है कि अगर आप कुछ गलत चीज स्कूल में लेकर आए, तो आपको स्कूल से निकाला जा सकता है।
-मोहिनी बक्शी, प्रिंसिपल, सीडलिंग स्कूल
काउंसलिंग करवाते हैं
वैसे कोई बड़ा कदम तो नहीं उठाया है। हां, नियमित रूप से अकस्मात चैकिंग का काम चलता रहता है। इससे बच्चे किसी तरह का गलत काम करने से डरते हैं। बच्चों की काउंसलिंग का कार्यक्रम भी बढ़ा दिया है।- माला अग्निहोत्री, वाइस प्रिंसिपल, इंडिया इंटरनेशनल स्कूल
समझाइश से काम होगा
हम माता-पिता को समझा रहे हैं कि हथियारों को बच्चों की पहुंच से दूर रखें। बच्चों को भी पढ़ाई का तनाव नहीं लेने की सलाह दी है। बच्चों को हथियारों के नुकसान से भी चेताया है।
- कर्नल कौशल मिश्रा, प्रिंसिपल, महावीर दिगंबर सीनियर सैकंडरी स्कूल
आलेख- आशीष जैन

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नखरा बड़ा खाने-पीने में



बच्चों की खाने की आदतें बिगड़ रही हैं। अनाश-शनाप खाने वाले बच्चों पर एक पड़ताल।

13 साल की निखिला आनंद नोएडा के अपमार्केट पब्लिक स्कूल में पढ़ती है। निखिला जब स्कूल में प्रोअर के लिए जाती है तो अक्सर उसे चक्कर आने लगते हैं और वह बेहोश हो जाती है। डॉक्टर ने उसकी जांच की तो पाया कि उसका हीमोग्लोबिन का स्तर काफी कम है। तीर की तरह दुबली-पतली निखिला खाने के मामले में काफी ना-नुकुर करती है और खाने की मेज पर उसकी मां और उसमें हमेशा तकरार चलती रहती है। उसकी खाने की इस आदत से उसमें लौह तत्व की कमी की वजह से एनीमिया हो गया है। दूसरी तरफ 12 साल का रितिक घोष उच्च कॉलेस्ट्रोल से परेशान है और उसे अब रोजउठाकर फुटबाल खेलने की हिदायत है। रोहित का मोटापा पूरी तरह से उसके अनियमित और गलत खान-पान से जुड़ा हुआ है। रोहित सारे जंक फूड्स खाने का शौकीन है, पर उसे फल-सब्जी खाने के नाम पर काफी परेशानी होती है। खाने में उसके काफी नखरे होते हैं।सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली को शिशु और पेट रोग विशेषज्ञ नीलम मोहन के मुताबिक, 'सबसे ज्यादा परिजन इसी शिकायत के साथ हमारे पास आते हैं, कि उनका बच्चा ढंग से खाता-पीता नहीं है।

'मैक्स हेल्थकेयर, नई दिल्ली के शिशु रोग विशेषज्ञ राहुल नागपाल साफ कहते हैं, 'जितने दौलतमंद परिजन हैं, उतनी ही गंभीर समस्या बनने लगती है।' मैंने देखा है कि संपन्न घर के माता-पिता खूब खिलाने की कोशिश करते हैं, पर बच्चे उतना ही खाने-पीने से घृणा करते हैं।' इसे हमें 'गरीबी से त्रस्त अमीर बच्चे' कह सकते हैं। इस आदत के प्रभाव भारतीय बच्चों में दिखाई देने लगे हैं।

बुरे प्रभाव

नई दिल्ली स्थित पोषण विशेषज्ञ ईषी खोसला कहती हैं कि खाने में मां-बाप को परेशान करने वाले बच्चों का स्टेमिना काफी कम होता है। उनकी एकाग्रता क्षमता भी घट जाती है और बाल व त्वचा पर कुप्रभाव नजर आने लगता है। वे कहती हैं कि 11 साल की उम्र तक खाने की जो आदतें बन जाती हैं, वह ताउम्र बनी रहती है। डॉ. नागपाल कहते हैं 'अध्ययन बताते हैं कि जिन बच्चों को दिन की शुरुआत में ग्लूकोज की कमी होती है उनमें 'लर्निंग डिसऑर्डर' की संभावना बढ़ जाती है। चुन- चुनकर खाने वाले बच्चों में विटामिन और खनिजों की कमी होती है। उनका विकास भी इससे प्रभावित हो जाता है। अधिकतर मामलों में इससे 'नियोफोबिया- नए खाने से डर' की आशंका बन जाती है। अगर बचपन में बच्चों में स्वास्थ्यपरक भोजन के प्रति रुचि जागृत की जाए तो आगे भयंकर बीमारियों जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन की संभावना कम हो जाती है।इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली के शिशु- पेट रोग विशेषज्ञ अनुपम सिबल के अनुसार 'इस पूरी समस्या का जन्म बचपन से ही शुरू हो जाता है। जब बच्चे का दूध छुड़ाया जाता है, तो यह समस्या सामने आती है।'

वजह खास है

अगर बचपन में बच्चे का दूध छुड़ाने में मां कोताही बरतती है, तो आगे चलकर बच्चे के लिए खाने पीने की आदतें बिगड़ने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ माताएं अपने छोटे बच्चे को भूख से ज्यादा बहुतसी चीजें खिलाती ही जाती हैं, इस वजह से बच्चे में भोजन के प्रति घृणा पैदा होने लगती है। कुछ मांएं दूध छुड़ाने के बाद भी लगातार तरल चीजें ही बच्चों को खिलाती हैं। इस वजह से भी आगे चलकर बच्चों में तरल, आसानी से खाया जाने वाली चीजों की आदत पड़ जाती है।कुछ परिजन तो खाने के समय को मनोरंजन का समय मानते हैं और टीवी, खिलौने दे देते हैं और सोचते हैं कि इन चीजों से बहलकर बच्चा खूब खाएगा। पर होता इससे उलट है। बच्चे खाना तो खाते नहीं है बल्कि लगातार टीवी और खिलौने मांगते रहते हैं। बच्चों के दांत निकलना, गले में दर्द, बंद नाक और पेट में खराबी होने की वजह से बच्चे हमेशा खाने से नाक-मुंह सिकुड़ने लगते हैं। पर यह कुछ ही समय की समस्या रहती है। इस दौरान अगर बच्चों को जबर्दस्ती खिलाया जाता है, तो आगे चलकर समस्या बढ़ जाती है और बच्चा भोजन से दूर भागने लगता है। जो मां-बाप हर वक्त अपने बच्चों के पीछे खाने-पीने को लेकर पड़े रहते हैं, उनमें यह समस्या अधिक होती है। डॉ. नागपाल कहते हैं '90 फीसदी मामलों में जबर्दस्ती भोजन खिलाने की वजह से ही बच्चे खाने में लापरवाह हो जाते हैं।'

सहज समाधान

डॉ. सिबल के मुताबिक यह समस्या काफी आम है। परिजनों को पूरी स्थिति समझनी चाहिए और काफी धैर्य से काम लेना चाहिए। जल्दबाजी से इस परेशानी का हल नहीं ढूंढा जा सकता। काउंसलिंग इसमें मददगार साबित हो सकती है। अगर आपका बच्चा ढंग से खाता नहीं है, तो उसे भूख बढ़ाने की दवा देना सही उपाय नहीं है। खोसला समस्या को जल्द से जल्द पहचानने पर जोर देते हैं। अध्ययन बताते हैं कि खान-पान की आदतों के निर्माण का सबसे सही समय 3 साल की उम्र होता है। सबसे पहले परिजनों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यह समस्या पैदा किस वजह से हो रही है। इसके बाद परिजनों को आराम से, बिना दुखी हुए बच्चे को समझना चाहिए।खाने की मेज से जुड़े एक आधारभूत तथ्य पर अधिकतर डॉक्टर सहमत हैं कि खाना परोसने के 45 मिनिट के अंदर खाने की मेज साफ हो जानी चाहिए और फिर भोजन 3 घंटे बाद ही देना चाहिए। डॉ. नागपाल कहते हैं कि पूरे परिवार को मिलकर एक साथ भोजन करना चाहिए। अध्ययन बताते हैं कि जो बच्चे खासकर किशोरावस्था में प्रवेश करने वाले, नियमित रूप से परिवार के साथ खाना खाते हैं, उनमें फाइबर कैल्शियम, आयरन और दूसरे जरू री विटामिनों की कमी नहीं होती। अगर बच्चा कम मात्रा में भोजन करता है, तो परिजनों को उसी मात्रा में भोजन के जरूरी तत्वों के समावेश की कोशिश करनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर बच्चा सिर्फ एक रोटी खाता है तो गेहूं के आटे की जगह उसे सोया या बेसन के आटे की रोटी खाने को दें और इसमें सब्जियां भर दें।

क्या करें-

माता- पिता को बच्चों के सामने खान-पान के मामले में बुराई करने की बजाय खुद का आदर्श स्थापित करना चाहिए। नियमित परिवार के भोजन की योजना तैयार करनी चाहिए।

- अगर आप खुद खूब फल-सब्जी और चपातियां खाते हैं, तो बच्चा भी आपसे सीखकर खाना खाएगा। खाना खाते वक्त टीवी ना देखें।

भोजन को आकर्षक बनाकर पेश करें। जिस खाने को बच्चा बहुत पसंद करता है, उसमें पौष्टिक और कम पसंद करने वाली चीजों का मेल करके भोजन में पेश करें।

- भोजन बनाने, खरीदने में बच्चे को भी शामिल करें। उससे खाने की लिस्ट बनाएं और अलग-अलग ढंग से सब्जियां जैसे- लाल (टमाटर), हरा (मटर), नारंगी (गाजर), पीला (मक्का) चुनने को कहें।- कभी भी भोजन को पुरस्कार या दण्ड के तौर पर न दें।

ऐसा न कहें 'अपनी गाजर खाओ, तभी आइसक्रीम मिलेगी।'

- सब्जियों को सूप, रोटी, मसाला डोसा, चावल, नूडल्स, पास्ता, मैदा, सलाद, चटनीऔर सॉस के साथ मिलाकर पेश करें।

- उसे हाथों से खाने के लिए प्रेरित करें।

- बच्चों को बच्चों या उसके दोस्तों के साथ खाना खिलाएं।

- दूध और ज्यूस ज्यादा ना दें।

- भोजन का समय नियमित रखें। बच्चे के भोजन में उसकी पसंदीदा चीजें भी परोसते रहें।

- अगर कुछ खास चीजें उसे पसंद नहीं है, तो उसके एवज में उतनी ही मात्रा के दूसरे पोषक तत्व दें। सारे डॉक्टर्स और न्यूट्रीशियन्स खान-पान की समस्याओं से ग्रस्त बच्चों के लिए अभिभावकों को रचनात्मक तरीके से भोजन को पेश करने की वकालत करते हैं।

खान-पान की समस्या से ग्रस्त बच्चों की समस्या सुलझाने के लिए इंटरनेट पर कुछ किताबें भी मौजूद हैं-1. आई विल नेवर नॉट एवर ईट ए टमाटो लेखक- लॉरेन चाइल्ड

2. फूसी ईटर्स रेसिपी बुक लेखक- अन्नाबेल करमेल

3. वन बाइट वॉन्ट फिल यू लेखक- एन्न हॉड्जमैन एंड रोज चास्ट

4. प्रीटेंड सूप एंड अदर रियल रेसिपील लेखक- मोली काटजेन एंड एल एल हेंडरसन।

-आशीष जैन

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01 November 2008

क्या खूब याददाश्त है...



बच्चो जिस तरह शरीर के लिए एक्सरसाइज करना जरूरी है उसी तरह आपको अपने दिमाग को तंदुरुस्त बनाने के लिए भी व्यायाम की जरूरत है। अगर आपका दिमाग तेज होगा, तो आपके मार्क्स अच्छे आएंगे। आपकी हर जगह तारीफ होगी। आपको चीजें ढूंढ़ने में परेशानी नहीं होगी और ना जाने कितने फायदे छिपे हैं, इस याददाश्त में। पेश हैं याददाश्त की कुछ मजेदार एक्सरसाइज-

1. हर रोज किसी एक चीज को या व्यक्ति को देखें। उसे दिमाग में अच्छी तरह बिठा लें। सप्ताह के अंत में याद की गई सातों चीजों को एक कागज पर लिखें। इससे आपका दिमाग विकसित होगा।

2. खाने की टेबल पर जो चीजें रखी हैं, उन्हें बिना देखे सिर्फ सूंघकर या चखकर पहचानें। फिर अपनी मम्मी से पूछें कि क्या आप सही बता रहे हो।

3. जब भी आप फोन अटेंड करें, तो सामने वाले को बिना नाम के पहचानने की कोशिश करें।

4. जब भी किसी रेस्टोरेंट में जाएं, तो मीनू में शामिल चीजों और उनकी कीमतों को याद करने की कोशिश करें।

5. जब आप अपनी अलमारी खोलें, तो याद रखें कि कौनसा सामान कहां रखा है। अगली बार अलमारी में बिना देखे चीजों का अनुमान लगाएं।

6. जब भी मम्मी आपको कुछ खरीदने बाहर जाएं, तो बिना लिस्ट बनाए, खरीदारी का सामान याद करें। बच्चो, बिना कम्प्यूटर और कैलकुलेटर के रुपयों का हिसाब रखें।

7. अपने सभी दोस्तों के फोन नंबर कागज पर लिखने की कोशिश करें।

8. अपने घर के सदस्यों, रिश्तेदारों व दोस्तों के जन्मदिन की लिस्ट बनाएं।

9. किसी कमरे में घुसते ही गिनें कि दाईं और बाईं तरफ कितने आदमी हैं।

10. क्रॉसवर्ड पहेली रोज हल करें।


बच्चो, आप सबको स्कूल में, घर में, होमवर्क में न जाने क्या-क्या याद रखना पड़ता है। कभी-कभी लाख कोशिशों के बाद भी कुछ याद नहीं रह पाता। हम इस बार कुछ ऐसे टिप्स लेकर आए हैं, जो आपकी याददाश्त को दुरुस्त करेंगे और इससे आप हमेशा पढ़ाई में अव्वल रहेंगे। बच्चो संस्कृत में एक सुभाषित है-

काग चेष्टा, बको ध्यानम्‌,

श्वान निद्रा तथैव च

अल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंचलक्षणम्‌।

इसका मतलब है विद्यार्थियों में पांच गुण होने चाहिए। सबसे पहले हमें इन गुणों को समझना है। काग या कौए की तरह प्रयास करें। बको यानी बगुले की तरह एकाग्रता रखें, कुत्ते की तरह चौकन्नी नींद हो, खाना सीमित हो और सुख-सुविधाओं का भोगी न हो।

- पढ़ाई के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें।

- संतुलित भोजन करें। भोजन सुपाच्य हो।

- खाली पेट कभी न रहें। अधिक भूख से सिरदर्द रहता है व कुछ याद नहीं होता।

- तली हुई, चटपटी चीजें कम से कम खाएं।

- देर रात तक न पढ़ें।

- हमेशा 8 घंटे की नींद अवश्य लें।

- खाना खाने के तुरंत बाद पढ़ाई के लिए न बैठें।

- सुबह-शाम सैर पर जरूर जाएं।

- गुस्सा कम करें, खुश रहें।

- किसी भी विषय को थोड़े-थोड़े अंतराल में पढ़ें।

- लिखकर, बोलकर, पढ़कर सभी तरीकों से याद करने की कोशिश करें।

- जिस भी विषय को याद करें, पूरी रुचि के साथ करें।

- याद करते समय, पहले याद की गई चीजों से उन चीजों को जोड़ते जाएं। मस्तिष्क में एक विचार से दूसरा विचार जुड़ता है तभी याददाश्त बनती है।

- पढ़ाई का एक समय तय कर लें, ताकि उस समय आपका मस्तिष्क पहले से कहीं तेजी से काम करें।

मस्तिष्क के दो भाग होते हैं-दायां और बायांदायां मस्तिष्क शरीर के बाएं अंगों के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।बायां मस्तिष्क शरीर के दाएं अंगों के संचालन में अहम है।

- बायां मस्तिष्क कल्पनाशील होता है। यह विचारों को मनमाने ढंग से चित्र व रंगों की मदद से याद रखता है। बायां मस्तिष्क तर्क को स्थान देता है। अच्छी याददाश्त के लिए दाएं व बाएं मस्तिष्क का सही समन्वय होना जरूरी है।

- इजिप्ट के बादशाह नासर के पास 20 हजार गुलाम थे। यह माना जाता है कि नासर को इन सभी गुलामों के नाम, जन्म स्थान, जाति, आयु और उन्हें पकड़े जाने की तारीख याद थी। नासर को उन गुलामों के बारे में यहां तक याद था कि किस गुलाम को कहां से खरीदा गया है।

- शतरंज जादूगर अमरीकन खिलाड़ी हैरी नेल्सन एक साथ बीस खिलाड़ियों की चालें याद रख सकते थे।

- डेनमार्क के एक बैंक में आग लग जाने पर ग्राहकों के बही-खाते और उनकी जानकारियां जब जल गईं, तो बैंक के ही एक क्लर्क ने 3000 ग्राहकों के नाम, पते और जमा धनराशि सही-सही बता दी।

- बि्रटिश संग्रहालय के अध्यक्ष रिचर्ड मारग्रेट कुर्सी पर बैठे-बैठे संग्रहालय की लाखों पुस्तकों के नाम, प्रकाशकों के पते और उनकी विषय वस्तु तक याद रखते थे।


-आशीष जैन

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असली परीक्षा तो माता-पिता की है




क्या इन दिनों आपके घर का माहौल बदला हुआ है? बच्चों की परीक्षा ने आपको टेंशन में डाल दिया है। बच्चे क्या पढ़ें, कैसे पढ़ें, क्या खाएं, क्या पिएं, कब सोएं, कब जागें- ढेरों सवाल आपके दिमाग में भी घूमते रहते हैं। घूमने भी चाहिए। अरे भई! आप बच्चों के माता-पिता जो हैं। इन दिनों आपके बच्चे ही इम्तहान नहीं दे रहे, बल्कि आप भी परीक्षा दे रहे हैं जनाब!

मधु, निशा, अनन्या और माधुरी शाम के समय बतिया रही थी। चारों के बच्चों के एग्जाम चल रहे हैं। चारों इन दिनों अपने बच्चों को लेकर काफी पशोपेश में हैं। सब अपना-अपना दुखड़ा एक-दूसरे को सुनाने लगती हैं। मधु कहती है, 'मेरी बेटी ने तो इन दिनों खाना-पीना बिल्कुल छोड़ दिया है।' इस पर माधुरी बोलती है, 'मेरा बेटा रोहित तो हमेशा टेंशन में रहता है कि अच्छे नंबर आएंगे भी या नहीं।' अनन्या की अलग ही परेशानी है। उसका बेटा इन दिनों ठीक से सो ही नहीं पा रहा है। निशा कहती है, 'मेरी बिटिया तो चौबीसों घंटे किताबों के चिपकी रहती है, ना हंसती है, ना बात करती है।' चारों सोचती हैं कि हमें बच्चों को किसी डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। चारों सहेलियां अपने बच्चों की समस्याएं आपस में बांट ही रही थी कि उनकी डॉक्टर सहेली हेमलता आती है और उनकी बातों में शामिल हो जाती है। उनकी बातें सुनकर हेमलता कहती है, 'तुम यूं ही घबराती हो। बच्चों में एग्जाम के दिनों में ये समस्याएं आ सकती हैं। डॉ. के पास जाने के बजाय तुम्हें ही कुछ करना चाहिए। तुम्हें समझना चाहिए कि अब बच्चों की परीक्षा के साथ-साथ तुम्हारी भी परीक्षा है।
जी हां, हेमलता सही कह रही हैं। एग्जाम के दिनों में सभी मांओं की हालत इन चार सहेलियों जैसी हो जाती है। पर परीक्षा की इस घड़ी को सिर्फ अपने बच्चों की परीक्षा ना समझें, यह समय आपके लिए भी किसी परीक्षा से कम नहीं है। बच्चों की एग्जाम की टेंशन को थोड़ी सी समझदारी से सुलझाया जा सकता है।

माता-पिता ही सर्वश्रेष्ठ काउंसलर
एनसीईआरटी से ट्रेनिंग प्राप्त काउंसलर गीतांजलि कुमार का कहना है, 'परीक्षा के दिनों में एक बच्चे के लिए माता-पिता ही सबसे अच्छे काउंसलर साबित हो सकते हैं। मां-पिता बच्चे को नजदीक से जानते हैं और उसकी भावनाओं को अच्छे से समझ सकते हैं। अगर बच्चे को कोई भी परेशानी महसूस हो, तो माता-पिता को खुद आगे होकर बच्चों से बात करनी चाहिए।' माता-पिता को बच्चों के सामने एक दोस्त की भूमिका निभानी होगी, तभी बच्चे एग्जाम के डर के बारे में उनसे बातचीत कर पाएंगे। माता-पिता को बच्चे को यकीन दिलाना चाहिए कि परीक्षाएं जीवन-मरण का प्रश्न नहीं हैं। बच्चों में भरोसा पैदा करने के लिए उन्हें याद दिलाना चाहिए कि उन्होंने पूरी साल पढ़ाई की है और अब एग्जाम भी अच्छे ही होंगे। साइकेट्रिस्ट डॉ. रेशमा अग्रवाल का मानना है, 'परीक्षा के दिनों में अगर पूरा परिवार बच्चे के साथ रहेगा, तो उसे रिलेक्स महसूस होगा और उसमें एंग्जाइटी भी पैदा नहीं होगी।'

नाक का सवाल नहीं
चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. अंजलि मुखर्जी का कहना है, 'माता-पिता को अपने बच्चे की एग्जाम को नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए।' बच्चे पर कभी प्रेशर ना बनाएं कि फलां से ज्यादा नंबर आने चाहिए या फलां का पेपर तो बहुत अच्छा हुआ है। पेपर देने के बाद अपने बच्चे से यह कभी नहीं पूछें कि कितने नम्बर आएंगे? बच्चा अगर अपने दोस्त के साथ पढ़ाई करने जाता है, तो उस पर शक न करें। करियर, सोसाइटी, नौकरी की बातों को अच्छे नंबर्स के साथ जोडक़र पेश न करें। बच्चों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उन्हें बताएं, 'अभी तो बहुत समय है। तुम, कर सकते हो।' बच्चों को अपनी पढ़ाई और एग्जाम के अच्छे अनुभवों के किस्से सुनाएं। इससे बच्चों को लगेगा कि मम्मी-पापा ने भी तो एग्जाम दी है। वे सही ही सलाह दे रहे हैं। एग्जाम के दिनों में बच्चों को कभी पढ़ाई के विषय में अपमानित न करें। बच्चों में असुरक्षा की भावना को पनपने की बजाय उनकी हर बात को ध्यान और धैर्य से सुनें। माता-पिता को बच्चों को एग्जाम के दिनों में गहरी सांस लेने व छोडऩे की सलाह देनी चाहिए। सबसे सही और उपयुक्त बात तो यही है कि बच्चों को आप पर पूरा यकीन हो जाए और वे कहने लगें, 'मुझे कोई टेंशन कैसे हो सकती है, मेरे मम्मी-पापा मेरे साथ जो हैं।' तभी आप भी इस एग्जाम में पास माने जाएंगे।

तैयार रहें आप भी
परीक्षा के दिनों में माता-पिता को बच्चे की दिनचर्या सामान्य बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। काउंसलर बिंदु प्रसाद कहते हैं, 'एग्जाम के दिनों में अपने बच्चों को समझाएं, कि वे अपनी नियमित दिनचर्या में कतई फेर-बदल न करें। सामान्य दिनों की तरह ही हल्का-फुल्का समय मनोरंजन के लिए भी निकालें।' माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों का स्टडी रूम व्यवस्थित रूप से जमा दें। एग्जाम हॉल में ले जाने वाली जरूरी चीजों को नियत स्थान पर रखें। माता-पिता को चाहिए, एग्जाम के दिनों में बच्चा साफ कपड़े पहने, ताकि उसका तन-मन अच्छा रहे और पढ़ाई ध्यान से कर पाएं। पढ़ाई की जगह हवादार हो और कमरे में में पर्याप्त रोशनी हो। परीक्षाओं के दिनों में मम्मी-पापा को भी टीवी कम ही देखना चाहिए, ताकि उनके बच्चों का ध्यान ना भटके।
डाइट कंसलटेंट आरती शाह का मानना है कि परीक्षा के दिनों में बच्चों को आयरन और प्रोटीन से भरपूर भोजन खिलाना चाहिए। बच्चों को वसा युक्त, तला-भुना और गरिष्ठ भोजन नहीं दें। साथ ही माता-पिता को यह भी ख्याल रखना चाहिए कि बच्चे को लगातार और थोड़ा-बहुत खाने को देते रहें। ज्यूस और ठंडा पानी भी पिलाते रहना चाहिए। द्गयूस में अगर थोड़ा नमक मिलाकर देंगे, तो बच्चों के शरीर में नमक की कमी भी नहीं होगी। सबसे जरूरी बात है कि एग्जाम के दिनों में बच्चों को याददाश्त बढ़ाने वाली दवाइयां कतई न दें। बच्चों को खुद पर विश्वास बनाए रखने की सलाह दें। बच्चों को देर रात तक पढ़ाई की राय देने से भी बचें। हां! सुबह जल्दी जगाकर उन्हें कुछ देर टहलने को कहें और फिर पढ़ाई की बातें करें। उनके कोर्स को और पेपर पैटर्न को आप भी समझने की कोशिश करें। अगर बच्चे के मन में परीक्षाओं से संबंधित कोई सवाल है, तो उसे टालें नहीं, उसका सही जवाब दें।
-आशीष जैन

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24 October 2008

आई है दिवाली

आज समय किसी के पास नहीं है। तो हाइटेक जमाने में दीपावली पूजन के लिए पंडितजी को खोजने की भी जरूरत नहीं।

महानगर में एक पंडितजी है दीनानाथ जी। अब भई दीपावली का समय है तो श्रेष्ठ चौघड़ियों के हिसाब से हर कोई फटाफट और सटीक समय पर दीनानाथजी को अपने साथ ले जाना चाहता है। दीनानाथजी भी चाहते हैं कि हर यजमान की इच्छा पूरी हो। समझ में नहीं आ रहा, कैसे इस समस्या से निजात पाएं। इसके लिए काम आया केबल नेटवर्क। केबल नेटवर्क की मदद से दीनानाथजी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग की और सारव् यजमान उनके बताए अनुसार उपयुक्त मुहूर्त में पूजा का मार्गदर्शन लेते रहे। पंडितजी के बताए अनुसार मंत्र पढ़ते लोग खुशी-खुशी महालक्ष्मी की आराधना करते रहे।

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बदलते समय और लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर अब बाजार में दीपावली पूजन का ऑडियो कैसेट भी मिल रहा है। इन कैसेटों में पूजा के मंत्र और विधान दोनों हैं। कई कैसेटों के साथ तो पूजन सामग्री भी मिल रही है। बाजार में इस तरह की थाली उपलब्ध है, जिन्हें तुरंत खरीदें और पूजा करना शुरू कर दें। इस थाली को गेरू,चंदन, गोटा-सितारव् और कोैड़ियों से सजाया गया है और इसमें लक्ष्मी-गणेश, दीपक, लौंग, कपूर, खील-बताशे, रोली, मौली सब कुछ मौजूद हैं।
अब तो बाजार में बहीखाते के विकल्प के रूप में बोनचाइना की खिलौनानुमा किताब भी मिलने लगी है। इसमें एक पेज पर गणपति बने हैं, तो दूसरे पर लक्ष्मीजी के मंत्र। इस तरह देखा जाए, तो पूरा बाजार ही आपकी सुविधा के लिए तैयार खड़ा है।
-आशीष जैन

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22 October 2008

सबको राम-राम राम।



आई है दिवाली आई है दिवाली
आंख में पानी, दिल है खाली।

दुनिया में हडकंप मचा है
लक्ष्मी रूठी कैसी सजा है।

बैंक हुई कंगाल हैं
बड़े-बड़े बदहाल हैं।

भारत में है राज का राज
भाषा में हो मराठी का साज।

दीए नहीं अब दिल जलते हैं
देशभक्त अब हाथ मलते हैं।

आई है दिवाली आई है दिवाली
देश-उपवन का खो गया माली।

चंद्रयान आगे बढ़ रहा
खाने को निवाला नहीं रहा।

मन को रोशन कैसे करें अब
उम्मीदों का तेल घट रहा अब।

चारों ओर चुनाव हैं
बातों का सैलाब है।

आई है दिवाली आई है दिवाली
असली माल लगता है जाली।

हर घर हर मन हर लौ रहे चमकती
ना हों कहीं आहें सिसकती।

रहे उजाला चारो ओर
चाहे अमावस हो या भोर।

दिल में सच्ची खुशी बसी हो
मुट्ठी में उम्मीद कसी हो।

आई है दिवाली आई है दिवाली
तन-मन-धन की भागे कंगाली।
-आशीष जैन

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07 October 2008

हौसलों के पंख सपनों की उड़ान

ग्रामीण महिलाएं ले रही हैं छोटे-छोटे ऋण और संवार रही हैं अपना हुनर।
चारों ओर धूल-मिट्टी के गुबार हैं, पर चेहरे पर हौसलों की मुस्कान साफ नजर आती है। मुश्किलें लाखों हैं, पर मंजिल पाने का यकीन है। हर तरफ आत्मविश्वास और खुशियों की यह बयार आई है महिलाओं को मिलने वाले ऋण से। अब महिलाएं अपने हुनर को आसानी से पेशा बना सकती हैं। चाहे कशीदाकारी हो, मिट्टी के बर्तन बनाना या दूध बेचने के लिए चाहिए भैंस, हर उस चीज के लिए ऋण मिलेगा, जिससे आप हुनर को बढ़ाना चाहती हों। पहले जिस महिला को पति ने छोड़ दिया, उसी महिला ने जब खुद का काम शुरू किया तो पति उससे मिन्नतें कर रहा है कि वह उसके साथ रहना चाहता है। यह है करामात महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता की। इस अभियान में महिलाओं के लिए वरदान साबित हुआ है एसकेएस माइक्रो फाइनेंस। आज ये महिलाएं अपने कौशल को बाजार में बेचने में माहिर हैं और अपने काम को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।

खुशहाली है चहुंओर
बात करते हैं ज्ञानादेवी से। कशीदे का काम सीखा, तो लगा कि खुद ही क्यों न कपड़ों पर कशीदाकारी कर बाजार में सप्लाई करव्। एसकेएस से 8 हजार का ऋण लिया और कशीदे की मशीन खरीद ली। अगले 4 हजार रुपयों से कपड़ा खरीदा और फिर बाजार में कशीदा कढ़ा हुआ कपड़ा सप्लाई करने लगी। पति का भी पूरा साथ मिला। आज ज्ञानादेवी के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने जाते हैं। पूरा परिवार इस बात से बेहद खुश है कि पति-पत्नी मिलकर कमा रहे हैं और अपने परिवार को खुशहाली की राह पर ले जा रहे हैं। शुरू में उन्हें लगा था कि कैसे मैं खुद का काम करूंगी, पैसा कैसे चुकाऊंगी। पर धीरव्-धीरव् आत्मविश्वास बढ़ा और आज वह अपने काम को और बढ़ाने की सोच रही हैं।

बड़ा अच्छा लगता है
आज से तीन साल पहले विमला देवी ने 8 हजार रुपए का ऋण लिया और उन पैसों से कपड़े खरीदकर गांव-ढाणियों में बेचने लगीं। पहले पति की पान की दुकान थी, पर अब वह बंद हो गई। अब विमला ही पूरे घर की जिम्मेदारियां निभाती है। खुद के बूते काम कर रही हैं, तो सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। अब वे अपने जैसी महिलाओं को जागरूक करके आत्मनिर्भर बनने का सबक देती हैं। घर पर पोते-पोतियों के बीच घिरी रहने वाली विमला बाजार में एक समझदार दुकानदार की भूमिका बखूबी निभा रही हैं।

औरों को भी काम
जरदोजी का काम मंजु को उसके पति ने सिखाया। पहले पति यह काम किया करते थे। एक हादसे में उनकी उंगली कट गई। फिर परिवार की जिम्मेदारी मंजु ने संभाल ली और एसकेएस से ऋण लेकर बाजार में सप्लाई शुरू कर दी। अब तो उसने अपने बढ़ते काम को देखकर लोगों से भी काम करवाना शुरू कर दिया है। पहले खुद सक्षम हुईं, अब आस-पास के लोगों को रोजगार मुहैया करा रही हैं।

खुद का पैसा ही भला
मोहिनी देवी ने अपनी सास से गर्मी में हाथ से झलने वाला पंखा बनाना सीखा था। खजूर के पेड़ की पत्तियों से बनने वाले पंखों के लिए पहले साहूकार से पैसा लेना पड़ता था। पैसों को लेकर उस पर दबाव बना रहता था। ऐसे में लगा कि अगर खुद ही कहीं से पैसों का इंतजाम कर लें, तो कितना अच्छा हो। एसकेएस की योजना ठीक लगी। अब खुद पंखा बनाकर सप्लाई करती हूं, तो बचत भी ज्यादा होती है।

बड़ा आकाश- सबका साथ
विक्रम अकूला ने एसकेएस माइक्रो फाइनेंस की स्थापना इसी मकसद से की थी कि दूर-दराज गांवों की वे महिलाएं जो न तो द्गयादा पढ़ी-लिखी हैं और न ही बाहरी दुनिया से परिचित, उन्हें रोजगार के लिए पैसे की कमी आड़े नहीं आए। इसलिए वे सिर्फ महिलाओं को ऋण देते हैं और वह भी बिना किसी कागजी कार्रवाई और गारंटर के। अगर महिला गरीब है, तो अपने आस-पड़ोस की पांच महिलाओं के साथ मिलकर ऋण ले सकती है। एक साल में दो हजार से शुरू कर 16 हजार रुपए तक लिए जा सकते हैं। जिस भी महिला में कमाने की चाह है, अब उसे सिर्फ ऋण लेना है और शुरू कर देना है अपना काम। ऋण लौटाना भी है बहुत आसान। हर हफ्ते होने वाली महिलाओं की मीटिंग में आसान सी रकम देते जाइए और 50 हफ्तों में पूरी रकम अदायगी। आज एसकेएस 17 से ज्यादा राज्यों में काम कर रहा है। राजस्थान में इसकी शुरुआत जुलाई 2006 में हुई और आज 18 जिलों के 1460 गांवों में हजारों महिलाओं का भविष्य संवारने में मदद कर रहा है। महिलाओं को ऋण देने के लिए जो लोग यहां काम कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर लोग गांव और इन्हीं महिलाओं के परिवारों से हैं।
-आशीष जैन

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06 October 2008

उजाला जिंदगी में


अलवर की दलित महिलाएं अमरीका के मशहूर स्टैच्यू आफ लिबर्टी के नीचे खुशी की इजहार करते हुए।



अंधेरी रात में जिस तरह एक नन्हा सा सितारा आसमान को रोशनी से लबरेज कर देता है। उसी तर्ज पर राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की मैला ढोने वाली महिलाओं ने भी अब इस कुप्रथा को छोड़कर अपनी जिंदगी को खुशियों से लबरेज कर लिया है।
कुछ लोग जिंदगी में सब कुछ सह लेते हैं जबकि कुछ बदलाव का बीड़ा उठाते हैं। उन्हीं में शुमार हैं राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की मैला ढोने वाली दलित महिलाएं। आज वे सदियों पुरानी बेड़ियों को उतारकर फैंक चुकी हैं और अपनी आगे की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए जुटी हैं। उनके सूने जीवन में रोशनी की किरण लेकर आई सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन की 'नई दिशा'। 'नई दिशा' ने सही मायनों में इन दलित महिलाओं के जीवन को नई दिशा दी है।
'नई दिशा' से जुड़कर ये महिलाएं आत्मनिर्भर बनने के लिए सिलाई, कढ़ाई, फूड प्रोसेसिंग, ब्यूटी केयर, सॉफ्ट टॉयज और बत्तियां बनाने का प्रशिक्षण ले रही हैं। नई दिशा ट्रेनिंग कम प्रोडक्शन सेंटर से इन महिलाओं की ओर से तैयार सामान गुड़गांव, अलवर और तिजारा के बाजारों में जाता है। इसके अलावा दिल्ली से आयात किए कपड़े आते हैं, जिन पर ये महिलाएं कढ़ाई का काम करती हैं। यह सामान विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। संस्था इन महिलाओं को 2 हजार रुपए मासिक भत्ता भी देती है।


गुमनामी से रैंप तक का सफर
हाल ही न्यूयार्क स्थित जनरल एसेंबली में दो जुलाई को आयोजित कैटवॉक में अलवर की इन दलित महिलाओं को शामिल होने का अवसर मिला। वहां 36 महिलाओं के समूह में से 11 महिलाओं ने भारत के मशहूर मॉडलों के साथ रैंप पर कदम से कदम मिलाते हुए कैटवॉक किया। इस आयोजन की तैयारी इन महिलाओं ने काफी पहले से शुरू कर दी थी। कैटवॉक के दौरान पहनी कारीगरी की गई बॉर्डर की नीली साड़ियां माइकल जैक्सन के कपड़े डिजाइन करने वाले फैशन डिजाइनर अब्दुल हल्दार की देखरेख में तैयार किए गए।



होंगे कामयाब एक दिन
न्यूयार्क में अपनी सफलता का परचम लहराकर दुनिया में भारत का नाम रोशन करने वाली ये महिलाएं वहां से लौटने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज हैं और भविष्य संवारने के मकसद से उन्होंने अपने-अपने हुनर के दम पर काम को आगे बढ़ाने की ठान ली है।

हमने कर दिखाया
अब हम सभी अपना अलग व्यवसाय खोलना चाहती हैं। ब्यूटी केयर का प्रशिक्षण लेने के बाद मैं भी अपनी अन्य बहनों के साथ मिलकर अपना ब्यूटी पार्लर खोलना चाहती हूं। प्रेसीडेंट के पद पर होने के नाते मैला ढोकर जीवन बिताने वाली देशभर की अन्य महिलाओं को इस घृणित कार्य से मुक्ति दिलाने का प्रयास करूंगी।
- उषा चौमर, प्रेसीडेंट, सुलभ इंटरनेशनल मिशन फाउंडेशन, अलवर



सिलाई और कढ़ाई से लेकर साड़ियों और सूट पर सितारे सजाने का काम मुझे अच्छा लगता है। अब मैं अपना बुटिक खोलना चाहती हूं। किसी नए काम को शुरू करने में परेशानी तो आएगी, पर हम भी पूरी तरह से तैयार हैं।
- लक्ष्मी नंदा, अलवर

सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक से बातचीत के कुछ अंश-
- आपको इन दलित महिलाओं को मैला ढोने जैसी कुप्रथा से छुटकारा दिलाने की प्रेरणा कहां से मिली?
यह तो गांधीजी का सपना था। हमने तो बस प्रयास किए हैं। कुछ समय पहले अलवर जाना हुआ, वहां कुछ महिलाओं को सिर पर मैला ले जाते हुए देख बहुत दुख हुआ। उनसे बात करने की कोशिश की, तो शुरुआत में कोई भी तैयार नहीं हुई। सबने चेहरे पर लंबा घूंघट डाला हुआ था। काफी समझाने पर इनमें से एक बात करने के लिए तैयार हुई।



-पर क्या अपने काम को छोड़ देने के लिए वे सहजता से तैयार हो गई?
जब इस काम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्वीकारा कि यह काम गंदा और अपमानजनक है। लेकिन काम नहीं किया, तो खाएंगे क्या? इस पर हमने कहा कि खाना हम देंगे, तुम काम छोड़ दो। काफी समझाने पर सब तैयार हो गईं।



- इसके बाद आपका अगला कदम क्या रहा?
इन महिलाओं के लिए अलवर शहर में ही सुलभ इंटरनेशनल की ओर से संचालित 'नई दिशा' नामक सेंटर खोला गया। शुरुआत में तीन महीनों तक नकद राशि दी गई और साथ में इनको शिक्षित करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इन्हें संस्था में ही सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी केयर, अचार, पापड़ आदि का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।



भविष्य के लिए क्या योजनाएं हैं?
इनके समूह में तीन तरह की महिलाएं हैं। पहली वे, जिनमें नेतृत्व की क्षमता है। ऐसी महिलाएं भविष्य में अपना कामकाज ठीक से संभाल लेंगी। दूसरी ऐसी महिलाएं हैं, जो नौकरी कर सकने योग्य हैं। इन महिलाओं को उनकी रुचि के अनुसार अन्य जगहों पर बतौर प्रशिक्षण नौकरी के लिए भेजा जाएगा, जिसका खर्चा सुलभ वहन करेगा। तीसरी वे महिलाएं हैं, जो केवल सामान तैयार कर सकती हैं, लेकिन बेच नहीं सकतीं। इनके लिए सामान बेचने के लिए मार्केटिंग आदि की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ ही दलित परिवारों के बच्चों के लिए 1 अप्रेल 2009 तक स्कूल की योजना है और पतियों को रुचि के आधार पर ड्राइविंग, बिजली आदि प्रशिक्षण दिए जाने हैं।


...और एक नया कदम
केंद्र सरकार के एक आकलन के मुताबिक भारत में 3.42 लाख लोग सिर पर मैला ढोने के काम से जुड़े हुए हैं। इनके लिए सन्‌ 2007 में सरकार ने प्रधानमंत्री स्वच्छकार पुनर्वास एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम को राजस्थान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति वित्त एवं विकास निगम संचालित करता है। अलवर में 'सुलभ इंटरनेशनल' के 'नई दिशा' कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए निगम ने टोंक में भी 190 महिलाओं को स्वरोजगार प्रशिक्षण देने का जिम्मा सुलभ इंटरनेशनल को सौंपा। निगम की महाप्रबंधक शुचि शर्मा के मुताबिक राजस्थान में पुनर्वासित करने योग्य हथ सफाईकर्मी लगभग 1326 हैं। मार्च, 2009 तक इन सभी को पुनर्वासित करने की योजना है। निगम हथसफाई कर्मियों को मैला ढोने का काम छोड़कर दूसरा काम शुरू करने के लिए ऋण भी देता है।
अलवर की तर्ज पर सुलभ इंटरनेशनल ने टोंक में वहां के मशहूर नमदों के निर्माण, आरी-तारी साड़ियां और सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण देना शुरू किया। सुलभ इंटरनेशनल की सलाहकार सुमन चाहर के मुताबिक कई टीमों ने उन लोगों की काउंसलिंग की। उन्हें मैला ढोने के काम को छोड़ने के लिए तैयार किया। आज वे खुद अपने पैरों पर खड़ी हैं और कमा रही हैं। टोंक के 'नई दिशा' सेंटर पर साक्षरता कार्यक्रम, साफ-सफाई, टीकाकरण और बैंकिंग के बारे में जानकारी दी जाती है। सुबह 9 बजे से 4 बजे तक प्रशिक्षण दिया जाता है। यह एक साल का प्रशिक्षण कार्यक्रम है। इस दौरान उन्हें एक हजार रुपए प्रतिमाह भत्ता भी दिया जाता है। कमाई की बचत के गुर भी सिखाए जाते हैं। समय-समय पर महिला उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। इन लोगों की मॉनिटरिंग भी की जाती है कि परिस्थितिवश ये दुबारा मैला ढोने के काम से तो नहीं जुड़ गई हैं।

मेरा नाम- मेरा काम
मैंने 'नई दिशा' में आरी-तारी और कशीदे का काम सीखा है। पहले मुझे घबराहट होती थी कि कैसे इस नए काम को सीख पाऊंगी। पर अब सारा काम मैं बहुत सफाई से करती हूं। अभी मुझे 6 माह का ही समय हुआ है, पर अब लगता है कि खुद के बूते कुछ कर रही हूं। अब तो घर वाले भी साथ देते हैं। सेंटर पर काम का ऑर्डर आता है, इससे आय में भी इजाफा हो रहा है।
- सुनीता, उम्र 27 वर्ष, टोंक



मैंने नई दिशा से सिलाई का काम सीखा है। इसकी बदौलत अपने तीन बच्चों को पाल रही हूं। अब मैं वापस उस घृणित काम को करना नहीं चाहती। समाज में महिलाओं की स्थिति बदल रही है। ऐसे में हमें मौका मिला है, तो हम भी बता देना चाहते हैं कि हम किसी से कम नहीं। अब हमारे काम को लेकर कोई हमसे घृणा नहीं कर सकता।
- उगंता, उम्र 32 वर्ष, टोंक




-आशीष जैन के साथ अलवर से ऋचा माथुर

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03 October 2008

गांधी बाबा क्या कहते हो



जबसे जाना तुझको बाबा

सपनों से तुम लगते हो।


गांधी बाबा आज का भारत देखके

क्या कहते हो... क्या कहते हो।


बम फट गया... कोई लूट गया...गांधी तेरे देश में।

चारों ओर लुटेरे बैठे हैंसाधुओं के भेष में।


भय, भुखमरी, भ्रष्टाचार

क्या हैं इन पर तेरे विचार।


ना कोई अब सोच है

सिर्फ बचा अब जोश है ।


कोई नहीं है तेरा साथी

सब पूछें अब मजहब और जाति।


आरक्षण की हवा आ रही

सबको लगता नई दवा आ रही।


सत्य, अहिंसा बकवास है

दौलत की बस आस है।


सिद्धांत सब झूठे हैं।

गांधी से सब रूठे हैं।


गांधी बाबा... गांधी बाबा

क्या कहते अब बोलो।


एक अकेले तुम थे गांधी

लाए थे भारत में आंधी।


आज चाहिए सौ-सौ गांधी

तभी हो सकेगा सपना पूरा।


गांधी बाबा वापस आओ

नई राह फिर-फिर बतलाओ।


देश प्रेम की बयार फैलती जाए

तभी गांधी का जन्मदिन याद आए।


-आशीष जैन

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01 October 2008

स्वाद से हुआ नाम रोशन


मिलिए 65 हजार रेसिपी बनाकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने वाली भोपाल की कृष्णावेणी से।

कुछ महिलाओं के हाथ में ऐसा जादू होता है कि उनकी बनाई रेसिपीज का हर कोई दीवाना बनकर रह जाता है। ऐसे में अगर कोई हमें कहे कि हिंदुस्तान में एक ऐसी भी महिला है जो हजार नहीं, दस हजार नहीं पूरे 65000 रेसिपीज बनाने में माहिर हैं तो एक बारगी तो विश्वास ही नहीं होता। जी हां, भोपाल शहर में रहने वाली 66 साल की कृष्णावेणी मुदलियर एक ऐसी ही शख्सियत हैं। खाना बनाने में बेहद पारंगत कृष्णावेणी एक आम गृहिणी ही हैं पर अपने शौक के चलते आज इनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ है। बकौल कृष्णावेणी 'मैंने बहुत कम उम्र से ही भोजन बनाना शुरू कर दिया था। मेरी रूचि बचपन से ही खाना पकाने में रही। इसी का नतीजा है कि मेरा नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ है।' कृष्णावेणी बताती हैं कि जब भी मेरी इच्छा कोई रेसिपी बनाने की होती थी तो मैं उसे बनाकर ही दम लेती थी। आज कृष्णावेणी भारत के विभिन्न राज्यों की रेसिपी बना लेती हैं साथ ही इटेलियन, चाइनीज और बर्मा के व्यंजन भी बना सकती हैं। बर्मा के बारे में कृष्णावेणी बताती हैं कि मैं कुछ दिन बर्मा रही थी तो मैंने झट से बर्मा की डिशेज बनाना सीख लिया। उनका दावा है कि उनकी बनाई रेसिपीज आस्ट्रेलिया, यूरोप और अफ्रीका में भी मशहूर हो रही हैं। कृष्णावेणी कहती है कि मैं अपनी रेसिपीज में खासतौर पर स्वाद को लेकर बेहद सतर्क रहती हूं। मसालों में थोड़ी सी ऊंच-नीच रेसिपी का स्वाद बिगाड़ सकती है। मैं अपनी रेसिपी में कैलोरी की मात्रा का भी खास खयाल रखती हूं। कृष्णावेणी के बेटे ओमप्रकाश मुदलियर बताते हैं रोज हमें स्वादिष्ट भोजन खाने को मिलता है। इससे अच्छी बात हमारे लिए और क्या होगी? जब मां को खाने के लिए कोई पुरस्कार मिलता है तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। हालांकि सन्‌ 2006 से कृष्णा का नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है। पर अब गिनीज बुक में मेरी मां का नाम आने से उन्हें पूरी दुनिया जानेगी। अभी वे बाकी विश्व रिकॉर्ड में प्रयासरत हैं। अभी तक सबसे ज्यादा रेसिपीज बनाने का रिकॉर्ड एक ब्रिटिश महिला के नाम था जिसे 3000 रेसिपीज बनाना आता था, इसकी तुलना में कृष्णावेणी की रेसिपीज की संख्या वाकई कई गुना ज्यादा थी। कृष्णावेणी की बहू कारतीखासी मुदलियर कहती हैं कि मेरी सासू मां की बनाई रेसिपीज पूरी दुनिया में चमकनी चाहिए। उनके हुनर का इस्तेमाल रोजगार सृजन में भी किया जा सकता है। इन सब बातों से एक बात तो स्पष्ट है कि कृष्णावेणी का नाम गिनीज बुक में दर्ज होना हर भारतीय गृहिणी के भोजन से लगाव का पुरस्कार माना जा सकता है।
- आशीष जैन

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19 September 2008

कितने रीयल रियलिटी शो

टेलीविजन का एक रियलिटी शो..... डिजाइनर परिधान में लकदक, स्टाइलिश ढंग से नाचते-गाते, अपने हुनर को पेश करते बच्चे। लगता है वाकई क्या खूब हैं ये नौनिहाल। पर चकाचौंध में डूबे इस बचपन की असलियत कुछ और ही है। बच्चों की मासूमियत और भोलेपन के पीछे कौन-सा दर्द छुपा है, आइए, जानने की कोशिश करते हैं।

पहला वाकया- एक बांग्ला टीवी चैनल के रियलिटी शो के दौरान जजों ने 16 साल की शिंजिनी सेनगुप्ता की इतनी आलोचना की कि वह सदमे से लकवे का शिकार हो गई।

दूसरा वाकया- झारखंड के 12 साल के दीपक तिर्की ने दर्द की गोलियां खा-खाकर अपनी प्रस्तुति दी।

तीसरा वाकया- सारेगामापा लिटिल चैंप्स की विजेता 12 वर्षीय अनामिका चौधरी की तबियत कार्यक्रम के दौरान बिगड़ गई। क्योंकि उसके साथ कार्यक्रम में भाग ले रही दूसरी लड़की स्मिता नंदी के पिता को बेटी के शो से बाहर होने पर दिल का दौरा पड़ गया था।

इन दिनों छोटे परदे पर बच्चे छाए हुए हैं। कोई नाचता है, तो कोई आवाज से सबको झुमाता है। उनकी हर अदा से दर्शक खुश हैं। प्रोडक्शन हाउस और टीवी चैनल वालों के लिए बच्चे एक नए प्रॉडक्ट की तरह साबित हुए हैं। वे बड़ों की तरह हर लटके-झटके से लैस हैं। वे डिजाइनर मुस्कान देते हैं, शेर सुनाते हैं। इन बच्चों को देखकर एक बार भी नहीं लगता कि ये वाकई 'बच्चे' हैं। माता-पिता की आकांक्षाओं को पूरा करने के चलते बच्चे अब बचपन, अपनी मासूमियत को भुलाकर गलाकाट प्रतिस्पर्धा का अंग बन गए हैं। मेकअप, चमकदार कपड़े और बड़ों जैसे लटके-झटके के बीच बच्चे बार-बार यही कह रहे हैं कि हमें लगातार काम करना है और थकना नहीं है। मानो थक गए, तो हार गए। इस तरह की सोच से वे खुद को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। देर रात तक चलने वाले शूटिंग शिड्यूल्स के बीच इन बच्चों के अति उत्साह को संभालने वाला कोई व्यक्ति नहीं होता। इससे स्वास्थ्य और मनोदशा पर विपरीत असर होता है। माता-पिता और दर्शक समझते हैं कि बड़ा समझदार बच्चा है। कोई मासूम ब्रिटनी स्पीयर्स बनना चाहती है, तो कोई सोनू निगम। ऐसा नहीं कि इसके लिए वे मेहनत नहीं कर रहे हैं या उनमें प्रतिभा की कमी है। पर कहीं न कहीं लगता है कि इन सबके बीच बचपन कहीं खोता जा रहा है।

नहीं चलेगी मनमानी
ऐसे ही एक रियलिटी शो 'छोटे उस्ताद' के दौरान एक दर्शक द्वारा खास मेहमान इमरान हाशमी को चूमने से खफा होकर एक संगीत निर्देशक कार्यक्रम से वॉकआउट कर गए। उनके मुताबिक बच्चों के कार्यक्रम में इस तरह की हरकत गलत है। टीवी चैनलों और रियलिटी शोज को मशहूर बनाने के लिए बच्चों पर जिस तरह मनमानी की जाती है, उसकी तरफ सरकार का कोई ध्यान नहीं है। शिंजनी की घटना के बाद थोड़ी सी हलचल जरूर हुई है। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी कहती हैं, 'देश में जानवरों तक के लिए कानून है। सरकार इस तरह के बालश्रम को नजरअंदाज नहीं करेगी और टीवी पर नाच-गानों के ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों के काम के तौर-तरीके तय करेगी। सरकार ने इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सौंपी है और शोज में बच्चों के काम के तौर-तरीकों की जांच के लिए 10 सदस्यीय कमेटी बना दी है।' आयोग की सदस्या संध्या बजाज का कहना है, 'हम इन शोज में जजों के लिए सीमाएं निर्धारित करेंगे और यह पता करेंगे कि इनसे बच्चों की पढ़ाई पर कितना असर हो रहा है। अगर बच्चों पर दबाव में माता-पिता की भूमिका भी पाई गई, तो उनसे भी सवाल किए जाएंगे।' इस पूरी कवायद पर बचपन बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक कैलाश सत्यार्थी का कहना है, ' सरकार चाहे, तो बालश्रम कानून के तहत रियलिटी शोज के लिए अध्यादेश भी लाया जा सकता है। बालश्रम अधिनियम 1986 में 10 अक्टूबर 2006 को संशोधन किया गया। इसके अनुसार घरेलू बाल मजदूरी, ढाबों के साथ-साथ मनोरंजन क्षेत्र में भी बच्चों से काम नहीं लिया जा सकता और ये शोज भी बच्चों को मनोरंजन का एक जरिया ही बनाते हैं, तो फिर इन पर तुरंत रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है?'

हर चीज है बिकाऊ
कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि आज बाजार में हर चीज बिकाऊ है। प्रोडक्शन हाउस और चैनल वाले बचपन का बाजारीकरण करने पर तुले हैं। उन्हें घंटों कोल्हू के बैल की तरह जोता जा रहा है। रियलिटी शो वाले बच्चों और माता-पिता को रातों-रात सुपर स्टार बनने के सपने दिखा रहे हैं। इससे बच्चे भी अपनी सुध-बुध खोकर घंटों खुद को परव्शान करके भी शूटिंग और रियाज कर रहे हैं। उन्हें शूटिंग के दौरान घंटों काम करना पड़ता है, जिससे वे न समय पर खा पाते हैं और न सो पाते हैं। हकीकत यह है कि 100 में से एक बच्चा जीतता है, बाकी 99 बच्चे हार जाते हैं। कुछ बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं, जिसका गहरा असर भी हो सकता है। दो बच्चों में तुलना भी नुकसान पहुंचाती है। मसलन 'देखो, ये कितना होशियार बच्चा है। तुम भी ऐसा ही किया करो।' आम बच्चों पर कुछ खास करने का दबाव बढ़ता जाता है।

हमारे साथ ऐसा नहीं
चैनल नाइन एक्स पर चल रहे शो 'चक दे बच्चे' में भाग ले रही उदयपुर की निष्ठा के पिता ए. के. नाग चौधरी कहते हैं,' हमने अपनी बच्ची को खेल भावना से कार्यक्रम में भाग लेने की सलाह दी है। हमने उसमें कभी भी कंपीटिशन की भावना पनपने नहीं दी। उसकी मम्मी मुंबई में चौबीसों घंटे उसके साथ रहती है और उसे संबल देती है। उसके लिए तो यह एक सीखने का मंच साबित हो रहा है। हां, अगर कुछ शोज में गलत हो रहा है, तो यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।' उनकी कही इन सारी बातों में कितनी सच्चाई है, यह तो वही जानते हैं। अब तो निष्ठा चक दे बच्चे की विजेता भी बन चुकी हैं।

बुरा असर सेहत पर
वरिष्ठ मनोचिकित्सक आर. के. सोलंकी बताते हैं कि अठारह घंटे काम करने वाले बच्चों पर दिन-रात अच्छे प्रदर्शन का बोझ रहता है। यह बात वे किसी से नहीं कह पाते और मन ही मन परेशान रहते हैं। शोज में होने वाली प्रतियोगिताओं को जीवन-मरण का प्रश्न बनाने की बजाय प्रतिभा निखार के मौके के रूप में देखना चाहिए। अगर बच्चे लगातार ऐसे तनाव भरे माहौल में रहते हैं, तो उन्हें हिस्टीरिया के दौरे तक पड़ सकते हैं। बच्चों को चाहिए कि वे बिना किसी दबाव के रिलेक्स होकर अपनी स्वाभाविक कला का प्रदर्शन करें और झूठे दिखावे से बचें।

आजाद छोड़ दो
समाजशास्त्री ज्योति सिडाना कहती हैं कि माता-पिता बच्चों को बिना किसी मेहनत के रातों-रात लखपति-करोड़पति बनाने के सपने दिखा रहे हैं। यह पूरी तरह गलत है। माता-पिता को इन कार्यक्रमों में बच्चों को भेजने से पहले उनकी प्रतिभा का सही आकलन करना चाहिए। इसी के साथ दूसरा पहलू यह भी है कि आजकल बच्चे जल्दी ही किसी भी बात को दिल से लगा लेते हैं । ऐसे में अगर उन्हें धैर्य का गुण सिखाया जाए, तो जिंदगी में कभी कोई मुश्किल नहीं आएगी। बच्चे पर किसी खास काम के लिए दबाव डालने की बजाय उनकी प्रतिभा को नैसर्गिक रूप से बढ़ने का मौका देना चाहिए। बच्चों में नैतिक मूल्य सिखाने पर ही वे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के काबिल बन पाएंगे और किसी भी तरह के तनाव से दूर रहेंगे।

'सरकार इस तरीके के बालश्रम को नजरअंदाज नहीं करेगी और टीवी पर नाच-गानों के ऐसे कार्यक्रमों में बच्चों के काम के तौर-तरीके तय करेगी। हमने इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सौंपी है। आयोग ने रियलिटी शोज में बच्चों के काम के तौर-तरीकों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है।' - रेणुका चौधरी, केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री

'सरकार चाहे, तो बालश्रम कानून के तहत रियलिटी शोज के लिए अध्यादेश भी लाया जा सकता है। बालश्रम अधिनियम 1986 में 10 अक्टूबर 2006 को संशोधन किया गया। इसके अनुसार घरेलू बाल मजदूरी, ढाबों के साथ-साथ मनोरंजन क्षेत्र में भी बच्चों से काम नहीं लिया जा सकता और ये शोज भी बच्चों को मनोरंजन का एक जरिया ही बनाते हैं, तो फिर इन पर तुरंत रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है?' - कैलाश सत्यार्थी, राष्ट्रीय संयोजक, बचपन बचाओ आंदोलन
-आशीष जैन

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गांव चलें हम

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मन करता है एक ऐसी जगह उड़ चलें, जहां कुदरत ने अपना हर रंग बिखेरा हो, जहां प्राकृतिक सुषमा के साथ विरासत का आकर्षण हो। जहां खुली हवा, नीले आसमान और हरी-भरी वसुंधरा की त्रिवेणी मिलकर मन को लुभा जाए। कला और संगीत फिजाओं में महकते हों। तो फिर आओ चलें शहर की रोशनी से दूर गांवों की ओर। यहीं मिलेगा आपको यह सब।

मैं तो जाता अपने गांव, सबको राम-राम राम। जी हां, गांवों की ओर लौट चलने का मन कर रहा है, तो देर मत लगाइए। गांव का सुकून तो बस वहां जाकर ही महसूस किया जा सकता है। गांव की मस्ती चूल्हे पर बनी मोटी रोटी और लहसुन की चटनी में ही मिल सकती है। दरअसल आज शहरों में आदमी का दम घुट रहा है। अब हमें उन बड़े-बड़े कारखानों, धुआं उगलती चिमनियों से दूर एक ऐसा गांव याद आता है, जहां हम सदा के लिए बस जाएं। पहले हम परेशान होते थे, तो याद आती थी पहाड़ों की। हम शिमला, मसूरी, दार्जिलिंग, श्रीनगर या फिर मनाली की तरफ भागते थे। पर अब तो वहां भी अजीब नजारा देखने को मिलता है। सड़कों पर चलने को जगह नहीं है। होटलों में कमरे नहीं हैं। पानी भी बूंद-बूंद करके आता है। सब तरफ परेशानियां हैं। ऐसे में हमें गांव-देहात में कुछ पल गुजारने की इच्छा होती है। मन में शायर की ये पंक्तियां गूंजने लगती हैं-
शहर की रोशनी से अब मेरा दिल भर गया यारो
चलो फिर से वहीं पुराने गांव चलते हैं।
मन चाहता है, कुछ ऐसे पल, जो सदा के लिए उसके हृदय में बस जाएं। वो पल कानों में बांसुरी की मधुर धुन की तरह गूंजते रहें। आज फिर गांव लौटने का मन कर रहा है। आप और हम ही नहीं, पूरी दुनिया के लोगों को गांव की मिट्टी की सौंधी सुगंध भा रही है। सांसों में बहती हुई शांति, दिलों में बसता हुआ लोगों का विश्वास और प्यार, पूरी दुनिया में किसी मोल में नहीं मिल सकते। गांव में आप बरगद के पेड़ नीचे बैठे-बैठे कब सुबह से शाम के सफर पर पहुंच जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
हां, भारत के लिए ग्रामीण पर्यटन की बात कुछ नई हो सकती है। पर यह अब धीरे-धीरे विकसित हो रहा है। लोग वाकई गांव का माहौल पसंद कर रहे हैं। पर्यटन से जुड़े लोग भी इस ओर ध्यान देने लगे हैं। देसी से लेकर विदेशी पर्यटक कड़ाही में पकती हरी सब्जियों का आनंद लेना चाहते हैं। वे तंदूर की रोटी को खेजड़ी के पेड़ के तले पूरे इत्मीनान से खाना चाहते हैं। चाहे गांवों में बिजली ना हो, सड़कें ना हों, पर कं क्रीट के जाल से निकलकर वहां की झोपड़ियों में जाते ही दिल को आराम मिलता है। गांव वाले भी इस बात से खुश हो रहे हैं कि लोग आ रहे हैं। इस बहाने उनका भी रोजगार बढ़ रहा है। उन्हें भी आमदनी हो रही है। वे मन ही मन पावणों का स्वागत करके भाव-विभोर हो रहे हैं। इसी तरह विदेशी पर्यटक भी कहते हैं कि यहां के कण-कण में आत्मीयता छुपी है। यहां आज भी ग्रामीण लोगों में 'अतिथि देवो भव' की भावना बसी हुई है। वे पर्यटकों को अपने परिवार का सदस्य मानकर सेवा करते हैं। यह विचार सिर्फ रॉबर्ट का ही नहीं है बल्कि राजस्थान में आने वाला हर पर्यटक यहां के सत्कार व आवभगत से अभिभूत है। इस तरह लोगों के ग्रामीण पर्यटन की ओर बढ़ते रुझान को देखकर सरकार भी वहां के लोगों को तो रोजगार के अवसर मुहैया करा ही रही है, साथ ही इस बहाने पर्यटकों को भी हर तरह की सुविधा मिल रही है। 'राजग्राम्य योजना' और 'ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट योजना' इसी तरह की योजनाएं हैं, जो ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से लागू की गई हैं।

क्या है राजग्राम्य योजना
राजस्थान सहकारिता विभाग ने 30 दिसम्बर 2007 से जिले के हर्ष गांव व फतेहपुर के ढांढ़ण गांव को ग्रामीण सहकार पर्यटक योजना में शामिल करते हुए राजग्राम्य योजना की शुरूआत की गई है। योजना में राज्य के 26 पर्यटक स्थलों को चिह्नित किया गया है।
राजग्राम्य योजना में देशी विदेशी पर्यटक अनुभवी ट्यूर ऑपरेटर्स के प्रयासों से 30 सदस्यों के पर्यटक दल को भ्रमण के लिए लाया जाएगा। गांव के रहन-सहन जानने के लिए भ्रमण के दौरान पर्यटकों को गांव का पैदल या बैलगाड़ी से दौरा करवाकर वहां की कला-संस्कृति एवं रहन-सहन व परम्पराओं से अवगत कराया जाएगा। इस दौरान ठहरने की व्यवस्था ग्राम सेवा सहकारी एजेन्सी करव्गी।

साफा पहनाकर किया जाएगा स्वागत
योजना के तहत गांव में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों का तिलक लगाकर, लोकगीत गाकर, माला व राजस्थानी पगड़ी अर्थात्‌ साफा पहनाकर उनका स्वागत किया जाएगा।

झोंपड़ी में होगी चारपाई
ग्राम सेवा सहकारी समिति भ्रमण दल के सदस्यों के लिए झोंपडिय़ों में व्यवस्था की जाएगी। बैठने के लिए मिट्टी से बनी सीटों अथवा मुड्डों की व्यवस्था होगी।

संस्कृति व लोक कलाकारों की प्रस्तुति
भ्रमण दल को गांव की कला एवं संस्कृति से रूबरू करने के लिए स्थानीय लोक कलाकारों द्वारा भोपा-भोपी नृत्य, कालबेलिया नृत्य, सपेरा नृत्य, शेखावाटी का प्रसिद्ध कच्ची घोड़ी नृत्य, बग्गी की सवारी, ऊँट व घोड़ी नृत्य दिखाया जाएगा।
गांव सहकार पर्यटक योजना के तहत गांवों में मिट्टी के बने बर्तन, लकड़ी, कपड़े, हस्तनिर्मित सामान, नमदे, खेस, बादले, राजस्थानी जूतियां, मोजड़ी उपलब्ध कराए जाएंगे।

गांव के परिवारों से जुडऩे का सीधा मौका
गांव में आने सभी पर्यटकों को ग्रामीण जीवन के रहन-सहन व उनके बारे में जानने का सीधा मौका मिल सकेगा। इसके अलावा यहां आने वाले पर्यटकों को ग्रामीण जीवन की झलक भी देखने को मिलेगी।

ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट योजना
भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 'ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट योजना' नाम की एक नई योजना शुरू की है। इस के तहत कोई भी मकान मालिक इसमें भाग लेकर अपने मकान का कमरा/कमरे पर्यटकों को रहने के लिए दे सकेगा, जिसमें मकान मालिक को भी आय होगी और पर्यटकों को भी अच्छी जगह सस्ते दामों पर मिल सकेगी। वैसे तो यह योजना पूरे भारत वर्ष में लागू है परन्तु ऐसे इलाकों में इसका खास महत्त्व होगा, जहां होटल के कमरों की कमी है। इस योजना में भाग लेने के लिए मकान मालिकों को पहले पर्यटन मंत्रालय/पर्यटन विभाग के पास स्वयं को पंजीकृत कराना होगा कि वे अपने कमरे पर्यटकों को रहने के लिए देना चाहते हैं तथा उनके पास पर्यटकों के रहने लायक गुणवत्ता वाले आवास हैं।

योजना में भाग लेने की शर्तें
योजना में भाग लेने के लिए सबसे पहली शर्त तो यह है कि घर का मालिक घर में रहता हो, उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला न हो, कम से कम एक तथा अधिक से अधिक पांच कमरे किराए पर दे सकता है।

योजना के लाभ
यदि आपका घर पहले से ही सभी सुविधाओं से सुसज्जित है, तो कम खर्चे में आप यह व्यापार शुरू कर सकते हैं। इसके अलावा पर्यटक बहुत ही कम समय के लिए ठहरते हैं। मंत्रालय ने कोई दरें निर्धारित नहीं की हैं। 'गोल्डन वर्ग' में आने वाले कई घरों के मालिक, पर्यटकों से 1500 से 2500 रूपए प्रतिदिन लेते हैं। मेजबानों के लिए मेहमान कोई बोझ नहीं है। मेजबान को उन्हें सिर्फ सुबह का नाश्ता देना होता है। अधिकांश मेहमान पूरा दिन बाहर रहते हैं और रात को लौटते हैं। महिलाओं के लिए तो यह कारोबार बहुत ही लाभकारी है क्योंकि वे घर से बाहर निकले बिना ही कमा सकती हैं और इसके लिए खास प्रशिक्षण की भी आवश्यकता नहीं होती।

योजना में कैसे भाग लें
योजना में भाग लेने के लिए एक आवेदन-पत्र है जिसे पर्यटन मंत्रालय की वेबसाइट www.incredible india.org से प्राप्त किया जा सकता है। फार्म प्राप्त करने के बाद पुलिस सत्यापन के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन में आवेदन करना होगा। पुलिस की क्लियरेंस मिलने में लगभग दो दिन लगते हैं।
इसके बाद आवेदनकर्ता को अपना आवेदन (जिसके साथ उन सुविधाओं की सूची लगी हो, जो आपके घर में उपलब्ध हैं) फार्म प्रस्तुत करना होगा जिसके साथ पुलिस का क्लीयरेंस लगा हो तथा घर के स्वामित्व का प्रमाण पत्र भी संलग्न हो, आवेदनकर्ता को मंत्रालय को पंजीकरण शुल्क भी जमा कराना होगा, जो 'गोल्ड कैटेगरी' के लिए 5,000 रूपए तथा सिल्वर वर्ग के लिए 3,000 रूपए हैं।
इसके बाद मंत्रालय की एक समिति उस घर का दौरा यह सुनिश्चित करने के लिए करेगी कि बताई गई सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं। समिति तब यह निर्णय करेगी कि घर 'स्वर्ण (गोल्ड)' वर्ग में आएगा या 'रजत (सिल्वर)' वर्ग में।
(उर्मिला राजौरिया, अतिरिक्त निदेशक, पर्यटन विभाग से बातचीत के आधार पर)

- आशीष जैन (रतन सिंह के सहयोग से)

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16 September 2008

ये बंधन है दोस्ती का

दुनिया में जब हम आते हैं, तो अनायास ही एक-एक रिश्ते में बंधते चले जाते हैं। सिर्फ दोस्ती ही ऐसा रिश्ता है, जो हम खुद बनाते हैं। लेकिन जब रिश्तेदारी में दोस्ती भी शुमार हो, तो क्या कहना।

दोस्ती की आंच पर पके रिश्तों की मजबूती गजब की होती है। एकदम खिले हुए, सहज और भरोसे के लायक। ऐसा होगा, तो आपको कभी रिश्तों में जटिलता या जकड़न महसूस नहीं होगी, बल्कि विचारों के खुलेपन की नई तस्वीर नजर आएगी। दिल की बात जुबां पर आसानी से आएगी और इसका फायदा आपके संबंधों को ही मिलेगा, फिर चाहे कोई भी रिश्ता हो। कुछ इसी फलसफे के साथ अपने रिश्तों में दोस्ती को जीते हुए लोगों की दास्तां-

जाने कब दोस्त बन गए
सचिवालय में कार्यरत माला जैन का कहना है कि मैं जितनी धूम-धाम और खुशी से बहू लाई थी, वह खुशी आज भी कम नहीं हुई। मैंने तो ज्यादातर सास-बहू को आपस में बुराइयां करते ही सुना है। मैं मानती थी कि यह रिश्ता कभी दोस्ताना नहीं बन सकता। लेकिन मेरी सोच गलत थी। हम कब सास-बहू से दोस्त बन गए, पता ही नहीं चला। यदि उसे कोई काम नहीं आता, तो मैं बिना डांटे या ताना दिए उसे प्यार से समझा देती हूं। कभी मैं कुछ गलत करती हूं, तो वह भी दोस्त की तरह मुझे समझाती है। हम कभी एक-दूसरे की बात का बुरा नहीं मानते। संस्कार के साथ-साथ मेरी बहू में रिश्तों को निभाने की समझ भी है। दूसरी तरफ बहू कविता का कहना है कि जब मैं शादी होकर इस घर में आई थी, तो बहुत झिझक रही थी। जैसा कि हर बहू के साथ होता है। लेकिन सास का ऐसा साथ मिला कि न जाने कब यह घर अपना लगने लगा। मुझे घर का काम करने की आदत नहीं थी। लेकिन कभी मेरी सास ने इस बात को मुद्दा नहीं बनाया। घर के बाकी लोगों को तो यह भी नहीं पता कि मुझे क्या बनाना आता है और क्या नहीं। कभी मेरी सास ने किसी तरह की शिकायत नहीं की। इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे कॅरियर बनाने की भी सलाह दी। फिलहाल मैं बैंक परीक्षा की तैयारी कर रही हूं और इसमें मेरी सास का पूरा सहयोग मिल रहा है। वे मेरे खान-पान से लेकर हर चीज का ध्यान रखती हैं। आज मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि वे मेरी सास कम और दोस्त ज्यादा हैं।
माला जैन, कविता जैन(सास-बहू)

बुरा होता नहीं देख सकता
लोग हमें पिता-पुत्र कम और दोस्त ज्यादा मानते हैं। इसमें उनकी गलती नहीं, हमारा रहन-सहन ही कुछ ऐसा है। हम जहां भी जाते हैं फुल मस्ती करते हैं। ये कहना है ट्यूरिस्ट कोच से जुड़े सुरेंद्र शर्मा का। वे अपने बेटे अमन को दोस्त समझकर हर बात में उससे सलाह लेते हैं। वे कहते हैं कि चाहे अमन का कॉलेज में एडमिशन हो या मोबाइल खरीदना हो, मैंने कभी अपनी मर्जी नहीं थोपी। हमने आज तक हर छोटी-छोटी बात एक-दूसरे से शेयर की है। खाली समय में हम किसी भी विषय पर चर्चा करने लगते हैं। मेरव् साथ रहकर उसे दोस्तों की कमी नहीं खलती। एक बार ग्यारहवीं क्लास में उसका अपने दोस्तों के साथ मनमुटाव हो गया था। इस वजह से वह काफी डिप्रेशन में था। मैंने उस वक्त एक दोस्त की तरह मानसिक रूप से सपोर्ट किया। कभी मोबाइल पर कोई अच्छा मैसेज आता है, तो मैं उसे अमन को फॉरवर्ड कर देता हूं। बड़ी से बड़ी गलती करने पर भी उसे डांट दूं, तो बाद में दिल मेरा ही दुखता है। वहीं बेटे अमन का कहना है कि पापा शुरू से ही क्रिकेट खेलते थे। उन्होंने मुझे एक दोस्त की तरह क्रिकेट की बारीकियां सिखाईं। उन्होंने मुझे क्लब क्रिकेट खेलने की सलाह भी दी। मैंने जयपुर क्लब में क्रिकेट जॉइन किया। लेकिन पढ़ाई के चलते उसे निरंतर नहीं रख पाया। इस बारे में पापा को पता चला, तो उन्होंने मुझे वापस क्लब जॉइन करने को कहा। मैं भी उनका कहा टाल न सका। एक अच्छे दोस्त की यही निशानी होती है कि वह अपने दोस्त का बुरा होता नहीं देख सकता और यही मेरे पापा ने किया।
सुरेंद्र शर्मा, अमन शर्मा (पिता-पुत्र)

दो जिस्म एक जान हैं हम
कौन कहता है कि हम दो बहनें हैं। हम तो दुनिया की सबसे अच्छी दोस्त हैं। दोस्ती के इस रिश्ते से ही हमारे चेहरों पर मुस्कान बनी रहती है। यह कहना है जीएनएम नर्सिंग कर रही शमा का। वह बताती है कि मेरी छोटी बहन पिंकू बहुत सीधी है। किसी से कुछ नहीं कहती। मन की हर बात छुपा कर रखती है। लेकिन मैं उसका चेहरा पढ़ लेती हूं। वह भी मम्मी-पापा और दोस्तों की बजाय मुझसे हर बात शेयर करती है। हम दोनों बहनें जरूर हैं लेकिन दोस्तों की तरह कॉम्पिटीशन भी रखते हैं। एक-दूसरे से शिकायत करते हैं तो कभी नोंक-झोंक भी हो जाती है। लेकिन एक सच्चे दोस्त की तरह मैं अपना हर फर्ज निभाने की पूरी कोशिश करती हूं। जब कभी पिंकू की तबियत खराब होती है या वो किसी परेशानी में होती है, तो मैं अपना काम छोड़कर उसके पास पहुंच जाती हूं। दूसरी ओर छोटी बहन पिंकू का कहना है कि मैं पहले बहुत सीधी-सादी लड़की थी। लेकिन दीदी ने मुझे समझाया कि आज की दुनिया में इतना सीधापन अच्छा नहीं होता। उन्होंने मेरी हर आदत को सुधारकर मेरे व्यक्तित्व को निखारा है। उन्होंने मुझे इतना प्यार और भरोसा दिया कि मैं हर बात उनसे खुलकर कर सकती हूं। यह काम कोई दोस्त ही कर सकता है। मैंने भी कभी उनकी बात का बुरा नहीं माना और जैसा उन्होंने कहा, वैसा ही किया।
शमा पंवार, पिंकू पंवार (बहनें)

पूरा ध्यान रखता हूं
ज्वैलरी का काम करने वाले विनोद शर्मा बड़े भाई की भूमिका में तो सभी को नजर आते हैं लेकिन अपने छोटे भाई कमलेश के लिए वे दोस्त भी हैं। वे बताते हैं कि वह मनचला है। या यूं कहें कि उसमें बचपना ज्यादा है। होने को तो उसकी शादी हो गई है लेकिन उसमें उतनी परिपक्वता नहीं है, जितनी होनी चाहिए। यही वजह है कि मैं बिजनेस और उसके व्यक्तिगत जीवन का पूरा ध्यान रखता हूं। वह भी हर काम मुझसे पूछकर करता है। काम को लेकर कभी तकलीफ नहीं हुई। छोटे भाई कमलेश का कहना है कि जितने सीधे और सरल भाईसाहब हैं, उतनी ही चंचलता मुझमें है। यूं तो हमारा बिजनेस एक है लेकिन सारा ध्यान वे ही रखते हैं। मुझे पार्टियां करने का शौक है। यदि मैंने घर में अपनी ओर से कोई कार्यक्रम रखा है, तो उसे पूरी तरह संभालते वे ही हैं। कभी कोई काम करने से मना नहीं करते। जब भी मैं किसी परेशानी में होता हूं, तो वे मुझे दोस्त की तरह संभाल लेते हैं। मेरे पूरे परिवार को लगता है कि वे मेरे साथ हैं, तो मुझे कुछ नहीं हो सकता। मेरा विश्वास भी यही है। सच कहूं तो मैंने भाई के रूप में सच्चा दोस्त पाया है।
विनोद शर्मा, कमलेश शर्मा (भाई)

प्रीति स्वर्णकार, आशीष जैन

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12 September 2008

पापा मेरे पापा

विशाल वृक्ष के साए में जिस तरह हर मौसम की मार से महफूज नन्हे पौधे बेफिक्री से झूमते हैं और हवा-पानी पाकर बढ़ते जाते हैं। उसी तरह जिंदगी के संघर्षों की तीखी धूप से हमें राहत देता है पिता का प्यार। ज्यों ज्यों हम बड़े होते जाते हैं, उनके वात्सल्य की गहराई समझ आती जाती है। उम्र के हर दौर में हमें याद आता है पिता के साथ हुआ अनमोल लेन-देन। कुछ इसी तरह की यादों के जरिए अपने दिल की बात कह रहा है एक युवक।

आज मैं अपनी उम्र के 30 बसंत देख चुका हूं। इतने सालों में कई चीजें बदल गईं, कई अच्छे-बुरे दौर गुजर गए पर एक चीज कभी नहीं बदली। वह है मेरे पिता का स्नेह, दुलार, विश्वास और उनकी बांहों में मिली सुरक्षा, जो आज भी हर मुश्किल समय में मुझे हमेशा महसूस होती है। मुझे धुंधली सी याद है, जब मैं बहुत छोटा था। उस वक्त पिताजी मुझे अपनी उंगली पकड़कर धीरे-धीरे चलना सिखाते थे। मैं कई बार गिरता, पर हर बार वे मुझे संभाल लेते और बदले में मैं उन्हें एक प्यारी सी मुस्कान दे दिया करता था। वे मुझे कभी गिरने नहीं देते थे। शायद इसीलिए मेरे नन्हे कदम जल्दी ही सध गए और मैं कब दौड़ने लगा, पता ही नहीं चला। जब मैं चार साल का हुआ, तो अपने पापा का हाथ पकड़कर पहली बार सहमता हुआ स्कूल गया। पापा मुझे वहां छोड़कर जा रहे थे, तो मैं दौड़कर वापस उनके पास आया और उन्हें कसकर पकड़ लिया। पापा ने मुझे प्यार से समझाया और मैं मान गया।

जब पापा साइकिल लाए
जब कुछ बड़ा हुआ और मैंने 12 साल की उम्र में साइकिल की जिद की, तो पापा मेरे लिए तुरंत बाजार से सुंदर सी साइकिल लाए थे। मैं दिन भर उस पर बैठकर पार्क के चक्कर लगाता रहता और पापा को बताया कि मैं इससे पूरी दुनिया का चक्कर काटूंगा। पापा भी मेरी पीठ थपथपाकर कहते, 'क्यों नहीं बेटा, जरूर चक्कर लगाना पूरी दुनिया का।'

मैंने गिफ्ट दिया
उसी दौरान एक बार पापा मेरे लिए पेंसिल कलर लेकर आए थे। मैंने उनसे घर की पूरी दीवारें रंग दी थीं। बाद में मुझे लगा कि पापा डांटेंगे। पर पापा जब ऑफिस से आए, तो पीठ पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए बोले, 'ड्रॉइंग बहुत अच्छी करते हो, पेंटर बनने का इरादा है क्या?' मैंने कुछ नहीं कहा और अपने कमरे से एक पेपर लाकर पापा से बोला,'यह रहा आपका गिफ्ट।' पापा ने पेपर देखा। मैंने उसमें पापा की ही पेंटिंग बना रखी थी। उन्होंने मुझे गले लगा लिया। उस वक्त मुझे लगा, मानो पूरी दुनिया भर की खुशियां एक ही पल में मुझे मिल गई हों।

उन्हें लिखा पहला खत
जब मैं 15 साल का हुआ, तो एक समर कैम्प के लिए दस दिन के लिए अपने शहर जयपुर से दूर जाना पड़ा। उस वक्त पापा ने अपने हाथों से मेरे लिए बैग जमाया और मिठाई का डिब्बा भी रखा और कहा, 'घबराना मत, मन लगाकर चीजें सीखना।' मैं घर से दूर तो जा रहा था, पर मन ही मन उनसे बिछुड़ने का गम था। वहां जाकर मैंने पिताजी को एक चिट्ठी लिखी। वह चिट्ठी आज भी पिताजी मुझे दिखाते हैं कि किस तरह मैंने अपने बचकाने शब्दों में ढेर सारा प्यार उंडेला था।

कहां खोए हो बेटा !
जब बचपने से जवानी की दहलीज पर कदम रखा, तो पड़ोस में रहने वाली हमउम्र लड़की को पसंद करने लगा। रात-दिन उसी के ख्यालों में खोया रहने लगा। एक दिन जब पापा ने पूछा, 'बेटा, कहां खोए रहते हो? कोई बात है क्या?' तो मन की बात जुबान पर आ ही गई। मैंने डरते-डरते पापा को उसके बारे में बताया। पर उस वक्त भी पापा के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और कहा, 'बेटा, वह अच्छी लड़की है, पर इस उम्र में होने वाली आकर्षण स्थायी नहीं होता। अभी तुम्हारी उम्र करियर की तरफ ध्यान देने की है। उम्र के इस दौर में अगर तुम बहकोगे, तो खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारोगे।' पापा ने बताया कि क्यों मुझे इस उम्र में वह अच्छी लगती है। मुझे क्या करना चाहिए। इस समझाइश से पापा के लिए मेरे मन में बसी इज्जत और भी बढ़ गई। उस दिन से उनका व्यकि्तत्व मुझे बहुत विशाल लगने लगा।

रातभर जागते थे
जब मैंने 18 साल की उम्र में एम्स में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए प्रवेश परीक्षा के लिए तैयारी शुरू की, तो पापा भी मेरे साथ रात भर जागते रहते थे। मेरी छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखते थे। वे मेरा हौसला बढ़ाते रहते थे। मैंने भी मन ही मन ठान लिया था कि मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेकर दिखाना है। जिस पल मेडिकल कॉलेज में एडमिशन की बात पिताजी को पता लगी, उनकी आंखों से आंसू बह निकले थे। इतना संतोष, इतना गर्व उनके चेहरे पर देखकर लगा कि वाकई मेरे पिताजी दुनिया के सबसे अच्छे पिता हैं। कुछ दिनों बाद मैं एम्स में आ गया और पढ़ाई में रम गया। फिर तो छुट्टियों में ही मिलना होता। टेलीफोन और खत ही हमारे बीच संवाद के सेतु का काम करते थे। जब-जब मैं घर आता, तो रात को पापा के पास आकर लेट जाता। उनका सान्निध्य पाकर लगता कि दुनिया की कोई परेशानी मुझे कमजोर नहीं कर सकती। हम घंटों पक्के दोस्तों की तरह बातें किया करते। बात करते-करते हम कब नींद के आगोश में डूबते, पता ही नहीं चलता।

डांट में था सबक
जब कभी दिल्ली से आता, तो उनके लिए कुछ न कुछ जरूर लेकर आता। पर जो चीज आज भी पिताजी के पास रखी है, वह है- उस वक्त मेरा लाया हुआ चश्मा। न जाने क्यों मुझे हर वक्त उनकी चिंता लगी रहती थी। तभी तो एक बार उनकी बीमारी की खबर लगते ही मैं एग्जाम बीच में ही छोड़कर चला आया था। हालांकि बाद में पापा ने बहुत डांटा था, पर मैं कैसे खुद को रोक सकता था। उनकी डांट में एक सबक था।

मैं हूं ना...
जब 24 साल की उम्र में पढ़ाई पूरी की, तो गांव आकर ही क्लिनिक खोली। उस वक्त पिताजी पूरे गांव में शान से कहते थे, 'मेरा बेटा डॉक्टर है। इलाज बहुत अच्छा करता है।' और जब कभी कोई मरीज सही होकर उनसे मेरी थोड़ी सी भी तारीफ कर देता, तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। उन दिनों हम किराए के मकान में रहते थे। एक दिन जब मेरी शादी की बात चली, तो लड़की वालों ने कहा, 'आपका खुद का घर तो है नहीं, ऐसे में हम अपनी बेटी आपको कैसे दे दें?' पिताजी को यह बात चुभ गई। रात को बातों ही बातों में मुझसे कहने लगे,'मैं ताउम्र क्लर्क की नौकरी करता रहा। कभी सोचा ही नहीं कि खुद का मकान भी बनवाना है।' यह कहते-कहते वे थोड़ा भावुक हो गए। उस वक्त मैंने उन्हें गले लगाते हुए कहा, 'पापा, चिंता मत करो। मैं हूं ना। सब ठीक हो जाएगा। आपका मकान भी बनेगा और मेरी शादी भी धूमधाम से होगी।' उस वक्त उनके चेहरे पर वही भाव थे, जो कभी उनके मुझे सहारा देने पर होते थे।

पूरी की इच्छा
कुछ दिनों बाद ही उन्होंने मेरी शादी कर दी। बहू को आशीर्वाद देते वक्त उन्होंने कहा, 'मेरा बेटा मेरे लिए एक 'बेटी' लेकर आया है।' शादी के कुछ समय बाद मां का देहांत हो गया। पिताजी दुखी थे पर मुझसे कभी कुछ नहीं बोले। मैंने पिताजी को धीरज बंधाने की पूरी कोशिश की। हमने चारों धाम की यात्रा करने की सोची। मैं, मेरी पत्नी और पापा चारों धाम की यात्रा पर निकल गए। पिताजी की शुरू से ही चारों धामों के दर्शन की इच्छा थी, सो वह भी पूरी हो गई। जब हमारे घर 'नया मेहमान' आया और पिताजी दादाजी बने, तो उन्होंने पूरे गांव को न्योता दिया। ढेरों खुशियां मनाईं।

बस आपका प्यार चाहिए
मैं सोचता कि पिताजी ने मुझे इस काबिल बनाया और मैं किस तरह अपना 'पितृ ऋण' चुकाऊं? कुछ ही दिन पहले की बात है। मेरा जन्मदिन था। मैं 30 साल पूरे कर चुका था। शाम को पार्टी हुई। पार्टी के बाद पिताजी मेरे पास आए और उन्होंने कहा, 'बता, तुझे क्या गिफ्ट दूं?' मैंने कहा, 'मुझे तो बस आपका प्यार चाहिए और कुछ नहीं।' इसके बाद उन्होंने एक कागज का पुर्जा मुझे थमा दिया। उनके जाने के बाद मैंने उसे पढ़ा। उसमें लिखा था, 'बेटा, तू मेरी पहली और आखिरी पूंजी है। सदा ऐसा ही खुश रहना।' यह पढ़कर मेरी आंखें छलक पड़ीं।

संतुष्ट हूं मैं
अगले दिन मैं पिताजी के साथ सैर पर जा रहा था। वे लाठी टेकते हुए चल रहे थे। एकाएक एक पत्थर से उनकी लाठी टकराई और वे लड़खड़ा गए। तभी मैंने उन्हें संभाल लिया। उस समय मैं उनके चेहरे पर वही मासूम मुस्कान देख रहा था, जो आज से लगभग तीस साल पहले मैंने उन्हें दी होगी जब उन्होंने मुझे संभाला था। आज मैं संतुष्ट हूं कि मुझे मौका मिला अपने पिता की सेवा करने का और बचपन में मिले दुलार का अंश भर लौटाने का।

-आशीष जैन

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11 September 2008

वो जब याद आए, बहुत याद आए



जैसे वृक्ष के साए में नन्हे पौधे बेफिक्री से झूमते हैं और स्नेह की हवा पाकर बढ़ते जाते हैं। इसी तरह जिंदगी की तपती-तीखी धूप में भी हमें याद आती है पिता के प्यार की ठंडी फुहार। बचपन में पिता के साथ गुजारे पलों को हर कोई बार-बार याद करना चाहता है। पेश है ऐसे ही कुछ सेलिब्रिटीज की बचपन में पिताजी के साथ जुड़ी रोचक यादें-

शबाना आजमी-कैफी आजमी
बचपन में मेरे एक दोस्त ने बताया कि उसने मेरे अब्बा का नाम अखबार में पढ़ा था। चालीस बच्चों वाली क्लास में सिर्फ मेरे अब्बा का नाम अखबार में आया था और इस घटना से मैंने मान लिया कि अब्बा कुछ अलग तरह के इंसान हैं। अब मुझे उनका कुर्ता-पाजामा पहनना बुरा नहीं लगता था। यहां तक कि मैंने वो काली गुड़िया भी बाहर निकाली, जो उन्होंने बचपन में मुझे दी थी। तब मैं चाहती थी कि वो मुझे नीली आंखों वाली सुनहरे बालों की गुड़िया खरीदकर देते, पर अब्बा ने मुझे प्यार से समझाया कि काला रंग भी खूबसूरत है और मुझे अपनी गुड़िया पर नाज करना चाहिए। तब मैं सात साल की थी और यह बात मेरी समझ में नहीं आई, पर मैंने चुपचाप वह गुड़िया ले ली और छुपा दी। तीन साल बाद मैंने उसे बाहर निकाल लिया, क्योंकि वो ही इस बात का पहला प्रमाण थी कि मैं अलग तरह के पिता की अलग तरह की बेटी हूं।जब मैं बड़ी हुई, तो अब्बा ने मेरी जिंदगी के हर फैसले में मेरा साथ दिया और जरूवरत लगी, तो मार्गदर्शन भी किया। जब मैं साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए दिल्ली से मेरठ तक एक पदयात्रा में शामिल होने जा रही थी, तो मैं थोड़ा नर्वस थी। मैं अब्बा के कमरे में गई, तो उन्होंने मुझे खींचकर अपने सामने बैठाया और कहा, 'मेरी बहादुर बेटी भला क्यों डर रही है। जाओ तुम्हें कुछ नहीं होगा। यह सुनकर मेरा सारा डर निकल गया था।

अमिताभ बच्चन-हरिवंशराय बच्चन
आज बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन जिस मुकाम पर हैं, वहां उन्हें थमकर जरा सा सुस्ताने की फुर्सत नहीं है। कभी न थकने का यह माद्दा अमिताभ को अपने पिता हरिवंशराय से मिला। बकौल अमिताभ 'बाबूजी को कैरम खेलना, क्रिकेट खेलना वगैरहा पसंद नहीं था। वे पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया करते थे। पर वे क्रिकेट प्रेम को बखूबी जानते थे। उन दिनों वे लंदन में थे और बंकिंघम पैलेस में एक कार्यक्रम में निमंत्रित किए थे। वहां भारत की क्रिकेट टीम भी गई हुई थी। उन्होंने तुरंत एक कागज वीनू मांकड़ को दिया और कहा कि कृपा करके पूरी टीम से ऑटोग्राफ ले दें। वीनू अचंभित कि इतना बड़ा कवि ऑटोग्राफ मांग रहा है, तो उन्होंने बताया कि मेरा बेटा बहुत खुश होगा और सचमुच वह ऑटोग्राफ वाला कागज जब बाबूजी ने मुझे पत्र में भेजा और मैंने दोस्तों को दिखाया, तो पूरे स्कूल में अचानक मैं बहुत मशहूर हो गया था।मेरे फिल्मों में आने के बाद बाबूजी ने मेरी सभी फिल्में देखी। अपने मित्रों में फिल्म का प्रचार भी करते थे। फलां फिल्म जरू र देखने जाना, अमित ने अच्छा काम किया है।'

लिएंडर पेस-वीस पेस
बचपन में मैं सॉकर खेला करता था। हमारी टीम का नाम था- कोला कोला। एक बार हमने गोल्ड स्पॉट टीम से फाइनल खेला था। मैच निर्णायक मोड़ पर था। ऐसे में मुझे पेनल्टी किक लगाने का मौका मिला, पर मैं चूक गया। हम मैच हार गए। मुझे लगा सब खत्म हो गया। सभी मुझे ही हार का जिम्मेदार मान रहे थे। ऐसे समय में मेरे पापा मेरे पास आए, मुझे उठाया और कंधे पर बिठाया। फिर पीठ पर झुलाते हुए सॉकर रू म तक ले गए। वे कहते रहे, 'सुनो, तुम सबसे अच्छे थे, तुम हो सकते हो और यही तुम्हें होना है। कभी-कभी चीजें आपके हाथ में नहीं होतीं और कभी उन्हें वैसा ही छोड़ देना चाहिए, जैसा कि वे असल में हैं।'

नितिन राय-रघु राय
जब मैं छोटा था, मुझे फोटोग्राफी की जगह संगीत ज्यादा आकर्षित करता था। मैं उन दिनों संगीतकार बनने का सपना देखता था। पर मेरे पिता के कलात्मक फोटोग्राफ मेरे अवचेतन मन को प्रभावित करते रहे। धीरे-धीरे उनका कैमरा बैग टांगकर मैं उनके फोटो शूट में उनका साथ देने लगा। डार्क रूम में भी उनके इर्द-गिर्द ही घूमता रहता और मेरे अंदर चित्रों के प्रति कलात्मक समझ पैदा होती गई। मम्मी पत्रकार थी, उनकी स्टोरीज के लिए मैं फोटोग्राफ उपलब्ध कराने लगा। हाई स्कूल में 'टारगेट' मैग्जीन के लिए फोटोग्राफ खींचने लगा। पिताजी अक्सर कहते, 'पहले काम की पूरी बारीकियां सीखो, फिर उसमें हाथ आजमाओ।' आज मुझे उनकी वे बातें याद आती हैं।

प्रिया दत्त-सुनील दत्त
मैं सिर्फ 13 साल की थी, तभी मेरी मां का निधन हो गया। उस वक्त पापा ही हमारे लिए मां बन गए थे। हमारे स्कूलों में जाना, नाटकों में जाना... वे सब कुछ करते थे। इतने बिजी शेड्यूल में भी वे हमारे लिए समय निकालते थे। सन 1987 में पिताजी दंगों से झुलसे भारत देश में शांति के उद्देश्य से मुंबई से अमृतसर पदयात्रा पर निकले। मैंने कहा, 'पापा, मैं भी आपके साथ आना चाहती हूं।' पापा ने मुझे इसी बात के साथ इजाजत दी कि मैं अगले साल कॉलेज रिपीट करूं। मैंने इस यात्रा में पापा से जो मानवीय मूल्य ग्रहण किए, वे आज भी काम आ रहे हैं।

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ये भी खूब है



1. ममता बनर्जी की हर अदा निराली है

कड़वी स्पीच भी लगती मीठी कव्वाली है

थोड़ी अडिय़ल, थोड़ी तुकनमिजाज है

नंदीग्राम हिंसा पर सख्त एतराज है

पहले भी दे चुकी लोकसभा से इस्तीफा

इस बार फिर अपनी भड़ास निकाली है


2. राहुल बाबा देश के नए तारणहार हैं

इस युवराज पर सारे मुल्क का भार है

महासचिव की पगड़ी बांधे

गुजरात में लगा रहे हैं नारे

कांग्रेसिए चल रहे पीछे

सोच के अब होंगे वारे-न्यारे।


3. हैदराबाद हरिकेन विवादों का दूसरा है नाम,

जलवाए खास का, मक्का मस्जिद है नया मुकाम

टेनिस परी ने सैकड़ों बार, कैमरा किया फेस

मीडिया हरदम करती चेंज

इस बार मामले को तूल ना दिया

मांफी मांगी, कहा भूल चूक में गुनाह किया


4. कॉलम लिखने पर बात बिगड़ गई

क्रिकेटिया बीसीसीआई कर्नल पर चढ़ गई

पहले कदम खींच लिए पीछे

फिर किया आत्ममंथन, मैं क्यों रहूं नीचे

पलटवार कर जबानी चाबुक मारा

कलमचियों पर प्रहार किया करारा


5. पहले हाथ का साथ छोड़ा

फिर कमल को पूरा निचोड़ा

किया था वादा येदूरिप्पा से

राज करेंगे थोड़ा-थोड़ा

खुद की ट्वेंटी पारी खेल ली

अब मुकर गए देवगौड़ा


6. तुझ संग प्रीत लगाई सजना

गीत शाहिद को नहीं सुहाया

लोलो को छोटे नवाब का साथ है भाया

'जब वी मैट' तो हो गई हिट

शाहिद-करीना की जोड़ी नहीं रही फीट

अब दीपिका पादुकोण से दिल मिलाएंगे

करीना को शाहिद खूब चिढ़ाएंगे


7. हमरा बाजीगर, खेल रहा है कौनसी बाजी

डर में जंचा था, दुल्हनिया आज भी ताजी

कभी के बी सी में जात हो धमक

कभी कर जात हो भारत कुमार की नकल

हद हो गई अब तो धोनी का बल्ला लिया पकड़


8. महाराजा ने भी हल्ला बोल दिया

बल्ले का मुंह खोल दिया

अख्तर एंड कंपनी को खूब धुना

तभी तो मैन ऑफ दी सीरीज चुना

वन डे में दादा दस हजारी हैं

टेस्ट में जलवे दिखाने की तैयारी है

पाक के बाद कंगारुओं की बारी है


9. परदेसन माधुरी नेने की वापसी करारी हुई,

आडियंस में पहले जमके खुमारी हुई,

शो छूटा, तो सबके ख्वाब टूट गए

दर्शकों ने सिर पीट लिया

'आजा नच ले' को भूल गए।


10. मोनिका भाभी लौट आई है गांव,

आसमां की बुलंदियों को छूने चले थे पांव,

कदम चले थे फिल्मी रास्ते पर

फिर डॉन की गलियों में मुड गए।

हसीना शिखर की जगह पहुंची जेलखाने

दुनिया भर के सुनने पड़े ताने

कमबख्त पहले समझ जाती, तो ये नौबत ना आती।


11. बडक़े अंबानी ने कामयाबी की लिखी नई इबारत है

बना रहे 27 मंजिला इमारत हैं।

शरीके ध्यात को जन्मदिन पर 242 करोड़ का तोहफा दे डाला

इस देश में जहां, लाखों को नसीब नहीं होता निवाला।

धन कुबरों के अजीबोगरीब शौक हैं

ये हकीकत है, ना कि जोक है


12. पिता कवि, बुद्धिजीवी हैं,

खुद महानायक बन गए हैं

चश्मे नूर भी बढ़ा रहे हैं शान

जमीन खरीदी बनके किसान

आफत में फंसे, तो जमीन कर दी दान।


(भाई संजय सोनगरा का योगदान साल 2008 आने पर )

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ए वतन ए वतन

1.मेरे वतन से अच्छा कोई वतन नहीं है।
सारे जहां में ऐसा कोई रतन नहीं है॥

2.शहीदों के मजारों पर, लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का, बाकी यही निशां होगा॥

3. कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा।
ये जिंदगी है कौम की, तू कौम पे लुटाए जा॥

4.तू शेरे हिंद आगे बढ़, मरने से तू कभी न डर।
उड़ा के दुश्मनों का सर, जोशे वतन बढ़ाए जा॥

5.दिल से निकलेगी न मरकर वतन की उल्फत
मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी॥


6. ऐ शहीदे- मुल्को- मिल्लत, तेरे जज्बो के निसार।
तेरी कुरबानी का चर्चा गैर की महफिल में है॥

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बातें खरीदारी की

खरीदारी करते समय हमें कुछ खास बातों का खयाल रखना चाहिए, ताकि अपने पैसे का सदुपयोग हो सके।
1हर वस्तु का बिल जरूर प्राप्त करें और संभालकर रखें।
2वस्तु के साथ मिलने वाली गारंटी या वारंटी के अंतर को भली-भांति समझ लें।
3एम आर पी पर भी तौल-मोल करके उचित मूल्य ही चुकाएं।
4मेडिकल वस्तुओं जैसे- दवाइयों की खरीदारी करते समय एक्सपायरी डेट जरूर जांच लें।
5वस्तु की खरीद करते समय उसके निर्माता, विक्रेता, ब्रांड नाम, गुणवत्ता, टिकाऊपन, टेक्नोलॉजी और उपयोगिता पर भी ध्यान दें।
6 ब्रिकी के बाद की सेवाओं की जानकारी भी लें। इलेक्ट्रोनिक उत्पाद खरीदते समय ध्यान रखें कि इसके पार्ट्स कहां मिलेंगे, उनकी सेवा कहां कराई जा सकेगी इत्यादि।
7 अगर उपहार योजना के तहत खरीद करते हैं, तो उपहार के बारे में भी पूरी जानकारी लें।
8. नकद खरीद और फायनेंस से खरीद में मूल्य का अंतर पता करें।
9. छुपे हुए मूल्यों की पड़ताल खरीद से पहले ही कर लें।
10. विज्ञापनों से प्रभावित होकर बिना सही जांच-पड़ताल के उत्पाद न खरीदें।
- आशीष जैन

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